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पूर्वी लद्दाख के सीमावर्ती गांवों की संसदीय समिति से अपील, 2020 के बाद चरागाहों तक घटी पहुंच, मांगी नियंत्रित अनुमति

चुशूल क्षेत्र के पूर्व काउंसलर रह चुके कोंचोक स्टैंजिन ने बताया कि पैंगोंग झील पूरी दुनिया में प्रसिद्ध पर्यटन स्थल है, लेकिन उसके आसपास रहने वाले कई स्थानीय परिवार पर्यटन का पूरा लाभ नहीं उठा पा रहे हैं...

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📍पैंगोंग, लद्दाख | 15 Jul, 2026, 1:34 PM

Pangong Border Villages: भारत-चीन वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के पास बसे लद्दाख के सीमावर्ती गांवों के लोगों ने अपनी समस्याओं और मांगों को सीधे संसद की स्थायी समिति के सामने रखा। पैंगोंग झील के किनारे आयोजित शिविर के दौरान मां पैंगोंग ए और बी समेत कई सीमावर्ती गांवों के प्रतिनिधियों ने संसदीय स्थायी समिति (पर्यटन, परिवहन और संस्कृति) को विस्तृत ज्ञापन सौंपा। इसमें राष्ट्रीय सुरक्षा, पर्यटन, पारंपरिक चरागाह, पश्मीना आधारित आजीविका, सांस्कृतिक विरासत और बुनियादी ढांचे से जुड़े कई अहम मुद्दे उठाए गए।

प्रतिनिधिमंडल में शामिल लद्दाख के चुशूल क्षेत्र के पूर्व काउंसलर और लद्दाख ऑटोनॉमस हिल डेवलपमेंट काउंसिल के पूर्व एग्जीक्यूटिव काउंसलर कोंचोक स्टैंजिन ने बताया कि भारत-चीन सीमा से लगे गांवों के लोग सालों से कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में रहकर देश की सीमाओं पर अपनी मौजूदगी बनाए हुए हैं। उन्होंने कहा कि सीमावर्ती इलाकों में विकास, रोजगार और बुनियादी सुविधाओं को मजबूत करना केवल स्थानीय लोगों की जरूरत नहीं बल्कि राष्ट्रीय हित का भी विषय है।

Pangong Border Villages: सीमावर्ती गांवों की भूमिका को मान्यता देने की मांग

कोंचोक स्टैंजिन के मुताबिक प्रतिनिधिमंडल ने समिति के अध्यक्ष सांसद संजय झा को याद बताया कि मां पैंगोंग ए और बी, फोब्रांग, लुकुंग, स्पांगमिक और आसपास के गांव दशकों से देश की सीमाओं पर रहने वाली पहली नागरिक आबादी हैं। ये गांव 14 हजार फीट से अधिक ऊंचाई पर स्थित हैं, जहां मौसम बेहद कठिन रहता है और बुनियादी सुविधाएं सीमित हैं।

उन्होंने कहा कि 1962 के भारत-चीन युद्ध, 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध, 1999 के कारगिल संघर्ष और 2020 के पूर्वी लद्दाख सीमा विवाद के दौरान स्थानीय लोगों ने भारतीय सेना को हर स्तर पर सहयोग दिया। कई बार सेना को स्थानीय मार्गों की जानकारी, रसद सहायता और अन्य जरूरी सहयोग भी इन गांवों के लोगों से मिला।

इसी कारण प्रतिनिधिमंडल ने मांग की कि सीमावर्ती समुदायों के योगदान को राष्ट्रीय और क्षेत्रीय युद्ध स्मारकों में आधिकारिक रूप से दर्ज किया जाए। (Pangong Border Villages)

पर्यटन पर प्रतिबंध से प्रभावित हो रही स्थानीय अर्थव्यवस्था

चुशूल क्षेत्र के पूर्व काउंसलर रह चुके कोंचोक स्टैंजिन ने बताया कि पैंगोंग झील पूरी दुनिया में प्रसिद्ध पर्यटन स्थल है, लेकिन उसके आसपास रहने वाले कई स्थानीय परिवार पर्यटन का पूरा लाभ नहीं उठा पा रहे हैं।

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उन्होंने बताया कि चांगथांग कोल्ड डेजर्ट वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी के तहत लागू नियमों के चलते कई गांवों में होमस्टे, कैंप, छोटे पर्यटन व्यवसाय और अन्य गतिविधियों पर विभिन्न प्रकार की सीमाएं लागू हैं। इससे स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के अवसर भी सीमित हो गए हैं।

प्रतिनिधिमंडल ने समिति से आग्रह किया कि वास्तविक सीमावर्ती निवासियों को विशेष राहत दी जाए ताकि वे पर्यटन से जुड़ी सरकारी योजनाओं, वित्तीय सहायता और युवा विकास कार्यक्रमों का लाभ आसानी से ले सकें।

सैंक्चुअरी की सीमा पर फिर उठी समीक्षा की मांग

कोंचोक स्टैंजिन ने बताया कि प्रतिनिधिमंडल ने चांगथांग कोल्ड डेजर्ट वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी की सीमा का युक्तिसंगत पुनर्निर्धारण करने की मांग भी दोहराई। ज्ञापन में मांग की गई कि सैंक्चुअरी की सीमा का वैज्ञानिक आधार पर पुनर्मूल्यांकन किया जाए, ताकि संवेदनशील वन्यजीव क्षेत्रों का संरक्षण भी बना रहे और गांवों के आसपास रहने वाले लोगों को विकास कार्यों में अनावश्यक कठिनाइयों का सामना न करना पड़े।

उनका कहना था कि वन्यजीव संरक्षण महत्वपूर्ण है, लेकिन इसके साथ स्थानीय लोगों के पारंपरिक अधिकारों और आजीविका का भी ध्यान रखा जाना चाहिए। सीमावर्ती गांवों के आसपास रहने वाले लोगों को विकास गतिविधियों के लिए पर्याप्त अवसर मिलने चाहिए, ताकि पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय विकास दोनों के बीच संतुलन बनाया जा सके। (Pangong Border Villages)

चरागाहों तक पहुंच सीमित होने से बढ़ीं दिक्कतें

बैठक के दौरान चांगपा समुदाय की आजीविका का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया गया। प्रतिनिधिमंडल ने बताया कि वर्ष 2020 में भारत-चीन सीमा पर तनाव बढ़ने के बाद कई पारंपरिक चरागाह क्षेत्रों तक स्थानीय पशुपालकों की पहुंच प्रभावित हुई है।

चांगपा समुदाय सदियों से पश्मीना बकरियों, याक और भेड़ों का पालन करता आया है। इनकी आजीविका पूरी तरह से पश्मीना बकरियों, याक और भेड़ों के पालन पर चल रही है। उन्होंने यह भी कहा कि सीमावर्ती क्षेत्रों में स्थानीय आबादी की मौजूदगी सुरक्षा व्यवस्था के लिए भी महत्वपूर्ण होती है। स्थानीय लोग इलाके की भौगोलिक परिस्थितियों से परिचित होते हैं और सीमावर्ती क्षेत्रों में निरंतर नागरिक उपस्थिति बनाए रखते हैं।

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कोंचोक स्टैंजिन ने बताया कि ज्ञापन में मांग की गई है कि सुरक्षा एजेंसियों के साथ समन्वय बनाकर स्थानीय पशुपालकों को पारंपरिक चरागाहों तक नियंत्रित पहुंच उपलब्ध कराई जाए। उन्होंने कहा कि सीमावर्ती इलाकों में स्थानीय आबादी की मौजूदगी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से भी महत्वपूर्ण होती है।

पारंपरिक ढांचों को बचाने की भी उठी मांग

प्रतिनिधिमंडल ने संसदीय समिति के सामने यह मुद्दा भी रखा कि सीमावर्ती इलाकों में सालों पुराने पारंपरिक पशु बाड़े, पत्थर से बने कोरल और चांगपा समुदाय के अस्थायी आवास (रेबो) धीरे-धीरे खत्म होते जा रहे हैं। इनका उपयोग कभी पशुपालन और मौसमी प्रवास के दौरान किया जाता था।

ज्ञापन में कहा गया कि ये पुराने ढांचे लद्दाख के सीमावर्ती क्षेत्रों के इतिहास और पारंपरिक जीवनशैली का हिस्सा हैं। इसलिए इनका संरक्षण और जहां जरूरत हो वहां पुनर्स्थापन किया जाना चाहिए। स्थानीय लोगों का कहना है कि इन संरचनाओं से यह भी पता चलता है कि सीमा के इन इलाकों में वर्षों से स्थानीय समुदाय रहते और अपने पशु चराते रहे हैं।

मठों के संरक्षण के लिए अलग वित्तीय सहायता की मांग

बैठक के दौरान लद्दाख के बौद्ध मठों के संरक्षण का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया गया।

प्रतिनिधिमंडल ने संस्कृति मंत्रालय से लद्दाख के मठों के लिए अलग वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने की भी मांग की। उनका कहना था कि दूर-दराज के सीमावर्ती इलाकों में स्थित मठ केवल धार्मिक केंद्र नहीं हैं, बल्कि शिक्षा, संस्कृति और सामाजिक जीवन का भी प्रमुख आधार हैं।

ज्ञापन में कहा गया कि कई मठों में ऐतिहासिक पांडुलिपियां, प्राचीन चित्रकला और सांस्कृतिक धरोहर सुरक्षित हैं। इनके रखरखाव, मरम्मत और संरक्षण के लिए नियमित वित्तीय सहायता की आवश्यकता है, ताकि आने वाली पीढ़ियों तक यह विरासत सुरक्षित रह सके।

फोब्रांग-त्सोगत्सालू सड़क को रक्षा मंत्रालय को सौंपने की मांग

बैठक में फोब्रांग-त्सोगत्सालू सड़क का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया गया। प्रतिनिधिमंडल ने कहा कि यह सड़क सीमावर्ती क्षेत्र के लिए रणनीतिक रूप से काफी महत्वपूर्ण है। वर्तमान में इसका प्रशासनिक नियंत्रण गृह मंत्रालय के पास है।

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प्रतिनिधिमंडल का कहना था कि यदि इस सड़क को रक्षा मंत्रालय के अधीन लाया जाए तो इसके रखरखाव और अपग्रेडेशन के लिए पर्याप्त धन उपलब्ध कराया जा सकेगा। इससे सड़क की स्थिति बेहतर होगी और सीमावर्ती क्षेत्रों तक नागरिकों तथा सुरक्षा बलों की आवाजाही भी अधिक सुगम हो सकेगी।

स्थानीय लोगों ने समिति को बताया कि इस सड़क का उपयोग केवल ग्रामीण ही नहीं करते, बल्कि सुरक्षा बलों की रसद व्यवस्था में भी इसका महत्वपूर्ण योगदान है। इसलिए इसके रखरखाव को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। (Pangong Border Villages)

सीमावर्ती गांवों के विकास पर जोर

बैठक में प्रतिनिधिमंडल ने कहा कि लद्दाख केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद सीमावर्ती गांवों के विकास पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। वाइब्रेंट विलेज कार्यक्रम जैसी योजनाएं भी चल रही हैं, लेकिन पर्यटन, चरागाह, सांस्कृतिक संरक्षण और स्थानीय रोजगार जैसे विषयों पर अलग से ठोस कदम उठाने की जरूरत है।

कोंचोक स्टैंजिन के अनुसार सीमावर्ती गांवों के लोग कठिन मौसम और सीमित संसाधनों के बावजूद देश की सीमाओं पर डटे हुए हैं। उनका कहना था कि इन गांवों की मजबूत सामाजिक और आर्थिक स्थिति राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी महत्वपूर्ण है।

समिति ने सुनीं सभी मांगें

कोंचोक स्टैंजिन ने बताया कि संसदीय स्थायी समिति के अध्यक्ष और सदस्यों ने पूरे ज्ञापन को ध्यान से सुना। प्रतिनिधिमंडल को आश्वासन दिया गया कि पर्यटन, रक्षा, गृह, संस्कृति और पर्यावरण मंत्रालय से जुड़े सभी मुद्दों को संबंधित विभागों के समक्ष रखा जाएगा। (Pangong Border Villages)

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