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भारतीय सेना के रिपेयर नेटवर्क का होगा मेकओवर, आर्मी बेस वर्कशॉप्स का बड़ा ट्रांसफॉर्मेशन करने की हो रही तैयारी

भारतीय सेना में आर्मी बेस वर्कशॉप्स सबसे बड़े टेक्निकल मेंटेनेंस सेंटर माने जाते हैं। जब किसी टैंक, आर्मर्ड व्हीकल, आर्टिलरी, रडार, कम्युनिकेशन सिस्टम या दूसरे सैन्य उपकरण में बड़ी खराबी आती है, तब उसकी मरम्मत इन्हीं वर्कशॉप्स में होती है...

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📍नई दिल्ली | 9 Jul, 2026, 1:00 PM

Army Base Workshops: भारतीय सेना जहां खुद को आधुनिक हथियारों से लैस कर रही है, तो वहीं अपने सबसे महत्वपूर्ण तकनीकी और रिपेयर नेटवर्क को भी आधुनिक बनाने के लिए बड़ा कदम उठा रही है। सेना का डायरेक्टरेट जनरल ऑफ इलेक्ट्रॉनिक्स एंड मैकेनिकल इंजीनियर्स (डीजी ईएमई) अपने आर्मी बेस वर्कशॉप्स (एबीडब्ल्यू) को मॉडर्नाइज बनाने की तैयारी कर रही है। इसके लिए ईएमई ने एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (ईओआई) जारी किया है।

इसका उद्देश्य सेना के पूरे रिपेयर सिस्टम को नई तकनीक, बेहतर वर्कफ्लो, मॉडर्न प्रोडक्शन कैपेसिटी और फास्ट मेंटेनेंस सिस्टम के हिसाब से तैयार करना है। इस परियोजना के जरिए सेना अपनी रिपेयर और ओवरहॉल क्षमता को अगले स्तर पर ले जाना चाहती है ताकि युद्ध के समय उपकरणों को कम समय में फिर से ऑपरेशनल बनाया जा सके।

Army Base Workshops हैं सेना के मेंटेनेंस सेंटर

भारतीय सेना में आर्मी बेस वर्कशॉप्स सबसे बड़े टेक्निकल मेंटेनेंस सेंटर माने जाते हैं। जब किसी टैंक, आर्मर्ड व्हीकल, आर्टिलरी, रडार, कम्युनिकेशन सिस्टम या दूसरे सैन्य उपकरण में बड़ी खराबी आती है, तब उसकी मरम्मत इन्हीं वर्कशॉप्स में होती है।

यहां सामान्य रिपेयर के अलावा पूरी ओवरहॉलिंग, खराब हिस्सों को बदलना, पुराने उपकरणों को नया जीवन देना, तकनीकी सुधार करना और कई बार ऐसे स्पेयर पार्ट्स तैयार करना भी शामिल होता है जो बाजार में आसानी से उपलब्ध नहीं होते।

इन्हीं वर्कशॉप्स की वजह से सेना अपने कई पुराने प्लेटफॉर्म सालों तक सफलतापूर्वक इस्तेमाल कर पाती है। (Army Base Workshops)

क्यों पड़ी बदलाव की जरूरत

सूत्रों के अनुसार पिछले कुछ सालों में सेना के उपकरण पहले की तुलना में कहीं अधिक आधुनिक और जटिल हो गए हैं। पहले जहां किसी हथियार या वाहन में मुख्य रूप से मैकेनिकल सिस्टम होता था, वहीं अब उनमें इलेक्ट्रॉनिक्स, सेंसर, डिजिटल कंट्रोल सिस्टम, सॉफ्टवेयर, एडवांस्ड कम्युनिकेशन और ऑटोमेशन जैसी तकनीक शामिल हो चुकी है। ऐसे आधुनिक उपकरणों की मरम्मत के लिए केवल पारंपरिक मशीनें और पुराने तरीके पर्याप्त नहीं हैं।

दूसरी बड़ी चुनौती यह है कि कई विदेशी उपकरण अब काफी पुराने हो चुके हैं। उनके मूल निर्माता कई बार स्पेयर पार्ट्स बनाना बंद कर देते हैं या सपोर्ट सीमित कर देते हैं। इससे सेना को पुराने प्लेटफॉर्म लंबे समय तक चलाने में कठिनाई होती है। इसी कारण सेना अब ऐस सिस्टम चाहती है जहां जरूरत पड़ने पर कई स्पेयर पार्ट्स देश में ही तैयार किए जा सकें।

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आत्मनिर्भरता पर रहेगा विशेष जोर

सूत्रों के मुताबिक इस पूरे प्रोजेक्ट का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देना भी है। अब केवल विदेशी कंपनियों पर निर्भर रहने के बजाय सेना चाहती है कि अधिक से अधिक पुर्जे, सब-सिस्टम और उपकरण भारत में ही विकसित और तैयार किए जाएं।

यही वजह है कि इस परियोजना में रिवर्स इंजीनियरिंग, एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग, डिजिटल ट्विन, एडवांस्ड डायग्नोस्टिक्स और मटेरियल टेस्टिंग जैसी आधुनिक तकनीकों को शामिल करने की योजना बनाई गई है।

इन तकनीकों की मदद से ऐसे पुर्जों का भी निर्माण किया जा सकेगा जिनका प्रोडक्शन कंपनियां अब बंद कर चुकी हैं।

केवल रिपेयर नहीं, उत्पादन क्षमता भी बढ़ेगी

सेना अब आर्मी बेस वर्कशॉप्स की भूमिका केवल रिपेयर तक सीमित नहीं रखना चाहती। इन वर्कशॉप्स में सीमित स्तर पर उत्पादन, असेंबली, फैब्रिकेशन, उपकरणों का अपग्रेडेशन और स्वदेशी स्पेयर पार्ट्स तैयार करने की क्षमता भी विकसित की जाएगी। इससे उपकरणों की उपलब्धता बढ़ेगी और रिपेयर का समय कम होगा। (Army Base Workshops)

किन वर्कशॉप्स से होगी शुरुआत

इस पूरे कार्यक्रम की शुरुआत दो पायलट आर्मी बेस वर्कशॉप्स से की जा रही है। पहली वर्कशॉप किरकी (पुणे) स्थित 512 आर्मी बेस वर्कशॉप है। यहां मुख्य रूप से बीएमपी-2 जैसे आर्मर्ड व्हीकल्स और उनसे जुड़े सिस्टम की मरम्मत तथा ओवरहॉल का काम होता है।

दूसरी जबलपुर स्थित 506 आर्मी बेस वर्कशॉप है। यहां विभिन्न प्रकार की तोपों और उनसे जुड़े उपकरणों की मरम्मत और रखरखाव किया जाता है। इन दोनों वर्कशॉप्स में लागू होने वाले सुधारों का अध्ययन करने के बाद आगे की योजना बनाई जाएगी।

किन क्षेत्रों में होगा सबसे बड़ा बदलाव

इस परियोजना के तहत तीन प्रमुख क्षेत्रों का विस्तार से अध्ययन किया जाएगा। पहला क्षेत्र उत्पादन से जुड़ा है, जहां पूरे रिपेयर और निर्माण कार्य को अधिक तेज और व्यवस्थित बनाने पर काम होगा।

दूसरा क्षेत्र सप्लाई चेन मैनेजमेंट का है। इसमें यह देखा जाएगा कि स्पेयर पार्ट्स, कच्चा माल और अन्य आवश्यक सामग्री सही समय पर उपलब्ध हो रही है या नहीं।

तीसरा क्षेत्र सपोर्ट सर्विसेज का है। इसमें इंजीनियरिंग सपोर्ट और प्रशासनिक व्यवस्था दोनों का मूल्यांकन किया जाएगा ताकि पूरी कार्यप्रणाली अधिक प्रभावी बन सके। (Army Base Workshops)

कैसे आगे बढ़ेगा पूरा ट्रांसफॉर्मेशन

आर्मी बेस वर्कशॉप्स के आधुनिकीकरण का यह कार्यक्रम तीन चरणों में पूरा किया जाएगा। यह पूरा ट्रांसफॉर्मेशन प्रोजेक्ट लगभग आठ महीने में पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। चयनित कंसल्टेंसी फर्म सबसे पहले दोनों वर्कशॉप्स की स्टडी करेगी। एक्सपर्ट्स यह देखेंगे कि किसी उपकरण के वर्कशॉप में आने से लेकर उसकी मरम्मत पूरी होने और वापस सेना को सौंपे जाने तक पूरी प्रक्रिया में कितना समय लगता है।

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परियोजना के पहले चरण को ‘ऐज-इज असेसमेंट’ नाम दिया गया है। इसकी अवधि लगभग तीन महीने होगी। इस दौरान कंसल्टेंसी टीम दोनों वर्कशॉप्स में जाकर वास्तविक कामकाज का विस्तृत अध्ययन करेगी।

विशेषज्ञ यह देखेंगे कि किसी सैन्य उपकरण के वर्कशॉप में पहुंचने से लेकर उसकी मरम्मत पूरी होने और सेना को वापस सौंपे जाने तक पूरी प्रक्रिया कैसे चलती है। रिपेयर के हर चरण का रिकॉर्ड तैयार किया जाएगा। उत्पादन, सप्लाई चेन मैनेजमेंट और सपोर्ट सर्विसेज से जुड़े सभी वर्कफ्लो का अध्ययन होगा।

इसी चरण में कर्मचारियों की तैनाती, मशीनों के उपयोग, वर्कशॉप के लेआउट, उत्पादन योजना, गुणवत्ता नियंत्रण प्रणाली, बैकलॉग, रिपेयर का समय, रीवर्क और कुल उत्पादन क्षमता का भी विस्तृत विश्लेषण किया जाएगा।

पहले चरण में मिली जानकारी के आधार पर परियोजना का दूसरा चरण शुरू होगा, जिसे ‘टू-बी असेसमेंट’ कहा गया है। इसकी अवधि लगभग दो महीने होगी। इसमें मौजूदा व्यवस्था की तुलना में बेहतर वर्कफ्लो, नई तकनीकों का इस्तेमाल, मशीनों की बेहतर व्यवस्था, मैनपावर का संतुलित उपयोग और आधुनिक औद्योगिक प्रक्रियाओं को शामिल किया जाएगा।

इसी दौरान प्रोडक्शन बढ़ाने के लिए विस्तृत ब्लूप्रिंट तैयार होगा। रिपेयर एसेट्स के तकनीकी अपग्रेडेशन की योजना बनाई जाएगी। यह भी तय किया जाएगा कि आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल किस प्रकार किया जाए ताकि मरम्मत की गुणवत्ता और गति दोनों बेहतर हो सकें।

परियोजना का अंतिम चरण ‘वेरिफिकेशन एंड रिअलाइनमेंट’ कहलाता है। इसकी अवधि अधिकतम तीन महीने रखी गई है। तीसरे चरण में यह देखा जाएगा कि जिन सुधारों की सिफारिश की गई है, उन्हें लागू करने के दौरान किसी प्रकार की व्यावहारिक समस्या तो नहीं आ रही। यदि किसी प्रक्रिया में बदलाव की जरूरत होगी तो उसे वास्तविक परिस्थितियों के अनुसार दोबारा व्यवस्थित किया जाएगा।

यदि कर्मचारियों को किसी नई प्रक्रिया में कठिनाई आती है, या किसी मशीन के में बदलाव की जरूरत होती है या किसी सिफारिश में सुधार की जरूरत महसूस होती है, तो उसे वास्तविक परिस्थितियों के अनुसार संशोधित किया जाएगा।

रक्षा सूत्रों के अनुसार इस चरण में कंसल्टेंट का मुख्य काम मार्गदर्शन देना और आवश्यक सुधार सुझाना होगा, जबकि नई कार्यप्रणाली को लागू करने का कार्य आर्मी बेस वर्कशॉप्स की टीम करेगी।

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अंत में एक वेरिफिकेशन एंड रिअलाइनमेंट रिपोर्ट तैयार की जाएगी, जिसमें सभी संशोधनों और अंतिम इम्प्लीमेंटेशन रोडमैप को शामिल किया जाएगा। (Army Base Workshops)

मैनपावर का भी होगा विस्तृत विश्लेषण

इस प्रोजेक्ट में कर्मचारियों की संख्या बढ़ाने के बजाय मौजूदा संसाधनों का बेहतर उपयोग करने पर जोर दिया गया है। विशेषज्ञ यह अध्ययन करेंगे कि किस विभाग में कितने कर्मचारी हैं, उनकी तकनीकी क्षमता क्या है, किस प्रकार का प्रशिक्षण चाहिए और कौन-से कार्यों को अधिक व्यवस्थित तरीके से किया जा सकता है। इससे बिना अतिरिक्त मैनपावर के भी उत्पादन क्षमता बढ़ाने का प्रयास किया जाएगा।

रिवर्स इंजीनियरिंग पर रहेगा विशेष फोकस

सेना के कई प्लेटफॉर्म ऐसे हैं जिनके मूल निर्माता अब स्पेयर पार्ट्स उपलब्ध नहीं कराते। ऐसी स्थिति में रिवर्स इंजीनियरिंग सबसे महत्वपूर्ण समाधान है। इस प्रक्रिया में पुराने पुर्जे का अध्ययन करके उसकी डिजाइन तैयार की जाती है और फिर उसी के आधार पर नया पुर्जा बनाया जाता है। इससे विदेशी कंपनियों पर निर्भरता कम होगी और पुराने सैन्य उपकरण अधिक समय तक ऑपरेशनल रह सकेंगे। (Army Base Workshops)

आधुनिक तकनीक का बढ़ेगा इस्तेमाल

इस प्रोजेक्ट का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा आधुनिक तकनीकों को वर्कशॉप्स में शामिल करना है। इसके तहत डिजिटल ट्विन जैसी तकनीक का उपयोग किया जाएगा। इसमें किसी उपकरण का डिजिटल मॉडल तैयार किया जाता है, जिससे उसकी खराबी और प्रदर्शन का पहले से विश्लेषण किया जा सकता है।

इसी तरह एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग यानी थ्री-डी प्रिंटिंग तकनीक का उपयोग करके ऐसे स्पेयर पार्ट्स बनाए जा सकेंगे जो बाजार में उपलब्ध नहीं हैं।

एडवांस्ड डायग्नोस्टिक्स सिस्टम की मदद से उपकरणों की खराबी जल्दी पकड़ी जा सकेगी जबकि आधुनिक मटेरियल टेस्टिंग तकनीक से किसी पुर्जे की गुणवत्ता का अधिक सटीक परीक्षण किया जाएगा। (Army Base Workshops)

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    हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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