📍नई दिल्ली | 12 Aug, 2026, 11:03 AM
DRDO VTOL Logistics Drone: भारतीय सेना की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है ऊंचे पहाड़ी इलाकों में तैनात सैनिकों तक समय पर रसद पहुंचाना। नियंत्रण रेखा (एलओसी) और वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के कई इलाकों में सैनिक 12,000 फीट से लेकर 18,000 फीट से अधिक ऊंचाई पर तैनात रहते हैं। इन इलाकों में राशन, दवाइयां, गोला-बारूद, कम्युनिकेशन इक्विपमेंट्स और जरूरी स्पेयर पार्ट्स पहुंचाना हमेशा से कठिन और महंगा काम रहा है।
इसी चुनौती को ध्यान में रखते हुए डीआरडीओ ने एक नया स्वदेशी प्रोजेक्ट शुरू किया है। डीआरडीओ की तरफ से जारी आरएफआई के मुताबिक ऐसा हाई-एल्टीट्यूड वीटीओएल लॉजिस्टिक्स ड्रोन डेवलप किया जाएगा, जो बिना रनवे के उड़ान भर सके, मुश्किल पहाड़ी इसकों में उतर सके और हेवी पेलोड लेकर फॉरवर्ड पोस्ट तक पहुंच सके। इस प्रोजेक्ट का मकसद दुर्गम इलाकों में रसद सप्लाई को अधिक तेज, सुरक्षित और भरोसेमंद बनाना है।
DRDO VTOL Logistics Drone: ऊंचे इलाकों में सप्लाई क्यों है बड़ी चुनौती?
भारत की उत्तरी सीमाओं पर स्थित कई सैन्य चौकियां ऐसे इलाकों में हैं जहां सड़क संपर्क सीमित है। भारी बर्फबारी, भूस्खलन, हिमस्खलन, तेज हवाएं और अत्यधिक ठंड के कारण कई बार सप्लाई मार्ग बाधित हो जाते हैं। ऐसी परिस्थितियों में सेना को खच्चरों, मानव पोर्टरों और हेलीकॉप्टरों पर निर्भर रहना पड़ता है।
हेलीकॉप्टर प्रभावी साधन हैं, लेकिन उनकी उड़ान लागत अधिक होती है। खराब मौसम में उड़ानें प्रभावित होती हैं और सीमित संख्या में उपलब्ध हेलीकॉप्टरों को कई तरह के सैन्य कार्यों में लगाया जाता है। इसके अलावा ऊंचाई वाले क्षेत्रों में फ्लाइंग ऑपरेशन तकनीकी रूप से भी कठिन होता है।
यही वजह है कि अब ऐसा सिस्टम डेवलप करने पर जोर दिया जा रहा है जो बिना पायलट के स्वचालित रूप से आवश्यक सामग्री सैनिकों तक पहुंचा सके। (DRDO VTOL Logistics Drone)
क्या है हाई-एल्टीट्यूड वीटीओएल लॉजिस्टिक्स ड्रोन?
यह एक विशेष प्रकार का अनमैन्ड एरियल व्हीकल होगा, जिसे वीटीओएल यानी वर्टिकल टेक-ऑफ एंड लैंडिंग क्षमता के साथ विकसित किया जाएगा। इसका अर्थ है कि इसे उड़ान भरने या उतरने के लिए किसी रनवे की जरूरत नहीं होगी।
ड्रोन केवल 5×5 मीटर के छोटे और बिना रनवे वाले इलाके से भी उड़ान भर सकेगा और वहीं उतर सकेगा। पहाड़ी इलाकों में यह क्षमता बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है क्योंकि वहां समतल भूमि की उपलब्धता बहुत कम होती है।
इस सिस्टम का पूरा डिजाइन स्वदेशी होगा और इसमें भारत में विकसित तकनीकों का इस्तेमाल किया जाएगा।
200 किलोग्राम तक सामान ले जाने की क्षमता
प्रोजेक्ट के अनुसार ड्रोन की पेलोड क्षमता 200 किलोग्राम तक होगी। ड्रोन एक बार में बड़ी मात्रा में राशन, चिकित्सा सामग्री, गोला-बारूद या अन्य जरूरी सैन्य उपकरण पहुंचाए जा सकेंगे।
ड्रोन का कुल वजन 700 किलोग्राम से अधिक होगा। यह लगभग 100 किलोमीटर तक उड़ान भरने में सक्षम होगा, जिसमें 50 किलोमीटर वन-वे मिशन शामिल है।
अधिकतम रफ्तार करीब 120 किलोमीटर प्रति घंटा रखी गई है। इससे दुगर्म इलाकों में स्थित चौकियों तक सामग्री पहुंचाने में लगने वाला समय काफी कम हो सकता है। (DRDO VTOL Logistics Drone)
25,000 फीट तक ऑपरेशनल क्षमता
इस प्रोजेक्ट की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक इसकी हाई-एल्टीट्यूड क्षमता है। ड्रोन को 25,000 फीट तक की सर्विस सीलिंग के लिए डिजाइन किया जा रहा है।
यह 15,000 फीट तक की ऊंचाई वाले क्षेत्रों से टेक-ऑफ कर सकेगा। इतनी ऊंचाई पर वायु घनत्व कम हो जाता है, जिससे सामान्य इंजन और रोटर सिस्टम की परफॉरमेंस पर असर पड़ता है।
इसी वजह से प्रोजेक्ट में विशेष रूप से हाई-एल्टीट्यूड ऑपरेशन के लिए जरूरी प्रोपल्शन सिस्टम डेवलप करने पर जोर दिया गया है। (DRDO VTOL Logistics Drone)
स्वदेशी हैवी-फ्यूल इंजन होगा सबसे अहम हिस्सा
ड्रोन का ऑपरेशन इंडिजिनस हैवी-फ्यूल इंटरनल कंबशन इंजन (आईसी इंजन) से होगा। यह इंजन जेपी-8 और डीजल जैसे मिलिट्री फ्यूल्स पर चलने में सक्षम होगा।
मिलिट्री इस्तेमाल के लिए हैवी-फ्यूल इंजन को अधिक सुरक्षित और व्यावहारिक माना जाता है क्योंकि सेना पहले से ही ऐसे ईंधनों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करती रही है।
ऊंचाई वाले इलाकों में कम ऑक्सीजन की स्थिति में इंजन की परफॉरमेंस बनाए रखना एक बड़ी तकनीकी चुनौती होती है। इसलिए इंजन को विशेष रूप से हाई-एल्टीट्यूड संचालन के लिए डिजाइन किया जाएगा।
एफएडीईसी तकनीक से होगा इंजन कंट्रोल
इस प्रोजेक्ट में फुल अथॉरिटी डिजिटल इंजन कंट्रोल यानी एफएडीईसी तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा।
एफएडीईसी एक डिजिटल सिस्टम है जो इंजन के फ्यूल फ्लो, पावर आउटपुट और प्रदर्शन को स्वतः नियंत्रित करती है। इससे इंजन की दक्षता बढ़ती है और बदलती परिस्थितियों में बेहतर प्रदर्शन मिलता है।
ऊंचे पर्वतीय क्षेत्रों में तापमान, हवा और वायुदाब लगातार बदलते रहते हैं। ऐसे वातावरण में एफएडीईसी तकनीक इंजन को स्थिर प्रदर्शन बनाए रखने में मदद करती है। (DRDO VTOL Logistics Drone)
बिना पायलट पूरा होगा मिशन
ड्रोन में मिलिट्री-ग्रेड ऑटोनॉमस फ्लाइट कंट्रोल सिस्टम लगाया जाएगा। यह सिस्टम पूर्व निर्धारित मार्ग के अनुसार ड्रोन को स्वतः उड़ाने में सक्षम होगी।
ड्रोन वेपॉइंट नेविगेशन, बाधाओं की पहचान और इमरजेंसी रिकवरी जैसी क्षमताओं से लैस होगा। यदि किसी वजह से कम्युनिकेश ब्लॉक हो जाए तो भी यह सुरक्षित तरीके से मिशन पूरा कर सकेगा या निर्धारित स्थान पर लौट सकेगा। (DRDO VTOL Logistics Drone)
नेविगेशन में होगी मल्टी-लेयर सिक्योरिटी
सीमावर्ती क्षेत्रों में नेविगेशन सिस्टम का सुरक्षित होना बेहद जरूरी है। इसलिए इस ड्रोन में जीपीएस, ग्लोनास और नाविक आधारित मल्टी-कॉन्स्टेलेशन जीएनएसएस सिस्टम लगाया जाएगा।
इसके साथ इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम का भी इस्तेमाल किया जाएगा। यदि सैटेलाइट सिग्नल ब्लॉक हो जाएं तब भी ड्रोन अपनी स्थिति का अनुमान लगाकर उड़ान जारी रख सकेगा।
ड्रोन में एंटी-जैमिंग और एंटी-स्पूफिंग तकनीक भी होगी ताकि इलेक्ट्रॉनिक युद्ध की स्थिति में इसकी कार्यक्षमता प्रभावित न हो। (DRDO VTOL Logistics Drone)
दो मीटर के भीतर सटीक डिलीवरी
प्रोजेक्ट के अनुसार पेलोड डिलीवरी की सटीकता दो मीटर सीईपी के भीतर रखी गई है।
सीईपी (सर्कुलर एरर प्रोबेबिलिटी) का अर्थ है कि ड्रोन द्वारा पहुंचाई गई सामग्री निर्धारित स्थान से औसतन केवल दो मीटर के दायरे में गिरेगी या उतरेगी। पहाड़ी इलाकों और छोटी चौकियों के लिए यह अत्यंत महत्वपूर्ण क्षमता मानी जाती है।
इससे गोला-बारूद, चिकित्सा सामग्री और अन्य आवश्यक उपकरण सही स्थान पर पहुंचाने में आसानी होगी।
बेहद कठिन मौसम में भी करेगा ऑपरेशन
ड्रोन को माइनस 40 डिग्री सेल्सियस से लेकर प्लस 60 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान में काम करने योग्य बनाया जाएगा। यह उड़ान के दौरान 50 से 60 किलोमीटर प्रति घंटे तक की हवाओं का सामना कर सकेगा। टेक-ऑफ और लैंडिंग के समय 25 से 30 किलोमीटर प्रति घंटे की हवा में भी ऑपरेशन संभव होगा। सीमावर्ती पर्वतीय क्षेत्रों में मौसम तेजी से बदलता है। इसलिए ऑल-वेदर क्षमता इस प्रोजेक्ट का महत्वपूर्ण हिस्सा है। (DRDO VTOL Logistics Drone)
सिक्योर कम्युनिकेशंस और साइबर सिक्योरिटी पर विशेष ध्यान
ड्रोन और ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन के बीच सुरक्षित डेटा कम्युनिकेशन के लिए एन्क्रिप्टेड मिलिट्री डेटालिंक का इस्तेमाल किया जाएगा।
सिस्टम में एईएस-256 स्तर की एन्क्रिप्शन तकनीक शामिल होगी। इसके अलावा साइबर हमलों, सिग्नल स्पूफिंग और इलेक्ट्रॉनिक व्यवधानों से सुरक्षा के लिए विशेष उपाय किए जाएंगे।
यह सुनिश्चित किया जाएगा कि मिशन से जुड़ी जानकारी किसी भी अनधिकृत व्यक्ति तक न पहुंचे।
ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन से होगी निगरानी
ड्रोन के ऑपपरेशन के लिए पोर्टेबल और रग्ड ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन विकसित किया जाएगा। यह स्टेशन वास्तविक समय में ड्रोन की स्थिति, गति, ऊंचाई और पेलोड की जानकारी प्रदर्शित करेगा। एक ही स्टेशन से कई ड्रोन की निगरानी और नियंत्रण भी संभव होगा। इसके साथ मिशन प्लानिंग और फ्लाइट मैनेजमेंट सॉफ्टवेयर भी विकसित किया जाएगा। (DRDO VTOL Logistics Drone)
आत्मनिर्भर रक्षा तकनीक पर जोर
प्रोजेक्ट के तहत केवल ड्रोन ही नहीं बल्कि इंजन, फ्लाइट कंट्रोल सिस्टम, नेविगेशन कंप्यूटर, डेटालिंक, मिशन सॉफ्टवेयर, पावर मैनेजमेंट सिस्टम और अन्य महत्वपूर्ण उप-प्रणालियों को भी स्वदेशी रूप से डेवलप करने पर जोर दिया गया है।
इसके लिए उद्योग, अनुसंधान संस्थानों और अकादमिक संगठनों से तकनीकी प्रस्ताव मांगे गए हैं। उनसे विकास समय, लागत, मानव संसाधन, अवसंरचना और स्वदेशी सामग्री के इस्तेमाल का विस्तृत विवरण भी मांगा गया है।
इस प्रोजेक्ट के लिए इंडस्ट्री, रिसर्च इंस्टीट्यूट्स और अकैडमिक ऑर्गेनाइजेशन्स से टेक्निकल प्रपोजल मांगे गए हैं। उनसे यह भी पूछा गया है कि इस ड्रोन सिस्टम को विकसित करने में कितना समय लगेगा, अनुमानित लागत क्या होगी, कितनी मैनपावर की जरूरत पड़ेगी, किस तरह का इंफ्रास्ट्रक्चर चाहिए होगा और सिस्टम में कितनी स्वदेशी सामग्री (इंडिजिनस कंटेंट) का इस्तेमाल किया जाएगा। (DRDO VTOL Logistics Drone)
Author
हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।





