📍नई दिल्ली/अवंतीपुरा | 11 Aug, 2026, 11:47 AM
IAF Logistics Drone System: ऊंचे पहाड़ों, बर्फ से ढके इलाकों और दुर्गम सीमावर्ती क्षेत्रों में तैनात सैनिकों तक समय पर जरूरी सामान पहुंचाना हमेशा से एक बड़ी चुनौती रही है। कई बार मौसम, खराब भौगोलिक इलाकों और सीमित परिवहन साधनों के कारण रसद सप्लाई प्रभावित होती है। सप्लाई प्रभावित न हो, इसके लिए भारतीय वायुसेना बड़ी तैयारी कर रही है।
रक्षा मंत्रालय ने जम्मू-कश्मीर के पुलवामा स्थित अवंतीपुरा एयर फोर्स स्टेशन के लिए एयर-बेस्ड लॉजिस्टिक पेलोड डिलीवरी सिस्टम की हायरिंग के लिए रिक्वेस्ट फॉर इन्फॉर्मेशन (आरएफआई) जारी किया है। इसका उद्देश्य ऐसे हवाई सिस्टम को शामिल करना है, जो आगे की चौकियों और सीमावर्ती इलाकों में तैनात सैनिकों तक दवाइयां, स्पेयर पार्ट्स, संचार उपकरण, गोला-बारूद और अन्य जरूरी सामग्री तेजी से पहुंचा सके।
IAF Logistics Drone System: सैनिकों तक अंतिम छोर की सप्लाई पहुंचाने पर जोर
भारतीय सेना और वायुसेना की कई चौकियां ऐसे इलाकों में स्थित हैं, जहां सड़क मार्ग से पहुंचना कठिन होता है। कुछ स्थानों पर मौसम कई दिनों तक हेलीकॉप्टर उड़ानों को भी प्रभावित कर देता है।
ऐसे में एयर-बेस्ड लॉजिस्टिक पेलोड डिलीवरी सिस्टम सैनिकों तक अंतिम छोर यानी लास्ट माइल सपोर्ट पहुंचाने का जरिया बनेगा। यह सिस्टम पारंपरिक परिवहन साधनों के बजाय ड्रोन, मानवरहित हवाई प्लेटफॉर्म (यूएवी) या इसी तरह की तकनीकों का इस्तेमाल करेगी।
आरएफआई के अनुसार यह सिस्टम रेगुलर सप्लाई के अलावा आपातकालीन परिस्थितियों में भी इस्तेमाल किया जा सकेगा। इसका इस्तेमाल दिन और रात दोनों समय किया जा सकेगा।
दो अलग-अलग ऊंचाइयों पर करेंगे काम
वायुसेना को दो तरह के सिस्टम्स की जरूरत है। पहली श्रेणी उन क्षेत्रों के लिए है, जहां लॉन्चिंग प्लेटफॉर्म समुद्र तल से 11,000 फीट तक की ऊंचाई पर हो सकता है। इस श्रेणी में सिस्टम कम से कम 18,000 फीट तक ऑपरेशन कर सके।
दूसरी श्रेणी और अधिक चुनौतीपूर्ण इलाकों के लिए है। इसमें सिस्टम को 15,000 फीट तक की ऊंचाई वाले क्षेत्रों से उड़ान भरने और कम से कम 24,000 फीट तक ऑपरेट करने की क्षमता रखनी होगी। (IAF Logistics Drone System)
50 किलोग्राम से लेकर 200 किलोग्राम तक पेलोड
वायुसेना ने न्यूनतम जरूरत के तौर पर 50 किलोग्राम पेलोड को कम से कम 50 किलोमीटर की एक तरफा दूरी तक पहुंचाने की क्षमता मांगी है।
हालांकि जरूरत इससे कहीं अधिक है। आरएफआई डॉक्यूमेंट्स के अनुसार वायुसेना ऐसे सिस्टम को प्राथमिकता देगी जो 200 किलोग्राम या उससे अधिक वजन का सामान 150 किलोमीटर या उससे ज्यादा दूरी तक पहुंचा सके।
इसका मतलब है कि भविष्य में यह सिस्टम केवल छोटे पैकेज नहीं, बल्कि भारी सैन्य सामग्री और आवश्यक उपकरण भी पहुंचाने में सक्षम हो सकती है।
बिना तैयार रनवे के भी उड़ान भर सकेगा सिस्टम
सीमावर्ती क्षेत्रों में हर जगह रनवे या हेलीपैड उपलब्ध नहीं होते। इसी वजह से वायुसेना ने ऐसी सिस्टम की मांग की है जो बिना तैयार क्षेत्र से भी उड़ान भर सके।
आरएफआई के अनुसार सिस्टम को अधिकतम 20 मीटर गुणा 20 मीटर के एरिया में लॉन्च और रिकवरी करने की क्षमता रखनी होगी। इससे पहाड़ी चौकियों, अस्थायी सैन्य ठिकानों और दूरस्थ इलाकों में भी इसका इस्तेमाल संभव होगा। (IAF Logistics Drone System)
पूरी तरह ऑटोनॉमस ऑपरेशन
वायुसेना ने केवल रिमोट कंट्रोल बेस्ड प्लेटफॉर्म की मांग नहीं की है। बल्कि उसका फोकस फुल ऑटोनॉमस ऑपरेशनल क्षमता पर है। सिस्टम में फुली ऑटोनोमस मोड, मैनुअल मोड और रिटर्न-टू-होम मोड होना जरूरी होगा।
यदि किसी कारण से संचार बाधित हो जाए या ऑपरेटर का नियंत्रण टूट जाए तो सिस्टम अपने निर्धारित बेस या सुरक्षित स्थान पर वापस लौट सकेगा। यह सुविधा कठिन मौसम और युद्ध जैसी परिस्थितियों में काफी महत्वपूर्ण है। (IAF Logistics Drone System)
दिन और रात दोनों समय निगरानी की सुविधा
हर सिस्टम में आधुनिक सेंसर लगाए जाएंगे। प्लेटफॉर्म में कलर डे वीडियो कैमरा और मोनोक्रोमैटिक नाइट थर्मल सेंसर होना अनिवार्य होगा। इससे ऑपरेटर दिन और रात दोनों समय निगरानी कर सकेंगे। थर्मल सेंसर कम दृश्यता और अंधेरे में भी लक्ष्य क्षेत्र की स्थिति देखने में मदद करेगा। (IAF Logistics Drone System)
इसके अलावा ऑटो ट्रैकिंग और डिटेक्शन जैसी सुविधाओं की भी मांग की गई है।
नेविगेशन को लेकर भी वायुसेना का कहना है कि सिस्टम को जीपीएस, ग्लोनास, नाविक और आईआरएनएसएस जैसे कई सैटेलाइट बेस्ड नेविगेशन नेटवर्क के साथ काम करने में सक्षम होना होगा।
वायुसेना ने यह भी कहा है कि इस्तेमालकर्ता जरूरत के अनुसार लैटिट्यूड-लॉन्गिट्यू बेस्ड कॉर्डिनेट्स या भारतीय मिलिट्री ग्रिड रेफरेंस सिस्टम का चयन कर सके। एक से अधिक नेविगेशन सोर्सेज का इस्तेमाल सिस्टम की विश्वसनीयता बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। (IAF Logistics Drone System)
जैमिंग और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध से सुरक्षा जरूरी
आधुनिक युद्धक्षेत्र में इलेक्ट्रॉनिक युद्ध एक बड़ी चुनौती बन चुका है। इसी वजह से आरएफआई में एंटी-जैमिंग और एंटी-स्पूफिंग क्षमता को महत्वपूर्ण जरूरत के रूप में शामिल किया गया है। सिस्टम को इलेक्ट्रॉनिक इंटरफेरेंस के खिलाफ हार्डन्ड होना होगा। साथ ही इसे मित्र और शत्रु की पहचान के लिए आईएफएफ सुविधा से भी लैस होना चाहिए। इसका उद्देश्य अपने ही हवाई प्लेटफॉर्म के साथ भ्रम या दुर्घटना की संभावना को कम करना है।
अत्यधिक गर्मी और कड़ाके की ठंड में भी ऑपरेशन
भारतीय सीमाओं पर मौसम की परिस्थितियां काफी अलग-अलग होती हैं। कहीं तापमान शून्य से कई डिग्री नीचे चला जाता है तो कहीं रेगिस्तानी क्षेत्रों में अत्यधिक गर्मी होती है। इसी कारण वायुसेना ने सिस्टम को माइनस 30 डिग्री सेल्सियस से लेकर प्लस 50 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक तापमान में ऑपरेशन योग्य बनाने की मांग की है। इसके लिए पर्यावरणीय परीक्षण भारतीय सैन्य मानकों के अनुरूप किए जाएंगे। (IAF Logistics Drone System)
सुरक्षित डेटा लिंक और एन्क्रिप्शन पर जोर
आरएफआई में कहा गया है कि ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन पोर्टेबल और मजबूत डिजाइन का होना चाहिए, ताकि उसे विभिन्न स्थानों पर आसानी से तैनात किया जा सके।
डेटा लिंक एस और सी बैंड फ्रीक्वेंसी रेंज में काम करेगा। इसके साथ 128 बिट या 256 बिट एईएस एन्क्रिप्शन का इस्तेमाल किया जाएगा।
इसका उद्देश्य डेटा को सुरक्षित रखना और कम्युनिकेशन को अवांछित हस्तक्षेप से बचाना है। (IAF Logistics Drone System)
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का फीचर!
आरएफआई में यह भी कहा गया है कि भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सिस्टम से अपग्रेड किया जा सके। सिस्टम में ऑनबोर्ड रिकॉर्डिंग, रियल टाइम वीडियो ट्रांसमिशन और एडवांस सर्विलंस सिस्टम्स उपलब्ध होनी चाहिए।
इसके अलावा पेलोड को सुरक्षित रखने, निर्धारित स्थान पर छोड़ने और जरूरत पड़ने पर इमरजेंसी रिलीज की सुविधा भी जरूरी हो। (IAF Logistics Drone System)
Author
हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।





