📍नई दिल्ली | 29 Jul, 2026, 12:52 PM
Garud Commandos Loiter Munitions System: भारतीय वायुसेना के स्पेशल फोर्स गारुड़ कमांडो को आधुनिक लॉइटर म्यूनिशन सिस्टम से लैस करने की तैयारी शुरू हो गई है। रक्षा मंत्रालय ने मैन पोर्टेबल लॉइटर म्यूनिशन्स सिस्टम (MPLMS) की खरीद के लिए आरएफआई जारी की है। यह सिस्टम स्पेशल फोर्सेज को दुश्मन के ठिकानों पर सुरक्षित दूरी से सटीक हमला करने की क्षमता देगा।
गरुड़ कमांडो वायुसेना के सबसे प्रशिक्षित स्पेशल फोर्सेज में शामिल हैं और उन्हें आतंकवाद विरोधी अभियान, एयरबेस सुरक्षा, विशेष अभियान और दुश्मन के इलाके में संवेदनशील मिशनों के लिए तैनात किया जाता है।
Garud Commandos Loiter Munitions System: क्या है मैन पोर्टेबल लॉइटर म्यूनिशन्स सिस्टम?
मैन पोर्टेबल लॉइटर म्यूनिशन्स सिस्टम एक ऐसा हथियार है जिसे अक्सर ‘कामिकाजे ड्रोन’ भी कहा जाता है। यह सामान्य ड्रोन की तरह केवल निगरानी नहीं करता, बल्कि टारगेट को तलाश कर उस पर सीधे हमला कर देता है।
इसकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि सैनिकों को दुश्मन के बेहद करीब जाने की जरूरत नहीं पड़ती। ऑपरेटर सुरक्षित स्थान से पूरे मिशन को कंट्रोल कर सकता है। इससे स्पेशल फोर्सेज का जोखिम कम होता है और हमला अधिक सटीक तरीके से किया जा सकता है।
रक्षा मंत्रालय ने आरएफआई में साफ किया है कि यह सिस्टम दिन और रात दोनों समय काम कर सके। इसका इस्तेमाल निगरानी, टोही और दुश्मन के सैनिकों, बख्तरबंद वाहनों तथा इमारतों पर सटीक हमले के लिए किया जाएगा। वहीं पूरा सिस्टम ऐसा होना चाहिए कि इसे केवल दो स्पेशल फोर्स ऑपरेटर ही चला सकें।
पूरा सिस्टम होना चाहिए पोर्टेबल
आरएफआई के अनुसार यह सिस्टम पूरी तरह मैन पोर्टेबल होना चाहिए। यानी इसे सैनिक अपने कंधों पर बैकपैक में लेकर चल सकें। पूरा सिस्टम एक, दो या अधिकतम तीन ऑल-वेदर बैकपैक में समा जाना चाहिए।
पूरे सिस्टम का कुल वजन 25 किलोग्राम से अधिक नहीं होना चाहिए। वहीं एयरियल व्हीकल, वारहेड और कैमरे सहित उसका कुल वजन 18 किलोग्राम से कम रखा गया है।
सिस्टम में हाई एक्सप्लोसिव वारहेड और हाई एक्सप्लोसिव एंटी-टैंक वारहेड वाले अलग-अलग एरियल व्हीकल, ग्राउंड डेटा टर्मिनल, ऑपरेटर कंट्रोल यूनिट, ट्रेनिंग के लिए अलग लॉइटर म्यूनिशन और विशेष रखरखाव उपकरण शामिल होंगे। (Garud Commandos Loiter Munitions System)
40 किलोमीटर तक मार, दो घंटे तक उड़ान
रक्षा मंत्रालय ने इस सिस्टम के लिए कई सख्त तकनीकी मानक तय किए हैं। आरएफआई के अनुसार लॉइटरिंग म्यूनिशन की कम से कम ऑपरेशनल रेंज 40 किलोमीटर होनी चाहिए। यह लगातार 120 मिनट या उससे अधिक समय तक हवा में रह सके।
इसकी सामान्य उड़ान गति कम से कम 60 किलोमीटर प्रति घंटा और टारगेट पर हमला करते समय डाइव स्पीड 100 किलोमीटर प्रति घंटा या उससे अधिक होनी चाहिए।
यह सिस्टम अलग-अलग कोणों से हमला करने में सक्षम होना चाहिए। टारगेट के अनुसार 35 डिग्री से 85 डिग्री तक अटैक एंगल उपलब्ध होना चाहिए, ताकि खुले मैदान से लेकर पहाड़ी इलाकों और इमारतों के पीछे छिपे टारगेटों तक प्रभावी हमला किया जा सके।
न्यूमेटिक लॉन्च सिस्टम से कम होगी पहचान
स्पेशल फोर्स मिशनों में गोपनीयता सबसे महत्वपूर्ण होती है। इसी कारण रक्षा मंत्रालय ने लॉन्च सिस्टम को लेकर भी विशेष शर्त रखी है।
आरएफआई में कहा गया है कि लॉइटर म्यूनिशन को न्यूमेटिक लॉन्च ट्यूब से छोड़ा जाना चाहिए। इस तकनीक से लॉन्च के समय आवाज बहुत कम होगी और विजुअल सिग्नेचर लगभग नहीं के बराबर रहेगा। इससे दुश्मन के लिए लॉन्च की जगह का पता लगाना कठिन होगा।
सिस्टम में ऐसा सेफ्टी मैकेनिज्म भी होना चाहिए, जिससे मिशन रद्द होने पर म्यूनिशन को सुरक्षित रूप से वापस लाया जा सके। (Garud Commandos Loiter Munitions System)
दो तरह के वारहेड होन जरूरी
रक्षा मंत्रालय के मुताबिक सिस्टम में दो तरह के वारहेड होने चाहिए। पहला हाई एक्सप्लोसिव (एचई) वारहेड, जिसका इस्तेमाल दुश्मन के सैनिकों और सामान्य सैन्य ठिकानों के खिलाफ किया जाएगा। दूसरा हाई एक्सप्लोसिव एंटी-टैंक (एचईएटी) वारहेड, जो आर्मर्ड व्हीकल्स को नष्ट कर सके।
आरएफआई के अनुसार एचई वारहेड का प्रभाव कम से कम पांच मीटर के दायरे तक होना चाहिए। वहीं एचईएटी वारहेड कम से कम 500 मिलीमीटर रोल्ड होमोजीनियस आर्मर (आरएचए) को भेदने में सक्षम होना चाहिए।
सिस्टम में ऐसा सेफ एंड आर्म मैकेनिज्म होना चाहिए, जिससे ऑपरेटर जरूरत पड़ने पर वारहेड को सक्रिय या निष्क्रिय कर सके। इसमें प्रॉक्सिमिटी, इम्पैक्ट और डिले जैसे अलग-अलग मोड उपलब्ध होने चाहिए, ताकि टारगेट के अनुसार हमला किया जा सके।
छोटे टारगेट पर भी सटीक हमला करने की क्षमता जरूरी
रक्षा मंत्रालय ने इस सिस्टम के लिए सटीकता को सबसे महत्वपूर्ण मानकों में रखा है। आरएफआई में कहा गया है कि सिस्टम कम से कम 800 फीट की ऊंचाई से मानव आकार के टारगेट की पहचान कर सके और 30 सेकंड के भीतर उस पर लॉक हासिल कर ले।
सर्कुलर एरर प्रोबेबल यानी सीईपी एक मीटर से अधिक नहीं होना चाहिए। इसका मतलब है कि हमला टारगेट से लगभग एक मीटर के भीतर होना चाहिए। वहीं फाइनल अटैक की सटीकता दो मीटर के दायरे के अंदर तय की गई है। (Garud Commandos Loiter Munitions System)
दिन और रात दोनों समय करेगा निगरानी
नए लॉइटर म्यूनिशन में इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल और इन्फ्रारेड कैमरा लगाया जाएगा। यही कैमरा ऑपरेटर को रीयल टाइम तस्वीरें उपलब्ध कराएगा।
आरएफआई के अनुसार कैमरा दिन और रात दोनों समय टारगेट की पहचान करने में सक्षम होना चाहिए। चलते हुए व्यक्ति और सैन्य वाहन दोनों की निगरानी और ट्रैकिंग की क्षमता होनी चाहिए।
ह्यूमन टारगेट की पहचान दिन में लगभग डेढ़ किलोमीटर और रात में करीब 750 मीटर की दूरी से होनी चाहिए। वहीं मिलिट्री व्हीकल को दिन में 2.2 किलोमीटर और रात में लगभग 1.2 किलोमीटर की दूरी से पहचानने की क्षमता मांगी गई है।
कैमरा केवल तस्वीरें भेजने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि ऑटोमैटिक टारगेट ट्रैकिंग की सुविधा भी उपलब्ध कराएगा, जिससे ऑपरेटर को लगातार टारगेट का पीछा करने में आसानी होगी। (Garud Commandos Loiter Munitions System)
जीपीएस बंद होने पर भी मिशन जारी रहेगा
आधुनिक युद्ध में कई बार दुश्मन जीपीएस सिग्नल को जाम करने की कोशिश करता है। ऐसे हालात को देखते हुए रक्षा मंत्रालय ने वैकल्पिक नेविगेशन सिस्टम भी मांगा है।
आरएफआई के अनुसार सिस्टम में जीपीएस के साथ भारतीय नैविक प्रणाली का विकल्प होना चाहिए। यदि जीपीएस उपलब्ध नहीं हो तो इनर्शियल नेविगेशन और इमेज आधारित नेविगेशन के जरिए भी म्यूनिशन अपना मिशन पूरा कर सके। (Garud Commandos Loiter Munitions System)
सुरक्षित डेटा लिंक और मजबूत कंट्रोल सिस्टम
पूरे सिस्टम को नियंत्रित करने के लिए एक मजबूत ऑपरेटर कंट्रोल यूनिट और ग्राउंड डेटा टर्मिनल की आवश्यकता होगी।
रक्षा मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि कंट्रोल यूनिट मिलिट्री ग्रेड रग्ड कंप्यूटर पर आधारित होनी चाहिए, जो धूल, पानी और झटकों को सहन कर सके। इसकी बैटरी कम से कम 18 घंटे तक चलनी चाहिए और स्क्रीन तेज धूप में भी साफ दिखाई देनी चाहिए।
डेटा लिंक पूरी तरह एन्क्रिप्टेड होगा ताकि मिशन के दौरान भेजी जा रही जानकारी को कोई तीसरा पक्ष बीच में पकड़ या बदल न सके। सिस्टम में रियल टाइम वीडियो, कंट्रोल ट्रांसफर और डेटा ट्रांसमिशन की सुविधा भी अनिवार्य रखी गई है। (Garud Commandos Loiter Munitions System)
ऊंचे पहाड़ों और कठिन मौसम में भी काम करने की शर्त
भारतीय वायुसेना के गरुड़ कमांडो अक्सर ऊंचाई वाले इलाकों और कठिन मौसम में अभियान चलाते हैं। यह सिस्टम ऐसा होना चाहिए जिसे 16 हजार फीट तक की ऊंचाई से लॉन्च किया जा सके। यह माइनस 20 डिग्री से लेकर प्लस 50 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान में काम करने में सक्षम हो। इसके अलावा धूल, हल्की बारिश और तेज हवा में भी इसकी कार्यक्षमता बनी रहनी चाहिए।
आरएफआई में यह भी कहा गया है कि पूरा सिस्टम मजबूत लेकिन हल्के मिलिट्री ग्रेड कंपोनेंट से बना हो और इसे दस मिनट या उससे कम समय में जोड़ा या अलग किया जा सके। (Garud Commandos Loiter Munitions System)
Author
हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।





