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The Indian Air Force will get to monitor the ‘Air Flys Satellite’, the AS-HAPS months will be monitored at a height of 20 km.

AS-HAPS Project India
(Image for representational purpose only. AI-Generated Image)

AS-HAPS Project India: The Indian Air Force will soon be able to monitor the enemy without space. The Ministry of Defence has released the Expression of Interest (EOI) for design and development of Airship based High Altitude Seudo Satellite (AS-HAPS). This project has been launched under Make-1 category of DAP-2020.

Particulars that the DAC meeting at the beginning of this month is fixed-wing high Altitude for Indian Air Force Seudo Satellite (FW-HAPS) purchase was also approved. While now India is working on two different types of High Altitude Seudo Satellite platform, starting the development process for the Airship Based system.

AS-HAPS Project India: What is High Altitude Seudo Satellite

According to the sources, High Altitude Seudo Satellite is an unmanned platform that can fly from the surface of the earth for a long time at a height of about 18 to 20 kilometers. This height is significantly higher than normal passenger planes and the weather bearing also remains very low.

it Seudo Satellite That’s why it can constantly keep an eye on a certain area like satellites present in space. The difference is just that it can be reloaded back to the ground if needed.

Why is Airship Based System Special

According to the formulas, the project would like to develop the Air Force Airship Based platform. It will be a large airship filled with gas, which will stay in the air for a long time with the help of solar energy and other energy systems.

इसकी सबसे बड़ी खूबी यह होगी कि यह एक ही इलाके के ऊपर कई दिनों या कई सप्ताह तक लगातार उड़ान भर सकता है। इसी वजह से यह सीमा क्षेत्रों, समुद्री इलाकों और दूर-दराज के क्षेत्रों में लगातार निगरानी रखने के लिए काफी उपयोगी माना जा रहा है। (AS-HAPS Project India)

20 किलोमीटर ऊंचाई पर करेगा काम

सूत्रों के अनुसार, एएस-एचएपीएस को करीब 18 से 20 किलोमीटर की ऊंचाई पर काम करने के लिए तैयार किया जाएगा। इस ऊंचाई पर वायुमंडल अपेक्षाकृत स्थिर होता है, जिससे प्लेटफॉर्म लंबे समय तक कम से कम एक महीने तक एक ही इलाके में रह सकता है।

वहीं, यह प्लेटफॉर्म केवल निगरानी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसमें ऐसे उपकरण लगाए जा सकेंगे, जिनकी मदद से खुफिया जानकारी जुटाई जा सके, दूर-दराज के इलाकों में कम्युनिकेशन फैसिलिटी उपलब्ध कराई जा सके और विभिन्न प्रकार के सेंसर्स के जरिए जमीन पर हो रही गतिविधियों पर लगातार नजर रखी जा सके।

इसमें इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल कैमरे, इन्फ्रारेड सेंसर, रडार, कम्युनिकेशन रिले सिस्टम और अन्य विशेष 500-2000 किग्रा तक के पेलोड लगाए जा सकते हैं। जरूरत के अनुसार अलग-अलग मिशन के लिए इसका पेलोड बदला भी जा सकेगा।

सैटेलाइट से सस्ता और ज्यादा लचीला विकल्प

सूत्रों का कहना है कि High Altitude स्यूडो सैटेलाइट का सबसे बड़ा फायदा इसकी लागत और संचालन है। किसी सैटेलाइट को अंतरिक्ष में भेजने के लिए रॉकेट की जरूरत होती है, जबकि एएस-एचएपीएस को जमीन से उड़ाया जा सकता है।

जरूरत पूरी होने के बाद इसे वापस उतारकर रखरखाव किया जा सकता है और फिर दोबारा उड़ान पर भेजा जा सकता है। इसी कारण यह कई मिशनों में पारंपरिक सैटेलाइट का कम लागत वाला विकल्प माना जाता है।

मेक-1 कैटेगरी में होगा डेवलपमेंट

सूत्रों के मुताबिक, यह प्रोजेक्ट रक्षा खरीद प्रक्रिया-2020 की मेक-1 कैटेगरी के तहत शुरू किया गया है। इस मॉडल में सरकार और कंपनियां मिलकर नई डिफेंस टेक्नोलॉजी डेवलप करते हैं। विकास कार्य के दौरान सरकारी सहायता भी उपलब्ध कराई जाती है, ताकि देश में नई तकनीकों का विकास तेज हो सके।

भारतीय वायुसेना ने योग्य भारतीय कंपनियों और उद्योग समूहों से इस प्रोजेक्ट के लिए प्रस्ताव मांगे हैं। आवेदन की अंतिम तारीख 10 अगस्त तय की गई है। (AS-HAPS Project India)

डीएसी पहले ही दे चुकी है एक और एचएपीएस को मंजूरी

3 जुलाई को Defence Acquisition Council ने भारतीय वायुसेना के लिए फिक्स्ड-विंग हाई एल्टीट्यूड स्यूडो सैटेलाइट की खरीद को स्वीकृति दी थी। यह विमान की तरह पंखों वाला मानव रहित प्लेटफॉर्म होगा, जो सौर ऊर्जा और बैटरी की मदद से कई सप्ताह तक स्ट्रेटोस्फियर में उड़ान भर सकेगा।

फिक्स्ड-विंग और एयरशिप बेस्ड दोनों सिस्टम्स अलग-अलग जरूरतों को पूरा करेंगे। फिक्स्ड-विंग प्लेटफॉर्म अपेक्षाकृत तेज रफ्तार से बड़े क्षेत्र में काम कर सकता है, जबकि एयरशिप आधारित प्लेटफॉर्म अधिक समय तक एक स्थान पर रहकर निगरानी करने के लिए उपयुक्त माना जाता है। (AS-HAPS Project India)

इसे बनाने में जुटीं कई कंपनियां

सूत्रों के मुताबिक, देश की कई कंपनियां पहले से ही इस तरह की तकनीक पर काम कर रही हैं। सरकारी क्षेत्र की नेशनल एयरोस्पेस लेबोरेटरीज और न्यूस्पेस रिसर्च एंड लैबोरेट्रीज समेत निजी क्षेत्र की कुछ डिफेंस कंपनियां लंबे समय तक उड़ान भरने वाले हाई एल्टीट्यूड प्लेटफॉर्म तैयार करने में जुटी हुई हैं। वहीं, रक्षा मंत्रालय के इस नए प्रोजेक्ट से इन कंपनियों को स्वदेशी सिस्टम डेवलप करने का मौका मिलेगा।

सूत्रों का कहना है कि भारतीय वायुसेना ऐसे प्लेटफॉर्म चाहती है, जो लंबे समय तक बिना रुके सीमावर्ती और समुद्री क्षेत्रों पर नजर रख सकें। लगातार उड़ान भरने की क्षमता के कारण यह प्रणाली खुफिया जानकारी जुटाने, संचार सहायता देने और निगरानी मिशनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। (AS-HAPS Project India)

INS Mahendragiri created a three-large record, project-17A with 75% indigenization laid the foundation of "Builder Navy"!

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(Image for representational purpose only. AI-Generated Image)

Project 17A INS Mahendragiri: The Indian Navy was largely dependent on foreign design and imported ships by a few decades ago. The British Leander class or ships based on Russian/British technology were built. But in the 21st century the situation completely changed. The Warship Design Bureau of Indian Navy (WDB) started preparing indigenous designs. At the same time, Project 17A (Nelgiri Class) is the largest example of it.

Sixth Indigenous Stealth Frigate created under Project 17A INS Mahendragiri Prepared in record time. The ship was officially incorporated into the Eastern naval fleet at the event held at Visakhapatnam on Saturday. The Indian Navy Warship Design Bureau has prepared while construction has been done by Mumbai-based Mazgaon Dock Shipbuilders Limited (MDL).

Project 17A INS Mahendragiri: Construction term component 95 to 75 months

Naval Head Admiral at Commissioning Ceremony Krishna Swaminathan The name Mahendragiri is derived from the historic Mahendragiri Mountain, located in the eastern ferries of Odisha. The Old Giri Class Frigates of the Indian Navy under Mahendragiri Project-17A, who served the country from 1972 to 2013.

The Naval Chief reported that the Indian Shipbuilding sector made several new records during the construction of Mahendragiri.
इसमें पहली उपलब्धि यह रही कि लॉन्चिंग से डिलीवरी तक का समय लगभग आधा कर दिया गया। पहले इस प्रक्रिया में लगभग 63 महीने लगते थे, जबकि महेंद्रगिरि के मामले में यह अवधि घटकर करीब 31 महीने रह गई।

दूसरी उपलब्धि पूरे निर्माण समय से जुड़ी रही है। पहले एक युद्धपोत तैयार होने में करीब 95 महीने लगते थे, लेकिन इस परियोजना में निर्माण अवधि घटकर लगभग 75 महीने रह गई। यानी निर्माण समय में लगभग 20 प्रतिशत की कमी लाई गई।

वहीं, तीसरी और सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि की चर्चा करते हुए चीफ ऑफ नेवल स्टाफ ने कहा कि पहले समुद्री परीक्षणों में बहुत समय लगता था। पहले किसी नए युद्धपोत को पूरी तरह तैयार घोषित करने से पहले पांच से सात समुद्री परीक्षण करने पड़ते थे, लेकिन महेंद्रगिरि ने पहले ही सी ट्रायल में सभी प्रमुख तकनीकी मानकों को सफलतापूर्वक पूरा कर लिया।

नौसेना प्रमुख ने कहा कि यह उपलब्धि भारतीय नौसेना, एमडीएल, वारशिप ओवरसीइंग टीम, परीक्षण एजेंसियों, रक्षा उद्योग और पूरे जहाज के दल के संयुक्त प्रयासों का परिणाम है।

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Image Source: Indian Navy

कोविड-19 महामारी में शुरू हुआ था निर्माण

समारोह में Mazgaon Dock Shipbuilders लिमिटेड (एमडीएल) के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक कैप्टन (सेवानिवृत्त) जगमोहन ने कहा कि महेंद्रगिरि का निर्माण उस समय शुरू हुआ, जब पूरी दुनिया कोविड-19 महामारी से जूझ रही थी। सप्लाई चेन प्रभावित थी, कर्मचारियों की आवाजाही सीमित थी और उद्योगों के सामने कई तरह की चुनौतियां थीं। इसके बावजूद परियोजना पर काम लगातार जारी रखा गया।

उन्होंने कहा कि भारतीय नौसेना, एमडीएल और रक्षा उद्योग के बीच बेहतर तालमेल की वजह से जहाज के प्रमुख हथियार और युद्ध प्रणाली डिलीवरी से पहले ही पूरी तरह तैयार कर दी गईं। यही वजह है कि महेंद्रगिरि पहले ही समुद्री परीक्षण में सभी आवश्यक तकनीकी मानकों पर खरा उतरा। (Project 17A INS Mahendragiri)

Read also:  INS Mahendragiri joined the Indian Navy, Defence Minister Bole- Both Maritime Shakti and Self-sufficiency in the Changing War

प्रोजेक्ट-17ए क्यों है खास

Project-17A भारतीय नौसेना के सबसे महत्वपूर्ण स्वदेशी युद्धपोत निर्माण कार्यक्रमों में से एक है। यह पहले के शिवालिक क्लास के फ्रिगेट का एडवांस वर्जन है। इस प्रोजेक्ट के तहत कुल सात स्टेल्थ गाइडेड मिसाइल फ्रिगेट बनाए जा रहे हैं।

इनमें चार युद्धपोत मुंबई स्थित एमडीएल और तीन युद्धपोत कोलकाता की गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (जीआरएसई) ने बनाए हैं।

भारतीय नौसेना के लिए नई पीढ़ी के स्टेल्थ फ्रिगेट बनाने की योजना को डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल (डीएसी) ने वर्ष 2009 में मंजूरी दी थी। इसके बाद फरवरी 2015 में कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (सीसीएस) ने इस परियोजना के लिए करीब 45,381 करोड़ रुपये की स्वीकृति दी।

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प्रोजेक्ट-17ए में पहली बार इंटीग्रेटेड मॉड्यूलर कंस्ट्रक्शन तकनीक

खास बात यह है कि प्रोजेक्ट-17ए के युद्धपोतों के निर्माण में मॉड्यूलर कंस्ट्रक्शन तकनीक का इस्तेमाल किया गया। इस तरीके में पूरे जहाज को एक साथ नहीं बनाया जाता, बल्कि उसे 200 से 300 टन तक के कई बड़े हिस्सों (ब्लॉक्स) में बांट दिया जाता है।

इस प्रक्रिया में सबसे पहले पूरे जहाज का कंप्यूटर की मदद से डिजिटल डिजाइन तैयार किया जाता है। इसके बाद डिजाइन के अनुसार जहाज को कई बड़े हिस्सों में बांट दिया जाता है। फिर स्टील प्लेटों को काटकर जहाज का आगे का हिस्सा, बीच का हिस्सा और पीछे का हिस्सा जैसे अलग-अलग ब्लॉक्स बनाए जाते हैं।

जब ब्लॉक तैयार हो जाते हैं, तब उनके अंदर पहले से ही बिजली की केबल, पाइपलाइन, वेंटिलेशन सिस्टम और कई अन्य मशीनें फिट कर दी जाती हैं। इससे बाद में अलग से फिटिंग करने में कम समय लगता है। इसके बाद गोलायथ क्रेन जैसी भारी क्रेन से इन ब्लॉक्स को उठाकर एक जगह लाया जाता है और उन्हें बहुत सटीक तरीके से जोड़ दिया जाता है। सभी हिस्सों को वेल्डिंग करके एक पूरा जहाज तैयार किया जाता है। इसके बाद अंतिम उपकरण लगाए जाते हैं, सभी सिस्टम की जांच होती है और फिर जहाज को समुद्र में उतारकर सी ट्रायल किए जाते हैं।

इस आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल करने के लिए मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड (एमडीएल) और गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (जीआरएसई) ने अपने शिपयार्ड में विशेष सुविधाएं तैयार कीं। इनमें बड़ी गोलायथ क्रेन, आधुनिक मॉड्यूल वर्कशॉप और वेट बेसिन जैसी सुविधाएं शामिल हैं।

एमडीएल ने इस तकनीक को और बेहतर तरीके से अपनाने के लिए इटली की प्रसिद्ध जहाज निर्माण कंपनी फिनकांतिएरी से भी तकनीकी सहयोग लिया। इसी वजह से प्रोजेक्ट-17ए के युद्धपोत पहले की तुलना में कम समय में तैयार किए जा सके और उनकी निर्माण गुणवत्ता भी बेहतर हुई। (Project 17A INS Mahendragiri)

टाइमलाइन- एमडीएल में बने प्रोजेक्ट-17ए के ये जहाज

प्रोजेक्ट-17ए का पहला युद्धपोत आईएनएस नीलगिरि था। इसकी कील 28 दिसंबर 2017 को रखी गई और इसे 28 सितंबर 2019 को लॉन्च किया गया। कोविड-19 महामारी और अन्य वजहों से इसके समुद्री परीक्षण अगस्त 2024 में शुरू हो सके। जहाज 20 दिसंबर 2024 को नौसेना को सौंपा गया और 15 जनवरी 2025 को आईएनएस सूरत और आईएनएस वाघशीर के साथ भारतीय नौसेना में शामिल किया गया। यह इस परियोजना का पहला जहाज था, इसलिए इसके निर्माण में सबसे अधिक समय लगा। कई नई तकनीकों और प्रक्रियाओं को पहली बार लागू करने के कारण इसे तैयार होने में लगभग सात वर्ष लगे।

दूसरा युद्धपोत आईएनएस उदयगिरि था। इसकी कील 7 मई 2019 को रखी गई और 17 मई 2022 को इसे लॉन्च किया गया। केवल 37 महीनों में इसे तैयार कर 1 जुलाई 2025 को नौसेना को सौंप दिया गया। लॉन्च से डिलीवरी तक का यह समय पूरे प्रोजेक्ट-17ए क्लास में सबसे कम रहा। बाद में 26 अगस्त 2025 को इसे आईएनएस हिमगिरि के साथ एक ही समारोह में कमीशन किया गया।

तीसरे एमडीएल युद्धपोत आईएनएस तारागिरि की कील 10 सितंबर 2020 को रखी गई। इसे 11 सितंबर 2022 को लॉन्च किया गया। 28 नवंबर 2025 को इसकी डिलीवरी हुई और 3 अप्रैल 2026 को इसे भारतीय नौसेना में शामिल कर लिया गया।

Next INS Mahendragiri की कील 28 जून 2022 को रखी गई। इसे 1 सितंबर 2023 को लॉन्च किया गया और 30 अप्रैल 2026 को नौसेना को सौंप दिया गया। वहीं आज 11 जुलाई 2026 को विशाखापत्तनम में इसकी कमीशनिंग हुई। (Project 17A INS Mahendragiri)

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जीआरएसई ने भी तैयार किए तीन आधुनिक युद्धपोत

कोलकाता स्थित जीआरएसई ने इस परियोजना के तहत तीन युद्धपोत बनाए।

पहला जहाज आईएनएस हिमगिरि था। इसकी कील 10 नवंबर 2018 को रखी गई, 14 दिसंबर 2020 को लॉन्च किया गया और 31 जुलाई 2025 को नौसेना को सौंपा गया। 26 अगस्त 2025 को इसे आईएनएस उदयगिरि के साथ कमीशन किया गया।

दूसरा जहाज आईएनएस दूनागिरि था। इसकी कील 24 जनवरी 2020 को रखी गई और 15 जुलाई 2022 को लॉन्च किया गया। 30 मार्च 2026 को इसकी डिलीवरी हुई और 21 जून 2026 को इसे आईएनएस संसोधक और आईएनएस अग्रय के साथ भारतीय नौसेना में शामिल किया गया।

वहीं, तीसरा और अंतिम जहाज आईएनएस विंध्यगिरि है। इसकी कील 5 मार्च 2021 को रखी गई और 17 अगस्त 2023 को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने इसे लॉन्च किया। यह इस परियोजना का अंतिम युद्धपोत है और इसका निर्माण अंतिम चरण में है। जो जल्द ही नौसेना में शामिल होगा। (Project 17A INS Mahendragiri)

इस पूरे प्रोजेक्ट-17ए की एक और बड़ी उपलब्धि यह रही कि दिसंबर 2024 में आईएनएस नीलगिरि की डिलीवरी के बाद अगले 17 महीनों से भी कम समय में छह प्रोजेक्ट-17ए युद्धपोत नौसेना को सौंप दिए गए। आईएनएस उदयगिरि ने लॉन्च से डिलीवरी तक केवल 37 महीने का समय लेकर पूरी क्लास में नया रिकॉर्ड बनाया।

आईएनएस दूनागिरि का निर्माण भी पहले जहाज की तुलना में काफी कम समय में पूरा हुआ। एक और बड़ी उपलब्धि यह रही कि दिसंबर 2024 में आईएनएस नीलगिरि की डिलीवरी के बाद अगले 17 महीनों से भी कम समय में छह प्रोजेक्ट-17ए युद्धपोत नौसेना को सौंप दिए गए।

इसी तरह आईएनएस तारागिरि पिछले 11 महीनों के दौरान डिलीवर होने वाला चौथा युद्धपोत बना। जबकि पूरी नीलगिरी क्लास 2026 के अंत तक ऑपरेशनल हो जाएगी।

आधुनिक युद्ध के लिए तैयार प्लेटफॉर्म

प्रोजेक्ट-17ए के सभी फ्रिगेट हवा, समुद्र और पानी के भीतर मौजूद खतरों से एक साथ मुकाबला करने में सक्षम हैं। इनमें सुपरसोनिक ब्रह्मोस क्रूज मिसाइल, बराक-8 मध्यम दूरी की वायु रक्षा मिसाइल, आधुनिक मल्टी-फंक्शन एईएसए रडार, टॉरपीडो लॉन्चर, पनडुब्बी रोधी रॉकेट प्रणाली, क्लोज-इन वेपन सिस्टम और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली लगी हैं।

करीब 149 मीटर लंबे और 6,670 टन वजनी इन युद्धपोतों में कंबाइंड डीजल ऑर गैस (सीओडीओजी) प्रोपल्शन सिस्टम लगाया गया है। यह इन्हें लंबी दूरी तक संचालन और लगभग 28 नॉट की अधिकतम गति प्रदान करता है। प्रत्येक जहाज पर लगभग 225 अधिकारी और नाविक तैनात किए जा सकते हैं।

इन युद्धपोतों में ऑटोमेशन का स्तर भी पहले की तुलना में काफी अधिक है। स्टेल्थ डिजाइन के कारण इनकी रडार पहचान कम होती है और आधुनिक सेंसर इन्हें समुद्री अभियानों के दौरान बेहतर स्थिति की जानकारी उपलब्ध कराते हैं। (Project 17A INS Mahendragiri)

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2026 में 18 शिप होंगे कमिशन!

मॉड्यूलर कंस्ट्रक्शन, स्वदेशी डिजाइन और शिपयार्ड्स की बढ़ती दक्षता के चलते जहाज अब रिकॉर्ड समय में तैयार हो रहे हैं। महेंद्रगिरि इस साल का छठा वॉरशिप है, जो नेवी में कमिशन किया गया है। वहीं इसी महीने नेवी में एक और स्वदेशी पनडुब्बी रोधी युद्धक पोत आईएनएस मालवान कमिशन होना है। जबकि अगले दो महीने में नेवी को 4 और शिप मिलेंगे। वहीं, इस साल 2026 में नेवी में 18 शिप कमिशन होंगे। बता दें कि नेवी के लिए इस वक्त 40 से ज्यादा शिप बन रहे हैं, जो आने वाले सालों में कमिशन किए जाएंगे। (Project 17A INS Mahendragiri)

INS Mahendragiri joined the Indian Navy, Defence Minister Bole- Both Maritime Shakti and Self-sufficiency in the Changing War

INS Mahendragiri Commission
(Image Source: Indian Navy)

INS Mahendragiri Commissioned: The Indian Navy got another state-of-the-art indigenous Health Frigate on Saturday. INS Mahendragiri was formally incorporated into the Eastern naval fleet in Visakhapatnam. It is the sixth stalth frigate prepared under the Warship Project-17A and has been built by Mazgaon Dock Shipbuilders Limited (MDL) in Mumbai.

On this spot, Defence Minister Rajnath Singh said that joining Mahendragiri’s navy is not only the beginning of a new warship, but it is also evidence of India’s growing maritime power, indigenous defence production and modern warship building capacity.

INS Mahendragiri Commissioned: New strength to meet the eastern marine area

Defence Minister said INS Mahendragiri By joining the Navy of the Eastern Fleet war will be capacity and strong. This will lead to the Blue Water Capacity of Indian Navy and its presence in the Indian Ocean region.

In his address, the Defence Minister said that Visakhapatnam today is not only the headquarters of the Eastern Naval Command, but has become a major centre for the maritime security of India. In the past few years, the city has hosted several large international naval events. It has also strengthened cooperation with the maritime diplomacy and friend countries of India.

He said Andhra Pradesh is now becoming an important centre of defence and aerospace sector. Here is fast working on defense production, military platform, test features and new technologies. Several important tasks associated with the country’s indigenous fifth generation fighter aircraft program are also being carried out in the same state.

The strong example of self-sufficient India is Mahendergiri

Rajnath Singh said that INS Mahendergiri is a great example of self-sufficient India campaign. It has been constructed by MDL based on design prepared by the Bureau of Warship Design of Indian Navy. He said that many defence industries, micro, small and medium industries and private companies have also played a significant role in the construction of this warship. Protecting the country has become industrial base and strong.

Must adopt techniques

Defence Minister said that the form of war in the world is changing rapidly. Now Artificial Intelligence, Cyber War, Space Based Technique, Hypersonic Weapons and Unmanned Systems have become part of modern military campaigns.

He said it is necessary to adopt new techniques, but with this the traditional military abilities must also be strengthened. According to them, the technique will play a significant role in future wars, but the actual strength of any country will be determined by its trained soldier, strong military organization and national resolution.

Operations Lessons Meet From the Sindoor

Defence Minister The operation shifter proved that India’s forces are fully capable of responding to every challenge. This campaign demonstrated our combined military capacity, technical efficiency and better coordination in front of the world.

वहीं, हिंद महासागर में भारत की बढ़ती भूमिका पर बोलते हुए रक्षा मंत्री ने कहा कि आज समुद्री सुरक्षा केवल नौसेना का विषय नहीं रह गई है। यह देश की आर्थिक सुरक्षा और वैश्विक व्यापार से भी जुड़ी हुई है।

भारत हिंद-प्रशांत क्षेत्र में एक जिम्मेदार और भरोसेमंद साझेदार के रूप में अपनी भूमिका निभा रहा है।

उन्होंने कहा कि हमारी नौसेना ने बार-बार यह साबित किया है कि चाहे किसी समुद्री क्षेत्र में राहत अभियान चलाना हो, समुद्री डकैती रोकनी हो, प्राकृतिक आपदा में सहायता पहुंचानी हो या संकट में फंसे देशों की मदद करनी हो, भारतीय नौसेना हमेशा सबसे पहले पहुंचती है।

इसी कारण भारतीय नौसेना को आज दुनिया में “फर्स्ट रिस्पॉन्डर” और “प्रीफर्ड सिक्योरिटी पार्टनर” के रूप में देखा जाता है। (INS Mahendragiri Commissioned)

आंध्र प्रदेश में तेजी से बढ़ रहा रक्षा उद्योग

रक्षा मंत्री ने कहा कि अनकापल्ली जिले में भारत डायनेमिक्स लिमिटेड की नई नेवल सिस्टम कंस्ट्रक्शन युनिट डेवलप की जा रही है। इस इकाई में ऑटोनॉमस पानी में चलने वाले वाहन, टॉरपीडो और अंडरवॉटर काउंटर मेजर सिस्टम जैसे आधुनिक रक्षा उपकरण बनाए जाएंगे। पहले इन प्रणालियों के लिए विदेशों पर निर्भर रहना पड़ता था।

उन्होंने यह भी बताया कि कर्नूल को देश के बड़े ड्रोन निर्माण केंद्र के रूप में विकसित करने का प्रयास किया जा रहा है। जिस तरह सूरत हीरा उद्योग और बेंगलुरु सूचना प्रौद्योगिकी के लिए जाना जाता है, उसी तरह कर्नूल को मानव रहित प्रणालियों के प्रमुख केंद्र के रूप में विकसित करने की दिशा में काम चल रहा है।

रक्षा मंत्री ने कहा कि महेंद्रगिरि के नौसेना में शामिल होने के साथ आंध्र प्रदेश समुद्री सुरक्षा और मानव रहित रक्षा तकनीक, दोनों क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है। (INS Mahendragiri Commissioned)

तय समय सीमा के भीतर पूरा किया गया महेंद्रगिरी

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने अपने भाषण के दौरान कहा कि महेंद्रगिरि का निर्माण तय समय सीमा के भीतर पूरा किया गया है। यह केवल एक युद्धपोत नहीं, बल्कि भारत की बढ़ती तकनीकी क्षमता, कुशल मानव संसाधन और मजबूत रक्षा उद्योग का प्रतीक है।

उन्होंने कहा कि हर नए युद्धपोत के साथ देश का रक्षा उद्योग और अधिक परिपक्व, सक्षम और आत्मविश्वासी बनता जा रहा है।

रक्षा मंत्री ने कहा कि जहाज निर्माण केवल एक उद्योग नहीं है। इससे इस्पात, इलेक्ट्रॉनिक्स, सेंसर, इंजन, सॉफ्टवेयर, प्रिसीजन इंजीनियरिंग, लॉजिस्टिक्स और अनेक सहायक उद्योगों को भी काम मिलता है। इसी कारण सरकार जहाज निर्माण क्षेत्र में लंबे समय के निवेश को बढ़ावा दे रही है।

उन्होंने कहा कि हमारा लक्ष्य भारत को वैश्विक स्तर पर जहाज निर्माण और समुद्री रक्षा तकनीक का प्रमुख केंद्र बनाना है। इसमें निजी उद्योग, एमएसएमई, स्टार्टअप, नवाचार करने वाले युवा और वैश्विक साझेदार सभी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

रक्षा मंत्री ने बताया कि सरकार ने मैरीटाइम डेवलपमेंट फंड, शिपबिल्डिंग फाइनेंशियल असिस्टेंस स्कीम और शिपबिल्डिंग डेवलपमेंट स्कीम जैसी कई योजनाएं शुरू की हैं। इन योजनाओं से देश का औद्योगिक आधार मजबूत होगा, जहाज निर्माण क्षमता बढ़ेगी और भारत अपने समुद्री तथा आर्थिक हितों की रक्षा के लिए और अधिक सक्षम बनेगा।

नेवी चीफ बोले- विशाखापत्तनम बना समुद्री सुरक्षा का प्रमुख केंद्र

वहीं, इस मौके पर बोलते हुए नौसेना प्रमुख एडमिरल कृष्णा स्वामीनाथन ने कहा कि विशाखापत्तनम समुद्री सुरक्षा का प्रमुख केंद्र बन चुका है। यह शहर भारत के समुद्री दृष्टिकोण और पूर्वी समुद्री क्षेत्र में हमारी रणनीतिक सोच का प्रमुख केंद्र बन चुका है।

उन्होंने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में Visakhapatnam ने अंतरराष्ट्रीय फ्लीट रिव्यू, मिलन नौसैनिक अभ्यास, इंडियन ओशन नेवल संगोष्ठी (आईओएनएस) और कई महत्वपूर्ण समुद्री कार्यक्रमों की सफल मेजबानी की है। इन आयोजनों ने भारत की समुद्री कूटनीति और मित्र देशों के साथ सहयोग को नई मजबूती दी है। उन्होंने कहा कि भारत के पूर्वी समुद्री तट की सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता में विशाखापत्तनम की भूमिका लगातार बढ़ती जा रही है। (INS Mahendragiri Commissioned)

महेंद्रगिरि ने जोड़ा पूर्वी और पश्चिमी तट

नौसेना प्रमुख ने कहा कि महेंद्रगिरि का निर्माण मुंबई स्थित मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड में हुआ, जबकि इसे भारतीय नौसेना के पूर्वी बेड़े में शामिल किया जा रहा है। एक तरह से यह युद्धपोत भारत के पश्चिमी और पूर्वी दोनों समुद्री तटों को जोड़ने का प्रतीक है। यह हमारी एकीकृत, आधुनिक और बहु-केंद्रित नौसैनिक क्षमता को भी दर्शाता है।

उन्होंने कहा कि मुझे पूरा विश्वास है कि आईएनएस महेंद्रगिरि भारतीय नौसेना की युद्ध क्षमता को और मजबूत करेगा। यह जहाज देश के समुद्री हितों की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा और पूर्वी बेड़े की ताकत को बढ़ाएगा। उन्होंने कहा कि महेंद्रगिरि का ध्येय वाक्य “माइटी, मेजेस्टिक, मैचलेस” है। मुझे विश्वास है कि यह युद्धपोत अपने नाम और अपने आदर्शों के अनुरूप हर मिशन में उत्कृष्ट प्रदर्शन करेगा। (INS Mahendragiri Commissioned)

इन प्रोजेक्ट्स से एमडीएल में मिलीं छह हजार नौकरियां

वहीं, इस मौके पर बोलते हुए एमडीएल के चैयरमेन और एमडी रिटायर्ड कैप्टन जगमोहन ने बताया कि महेंद्रगिरि के शामिल होने के साथ ही एमडीएल ने पिछले लगभग 20 सालों में भारतीय नौसेना द्वारा सौंपे गए सभी प्रमुख युद्धपोत निर्माण कार्यक्रम पूरे कर लिए हैं।

इन परियोजनाओं की कुल लागत लगभग 85 हजार करोड़ रुपये रही है। इन परियोजनाओं ने भारत की समुद्री सुरक्षा को मजबूत किया है और देश में आधुनिक जहाज निर्माण की क्षमता को नई ऊंचाई दी है।

उन्होंने कहा कि इन परियोजनाओं से एमडीएल में छह हजार से अधिक कुशल कर्मचारियों को लगातार रोजगार मिला।

इसके अलावा देशभर में 25 हजार से अधिक अतिरिक्त रोजगार के अवसर भी पैदा हुए। 500 से अधिक सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग (एमएसएमई) इन परियोजनाओं का हिस्सा बने।

इनमें से कई कंपनियां शुरुआत में छोटी आपूर्तिकर्ता थीं, लेकिन आज वे भारतीय रक्षा उद्योग की भरोसेमंद साझेदार बन चुकी हैं। मेरे विचार से यही आत्मनिर्भर भारत की सबसे बड़ी सफलता है। (INS Mahendragiri Commissioned)

एमडीएल ने बनाईं कलवरी क्लास की छह पनडुब्बियां

कैप्टन जगमोहन ने बताया कि एमडीएल द्वारा बनाए गए कलवरी श्रेणी की छह पनडुब्बियां, विशाखापत्तनम श्रेणी के चार विध्वंसक युद्धपोत और Project-17A की चार फ्रिगेट आज भारतीय नौसेना की अग्रिम युद्ध क्षमता का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

इनमें से हर प्लेटफॉर्म भारत की तकनीकी क्षमता और स्वदेशी जहाज निर्माण की सफलता का उदाहरण है। इन्हें भारतीय नौसेना के वारशिप डिजाइन ब्यूरो, वारशिप ओवरसीइंग टीम, एमडीएल और भारतीय उद्योगों के संयुक्त प्रयास से तैयार किया गया है। (INS Mahendragiri Commissioned)

20 हजार करोड़ रुपये का नया मेगा शिपयार्ड

एमडीएल के एमडी कैप्टन जगमोहन ने बताया कि महेंद्रगिरि के कमीशनिंग के साथ भविष्य की योजनाओं पर भी तेजी से काम जारी है। उन्होंने बताया कि एमडीएल एक नए मेगा शिपयार्ड की स्थापना की योजना पर काम कर रहा है। इस परियोजना में 20 हजार करोड़ रुपये से अधिक का निवेश प्रस्तावित है।

इस नए शिपयार्ड में बड़े वाणिज्यिक जहाजों का निर्माण किया जाएगा। साथ ही यह भारत की क्षमता को बड़े नौसैनिक जहाजों के निर्माण, रखरखाव और आधुनिकीकरण के क्षेत्र में भी मजबूत करेगा।

यह परियोजना भारत सरकार के समुद्री अमृतकाल विजन-2047 को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी और भारत को दुनिया के प्रमुख जहाज निर्माण देशों में शामिल करने की दिशा में मदद करेगी।

75 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री से तैयार हुआ युद्धपोत

आईएनएस महेंद्रगिरि का वजन लगभग 6,670 टन है। यह एक बहुउद्देश्यीय स्टेल्थ फ्रिगेट है, जिसे समुद्र में अलग-अलग प्रकार के अभियानों के लिए तैयार किया गया है। इसका नाम ओडिशा के प्रसिद्ध महेंद्रगिरि पर्वत के नाम पर रखा गया है।

इस युद्धपोत में लगभग 75 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री का उपयोग किया गया है। इसमें इस्तेमाल होने वाले कई प्रमुख सिस्टम, सेंसर और उपकरण भारतीय उद्योगों ने तैयार किए हैं। इससे देश की डिजाइन क्षमता, निर्माण कौशल और रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता का स्तर बढ़ा है। (INS Mahendragiri Commissioned)

आधुनिक हथियारों और सेंसर से लैस

महेंद्रगिरि को आधुनिक समुद्री युद्ध की जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। इसमें लंबी दूरी तक निगरानी करने वाला मल्टी-फंक्शन रडार लगाया गया है। यह रडार एक साथ कई हवाई और समुद्री टारगेट्स पर नजर रख सकता है।

युद्धपोत में लंबी दूरी की सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल प्रणाली, सुपरसोनिक ब्रह्मोस क्रूज मिसाइल, पनडुब्बी रोधी हथियार, टॉरपीडो लॉन्चर, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली और क्लोज-इन वेपन सिस्टम लगाए गए हैं। इसके अलावा इसमें आधुनिक सेंसर लगाए गए हैं, जो समुद्र के ऊपर और नीचे मौजूद खतरों का पता लगाने में मदद करते हैं।

महेंद्रगिरि को हवा, समुद्र और पानी के भीतर मौजूद खतरों का एक साथ सामना करने के लिए तैयार किया गया है। (INS Mahendragiri Commissioned)

स्टेल्थ डिजाइन से दुश्मन के लिए पहचानना मुश्किल

यह युद्धपोत स्टेल्थ तकनीक पर आधारित है। इसके डिजाइन में ऐसे बदलाव किए गए हैं, जिससे रडार पर इसकी पहचान करना कठिन हो जाता है। जहाज की बाहरी संरचना इस तरह तैयार की गई है कि रडार तरंगों का परावर्तन कम हो।

इसके साथ ही जहाज में ऑटोमेशन का स्तर भी काफी अधिक है। कई सिस्टम कंप्यूटर आधारित हैं, जिससे कम समय में तेजी से निर्णय लेने और हथियारों के संचालन में मदद मिलती है।

महेंद्रगिरि में कंबाइंड डीजल ऑर गैस (सीओडीओजी) प्रोपल्शन सिस्टम लगाया गया है। जरूरत के अनुसार यह डीजल इंजन और गैस टरबाइन दोनों का उपयोग कर सकता है। इससे जहाज को लंबी दूरी तक संचालन और अधिक गति दोनों मिलती हैं। इसकी अधिकतम गति लगभग 28 नॉट है और इस पर करीब 225 अधिकारी और नाविक तैनात किए जा सकते हैं। (INS Mahendragiri Commissioned)

Air Defense Training in Gopalpur Hightech, Army now giving on simulators VSHORADS and L-70 operators like War Training

Army Air Defence Centre Gopalpur
Image Source: Indian Army

Army Air Defence Centre Gopalpur: The Indian Army is constantly modernizing its training regime. The new generation is now being trained on several state-of-the-art simulators at the Army Air Defense Centre, Gopalpur, Odisha. The Army Air Defense Centre has included the Driving Simulator, VSHORADS Simulator and Virtual Shooting Simulator in its training. According to the Army, these new systems are aimed at better training the seals in real war-like conditions, so that they can quickly cope with modern air threats.

Army Air Defence Centre Gopalpur: Replacing War

By a few years ago, air hazards mainly meant fighter aircraft and helicopter. Now the situation is completely changed. Today the dangers such as drones, drones swarm, loiting munition, low altitude flying cruise missiles and electronic warfare are rising rapidly.

Only traditional training in such an environment is not considered sufficient. The soldiers have become necessary to practice in an environment where they can learn to decide immediately in different situations. Considering the Need Gopalpur The technology-based training system has been strengthened.

Why is Gopalpur Special

Located in Gopalpur Military Station of Odisha Army Air Defense Centre is the premier Air Defence Training Institute of Indian Army. here Air Defense The officers of the core and the youngest modern vendor systems operate and train air hazards.

Here are trainings already associated with L-70 Air Defence Gun, Shilka, Sky Missile System and other Air Defense Platform. Now joining new generation simulators has become the level of training and modern. Army Air Defence Centre Gopalpur

Training of Missile Operators from VSHORADS Simulator

Joined at Gopalpur VSHORADS The simulator will practise running air defense missile systems of short distance to the seals. VSHORADS is used to target fly helicopters, drones and other air targets at low altitudes.

This simulator has a model like a genuine launcher. Different types of air targets appear on the large screen in front of it. Young targets identify, lock and then practice the entire process of staining the missile.

According to the formulas, both day and night can be practiced. Also drone swarms, helicopters flying at low altitudes and fast speed targets can also be simulated.

L-70 and other systems also have training

Only new missile systems are not trained at Gopalpur Centre. The operation of L-70 air defense gun, sillka and other air defense systems are also trained.

Also for L-70 Gun in Video Simulator Training is available where young targets identify, monitor and practice the process of fire control. The L-70 system has also been working to upgrade with modern sensors and counter drone capacity in recent years, according to which training is also being updated. Army Air Defence Centre Gopalpur

Practice of firing on virtual shooting simulators

Also a virtual shooting in Gopalpur Simulator is. It has been built in such a way that the soldiers can practice firing in such conditions as a war run without real pills. If the enemy commands, terrorists, drone operators or small weapons are reached on an air defense position, the soldiers may also have to combat the rifle. This simulator for such situations prepares them in advance.

This system uses a real rifle-like-looking training rifle. When the soldier shoots and presses the trigger, the computer immediately records whether the tablet was correctly replaced. The biggest merit of this simulator is that it can be practiced repeatedly without having to play a real pill. Different conditions, weather, location and danger can be changed within a few minutes. This makes the soldiers practice in a variety of situations before real operation and their response capacity is better than ever.

Driving simulators will get real-like training

The aim of the new driving simulators is to practice the Military Vehicles run safely and fast in difficult situations. The soldiers are experienced to drive vehicles in conditions such as separate roads, mountain paths, rains, fog, night time and limited visibility.

The system has a motion platform, giving the driver a real experience of moving the vehicle. The whole way appears on a large digital display with it. Conditions such as sudden threats, road barriers and air hazards are also created during training, so that the driver can learn to respond instantly. Army Air Defence Centre Gopalpur

Digital Analysis of Every Practice

The complete record of every training session is prepared in these simulators. The system enters how much time the soldier took to recognize the target, when he decided and how accurate his response was.

After this, instructors get complete reports. On the same basis, the skills of the seals are analyzed and further training is given. This allows training to be made more effective and in accordance with individual needs.

Increased emphasis on technique based training

The Indian Army has been focusing on technology-based training for the past few years. It is intended not only to teach weapons, but also to prepare the seals for situations where they may have to make the right decision within a few seconds.

Frequent exercises can be made from modern simulators because it reduces the consumption of missiles and ammunition, reduces the cost of training and the seals experience complex conditions in a more secure environment.

According to the information issued by the Army Air Defense Center, the main objective of these new simulators is to give the troops training in accordance with technology-based, mission-oriented and real conditions. It has special emphasis on technical efficiency, operational skills and decision making ability. Army Air Defence Centre Gopalpur

Why is DRDO’s new S-band radar special? Several targets will be monitored simultaneously from ballistic to cruise missiles

DRDO S-Band Tracking Radar
(Image for representational purpose only. AI-Generated Image)

DRDO S-Band Tracking Radar: DRDO is preparing to develop new S-band instrumentation tracking radar to further strengthen the country’s missile testing capability. The Integrated Test Range (ITR) of DRDO, located Silverpur, has released the Request for Proposal (RFP) for Procurement and Development of this state-of-the-art radar system. It will help to accurately tracking radar missiles, rockets, fighter aircraft and other aerial targets. It will be mainly used during ballistic missile, air defense system and other flight tests.

DRDO S-Band Tracking Radar: What happens S-Band Instrumentation Tracking Radar

General Monitoring Radar and Instrumentation Tracking Radar has a big difference. The general radar is aimed at exploring and monitoring the aerial targets, while the instrumentation tracking radar has to record every activity of a missile or aerial platform in a highly accurate manner during the work test.

This radar will track the target in two different ways. The first skin mode, in which its position is detected based on the radar waves returned from the target. The second beacon or transponder mode, which is tracking based on signals from special transponders engaged on the missile or the test platform. This allows accurate monitoring of the targets flying at longer distances and higher altitudes. (DRDO S-Band Tracking Radar)

Active Phased Array technology will be based on system

New Radar Solid State as per formulas Active Phased Array will be based on technology. This radar will work on S-band (2900MHz to 3300MHz) frequency. It will feature thousands of small transmits and receive modules replacing traditional revolving antenna, which will be able to send the beams to different directions in an electronic way.

Digital beam forming technology will be used with it. This will make it easier to monitor multiple targets at the same time and the accuracy of tracking will also increase. (DRDO S-Band Tracking Radar)

More than 250 kilometres

This radar is about 2 square meters present at least 250 kilometres as per RFP Radar Cross Section The targets with which will be able to track the skin mode. Its minimum detection range is laid about 3 kilometres. I.e. very close and far away will be able to monitor both goals.

This system will monitor low radar cross-section targets, cruise missiles, tactical missiles, fighter planes, medium-range ballistic missiles and long-distance ballistic missiles.

Different types of targets can be monitored

This radar is being prepared in such a way that several types of aerial platforms can be tracked from the same system. It includes combat aircraft, cruise missile, tactical missile, rocket booster, missile separating phase and ballistic missile payload.

Sources say that high and low range resolution modes will also be available for different categorizing targets, making tracking of both small and large items more accurate. (DRDO S-Band Tracking Radar)

Four dimension will be tracking

यह नया सिस्टम केवल टारगेट की दूरी ही नहीं बताएगा, बल्कि चार महत्वपूर्ण जानकारियां एक साथ उपलब्ध कराएगा। इनमें टारगेट की दूरी, दिशा (एजिमुथ), ऊंचाई (एलिवेशन) और उसकी रफ्तार (डॉप्लर) शामिल होगी। हर माप के साथ समय की जानकारी भी रिकॉर्ड होगी, जिससे पूरी उड़ान का विश्लेषण किया जा सकेगा।

दस्तावेज के अनुसार इसकी दूरी मापने की सटीकता लगभग 20 मीटर के भीतर होगी। वहीं डॉप्लर आधारित गति मापने की सटीकता लगभग 4 मीटर प्रति सेकंड तक रखी गई है।

रडार जरूरत के अनुसार हाई और लो दोनों प्रकार के रेंज रिजॉल्यूशन मोड में काम करेगा। हाई रिजॉल्यूशन में लगभग 75 मीटर और लो रिजॉल्यूशन में लगभग 200 मीटर तक की दूरी का अंतर स्पष्ट पहचान सकेगा।

तेजी से बदलती दिशा में भी करेगा काम

रडार इलेक्ट्रॉनिक तरीके से लगभग 50 डिग्री तक दाएं-बाएं और 70 डिग्री तक ऊंचाई की दिशा में बिना एंटीना घुमाए बीम भेज सकेगा। एंटीना को अलग-अलग जरूरत के अनुसार झुकाया भी जा सकेगा। सामान्य ऑपरेशन के लिए इसे 12 डिग्री पर रखा जाएगा। बहुत ऊंचाई और अधिक गति वाले टारगेट्स के लिए इसे 40 डिग्री तक झुकाया जा सकेगा। रखरखाव के समय इसे 0 डिग्री और परिवहन के दौरान 90 डिग्री की स्थिति में रखा जा सकेगा।

यह सिस्टम बहुत तेज रफ्तार से उड़ने वाले टारगेट्स की भी निगरानी कर सकेगी। आरएफपी के अनुसार इसकी डॉप्लर क्षमता 2500 मीटर प्रति सेकंड से अधिक होगी।

परीक्षण के दौरान यदि मिसाइल बहुत तेज गति से दिशा बदलती है या ऊंचाई तेजी से बढ़ती है, तब भी यह प्रणाली लगातार ट्रैक बनाए रख सकेगी। (DRDO S-Band Tracking Radar)

पूरा सिस्टम होगा मोबाइल

आरएफपी में इस रडार को री-लोकेटेबल सिस्टम के रूप में डेवलप करने की शर्त रखी गई है। इसका मतलब है कि आवश्यकता पड़ने पर इसे एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाकर फिर से स्थापित किया जा सकेगा।

पूरे सिस्टम में एक्टिव एंटीना एरे, मोटर चालित पेडेस्टल, प्रोसेसिंग इलेक्ट्रॉनिक्स, रेक्टिफायर यूनिट, लिक्विड कूलिंग सिस्टम, रडार कंट्रोल सिस्टम और सेल्फ कैलिब्रेशन जैसी सुविधाएं शामिल होंगी।

इसमें अतिरिक्त सुरक्षा के लिए रेडोम भी लगाया जाएगा, जिससे मौसम और बाहरी परिस्थितियों का असर कम हो।

लिक्विड कूलिंग और सेल्फ कैलिब्रेशन जैसी आधुनिक सुविधाएं

रडार में बड़ी संख्या में इलेक्ट्रॉनिक मॉड्यूल लगातार काम करेंगे। इन्हें सामान्य तापमान पर रखने के लिए रेडंडेंट लिक्विड कूलिंग सिस्टम लगाया जाएगा ताकि किसी एक यूनिट में खराबी आने पर दूसरी यूनिट काम संभाल सके।

इसके साथ सेल्फ कैलिब्रेशन सुविधा भी होगी। इससे रडार समय-समय पर अपनी सटीकता स्वयं जांच सकेगा और जरूरत पड़ने पर अपने मापदंड स्वतः ठीक कर सकेगा। (DRDO S-Band Tracking Radar)

कंट्रोल शेल्टर से होगी पूरी निगरानी

पूरे सिस्टम के ऑपरेशन के लिए वातानुकूलित ऑपरेशन शेल्टर बनाया जाएगा। इसमें रडार प्रोसेसिंग यूनिट, वाइड बैंड रिकॉर्डर, दो मॉनिटरिंग कंसोल और डेटा विश्लेषण के लिए कई हाई परफॉर्मेंस वर्कस्टेशन लगाए जाएंगे।

यहीं से ऑपरेटर रडार की निगरानी करेंगे और उड़ान परीक्षण के दौरान मिलने वाले आंकड़ों का विश्लेषण करेंगे।

मिसाइल परीक्षणों में निभाता है अहम रोल

आरएफपी डॉक्युमेंट के मुताबिक 18 महीने के भीतर पूरा सिस्टम उपलब्ध कराना होगा। रडार की इंस्टॉलेशन और कमीशनिंग का काम भी वही कंपनी करेगी। यह काम आईटीआर चांदीपुर या डीआरडीओ द्वारा तय किए गए भारत के किसी अन्य स्थान पर किया जा सकता है। साथ ही, रडार को चलाने और उसका ऑपरेशन समझाने के लिए कंपनी को संबंधित कर्मचारियों को प्रशिक्षण भी देना होगा। सिस्टम की वारंटी 36 महीने की होगी।

चांदीपुर स्थित आईटीआर देश की सबसे महत्वपूर्ण मिसाइल परीक्षण सुविधाओं में शामिल है। यहां बैलिस्टिक मिसाइल, एयर डिफेंस मिसाइल, सामरिक हथियार प्रणाली और अन्य उड़ान परीक्षण नियमित रूप से किए जाते हैं।

ऐसे प्रत्येक परीक्षण में इंस्ट्रूमेंटेशन ट्रैकिंग रडार सबसे अहम भूमिका निभाता है। यह उड़ान के हर चरण का रिकॉर्ड तैयार करता है और वैज्ञानिकों को यह पता लगाने में मदद करता है कि मिसाइल तय ट्रैजेक्टरी पर उड़ रही है या नहीं। इसी डेटा के आधार पर किसी भी परीक्षण की तकनीकी सफलता का मूल्यांकन किया जाता है। (DRDO S-Band Tracking Radar)

First big message to the officers of Army Chief, ‘Afsar Own Extract Solution’, ready for every unit war

Indian Army Chief Letter
(Image for representational purpose only. AI-Generated Image)

Indian Army Chief Letter: भारतीय सेना के नए प्रमुख जनरल धीरज सेठ ने पद संभालने के बाद सभी अधिकारियों को अपना पहला संदेश भेजा है। अपने संदेश में उन्होंने साफ कहा है कि भारतीय सेना को हर समय किसी भी चुनौती का सामना करने के लिए पूरी तरह तैयार रहना होगा। उन्होंने खास तौर पर “ऑपरेशन सिंदूर 2.0” और “ऑपरेशन स्नो लेपर्ड 2.0” का जिक्र करते हुए कहा कि सेना की सबसे बड़ी प्राथमिकता हमेशा युद्ध की तैयारी और ऑपरेशनल क्षमता बनी रहनी चाहिए।

अपने पत्र में उन्होंने यह भी लिखा कि हमारा लक्ष्य भारतीय सेना को और अधिक मजबूत बनाना, युद्ध के लिए हर समय तैयार रखना, नई क्षमताएं विकसित करना, मौजूदा सुरक्षा चुनौतियों का प्रभावी ढंग से सामना करना और देश निर्माण में अपनी भूमिका को और मजबूत करना होना चाहिए।

Indian Army Chief Letter: बदलते युद्ध के अनुसार खुद को बदलना होगा

General Endurance Seth ने 06 जुलाई को भेजे अपने संदेश में कहा कि आज भारतीय सेना तेजी से बदलाव के दौर से गुजर रही है। आपने हाल ही में मेरे द्वारा बताए गए “विजय” के सिद्धांतों के बारे में सुना होगा। अब युद्ध पहले जैसा नहीं रहा।

आज सैनिकों के साथ ड्रोन और दूसरे बिना चालक वाले सिस्टम भी युद्ध का हिस्सा बन चुके हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, मशीन लर्निंग और नई तकनीकें अब भविष्य की नहीं बल्कि आज की जरूरत हैं। इसलिए हर अधिकारी को इस बदलाव की जिम्मेदारी अपने स्तर पर उठानी होगी।

अगर हर अधिकारी अपनी यूनिट में इस बदलाव को अपनाएगा, तभी पूरी सेना वास्तव में आधुनिक बन पाएगी।

इसके साथ ही हमें अधिकारियों और सैनिकों के बीच भरोसा, सम्मान, अच्छा व्यवहार, पेशेवर दक्षता और नैतिक मूल्यों पर आधारित मजबूत संबंध भी बनाए रखने होंगे।

हर समय युद्ध के लिए तैयार रहे सेना

उन्होंने लिखा कि युद्ध की तैयारी केवल बड़े सैन्य अभ्यासों तक सीमित नहीं होनी चाहिए। हर यूनिट को समय-समय पर अपनी तैयारियों की समीक्षा करनी चाहिए।

जनरल सेठ ने लिखा कि हमारी तैयारी हमेशा ऐसी होनी चाहिए कि यदि ऑपरेशन सिंदूर 2.0 या ऑपरेशन स्नो लेपर्ड 2.0 जैसी कोई भी चुनौती सामने आए, तो सेना तुरंत कार्रवाई करने के लिए पूरी तरह तैयार हो।

उन्होंने अधिकारियों से कहा कि वे लगातार यह सुनिश्चित करें कि उनकी यूनिट के पास पर्याप्त हथियार, गोला-बारूद, रसद, संचार उपकरण, वाहन, तकनीकी संसाधन और प्रशिक्षित सैनिक उपलब्ध हों। यदि किसी स्तर पर कमी दिखाई देती है तो उसका समाधान तुरंत निकाला जाए।

ऊपर से नहीं आएगा हर समस्या का समाधान

अपने पत्र में उन्होंने आगे लिखा कि आज तकनीक इतनी तेजी से बदल रही है कि कई बार हथियार खरीदने या नई क्षमता विकसित करने की सरकारी प्रक्रिया उसके बराबर गति से आगे नहीं बढ़ पाती। यह बिल्कुल सामान्य बात है।

इसलिए हर अधिकारी को अपने स्तर पर व्यावहारिक, सरल और लागू किए जा सकने वाले समाधान खोजने होंगे।
छोटे-छोटे सुधार भी पूरी यूनिट की क्षमता को काफी बढ़ा सकते हैं।

उन्होंने लिखा कि हर समस्या के समाधान के लिए केवल मुख्यालय की ओर देखने की आदत बदलनी होगी।

साथ ही उन्होंने यह भी लिखा कि हमें केवल आदर्श समाधान का इंतजार नहीं करना चाहिए। कई बार साधारण, व्यावहारिक और तुरंत लागू होने वाला समाधान ज्यादा उपयोगी होता है। जो तरीके वर्षों से युद्ध में सफल साबित हुए हैं, उन्हें केवल इसलिए नहीं छोड़ देना चाहिए क्योंकि नई तकनीक आ गई है। जरूरत पड़ने पर हमें अपनी बुनियादी सैन्य क्षमताओं पर भी पूरा भरोसा रखना होगा।

साथ ही परिस्थितियों के अनुसार खुद को बदलने, सुधारने और नई परिस्थितियों में काम करने की क्षमता भी बनाए रखनी होगी। लेकिन यह सब करते समय गुणवत्ता, जवाबदेही और नियमों से कोई समझौता नहीं होना चाहिए।

बदल रहा है युद्ध का स्वरूप

जनरल धीरज सेठ ने अधिकारियों को बताया कि आधुनिक युद्ध पहले जैसा नहीं रह गया है। अब लड़ाई केवल सैनिकों, टैंकों और तोपों के भरोसे नहीं लड़ी जाती।

उन्होंने कहा कि आज ड्रोन, बिना चालक वाले सिस्टम, स्मार्ट हथियार, Artificial Intelligence, मशीन लर्निंग और स्वचालित तकनीकें युद्ध का सामान्य हिस्सा बन चुकी हैं। ऐसे में हर अधिकारी को इन तकनीकों की जानकारी होनी चाहिए और उन्हें अपनी यूनिट में प्रभावी तरीके से अपनाना चाहिए।

नई तकनीक के साथ पुरानी सैन्य क्षमता भी जरूरी

सेना प्रमुख ने अपने संदेश में यह भी स्पष्ट किया कि नई तकनीक अपनाने का मतलब यह नहीं है कि पहले से सफल सैन्य सिद्धांतों और पारंपरिक क्षमताओं को भुला दिया जाए।

उन्होंने अधिकारियों से कहा कि आधुनिक तकनीक और पारंपरिक सैन्य कौशल दोनों का संतुलन बनाए रखना जरूरी है। कई परिस्थितियों में बुनियादी सैन्य प्रशिक्षण, नेतृत्व क्षमता और सैनिकों का अनुशासन ही सबसे बड़ी ताकत साबित होते हैं।

सैनिकों के साथ भरोसे का रिश्ता बनाने पर जोर

अपने पहले संदेश में सेना प्रमुख ने नेतृत्व शैली पर भी विशेष जोर दिया। उन्होंने अधिकारियों से कहा कि वे अपने सैनिकों के साथ विश्वास, सम्मान और पारदर्शिता का रिश्ता बनाएं। एक अच्छा कमांडर वही होता है जो कठिन परिस्थितियों में सबसे आगे खड़ा दिखाई दे।

उन्होंने लिखा कि एक अधिकारी का सबसे बड़ा गुण उसका नेतृत्व होता है। नेतृत्व केवल आदेश देने से नहीं आता।

अधिकारी को अपने सैनिकों के साथ रहना चाहिए, उनके साथ कठिन परिस्थितियों में काम करना चाहिए और हर चुनौती में सबसे आगे दिखाई देना चाहिए। उन्होंने लिखा कि सैनिक उसी अधिकारी को सबसे ज्यादा मानते हैं जो खुद करके दिखाता है।

उन्होंने अधिकारियों को शारीरिक रूप से फिट रहने की भी सलाह दी और कहा कि नेतृत्व केवल आदेश देने से नहीं, बल्कि उदाहरण प्रस्तुत करने से स्थापित होता है।

सीखने और नए विचारों को बढ़ावा देने की सलाह

General Endurance Seth ने अधिकारियों से कहा कि वे अपनी यूनिट में ऐसा माहौल तैयार करें जहां सैनिक और जूनियर अधिकारी नई बातें सीख सकें और अपने सुझाव खुलकर रख सकें।

उन्होंने लिखा कि यदि प्रशिक्षण के दौरान सीमित दायरे में कोई गलती होती है और उससे सीख मिलती है तो उसे सकारात्मक तरीके से देखा जाना चाहिए।

उन्होंने हर अधिकारी को लगातार सीखते रहने की आदत पर भी जोर दिया। उन्होंने लिखा कि नई तकनीक, दुनिया में हो रहे बदलाव, आधुनिक युद्ध के तरीके और वैश्विक सुरक्षा परिस्थितियों की जानकारी रखना आज की जरूरत है। इसके लिए नियमित पढ़ाई की आदत विकसित करनी होगी।

जितना अधिक आप सीखेंगे, उतनी ही आसानी से अपनी यूनिट की समस्याओं का समाधान खुद निकाल पाएंगे। यदि आप लगातार खुद को अपडेट रखेंगे तो हर छोटी समस्या के लिए ऊपरी मुख्यालय की ओर देखने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

ऐसा माहौल बनाइए जहां लोग सीख सकें

सेना प्रमुख ने अधिकारियों से कहा कि केवल सैन्य प्रशिक्षण पर्याप्त नहीं है। हर यूनिट का वातावरण ऐसा होना चाहिए जहां सैनिक और जूनियर अधिकारी खुलकर अपने विचार रख सकें। नई सोच को प्रोत्साहन मिलना चाहिए।

नई तकनीक सीखने के अवसर मिलने चाहिए। यदि प्रशिक्षण के दौरान कोई सीमित और सुरक्षित गलती होती है, जिससे सीख मिलती है, तो उसे सकारात्मक नजरिए से देखना चाहिए।

हमारा उद्देश्य ऐसा वातावरण बनाना होना चाहिए जहां पेशेवर विकास, साहसिक सोच और नए विचारों को बढ़ावा मिले।

सोशल मीडिया को भी बताया नया युद्धक्षेत्र

जनरल धीरज सेठ ने अपने संदेश में सोशल मीडिया का भी जिक्र किया। उन्होंने लिखा कि आज का युद्ध केवल जमीन, समुद्र और आसमान तक सीमित नहीं है। सोशल मीडिया भी अब एक महत्वपूर्ण युद्धक्षेत्र बन चुका है।

हमारे विरोधी देश इसका इस्तेमाल दुष्प्रचार फैलाने, भ्रम पैदा करने और लोगों की सोच को प्रभावित करने के लिए करते हैं। इसलिए हर अधिकारी को सोशल मीडिया का इस्तेमाल बहुत जिम्मेदारी से करना चाहिए।

बिना सोचे-समझे कोई जानकारी साझा करना या अनुचित टिप्पणी करना केवल व्यक्तिगत गलती नहीं होती, बल्कि इससे सेना की सुरक्षा और प्रतिष्ठा दोनों प्रभावित हो सकती हैं। अनुशासन, संयम और गरिमापूर्ण व्यवहार हर समय बनाए रखना जरूरी है।

सेना की परंपराओं और मूल्यों को बनाए रखें

सेन प्रमुख ने अपने पत्र में लिखा कि हर अधिकारी को हमेशा “एक अधिकारी और सज्जन व्यक्ति” की पहचान बनाए रखनी चाहिए। ईमानदारी, नैतिकता, अनुशासन और चरित्र हमारी सबसे बड़ी पहचान हैं।

अपने साथ काम करने वाले सैनिकों के साथ-साथ पूर्व सैनिकों के प्रति भी सम्मान और संवेदनशीलता दिखाना हमारी जिम्मेदारी है। जिन लोगों ने वर्षों तक देश की सेवा की है, उनकी समस्याओं को समझना और उनके समाधान के लिए प्रयास करना भी हमारी जिम्मेदारी का हिस्सा है

उन्होंने लिखा कि सैनिक का जीवन केवल नौकरी नहीं बल्कि जीवन जीने का तरीका होता है। पूरी मेहनत से काम करना जरूरी है, लेकिन उतना ही जरूरी है अपने परिवार के लिए समय निकालना, अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखना और खुद को हर क्षेत्र में बेहतर बनाना।

मुझे आपकी क्षमता, नेतृत्व, निर्णय लेने की योग्यता, मानसिक मजबूती और शारीरिक फिटनेस पर पूरा भरोसा है।

आर्मी मुख्यालय हमेशा आपकी सहायता और मार्गदर्शन के लिए उपलब्ध रहेगा। आप सभी भारतीय सेना की गौरवशाली परंपरा को आगे बढ़ाते रहें। मुझे आप पर पूरा विश्वास है और आपसे मेरी अपेक्षाएं भी बहुत ऊंची हैं।

विकसित भारत के लक्ष्य का भी किया उल्लेख

अपने संदेश में जनरल धीरज सेठ ने कहा कि भारतीय सेना केवल सीमाओं की सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि विकसित भारत के राष्ट्रीय लक्ष्य में भी उसकी महत्वपूर्ण भूमिका है।

देश को वर्ष 2047 तक विकसित भारत बनाने के राष्ट्रीय लक्ष्य में भी सेना की महत्वपूर्ण भूमिका है। हमारे पास लोगों को प्रेरित करने, संसाधनों को संगठित करने और कठिन परिस्थितियों में शानदार परिणाम देने की क्षमता है।

इसलिए हर अधिकारी को केवल सैन्य कार्यों तक सीमित नहीं रहना चाहिए बल्कि व्यापक सोच विकसित करनी चाहिए। देश की बड़ी जिम्मेदारियों को समझना और उनके अनुसार खुद को तैयार करना भी जरूरी है।

Germany, first sent International Lijan Officer, connected to IFC-IOR of Indian Navy

Germany IFC-IOR India
Cdr Oliver Vanek joined IFC-IOR today as its 17th International Liaison Officer and the first ILO from Germany, in the presence of Col Klaus Willi Merkel, Defence Attaché of Germany to India. (Image Source: Indian Navy)

Germany IFC-IOR India: The maritime security cooperation between India and Germany has been strengthened. Germany has first deployed an International Lijan Officer (ILO) to the Indian Navy’s Information Fusion Centre-Indian Ocean Region (IFC-IOR). The Gurugram-based commander Oliver Vinek has taken over by Germany. He is the 17th International Lijan Officer deployed in this centre and is also the first representative of Germany.

According to the Indian Navy, this appointment will help to further strengthen the exchange, maritime monitoring and regional coordination of marine information between India and Germany.

Germany IFC-IOR India: What is IFC-IOR?

The IFC-IOR is a centre established by the Indian Navy, where information about marine activities occurring in the Indian Ocean region is collected and shared with partner countries.

The main objective of this centre is to monitor the movement of ships in the sea, identify suspicious activities and share information in real-time between different countries. This makes it easier to respond faster on any marine event.

What are the activities laid on?

According to formulas IFC-IOR Not limited to monitoring of trade ships only. The events such as sea robbery, illegal fishing, weapons and drug trafficking, human trafficking, sea accidents and natural disasters are also constantly monitored.

केंद्र विभिन्न देशों और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों से मिलने वाली सूचनाओं का विश्लेषण करता है और जरूरत पड़ने पर संबंधित देशों को तुरंत जानकारी उपलब्ध कराता है।

जर्मनी की तैनाती क्यों मानी जा रही है महत्वपूर्ण?

सूत्रों का कहना है कि जर्मनी यूरोप की प्रमुख समुद्री और आर्थिक शक्तियों में शामिल है। बड़ी संख्या में जर्मन व्यापारिक जहाज हिंद महासागर के समुद्री मार्गों का इस्तेमाल करते हैं। ऐसे में आईएफसी-आईओआर में जर्मनी के प्रतिनिधि की मौजूदगी से दोनों देशों के बीच सूचना साझा करने की प्रक्रिया और तेज होगी।

भारतीय नौसेना के अधिकारियों के अनुसार इससे समुद्री सुरक्षा से जुड़े मामलों में बेहतर समन्वय स्थापित किया जा सकेगा और साझेदार देशों के बीच सहयोग भी बढ़ेगा।

बता दें कि 12 जनवरी को ही रक्षा समाचार ने खबर लिखी थी कि germany IFC-IOR में अपना लायजन अफसर भेजेगा।

Germany IFC-IOR India

क्या होती है समुद्री संपर्क अधिकारी भूमिका?

लाइजन ऑफिसर किसी सैन्य या सुरक्षा संगठन का स्थायी प्रतिनिधि होता है। उसका मुख्य काम अपने देश और मेजबान संगठन के बीच सूचनाओं का आदान-प्रदान, समन्वय और आपसी सहयोग को आसान बनाना होता है।

रक्षा सूत्रों के मुताबिक आईएफसी-आईओआर में तैनात अधिकारी अपने-अपने देशों की समुद्री एजेंसियों और भारतीय नौसेना के बीच संपर्क बनाए रखते हैं। किसी संदिग्ध जहाज, सुरक्षा चुनौती या समुद्री घटना की स्थिति में वे तेजी से जानकारी साझा करने में मदद करते हैं।

बढ़ता जा रहा है अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क

जर्मनी के अधिकारी के शामिल होने के बाद आईएफसी-आईओआर में तैनात अंतरराष्ट्रीय लाइजन ऑफिसरों की संख्या बढ़कर 17 हो गई है। भारतीय नौसेना पिछले कुछ वर्षों से मित्र देशों के अधिकारियों को इस केंद्र में शामिल कर रही है ताकि हिंद महासागर क्षेत्र में साझा समुद्री सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत किया जा सके।

रक्षा समाचार ने बताया था कि कुछ दिन पहले ही indonesia ने भी अपना लाइजन ऑफिसर इस केंद्र में तैनात किया था। अब जर्मनी के जुड़ने से इस बहुराष्ट्रीय नेटवर्क का दायरा और विस्तृत हो गया है।

वैश्विक व्यापार के लिए अहम है हिंद महासागर

हिंद महासागर दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री क्षेत्रों में गिना जाता है। वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति का बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र से होकर गुजरता है। तेल और गैस लेकर चलने वाले टैंकरों के अलावा हजारों व्यापारिक जहाज हर वर्ष इस समुद्री मार्ग का उपयोग करते हैं।

सूत्रों के मुताबिक इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार की सुरक्षा चुनौती का असर अंतरराष्ट्रीय व्यापार और आपूर्ति श्रृंखला पर पड़ सकता है। इसी कारण समुद्री निगरानी और देशों के बीच सूचना साझा करने की व्यवस्था को लगातार मजबूत किया जा रहा है।

भारत-जर्मनी रक्षा सहयोग को मिली नई मजबूती

हाल के वर्षों में भारत और जर्मनी के बीच रक्षा और समुद्री सहयोग लगातार बढ़ा है। दोनों देशों के बीच उच्च स्तरीय रक्षा वार्ताएं, नौसैनिक संपर्क और समुद्री सुरक्षा से जुड़े कई क्षेत्रों में सहयोग बढ़ा है।

आईएफसी-आईओआर में जर्मनी के पहले लाइजन ऑफिसर की तैनाती को इसी बढ़ते रणनीतिक सहयोग का हिस्सा माना जा रहा है। भारतीय नौसेना का कहना है कि इस कदम से समुद्री सूचना साझा करने, समुद्री क्षेत्र की बेहतर निगरानी और हिंद महासागर क्षेत्र में कॉर्डिनेशन को और मजबूती मिलेगी।

The Indian Army’s Repair Network will have a Makeover, preparing to make the Army Base Workshops larger transforms

Indian Army Base Workshop
(Image for representational purpose only. AI-Generated Image)

Army Base Workshops: The Indian Army is taking great steps to modernize its most important technical and repair networks, while equipping itself with modern weapons. The Directorate General of Electronics and Mechanical Engineers (DG EME) of the Army is preparing to make its Army Base Workshops (ABW). For this, the EME has released the Expression of Interest (EOI).

It aims to prepare the entire repair system of the Army in accordance with new technology, improved workflow, modern production capacities and fast maintenance systems. The project allows the army to move their repairs and overhaul capacity to the next level in order to re-operate the equipment at the time of war.

Army Base Workshops Are Army Maintenance Centers

Army Base Workshops are considered to be the largest Technical Maintenance Centre in Indian Army. when a tank, Armored VehicleIn artillery, radar, communication system or other military equipment, the repair is in these workshops.

Here the entire overhauling in addition to the general repair, changing the bad parts, giving new life to old equipment, improving technical and preparing such spare parts several times that are not readily available in the market.

The Army can successfully use several old platform years due to these workshops. (Army Base Workshops)

Why Changes Need

In the past few years, the military equipment has become more modern and complex than before. The first where a weapon or vehicle mainly had a mechanical system, has now included technology such as electronics, sensors, digital control systems, software, advanced communications and automation. Only traditional machines and old methods are not enough to repair such modern equipment.

The second major challenge is that many foreign tools have now become quite old. Their original manufacturers stop creating spare parts several times or limit support. This makes the army hard to run the old platform longer. This is why many spare parts can be prepared in the country when needed.

Special emphasis on self-reliance

According to the formulas, an important objective of this project is to promote self-sufficiency. Now instead of relying on foreign companies, the more and more parts, subsystems and equipment are developed and prepared in India.

That’s why in this project Reverse EngineeringPlanned to include modern technologies like additive manufacturing, digital twin, advanced diagnostics, and material testing.

With the help of these technologies, such spares can also be manufactured which the production companies have now closed.

Not only repair, production efficiency will also increase

Army no longer wants to keep the role of Army Base Workshops limited to repairs only. These workshops will also develop the ability to produce, assembly, fabrication, upgrade of equipment and prepare indigenous spare parts at a limited level. This will increase the availability of equipment and reduce repair time. (Army Base Workshops)

Which workshops will start

Two Pilots Starting This Complete Program Army Base Workshops going from. The first workshop is Kirki (Pune) located 512 Army Base Workshop. Here is mainly the repair and overhaul work of BMP-2 such as armored vehicles and systems associated with them.

The second Jabalpur is located 506 Army Base Workshop. Here are various types of cannons and equipment connected to them repaired and maintained. Further planning will be made after studying the reforms implemented in both these workshops.

The biggest change in areas

Three major areas under this project will be studied in detail. The first area is connected to production, where the whole repair and construction work will be work on making the work more faster and orderly.

The second area is of supply chain management. It will be seen whether the spare parts, raw materials and other necessary materials are getting available at the right time.

The third area is of support services. Both engineering support and administrative systems will be evaluated to make the entire functioning more effective. (Army Base Workshops)

How to Proceed Complete Transformation

Army Base Workshops This programme of modernization will be completed in three phases. complete Transformation The project is aiming to complete in about eight months. The selected consultancy firm will first study both workshops. Experts will see how much time it takes to the whole process, from coming to the workshop of a tool to complete the repair and handing back to the army.

The first phase of the project is named as ‘Edge-Edge Assessment’. The duration will be about three months. During this, the consultancy team will study a detailed study of the actual functioning by visiting both workshops.

Experts will see how the whole process moves from reaching the workshop of a military equipment to complete the repair and entrusted the army. Record of every step of the repair will be prepared. All workflows related to production, supply chain management and support services will be studied.

A detailed analysis of staff deployment, machines use, workshop layout, production plan, quality control system, backlog, repair time, rework and total production capacity will also be carried out.

The second phase of the project will begin on the basis of the information found in the first phase, called ‘To-B Assessment’. The duration will be about two months. It will include better workflow, new technologies used, better arrangement of machines, balanced use of manpower and modern industrial processes than existing arrangements.

During this, the detailed blueprint will be ready to increase production. Technical upgrade of Repair Assets will be planned. It will also be decided how modern technologies are used to improve both repair quality and speed.

The final stage of the project is called ‘Verification and Realignment’. Its duration is kept maximum three months. In the third phase it will be seen that the corrections that have been recommended do not come to any kind of practical problem while applying. If you need a change in a process, it will be re-organized as per actual circumstances.

If employees have difficulty in a new process, or need a change in a machine or feel the need to improve a recommendation, then it will be modified according to actual conditions.

The main work of the Consultant at this stage in accordance with the Defence formulas will be to give guidance and recommend the necessary improvement, while the task of implementing the new methodology will team the Army Base Workshops.

Finally a verification and realignment report will be prepared, including all modifications and final approval roadmaps. (Army Base Workshops)

Manpower will also have detailed analysis

This project has been emphasised to better use existing resources instead of increasing the number of employees. Experts will study how many employees are in the department, what is their technical capacity, what type of training should be done and which functions can be done in a more systematic way. It will be attempted to increase production efficiency without additional manpower.

Special focus will remain on reverse engineering

There are several platforms of the Army that the original manufacturers no longer provide spare parts. Reverse engineering is the most important solution in such a situation. In this process, its design is prepared by studying the old parts and then the new purza is made based on the same. This will reduce dependence on foreign companies and the old military equipment will be able to remain operational for a longer time. (Army Base Workshops)

Modern technology will grow

The most important part of this project is to incorporate modern technologies into workshops. Under this technology like Digital Twine will be used. The digital model of a device is designed, allowing its malfunction and performance to be analyzed in advance.

Similarly, such spare parts can be made using additive manufacturing i.e. three-D printing technology which are not available in the market.

The malfunction of the equipment can be quickly gripped with the help of advanced diagnostics system while modern material testing technology will make a more accurate test of the quality of a component. (Army Base Workshops)

Explainer: Why is the 60 KM minim range of Pinaca LRGR? Know How Enhanced Indian Army Strike Power

Pinaka Long Range Guided Rocket
(Image for representational purpose only. AI-Generated Image)

Pinaka Long Range Guided Rocket: Defence Research and Development Organization (DRDO) successfully tested Pinaka Long Range Guided Rocket (LRGRGR) on Wednesday. It was important that this time the rocket was not at its maximum distance, but the user default was at a minimum range of 60 kilometres. According to the formulas, this test was so important because it proved that the rocket can attack as accurately as possible at a short distance, as long as it does.

During the test, the rocket was stained from the existing Pinaca Launcher of the Indian Army. During the flight he made accurate targets to the fixed target while walking on the fixed trajectory.

Pinaka Long Range Guided Rocket: What Is The Minimum Range And Why It Is Necessary

Often, when it comes to a missile or a rocket, it takes its range. But the minimum distance is equally important. The Minimum range means the shortest distance, as far as a rocket can attack in a safe and accurate manner with full capacity.

If a weapon is made only for maximum distance, he is not effective at the nearest target. In this case, the army has to resort to different vibration systems. Pinaca The minimum distance of 60 kilometres of LRGR largely eliminates this problem. Now a relatively close and far from the same launcher, both sort of targets can be targeted. (Pinaka Long Range Guided Rocket)

Significance of why it grows in the battlefield

Sources say that the enemy during the war does not always have a certain distance. Many times the enemy’s advance checkpoints range from 60 to 70 kilometres, while the target can be more than 100 kilometres several times.

The biggest need for the army in such a situation is a weapon that works with equal accuracy at different distances. Pinaca LRGRGR meets the corresponding need. If a commander has to attack the target that exists about 65 kms away, he will not have to wait for another weapon.

Why the minimum range is fixed in guided rocket

General rockets and Guided Rocket The big difference in it happens that the guided rocket continues to control its direction during flight.

Rocket acquires stable flight in the phase first after the launch. Then his navigation and guidance system is activated and puts him on the right track. The control system at the last stage makes small corrections so as to accurately attack the target.

Rocket does not get enough time for all these processes if the distance is too low. That is why a minimum effective distance of every guided weapon is fixed. This distance in Pinaca LRGRGR is 60 kms. (Pinaka Long Range Guided Rocket)

Target of many distances from the same launcher

The biggest feature of the Pinaca system is its Common Launcher Philosphy. According to sources, the army will not have to buy separate launchers for new rockets.

Standard Pinaca rocket, guided pinaca and long range guided rocket can be stained from the existing Pinaca launcher. This makes logistics easier and costs less even on the system.

एक ही प्लेटफॉर्म से लगभग 60 किलोमीटर से लेकर 120 किलोमीटर तक की दूरी पर टारगेट साधने की क्षमता सेना के लिए बेहद फायदेमंद मानी जा रही है। (Pinaka Long Range Guided Rocket)

गाइडेड तकनीक कैसे करती है काम

पिनाका एलआरजीआर सामान्य अनगाइडेड रॉकेट की तरह केवल बैलिस्टिक रास्ते पर नहीं उड़ता। रॉकेट में आधुनिक नेविगेशन और गाइडेंस तकनीक लगी है, जो उड़ान के दौरान उसकी दिशा पर लगातार नजर रखती है। यदि हवा, तापमान या अन्य कारणों से रॉकेट अपनी तय दिशा से थोड़ा भी हटता है, तो कंट्रोल सिस्टम तुरंत उसे सही रास्ते पर वापस लाने का प्रयास करता है।

इसी वजह से इसकी सटीकता पहले के अनगाइडेड रॉकेट की तुलना में काफी बेहतर मानी जाती है।

What will benefit the army

इस नई क्षमता से भारतीय सेना की रॉकेट आर्टिलरी पहले के मुकाबले ज्यादा फायदेमंद हो जाएगी। पहले अलग-अलग दूरी के टारगेट्स के लिए अलग हथियारों की जरूरत पड़ सकती थी। अब एक ही प्लेटफॉर्म से कई दूरी पर हमला किया जा सकेगा।

इससे ऑपरेशन की योजना बनाना आसान होगा, प्रतिक्रिया देने में कम समय लगेगा और हथियारों की तैनाती भी ज्यादा प्रभावी तरीके से की जा सकेगी। (Pinaka Long Range Guided Rocket)

डीएसी ने भी दी थी मंजूरी

दिसंबर 2025 में डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल (डीएसी) ने पिनाका लॉन्ग रेंज गाइडेड रॉकेट परियोजना को मंजूरी दी थी। इस परियोजना की अनुमानित लागत लगभग 2,500 करोड़ रुपये रखी गई थी। इसमें केवल रॉकेट ही नहीं बल्कि उनसे जुड़े सपोर्ट सिस्टम और अन्य आवश्यक उपकरण भी शामिल हैं। डीएसी की मंजूरी मिलने के बाद इस प्रणाली के उत्पादन और सेना में शामिल करने की प्रक्रिया आगे बढ़ी।

नवंबर 2024 में पूरे हुए थे 75 किमी वाले गाइडेड पिनाका के परीक्षण

नवंबर 2024 में डीआरडीओ ने 75 किलोमीटर रेंज वाले गाइडेड पिनाका रॉकेट के महत्वपूर्ण फ्लाइट ट्रायल पूरे किए थे। ये परीक्षण प्रोविजनल स्टाफ क्वालिटेटिव रिक्वायरमेंट्स (पीएसक्यूआर) वैलिडेशन ट्रायल का हिस्सा थे। इनका उद्देश्य यह देखना था कि रॉकेट तय दूरी पर कितनी सटीकता से हमला करता है और लगातार कई रॉकेट दागे जाने पर उसका प्रदर्शन कैसा रहता है।

परीक्षण के दौरान दो अलग-अलग भारतीय कंपनियों द्वारा बनाए गए रॉकेटों को अलग-अलग लॉन्चरों से दागा गया। इसमें रेंज, सटीकता, स्थिरता और फायरिंग की गति जैसे सभी प्रमुख मानकों की जांच की गई। इन परीक्षणों के सफल रहने के बाद सेना के लिए गाइडेड पिनाका की राह और आसान हुई। (Pinaka Long Range Guided Rocket)

दिसंबर 2025 में पहली बार 120 किलोमीटर रेंज वाला एलआरजीआर उड़ा

29 दिसंबर 2025 को डीआरडीओ ने पहली बार पिनाका लॉन्ग रेंज गाइडेड रॉकेट का सफल फ्लाइट टेस्ट किया। यह परीक्षण ओडिशा के चांदीपुर स्थित इंटीग्रेटेड टेस्ट रेंज से किया गया था। उस समय रॉकेट को उसकी अधिकतम डिजाइन रेंज यानी लगभग 120 किलोमीटर तक दागा गया।

पूरी उड़ान के दौरान रॉकेट ने निर्धारित ट्रैजेक्टरी का पालन किया और लक्ष्य पर सटीक प्रहार किया। रेंज पर मौजूद सभी ट्रैकिंग सिस्टम ने उड़ान के हर चरण की निगरानी की। सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि इस नए रॉकेट को भारतीय सेना के मौजूदा पिनाका लॉन्चर से ही दागा गया। इससे यह साबित हो गया कि नए सिस्टम के लिए अलग लॉन्चर विकसित करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। (Pinaka Long Range Guided Rocket)

सात रेजिमेंट पूरी तरह ऑपरेशनल

सूत्रों के मुताबिक भारतीय सेना में पिनाका की सात रेजिमेंट पूरी तरह ऑपरेशनल हैं, जबकि आठवीं रेजिमेंट को भी आवश्यक उपकरण मिलने शुरू हो गए हैं। इसी दौरान एलआरजीआर को इन रेजिमेंटों में शामिल करने की तैयारी शुरू हुई। (Pinaka Long Range Guided Rocket)

आर्मेनिया बना पहला विदेशी ग्राहक

भारत ने गाइडेड पिनाका प्रणाली का पहला निर्यात आर्मेनिया को किया है। 18 जनवरी 2026 को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने नागपुर स्थित सोलर डिफेंस एंड एयरोस्पेस लिमिटेड के संयंत्र से गाइडेड पिनाका रॉकेटों की पहली खेप को रवाना किया। रक्षा सूत्रों के अनुसार आर्मेनिया ने पहले ही पिनाका की चार बैटरियों के लिए करीब 2,000 करोड़ रुपये का समझौता किया था। इसी सौदे के तहत गाइडेड रॉकेट भी शामिल हैं। यह पहला अवसर था जब भारत ने गाइडेड पिनाका प्रणाली किसी विदेशी देश को निर्यात की। (Pinaka Long Range Guided Rocket)

भारतीय उद्योग की भी बड़ी भूमिका

पिनाका कार्यक्रम में सरकारी और निजी दोनों क्षेत्र की कंपनियां शामिल हैं। डीआरडीओ ने इसकी तकनीक विकसित की है, जबकि उत्पादन का काम अलग-अलग भारतीय कंपनियों को दिया गया है।

रॉकेट निर्माण में म्यूनिशंस इंडिया लिमिटेड और इकोनॉमिक एक्सप्लोसिव्स लिमिटेड की भूमिका है। वहीं लॉन्चर और उससे जुड़े वाहनों के विकास में लार्सन एंड टुब्रो तथा टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स जैसी कंपनियां भी योगदान दे रही हैं। (Pinaka Long Range Guided Rocket)

Indian Army Will Buy 450 New Carl Gustaf Mark-IV Launcher, Know How Fatal It’s Anti-Tank Weapon System

Carl Gustaf M4 Rocket Launcher RFP
(Image for reference only. AI-Generated Image)

Carl Gustaf M4 Rocket Launcher: Indian Army is taking another big step towards enhancing the marching capacity of its infantry units. Indian Army is preparing to buy Karl Gustaf Mark-4 Multi-Roll Shoulder-Fired Weapon soon. The Army has released the Request for Proposal (RFP) to buy 450 units of light-weight rocket launchers. This purchase will not only include launchers, but also necessary accessories, spare parts, technical documents and support systems.

The Battle Force has to act faster in different types of war zones. The need for light but powerful weapons in mountainous areas, forests, bordering areas and urban wars is constantly growing. Carl Gustaf Mark-4 will meet the corresponding need of the army.

Carl Gustaf M4 Rocket Launcher: What is Carl Gustaf Mark-IV?

Carl Gustaf मार्क-IV दुनिया की सबसे आधुनिक 84 मिलीमीटर रिकॉयलेस राइफल सिस्टम में से एक है। इसे स्वीडन की रक्षा कंपनी साब ने डेवलप किया है। यह ऐसा हथियार है जिसे एक सैनिक आसानी से अपने कंधे पर लेकर युद्ध क्षेत्र में पहुंच सकता है और जरूरत पड़ने पर दुश्मन के बख्तरबंद वाहन, बंकर, इमारत, फायरिंग पोजीशन या अन्य सैन्य ठिकानों पर हमला कर सकता है।

इसकी सबसे बड़ी ताकत इसका हल्का वजन और मल्टीपर्पज इस्तेमाल है। एक ही लॉन्चर से अलग-अलग प्रकार के गोला-बारूद दागे जा सकते हैं। इसी के चलते इसे केवल एंटी-टैंक वेपन नहीं, बल्कि मल्टी-रोल वेपन सिस्टम भी माना जाता है। (Carl Gustaf M4 Rocket Launcher)

पहले से कहीं हल्का और आधुनिक

कार्ल गुस्ताफ मार्क-IV वर्जन पहले के मॉडल की तुलना में काफी हल्का बनाया गया है। इसका वजन साइटिंग सिस्टम और बाइपॉड को छोड़कर 6.6 से 7 किलोग्राम है, जबकि पुराने मॉडल इससे काफी भारी थे। वजन कम होने के कारण सैनिक इसे लंबे समय तक अपने साथ लेकर चल सकते हैं।

इसकी कुल लंबाई लगभग 95 सेंटीमीटर है। यानी यह एक मीटर से भी छोटा है। छोटे आकार के कारण इसे तंग गलियों, पहाड़ी रास्तों, घने जंगलों और इमारतों के भीतर भी आसानी से इस्तेमाल किया जा सकता है।

मार्क-IV को हल्का बनाने के लिए इसमें आधुनिक सामग्री का उपयोग किया गया है। इसके बाहरी हिस्से में कार्बन फाइबर और अंदर टाइटेनियम लाइनर लगाया गया है। इससे हथियार का वजन कम हुआ है, लेकिन मजबूती पर कोई असर नहीं पड़ा।

इसके पीछे का वेंटुरी सेक्शन भी नए तरीके से डिजाइन किया गया है, जिससे इसकी लंबाई और वजन दोनों कम हुए हैं। यही कारण है कि यह मॉडल पहले की तुलना में ज्यादा संतुलित माना जाता है। (Carl Gustaf M4 Rocket Launcher)

बैरल लाइफ 15 साल

आरएफपी के मुताबिक, Indian Army के लिए खरीदा जाने वाला कार्ल गुस्ताफ मार्क-IV एक 84 मिलीमीटर कैलिबर का हल्के वजन वाला रिकॉयलेस रॉकेट लॉन्चर होगा। यह सिंगल-शॉट फायरिंग सिस्टम पर काम करेगा, यानी एक बार में एक ही रॉकेट दागा जाएगा और उसके बाद अगला राउंड लोड किया जाएगा।

आरएफपी में स्पष्ट किया गया है कि इस लॉन्चर की बैरल लाइफ कम से कम 1,500 राउंड या 15 साल होनी चाहिए। यानी निर्धारित रखरखाव के साथ इसे लंबे समय तक सेवा में इस्तेमाल किया जा सके।

एक ही लॉन्चर से कई तरह के टारगेट्स पर हमला

सेना ने यह भी शर्त रखी है कि नए लॉन्चर की सटीकता (एक्यूरेसी) मौजूदा 84 मिलीमीटर कार्ल गुस्ताफ मार्क-III के बराबर या उससे बेहतर होनी चाहिए, ताकि टारगेट पर पहले जैसी या उससे अधिक प्रभावी फायरिंग की जा सके।

लॉन्चर को इस तरह डिजाइन किया जाना चाहिए कि वह भारतीय सेना के पास पहले से मौजूद 84 मिलीमीटर के सभी गोला-बारूद को दाग सके। इसके साथ ही भविष्य में डेवलप होने वाले नए गोला-बारूद के साथ भी यह पूरी तरह काम कर सके।

कार्ल गुस्ताफ मार्क-IV की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह केवल एक तरह का रॉकेट लॉन्चर नहीं है, बल्कि एक ऐसा हथियार है जो अलग-अलग मिशनों के लिए अलग-अलग प्रकार के गोला-बारूद का इस्तेमाल कर सकता है। यही वजह है कि दुनिया की कई सेनाएं इसे अपनी इन्फैंट्री यूनिट्स का महत्वपूर्ण हथियार मानती हैं।

कार्ल गुस्ताफ मार्क-IV के लिए 84 मिलीमीटर कैलिबर के कई प्रकार के गोले उपलब्ध हैं। मिशन के अनुसार सैनिक अलग-अलग राउंड का चयन कर सकते हैं।

यदि सामने दुश्मन का बख्तरबंद वाहन या टैंक हो, तो हाई एक्सप्लोसिव एंटी-टैंक (हीट) राउंड का उपयोग किया जाता है। इसकी विशेष डिजाइन धातु की मोटी परत को भेदकर अंदर विस्फोट करती है।

अगर टारगेट किसी इमारत, बंकर या दीवार के पीछे छिपा हो, तो हाई एक्सप्लोसिव ड्यूल पर्पज (एचईडीपी) राउंड इस्तेमाल किया जाता है। यह पहली बाधा को तोड़ कर और फिर अंदर विस्फोट करता है।

इसी तरह सैनिकों के समूह के खिलाफ हाई एक्सप्लोसिव (एचई) राउंड का उपयोग किया जाता है। इसके अलावा धुआं फैलाने वाले स्मोक राउंड और रात के समय रोशनी करने वाले इल्यूमिनेशन राउंड भी उपलब्ध हैं। (Carl Gustaf M4 Rocket Launcher)

माइनस 20 डिग्री से लेकर प्लस 50 डिग्री सेल्सियस तक करे काम

भारतीय सेना ने यह भी स्पष्ट किया है कि यह हथियार भारत के धूलभरे, गर्म और अधिक नमी वाले इलाकों में बिना किसी रुकावट के काम करने में सक्षम होना चाहिए। यानी रेगिस्तान, जंगल, पहाड़ी और तटीय क्षेत्रों जैसी सभी परिस्थितियों में इसकी कार्यक्षमता प्रभावित नहीं होनी चाहिए।

विश्वसनीयता के मामले में भी नया लॉन्चर कार्ल गुस्ताफ मार्क-III के बराबर या उससे बेहतर प्रदर्शन करने वाला होना चाहिए। साथ ही इसकी मेंटेनेंस आसान होनी चाहिए, ताकि सैनिक बिना किसी विशेष औजार के इसे खोलकर साफ कर सकें, नियमित जांच कर सकें और जरूरत पड़ने पर इसके पुर्जों को आसानी से बदल या मरम्मत कर सकें।

इसके अलावा सेना ने यह भी शर्त रखी है कि माइनस 20 डिग्री सेल्सियस से लेकर प्लस 50 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान में भी लॉन्चर की क्षमता पर कोई असर नहीं पड़ना चाहिए। यानी यह हथियार लद्दाख की कड़ाके की ठंड से लेकर राजस्थान के रेगिस्तान जैसी भीषण गर्मी तक हर मौसम में समान रूप से प्रभावी ढंग से काम करने में सक्षम होना चाहिए। (Carl Gustaf M4 Rocket Launcher)

कैसे करता है काम?

कार्ल गुस्ताफ मार्क-IV एक सिंगल-शॉट ब्रीच-लोडिंग रिकॉयलेस सिस्टम है। हर बार फायरिंग के बाद पीछे से नया गोला-बारूद डाला जाता है और फिर अगला शॉट तैयार होता है।

सामान्य तौर पर इसे दो सैनिक चलाते हैं। एक सैनिक लॉन्चर संभालता है जबकि दूसरा गोला-बारूद लोड करता है। हालांकि जरूरत पड़ने पर एक सैनिक भी इसे अकेले चला सकता है, लेकिन उस हालात में फायरिंग की स्पीड कम हो जाती है। कार्ल गुस्ताफ लगभग एक मिनट में छह राउंड तक दाग सकता है। (Carl Gustaf M4 Rocket Launcher)

निशाना लगाने के लिए आधुनिक सिस्टम

मार्क-IV में अलग-अलग प्रकार की साइट लगाई जा सकती हैं। इसमें साधारण आयरन साइट, रेड डॉट साइट, टेलीस्कोपिक साइट और आधुनिक डिजिटल फायर कंट्रोल सिस्टम का इस्तेमाल किया जा सकता है।

आरएफपी के अनुसार लॉन्चर में एफसीडी-558 फायर कंट्रोल डिवाइस और रेड डॉट साइट लगाने की सुविधा होनी चाहिए। इससे गनर टारगेट पर तेजी और अधिक सटीकता के साथ निशाना लगा सकेगा।

इसके ऊपर पिकाटिनी रेल दी गई है, जिस पर जरूरत के अनुसार अतिरिक्त उपकरण लगाए जा सकते हैं। इससे अलग-अलग मिशनों के अनुसार हथियार को आसानी से तैयार किया जा सकता है। आधुनिक डिजिटल साइट लगाने पर टारगेट की दूरी, ऊंचाई और अन्य जरूरी जानकारी देखकर ज्यादा सटीक निशाना लगाया जा सकता है। (Carl Gustaf M4 Rocket Launcher)

सैनिकों की सुरक्षा का भी ध्यान

मार्क-IV में कई ऐसे फीचर जोड़े गए हैं, जो सैनिकों की सुरक्षा बढ़ाते हैं। इसमें ट्रैवल सेफ्टी कैच दिया गया है, जिससे जरूरत पड़ने पर हथियार को लोडेड स्थिति में भी सुरक्षित रखा जा सकता है।

इसके अलावा इसमें एडजस्ट होने वाला शोल्डर रेस्ट और आगे पकड़ने के लिए बेहतर ग्रिप दी गई है। इससे लंबे समय तक हथियार इस्तेमाल करने में भी सैनिक को कम थकान होती है। (Carl Gustaf M4 Rocket Launcher)

बैरल की स्थिति खुद बताएगा सिस्टम

इस हथियार में डिजिटल शॉट काउंटर भी लगाया गया है। यह रिकॉर्ड रखता है कि लॉन्चर से अब तक कितने राउंड दागे जा चुके हैं। इससे तकनीकी टीम को यह पता चलता रहता है कि बैरल की कितनी लाइफ बची है और कब उसकी जांच या बदलाव की जरूरत पड़ेगी। कंपनी के अनुसार इसकी बैरल लाइफ एक हजार से अधिक फुल कैलिबर राउंड तक हो सकती है।

कितनी दूर तक कर सकता है हमला

मार्क-IV की मारक क्षमता इस्तेमाल किए जाने वाले गोले पर निर्भर करती है। आरएफपी के मुताबिक, इसकी मारक क्षमता की बात करें तो हाई एक्सप्लोसिव Anti-tank (HEAT) गोले के साथ इसकी प्रभावी रेंज कम से कम 350 मीटर होनी चाहिए। वहीं हाई एक्सप्लोसिव (HE) गोले के साथ यह कम से कम 800 मीटर तक सटीक हमला करने में सक्षम होना चाहिए।

चलते हुए बख्तरबंद वाहन के खिलाफ इसकी प्रभावी दूरी लगभग 350 से 400 मीटर मानी जाती है। यदि टारगेट स्थिर हो, तो यह दूरी लगभग 500 मीटर तक हो सकती है।

हाई एक्सप्लोसिव और स्मोक राउंड के साथ यह लगभग एक किलोमीटर तक प्रभावी फायर कर सकता है। आधुनिक गाइडेड गोला-बारूद के साथ इसकी दूरी इससे भी अधिक हो सकती है। (Carl Gustaf M4 Rocket Launcher)

भारत में ही बनेगा कार्ल गुस्ताफ मार्क-IV

सूत्रों के मुताबिक, भारत में इस हथियार का निर्माण हरियाणा के झज्जर स्थित मेट सिटी में स्थापित साब की नई फैक्टरी में किया जाएगा। यह स्वीडन के बाहर कार्ल गुस्ताफ मार्क-IV की पहली प्रोडक्शन युनिट है। इसे स्थापित करने की घोषणा वर्ष 2022 में की गई थी।

डिफेंस सेक्टर में पहला 100 प्रतिशत एफडीआई प्रोजेक्ट

साल 2023 में भारत सरकार ने साब को इस परियोजना के लिए 100 प्रतिशत विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (एफडीआई) की मंजूरी दी। इसके बाद कंपनी ने साब एफएफवीओ इंडिया प्राइवेट लिमिटेड के नाम से अपनी भारतीय युनिट बनाई, जो पूरी तरह साब के स्वामित्व वाली कंपनी है।

रक्षा क्षेत्र में इसे एक महत्वपूर्ण कदम माना गया क्योंकि इससे आधुनिक रक्षा उपकरणों का उत्पादन भारत में शुरू होने का रास्ता खुला।

मार्च 2024 में झज्जर स्थित संयंत्र का निर्माण कार्य आधिकारिक रूप से शुरू हुआ। फैक्टरी में केवल लॉन्चर ही नहीं, बल्कि कई महत्वपूर्ण पुर्जों का भी निर्माण किया जाएगा। इनमें कार्बन फाइबर ट्यूब, आधुनिक साइटिंग सिस्टम और अन्य अपग्रेडेड कंपोनेंट शामिल हैं।

सूत्रों का कहना है कि यहां बने कुछ कंपोनेंट दुनिया के दूसरे देशों में उपयोग होने वाले कार्ल गुस्ताफ सिस्टम के लिए भी भेजे जा सकते हैं।

वहीं, भारत में उत्पादन शुरू होने से सेना को हथियारों की आपूर्ति के लिए विदेश पर पहले जैसी निर्भरता नहीं रहेगी। स्पेयर पार्ट्स, मरम्मत और तकनीकी सहायता भी कम समय में उपलब्ध कराई जा सकेगी। इससे लॉजिस्टिक व्यवस्था बेहतर होगी और रखरखाव का समय कम लगेगा। (Carl Gustaf M4 Rocket Launcher)