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क्या है सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान का नया गठबंधन? मक्का डिफेंस एग्रीमेंट के पीछे क्या है पूरी कहानी, भारत क्यों है सतर्क

सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान के नए सुरक्षा समझौते ने पश्चिम एशिया की रणनीतिक राजनीति में नई चर्चा छेड़ दी है। जानिए मक्का डिफेंस पैक्ट क्या है, इसके पीछे की वजहें क्या हैं और भारत के लिए इसका क्या महत्व हो सकता है...

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📍नई दिल्ली | 11 Aug, 2026, 2:39 PM

Mecca Defence Pact: पश्चिम एशिया में चल रहे उथल-पुथल से इन दिनों पूरी दुनिया चिंतित है। अमेरिका-ईरान संघर्ष, लाल सागर और होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास बढ़े तनाव, क्षेत्रीय सुरक्षा चिंताओं और बदलते सामरिक समीकरणों के बीच 7 अगस्त को सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान ने एक नए सुरक्षा समझौते पर दस्तखत किए। इस समझौते को मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट (एमजेडीए) नाम दिया गया है। इसे सामूहिक सुरक्षा (कलेक्टिव सिक्योरिटी) और सामूहिक प्रतिरोध (कलेक्टिव डिटरेंस) की व्यवस्था के रूप में देखा जा रहा है।

हालांकि समझौते के पूरे प्रावधान सार्वजनिक नहीं किए गए हैं, लेकिन तीनों देशों की ओर से जारी संयुक्त बयान में कहा गया है कि अगर किसी एक सदस्य देश पर हमला होता है तो उसे तीनों देशों पर हमला माना जाएगा। इसी एक पंक्ति ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी तरफ खींचा है।

वहीं, इसकी तुलना नाटो के अनुच्छेद-5 से की जा रही है, जिसके तहत किसी एक सदस्य पर हमला पूरे गठबंधन पर हमला माना जाता है। इसी वजह से कुछ हलकों में इसे संभावित “मुस्लिम नाटो” की दिशा में एक कदम भी बताया जा रहा है। हालांकि सऊदी अरब ने इस दावे को सार्वजनिक रूप से खारिज किया है।

Mecca Defence Pact: क्या है मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट?

मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट एक त्रिपक्षीय सुरक्षा समझौता है, जिसमें सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान शामिल हैं। यह समझौता ऐसे समय सामने आया है जब पश्चिम एशिया में सुरक्षा व्यवस्था को लेकर नए विकल्पों की तलाश जारी है।

संयुक्त बयान के अनुसार तीनों देश सुरक्षा मामलों में सहयोग बढ़ाएंगे और किसी सदस्य देश के खिलाफ होने वाले सैन्य हमले को सामूहिक खतरे के तौर पर देखेंगे। हालांकि अभी तक यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि किसी संकट की स्थिति में सैन्य सहायता किस तरह दी जाएगी, किस स्तर पर सैनिक तैनात होंगे या कमान और नियंत्रण व्यवस्था कैसी होगी।

यही कारण है कि समझौते को लेकर कई सवाल अभी भी बने हुए हैं।

“कलेक्टिव सिक्योरिटी” और “मिलिट्री अलायंस” में क्या है अंतर?

सैन्य गठबंधन का मतलब होता है कि सदस्य देश अपने दुश्मनों के खिलाफ एकजुट होकर लड़ाई लड़ें। जबकि सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था में देशों की कोशिश होती है कि विवाद बातचीत से सुलझाए जाएं और क्षेत्रीय स्थिरता बनी रहे। वहीं, मक्का समझौते को इसी नजरिये से देखा जाना चाहिए। (Mecca Defence Pact)

अमेरिका-ईरान संघर्ष के बाद क्यों बढ़ी इसकी चर्चा?

इस समझौते की पृष्ठभूमि को समझना जरूरी है। पश्चिम एशिया लंबे समय से सुरक्षा अस्थिरता का सामना कर रहा है। ईरान और उसके सहयोगी समूहों की गतिविधियां, इजरायल से जुड़े तनाव, समुद्री मार्गों की सुरक्षा और ऊर्जा ढांचे पर हमलों की आशंकाएं क्षेत्रीय देशों के लिए बड़ी चिंता रही हैं।

विशेष रूप से सऊदी अरब ने पिछले कुछ सालों में अपने तेल प्रतिष्ठानों और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे पर हमले झेले हैं। इसके अलावा होर्मुज जलडमरूमध्य और बाब-अल-मंदेब जैसे समुद्री मार्गों की सुरक्षा भी उसके लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि ग्लोबल एनर्जी सप्लाई का बड़ा हिस्सा इन्हीं रास्तों से गुजरता है।

इसी पृष्ठभूमि में सऊदी अरब ने सुरक्षा सहयोग के नए विकल्पों पर काम करना शुरू किया। इससे पहले सितंबर 2025 में सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच स्ट्रेटेजिक म्यूचुअल डिफेंस एग्रीमेंट (एसएमडीए) और बहुराष्ट्रीय समुद्री रक्षा गठबंधन जैसे प्रयास भी सामने आ चुके हैं। (Mecca Defence Pact)

क्या यह वास्तव में “मुस्लिम नाटो” है?

समझौते की घोषणा के बाद सबसे ज्यादा चर्चा इसी सवाल पर हुई। कई अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों और रणनीतिक विशेषज्ञों ने इसे संभावित मुस्लिम नाटो की शुरुआत बताया।

हालांकि सऊदी उप विदेश मंत्री ने स्पष्ट किया कि यह किसी सैन्य धुरी या सांप्रदायिक गठबंधन बनाने की कोशिश नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि इसका उद्देश्य हथियारों की दौड़ या परमाणु महत्वाकांक्षाओं को बढ़ावा देना नहीं है।

इसके बावजूद बहस इसलिए जारी है क्योंकि समझौते में यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि मुख्य खतरा किससे है। संयुक्त बयान में न तो ईरान का नाम लिया गया, न इजरायल का और न ही क्षेत्र में सक्रिय गैर-राज्य समूहों का।

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यही अस्पष्टता इस समझौते को लेकर अलग-अलग व्याख्याओं को जन्म दे रही है।

सऊदी अरब को क्यों करना पड़ा यह समझौता?

विश्लेषकों का मानना है कि इस समझौते का केंद्र बिंदु सऊदी अरब की सुरक्षा जरूरतें हैं। सऊदी अरब का रक्षा बजट लगभग 83 अरब डॉलर माना जाता है, जो दुनिया के सबसे बड़े रक्षा बजटों में शामिल है। इसके बावजूद उसे कई प्रकार की सुरक्षा चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।

इनमें ड्रोन और मिसाइल हमलों का खतरा, तेल प्रतिष्ठानों की सुरक्षा, समुद्री व्यापार मार्गों की रक्षा और आंतरिक सुरक्षा संबंधी चिंताएं शामिल हैं।

सऊदी अरब लंबे समय तक अमेरिकी सुरक्षा व्यवस्था पर निर्भर रहा है। लेकिन बदलती परिस्थितियों और क्षेत्रीय तनावों ने उसे वैकल्पिक साझेदारों की तलाश के लिए प्रेरित किया है। तुर्किये और पाकिस्तान इसी रणनीति का हिस्सा माने जा रहे हैं। (Mecca Defence Pact)

तुर्किये इस गठबंधन में क्या लेकर आया है?

तुर्किये आज पश्चिम एशिया और यूरोप के बीच स्थित एक महत्वपूर्ण सैन्य शक्ति है। पिछले एक दशक में उसने अपने रक्षा उद्योग का तेजी से विस्तार किया है।

तुर्किये के रक्षा निर्यात का आंकड़ा लगभग 10 अरब डॉलर सालाना तक पहुंच चुका है। ड्रोन, बख्तरबंद वाहन, मिसाइल सिस्टम, नौसैनिक प्लेटफॉर्म और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम्स के क्षेत्र में उसकी क्षमताएं लगातार बढ़ी हैं।

रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में तुर्किये की आत्मनिर्भरता भी बढ़ी है। यही वजह है कि सऊदी अरब और पाकिस्तान दोनों तुर्किये के रक्षा उद्योग में रुचि दिखा रहे हैं।

एमजेडीए के जरिए तीनों देशों के बीच सैन्य तकनीक, संयुक्त उत्पादन और रक्षा सहयोग बढ़ने की संभावना पर चर्चा हो रही है।

पाकिस्तान के लिए यह समझौता कितना महत्वपूर्ण है?

पाकिस्तान लंबे समय से सऊदी अरब के साथ घनिष्ठ रक्षा संबंध बनाए हुए है। पाकिस्तानी सेना में लगभग 6.6 लाख सक्रिय सैनिक हैं, जो उसे मुस्लिम वर्ल्ड की सबसे बड़ी सेनाओं में शामिल करता है।

सऊदी अरब में पहले भी पाकिस्तानी सैनिकों की तैनाती हो चुकी है। दोनों देशों के बीच सैन्य प्रशिक्षण और सुरक्षा सहयोग का लंबा इतिहास रहा है।

हालांकि पाकिस्तान के सामने अपनी कुछ मुश्किलें भी हैं। उसकी ईरान के साथ लगभग 900 किलोमीटर लंबी सीमा लगती है। देश के भीतर बड़ी शिया आबादी मौजूद है और उसे अफगानिस्तान तथा आंतरिक सुरक्षा से जुड़ी चुनौतियों का भी सामना करना पड़ता है।

इसी कारण कई विशेषज्ञ मानते हैं कि पाकिस्तान किसी ऐसे क्षेत्रीय संघर्ष में सीधे शामिल होने से बचना चाहेगा जो ईरान के साथ उसके संबंधों को प्रभावित करे। (Mecca Defence Pact)

क्या तीनों देशों के बीच मतभेद भी हैं?

यह समझौता जितना महत्वपूर्ण दिखाई देता है, उतना ही जटिल भी है। तीनों देशों के बीच कई ऐतिहासिक और राजनीतिक मतभेद मौजूद रहे हैं।

सऊदी अरब और तुर्किये आज भले साथ दिखाई दे रहे हों, लेकिन उनके बीच लंबे समय से अविश्वास भी रहा है।
ओटोमन साम्राज्य के दौर में अरब क्षेत्रों पर तुर्क शासन था। सऊदी शासकों के इतिहास में उस दौर की कई कड़वी यादें मौजूद हैं।

इसके अलावा तुर्किये के राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोआन अक्सर मुस्लिम दुनिया में नेतृत्व की भूमिका की बात करते रहे हैं। दूसरी तरफ सऊदी अरब खुद को इस्लाम के दो सबसे पवित्र स्थलों मक्का और मदीना का संरक्षक मानता है।

तुर्किये के राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोआन की नव-उस्मानी सोच और मुस्लिम दुनिया में नेतृत्व की महत्वाकांक्षा कई बार सऊदी दृष्टिकोण से टकराती रही है।

2018 में सऊदी पत्रकार जमाल खशोगी की इस्तांबुल स्थित सऊदी वाणिज्य दूतावास में हत्या के बाद तुर्किये और सऊदी अरब के रिश्तों में काफी तनाव आया था। तुर्किये से लीक हुई जानकारियों ने उस समय सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान की अंतरराष्ट्रीय छवि को नुकसान पहुंचाया था।

हालांकि बाद के सालों में दोनों देशों ने रिश्ते सुधारने की कोशिश की।

इसी तरह पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच भी कुछ मुद्दों पर मतभेद रहे हैं। अतीत में सैनिक तैनाती, कमान व्यवस्था और ईरान से जुड़े मामलों पर दोनों देशों के दृष्टिकोण पूरी तरह समान नहीं रहे। (Mecca Defence Pact)

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क्या यह गठबंधन सैन्य रूप से प्रभावी हो सकता है?

सैन्य दृष्टि से देखें तो तीनों देशों की क्षमताएं एक-दूसरे की पूरक हैं। सऊदी अरब के पास विशाल रक्षा बजट है। तुर्किये के पास विकसित हो रहा रक्षा उद्योग है। पाकिस्तान के पास बड़ा मिलिट्री स्ट्रक्चर और ऑपरेशनल अनुभव है।

यदि तीनों देश संयुक्त अभ्यास, वेपन सिस्टम्स की इंटरऑपरेबिलिटी, तकनीकी सहयोग और रक्षा उत्पादन पर काम करते हैं तो इससे उनकी सामूहिक क्षमता बढ़ सकती है।

इसी वजह से इस समझौते को केवल राजनीतिक बयानबाजी के रूप में नहीं देखा जा रहा, बल्कि इसे रक्षा सहयोग के एक संभावित ढांचे के रूप में भी समझा जा रहा है। (Mecca Defence Pact)

यह समझौता किसके खिलाफ है?

पहली नजर में ऐसा लग सकता है कि यह समझौता ईरान को ध्यान में रखकर किया गया है। क्योंकि हाल के वर्षों में ईरान और खाड़ी देशों के बीच तनाव रहा है। ईरान समर्थित समूहों ने कई बार क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियां पैदा की हैं।

लेकिन कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि इस समझौते का असली फोकस केवल ईरान नहीं है। उनके अनुसार तुर्किये के लिए इजराइल एक बड़ी रणनीतिक चुनौती बनकर उभरा है, खासकर सीरिया के घटनाक्रम के बाद।

तुर्किये और इजराइल के बीच बयानबाजी लगातार तेज हुई है। कई इजराइली नेताओं ने हाल के महीनों में तुर्किये को क्षेत्रीय चुनौती बताया है। वहीं तुर्किये के राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोआन भी इजराइल की सैन्य कार्रवाइयों की लगातार आलोचना करते रहे हैं। (Mecca Defence Pact)

क्या अमेरिका है इस समझौते के पीछे?

मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट को केवल सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान के बीच सुरक्षा समझौते के रूप में नहीं देखा जा रहा है। बल्कि इसे पश्चिम एशिया में बदलती अमेरिकी भूमिका से भी जोड़कर देखा जा रहा है।

दरअसल, पिछले कुछ सालों में अमेरिका ने पश्चिम एशिया में अपनी प्रत्यक्ष सैन्य मौजूदगी को सीमित करने की नीति अपनाई है। अफगानिस्तान से अमेरिकी वापसी, इंडो-पैसिफिक क्षेत्र पर बढ़ता फोकस और घरेलू प्राथमिकताओं ने क्षेत्रीय देशों को अपनी सुरक्षा व्यवस्था को लेकर नए विकल्प तलाशने के लिए प्रेरित किया है।

सऊदी अरब लंबे समय तक अमेरिकी की सुरक्षा में रहा है। 1991 के खाड़ी युद्ध से लेकर हाल के सालों तक अमेरिकी सैन्य उपस्थिति ने सऊदी सुरक्षा व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। लेकिन 2019 में सऊदी के अबकैक और खुरैस तेल प्रतिष्ठानों पर हुए ड्रोन और मिसाइल हमलों के बाद यह बहस तेज हुई कि क्षेत्रीय देशों को अपनी सुरक्षा के लिए केवल अमेरिका पर निर्भर नहीं रहना चाहिए।

इसी पृष्ठभूमि में सऊदी अरब ने चीन, तुर्किये और पाकिस्तान समेत कई देशों के साथ रक्षा सहयोग बढ़ाना शुरू किया। मक्का समझौते को भी इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।

हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि सऊदी अरब अमेरिका से दूरी बना रहा है। अमेरिका आज भी सऊदी अरब का सबसे बड़ा रक्षा साझेदार है। सऊदी वायुसेना के एफ-15 लड़ाकू विमान, पैट्रियट और थाड मिसाइल डिफेंस सिस्टम समेत कई प्रमुख हथियार अमेरिकी मूल के हैं।

वहीं, मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट का एक उद्देश्य यह भी हो सकता है कि क्षेत्रीय देश अपनी सुरक्षा जरूरतों के लिए एक अतिरिक्त गठबंधन तैयार रखें, ताकि किसी संकट की स्थिति में केवल बाहरी शक्तियों पर निर्भर न रहना पड़े। (Mecca Defence Pact)

चीन की भी अप्रत्यक्ष भूमिका?

विश्लेषकों के अनुसार इस पूरे समीकरण में चीन भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। तुर्किये और पाकिस्तान दोनों के चीन के साथ रक्षा संबंध मजबूत हैं। पाकिस्तान पहले से चीनी हथियारों और सैन्य तकनीक का बड़ा उपयोगकर्ता है। वहीं तुर्किये भी रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रहा है।

आज पाकिस्तान, तुर्किये और चीन कई रक्षा परियोजनाओं में सहयोग कर रहे हैं। इसी नेटवर्क के जरिए सऊदी अरब अपनी सैन्य औद्योगिक क्षमता बढ़ाना चाहता है। (Mecca Defence Pact)

भारत इस समझौते को कैसे देख रहा है?

भारत के लिए यह समझौता स्वाभाविक रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें पाकिस्तान शामिल है। नई दिल्ली की चिंता केवल पाकिस्तान तक सीमित नहीं है, बल्कि तुर्किये की दक्षिण एशिया में बढ़ती रणनीतिक सक्रियता पर भी नजर रखी जा रही है।

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तुर्किये पिछले कुछ सालों में पाकिस्तान के साथ रक्षा सहयोग बढ़ा चुका है। नौसैनिक परियोजनाओं, ड्रोन तकनीक और रक्षा उद्योग में दोनों देशों के बीच सहयोग बढ़ा है।

ऐसे में भारत इस नए सुरक्षा समझौते का अध्ययन कर रहा है कि इसका क्षेत्रीय सुरक्षा संतुलन पर क्या प्रभाव पड़ सकता है।

हालांकि कई विशेषज्ञों का मानना है कि भारत और सऊदी अरब के संबंधों की प्रकृति पाकिस्तान से अलग है। (Mecca Defence Pact)

भारत और सऊदी अरब के संबंध क्यों हैं महत्वपूर्ण?

भारत दुनिया के सबसे बड़े ऊर्जा आयातकों में से एक है। सऊदी अरब भारत के प्रमुख तेल आपूर्तिकर्ताओं में शामिल है। दोनों देशों के बीच व्यापार, निवेश, ऊर्जा और रणनीतिक सहयोग लगातार बढ़ा है।

भारत सऊदी अरब का एक महत्वपूर्ण आर्थिक साझेदार है। दोनों देशों के संबंध अपेक्षाकृत स्थिर और व्यावहारिक माने जाते हैं।

इसी कारण कई जानकारों का मानना है कि सऊदी अरब भारत को एक स्थिर और भरोसेमंद साझेदार के रूप में देखता है। इसलिए यह संभावना कम मानी जाती है कि रियाद भारत के खिलाफ किसी पाकिस्तानी सैन्य एजेंडे का समर्थन करेगा। (Mecca Defence Pact)

भारत को किस बात पर नजर रखनी चाहिए?

विशेषज्ञों के अनुसार भारत को तीन प्रमुख बातों पर नजर रखनी होगी। पहली, पाकिस्तान और तुर्किये के सैन्य सहयोग की गति। दूसरी, सऊदी अरब की रक्षा खरीद और रक्षा उत्पादन परियोजनाओं में पाकिस्तान तथा तुर्किये की भूमिका। तीसरी, चीन-पाकिस्तान-तुर्किये नेटवर्क के साथ सऊदी अरब के बढ़ते रणनीतिक संबंध।

हालांकि अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि मक्का समझौता क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को कितना बदल पाएगा। लेकिन इतना तय है कि इस समझौते ने पश्चिम एशिया की सुरक्षा राजनीति में एक नया समीकरण जोड़ दिया है, जिस पर भारत समेत कई देश करीबी नजर बनाए हुए हैं। (Mecca Defence Pact)

इजरायल, यूएई और भारत का भी बढ़ा जिक्र

मक्का समझौते के बाद कुछ रणनीतिक विश्लेषकों ने एक अन्य संभावित समीकरण की भी चर्चा शुरू की है। उनके अनुसार तुर्किये, पाकिस्तान और सऊदी अरब की बढ़ती निकटता के बीच इजरायल, संयुक्त अरब अमीरात और भारत के संबंधों का महत्व भी बढ़ सकता है।

भारत और इजरायल के बीच रक्षा सहयोग पिछले कई सालों में मजबूत हुआ है। ड्रोन, मिसाइल, निगरानी प्रणाली और सैन्य तकनीक के क्षेत्र में दोनों देशों की साझेदारी महत्वपूर्ण मानी जाती है।

संयुक्त अरब अमीरात भी भारत का प्रमुख रणनीतिक और आर्थिक साझेदार है। इसलिए पश्चिम एशिया में बदलते समीकरणों के बीच इन संबंधों पर भी नजर रखी जा रही है। (Mecca Defence Pact)

समझौते को लेकर सबसे बड़ा सवाल क्या है?

मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट को लेकर सबसे बड़ा सवाल यही है कि इसका वास्तविक स्वरूप क्या होगा। अभी तक केवल संयुक्त बयान सामने आया है। समझौते का पूरा विवरण सार्वजनिक नहीं किया गया है।

यह स्पष्ट नहीं है कि सामूहिक सुरक्षा की स्थिति में सदस्य देशों की क्या जिम्मेदारियां होंगी, सैन्य सहायता का स्वरूप क्या होगा, कमान व्यवस्था कैसे चलेगी और यह सहयोग किस स्तर तक जाएगा। यही वजह है कि फिलहाल यह समझौता जितना चर्चा में है, उतने ही सवाल भी इसके साथ जुड़े हुए हैं। (Mecca Defence Pact)

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    हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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