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भारत के S-400 से परेशान है चीन? LAC के पास एक्सरसाइज में PLA ने 370 मिमी गाइडेड रॉकेट से एयर डिफेंस सिस्टम को बनाया निशाना, क्या है ड्रैगन की रणनीति?

India S-400 China Drill
(Image for representational Purpose only. AI-Generated Image)

India S-400 China Drill: भारत के एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम को लेकर चीन कितना घबराया हुआ है इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) ने हाल ही में एक सैन्य अभ्यास किया। , इस एक्सरसाइज में एस-400 जैसे एयर डिफेंस सिस्टम पर हमला करने का अभ्यास किया गया। हाल ही में पश्चिमी थिएटर कमांड की ओर से जारी वीडियो में 370 मिमी गाइडेड रॉकेट से एयर डिफेंस रडार पर हमला करते हुए दिखाया गया है।

चीन का पश्चिमी थिएटर कमांड भारत के साथ लगने वाली वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) की जिम्मेदारी संभालती है। अभ्यास के दौरान चीन ने लंबी दूरी तक मार करने वाले गाइडेड रॉकेट का इस्तेमाल करते हुए यह दिखाने की कोशिश की कि जरूरत पड़ने पर वह दुश्मन के एयर डिफेंस सिस्टम पर शुरुआती हमला कर सकता है।

India S-400 China Drill: किस हथियार का किया गया इस्तेमाल

अभ्यास में चीन ने 370 मिमी गाइडेड रॉकेट का इस्तेमाल किया। माना जाता है कि यह रॉकेट पीसीएल-191 मल्टीपल लॉन्च रॉकेट सिस्टम से दागा जाता है। यह चीन की नई पीढ़ी की लंबी दूरी की रॉकेट प्रणाली है।

यह रॉकेट सैटेलाइट नेविगेशन और इनर्शियल गाइडेंस सिस्टम की मदद से अपने तय स्थान तक पहुंचता है। अलग-अलग संस्करणों की मारक क्षमता लगभग 300 से 350 किलोमीटर तक बताई जाती है।

चीन ने रॉकेट आर्टिलरी पर क्यों बढ़ाया जोर

पश्चिमी थिएटर कमांड ने पिछले कुछ सालों में अपनी लंबी दूरी की रॉकेट क्षमता में काफी बढ़ोतरी की है। इसमें पीसीएल-191 जैसे आधुनिक मल्टीपल लॉन्च रॉकेट सिस्टम शामिल हैं। यह सिस्टम कुछ ही मिनटों में कई गाइडेड रॉकेट दाग सकता है।

रिपोर्टों के मुताबिक 370 मिमी गाइडेड रॉकेट सैटेलाइट और इनर्शियल गाइडेंस की मदद से लंबी दूरी तक पहुंच सकते हैं। ऐसे हथियारों का इस्तेमाल स्थिर सैन्य ठिकानों, रडार स्टेशन, मिसाइल बैटरियों और कमांड सेंटर पर हमला करने के लिए किया जाता है।

साल 2020 में पूर्वी लद्दाख में भारत और चीन के बीच तनाव बढ़ने के बाद पीएलए ने तिब्बत और शिनजियांग क्षेत्र में अपनी सैन्य मौजूदगी लगातार मजबूत की है।

पश्चिमी थिएटर कमांड ने इन इलाकों में लंबी दूरी की रॉकेट प्रणाली, ड्रोन, निगरानी उपकरण और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम की संख्या बढ़ाई है। (India S-400 China Drill)

क्या है इस रणनीति का मतलब

चीन की यह एक्सरसाइज ‘सप्रेशन ऑफ एनिमी एयर डिफेंसिस (SEAD)’ और ‘डिस्ट्रक्शन ऑफ एनिमी एयर डिफेंसिस (DEAD)’ रणनीति पर आधारित थी। आधुनिक युद्ध में इन दोनों रणनीतियों का उद्देश्य किसी भी बड़े सैन्य अभियान की शुरुआत में दुश्मन के एयर डिफेंस सिस्टम को कमजोर या पूरी तरह निष्क्रिय करना होता है। इसके लिए पहले एयर डिफेंस रडार, मिसाइल लॉन्चर, कमांड सेंटर और अन्य महत्वपूर्ण ठिकानों की पहचान की जाती है। इसके बाद लंबी दूरी के गाइडेड रॉकेट, मिसाइल, ड्रोन, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम और अन्य हथियारों की मदद से उन पर एक साथ हमला किया जाता है, ताकि विरोधी की हवाई सुरक्षा कमजोर पड़ जाए। जब एयर डिफेंस सिस्टम प्रभावी ढंग से काम नहीं कर पाते, तब लड़ाकू विमान और अन्य हमलावर प्लेटफॉर्म अपेक्षाकृत कम जोखिम के साथ अपने मिशन पूरे कर सकते हैं।

चीन के हालिया अभ्यास से यह संकेत मिलता है कि उसकी सेना भविष्य में किसी भी बड़े संघर्ष की शुरुआत में सबसे पहले विरोधी के एयर डिफेंस नेटवर्क को निशाना बनाने की तैयारी पर विशेष ध्यान दे रही है। इसी सोच के तहत पीएलए ने अपने युद्धाभ्यास में गाइडेड रॉकेट, लंबी दूरी की मारक क्षमता और आधुनिक हमले की तकनीकों का प्रदर्शन किया। यह अभ्यास चीन की बदलती सैन्य रणनीति और संयुक्त युद्ध क्षमता को भी दर्शाता है।

India S-400 China Drill
PLA Western Theater Command has released footage from an exercise showing a PCL-191 multiple launch rocket system (MLRS) simulating the destruction of a 92N6E fire-control radar – part of the S-400 air defence system.

अब केवल लड़ाकू विमानों पर निर्भर नहीं चीन

कुछ साल पहले तक लड़ाकू विमानों किसी भी देश की सुरक्षा की रीढ़ होते थे। लेकिन अब चीन अपनी रणनीति बदल रहा है। रिपोर्टों के अनुसार पीएलए अब रॉकेट आर्टिलरी, ड्रोन, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर और साइबर हमलों का एक साथ इस्तेमाल करने की तैयारी कर रही है। इसका उद्देश्य युद्ध की शुरुआत में ही कम्युनिकेशन नेटवर्क, रडार, एयर डिफेंस सिस्टम और कमांड सेंटर को प्रभावित करना होता है। इसे मल्टी-डोमेन ऑपरेशन की रणनीति कहा जाता है, जिसमें एक साथ कई तरह के सैन्य साधनों का इस्तेमाल किया जाता है। (India S-400 China Drill)

भारत के लिए एस-400 क्यों अहम

भारत ने रूस से पांच एस-400 ट्रायम्फ एयर डिफेंस सिस्टम खरीदे हैं। यह दुनिया के सबसे आधुनिक लंबी दूरी के एयर डिफेंस सिस्टम में गिना जाता है। इसके अलावा रक्षा मंत्रालय पहले ही अतिरिक्त पांच एस-400 स्क्वाड्रन खरीदने के प्रस्ताव को मंजूरी दे चुका है। जिसके बाद भारत के पास कुल 10 एस-400 स्क्वाड्रन हो जाएंगे।

एस-400 एक साथ कई तरह के हवाई खतरों पर नजर रख सकता है। यह लड़ाकू विमान, ड्रोन, क्रूज मिसाइल और बैलिस्टिक मिसाइल को अलग-अलग दूरी पर रोकने की क्षमता रखता है। इसकी अधिकतम मारक क्षमता लगभग 400 किलोमीटर तक बताई जाती है।

भारतीय वायुसेना ने इसे उत्तर और पश्चिमी सीमाओं की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए तैनात किया है। यह प्रणाली भारतीय वायुसेना के इंटीग्रेटेड एयर कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम के साथ मिलकर काम करती है, जिससे अलग-अलग रडार और एयर डिफेंस नेटवर्क से जानकारी एक साथ मिलती रहती है। (India S-400 China Drill)

भारत भी लगातार मजबूत कर रहा है अपनी हवाई सुरक्षा

भारत भी बदलते युद्ध के स्वरूप को देखते हुए अपनी हवाई सुरक्षा व्यवस्था को लगातार मजबूत कर रहा है। एस-400 के अलावा आकाश मिसाइल सिस्टम, बराक-8, क्यूआरएसएएम और बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस जैसी कई प्रणालियां अलग-अलग स्तर पर सुरक्षा देती हैं। इन सभी को जोड़कर मल्टी-लेयर एयर डिफेंस नेटवर्क तैयार किया गया है।

इसके अलावा डीआरडीओ लंबे समय से प्रोजेक्ट कुशा पर भी काम कर रहा है। यह भारत का स्वदेशी लंबी दूरी का एयर डिफेंस सिस्टम है। इसका उद्देश्य भविष्य में विदेशी प्रणालियों पर निर्भरता कम करना और स्वदेशी क्षमता को मजबूत करना है।

भारतीय सेना और वायुसेना लगातार कर रही हैं अभ्यास

भारतीय सेना और वायुसेना भी समय-समय पर संयुक्त सैन्य अभ्यास करती रहती हैं। इन अभ्यासों में एयर डिफेंस सिस्टम, लड़ाकू विमान, मिसाइल इकाइयों और रडार नेटवर्क के बीच तालमेल की जांच की जाती है। साथ ही तेजी से तैनाती, स्थान बदलने और इलेक्ट्रॉनिक सुरक्षा से जुड़े अभ्यास भी किए जाते हैं। आधुनिक युद्ध में केवल अत्याधुनिक हथियार होना ही पर्याप्त नहीं है। उन्हें तेजी से तैनात करना, सुरक्षित रखना और पूरे नेटवर्क के साथ जोड़कर इस्तेमाल करना भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है। (India S-400 China Drill)

भारतीय वायुसेना को निगरानी के लिए मिलेगा ‘हवा में उड़ता सैटेलाइट’, 20 किमी की ऊंचाई पर AS-HAPS महीनों तक करेगा निगरानी

AS-HAPS Project India
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AS-HAPS Project India: भारतीय वायुसेना को जल्द ही ऐसी टेक्नोलॉजी मिलने वाली है जिसमें उसे बिना अंतरिक्ष में गए ही दुश्मन की निगरानी कर सकेगी। रक्षा मंत्रालय ने एयरशिप आधारित हाई एल्टीट्यूड स्यूडो सैटेलाइट (AS-HAPS) के डिजाइन और विकास के लिए एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (ईओआई) जारी कर दिया है। यह प्रोजेक्ट डीएपी-2020 की मेक-1 कैटेगरी के तहत शुरू किया गया है।

खास बात यह है कि इस महीने की शुरुआत में हुई डीएसी की बैठक में भारतीय वायुसेना के लिए फिक्स्ड-विंग हाई एल्टीट्यूड स्यूडो सैटेलाइट (FW-HAPS) की खरीद को भी मंजूरी दी थी। वहीं अब एयरशिप बेस्ड सिस्टम के लिए डेवलपमेंट प्रोसेस शुरू होने से भारत एक साथ दो अलग-अलग तरह के हाई एल्टीट्यूड स्यूडो सैटेलाइट प्लेटफॉर्म पर काम कर रहा है।

AS-HAPS Project India: क्या है हाई एल्टीट्यूड स्यूडो सैटेलाइट

सूत्रों के मुताबिक, हाई एल्टीट्यूड स्यूडो सैटेलाइट ऐसा मानव रहित प्लेटफॉर्म होता है, जो धरती की सतह से करीब 18 से 20 किलोमीटर की ऊंचाई पर लंबे समय तक उड़ान भर सकता है। यह ऊंचाई सामान्य यात्री विमानों से काफी अधिक होती है और मौसम का असर भी बहुत कम रहता है।

इसे स्यूडो सैटेलाइट इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह अंतरिक्ष में मौजूद सैटेलाइट की तरह लगातार एक निश्चित क्षेत्र पर नजर बनाए रख सकता है। फर्क सिर्फ इतना है कि इसे जरूरत पड़ने पर वापस जमीन पर उतारा जा सकता है और दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता है।

एयरशिप बेस्ड सिस्टम क्यों है खास

सूत्रों के मुताबिक इस प्रोजेक्ट में वायुसेना एयरशिप बेस्ड प्लेटफॉर्म डेवलप कराना चाहती है। यह गैस से भरा एक बड़ा एयरशिप होगा, जो सौर ऊर्जा और अन्य ऊर्जा प्रणालियों की मदद से लंबे समय तक हवा में रह सकेगा।

इसकी सबसे बड़ी खूबी यह होगी कि यह एक ही इलाके के ऊपर कई दिनों या कई सप्ताह तक लगातार उड़ान भर सकता है। इसी वजह से यह सीमा क्षेत्रों, समुद्री इलाकों और दूर-दराज के क्षेत्रों में लगातार निगरानी रखने के लिए काफी उपयोगी माना जा रहा है। (AS-HAPS Project India)

20 किलोमीटर ऊंचाई पर करेगा काम

सूत्रों के अनुसार, एएस-एचएपीएस को करीब 18 से 20 किलोमीटर की ऊंचाई पर काम करने के लिए तैयार किया जाएगा। इस ऊंचाई पर वायुमंडल अपेक्षाकृत स्थिर होता है, जिससे प्लेटफॉर्म लंबे समय तक कम से कम एक महीने तक एक ही इलाके में रह सकता है।

वहीं, यह प्लेटफॉर्म केवल निगरानी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसमें ऐसे उपकरण लगाए जा सकेंगे, जिनकी मदद से खुफिया जानकारी जुटाई जा सके, दूर-दराज के इलाकों में कम्युनिकेशन फैसिलिटी उपलब्ध कराई जा सके और विभिन्न प्रकार के सेंसर्स के जरिए जमीन पर हो रही गतिविधियों पर लगातार नजर रखी जा सके।

इसमें इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल कैमरे, इन्फ्रारेड सेंसर, रडार, कम्युनिकेशन रिले सिस्टम और अन्य विशेष 500-2000 किग्रा तक के पेलोड लगाए जा सकते हैं। जरूरत के अनुसार अलग-अलग मिशन के लिए इसका पेलोड बदला भी जा सकेगा।

सैटेलाइट से सस्ता और ज्यादा लचीला विकल्प

सूत्रों का कहना है कि हाई एल्टीट्यूड स्यूडो सैटेलाइट का सबसे बड़ा फायदा इसकी लागत और संचालन है। किसी सैटेलाइट को अंतरिक्ष में भेजने के लिए रॉकेट की जरूरत होती है, जबकि एएस-एचएपीएस को जमीन से उड़ाया जा सकता है।

जरूरत पूरी होने के बाद इसे वापस उतारकर रखरखाव किया जा सकता है और फिर दोबारा उड़ान पर भेजा जा सकता है। इसी कारण यह कई मिशनों में पारंपरिक सैटेलाइट का कम लागत वाला विकल्प माना जाता है।

मेक-1 कैटेगरी में होगा डेवलपमेंट

सूत्रों के मुताबिक, यह प्रोजेक्ट रक्षा खरीद प्रक्रिया-2020 की मेक-1 कैटेगरी के तहत शुरू किया गया है। इस मॉडल में सरकार और कंपनियां मिलकर नई डिफेंस टेक्नोलॉजी डेवलप करते हैं। विकास कार्य के दौरान सरकारी सहायता भी उपलब्ध कराई जाती है, ताकि देश में नई तकनीकों का विकास तेज हो सके।

भारतीय वायुसेना ने योग्य भारतीय कंपनियों और उद्योग समूहों से इस प्रोजेक्ट के लिए प्रस्ताव मांगे हैं। आवेदन की अंतिम तारीख 10 अगस्त तय की गई है। (AS-HAPS Project India)

डीएसी पहले ही दे चुकी है एक और एचएपीएस को मंजूरी

3 जुलाई को रक्षा अधिग्रहण परिषद ने भारतीय वायुसेना के लिए फिक्स्ड-विंग हाई एल्टीट्यूड स्यूडो सैटेलाइट की खरीद को स्वीकृति दी थी। यह विमान की तरह पंखों वाला मानव रहित प्लेटफॉर्म होगा, जो सौर ऊर्जा और बैटरी की मदद से कई सप्ताह तक स्ट्रेटोस्फियर में उड़ान भर सकेगा।

फिक्स्ड-विंग और एयरशिप बेस्ड दोनों सिस्टम्स अलग-अलग जरूरतों को पूरा करेंगे। फिक्स्ड-विंग प्लेटफॉर्म अपेक्षाकृत तेज रफ्तार से बड़े क्षेत्र में काम कर सकता है, जबकि एयरशिप आधारित प्लेटफॉर्म अधिक समय तक एक स्थान पर रहकर निगरानी करने के लिए उपयुक्त माना जाता है। (AS-HAPS Project India)

इसे बनाने में जुटीं कई कंपनियां

सूत्रों के मुताबिक, देश की कई कंपनियां पहले से ही इस तरह की तकनीक पर काम कर रही हैं। सरकारी क्षेत्र की नेशनल एयरोस्पेस लेबोरेटरीज और न्यूस्पेस रिसर्च एंड लैबोरेट्रीज समेत निजी क्षेत्र की कुछ डिफेंस कंपनियां लंबे समय तक उड़ान भरने वाले हाई एल्टीट्यूड प्लेटफॉर्म तैयार करने में जुटी हुई हैं। वहीं, रक्षा मंत्रालय के इस नए प्रोजेक्ट से इन कंपनियों को स्वदेशी सिस्टम डेवलप करने का मौका मिलेगा।

सूत्रों का कहना है कि भारतीय वायुसेना ऐसे प्लेटफॉर्म चाहती है, जो लंबे समय तक बिना रुके सीमावर्ती और समुद्री क्षेत्रों पर नजर रख सकें। लगातार उड़ान भरने की क्षमता के कारण यह प्रणाली खुफिया जानकारी जुटाने, संचार सहायता देने और निगरानी मिशनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। (AS-HAPS Project India)

INS Mahendragiri ने बनाए तीन बड़े रिकॉर्ड, 75% स्वदेशीकरण के साथ Project-17A ने रखी “बिल्डर नेवी” की नींव!

Project 17A INS Mahendragiri
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Project 17A INS Mahendragiri: भारतीय नौसेना कुछ दशक पहले तक ज्यादातर विदेशी डिजाइन और आयातित जहाजों पर निर्भर थी। ब्रिटिश लीएंडर क्लास या रूसी/ब्रिटिश तकनीक पर आधारित जहाजों का निर्माण होता था। लेकिन 21वीं सदी में स्थिति पूरी तरह बदल गई। भारतीय नौसेना के वॉरशिप डिजाइन ब्यूरो (WDB) ने स्वदेशी डिजाइन तैयार करना शुरू किया। वहीं, प्रोजेक्ट 17ए (नीलगिरी क्लास) इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।

प्रोजेक्ट 17ए के तहत बनाए गए छठे स्वदेशी स्टेल्थ फ्रिगेट आईएनएस महेंद्रगिरि को रिकॉर्ड टाइम में तैयार किया है। इस जहाज को शनिवार को विशाखापत्तनम में आयोजित समारोह में आईएनएस महेंद्रगिरि को आधिकारिक रूप से पूर्वी नौसैनिक बेड़े में शामिल किया गया। इसका डिजाइन भारतीय नौसेना के वारशिप डिजाइन ब्यूरो ने तैयार किया है, जबकि निर्माण मुंबई स्थित मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड (एमडीएल) ने किया है।

Project 17A INS Mahendragiri: निर्माण अवधि घटकर 95 से 75 महीने हुई

कमीशनिंग समारोह में नौसेना प्रमुख एडमिरल कृष्णा स्वामीनाथन ने बताया कि महेंद्रगिरि नाम ओडिशा के पूर्वी घाट में स्थित ऐतिहासिक महेंद्रगिरि पर्वत से लिया गया है। महेंद्रगिरि प्रोजेक्ट-17ए के तहत भारतीय नौसेना की पुराने गिरी क्लास फ्रिगेट्स से प्रेरित हैं, जिन्होंने वर्ष 1972 से 2013 तक देश की सेवा की थी।

नौसेना प्रमुख ने बताया कि महेंद्रगिरि के निर्माण के दौरान भारतीय शिपबिल्डिंग क्षेत्र ने कई नए रिकॉर्ड बनाए।
इसमें पहली उपलब्धि यह रही कि लॉन्चिंग से डिलीवरी तक का समय लगभग आधा कर दिया गया। पहले इस प्रक्रिया में लगभग 63 महीने लगते थे, जबकि महेंद्रगिरि के मामले में यह अवधि घटकर करीब 31 महीने रह गई।

दूसरी उपलब्धि पूरे निर्माण समय से जुड़ी रही है। पहले एक युद्धपोत तैयार होने में करीब 95 महीने लगते थे, लेकिन इस परियोजना में निर्माण अवधि घटकर लगभग 75 महीने रह गई। यानी निर्माण समय में लगभग 20 प्रतिशत की कमी लाई गई।

वहीं, तीसरी और सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि की चर्चा करते हुए चीफ ऑफ नेवल स्टाफ ने कहा कि पहले समुद्री परीक्षणों में बहुत समय लगता था। पहले किसी नए युद्धपोत को पूरी तरह तैयार घोषित करने से पहले पांच से सात समुद्री परीक्षण करने पड़ते थे, लेकिन महेंद्रगिरि ने पहले ही सी ट्रायल में सभी प्रमुख तकनीकी मानकों को सफलतापूर्वक पूरा कर लिया।

नौसेना प्रमुख ने कहा कि यह उपलब्धि भारतीय नौसेना, एमडीएल, वारशिप ओवरसीइंग टीम, परीक्षण एजेंसियों, रक्षा उद्योग और पूरे जहाज के दल के संयुक्त प्रयासों का परिणाम है।

Project 17A INS Mahendragiri
Image Source: Indian Navy

कोविड-19 महामारी में शुरू हुआ था निर्माण

समारोह में मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड (एमडीएल) के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक कैप्टन (सेवानिवृत्त) जगमोहन ने कहा कि महेंद्रगिरि का निर्माण उस समय शुरू हुआ, जब पूरी दुनिया कोविड-19 महामारी से जूझ रही थी। सप्लाई चेन प्रभावित थी, कर्मचारियों की आवाजाही सीमित थी और उद्योगों के सामने कई तरह की चुनौतियां थीं। इसके बावजूद परियोजना पर काम लगातार जारी रखा गया।

उन्होंने कहा कि भारतीय नौसेना, एमडीएल और रक्षा उद्योग के बीच बेहतर तालमेल की वजह से जहाज के प्रमुख हथियार और युद्ध प्रणाली डिलीवरी से पहले ही पूरी तरह तैयार कर दी गईं। यही वजह है कि महेंद्रगिरि पहले ही समुद्री परीक्षण में सभी आवश्यक तकनीकी मानकों पर खरा उतरा। (Project 17A INS Mahendragiri)

यह भी पढ़ें:  INS महेंद्रगिरि भारतीय नौसेना में शामिल, रक्षा मंत्री बोले- बदलते युद्ध के दौर में समुद्री शक्ति और आत्मनिर्भरता दोनों जरूरी

प्रोजेक्ट-17ए क्यों है खास

प्रोजेक्ट-17ए भारतीय नौसेना के सबसे महत्वपूर्ण स्वदेशी युद्धपोत निर्माण कार्यक्रमों में से एक है। यह पहले के शिवालिक क्लास के फ्रिगेट का एडवांस वर्जन है। इस प्रोजेक्ट के तहत कुल सात स्टेल्थ गाइडेड मिसाइल फ्रिगेट बनाए जा रहे हैं।

इनमें चार युद्धपोत मुंबई स्थित एमडीएल और तीन युद्धपोत कोलकाता की गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (जीआरएसई) ने बनाए हैं।

भारतीय नौसेना के लिए नई पीढ़ी के स्टेल्थ फ्रिगेट बनाने की योजना को डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल (डीएसी) ने वर्ष 2009 में मंजूरी दी थी। इसके बाद फरवरी 2015 में कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (सीसीएस) ने इस परियोजना के लिए करीब 45,381 करोड़ रुपये की स्वीकृति दी।

Project 17A INS Mahendragiri
Image Source: Indian Navy

प्रोजेक्ट-17ए में पहली बार इंटीग्रेटेड मॉड्यूलर कंस्ट्रक्शन तकनीक

खास बात यह है कि प्रोजेक्ट-17ए के युद्धपोतों के निर्माण में मॉड्यूलर कंस्ट्रक्शन तकनीक का इस्तेमाल किया गया। इस तरीके में पूरे जहाज को एक साथ नहीं बनाया जाता, बल्कि उसे 200 से 300 टन तक के कई बड़े हिस्सों (ब्लॉक्स) में बांट दिया जाता है।

इस प्रक्रिया में सबसे पहले पूरे जहाज का कंप्यूटर की मदद से डिजिटल डिजाइन तैयार किया जाता है। इसके बाद डिजाइन के अनुसार जहाज को कई बड़े हिस्सों में बांट दिया जाता है। फिर स्टील प्लेटों को काटकर जहाज का आगे का हिस्सा, बीच का हिस्सा और पीछे का हिस्सा जैसे अलग-अलग ब्लॉक्स बनाए जाते हैं।

जब ब्लॉक तैयार हो जाते हैं, तब उनके अंदर पहले से ही बिजली की केबल, पाइपलाइन, वेंटिलेशन सिस्टम और कई अन्य मशीनें फिट कर दी जाती हैं। इससे बाद में अलग से फिटिंग करने में कम समय लगता है। इसके बाद गोलायथ क्रेन जैसी भारी क्रेन से इन ब्लॉक्स को उठाकर एक जगह लाया जाता है और उन्हें बहुत सटीक तरीके से जोड़ दिया जाता है। सभी हिस्सों को वेल्डिंग करके एक पूरा जहाज तैयार किया जाता है। इसके बाद अंतिम उपकरण लगाए जाते हैं, सभी सिस्टम की जांच होती है और फिर जहाज को समुद्र में उतारकर सी ट्रायल किए जाते हैं।

इस आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल करने के लिए मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड (एमडीएल) और गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (जीआरएसई) ने अपने शिपयार्ड में विशेष सुविधाएं तैयार कीं। इनमें बड़ी गोलायथ क्रेन, आधुनिक मॉड्यूल वर्कशॉप और वेट बेसिन जैसी सुविधाएं शामिल हैं।

एमडीएल ने इस तकनीक को और बेहतर तरीके से अपनाने के लिए इटली की प्रसिद्ध जहाज निर्माण कंपनी फिनकांतिएरी से भी तकनीकी सहयोग लिया। इसी वजह से प्रोजेक्ट-17ए के युद्धपोत पहले की तुलना में कम समय में तैयार किए जा सके और उनकी निर्माण गुणवत्ता भी बेहतर हुई। (Project 17A INS Mahendragiri)

टाइमलाइन- एमडीएल में बने प्रोजेक्ट-17ए के ये जहाज

प्रोजेक्ट-17ए का पहला युद्धपोत आईएनएस नीलगिरि था। इसकी कील 28 दिसंबर 2017 को रखी गई और इसे 28 सितंबर 2019 को लॉन्च किया गया। कोविड-19 महामारी और अन्य वजहों से इसके समुद्री परीक्षण अगस्त 2024 में शुरू हो सके। जहाज 20 दिसंबर 2024 को नौसेना को सौंपा गया और 15 जनवरी 2025 को आईएनएस सूरत और आईएनएस वाघशीर के साथ भारतीय नौसेना में शामिल किया गया। यह इस परियोजना का पहला जहाज था, इसलिए इसके निर्माण में सबसे अधिक समय लगा। कई नई तकनीकों और प्रक्रियाओं को पहली बार लागू करने के कारण इसे तैयार होने में लगभग सात वर्ष लगे।

दूसरा युद्धपोत आईएनएस उदयगिरि था। इसकी कील 7 मई 2019 को रखी गई और 17 मई 2022 को इसे लॉन्च किया गया। केवल 37 महीनों में इसे तैयार कर 1 जुलाई 2025 को नौसेना को सौंप दिया गया। लॉन्च से डिलीवरी तक का यह समय पूरे प्रोजेक्ट-17ए क्लास में सबसे कम रहा। बाद में 26 अगस्त 2025 को इसे आईएनएस हिमगिरि के साथ एक ही समारोह में कमीशन किया गया।

तीसरे एमडीएल युद्धपोत आईएनएस तारागिरि की कील 10 सितंबर 2020 को रखी गई। इसे 11 सितंबर 2022 को लॉन्च किया गया। 28 नवंबर 2025 को इसकी डिलीवरी हुई और 3 अप्रैल 2026 को इसे भारतीय नौसेना में शामिल कर लिया गया।

इसके बाद आईएनएस महेंद्रगिरि की कील 28 जून 2022 को रखी गई। इसे 1 सितंबर 2023 को लॉन्च किया गया और 30 अप्रैल 2026 को नौसेना को सौंप दिया गया। वहीं आज 11 जुलाई 2026 को विशाखापत्तनम में इसकी कमीशनिंग हुई। (Project 17A INS Mahendragiri)

Project 17A INS Mahendragiri
Image Source: Indian Navy

जीआरएसई ने भी तैयार किए तीन आधुनिक युद्धपोत

कोलकाता स्थित जीआरएसई ने इस परियोजना के तहत तीन युद्धपोत बनाए।

पहला जहाज आईएनएस हिमगिरि था। इसकी कील 10 नवंबर 2018 को रखी गई, 14 दिसंबर 2020 को लॉन्च किया गया और 31 जुलाई 2025 को नौसेना को सौंपा गया। 26 अगस्त 2025 को इसे आईएनएस उदयगिरि के साथ कमीशन किया गया।

दूसरा जहाज आईएनएस दूनागिरि था। इसकी कील 24 जनवरी 2020 को रखी गई और 15 जुलाई 2022 को लॉन्च किया गया। 30 मार्च 2026 को इसकी डिलीवरी हुई और 21 जून 2026 को इसे आईएनएस संसोधक और आईएनएस अग्रय के साथ भारतीय नौसेना में शामिल किया गया।

वहीं, तीसरा और अंतिम जहाज आईएनएस विंध्यगिरि है। इसकी कील 5 मार्च 2021 को रखी गई और 17 अगस्त 2023 को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने इसे लॉन्च किया। यह इस परियोजना का अंतिम युद्धपोत है और इसका निर्माण अंतिम चरण में है। जो जल्द ही नौसेना में शामिल होगा। (Project 17A INS Mahendragiri)

इस पूरे प्रोजेक्ट-17ए की एक और बड़ी उपलब्धि यह रही कि दिसंबर 2024 में आईएनएस नीलगिरि की डिलीवरी के बाद अगले 17 महीनों से भी कम समय में छह प्रोजेक्ट-17ए युद्धपोत नौसेना को सौंप दिए गए। आईएनएस उदयगिरि ने लॉन्च से डिलीवरी तक केवल 37 महीने का समय लेकर पूरी क्लास में नया रिकॉर्ड बनाया।

आईएनएस दूनागिरि का निर्माण भी पहले जहाज की तुलना में काफी कम समय में पूरा हुआ। एक और बड़ी उपलब्धि यह रही कि दिसंबर 2024 में आईएनएस नीलगिरि की डिलीवरी के बाद अगले 17 महीनों से भी कम समय में छह प्रोजेक्ट-17ए युद्धपोत नौसेना को सौंप दिए गए।

इसी तरह आईएनएस तारागिरि पिछले 11 महीनों के दौरान डिलीवर होने वाला चौथा युद्धपोत बना। जबकि पूरी नीलगिरी क्लास 2026 के अंत तक ऑपरेशनल हो जाएगी।

आधुनिक युद्ध के लिए तैयार प्लेटफॉर्म

प्रोजेक्ट-17ए के सभी फ्रिगेट हवा, समुद्र और पानी के भीतर मौजूद खतरों से एक साथ मुकाबला करने में सक्षम हैं। इनमें सुपरसोनिक ब्रह्मोस क्रूज मिसाइल, बराक-8 मध्यम दूरी की वायु रक्षा मिसाइल, आधुनिक मल्टी-फंक्शन एईएसए रडार, टॉरपीडो लॉन्चर, पनडुब्बी रोधी रॉकेट प्रणाली, क्लोज-इन वेपन सिस्टम और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली लगी हैं।

करीब 149 मीटर लंबे और 6,670 टन वजनी इन युद्धपोतों में कंबाइंड डीजल ऑर गैस (सीओडीओजी) प्रोपल्शन सिस्टम लगाया गया है। यह इन्हें लंबी दूरी तक संचालन और लगभग 28 नॉट की अधिकतम गति प्रदान करता है। प्रत्येक जहाज पर लगभग 225 अधिकारी और नाविक तैनात किए जा सकते हैं।

इन युद्धपोतों में ऑटोमेशन का स्तर भी पहले की तुलना में काफी अधिक है। स्टेल्थ डिजाइन के कारण इनकी रडार पहचान कम होती है और आधुनिक सेंसर इन्हें समुद्री अभियानों के दौरान बेहतर स्थिति की जानकारी उपलब्ध कराते हैं। (Project 17A INS Mahendragiri)

Project 17A INS Mahendragiri
Image Source: Indian Navy

2026 में 18 शिप होंगे कमिशन!

मॉड्यूलर कंस्ट्रक्शन, स्वदेशी डिजाइन और शिपयार्ड्स की बढ़ती दक्षता के चलते जहाज अब रिकॉर्ड समय में तैयार हो रहे हैं। महेंद्रगिरि इस साल का छठा वॉरशिप है, जो नेवी में कमिशन किया गया है। वहीं इसी महीने नेवी में एक और स्वदेशी पनडुब्बी रोधी युद्धक पोत आईएनएस मालवान कमिशन होना है। जबकि अगले दो महीने में नेवी को 4 और शिप मिलेंगे। वहीं, इस साल 2026 में नेवी में 18 शिप कमिशन होंगे। बता दें कि नेवी के लिए इस वक्त 40 से ज्यादा शिप बन रहे हैं, जो आने वाले सालों में कमिशन किए जाएंगे। (Project 17A INS Mahendragiri)

INS महेंद्रगिरि भारतीय नौसेना में शामिल, रक्षा मंत्री बोले- बदलते युद्ध के दौर में समुद्री शक्ति और आत्मनिर्भरता दोनों जरूरी

INS Mahendragiri Commissioned
(Image Source: Indian Navy)

INS Mahendragiri Commissioned: भारतीय नौसेना को शनिवार को एक और अत्याधुनिक स्वदेशी स्टेल्थ फ्रिगेट मिल गया। आईएनएस महेंद्रगिरि को विशाखापत्तनम में पूर्वी नौसैनिक बेड़े में औपचारिक रूप से शामिल किया गया। यह युद्धपोत प्रोजेक्ट-17ए के तहत तैयार किया गया छठा स्टेल्थ फ्रिगेट है और इसका निर्माण मुंबई स्थित मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड (एमडीएल) ने किया है।

इस मौके पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि महेंद्रगिरि का नौसेना में शामिल होना केवल एक नए युद्धपोत की शुरुआत नहीं है, बल्कि यह भारत की बढ़ती समुद्री शक्ति, स्वदेशी रक्षा उत्पादन और आधुनिक युद्धपोत निर्माण क्षमता का भी प्रमाण है।

INS Mahendragiri Commissioned: पूर्वी समुद्री क्षेत्र को मिलेगी नई ताकत

रक्षा मंत्री ने कहा कि आईएनएस महेंद्रगिरि के नौसेना में शामिल होने से पूर्वी बेड़े की युद्ध क्षमता और मजबूत होगी। इससे भारतीय नौसेना की ब्लू वॉटर क्षमता और हिंद महासागर क्षेत्र में उसकी मौजूदगी को भी नई मजबूती मिलेगी।

अपने संबोधन में रक्षा मंत्री ने कहा कि विशाखापत्तनम आज केवल पूर्वी नौसैनिक कमान का मुख्यालय नहीं है, बल्कि भारत की समुद्री सुरक्षा का एक प्रमुख केंद्र बन चुका है। पिछले कुछ सालों में इस शहर ने कई बड़े अंतरराष्ट्रीय नौसैनिक कार्यक्रमों की मेजबानी की है। इससे भारत की समुद्री कूटनीति और मित्र देशों के साथ सहयोग भी मजबूत हुआ है।

उन्होंने कहा कि आंध्र प्रदेश अब रक्षा और एयरोस्पेस क्षेत्र का भी महत्वपूर्ण केंद्र बन रहा है। यहां रक्षा उत्पादन, सैन्य प्लेटफॉर्म, परीक्षण सुविधाओं और नई तकनीकों पर तेजी से काम हो रहा है। देश के स्वदेशी पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान कार्यक्रम से जुड़े कई महत्वपूर्ण कार्य भी इसी राज्य में किए जा रहे हैं।

आत्मनिर्भर भारत का मजबूत उदाहरण है महेंद्रगिरि

राजनाथ सिंह ने कहा कि आईएनएस महेंद्रगिरि आत्मनिर्भर भारत अभियान का एक बड़ा उदाहरण है। इसका निर्माण भारतीय नौसेना के वारशिप डिजाइन ब्यूरो द्वारा तैयार डिजाइन के आधार पर एमडीएल ने किया है। उन्होंने कहा कि इस युद्धपोत के निर्माण में देश के अनेक रक्षा उद्योगों, सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों तथा निजी कंपनियों ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इससे देश का रक्षा औद्योगिक आधार और मजबूत हुआ है।

तकनीकों को अपनाना जरूरी

रक्षा मंत्री ने कहा कि दुनिया में युद्ध का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, साइबर युद्ध, अंतरिक्ष आधारित तकनीक, हाइपरसोनिक हथियार और मानव रहित प्रणालियां आधुनिक सैन्य अभियानों का हिस्सा बन चुकी हैं।

उन्होंने कहा कि नई तकनीकों को अपनाना जरूरी है, लेकिन इसके साथ पारंपरिक सैन्य क्षमताओं को भी मजबूत बनाए रखना होगा। उनके अनुसार भविष्य के युद्धों में तकनीक महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी, लेकिन किसी भी देश की वास्तविक ताकत उसके प्रशिक्षित सैनिक, मजबूत सैन्य संगठन और राष्ट्रीय संकल्प से ही तय होगी।

ऑपरेशन सिंदूर से मिले सबक

रक्षा मंत्री ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर ने यह साबित किया कि भारत की सेनाएं हर चुनौती का प्रभावी जवाब देने में पूरी तरह सक्षम हैं। इस अभियान ने हमारी संयुक्त सैन्य क्षमता, तकनीकी दक्षता और बेहतर समन्वय को दुनिया के सामने प्रदर्शित किया।

वहीं, हिंद महासागर में भारत की बढ़ती भूमिका पर बोलते हुए रक्षा मंत्री ने कहा कि आज समुद्री सुरक्षा केवल नौसेना का विषय नहीं रह गई है। यह देश की आर्थिक सुरक्षा और वैश्विक व्यापार से भी जुड़ी हुई है।

भारत हिंद-प्रशांत क्षेत्र में एक जिम्मेदार और भरोसेमंद साझेदार के रूप में अपनी भूमिका निभा रहा है।

उन्होंने कहा कि हमारी नौसेना ने बार-बार यह साबित किया है कि चाहे किसी समुद्री क्षेत्र में राहत अभियान चलाना हो, समुद्री डकैती रोकनी हो, प्राकृतिक आपदा में सहायता पहुंचानी हो या संकट में फंसे देशों की मदद करनी हो, भारतीय नौसेना हमेशा सबसे पहले पहुंचती है।

इसी कारण भारतीय नौसेना को आज दुनिया में “फर्स्ट रिस्पॉन्डर” और “प्रीफर्ड सिक्योरिटी पार्टनर” के रूप में देखा जाता है। (INS Mahendragiri Commissioned)

आंध्र प्रदेश में तेजी से बढ़ रहा रक्षा उद्योग

रक्षा मंत्री ने कहा कि अनकापल्ली जिले में भारत डायनेमिक्स लिमिटेड की नई नेवल सिस्टम कंस्ट्रक्शन युनिट डेवलप की जा रही है। इस इकाई में ऑटोनॉमस पानी में चलने वाले वाहन, टॉरपीडो और अंडरवॉटर काउंटर मेजर सिस्टम जैसे आधुनिक रक्षा उपकरण बनाए जाएंगे। पहले इन प्रणालियों के लिए विदेशों पर निर्भर रहना पड़ता था।

उन्होंने यह भी बताया कि कर्नूल को देश के बड़े ड्रोन निर्माण केंद्र के रूप में विकसित करने का प्रयास किया जा रहा है। जिस तरह सूरत हीरा उद्योग और बेंगलुरु सूचना प्रौद्योगिकी के लिए जाना जाता है, उसी तरह कर्नूल को मानव रहित प्रणालियों के प्रमुख केंद्र के रूप में विकसित करने की दिशा में काम चल रहा है।

रक्षा मंत्री ने कहा कि महेंद्रगिरि के नौसेना में शामिल होने के साथ आंध्र प्रदेश समुद्री सुरक्षा और मानव रहित रक्षा तकनीक, दोनों क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है। (INS Mahendragiri Commissioned)

तय समय सीमा के भीतर पूरा किया गया महेंद्रगिरी

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने अपने भाषण के दौरान कहा कि महेंद्रगिरि का निर्माण तय समय सीमा के भीतर पूरा किया गया है। यह केवल एक युद्धपोत नहीं, बल्कि भारत की बढ़ती तकनीकी क्षमता, कुशल मानव संसाधन और मजबूत रक्षा उद्योग का प्रतीक है।

उन्होंने कहा कि हर नए युद्धपोत के साथ देश का रक्षा उद्योग और अधिक परिपक्व, सक्षम और आत्मविश्वासी बनता जा रहा है।

रक्षा मंत्री ने कहा कि जहाज निर्माण केवल एक उद्योग नहीं है। इससे इस्पात, इलेक्ट्रॉनिक्स, सेंसर, इंजन, सॉफ्टवेयर, प्रिसीजन इंजीनियरिंग, लॉजिस्टिक्स और अनेक सहायक उद्योगों को भी काम मिलता है। इसी कारण सरकार जहाज निर्माण क्षेत्र में लंबे समय के निवेश को बढ़ावा दे रही है।

उन्होंने कहा कि हमारा लक्ष्य भारत को वैश्विक स्तर पर जहाज निर्माण और समुद्री रक्षा तकनीक का प्रमुख केंद्र बनाना है। इसमें निजी उद्योग, एमएसएमई, स्टार्टअप, नवाचार करने वाले युवा और वैश्विक साझेदार सभी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

रक्षा मंत्री ने बताया कि सरकार ने मैरीटाइम डेवलपमेंट फंड, शिपबिल्डिंग फाइनेंशियल असिस्टेंस स्कीम और शिपबिल्डिंग डेवलपमेंट स्कीम जैसी कई योजनाएं शुरू की हैं। इन योजनाओं से देश का औद्योगिक आधार मजबूत होगा, जहाज निर्माण क्षमता बढ़ेगी और भारत अपने समुद्री तथा आर्थिक हितों की रक्षा के लिए और अधिक सक्षम बनेगा।

नेवी चीफ बोले- विशाखापत्तनम बना समुद्री सुरक्षा का प्रमुख केंद्र

वहीं, इस मौके पर बोलते हुए नौसेना प्रमुख एडमिरल कृष्णा स्वामीनाथन ने कहा कि विशाखापत्तनम समुद्री सुरक्षा का प्रमुख केंद्र बन चुका है। यह शहर भारत के समुद्री दृष्टिकोण और पूर्वी समुद्री क्षेत्र में हमारी रणनीतिक सोच का प्रमुख केंद्र बन चुका है।

उन्होंने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में विशाखापत्तनम ने अंतरराष्ट्रीय फ्लीट रिव्यू, मिलन नौसैनिक अभ्यास, इंडियन ओशन नेवल संगोष्ठी (आईओएनएस) और कई महत्वपूर्ण समुद्री कार्यक्रमों की सफल मेजबानी की है। इन आयोजनों ने भारत की समुद्री कूटनीति और मित्र देशों के साथ सहयोग को नई मजबूती दी है। उन्होंने कहा कि भारत के पूर्वी समुद्री तट की सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता में विशाखापत्तनम की भूमिका लगातार बढ़ती जा रही है। (INS Mahendragiri Commissioned)

महेंद्रगिरि ने जोड़ा पूर्वी और पश्चिमी तट

नौसेना प्रमुख ने कहा कि महेंद्रगिरि का निर्माण मुंबई स्थित मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड में हुआ, जबकि इसे भारतीय नौसेना के पूर्वी बेड़े में शामिल किया जा रहा है। एक तरह से यह युद्धपोत भारत के पश्चिमी और पूर्वी दोनों समुद्री तटों को जोड़ने का प्रतीक है। यह हमारी एकीकृत, आधुनिक और बहु-केंद्रित नौसैनिक क्षमता को भी दर्शाता है।

उन्होंने कहा कि मुझे पूरा विश्वास है कि आईएनएस महेंद्रगिरि भारतीय नौसेना की युद्ध क्षमता को और मजबूत करेगा। यह जहाज देश के समुद्री हितों की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा और पूर्वी बेड़े की ताकत को बढ़ाएगा। उन्होंने कहा कि महेंद्रगिरि का ध्येय वाक्य “माइटी, मेजेस्टिक, मैचलेस” है। मुझे विश्वास है कि यह युद्धपोत अपने नाम और अपने आदर्शों के अनुरूप हर मिशन में उत्कृष्ट प्रदर्शन करेगा। (INS Mahendragiri Commissioned)

इन प्रोजेक्ट्स से एमडीएल में मिलीं छह हजार नौकरियां

वहीं, इस मौके पर बोलते हुए एमडीएल के चैयरमेन और एमडी रिटायर्ड कैप्टन जगमोहन ने बताया कि महेंद्रगिरि के शामिल होने के साथ ही एमडीएल ने पिछले लगभग 20 सालों में भारतीय नौसेना द्वारा सौंपे गए सभी प्रमुख युद्धपोत निर्माण कार्यक्रम पूरे कर लिए हैं।

इन परियोजनाओं की कुल लागत लगभग 85 हजार करोड़ रुपये रही है। इन परियोजनाओं ने भारत की समुद्री सुरक्षा को मजबूत किया है और देश में आधुनिक जहाज निर्माण की क्षमता को नई ऊंचाई दी है।

उन्होंने कहा कि इन परियोजनाओं से एमडीएल में छह हजार से अधिक कुशल कर्मचारियों को लगातार रोजगार मिला।

इसके अलावा देशभर में 25 हजार से अधिक अतिरिक्त रोजगार के अवसर भी पैदा हुए। 500 से अधिक सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग (एमएसएमई) इन परियोजनाओं का हिस्सा बने।

इनमें से कई कंपनियां शुरुआत में छोटी आपूर्तिकर्ता थीं, लेकिन आज वे भारतीय रक्षा उद्योग की भरोसेमंद साझेदार बन चुकी हैं। मेरे विचार से यही आत्मनिर्भर भारत की सबसे बड़ी सफलता है। (INS Mahendragiri Commissioned)

एमडीएल ने बनाईं कलवरी क्लास की छह पनडुब्बियां

कैप्टन जगमोहन ने बताया कि एमडीएल द्वारा बनाए गए कलवरी श्रेणी की छह पनडुब्बियां, विशाखापत्तनम श्रेणी के चार विध्वंसक युद्धपोत और प्रोजेक्ट-17ए की चार फ्रिगेट आज भारतीय नौसेना की अग्रिम युद्ध क्षमता का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

इनमें से हर प्लेटफॉर्म भारत की तकनीकी क्षमता और स्वदेशी जहाज निर्माण की सफलता का उदाहरण है। इन्हें भारतीय नौसेना के वारशिप डिजाइन ब्यूरो, वारशिप ओवरसीइंग टीम, एमडीएल और भारतीय उद्योगों के संयुक्त प्रयास से तैयार किया गया है। (INS Mahendragiri Commissioned)

20 हजार करोड़ रुपये का नया मेगा शिपयार्ड

एमडीएल के एमडी कैप्टन जगमोहन ने बताया कि महेंद्रगिरि के कमीशनिंग के साथ भविष्य की योजनाओं पर भी तेजी से काम जारी है। उन्होंने बताया कि एमडीएल एक नए मेगा शिपयार्ड की स्थापना की योजना पर काम कर रहा है। इस परियोजना में 20 हजार करोड़ रुपये से अधिक का निवेश प्रस्तावित है।

इस नए शिपयार्ड में बड़े वाणिज्यिक जहाजों का निर्माण किया जाएगा। साथ ही यह भारत की क्षमता को बड़े नौसैनिक जहाजों के निर्माण, रखरखाव और आधुनिकीकरण के क्षेत्र में भी मजबूत करेगा।

यह परियोजना भारत सरकार के समुद्री अमृतकाल विजन-2047 को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी और भारत को दुनिया के प्रमुख जहाज निर्माण देशों में शामिल करने की दिशा में मदद करेगी।

75 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री से तैयार हुआ युद्धपोत

आईएनएस महेंद्रगिरि का वजन लगभग 6,670 टन है। यह एक बहुउद्देश्यीय स्टेल्थ फ्रिगेट है, जिसे समुद्र में अलग-अलग प्रकार के अभियानों के लिए तैयार किया गया है। इसका नाम ओडिशा के प्रसिद्ध महेंद्रगिरि पर्वत के नाम पर रखा गया है।

इस युद्धपोत में लगभग 75 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री का उपयोग किया गया है। इसमें इस्तेमाल होने वाले कई प्रमुख सिस्टम, सेंसर और उपकरण भारतीय उद्योगों ने तैयार किए हैं। इससे देश की डिजाइन क्षमता, निर्माण कौशल और रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता का स्तर बढ़ा है। (INS Mahendragiri Commissioned)

आधुनिक हथियारों और सेंसर से लैस

महेंद्रगिरि को आधुनिक समुद्री युद्ध की जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। इसमें लंबी दूरी तक निगरानी करने वाला मल्टी-फंक्शन रडार लगाया गया है। यह रडार एक साथ कई हवाई और समुद्री टारगेट्स पर नजर रख सकता है।

युद्धपोत में लंबी दूरी की सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल प्रणाली, सुपरसोनिक ब्रह्मोस क्रूज मिसाइल, पनडुब्बी रोधी हथियार, टॉरपीडो लॉन्चर, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली और क्लोज-इन वेपन सिस्टम लगाए गए हैं। इसके अलावा इसमें आधुनिक सेंसर लगाए गए हैं, जो समुद्र के ऊपर और नीचे मौजूद खतरों का पता लगाने में मदद करते हैं।

महेंद्रगिरि को हवा, समुद्र और पानी के भीतर मौजूद खतरों का एक साथ सामना करने के लिए तैयार किया गया है। (INS Mahendragiri Commissioned)

स्टेल्थ डिजाइन से दुश्मन के लिए पहचानना मुश्किल

यह युद्धपोत स्टेल्थ तकनीक पर आधारित है। इसके डिजाइन में ऐसे बदलाव किए गए हैं, जिससे रडार पर इसकी पहचान करना कठिन हो जाता है। जहाज की बाहरी संरचना इस तरह तैयार की गई है कि रडार तरंगों का परावर्तन कम हो।

इसके साथ ही जहाज में ऑटोमेशन का स्तर भी काफी अधिक है। कई सिस्टम कंप्यूटर आधारित हैं, जिससे कम समय में तेजी से निर्णय लेने और हथियारों के संचालन में मदद मिलती है।

महेंद्रगिरि में कंबाइंड डीजल ऑर गैस (सीओडीओजी) प्रोपल्शन सिस्टम लगाया गया है। जरूरत के अनुसार यह डीजल इंजन और गैस टरबाइन दोनों का उपयोग कर सकता है। इससे जहाज को लंबी दूरी तक संचालन और अधिक गति दोनों मिलती हैं। इसकी अधिकतम गति लगभग 28 नॉट है और इस पर करीब 225 अधिकारी और नाविक तैनात किए जा सकते हैं। (INS Mahendragiri Commissioned)

गोपालपुर में एयर डिफेंस ट्रेनिंग हुई हाईटेक, सेना अब सिमुलेटर पर दे रही VSHORADS और एल-70 ऑपरेटरों को युद्ध जैसी ट्रेनिंग

Army Air Defence Centre Gopalpur
Image Source: Indian Army

Army Air Defence Centre Gopalpur: भारतीय सेना अपनी ट्रेनिंग व्यवस्था को भी लगातार आधुनिक बना रही है। ओडिशा के गोपालपुर स्थित आर्मी एयर डिफेंस सेंटर में अब नई पीढ़ी के कई अत्याधुनिक सिमुलेटरों पर ट्रेनिंग दी जा रही है। आर्मी एयर डिफेंस सेंटर ने ड्राइविंग सिमुलेटर, VSHORADS सिमुलेटर और वर्चुअल शूटिंग सिमुलेटर को अपनी ट्रेनिंग में शामिल किया है। सेना के मुताबिक इन नए सिस्टमों का उद्देश्य जवानों को असली युद्ध जैसी परिस्थितियों में बेहतर ट्रेनिंग देना है, ताकि वे आधुनिक हवाई खतरों का तेजी से सामना कर सकें।

Army Air Defence Centre Gopalpur: बदल रहा है युद्ध का स्वरूप

कुछ साल पहले तक हवाई खतरों का मतलब मुख्य रूप से लड़ाकू विमान और हेलीकॉप्टर हुआ करता था। अब स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। आज ड्रोन, ड्रोन स्वॉर्म, लोइटरिंग म्यूनिशन, कम ऊंचाई पर उड़ने वाली क्रूज मिसाइलें और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर जैसे खतरे तेजी से बढ़ रहे हैं।

ऐसे माहौल में केवल पारंपरिक ट्रेनिंग पर्याप्त नहीं मानी जाती। सैनिकों को ऐसे वातावरण में अभ्यास कराना जरूरी हो गया है, जहां वे अलग-अलग परिस्थितियों में तुरंत फैसला लेना सीख सकें। इसी जरूरत को ध्यान में रखते हुए गोपालपुर में तकनीक आधारित ट्रेनिंग सिस्टम को मजबूत किया गया है।

गोपालपुर क्यों है खास

ओडिशा के गोपालपुर मिलिट्री स्टेशन में स्थित आर्मी एयर डिफेंस सेंटर भारतीय सेना का प्रमुख एयर डिफेंस प्रशिक्षण संस्थान है। यहां एयर डिफेंस कोर के अधिकारी और जवान आधुनिक वेपन सिस्टम्स को ऑपरेट करना और हवाई खतरों से निपटने की ट्रेनिंग लेते हैं।

यहां पहले से एल-70 एयर डिफेंस गन, शिल्का, आकाश मिसाइल सिस्टम और अन्य एयर डिफेंस प्लेटफॉर्म से जुड़ी ट्रेनिंग दी जाती रही है। अब नई पीढ़ी के सिमुलेटर जुड़ने से ट्रेनिंग का लेवल और आधुनिक हो गया है। (Army Air Defence Centre Gopalpur)

VSHORADS सिमुलेटर से मिसाइल ऑपरेटरों की ट्रेनिंग

गोपालपुर में शामिल किया गया VSHORADS सिमुलेटर जवानों को कम दूरी की एयर डिफेंस मिसाइल सिस्टम चलाने का अभ्यास कराएगा। VSHORADS का इस्तेमाल कम ऊंचाई पर उड़ने वाले हेलीकॉप्टर, ड्रोन और अन्य हवाई टारगेट्स को निशाना बनाने के लिए किया जाता है।

इस सिमुलेटर में वास्तविक लॉन्चर जैसा मॉडल लगाया गया है। इसके सामने बड़ी स्क्रीन पर अलग-अलग प्रकार के हवाई टारगेट दिखाई देते हैं। जवान टारगेट की पहचान करते हैं, उसे लॉक करते हैं और फिर मिसाइल दागने की पूरी प्रक्रिया का अभ्यास करते हैं।

सूत्रों के अनुसार इसमें दिन और रात दोनों परिस्थितियों का अभ्यास कराया जा सकता है। साथ ही ड्रोन स्वॉर्म, कम ऊंचाई पर उड़ने वाले हेलीकॉप्टर और तेज गति वाले टारगेट्स को भी सिमुलेट किया जा सकता है।

एल-70 और अन्य सिस्टम्स की भी होती है ट्रेनिंग

गोपालपुर सेंटर में केवल नए मिसाइल सिस्टम्स की ही ट्रेनिंग नहीं दी जाती। यहां एल-70 एयर डिफेंस गन, शिल्का और अन्य एयर डिफेंस सिस्टम के ऑपरेशन की भी ट्रेनिंग दी जाती है।

वीडियो में एल-70 गन के लिए भी सिमुलेटर ट्रेनिंग उपलब्ध है, जहां जवान टारगेट की पहचान, ट्रैकिंग और फायर कंट्रोल की प्रक्रिया का अभ्यास करते हैं। हाल के सालों में एल-70 सिस्टम को आधुनिक सेंसर और काउंटर ड्रोन क्षमता के साथ अपग्रेड करने का काम भी किया गया है, जिसके अनुसार ट्रेनिंग को भी अपडेट किया जा रहा है। (Army Air Defence Centre Gopalpur)

वर्चुअल शूटिंग सिमुलेटर पर फायरिंग का अभ्यास

इसके अलावा गोपालपुर में एक वर्चुअल शूटिंग सिमुलेटर है। इसे इस तरह बनाया गया है कि सैनिक बिना असली गोलियां चलाए युद्ध जैसी परिस्थितियों में फायरिंग का अभ्यास कर सकें। अगर किसी एयर डिफेंस पोजीशन पर दुश्मन के कमांडो, आतंकवादी, ड्रोन ऑपरेटर या छोटे हथियारों से लैस हमलावर पहुंच जाएं, तो सैनिकों को राइफल से भी मुकाबला करना पड़ सकता है। ऐसे हालात के लिए यह सिमुलेटर उन्हें पहले से तैयार करता है।

इस सिस्टम में असली राइफल जैसी दिखने वाली ट्रेनिंग राइफल का इस्तेमाल किया जाता है। जब सैनिक निशाना लगाता है और ट्रिगर दबाता है, तो कंप्यूटर तुरंत रिकॉर्ड करता है कि गोली सही जगह लगी या नहीं। इस सिमुलेटर की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसमें बिना असली गोली चलाए बार-बार अभ्यास किया जा सकता है। अलग-अलग हालात, मौसम, स्थान और खतरे कुछ ही मिनटों में बदले जा सकते हैं। इससे सैनिक वास्तविक ऑपरेशन से पहले कई तरह की परिस्थितियों में अभ्यास कर लेते हैं और उनकी प्रतिक्रिया क्षमता पहले से बेहतर हो जाती है।

ड्राइविंग सिमुलेटर से मिलेगी असली जैसी ट्रेनिंग

नए ड्राइविंग सिमुलेटर का उद्देश्य मिलिट्री व्हीकल्स को मुश्किल हालात कठिन परिस्थितियों में सुरक्षित और तेज तरीके से चलाने का अभ्यास कराना है। इसमें सैनिकों को अलग-अलग तरह की सड़कें, पहाड़ी रास्ते, बारिश, कोहरा, रात का समय और लिमिटेड विजिबिलिटी जैसी परिस्थितियों में वाहन चलाने का अनुभव कराया जाता है।

इस सिस्टम में मोशन प्लेटफॉर्म लगाया गया है, जिससे चालक को वाहन के हिलने-डुलने का भी असली अनुभव मिलता है। इसके साथ बड़े डिजिटल डिस्प्ले पर पूरा रास्ता दिखाई देता है। ट्रेनिंग के दौरान अचानक आने वाले खतरों, सड़क अवरोधों और हवाई खतरे जैसी स्थितियां भी बनाई जाती हैं, ताकि चालक तुरंत प्रतिक्रिया देना सीख सके। (Army Air Defence Centre Gopalpur)

हर अभ्यास का डिजिटल विश्लेषण

इन सिमुलेटरों में हर ट्रेनिंग सेशन का पूरा रिकॉर्ड तैयार किया जाता है। सिस्टम यह दर्ज करता है कि सैनिक ने टारगेट को पहचानने में कितना समय लिया, कब निर्णय लिया और उसकी प्रतिक्रिया कितनी सटीक रही।

इसके बाद प्रशिक्षकों को पूरी रिपोर्ट मिलती है। इसी आधार पर जवानों के स्किल्स का विश्लेषण किया जाता है और उन्हें आगे की ट्रेनिंग दी जाती है। इससे प्रशिक्षण अधिक प्रभावी और व्यक्तिगत जरूरतों के अनुसार बनाया जा सकता है।

तकनीक आधारित ट्रेनिंग पर बढ़ रहा जोर

भारतीय सेना पिछले कुछ वर्षों से तकनीक आधारित प्रशिक्षण पर विशेष ध्यान दे रही है। इसका उद्देश्य केवल हथियार चलाना सिखाना नहीं, बल्कि जवानों को ऐसी परिस्थितियों के लिए तैयार करना है जहां उन्हें कुछ सेकंड के भीतर सही निर्णय लेना पड़ सकता है।

दरअसल आधुनिक सिमुलेटर से बार-बार अभ्यास इसलिए कराया जा सकता है क्योंकि इससे मिसाइलों और गोला-बारूद की खपत कम होती है, प्रशिक्षण की लागत घटती है और जवानों को अधिक सुरक्षित वातावरण में जटिल परिस्थितियों का अनुभव मिलता है।

आर्मी एयर डिफेंस सेंटर द्वारा जारी जानकारी के अनुसार इन नए सिमुलेटरों का मुख्य उद्देश्य सैनिकों को तकनीक आधारित, मिशन उन्मुख और वास्तविक परिस्थितियों के अनुरूप प्रशिक्षण देना है। इसमें तकनीकी दक्षता, ऑपरेशनल कौशल और निर्णय लेने की क्षमता पर विशेष जोर दिया गया है। (Army Air Defence Centre Gopalpur)

DRDO का नया एस-बैंड रडार क्यों है खास? बैलिस्टिक से क्रूज मिसाइल तक एक साथ कई टारगेट पर रखेगा नजर

DRDO S-Band Tracking Radar
(Image for representational Purpose only. AI-Generated Image)

DRDO S-Band Tracking Radar: देश की मिसाइल परीक्षण क्षमता को और मजबूत करने के लिए डीआरडीओ नए एस-बैंड इंस्ट्रूमेंटेशन ट्रैकिंग रडार को डेवलप करने की तैयारी कर रहा है। चांदीपुर स्थित डीआरडीओ के इंटीग्रेटेड टेस्ट रेंज (आईटीआर) ने इस अत्याधुनिक रडार सिस्टम के प्रोक्योरमेंट और डेवलपमेंट के लिए रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल (आरएफपी) जारी किया है। यह रडार मिसाइल, रॉकेट, लड़ाकू विमान और अन्य एरियल टारगेट्स की सटीक ट्रैकिंग करने में मदद करेगा। इसका इस्तेमाल मुख्य रूप से बैलिस्टिक मिसाइल, एयर डिफेंस सिस्टम और अन्य उड़ान परीक्षणों के दौरान किया जाएगा।

DRDO S-Band Tracking Radar: क्या होता है एस-बैंड इंस्ट्रूमेंटेशन ट्रैकिंग रडार

सामान्य निगरानी रडार और इंस्ट्रूमेंटेशन ट्रैकिंग रडार में बड़ा अंतर होता है। सामान्य रडार का उद्देश्य एरियल टारगेट्स की खोज और निगरानी करना होता है, जबकि इंस्ट्रूमेंटेशन ट्रैकिंग रडार का काम परीक्षण के दौरान किसी मिसाइल या हवाई प्लेटफॉर्म की हर गतिविधि को बेहद सटीक तरीके से रिकॉर्ड करना होता है।

यह रडार दो अलग-अलग तरीकों से टारगेट को ट्रैक करेगा। पहला स्किन मोड, जिसमें टारगेट से वापस आने वाली रडार तरंगों के आधार पर उसकी स्थिति पता लगाई जाती है। दूसरा बीकन या ट्रांसपोंडर मोड, जिसमें मिसाइल या परीक्षण प्लेटफॉर्म पर लगे विशेष ट्रांसपोंडर से मिलने वाले संकेतों के आधार पर ट्रैकिंग की जाती है। इससे लंबी दूरी और अधिक ऊंचाई पर उड़ रहे टारगेटों की भी सटीक निगरानी संभव होती है। (DRDO S-Band Tracking Radar)

एक्टिव फेज्ड एरे तकनीक पर आधारित होगा सिस्टम

सूत्रों के अनुसार नया रडार सॉलिड स्टेट एक्टिव फेज्ड एरे तकनीक पर आधारित होगा। यह रडार एस-बैंड (2900 मेगाहर्ट्ज से 3300 मेगाहर्ट्ज) फ्रीक्वेंसी पर काम करेगा। इसमें पारंपरिक घूमने वाले एंटीना की जगह हजारों छोटे ट्रांसमिट और रिसीव मॉड्यूल लगे होंगे, जो इलेक्ट्रॉनिक तरीके से बीम को अलग-अलग दिशाओं में भेज सकेंगे।

इसके साथ डिजिटल बीम फॉर्मिंग तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा। इससे एक ही समय में कई टारगेटों पर नजर रखना आसान होगा और ट्रैकिंग की सटीकता भी बढ़ेगी। (DRDO S-Band Tracking Radar)

250 किलोमीटर से अधिक दूरी तक करेगा ट्रैक

आरएफपी के अनुसार यह रडार कम से कम 250 किलोमीटर दूरी पर मौजूद लगभग 2 वर्ग मीटर रडार क्रॉस सेक्शन वाले टारगेट्स को स्किन मोड में ट्रैक करने में सक्षम होगा। इसकी न्यूनतम डिटेक्शन रेंज लगभग 3 किलोमीटर रखी गई है। यानी बहुत पास और काफी दूर दोनों तरह के लक्ष्यों की निगरानी की जा सकेगी।

यह सिस्टम कम रडार क्रॉस सेक्शन वाले टारगेटों, क्रूज मिसाइलों, सामरिक मिसाइलों, लड़ाकू विमानों, मध्यम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलों और लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल के बूस्ट चरण तक की निगरानी कर सकेगी।

अलग-अलग तरह के टारगेटों पर रख सकेगा नजर

इस रडार को इस तरह तैयार किया जा रहा है कि एक ही सिस्टम से कई तरह के एरियल प्लेटफॉर्म को ट्रैक किया जा सके। इसमें लड़ाकू विमान, क्रूज मिसाइल, सामरिक मिसाइल, रॉकेट बूस्टर, मिसाइल के अलग होने वाले चरण और बैलिस्टिक मिसाइल पेलोड शामिल हैं।

सूत्रों का कहना है कि अलग-अलग कैटेगरी के टारगेट्स के लिए इसमें हाई और लो रेंज रिजॉल्यूशन मोड भी उपलब्ध होंगे, जिससे छोटी और बड़ी दोनों तरह की वस्तुओं की ट्रैकिंग अधिक सटीक हो सकेगी। (DRDO S-Band Tracking Radar)

चार डाइमेंशन में होगी ट्रैकिंग

यह नया सिस्टम केवल टारगेट की दूरी ही नहीं बताएगा, बल्कि चार महत्वपूर्ण जानकारियां एक साथ उपलब्ध कराएगा। इनमें टारगेट की दूरी, दिशा (एजिमुथ), ऊंचाई (एलिवेशन) और उसकी रफ्तार (डॉप्लर) शामिल होगी। हर माप के साथ समय की जानकारी भी रिकॉर्ड होगी, जिससे पूरी उड़ान का विश्लेषण किया जा सकेगा।

दस्तावेज के अनुसार इसकी दूरी मापने की सटीकता लगभग 20 मीटर के भीतर होगी। वहीं डॉप्लर आधारित गति मापने की सटीकता लगभग 4 मीटर प्रति सेकंड तक रखी गई है।

रडार जरूरत के अनुसार हाई और लो दोनों प्रकार के रेंज रिजॉल्यूशन मोड में काम करेगा। हाई रिजॉल्यूशन में लगभग 75 मीटर और लो रिजॉल्यूशन में लगभग 200 मीटर तक की दूरी का अंतर स्पष्ट पहचान सकेगा।

तेजी से बदलती दिशा में भी करेगा काम

रडार इलेक्ट्रॉनिक तरीके से लगभग 50 डिग्री तक दाएं-बाएं और 70 डिग्री तक ऊंचाई की दिशा में बिना एंटीना घुमाए बीम भेज सकेगा। एंटीना को अलग-अलग जरूरत के अनुसार झुकाया भी जा सकेगा। सामान्य ऑपरेशन के लिए इसे 12 डिग्री पर रखा जाएगा। बहुत ऊंचाई और अधिक गति वाले टारगेट्स के लिए इसे 40 डिग्री तक झुकाया जा सकेगा। रखरखाव के समय इसे 0 डिग्री और परिवहन के दौरान 90 डिग्री की स्थिति में रखा जा सकेगा।

यह सिस्टम बहुत तेज रफ्तार से उड़ने वाले टारगेट्स की भी निगरानी कर सकेगी। आरएफपी के अनुसार इसकी डॉप्लर क्षमता 2500 मीटर प्रति सेकंड से अधिक होगी।

परीक्षण के दौरान यदि मिसाइल बहुत तेज गति से दिशा बदलती है या ऊंचाई तेजी से बढ़ती है, तब भी यह प्रणाली लगातार ट्रैक बनाए रख सकेगी। (DRDO S-Band Tracking Radar)

पूरा सिस्टम होगा मोबाइल

आरएफपी में इस रडार को री-लोकेटेबल सिस्टम के रूप में डेवलप करने की शर्त रखी गई है। इसका मतलब है कि आवश्यकता पड़ने पर इसे एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाकर फिर से स्थापित किया जा सकेगा।

पूरे सिस्टम में एक्टिव एंटीना एरे, मोटर चालित पेडेस्टल, प्रोसेसिंग इलेक्ट्रॉनिक्स, रेक्टिफायर यूनिट, लिक्विड कूलिंग सिस्टम, रडार कंट्रोल सिस्टम और सेल्फ कैलिब्रेशन जैसी सुविधाएं शामिल होंगी।

इसमें अतिरिक्त सुरक्षा के लिए रेडोम भी लगाया जाएगा, जिससे मौसम और बाहरी परिस्थितियों का असर कम हो।

लिक्विड कूलिंग और सेल्फ कैलिब्रेशन जैसी आधुनिक सुविधाएं

रडार में बड़ी संख्या में इलेक्ट्रॉनिक मॉड्यूल लगातार काम करेंगे। इन्हें सामान्य तापमान पर रखने के लिए रेडंडेंट लिक्विड कूलिंग सिस्टम लगाया जाएगा ताकि किसी एक यूनिट में खराबी आने पर दूसरी यूनिट काम संभाल सके।

इसके साथ सेल्फ कैलिब्रेशन सुविधा भी होगी। इससे रडार समय-समय पर अपनी सटीकता स्वयं जांच सकेगा और जरूरत पड़ने पर अपने मापदंड स्वतः ठीक कर सकेगा। (DRDO S-Band Tracking Radar)

कंट्रोल शेल्टर से होगी पूरी निगरानी

पूरे सिस्टम के ऑपरेशन के लिए वातानुकूलित ऑपरेशन शेल्टर बनाया जाएगा। इसमें रडार प्रोसेसिंग यूनिट, वाइड बैंड रिकॉर्डर, दो मॉनिटरिंग कंसोल और डेटा विश्लेषण के लिए कई हाई परफॉर्मेंस वर्कस्टेशन लगाए जाएंगे।

यहीं से ऑपरेटर रडार की निगरानी करेंगे और उड़ान परीक्षण के दौरान मिलने वाले आंकड़ों का विश्लेषण करेंगे।

मिसाइल परीक्षणों में निभाता है अहम रोल

आरएफपी डॉक्युमेंट के मुताबिक 18 महीने के भीतर पूरा सिस्टम उपलब्ध कराना होगा। रडार की इंस्टॉलेशन और कमीशनिंग का काम भी वही कंपनी करेगी। यह काम आईटीआर चांदीपुर या डीआरडीओ द्वारा तय किए गए भारत के किसी अन्य स्थान पर किया जा सकता है। साथ ही, रडार को चलाने और उसका ऑपरेशन समझाने के लिए कंपनी को संबंधित कर्मचारियों को प्रशिक्षण भी देना होगा। सिस्टम की वारंटी 36 महीने की होगी।

चांदीपुर स्थित आईटीआर देश की सबसे महत्वपूर्ण मिसाइल परीक्षण सुविधाओं में शामिल है। यहां बैलिस्टिक मिसाइल, एयर डिफेंस मिसाइल, सामरिक हथियार प्रणाली और अन्य उड़ान परीक्षण नियमित रूप से किए जाते हैं।

ऐसे प्रत्येक परीक्षण में इंस्ट्रूमेंटेशन ट्रैकिंग रडार सबसे अहम भूमिका निभाता है। यह उड़ान के हर चरण का रिकॉर्ड तैयार करता है और वैज्ञानिकों को यह पता लगाने में मदद करता है कि मिसाइल तय ट्रैजेक्टरी पर उड़ रही है या नहीं। इसी डेटा के आधार पर किसी भी परीक्षण की तकनीकी सफलता का मूल्यांकन किया जाता है। (DRDO S-Band Tracking Radar)

आर्मी चीफ का अधिकारियों को पहला बड़ा संदेश, ‘अफसर खुद निकालें समाधान’, हर यूनिट युद्ध के लिए रहे तैयार

Indian Army Chief Letter
(Image for representational Purpose only. AI-Generated Image)

Indian Army Chief Letter: भारतीय सेना के नए प्रमुख जनरल धीरज सेठ ने पद संभालने के बाद सभी अधिकारियों को अपना पहला संदेश भेजा है। अपने संदेश में उन्होंने साफ कहा है कि भारतीय सेना को हर समय किसी भी चुनौती का सामना करने के लिए पूरी तरह तैयार रहना होगा। उन्होंने खास तौर पर “ऑपरेशन सिंदूर 2.0” और “ऑपरेशन स्नो लेपर्ड 2.0” का जिक्र करते हुए कहा कि सेना की सबसे बड़ी प्राथमिकता हमेशा युद्ध की तैयारी और ऑपरेशनल क्षमता बनी रहनी चाहिए।

अपने पत्र में उन्होंने यह भी लिखा कि हमारा लक्ष्य भारतीय सेना को और अधिक मजबूत बनाना, युद्ध के लिए हर समय तैयार रखना, नई क्षमताएं विकसित करना, मौजूदा सुरक्षा चुनौतियों का प्रभावी ढंग से सामना करना और देश निर्माण में अपनी भूमिका को और मजबूत करना होना चाहिए।

Indian Army Chief Letter: बदलते युद्ध के अनुसार खुद को बदलना होगा

जनरल धीरज सेठ ने 06 जुलाई को भेजे अपने संदेश में कहा कि आज भारतीय सेना तेजी से बदलाव के दौर से गुजर रही है। आपने हाल ही में मेरे द्वारा बताए गए “विजय” के सिद्धांतों के बारे में सुना होगा। अब युद्ध पहले जैसा नहीं रहा।

आज सैनिकों के साथ ड्रोन और दूसरे बिना चालक वाले सिस्टम भी युद्ध का हिस्सा बन चुके हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, मशीन लर्निंग और नई तकनीकें अब भविष्य की नहीं बल्कि आज की जरूरत हैं। इसलिए हर अधिकारी को इस बदलाव की जिम्मेदारी अपने स्तर पर उठानी होगी।

अगर हर अधिकारी अपनी यूनिट में इस बदलाव को अपनाएगा, तभी पूरी सेना वास्तव में आधुनिक बन पाएगी।

इसके साथ ही हमें अधिकारियों और सैनिकों के बीच भरोसा, सम्मान, अच्छा व्यवहार, पेशेवर दक्षता और नैतिक मूल्यों पर आधारित मजबूत संबंध भी बनाए रखने होंगे।

हर समय युद्ध के लिए तैयार रहे सेना

उन्होंने लिखा कि युद्ध की तैयारी केवल बड़े सैन्य अभ्यासों तक सीमित नहीं होनी चाहिए। हर यूनिट को समय-समय पर अपनी तैयारियों की समीक्षा करनी चाहिए।

जनरल सेठ ने लिखा कि हमारी तैयारी हमेशा ऐसी होनी चाहिए कि यदि ऑपरेशन सिंदूर 2.0 या ऑपरेशन स्नो लेपर्ड 2.0 जैसी कोई भी चुनौती सामने आए, तो सेना तुरंत कार्रवाई करने के लिए पूरी तरह तैयार हो।

उन्होंने अधिकारियों से कहा कि वे लगातार यह सुनिश्चित करें कि उनकी यूनिट के पास पर्याप्त हथियार, गोला-बारूद, रसद, संचार उपकरण, वाहन, तकनीकी संसाधन और प्रशिक्षित सैनिक उपलब्ध हों। यदि किसी स्तर पर कमी दिखाई देती है तो उसका समाधान तुरंत निकाला जाए।

ऊपर से नहीं आएगा हर समस्या का समाधान

अपने पत्र में उन्होंने आगे लिखा कि आज तकनीक इतनी तेजी से बदल रही है कि कई बार हथियार खरीदने या नई क्षमता विकसित करने की सरकारी प्रक्रिया उसके बराबर गति से आगे नहीं बढ़ पाती। यह बिल्कुल सामान्य बात है।

इसलिए हर अधिकारी को अपने स्तर पर व्यावहारिक, सरल और लागू किए जा सकने वाले समाधान खोजने होंगे।
छोटे-छोटे सुधार भी पूरी यूनिट की क्षमता को काफी बढ़ा सकते हैं।

उन्होंने लिखा कि हर समस्या के समाधान के लिए केवल मुख्यालय की ओर देखने की आदत बदलनी होगी।

साथ ही उन्होंने यह भी लिखा कि हमें केवल आदर्श समाधान का इंतजार नहीं करना चाहिए। कई बार साधारण, व्यावहारिक और तुरंत लागू होने वाला समाधान ज्यादा उपयोगी होता है। जो तरीके वर्षों से युद्ध में सफल साबित हुए हैं, उन्हें केवल इसलिए नहीं छोड़ देना चाहिए क्योंकि नई तकनीक आ गई है। जरूरत पड़ने पर हमें अपनी बुनियादी सैन्य क्षमताओं पर भी पूरा भरोसा रखना होगा।

साथ ही परिस्थितियों के अनुसार खुद को बदलने, सुधारने और नई परिस्थितियों में काम करने की क्षमता भी बनाए रखनी होगी। लेकिन यह सब करते समय गुणवत्ता, जवाबदेही और नियमों से कोई समझौता नहीं होना चाहिए।

बदल रहा है युद्ध का स्वरूप

जनरल धीरज सेठ ने अधिकारियों को बताया कि आधुनिक युद्ध पहले जैसा नहीं रह गया है। अब लड़ाई केवल सैनिकों, टैंकों और तोपों के भरोसे नहीं लड़ी जाती।

उन्होंने कहा कि आज ड्रोन, बिना चालक वाले सिस्टम, स्मार्ट हथियार, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, मशीन लर्निंग और स्वचालित तकनीकें युद्ध का सामान्य हिस्सा बन चुकी हैं। ऐसे में हर अधिकारी को इन तकनीकों की जानकारी होनी चाहिए और उन्हें अपनी यूनिट में प्रभावी तरीके से अपनाना चाहिए।

नई तकनीक के साथ पुरानी सैन्य क्षमता भी जरूरी

सेना प्रमुख ने अपने संदेश में यह भी स्पष्ट किया कि नई तकनीक अपनाने का मतलब यह नहीं है कि पहले से सफल सैन्य सिद्धांतों और पारंपरिक क्षमताओं को भुला दिया जाए।

उन्होंने अधिकारियों से कहा कि आधुनिक तकनीक और पारंपरिक सैन्य कौशल दोनों का संतुलन बनाए रखना जरूरी है। कई परिस्थितियों में बुनियादी सैन्य प्रशिक्षण, नेतृत्व क्षमता और सैनिकों का अनुशासन ही सबसे बड़ी ताकत साबित होते हैं।

सैनिकों के साथ भरोसे का रिश्ता बनाने पर जोर

अपने पहले संदेश में सेना प्रमुख ने नेतृत्व शैली पर भी विशेष जोर दिया। उन्होंने अधिकारियों से कहा कि वे अपने सैनिकों के साथ विश्वास, सम्मान और पारदर्शिता का रिश्ता बनाएं। एक अच्छा कमांडर वही होता है जो कठिन परिस्थितियों में सबसे आगे खड़ा दिखाई दे।

उन्होंने लिखा कि एक अधिकारी का सबसे बड़ा गुण उसका नेतृत्व होता है। नेतृत्व केवल आदेश देने से नहीं आता।

अधिकारी को अपने सैनिकों के साथ रहना चाहिए, उनके साथ कठिन परिस्थितियों में काम करना चाहिए और हर चुनौती में सबसे आगे दिखाई देना चाहिए। उन्होंने लिखा कि सैनिक उसी अधिकारी को सबसे ज्यादा मानते हैं जो खुद करके दिखाता है।

उन्होंने अधिकारियों को शारीरिक रूप से फिट रहने की भी सलाह दी और कहा कि नेतृत्व केवल आदेश देने से नहीं, बल्कि उदाहरण प्रस्तुत करने से स्थापित होता है।

सीखने और नए विचारों को बढ़ावा देने की सलाह

जनरल धीरज सेठ ने अधिकारियों से कहा कि वे अपनी यूनिट में ऐसा माहौल तैयार करें जहां सैनिक और जूनियर अधिकारी नई बातें सीख सकें और अपने सुझाव खुलकर रख सकें।

उन्होंने लिखा कि यदि प्रशिक्षण के दौरान सीमित दायरे में कोई गलती होती है और उससे सीख मिलती है तो उसे सकारात्मक तरीके से देखा जाना चाहिए।

उन्होंने हर अधिकारी को लगातार सीखते रहने की आदत पर भी जोर दिया। उन्होंने लिखा कि नई तकनीक, दुनिया में हो रहे बदलाव, आधुनिक युद्ध के तरीके और वैश्विक सुरक्षा परिस्थितियों की जानकारी रखना आज की जरूरत है। इसके लिए नियमित पढ़ाई की आदत विकसित करनी होगी।

जितना अधिक आप सीखेंगे, उतनी ही आसानी से अपनी यूनिट की समस्याओं का समाधान खुद निकाल पाएंगे। यदि आप लगातार खुद को अपडेट रखेंगे तो हर छोटी समस्या के लिए ऊपरी मुख्यालय की ओर देखने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

ऐसा माहौल बनाइए जहां लोग सीख सकें

सेना प्रमुख ने अधिकारियों से कहा कि केवल सैन्य प्रशिक्षण पर्याप्त नहीं है। हर यूनिट का वातावरण ऐसा होना चाहिए जहां सैनिक और जूनियर अधिकारी खुलकर अपने विचार रख सकें। नई सोच को प्रोत्साहन मिलना चाहिए।

नई तकनीक सीखने के अवसर मिलने चाहिए। यदि प्रशिक्षण के दौरान कोई सीमित और सुरक्षित गलती होती है, जिससे सीख मिलती है, तो उसे सकारात्मक नजरिए से देखना चाहिए।

हमारा उद्देश्य ऐसा वातावरण बनाना होना चाहिए जहां पेशेवर विकास, साहसिक सोच और नए विचारों को बढ़ावा मिले।

सोशल मीडिया को भी बताया नया युद्धक्षेत्र

जनरल धीरज सेठ ने अपने संदेश में सोशल मीडिया का भी जिक्र किया। उन्होंने लिखा कि आज का युद्ध केवल जमीन, समुद्र और आसमान तक सीमित नहीं है। सोशल मीडिया भी अब एक महत्वपूर्ण युद्धक्षेत्र बन चुका है।

हमारे विरोधी देश इसका इस्तेमाल दुष्प्रचार फैलाने, भ्रम पैदा करने और लोगों की सोच को प्रभावित करने के लिए करते हैं। इसलिए हर अधिकारी को सोशल मीडिया का इस्तेमाल बहुत जिम्मेदारी से करना चाहिए।

बिना सोचे-समझे कोई जानकारी साझा करना या अनुचित टिप्पणी करना केवल व्यक्तिगत गलती नहीं होती, बल्कि इससे सेना की सुरक्षा और प्रतिष्ठा दोनों प्रभावित हो सकती हैं। अनुशासन, संयम और गरिमापूर्ण व्यवहार हर समय बनाए रखना जरूरी है।

सेना की परंपराओं और मूल्यों को बनाए रखें

सेन प्रमुख ने अपने पत्र में लिखा कि हर अधिकारी को हमेशा “एक अधिकारी और सज्जन व्यक्ति” की पहचान बनाए रखनी चाहिए। ईमानदारी, नैतिकता, अनुशासन और चरित्र हमारी सबसे बड़ी पहचान हैं।

अपने साथ काम करने वाले सैनिकों के साथ-साथ पूर्व सैनिकों के प्रति भी सम्मान और संवेदनशीलता दिखाना हमारी जिम्मेदारी है। जिन लोगों ने वर्षों तक देश की सेवा की है, उनकी समस्याओं को समझना और उनके समाधान के लिए प्रयास करना भी हमारी जिम्मेदारी का हिस्सा है

उन्होंने लिखा कि सैनिक का जीवन केवल नौकरी नहीं बल्कि जीवन जीने का तरीका होता है। पूरी मेहनत से काम करना जरूरी है, लेकिन उतना ही जरूरी है अपने परिवार के लिए समय निकालना, अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखना और खुद को हर क्षेत्र में बेहतर बनाना।

मुझे आपकी क्षमता, नेतृत्व, निर्णय लेने की योग्यता, मानसिक मजबूती और शारीरिक फिटनेस पर पूरा भरोसा है।

आर्मी मुख्यालय हमेशा आपकी सहायता और मार्गदर्शन के लिए उपलब्ध रहेगा। आप सभी भारतीय सेना की गौरवशाली परंपरा को आगे बढ़ाते रहें। मुझे आप पर पूरा विश्वास है और आपसे मेरी अपेक्षाएं भी बहुत ऊंची हैं।

विकसित भारत के लक्ष्य का भी किया उल्लेख

अपने संदेश में जनरल धीरज सेठ ने कहा कि भारतीय सेना केवल सीमाओं की सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि विकसित भारत के राष्ट्रीय लक्ष्य में भी उसकी महत्वपूर्ण भूमिका है।

देश को वर्ष 2047 तक विकसित भारत बनाने के राष्ट्रीय लक्ष्य में भी सेना की महत्वपूर्ण भूमिका है। हमारे पास लोगों को प्रेरित करने, संसाधनों को संगठित करने और कठिन परिस्थितियों में शानदार परिणाम देने की क्षमता है।

इसलिए हर अधिकारी को केवल सैन्य कार्यों तक सीमित नहीं रहना चाहिए बल्कि व्यापक सोच विकसित करनी चाहिए। देश की बड़ी जिम्मेदारियों को समझना और उनके अनुसार खुद को तैयार करना भी जरूरी है।

भारतीय नौसेना के IFC-IOR से जुड़ा जर्मनी, पहली बार भेजा इंटरनेशनल लाइजन ऑफिसर

Germany IFC-IOR India
Cdr Oliver Vanek joined IFC-IOR today as its 17th International Liaison Officer and the first ILO from Germany, in the presence of Col Klaus Willi Merkel, Defence Attaché of Germany to India. (Image Source: Indian Navy)

Germany IFC-IOR India: भारत और जर्मनी के बीच समुद्री सुरक्षा सहयोग को नई मजबूती मिली है। जर्मनी ने पहली बार अपने एक इंटरनेशनल लाइजन ऑफिसर (आईएलओ) को भारतीय नौसेना के इन्फॉर्मेशन फ्यूजन सेंटर-इंडियन ओशन रीजन (आईएफसी-आईओआर) में तैनात किया है। गुरुग्राम स्थित इस केंद्र में जर्मनी की ओर से कमांडर ओलिवर वानेक ने कार्यभार संभाल लिया है। वह इस केंद्र में तैनात होने वाले 17वें अंतरराष्ट्रीय लाइजन ऑफिसर हैं और जर्मनी के पहले प्रतिनिधि भी हैं।

भारतीय नौसेना के अनुसार इस नियुक्ति के साथ भारत और जर्मनी के बीच समुद्री सूचनाओं के आदान-प्रदान, समुद्री निगरानी और क्षेत्रीय समन्वय को और मजबूत करने में मदद मिलेगी।

Germany IFC-IOR India: क्या है आईएफसी-आईओआर?

आईएफसी-आईओआर भारतीय नौसेना द्वारा स्थापित एक ऐसा केंद्र है, जहां हिंद महासागर क्षेत्र में होने वाली समुद्री गतिविधियों की जानकारी एकत्र की जाती है और साझेदार देशों के साथ साझा की जाती है।

रक्षा सूत्रों के अनुसार इस केंद्र का मुख्य उद्देश्य समुद्र में जहाजों की आवाजाही पर नजर रखना, संदिग्ध गतिविधियों की पहचान करना और विभिन्न देशों के बीच वास्तविक समय में सूचना साझा करना है। इससे किसी भी समुद्री घटना पर तेजी से प्रतिक्रिया देने में आसानी होती है।

किन गतिविधियों पर रखी जाती है नजर?

सूत्रों के मुताबिक आईएफसी-आईओआर केवल व्यापारिक जहाजों की निगरानी तक सीमित नहीं है। यहां समुद्री डकैती, अवैध मछली पकड़ने, हथियारों और नशीले पदार्थों की तस्करी, मानव तस्करी, समुद्री दुर्घटनाओं और प्राकृतिक आपदाओं जैसी घटनाओं पर भी लगातार नजर रखी जाती है।

केंद्र विभिन्न देशों और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों से मिलने वाली सूचनाओं का विश्लेषण करता है और जरूरत पड़ने पर संबंधित देशों को तुरंत जानकारी उपलब्ध कराता है।

जर्मनी की तैनाती क्यों मानी जा रही है महत्वपूर्ण?

सूत्रों का कहना है कि जर्मनी यूरोप की प्रमुख समुद्री और आर्थिक शक्तियों में शामिल है। बड़ी संख्या में जर्मन व्यापारिक जहाज हिंद महासागर के समुद्री मार्गों का इस्तेमाल करते हैं। ऐसे में आईएफसी-आईओआर में जर्मनी के प्रतिनिधि की मौजूदगी से दोनों देशों के बीच सूचना साझा करने की प्रक्रिया और तेज होगी।

भारतीय नौसेना के अधिकारियों के अनुसार इससे समुद्री सुरक्षा से जुड़े मामलों में बेहतर समन्वय स्थापित किया जा सकेगा और साझेदार देशों के बीच सहयोग भी बढ़ेगा।

बता दें कि 12 जनवरी को ही रक्षा समाचार ने खबर लिखी थी कि जर्मनी IFC-IOR में अपना लायजन अफसर भेजेगा।

Germany IFC-IOR India

क्या होती है समुद्री संपर्क अधिकारी भूमिका?

लाइजन ऑफिसर किसी सैन्य या सुरक्षा संगठन का स्थायी प्रतिनिधि होता है। उसका मुख्य काम अपने देश और मेजबान संगठन के बीच सूचनाओं का आदान-प्रदान, समन्वय और आपसी सहयोग को आसान बनाना होता है।

रक्षा सूत्रों के मुताबिक आईएफसी-आईओआर में तैनात अधिकारी अपने-अपने देशों की समुद्री एजेंसियों और भारतीय नौसेना के बीच संपर्क बनाए रखते हैं। किसी संदिग्ध जहाज, सुरक्षा चुनौती या समुद्री घटना की स्थिति में वे तेजी से जानकारी साझा करने में मदद करते हैं।

बढ़ता जा रहा है अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क

जर्मनी के अधिकारी के शामिल होने के बाद आईएफसी-आईओआर में तैनात अंतरराष्ट्रीय लाइजन ऑफिसरों की संख्या बढ़कर 17 हो गई है। भारतीय नौसेना पिछले कुछ वर्षों से मित्र देशों के अधिकारियों को इस केंद्र में शामिल कर रही है ताकि हिंद महासागर क्षेत्र में साझा समुद्री सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत किया जा सके।

रक्षा समाचार ने बताया था कि कुछ दिन पहले ही इंडोनेशिया ने भी अपना लाइजन ऑफिसर इस केंद्र में तैनात किया था। अब जर्मनी के जुड़ने से इस बहुराष्ट्रीय नेटवर्क का दायरा और विस्तृत हो गया है।

वैश्विक व्यापार के लिए अहम है हिंद महासागर

हिंद महासागर दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री क्षेत्रों में गिना जाता है। वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति का बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र से होकर गुजरता है। तेल और गैस लेकर चलने वाले टैंकरों के अलावा हजारों व्यापारिक जहाज हर वर्ष इस समुद्री मार्ग का उपयोग करते हैं।

सूत्रों के मुताबिक इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार की सुरक्षा चुनौती का असर अंतरराष्ट्रीय व्यापार और आपूर्ति श्रृंखला पर पड़ सकता है। इसी कारण समुद्री निगरानी और देशों के बीच सूचना साझा करने की व्यवस्था को लगातार मजबूत किया जा रहा है।

भारत-जर्मनी रक्षा सहयोग को मिली नई मजबूती

हाल के वर्षों में भारत और जर्मनी के बीच रक्षा और समुद्री सहयोग लगातार बढ़ा है। दोनों देशों के बीच उच्च स्तरीय रक्षा वार्ताएं, नौसैनिक संपर्क और समुद्री सुरक्षा से जुड़े कई क्षेत्रों में सहयोग बढ़ा है।

आईएफसी-आईओआर में जर्मनी के पहले लाइजन ऑफिसर की तैनाती को इसी बढ़ते रणनीतिक सहयोग का हिस्सा माना जा रहा है। भारतीय नौसेना का कहना है कि इस कदम से समुद्री सूचना साझा करने, समुद्री क्षेत्र की बेहतर निगरानी और हिंद महासागर क्षेत्र में कॉर्डिनेशन को और मजबूती मिलेगी।

भारतीय सेना के रिपेयर नेटवर्क का होगा मेकओवर, आर्मी बेस वर्कशॉप्स का बड़ा ट्रांसफॉर्मेशन करने की हो रही तैयारी

Indian Army Base Workshops
(Image for representational Purpose only. AI-Generated Image)

Army Base Workshops: भारतीय सेना जहां खुद को आधुनिक हथियारों से लैस कर रही है, तो वहीं अपने सबसे महत्वपूर्ण तकनीकी और रिपेयर नेटवर्क को भी आधुनिक बनाने के लिए बड़ा कदम उठा रही है। सेना का डायरेक्टरेट जनरल ऑफ इलेक्ट्रॉनिक्स एंड मैकेनिकल इंजीनियर्स (डीजी ईएमई) अपने आर्मी बेस वर्कशॉप्स (एबीडब्ल्यू) को मॉडर्नाइज बनाने की तैयारी कर रही है। इसके लिए ईएमई ने एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (ईओआई) जारी किया है।

इसका उद्देश्य सेना के पूरे रिपेयर सिस्टम को नई तकनीक, बेहतर वर्कफ्लो, मॉडर्न प्रोडक्शन कैपेसिटी और फास्ट मेंटेनेंस सिस्टम के हिसाब से तैयार करना है। इस परियोजना के जरिए सेना अपनी रिपेयर और ओवरहॉल क्षमता को अगले स्तर पर ले जाना चाहती है ताकि युद्ध के समय उपकरणों को कम समय में फिर से ऑपरेशनल बनाया जा सके।

Army Base Workshops हैं सेना के मेंटेनेंस सेंटर

भारतीय सेना में आर्मी बेस वर्कशॉप्स सबसे बड़े टेक्निकल मेंटेनेंस सेंटर माने जाते हैं। जब किसी टैंक, आर्मर्ड व्हीकल, आर्टिलरी, रडार, कम्युनिकेशन सिस्टम या दूसरे सैन्य उपकरण में बड़ी खराबी आती है, तब उसकी मरम्मत इन्हीं वर्कशॉप्स में होती है।

यहां सामान्य रिपेयर के अलावा पूरी ओवरहॉलिंग, खराब हिस्सों को बदलना, पुराने उपकरणों को नया जीवन देना, तकनीकी सुधार करना और कई बार ऐसे स्पेयर पार्ट्स तैयार करना भी शामिल होता है जो बाजार में आसानी से उपलब्ध नहीं होते।

इन्हीं वर्कशॉप्स की वजह से सेना अपने कई पुराने प्लेटफॉर्म सालों तक सफलतापूर्वक इस्तेमाल कर पाती है। (Army Base Workshops)

क्यों पड़ी बदलाव की जरूरत

सूत्रों के अनुसार पिछले कुछ सालों में सेना के उपकरण पहले की तुलना में कहीं अधिक आधुनिक और जटिल हो गए हैं। पहले जहां किसी हथियार या वाहन में मुख्य रूप से मैकेनिकल सिस्टम होता था, वहीं अब उनमें इलेक्ट्रॉनिक्स, सेंसर, डिजिटल कंट्रोल सिस्टम, सॉफ्टवेयर, एडवांस्ड कम्युनिकेशन और ऑटोमेशन जैसी तकनीक शामिल हो चुकी है। ऐसे आधुनिक उपकरणों की मरम्मत के लिए केवल पारंपरिक मशीनें और पुराने तरीके पर्याप्त नहीं हैं।

दूसरी बड़ी चुनौती यह है कि कई विदेशी उपकरण अब काफी पुराने हो चुके हैं। उनके मूल निर्माता कई बार स्पेयर पार्ट्स बनाना बंद कर देते हैं या सपोर्ट सीमित कर देते हैं। इससे सेना को पुराने प्लेटफॉर्म लंबे समय तक चलाने में कठिनाई होती है। इसी कारण सेना अब ऐस सिस्टम चाहती है जहां जरूरत पड़ने पर कई स्पेयर पार्ट्स देश में ही तैयार किए जा सकें।

आत्मनिर्भरता पर रहेगा विशेष जोर

सूत्रों के मुताबिक इस पूरे प्रोजेक्ट का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देना भी है। अब केवल विदेशी कंपनियों पर निर्भर रहने के बजाय सेना चाहती है कि अधिक से अधिक पुर्जे, सब-सिस्टम और उपकरण भारत में ही विकसित और तैयार किए जाएं।

यही वजह है कि इस परियोजना में रिवर्स इंजीनियरिंग, एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग, डिजिटल ट्विन, एडवांस्ड डायग्नोस्टिक्स और मटेरियल टेस्टिंग जैसी आधुनिक तकनीकों को शामिल करने की योजना बनाई गई है।

इन तकनीकों की मदद से ऐसे पुर्जों का भी निर्माण किया जा सकेगा जिनका प्रोडक्शन कंपनियां अब बंद कर चुकी हैं।

केवल रिपेयर नहीं, उत्पादन क्षमता भी बढ़ेगी

सेना अब आर्मी बेस वर्कशॉप्स की भूमिका केवल रिपेयर तक सीमित नहीं रखना चाहती। इन वर्कशॉप्स में सीमित स्तर पर उत्पादन, असेंबली, फैब्रिकेशन, उपकरणों का अपग्रेडेशन और स्वदेशी स्पेयर पार्ट्स तैयार करने की क्षमता भी विकसित की जाएगी। इससे उपकरणों की उपलब्धता बढ़ेगी और रिपेयर का समय कम होगा। (Army Base Workshops)

किन वर्कशॉप्स से होगी शुरुआत

इस पूरे कार्यक्रम की शुरुआत दो पायलट आर्मी बेस वर्कशॉप्स से की जा रही है। पहली वर्कशॉप किरकी (पुणे) स्थित 512 आर्मी बेस वर्कशॉप है। यहां मुख्य रूप से बीएमपी-2 जैसे आर्मर्ड व्हीकल्स और उनसे जुड़े सिस्टम की मरम्मत तथा ओवरहॉल का काम होता है।

दूसरी जबलपुर स्थित 506 आर्मी बेस वर्कशॉप है। यहां विभिन्न प्रकार की तोपों और उनसे जुड़े उपकरणों की मरम्मत और रखरखाव किया जाता है। इन दोनों वर्कशॉप्स में लागू होने वाले सुधारों का अध्ययन करने के बाद आगे की योजना बनाई जाएगी।

किन क्षेत्रों में होगा सबसे बड़ा बदलाव

इस परियोजना के तहत तीन प्रमुख क्षेत्रों का विस्तार से अध्ययन किया जाएगा। पहला क्षेत्र उत्पादन से जुड़ा है, जहां पूरे रिपेयर और निर्माण कार्य को अधिक तेज और व्यवस्थित बनाने पर काम होगा।

दूसरा क्षेत्र सप्लाई चेन मैनेजमेंट का है। इसमें यह देखा जाएगा कि स्पेयर पार्ट्स, कच्चा माल और अन्य आवश्यक सामग्री सही समय पर उपलब्ध हो रही है या नहीं।

तीसरा क्षेत्र सपोर्ट सर्विसेज का है। इसमें इंजीनियरिंग सपोर्ट और प्रशासनिक व्यवस्था दोनों का मूल्यांकन किया जाएगा ताकि पूरी कार्यप्रणाली अधिक प्रभावी बन सके। (Army Base Workshops)

कैसे आगे बढ़ेगा पूरा ट्रांसफॉर्मेशन

आर्मी बेस वर्कशॉप्स के आधुनिकीकरण का यह कार्यक्रम तीन चरणों में पूरा किया जाएगा। यह पूरा ट्रांसफॉर्मेशन प्रोजेक्ट लगभग आठ महीने में पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। चयनित कंसल्टेंसी फर्म सबसे पहले दोनों वर्कशॉप्स की स्टडी करेगी। एक्सपर्ट्स यह देखेंगे कि किसी उपकरण के वर्कशॉप में आने से लेकर उसकी मरम्मत पूरी होने और वापस सेना को सौंपे जाने तक पूरी प्रक्रिया में कितना समय लगता है।

परियोजना के पहले चरण को ‘ऐज-इज असेसमेंट’ नाम दिया गया है। इसकी अवधि लगभग तीन महीने होगी। इस दौरान कंसल्टेंसी टीम दोनों वर्कशॉप्स में जाकर वास्तविक कामकाज का विस्तृत अध्ययन करेगी।

विशेषज्ञ यह देखेंगे कि किसी सैन्य उपकरण के वर्कशॉप में पहुंचने से लेकर उसकी मरम्मत पूरी होने और सेना को वापस सौंपे जाने तक पूरी प्रक्रिया कैसे चलती है। रिपेयर के हर चरण का रिकॉर्ड तैयार किया जाएगा। उत्पादन, सप्लाई चेन मैनेजमेंट और सपोर्ट सर्विसेज से जुड़े सभी वर्कफ्लो का अध्ययन होगा।

इसी चरण में कर्मचारियों की तैनाती, मशीनों के उपयोग, वर्कशॉप के लेआउट, उत्पादन योजना, गुणवत्ता नियंत्रण प्रणाली, बैकलॉग, रिपेयर का समय, रीवर्क और कुल उत्पादन क्षमता का भी विस्तृत विश्लेषण किया जाएगा।

पहले चरण में मिली जानकारी के आधार पर परियोजना का दूसरा चरण शुरू होगा, जिसे ‘टू-बी असेसमेंट’ कहा गया है। इसकी अवधि लगभग दो महीने होगी। इसमें मौजूदा व्यवस्था की तुलना में बेहतर वर्कफ्लो, नई तकनीकों का इस्तेमाल, मशीनों की बेहतर व्यवस्था, मैनपावर का संतुलित उपयोग और आधुनिक औद्योगिक प्रक्रियाओं को शामिल किया जाएगा।

इसी दौरान प्रोडक्शन बढ़ाने के लिए विस्तृत ब्लूप्रिंट तैयार होगा। रिपेयर एसेट्स के तकनीकी अपग्रेडेशन की योजना बनाई जाएगी। यह भी तय किया जाएगा कि आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल किस प्रकार किया जाए ताकि मरम्मत की गुणवत्ता और गति दोनों बेहतर हो सकें।

परियोजना का अंतिम चरण ‘वेरिफिकेशन एंड रिअलाइनमेंट’ कहलाता है। इसकी अवधि अधिकतम तीन महीने रखी गई है। तीसरे चरण में यह देखा जाएगा कि जिन सुधारों की सिफारिश की गई है, उन्हें लागू करने के दौरान किसी प्रकार की व्यावहारिक समस्या तो नहीं आ रही। यदि किसी प्रक्रिया में बदलाव की जरूरत होगी तो उसे वास्तविक परिस्थितियों के अनुसार दोबारा व्यवस्थित किया जाएगा।

यदि कर्मचारियों को किसी नई प्रक्रिया में कठिनाई आती है, या किसी मशीन के में बदलाव की जरूरत होती है या किसी सिफारिश में सुधार की जरूरत महसूस होती है, तो उसे वास्तविक परिस्थितियों के अनुसार संशोधित किया जाएगा।

रक्षा सूत्रों के अनुसार इस चरण में कंसल्टेंट का मुख्य काम मार्गदर्शन देना और आवश्यक सुधार सुझाना होगा, जबकि नई कार्यप्रणाली को लागू करने का कार्य आर्मी बेस वर्कशॉप्स की टीम करेगी।

अंत में एक वेरिफिकेशन एंड रिअलाइनमेंट रिपोर्ट तैयार की जाएगी, जिसमें सभी संशोधनों और अंतिम इम्प्लीमेंटेशन रोडमैप को शामिल किया जाएगा। (Army Base Workshops)

मैनपावर का भी होगा विस्तृत विश्लेषण

इस प्रोजेक्ट में कर्मचारियों की संख्या बढ़ाने के बजाय मौजूदा संसाधनों का बेहतर उपयोग करने पर जोर दिया गया है। विशेषज्ञ यह अध्ययन करेंगे कि किस विभाग में कितने कर्मचारी हैं, उनकी तकनीकी क्षमता क्या है, किस प्रकार का प्रशिक्षण चाहिए और कौन-से कार्यों को अधिक व्यवस्थित तरीके से किया जा सकता है। इससे बिना अतिरिक्त मैनपावर के भी उत्पादन क्षमता बढ़ाने का प्रयास किया जाएगा।

रिवर्स इंजीनियरिंग पर रहेगा विशेष फोकस

सेना के कई प्लेटफॉर्म ऐसे हैं जिनके मूल निर्माता अब स्पेयर पार्ट्स उपलब्ध नहीं कराते। ऐसी स्थिति में रिवर्स इंजीनियरिंग सबसे महत्वपूर्ण समाधान है। इस प्रक्रिया में पुराने पुर्जे का अध्ययन करके उसकी डिजाइन तैयार की जाती है और फिर उसी के आधार पर नया पुर्जा बनाया जाता है। इससे विदेशी कंपनियों पर निर्भरता कम होगी और पुराने सैन्य उपकरण अधिक समय तक ऑपरेशनल रह सकेंगे। (Army Base Workshops)

आधुनिक तकनीक का बढ़ेगा इस्तेमाल

इस प्रोजेक्ट का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा आधुनिक तकनीकों को वर्कशॉप्स में शामिल करना है। इसके तहत डिजिटल ट्विन जैसी तकनीक का उपयोग किया जाएगा। इसमें किसी उपकरण का डिजिटल मॉडल तैयार किया जाता है, जिससे उसकी खराबी और प्रदर्शन का पहले से विश्लेषण किया जा सकता है।

इसी तरह एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग यानी थ्री-डी प्रिंटिंग तकनीक का उपयोग करके ऐसे स्पेयर पार्ट्स बनाए जा सकेंगे जो बाजार में उपलब्ध नहीं हैं।

एडवांस्ड डायग्नोस्टिक्स सिस्टम की मदद से उपकरणों की खराबी जल्दी पकड़ी जा सकेगी जबकि आधुनिक मटेरियल टेस्टिंग तकनीक से किसी पुर्जे की गुणवत्ता का अधिक सटीक परीक्षण किया जाएगा। (Army Base Workshops)

Explainer: पिनाका LRGR की 60 KM मिनिमम रेंज क्यों है गेमचेंजर? जानिए कैसे बढ़ी भारतीय सेना की स्ट्राइक पावर

Pinaka Long Range Guided Rocket
(Image for representational Purpose only. AI-Generated Image)

Pinaka Long Range Guided Rocket: डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गेनाइजेशन (डीआरडीओ) ने बुधवार को पिनाका लॉन्ग रेंज गाइडेड रॉकेट (एलआरजीआर) का सफल परीक्षण किया। खास बात यह रही कि इस बार रॉकेट को उसकी अधिकतम दूरी पर नहीं, बल्कि यूजर डिफाइंड 60 किलोमीटर की मिनिमम रेंज पर परखा गया। सूत्रों के मुताबिक यह परीक्षण इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि इससे यह साबित हुआ कि रॉकेट कम दूरी पर भी उतनी ही सटीकता से हमला कर सकता है, जितना लंबी दूरी पर करता है।

परीक्षण के दौरान रॉकेट को भारतीय सेना के मौजूदा पिनाका लॉन्चर से ही दागा गया। उड़ान के दौरान उसने तय ट्रैजेक्टरी पर चलते हुए तय टारगेट को सटीक निशाना बनाया।

Pinaka Long Range Guided Rocket: क्या होती है मिनिमम रेंज और यह क्यों है जरूरी

अक्सर किसी मिसाइल या रॉकेट को लेकर जब बात होती है, तो उसकी रेंज को लेकर होती है। लेकिन न्यूनतम दूरी भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है। मिनिमम रेंज का मतलब उस सबसे कम दूरी से है, जहां तक कोई रॉकेट पूरी क्षमता के साथ सुरक्षित और सटीक तरीके से हमला कर सकता है।

यदि कोई हथियार केवल अधिकतम दूरी के लिए बनाया गया हो, तो वह नजदीक के टारगेट पर प्रभावी नहीं रह जाता। ऐसे में सेना को अलग वेपन सिस्टम का सहारा लेना पड़ता है। पिनाका एलआरजीआर की 60 किलोमीटर की न्यूनतम दूरी इस समस्या को काफी हद तक खत्म करती है। अब एक ही लॉन्चर से अपेक्षाकृत नजदीक और दूर, दोनों तरह के टारगेट्स को निशाना बनाया जा सकता है। (Pinaka Long Range Guided Rocket)

युद्ध के मैदान में क्यों बढ़ जाता है इसका महत्व

सूत्रों का कहना है कि युद्ध के दौरान दुश्मन हमेशा एक निश्चित दूरी पर नहीं होता। कई बार दुश्मन की अग्रिम चौकियां 60 से 70 किलोमीटर दूर होती हैं, जबकि कई बार टारगेट 100 किलोमीटर से भी ज्यादा दूरी पर हो सकता है।

ऐसी स्थिति में सेना के लिए सबसे बड़ी जरूरत एक ऐसे हथियार की होती है, जो अलग-अलग दूरी पर समान सटीकता के साथ काम करे। पिनाका एलआरजीआर इसी जरूरत को पूरा करता है। यदि किसी कमांडर को अचानक 65 किलोमीटर दूर मौजूद टारगेट पर हमला करना हो, तो उसे किसी दूसरे हथियार का इंतजार नहीं करना पड़ेगा।

गाइडेड रॉकेट में मिनिमम रेंज क्यों तय की जाती है

सामान्य रॉकेट और गाइडेड रॉकेट में बड़ा अंतर यह होता है कि गाइडेड रॉकेट उड़ान के दौरान लगातार अपनी दिशा नियंत्रित करता रहता है।

रॉकेट लॉन्च होने के बाद पहले फेज में स्थिर उड़ान हासिल करता है। इसके बाद उसका नेविगेशन और गाइडेंस सिस्टम एक्टिव होकर उसे सही ट्रैजेक्टरी पर रखता है। आखिरी चरण में कंट्रोल सिस्टम छोटे-छोटे सुधार करता है ताकि टारगेट पर सटीक हमला हो सके।

यदि दूरी बहुत कम हो तो रॉकेट को इन सभी प्रक्रियाओं के लिए पर्याप्त समय नहीं मिलता। इसी कारण हर गाइडेड हथियार की एक न्यूनतम प्रभावी दूरी तय की जाती है। पिनाका एलआरजीआर में यह दूरी 60 किलोमीटर रखी गई है। (Pinaka Long Range Guided Rocket)

एक ही लॉन्चर से कई दूरी के टारगेट

पिनाका सिस्टम की सबसे बड़ी खासियत इसकी कॉमन लॉन्चर फिलॉसफी है। सूत्रों के अनुसार सेना को नए रॉकेट के लिए अलग लॉन्चर खरीदने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

मौजूदा पिनाका लॉन्चर से ही स्टैंडर्ड पिनाका रॉकेट, गाइडेड पिनाका और लॉन्ग रेंज गाइडेड रॉकेट दागे जा सकते हैं। इससे लॉजिस्टिक आसान होती है और सिस्टम पर भी कम खर्च आता है।

एक ही प्लेटफॉर्म से लगभग 60 किलोमीटर से लेकर 120 किलोमीटर तक की दूरी पर टारगेट साधने की क्षमता सेना के लिए बेहद फायदेमंद मानी जा रही है। (Pinaka Long Range Guided Rocket)

गाइडेड तकनीक कैसे करती है काम

पिनाका एलआरजीआर सामान्य अनगाइडेड रॉकेट की तरह केवल बैलिस्टिक रास्ते पर नहीं उड़ता। रॉकेट में आधुनिक नेविगेशन और गाइडेंस तकनीक लगी है, जो उड़ान के दौरान उसकी दिशा पर लगातार नजर रखती है। यदि हवा, तापमान या अन्य कारणों से रॉकेट अपनी तय दिशा से थोड़ा भी हटता है, तो कंट्रोल सिस्टम तुरंत उसे सही रास्ते पर वापस लाने का प्रयास करता है।

इसी वजह से इसकी सटीकता पहले के अनगाइडेड रॉकेट की तुलना में काफी बेहतर मानी जाती है।

सेना को क्या मिलेगा फायदा

इस नई क्षमता से भारतीय सेना की रॉकेट आर्टिलरी पहले के मुकाबले ज्यादा फायदेमंद हो जाएगी। पहले अलग-अलग दूरी के टारगेट्स के लिए अलग हथियारों की जरूरत पड़ सकती थी। अब एक ही प्लेटफॉर्म से कई दूरी पर हमला किया जा सकेगा।

इससे ऑपरेशन की योजना बनाना आसान होगा, प्रतिक्रिया देने में कम समय लगेगा और हथियारों की तैनाती भी ज्यादा प्रभावी तरीके से की जा सकेगी। (Pinaka Long Range Guided Rocket)

डीएसी ने भी दी थी मंजूरी

दिसंबर 2025 में डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल (डीएसी) ने पिनाका लॉन्ग रेंज गाइडेड रॉकेट परियोजना को मंजूरी दी थी। इस परियोजना की अनुमानित लागत लगभग 2,500 करोड़ रुपये रखी गई थी। इसमें केवल रॉकेट ही नहीं बल्कि उनसे जुड़े सपोर्ट सिस्टम और अन्य आवश्यक उपकरण भी शामिल हैं। डीएसी की मंजूरी मिलने के बाद इस प्रणाली के उत्पादन और सेना में शामिल करने की प्रक्रिया आगे बढ़ी।

नवंबर 2024 में पूरे हुए थे 75 किमी वाले गाइडेड पिनाका के परीक्षण

नवंबर 2024 में डीआरडीओ ने 75 किलोमीटर रेंज वाले गाइडेड पिनाका रॉकेट के महत्वपूर्ण फ्लाइट ट्रायल पूरे किए थे। ये परीक्षण प्रोविजनल स्टाफ क्वालिटेटिव रिक्वायरमेंट्स (पीएसक्यूआर) वैलिडेशन ट्रायल का हिस्सा थे। इनका उद्देश्य यह देखना था कि रॉकेट तय दूरी पर कितनी सटीकता से हमला करता है और लगातार कई रॉकेट दागे जाने पर उसका प्रदर्शन कैसा रहता है।

परीक्षण के दौरान दो अलग-अलग भारतीय कंपनियों द्वारा बनाए गए रॉकेटों को अलग-अलग लॉन्चरों से दागा गया। इसमें रेंज, सटीकता, स्थिरता और फायरिंग की गति जैसे सभी प्रमुख मानकों की जांच की गई। इन परीक्षणों के सफल रहने के बाद सेना के लिए गाइडेड पिनाका की राह और आसान हुई। (Pinaka Long Range Guided Rocket)

दिसंबर 2025 में पहली बार 120 किलोमीटर रेंज वाला एलआरजीआर उड़ा

29 दिसंबर 2025 को डीआरडीओ ने पहली बार पिनाका लॉन्ग रेंज गाइडेड रॉकेट का सफल फ्लाइट टेस्ट किया। यह परीक्षण ओडिशा के चांदीपुर स्थित इंटीग्रेटेड टेस्ट रेंज से किया गया था। उस समय रॉकेट को उसकी अधिकतम डिजाइन रेंज यानी लगभग 120 किलोमीटर तक दागा गया।

पूरी उड़ान के दौरान रॉकेट ने निर्धारित ट्रैजेक्टरी का पालन किया और लक्ष्य पर सटीक प्रहार किया। रेंज पर मौजूद सभी ट्रैकिंग सिस्टम ने उड़ान के हर चरण की निगरानी की। सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि इस नए रॉकेट को भारतीय सेना के मौजूदा पिनाका लॉन्चर से ही दागा गया। इससे यह साबित हो गया कि नए सिस्टम के लिए अलग लॉन्चर विकसित करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। (Pinaka Long Range Guided Rocket)

सात रेजिमेंट पूरी तरह ऑपरेशनल

सूत्रों के मुताबिक भारतीय सेना में पिनाका की सात रेजिमेंट पूरी तरह ऑपरेशनल हैं, जबकि आठवीं रेजिमेंट को भी आवश्यक उपकरण मिलने शुरू हो गए हैं। इसी दौरान एलआरजीआर को इन रेजिमेंटों में शामिल करने की तैयारी शुरू हुई। (Pinaka Long Range Guided Rocket)

आर्मेनिया बना पहला विदेशी ग्राहक

भारत ने गाइडेड पिनाका प्रणाली का पहला निर्यात आर्मेनिया को किया है। 18 जनवरी 2026 को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने नागपुर स्थित सोलर डिफेंस एंड एयरोस्पेस लिमिटेड के संयंत्र से गाइडेड पिनाका रॉकेटों की पहली खेप को रवाना किया। रक्षा सूत्रों के अनुसार आर्मेनिया ने पहले ही पिनाका की चार बैटरियों के लिए करीब 2,000 करोड़ रुपये का समझौता किया था। इसी सौदे के तहत गाइडेड रॉकेट भी शामिल हैं। यह पहला अवसर था जब भारत ने गाइडेड पिनाका प्रणाली किसी विदेशी देश को निर्यात की। (Pinaka Long Range Guided Rocket)

भारतीय उद्योग की भी बड़ी भूमिका

पिनाका कार्यक्रम में सरकारी और निजी दोनों क्षेत्र की कंपनियां शामिल हैं। डीआरडीओ ने इसकी तकनीक विकसित की है, जबकि उत्पादन का काम अलग-अलग भारतीय कंपनियों को दिया गया है।

रॉकेट निर्माण में म्यूनिशंस इंडिया लिमिटेड और इकोनॉमिक एक्सप्लोसिव्स लिमिटेड की भूमिका है। वहीं लॉन्चर और उससे जुड़े वाहनों के विकास में लार्सन एंड टुब्रो तथा टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स जैसी कंपनियां भी योगदान दे रही हैं। (Pinaka Long Range Guided Rocket)