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एक तरफ ट्रंप की तारीफ, तो दूसरी तरफ चीन से हथियारों की भरमार! ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान खरीद रहा ये हथियार

SIPRI रिपोर्ट में पाकिस्तान के 80 प्रतिशत हथियार आयात चीन से होने की पुष्टि; 1000 ड्रोन, HQ एयर डिफेंस, लेजर सिस्टम, हंगोर पनडुब्बी और MH-60 हेलीकॉप्टर प्रस्ताव की जानकारी सामने आई...

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📍इस्लामाबाद/नई दिल्ली | 23 Jun, 2026, 10:20 PM

Pakistan-China weapons deal: पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर सार्वजनिक मंचों पर अमेरिका के साथ बेहतरीन रिश्तों की बात करते रहे हैं। दोनों अमेरिका की तारीफों के पुल बांधते नहीं थकते। वहीं ट्रंप भी खुद को पाकिस्तान का सच्चा दोस्त बताते हैं। यहां तक कि ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की भूमिका की जम कर तारीफ की थी। यहां तक कि शहबाज और मुनीर ने ट्रंप को नोबल पुरस्कार के लिए भी नामित कर दिया था। लेकिन यह पाकिस्तान का दोगलापन है, जहां वो तरीफों के पुल बांध कर अमेरिका और ट्रंप का उल्लू बनाता है, तो वहीं जब हथियार खरीदने की बात आती है, तो उसे सिर्फ चीन ही याद आता है।

दरअसल पाकिस्तान की असली हथियार निर्भरता चीन पर टिकी हुई है, जबकि तुर्किएदूसरा महत्वपूर्ण रक्षा साझेदार बनकर उभरा है। पाकिस्तान की रक्षा खरीद का रिकॉर्ड कुछ दूसरी ही तस्वीर दिखाता है। उसके लड़ाकू विमान, मिसाइल, एयर डिफेंस, ड्रोन, पनडुब्बी और गोला-बारूद से जुड़ी बड़ी जरूरतें चीन और तुर्किएसे पूरी हो रही हैं।

Pakistan-China weapons deal: सिपरी की रिपोर्ट ने खोली पोल

स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट यानी सिपरी की मार्च 2026 में जारी रिपोर्ट के अनुसार, 2021 से 2025 के बीच पाकिस्तान के हथियार आयात में 66 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई। इस अवधि में पाकिस्तान के कुल हथियार आयात का 80 प्रतिशत हिस्सा चीन से आया। साल 2016 से 2020 के दौरान यह आंकड़ा पिछले पांच वर्ष की अवधि में 73 प्रतिशत था। सिपरी के मुताबिक पाकिस्तान दुनिया के बड़े हथियार आयातकों में शामिल रहा है और चीन उसका सबसे बड़ा डिफेंस सप्लायर बना हुआ है।

सिपरी के मार्च 2026 के आंकड़ों में पाकिस्तान दुनिया के प्रमुख हथियार आयातकों में पांचवे नंबर पर रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान की आयातित सैन्य क्षमता में चीन की हिस्सेदारी 80 प्रतिशत तक पहुंच गई। जिसके बाद तुर्किए और नीदरलैंड का नंबर है। पाकिस्तान वायुसेना के जेएफ-17 लड़ाकू विमान, नौसेना की हंगोर श्रेणी की पनडुब्बियां, एयर डिफेंस सिस्टम, रडार, मिसाइल और ड्रोन परियोजनाओं में चीन लंबे समय से मुख्य भागीदार है।

वहीं, तुर्किए भी 7 फीसदी हिस्सेदारी के साथ दूसरे नंबर पर पाकिस्तान का दूसरा महत्वपूर्ण सप्लायर बनकर उभरा है। तुर्किए से ड्रोन, नौसैनिक प्लेटफॉर्म, इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम, गोला-बारूद और एयर डिफेंस से जुड़े उपकरणों पर सहयोग बढ़ा है। जिसके बाद 4.6 फीसदी की हिस्सेदारी के साथ नीदरलैंड तीसरा देश है।

वहीं चौंकाने वाली वाली बात यह है कि ट्रंप के साथ गहरी दोस्ती का दंभ भरने वाला पाकिस्तान अपने दोस्त अमेरिका से बेहद कम हथियार खरीदता है। वहीं, पाकिस्तान चीन और तुर्किएके साथ संयुक्त उत्पादन, स्थानीय असेंबली, तकनीकी सहायता तथा गोला-बारूद उत्पादन क्षमता बढ़ाने पर भी ध्यान दे रहा है।

ऑपरेशन सिंदूर के बाद एयर डिफेंस पर जोर

सूत्रों के अनुसार, ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान ने अपने एयर डिफेंस सिस्टम, ड्रोन नेटवर्क और लंबी दूरी की मारक क्षमता पर विशेष ध्यान दिया। इस दौरान चीन से एचक्यू सीरीज के एयर डिफेंस सिस्टम, रडार और संबंधित मिसाइल उपकरणों की जरूरतों की समीक्षा की गई।

पाकिस्तान के पास पहले से चीनी एचक्यू-9/पी एयर डिफेंस सिस्टम मौजूद है। यह लंबी दूरी का सरफेस-टू-एयर मिसाइल सिस्टम है, जिसका इस्तेमाल लड़ाकू विमान, बड़े ड्रोन और कुछ प्रकार की मिसाइलों के खिलाफ किया जा सकता है। इसके साथ मध्यम और कम दूरी के एयर डिफेंस सिस्टम भी तैनात किए जाते हैं, ताकि अलग-अलग ऊंचाई और दूरी पर आने वाले लक्ष्यों को ट्रैक किया जा सके।

सूत्रों के अनुसार, पाकिस्तान ने चीन से अतिरिक्त एचक्यू सीरीज की 12 एयर डिफेंस बैटरियों, एचक्यू-19 एयर डिफेंस सिस्टम, तथा एचक्यू-17 से संबंधित उपकरणों की खरीद पर काम तेज किया है। एचक्यू-17 को कम दूरी के एयर डिफेंस सिस्टम की श्रेणी में रखा जाता है। ऐसे सिस्टम का इस्तेमाल कम ऊंचाई पर उड़ने वाले ड्रोन, हेलीकॉप्टर, क्रूज मिसाइल और लड़ाकू विमानों के खिलाफ किया जाता है। लंबी दूरी के एचक्यू-9 जैसे सिस्टम के साथ छोटे रेंज के एयर डिफेंस सिस्टम लगाए जाते हैं, ताकि बड़े रडार और मिसाइल बैटरियों को ड्रोन या लो-फ्लाइंग हथियारों से सुरक्षा मिल सके। हालांकि इनमें से कुछ डिलीवर हो गई है, तो कुछ की डिलीवरी 2027 तक होनी है। (Pakistan-China weapons deal)

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Pakistan-China weapons deal

तुर्किए से हिसार CUAS सिस्टम

पाकिस्तान और तुर्किए के बीच एयर डिफेंस सहयोग भी बढ़ा है। सूत्रों के अनुसार, पाकिस्तान की तुर्किए के हिसार-1 सिस्टम और उससे जुड़े कमांड तथा रडार उपकरण खरीदे हैं। हिसार-1 काउंटर अनमैन्ड एरियर सिस्टम (C-UAS) है। इन्हें ड्रोन, हेलीकॉप्टर, क्रूज मिसाइल और लड़ाकू विमानों जैसे टारगेट्स के खिलाफ इस्तेमाल करने के लिए डेवलप किया गया है।

तुर्किए के एयर डिफेंस सिस्टमों में मोबाइल लॉन्चर, रडार और कमांड वाहन शामिल होते हैं। इनका एक लाभ यह है कि इन्हें सड़क मार्ग से तेजी से दूसरे स्थान पर ले जाया जा सकता है। युद्ध के दौरान एयर डिफेंस यूनिट को एक ही जगह लंबे समय तक रखने से उसके निशाने पर आने का खतरा बढ़ता है। इसलिए मोबाइल सिस्टमों को तैनाती के बाद स्थान बदलने की क्षमता के हिसाब से डिजाइन किया जाता है।

पाकिस्तान के लिए तुर्किए से सहयोग का महत्व इसलिए भी है क्योंकि दोनों देश ड्रोन, नौसेना और गोला-बारूद क्षेत्र में पहले से साथ काम कर रहे हैं। तुर्किए की रक्षा कंपनियां पाकिस्तान को केवल प्लेटफॉर्म नहीं, बल्कि प्रशिक्षण, रखरखाव और स्थानीय उत्पादन में भी मदद करती हैं। (Pakistan-China weapons deal)

Pakistan-China weapons deal
Sarforash Drone

लंबी दूरी के कामिकेज ड्रोन खरीदने की तैयारी

सूत्रों के अनुसार पाकिस्तान ने हाल ही में विंग्ड इनोवेटिव सॉल्यूशंस से सरफरोश और यलगार नाम के दो ड्रोन खरीदे हैं। ये दोनों कैनिस्टर लॉन्च वाले कामिकेज ड्रोन और अलग-अलग रेंज के यूएवी हैं। इनकी रेंज 200 किलोमीटर, 340 किलोमीटर, 500 किलोमीटर और 1,000 किलोमीटर तक है। पाकिस्तान लंबे समय से सर्विलांस और स्ट्राइक ड्रोन क्षमता बढ़ाने पर काम कर रहा है।

कैनिस्टर लॉन्च सिस्टम का मतलब है कि ड्रोन को एक बंद कंटेनर या ट्यूब में रखा जाता है। जरूरत पड़ने पर उसे जमीन से, वाहन से या किसी दूसरे प्लेटफॉर्म से लॉन्च किया जा सकता है। इसमें ड्रोन को खुले रनवे या बड़े लॉन्च क्षेत्र की जरूरत कम होती है। सैन्य इस्तेमाल में ऐसे सिस्टम का फायदा यह होता है कि उन्हें छिपाकर रखा जा सकता है और तेजी से तैनात किया जा सकता है।

सूत्रों के अनुसार, पाकिस्तान अलग-अलग वजन और वारहेड क्षमता वाले तीन से चार प्रकार के ड्रोन विकल्पों पर काम कर रहा है। इनमें फायर-एंड-फॉरगेट क्षमता, जीपीएस बेस्ड नेविगेशन, जैसे फीचर हैं। (Pakistan-China weapons deal)

चीन से हाई एनर्जी लेजर सिस्टम

पाकिस्तान चीन से हाई एनर्जी लेजर वेपन सिस्टम की भी खरीद कर रहा है। इसकी रेंज 7 से 8 किलोमीटर बताई गई है। इस तरह के सिस्टम को डायरेक्टेड एनर्जी वेपन कहा जाता है। इसमें पारंपरिक मिसाइल या गोला-बारूद की जगह बहुत शक्तिशाली लेजर बीम का इस्तेमाल किया जाता है।

लेजर सिस्टम का इस्तेमाल खासकर छोटे ड्रोन, क्वाडकॉप्टर, कम ऊंचाई पर उड़ने वाले लक्ष्य और कुछ हल्के हथियारों के खिलाफ किया जा सकता है। लेजर बीम लक्ष्य के किसी संवेदनशील हिस्से को गर्म करके उसे नुकसान पहुंचाती है। ड्रोन के कैमरे, बैटरी, मोटर, कंट्रोल सिस्टम या वारहेड को निशाना बनाया जा सकता है।

लेकिन लेजर वेपन की अपनी सीमाएं भी होती हैं। धूल, धुआं, बारिश, कोहरा और खराब मौसम इसकी प्रभावशीलता को प्रभावित कर सकते हैं। इसके लिए लगातार बिजली सप्लाई, टारगेट को सटीक ट्रैक करने वाला सेंसर और स्टेबल बीम कंट्रोल जरूरी होता है। यही कारण है कि ऐसे सिस्टम आमतौर पर पारंपरिक मिसाइल आधारित एयर डिफेंस के साथ मिलकर काम करते हैं। (Pakistan-China weapons deal)

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जेएफ-17 का नया बैच

पाकिस्तान वायुसेना का जेएफ-17 थंडर लड़ाकू विमान चीन और पाकिस्तान के संयुक्त सहयोग का सबसे बड़ा उदाहरण है। यह एक सिंगल इंजन, मल्टीरोल फाइटर जेट है। इसका इस्तेमाल एयर डिफेंस, ग्राउंड अटैक और सीमित समुद्री मिशनों में किया जा सकता है। यह विमान पाकिस्तान एयरोनॉटिकल कॉम्प्लेक्स और चीन की एवीआईसी के सहयोग से डेवलप किया गया था।

जेएफ-17 के नए वर्जन में रडार, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम, मिसाइल एकीकरण और कॉकपिट डिस्प्ले में सुधार किया गया है। ब्लॉक-3 वर्जन में एक्टिव इलेक्ट्रॉनिकली स्कैन्ड एरे यानी एईएसए रडार लगा है। एईएसए रडार में कई छोटे ट्रांसमिट-रिसीव मॉड्यूल होते हैं, जिससे रडार एक साथ कई लक्ष्यों को ट्रैक कर सकता है और इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग के बीच काम करने की क्षमता बेहतर होती है।

इसके अलावा पांचवीं पीढ़ी के स्टेल्थ फाइटर जेट्स जे-35 की डिलीवरी भी इसी साल शुरू होने वाली है। पाकिस्तान ने 40 जे-35AE (एक्सपोर्ट वेरिएंट) खरीदने की योजना बनाई है। यह चीन का J-35 का पहला एक्सपोर्ट ऑर्डर होगा। सूत्रों के मुताबिक पहला छोटा बैच 2026 के अंत तक आ सकता है। हालांकि पायलट ट्रेनिंग पहले से चीन में शुरू हो चुकी है। (Pakistan-China weapons deal)

हंगोर क्लास पनडुब्बी

पाकिस्तान नौसेना का सबसे बड़ा चीन समर्थित कार्यक्रम हंगोर क्लास की पनडुब्बियां हैं। पाकिस्तान ने चीन से आठ डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों का समझौता किया था। इनमें से कुछ पनडुब्बियां चीन में बनाई जानी हैं और कुछ पाकिस्तान में कराची शिपयार्ड में असेंबल की जानी हैं। इनमें से चीन से एक पनडुब्बी पाकिस्तान को डिलीवर भी हो चुकी है। जिसकी तस्वीरें भी सामने आई थीं।

आधुनिक डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों में एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन जैसी तकनीक भी है, जिससे वे बिना सतह पर आए अधिक समय तक पानी के नीचे रह सकती हैं। डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियां समुद्री निगरानी, समुद्री रास्तों की सुरक्षा, टॉरपीडो हमले और एंटी-शिप मिसाइल ऑपरेशन के लिए उपयोग की जाती हैं। पनडुब्बी कार्यक्रम पाकिस्तान की समुद्री रणनीति में महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि अरब सागर में उसकी नौसैनिक गतिविधियां बढ़ रही हैं। (Pakistan-China weapons deal)

तुर्की और चीन के साथ गोला-बारूद, आर्टिलरी का प्रोडक्शन

सूत्रों ने बताया कि पाकिस्तान ने गोला-बारूद के स्थानीय उत्पादन को बढ़ाने के लिए तुर्की और चीन के साथ दो अलग-अलग परियोजनाओं पर काम शुरू किया है। इनमें पहली परियोजना 155 मिलीमीटर आर्टिलरी गोले से जुड़ी है, जबकि दूसरी 125 मिलीमीटर टैंक गोला-बारूद उत्पादन से संबंधित है।

155 मिलीमीटर आर्टिलरी गोले के लिए पाकिस्तान की वाह इंडस्ट्रीज लिमिटेड ने तुर्की की कंपनी रेपकॉन के साथ समझौता किया था। इस समझौते के तहत पाकिस्तान में एक ऑटोमेटेड प्रोडक्शन लाइन और एक्सप्लोसिव फिलिंग लाइन लगाई जानी है। इस लाइन की सालाना क्षमता करीब 1 लाख 20 हजार 155 मिलीमीटर आर्टिलरी शेल बनाने की बताई गई है। वाह इंडस्ट्रीज, पाकिस्तान ऑर्डनेंस फैक्ट्रियों से जुड़ी कंपनी है और सेना के लिए हथियार तथा गोला-बारूद तैयार करती है। 155 मिलीमीटर गोले लंबी दूरी की तोपों में इस्तेमाल होते हैं। इन्हें हाई एक्सप्लोसिव, स्मोक और अन्य प्रकार के मिशनों में उपयोग किया जा सकता है।

दूसरी परियोजना 125 मिलीमीटर टैंक गोला-बारूद से जुड़ी है। सूत्रों के अनुसार, पाकिस्तान इसमें चीन की नोरिन्को की तकनीकी मदद ले रहा है। 125 मिलीमीटर गोला-बारूद पाकिस्तान के अल-खालिद और अल-जरार जैसे टैंकों की मुख्य जरूरत है। इसमें आर्मर पियर्सिंग, हाई एक्सप्लोसिव और हीट श्रेणी के राउंड शामिल हैं।

पाकिस्तान के पास चीन निर्मित विंग लूंग श्रेणी के आर्मर्ड ड्रोन पहले से मौजूद हैं। इसके अलावा चीन के साथ सेंसर, डेटा लिंक और ड्रोन नियंत्रण तकनीक में भी सहयोग रहा है। पाकिस्तान ने चीन की मदद से शाहपर, बुर्राक और अन्य यूएवी प्लेटफॉर्म भी डेवलप किए हैं। (Pakistan-China weapons deal)

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Pakistan-China weapons deal

चीन से 28 मिलियन के ड्रोन खरीदे

वहीं पाकिस्तान ने चीन के साथ 1000 ड्रोन सिस्टम की खरीद के लिए करीब 20 करोड़ युआन का सौदा किया है। भारतीय मुद्रा में यह राशि लगभग 230 से 240 करोड़ रुपये के आसपास बैठती है। रक्षा सूत्रों के अनुसार, यह खरीद रावलपिंडी स्थित जीडब्ल्यूअल्फा टेक प्राइवेट लिमिटेड के माध्यम से की जा रही है। कंपनी रोबोटिक्स, इलेक्ट्रॉनिक्स, आईटी और एयरोस्पेस सिस्टम इंटीग्रेशन के क्षेत्र में काम करती है तथा नेशनल एयरोस्पेस साइंस एंड टेक्नोलॉजी पार्क से जुड़ी हुई है।

इस सौदे के तहत चीन से ड्रोन प्लेटफॉर्म, सेंसर, कम्युनिकेशन उपकरण, ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन और अन्य सहायक सिस्टम लिए जाएंगे। इन ड्रोन की रेंज 40 किमी, 200 किमी औऱ 500 किमी तक होगी। इन ड्रोन सिस्टम का इस्तेमाल सीमा निगरानी, वीडियो सर्विलांस, जीपीएस आधारित टारगेट पहचान और सैन्य यूनिटों तक रियल टाइम जानकारी पहुंचाने के लिए किया जा सकता है। इसके अलावा पाकिस्तान चीन से मिलने वाले सिस्टम और कंपोनेंट्स को स्थानीय स्तर पर इंटीग्रेट करने की दिशा में भी काम कर रहा है।

रक्षा सूत्रों के मुताबिक, पाकिस्तान निजी कंपनियों के जरिए ड्रोन तकनीक, इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम और एयरोस्पेस उपकरणों की स्थानीय क्षमता विकसित करने की कोशिश कर रहा है। इसके अलावा पाकिस्तान 300-400 मल्टीकॉप्टर की भी खरीद कर रहा है। साथ ही, पाकिस्तान चीन से एंटी ड्रोन गन सिस्टम की भी खरीद कर रहा है। (Pakistan-China weapons deal)

अमेरिका से 10 एमएच-60 हेलीकॉप्टर खरीदने की तैयारी

पाकिस्तान नेवी समुद्री निगरानी और पनडुब्बी रोधी युद्ध क्षमता बढ़ाने के लिए अमेरिका से 10 एमएच-60 हेलीकॉप्टर खरीदने की तैयारी कर रही है। रक्षा सूत्रों के अनुसार, यह प्रस्ताव अमेरिकी क्लियरेंस प्रक्रिया में भेजा गया है। हालांकि खरीद की अंतिम मंजूरी, कीमत और डिलीवरी शेड्यूल पर अभी कोई सार्वजनिक आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है।

एमएच-60आर को रोमियो हेलीकॉप्टर भी कहा जाता है। यह अमेरिकी नौसेना का मल्टी-रोल समुद्री हेलीकॉप्टर है। इसका मुख्य उपयोग पनडुब्बी रोधी युद्ध, सतह पर मौजूद जहाजों की पहचान, समुद्री गश्त, लक्ष्य की निगरानी और खोज-बचाव मिशन में होता है।

इस हेलीकॉप्टर में समुद्र की सतह और हवा में मौजूद लक्ष्यों को खोजने के लिए रडार लगाया जाता है। पनडुब्बी की तलाश के लिए इसमें डिपिंग सोनार और सोनाबॉय जैसे उपकरण लगाए जा सकते हैं। डिपिंग सोनार को हेलीकॉप्टर से समुद्र में नीचे उतारा जाता है। यह पानी के भीतर ध्वनि तरंगें भेजकर पनडुब्बी की मौजूदगी का पता लगाने में मदद करता है। सोनाबॉय छोटे सेंसर होते हैं, जिन्हें समुद्र में गिराया जाता है और वे पानी के भीतर की आवाजों का डेटा भेजते हैं।

एमएच-60आर को टॉरपीडो, एंटी-शिप मिसाइल, रॉकेट और मशीन गन जैसे हथियारों के साथ भी कॉन्फिगर किया जा सकता है। किसी भी देश को मिलने वाला हथियार पैकेज अमेरिकी मंजूरी और खरीदार देश की जरूरत के अनुसार अलग होता है।

पाकिस्तान नेवी के लिए ऐसे हेलीकॉप्टरों का उपयोग फ्रिगेट, कोरवेट और अन्य युद्धपोतों के साथ समुद्री मिशन में किया जा सकता है। अरब सागर में पनडुब्बी गतिविधियों पर नजर रखने, जहाजों की सुरक्षा और समुद्री गश्त में इनकी भूमिका अहम होती है। (Pakistan-China weapons deal)

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    हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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