📍नई दिल्ली | 16 Jul, 2026, 2:12 PM
DRDO Quantum Communication: भारत ने सिक्योर मिलिट्री कम्युनिकेशन के क्षेत्र में एक और बड़ी उपलब्धि हासिल की है। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) ने फाइबर बेस्ड क्वांटम की डिस्ट्रीब्यूशन (क्यूकेडी) सिस्टम के मिलिट्री फील्ड ट्रायल सफलतापूर्वक पूरे कर लिए हैं। यह सिस्टम ऐसा सुरक्षित कम्युनिकेशन नेटवर्क तैयार करता है, जिसे रास्ते में कोई सुन नहीं सकता और न ही उसमें सेंध लगा सकता है। डीआरडीओ ने इस तकनीक को बेंगलुरु की भारतीय कंपनी टैकबिट लैब्स के साथ मिलकर तैयार किया है।
सूत्रों के मुताबिक, इसका परीक्षण मिलिट्री इकोसिस्टम में किया गया, वहीं यह सिस्टम भविष्य में भारत के स्ट्रेटेजिक कम्युनिकेशन नेटवर्क की सुरक्षा बढ़ाने में अहम भूमिका निभाएगा। यह तकनीक बड़े पैमाने पर मल्टी-हॉप क्वांटम नेटवर्क बनाने की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।
DRDO Quantum Communication: क्या है क्वांटम की डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम
आमतौर पर जब कोई संदेश इंटरनेट या किसी सुरक्षित नेटवर्क के जरिए भेजा जाता है तो उसे एन्क्रिप्शन यानी विशेष कोड में बदल दिया जाता है। इस कोड को खोलने के लिए एक डिजिटल “की” यानी चाबी की जरूरत होती है।
यहीं से क्वांटम की डिस्ट्रीब्यूशन (क्यूकेडी) की भूमिका शुरू होती है। यह तकनीक उस डिजिटल चाबी को एक स्थान से दूसरे स्थान तक इस तरह भेजती है कि अगर कोई तीसरा व्यक्ति बीच में उसे पकड़ने या पढ़ने की कोशिश करे, तो सिस्टम तुरंत इसकी जानकारी दोनों अधिकृत पक्षों को दे देता है।
यानी संदेश चोरी होने से पहले ही पता चल जाता है कि नेटवर्क में किसी ने हस्तक्षेप किया है।
यह तकनीक सामान्य एन्क्रिप्शन से कैसे है अलग
आज दुनिया में ज्यादातर सिक्योर मैथेमेटिकल कम्युनिकेशन एन्क्रिप्शन पर बेस्ड हैं। बैंकिंग, मिलिट्री नेटवर्क, सरकारी डेटा और इंटरनेट सेवाओं में इसी प्रकार की सुरक्षा का इस्तेमाल होता है।
लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में आने वाले क्वांटम कंप्यूटर इतनी अधिक क्षमता वाले होंगे कि वे आज इस्तेमाल हो रहे कई एन्क्रिप्शन सिस्टम को काफी तेजी से तोड़ सकेंगे।
इसी खतरे को देखते हुए दुनिया के कई देश क्वांटम कम्युनिकेशन पर काम कर रहे हैं।
क्यूकेडी की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसकी सुरक्षा केवल गणित पर आधारित नहीं होती, बल्कि क्वांटम फिजिक्स के नियमों पर आधारित होती है। इसलिए यदि कोई बीच में जानकारी चुराने की कोशिश करता है तो स्वयं क्वांटम अवस्था बदल जाती है और सिस्टम तुरंत अलर्ट कर देता है।
कैसे काम करता है ये सिस्टम
क्वांटम कम्युनिकेशन में जानकारी भेजने के लिए फोटॉन यानी प्रकाश के अत्यंत छोटे कणों का इस्तेमाल किया जाता है। इन फोटॉनों में विशेष प्रकार की क्वांटम जानकारी मौजूद होती है। यदि कोई व्यक्ति इन्हें रास्ते में मापने या कॉपी करने की कोशिश करता है तो इनकी मूल अवस्था बदल जाती है।
यही बदलाव सिक्योरिटी सिस्टम को बता देता है कि किसी ने कम्युनिकेशन में दखल देने की कोशिश की है। इसके बाद पूरी की दोबारा तैयार की जाती है और संदिग्ध कम्युनिकेशन रिसीव नहीं होता। यही वजह है कि इसे दुनिया की सबसे सिक्योर कम्युनिकेशन टेक्नोलॉजी में से एक माना जाता है। (DRDO Quantum Communication)
डीआरडीओ ने किस तरह का सिस्टम तैयार किया
डीआरडीओ ने जिस सिस्टम का परीक्षण किया है, वह फाइबर बेस्ड क्वांटम की डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम है। यह तकनीक पहले से मौजूद ऑप्टिकल फाइबर नेटवर्क के साथ काम कर सकती है। नई केबल बिछाने की जरूरत कम पड़ती है और मौजूदा कम्युनिकेशन स्ट्रक्चर का इस्तेमाल किया जा सकता है।
डीआरडीओ का कहना है कि यह सिस्टम केवल एक लिंक तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आगे चलकर कई सुरक्षित नेटवर्क को जोड़ने वाले मल्टी-हॉप नेटवर्क का आधार बनेगा।
टैकबिट लैब्स की रही अहम भूमिका
इस परियोजना में डीआरडीओ के साथ बेंगलुरु स्थित टैकबिट लैब्स ने भी काम किया है। यह भारतीय कंपनी क्वांटम साइबर सुरक्षा, क्वांटम रैंडम नंबर जेनरेटर और पोस्ट-क्वांटम क्रिप्टोग्राफी जैसे क्षेत्रों में काम करती है।
डीआरडीओ के अनुसार, प्रयोगशाला स्तर पर विकसित तकनीक को वास्तविक उत्पाद में बदलने का काम इसी साझेदारी के माध्यम से किया गया। (DRDO Quantum Communication)
डीआरडीओ कई सालों से कर रहा है क्वांटम तकनीक पर काम
क्वांटम तकनीक पर शोध को आगे बढ़ाने के लिए डीआरडीओ ने मई 2025 में दिल्ली के मेटकॉफ हाउस परिसर में क्वांटम टेक्नोलॉजी रिसर्च सेंटर (क्यूटीआरसी) की स्थापना की थी। इस केंद्र में सुरक्षित क्वांटम संचार, क्वांटम सेंसिंग और पोस्ट-क्वांटम साइबर सुरक्षा से जुड़े कई आधुनिक प्रयोग किए जा रहे हैं।
इस रिसर्च सेंटर में सिंगल फोटॉन सोर्स की जांच, लेजर कैरेक्टराइजेशन, क्वांटम की डिस्ट्रीब्यूशन तकनीक का परीक्षण, अल्ट्रा स्मॉल एटॉमिक क्लॉक, एटॉमिक मैग्नेटोमीटर और अन्य अत्याधुनिक प्रयोगशालाएं बनाई गई हैं। यहां वैज्ञानिक भविष्य के सुरक्षित सैन्य नेटवर्क के लिए नई तकनीकों पर लगातार काम कर रहे हैं।
पिछले कई सालों से डीआरडीओ लगातार क्वांटम कम्युनिकेशन पर अनुसंधान कर रहा है। वर्ष 2022 में डीआरडीओ ने प्रयागराज और विंध्याचल के बीच लगभग 100 किलोमीटर से अधिक की दूरी पर देश का पहला इंटरसिटी क्वांटम कम्युनिकेशन लिंक सफलतापूर्वक प्रदर्शित किया था। उस समय पहली बार सामान्य टेलीकॉम फाइबर के जरिए सुरक्षित क्वांटम की डिस्ट्रीब्यूशन का प्रदर्शन किया गया था।
इसके बाद आईआईटी दिल्ली के साथ मिलकर डीआरडीओ ने एक किलोमीटर से अधिक दूरी तक फ्री स्पेस ऑप्टिकल लिंक के जरिए एंटैंगलमेंट आधारित सुरक्षित संचार का सफल प्रदर्शन किया था।
उस परीक्षण के दौरान क्वांटम बिट एरर रेट सात प्रतिशत से कम रही, जिसे इस प्रकार के परीक्षणों में अच्छा माना जाता है। सुरक्षित की तैयार करने की गति भी सफल रही थी।
आईआईटी दिल्ली के साथ मिला बड़ा अनुभव
डीआरडीओ के डीआरडीओ-इंडस्ट्री-अकादमिया सेंटर ऑफ एक्सीलेंस के तहत आईआईटी दिल्ली में क्वांटम कम्युनिकेशन पर लगातार अनुसंधान चल रहा है। पिछले साल वैज्ञानिकों ने क्वांटम साइबर सिक्योरिटी से जुड़ा सफल प्रदर्शन किया था। इसमें यह दिखाया गया कि भविष्य में क्वांटम नेटवर्क और क्वांटम इंटरनेट जैसे सिस्टम विकसित किए जा सकते हैं। (DRDO Quantum Communication)
एंटैंगलमेंट आधारित क्यूकेडी क्या होती है
डीआरडीओ जिस तकनीक पर काम कर रहा है, उसमें क्वांटम एंटैंगलमेंट का इस्तेमाल भी शामिल है। इसे सामान्य क्यूकेडी की तुलना में अधिक सुरक्षित माना जाता है।
एंटैंगलमेंट ऐसी अवस्था होती है जिसमें दो फोटॉन एक-दूसरे से विशेष रूप से जुड़े रहते हैं। चाहे दोनों के बीच कितनी भी दूरी हो, यदि कोई तीसरा व्यक्ति उनमें से किसी एक को छूने या मापने की कोशिश करता है तो दोनों की क्वांटम अवस्था प्रभावित हो जाती है।
यही बदलाव अधिकृत उपयोगकर्ताओं को तुरंत बता देता है कि कम्युनिकेशन के दौरान किसी ने दखल देने की कोशिश की है। इस कारण एंटैंगलमेंट बेस्ड सिस्टम को भविष्य की सुरक्षित संचार तकनीकों में सबसे महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
पोस्ट-क्वांटम साइबर सुरक्षा क्यों बन रही है जरूरी
दुनिया भर में साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ एक नए खतरे की चर्चा कर रहे हैं, जिसे “हार्वेस्ट नाउ, डिक्रिप्ट लेटर” कहा जाता है। इसका मतलब है कि कोई हमलावर आज सुरक्षित डेटा चुरा सकता है और भविष्य में जब उसके पास शक्तिशाली क्वांटम कंप्यूटर होंगे, तब उस डेटा को पढ़ सकता है।
इसी खतरे को देखते हुए दुनिया के कई देश पोस्ट-क्वांटम क्रिप्टोग्राफी और क्वांटम की डिस्ट्रीब्यूशन जैसी तकनीकों पर तेजी से काम कर रहे हैं। डीआरडीओ का यह नया सिस्टम भी इसी दिशा में भारत की तैयारी का हिस्सा माना जा रहा है। (DRDO Quantum Communication)
Author
हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।



