📍नई दिल्ली | 15 Jul, 2026, 9:37 PM
MiG-29 Avionics Indigenous Development: भारतीय वायुसेना ने अपने पुराने हो चुके मिग-29 फाइटर जेट्स के मेंटेनेंस और ऑपरेशनल क्षमता को मजबूत करने के लिए इसमें इस्तेमाल होने वाले आठ महत्वपूर्ण एवियोनिक एग्रीगेट्स के स्वदेशी विकास के लिए एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (ईओआई) जारी किया है। इसका उद्देश्य उन विदेशी इक्विपमेंटों का भारतीय विकल्प तैयार करना है, क्योंकि उनकी उपलब्धता समय के साथ मुश्किल होती जा रही है।
इस प्रोजेक्ट के तहत भारतीय कंपनियों से मौजूदा विदेशी सिस्टम का फंक्शनल रिप्लेसमेंट बनाने की मांग की गई है।
MiG-29 Avionics Indigenous Development: क्यों उठाना पड़ा यह कदम
मिग-29 भारतीय वायुसेना का एक महत्वपूर्ण मल्टीरोल फाइटर जेट है। यह विमान 1980 के दशक के अंत में वायुसेना में शामिल हुआ था और बाद में इसे मिग-29 यूपीजी मानक तक अपग्रेड किया गया। इन विमानों में आधुनिक रडार, डिजिटल कॉकपिट, बेहतर इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम और हवा में ईंधन भरने जैसी सुविधाएं जोड़ी गईं।
इसके बावजूद विमान के कई इलेक्ट्रॉनिक इक्विपमेंट पुराने हो चुके हैं। इनमें इस्तेमाल होने वाले कई पुर्जों का उत्पादन बंद हो चुका है या उनकी सप्लाई सीमित हो गई है। ऐसे में स्पेयर पार्ट्स की उपलब्धता और रखरखाव बड़ी चुनौती बन गई है।
इसी समस्या को देखते हुए वायुसेना अब विदेशी इक्विपमेंटों की नकल करने के बजाय नई पीढ़ी के भारतीय इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम डेवलप करना चाहती है।
पूरी तकनीक बदलने की योजना
पुणे स्थित वायुसेना के बेस रिपेयर डिपो (9 बीआरडी) की तरफ से यह ईओआई जारी किया गया है। इस प्रोजेक्ट की सबसे बड़ी खासियत यह है कि भारतीय वायुसेना पारंपरिक तरीके से अलग रास्ता अपना रही है। इससे पहले किसी खराब इक्विपमेंट का वैसा ही दूसरा इक्विपमेंट तैयार करने का कोशिश की जाती थी। लेकिन अब वायुसेना ने टेक्नोलॉजी स्पेसिफिक इंडिजनाइजेशन मॉडल अपनाया है। इसमें समान तकनीक वाले कई इक्विपमेंट्स को एक ग्रुप में रखकर उनके लिए एक साझा हार्डवेयर प्लेटफॉर्म डेवलप किया जाएगा।
इसके बाद अलग-अलग काम केवल सॉफ्टवेयर के जरिए कराए जाएंगे। इसे सॉफ्टवेयर डिफाइंड एवियोनिक सिस्टम कहा जाता है। इससे भविष्य में किसी एक इक्विपमेंट के खराब होने पर पूरा सिस्टम बदलने की जरूरत नहीं पड़ेगी। केवल सॉफ्टवेयर या संबंधित मॉड्यूल अपडेट करके काम किया जा सकेगा। MiG-29 Avionics Indigenous Development
किन आठ सिस्टम को भारत में किया जाएगा तैयार
ईओआई में जिन आठ प्रमुख एवियोनिक एग्रीगेट्स को शामिल किया गया है, उनमें रडार के लिए पावर और सिंक्रोनाइजेशन सिस्टम, रिसीवर-एक्साइटर यूनिट, ट्रांसमीटर यूनिट, कैमरा इलेक्ट्रॉनिक यूनिट, वोल्टेज रेक्टिफायर, एयरबोर्न प्रोटेक्टेड रिकॉर्डर, कोड कन्वर्टर और रडार ट्रांसमीटर शामिल हैं।
इनमें से कुछ इक्विपमेंट सीधे रडार ऑपरेशन से जुड़े हैं, जबकि कुछ फ्लाइट रिकॉर्डिंग, पावर मैनेजमेंट और सेंसर डेटा प्रोसेसिंग का काम करते हैं। कई सिस्टम को वायुसेना ने मिशन क्रिटिकल कैटेगरी में रखा है, यानी इनके बिना विमान का सुरक्षित ऑपरेशन संभव नहीं होगा। MiG-29 Avionics Indigenous Development
रडार सिस्टम को मिलेगा नया भारतीय विकल्प
प्रोजेक्ट में शामिल सबसे महत्वपूर्ण सिस्टम रडार से जुड़े हैं। एक यूनिट रडार के विभिन्न हिस्सों को स्टेबल इलेक्ट्रिसिटी सप्लाई और सिंक्रोनाइजेशन सिग्नल उपलब्ध कराती है। दूसरी यूनिट रेडियो फ्रीक्वेंसी सिग्नलों को रिसीव और प्रोसेस करती है। तीसरी यूनिट रडार ट्रांसमीटर के लिए हाई पावर सिग्नल तैयार करती है। इन सभी का स्वदेश में डेवलपमेंट होने से भविष्य में विदेशी सप्लाई पर निर्भरता कम होगी।
कॉकपिट रिकॉर्डर और फ्लाइट डेटा सिस्टम भी होंगे स्वदेशी
प्रोजेक्ट में एयरबोर्न प्रोटेक्टेड रिकॉर्डर भी शामिल है। यही सिस्टम उड़ान के दौरान विमान के विभिन्न पैरामीटर और कॉकपिट की आवाज रिकॉर्ड करता है। किसी दुर्घटना या तकनीकी जांच के समय यही रिकॉर्डर सबसे महत्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध कराता है।
इसके अलावा कैमरा इलेक्ट्रॉनिक यूनिट और वोल्टेज रेक्टिफायर जैसे इक्विपमेंट भी डेवलप किए जाएंगे, जो मल्टी फंक्शन डिस्प्ले और डिजिटल वीडियो रिकॉर्डिंग सिस्टम को बिजली उपलब्ध कराते हैं। MiG-29 Avionics Indigenous Development
मॉडर्न ओपन आर्किटेक्चर पर बनेगा पूरा सिस्टम
भारतीय वायुसेना ने इस प्रोजेक्ट में मॉड्यूलर ओपन सिस्टम अप्रोच (मोसा) अपनाने का फैसला किया है। इस मॉडल में पूरा हार्डवेयर ओपन वीपीएक्स प्लेटफॉर्म पर आधारित होगा। इससे भविष्य में किसी भी मॉड्यूल को आसानी से बदला या अपग्रेड किया जा सकेगा।
सॉफ्टवेयर का विकास अंतरराष्ट्रीय डीओ-178सी स्टैंडर्ड के अनुसार होगा, जबकि हार्डवेयर डीओ-254 सर्टिफिकेशन प्रक्रिया का पालन करेगा। यही स्टैंडर्ड दुनिया के आधुनिक सैन्य और नागरिक विमानों में इस्तेमाल किए जाते हैं।
नई तकनीक तैयार करने से पहले भारतीय कंपनियों को पुराने विदेशी इक्विपमेंटों का विस्तृत तकनीकी अध्ययन करना होगा। इसके तहत प्रत्येक इक्विपमेंट की कार्यप्रणाली, इनपुट और आउटपुट सिग्नल, इंटरफेस, प्रदर्शन सीमा, फर्मवेयर और इलेक्ट्रॉनिक व्यवहार का विश्लेषण किया जाएगा। इसके बाद भारतीय कंपनियां ऐसा नया सिस्टम विकसित करेंगी जो पुराने इक्विपमेंट की सभी क्षमताओं को पूरा कर सके।
परीक्षण के लिए बनेगा विशेष टेस्ट बेड
वायुसेना ने इस प्रोजेक्ट में आधुनिक पीएक्सआईई आधारित टेस्ट बेड डेवलप करने की भी योजना बनाई है। इसमें लैबव्यू आधारित सॉफ्टवेयर का उपयोग किया जाएगा। यही प्लेटफॉर्म दुनिया की कई बड़ी एयरोस्पेस कंपनियां
टेस्टिंग और मेजरमेंट के लिए इस्तेमाल करती हैं।
नए तैयार सिस्टम की तुलना ऑरिजनल इक्विपमेंट से की जाएगी। इसके लिए दोनों पर समान टेस्ट वेक्टर चलाकर परिणामों का मिलान किया जाएगा। MiG-29 Avionics Indigenous Development
हर सिस्टम के बनेंगे तीन प्रोटोटाइप
वायुसेना ने प्रत्येक एवियोनिक एग्रीगेट के कम से कम तीन प्रोटोटाइप तैयार करने की शर्त रखी है। इनका इस्तेमाल डिजाइन सत्यापन, तकनीकी परीक्षण और सर्टिफिकेशन प्रक्रिया में किया जाएगा। सभी सिस्टम को सीईएमआईएलएसी, आरसीएमए और डीजीएक्यूए जैसी डिफेंस सर्टिफिकेशन एजेंसियों की मंजूरी लेनी होगी।
किन कंपनियों को मिलेगा मौका
इस प्रोजेक्ट में केवल भारतीय कंपनियां भाग ले सकेंगी। ऐसी कंपनियों को प्राथमिकता दी जाएगी जिनके पास एवियोनिक सिस्टम के डिजाइन, डेवलपमेंट, रिपेयर या ओवरहॉल का अनुभव हो। साथ ही उन्हें मिलिट्री एयरवर्थनेस मानकों की जानकारी भी होनी चाहिए। यदि कोई कंपनी किसी विदेशी तकनीकी साझेदार के साथ काम करना चाहती है तो उसे उसकी भूमिका भी स्पष्ट करनी होगी। MiG-29 Avionics Indigenous Development
मिग-29 बेड़े के लिए क्यों अहम है यह प्रोजेक्ट
भारतीय वायुसेना के पास इस समय लगभग 55 से 65 मिग-29 यूपीजी लड़ाकू विमान हैं। इनमें सिंगल-सीटर और ट्विन-सीटर ट्रेनर दोनों शामिल हैं। ये विमान मुख्य रूप से पंजाब के अदमपुर और गुजरात के जामनगर एयरबेस से संचालित तीन स्क्वाड्रनों में तैनात हैं। यह बेड़ा वायुसेना की एयर डिफेंस क्षमता का महत्वपूर्ण हिस्सा है। वहीं वायुसेना की योजना इसकी सर्विस लाइफ 40 साल से बढ़ाकर 50 साल करने की है।
भारतीय वायुसेना के लिए लड़ाकू विमानों की संख्या बनाए रखना इस समय बड़ी चुनौती है। वायुसेना की स्वीकृत क्षमता 42 फाइटर स्क्वाड्रन की है, लेकिन फिलहाल उसके पास केवल 29 से 31 स्क्वाड्रन ही सक्रिय हैं। मिग-21 लड़ाकू विमानों के चरणबद्ध रिटायर होने के बाद यह कमी और बढ़ गई है। ऐसे में मिग-29 जैसे विमानों की भूमिका और महत्वपूर्ण हो गई है। स्वदेशी तेजस एमके-2 लड़ाकू विमान के पूरी तरह सेवा में आने में अभी समय है। इसलिए वायुसेना चाहती है कि मिग-29 बेड़ा लंबे समय तक पूरी क्षमता के साथ सेवा में बना रहे। इसी वजह से इसके पुराने और दुर्लभ हो चुके एवियोनिक सिस्टम का स्वदेशी विकल्प तैयार करने की प्रक्रिया शुरू की गई है, ताकि इन विमानों की ऑपरेशनल क्षमता प्रभावित न हो।
भारतीय वायुसेना इन विमानों को सेवा में बनाए रखने के लिए लगातार अपग्रेड और लाइफ एक्सटेंशन कार्यक्रम चला रही है। हाल के सालों में मिग-29 में एएसआरएएएम हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइल, एचएसएलडी एमके-2 प्रिसीजन गाइडेड बम, स्वदेशी इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम और सॉफ्टवेयर डिफाइंड रेडियो जैसी नई क्षमताएं जोड़ी गई हैं। (MiG-29 Avionics Indigenous Development)
Author
हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।



