📍नई दिल्ली | 3 Aug, 2026, 6:42 PM
IAF Helicopter Counter Drone System: भारतीय वायुसेना अब हेलीकॉप्टरों को दुश्मन के सस्ते ड्रोन, निगरानी करने वाले यूएवी और लोइटरिंग म्यूनिशंस से निपटने के लिए इस्तेमाल करने की तैयारी कर रही है। इसके लिए हेलीकॉप्टरों पर एआई बेस्ड रडार, इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल और इन्फ्रारेड सेंसर, रेडियो फ्रीक्वेंसी और जीपीएस जैमर, माइक्रो-मिसाइल तथा 20 मिलीमीटर एयर-बर्स्ट गन राउंड जैसे सिस्टम लगाए जा सकते हैं। वायुसेना चाहती है कि हेलीकॉप्टर हवा में रहते हुए छोटे ड्रोन को खोज सके, उसकी पहचान और ट्रैकिंग कर सके तथा उपलब्ध काउंटर-ड्रोन सिस्टम से उससे निपट सके।
भारतीय वायुसेना ने नई दिल्ली में आयोजित आईएएफ-एसआईडीएम ‘संकल्प 2026’ के दौरान रक्षा उद्योग के सामने इससे जुड़ा प्रॉब्लम स्टेटमेंट रखा है। इसका नाम ‘काउंटरिंग लो-कॉस्ट लोइटरिंग म्यूनिशंस एंड रिकॉनिसेंस ड्रोन्स यूजिंग हेलीकॉप्टर्स’ है। वायुसेना के अनुसार जरूरी बदलाव, नए उपकरणों और सिस्टम इंटीग्रेशन के जरिए हेलीकॉप्टरों को काउंटर-यूएएस भूमिका वाला प्लेटफॉर्म बनाया जा सकता है।
IAF Helicopter Counter Drone System: सस्ते ड्रोन ने बदली एयर डिफेंस की चुनौती
यूक्रेन और पश्चिम एशिया के संघर्षों ने छोटे ड्रोन और लोइटरिंग म्यूनिशन की भूमिका को काफी बढ़ा दिया है। इनमें से कई ड्रोन आकार में छोटे होते हैं, कम ऊंचाई पर उड़ते हैं और उनका रडार क्रॉस सेक्शन भी काफी कम होता है। इस कारण रडार के लिए उनकी पहचान करना मुश्किल हो सकता है।
दूसरी समस्या लागत की है। हजारों या लाखों रुपये की कीमत वाले छोटे ड्रोन को रोकने के लिए बहुत महंगी एयर डिफेंस मिसाइल इस्तेमाल करना हमेशा व्यावहारिक विकल्प नहीं होता। इसी कारण सेनाएं इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग, गन, एयर-बर्स्ट गोला-बारूद और कम लागत वाली छोटी मिसाइलों जैसे विकल्पों पर भी काम कर रही हैं।
जमीन पर लगे रडार और एयर डिफेंस सिस्टम के सामने टेरन मास्किंग और लाइन-ऑफ-साइट की सीमा भी होती है। पहाड़, इमारत या दूसरी रुकावट के पीछे कम ऊंचाई पर उड़ रहा ड्रोन कुछ समय के लिए सेंसर की सीधी नजर से बाहर रह सकता है। हेलीकॉप्टर अपनी ऊंचाई और लोकेशन बदलकर ऐसे क्षेत्र को दूसरे कोण से देख सकता है।
एआई रडार खोजेगा छोटे ड्रोन
वायुसेना की जरूरत में एक महत्वपूर्ण सिस्टम एआई बेस्ड रडार है, जो कम रडार क्रॉस सेक्शन वाले टारगेट का पता लगाने में सक्षम हो। छोटे ड्रोन की पहचान आसान नहीं होती। रडार को जमीन से आने वाले क्लटर, पक्षियों और धीमी गति से उड़ने वाली दूसरी वस्तुओं के बीच वास्तविक खतरे को अलग करना होता है। एआई आधारित प्रोसेसिंग सेंसर से मिलने वाले डेटा का विश्लेषण करके संदिग्ध टारगेट को पहचानने और उसकी ट्रैकिंग में मदद कर सकती है।
रडार के साथ इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल और इन्फ्रारेड पॉड को जोड़ने की जरूरत भी बताई गई है। इसमें एआई बेस्ड थ्रेट और टारगेट आइडेंटिफिकेशन फीचर रखने की बात है। यानी किसी संदिग्ध हवाई वस्तु का पता चलने के बाद कैमरा और थर्मल सेंसर उसकी पहचान को और स्पष्ट कर सकेंगे। (IAF Helicopter Counter Drone System)
पहले जैमर से ड्रोन रोकने की कोशिश
प्रस्तावित सिस्टम में एयरबोर्न रेडियो फ्रीक्वेंसी और जीपीएस जैमर भी शामिल है। इसे इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल/इन्फ्रारेड पॉड और हेलीकॉप्टर की फ्रंट गन के साथ जोड़ने की जरूरत बताई गई है।
कई ड्रोन ऑपरेटर और ड्रोन के बीच रेडियो कम्युनिकेशन पर निर्भर होते हैं। वहीं नेविगेशन के लिए सैटेलाइट सिग्नल का इस्तेमाल किया जा सकता है। इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग ऐसे लिंक को बाधित करने का एक तरीका है।
हालांकि हर तरह के ड्रोन को केवल जैमिंग से रोकना संभव नहीं होता। ऑटोनॉमस तरीके से उड़ रहे या ऐसे यूएवी जिनका कम्युनिकेशन लिंक जाम होने के बाद भी मिशन जारी रह सकता है, उनके खिलाफ फिजिकल तौर पर इंटरसेप्ट करने वाले हथियार की जरूरत पड़ सकती है। इसी कारण वायुसेना के कॉन्सेप्ट में सॉफ्ट-किल के साथ हार्ड-किल विकल्प भी रखे गए हैं। (IAF Helicopter Counter Drone System)
ड्रोन के लिए खास माइक्रो-मिसाइल
इस योजना में सबसे दिलचस्प हथियार माइक्रो-मिसाइल है। वायुसेना ऐसी छोटी मिसाइलों को देख रही है जिन्हें खास तौर पर ड्रोन और धीमी गति से उड़ने वाले हवाई टारगेट के खिलाफ तैयार किया गया हो।
इसका उद्देश्य बड़े और महंगे सर्फेस-टू-एयर हथियार की जगह छोटे ड्रोन के अनुरूप इंटरसेप्टर उपलब्ध कराना है।
भारतीय उद्योग इस दिशा में पहले से काम कर रहा है। वायुसेना के प्रॉब्लम स्टेटमेंट में भार्गवास्त्र का उदाहरण दिया गया है। इसे सोलर डिफेंस एंड एयरोस्पेस लिमिटेड ने डेवलप किया है।
भार्गवास्त्र के माइक्रो-रॉकेट का 13 मई 2025 को ओडिशा के गोपालपुर स्थित सीवर्ड फायरिंग रेंज में परीक्षण किया गया था। परीक्षण के दौरान चार रॉकेट दागे गए, जिनमें दो को साल्वो मोड में दो सेकंड के भीतर फायर किया गया। सिस्टम को करीब 2.5 किलोमीटर तक छोटे ड्रोन से निपटने के लिए तैयार किया गया है। इसके पहले स्तर में अनगाइडेड माइक्रो-रॉकेट और ज्यादा सटीक इंटरसेप्शन के लिए गाइडेड माइक्रो-मिसाइल शामिल है। (IAF Helicopter Counter Drone System)
जुलाई 2026 में फिर सामने आया भार्गवास्त्र
भार्गवास्त्र पर काम इसके बाद भी जारी रहा। 24 जुलाई 2026 को सोलर डिफेंस एंड एयरोस्पेस के चेयरमैन सत्यनारायण नुवाल ने नागपुर में सिस्टम के प्रदर्शन के बाद बताया कि इसके रडार की डिटेक्शन रेंज 10 किलोमीटर तक और इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल ट्रैकिंग सिस्टम की रेंज करीब छह किलोमीटर है।
कंपनी के अनुसार भारतीय सेना की टीम ने नागपुर स्थित सुविधा में सिस्टम की समीक्षा की। प्रदर्शन के दौरान ड्रोन स्वार्म उड़ाया गया, जिसे रडार, इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल/इन्फ्रारेड और रेडियो फ्रीक्वेंसी सेंसर से डिटेक्ट किया गया। इसके बाद कमांड, कंट्रोल, कम्युनिकेशन और इंटेलिजेंस सिस्टम ने हवाई स्थिति की तस्वीर तैयार करके टारगेट को लॉन्चर के लिए निर्धारित किया। (IAF Helicopter Counter Drone System)
20 मिलीमीटर गन से भी रोके जाएंगे ड्रोन
माइक्रो-मिसाइल के अलावा वायुसेना ने 20 मिलीमीटर एयर-बर्स्ट गन राउंड को भी संभावित विकल्प के रूप में शामिल किया है।
सामान्य गन फायर में छोटे ड्रोन को सीधे हिट करना कठिन हो सकता है। एयर-बर्स्ट गोला-बारूद को एरियल टरगेट के आसपास निर्धारित जगह पर असर पैदा करने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे निकलने वाले फ्रैगमेंट छोटे ड्रोन को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
प्रॉब्लम स्टेटमेंट में फ्रैगमेंटेशन रॉकेट-प्रोपेल्ड वारहेड का भी उल्लेख है। इसे माइक्रो और मिनी यूएएस सहित अलग-अलग तरह के ड्रोन से निपटने के लिए इस्तेमाल करने की जरूरत बताई गई है। (IAF Helicopter Counter Drone System)
एक हेलीकॉप्टर पर कई लेयर में काम करेगा सिस्टम
वायुसेना का कॉन्सेप्ट केवल हेलीकॉप्टर पर एक मिसाइल लगाने तक सीमित नहीं है। इसमें पूरा डिटेक्ट, ट्रैक, पहचान और एंगेजमेंट सिस्टम एक साथ काम करेगा।
सबसे पहले रडार संदिग्ध एरियल टारगेट का पता लगाएगा। इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल और इन्फ्रारेड पॉड उसकी पहचान और ट्रैकिंग में मदद करेगा। एआई सिस्टम सेंसर से मिले डेटा के आधार पर खतरे को पहचानने में सहायता करेगा।
इसके बाद उपलब्ध विकल्पों में रेडियो फ्रीक्वेंसी या जीपीएस जैमिंग जैसे सॉफ्ट-किल सिस्टम इस्तेमाल किए जा सकते हैं। यदि ड्रोन पर इलेक्ट्रॉनिक काउंटर-मेजर असरदार नहीं रहता है तो माइक्रो-मिसाइल, फ्रैगमेंटेशन हथियार या गन जैसे हार्ड-किल विकल्प काम आएंगे। (IAF Helicopter Counter Drone System)
अपाचे और प्रचंड जैसे लड़ाकू हेलीकॉप्टर भी वायुसेना के बेड़े में
भारतीय वायुसेना के पास अलग-अलग भूमिकाओं वाले हेलीकॉप्टर मौजूद हैं। इनमें एएच-64ई अपाचे अटैक हेलीकॉप्टर और स्वदेशी एलसीएच प्रचंड जैसे लड़ाकू प्लेटफॉर्म भी शामिल हैं। इसके अलावा एमआई-17 कैटेगरी के हेलीकॉप्टर वायुसेना के रोटरी-विंग बेड़े का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
हालांकि संकल्प 2026 के प्रॉब्लम स्टेटमेंट में किसी खास हेलीकॉप्टर को इस काउंटर-यूएएस भूमिका के लिए चुने जाने की बात नहीं कही गई है। फिलहाल वायुसेना ने उद्योग के सामने उस तकनीकी क्षमता को रखा है, जिसमें जरूरी मॉडिफिकेशन, मैन्युफैक्चरिंग और सिस्टम इंटीग्रेशन के जरिए हेलीकॉप्टर को लो-कॉस्ट लोइटरिंग म्यूनिशन तथा रिकॉनिसेंस ड्रोन के खिलाफ इस्तेमाल किया जा सके। (IAF Helicopter Counter Drone System)
Author
हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।





