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भारतीय नौसेना की नई P-75i पनडुब्बियों में लगेगी स्वदेशी लिथियम-आयन बैटरी, अब और देर तक रहेंगी समंदर के अंदर

पी-75 इंडिया परियोजना के तहत छह नई पनडुब्बियों के लिए 20.64 मेगावाट-घंटा क्षमता वाला स्वदेशी लिथियम-आयन बैटरी सिस्टम विकसित करने की तैयारी, बैटरी मैनेजमेंट और सुरक्षा तकनीक पर विशेष जोर...

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📍नई दिल्ली/मुंबई | 11 Aug, 2026, 5:55 PM

P75 India submarine: समुद्र के भीतर लंबे समय तक छिपकर ऑपरेशन करने की क्षमता किसी भी आधुनिक पनडुब्बी की सबसे बड़ी ताकत मानी जाती है। पनडुब्बी जितनी देर तक बिना सतह पर आए पानी के भीतर रह सकती है, उसकी युद्धक क्षमता उतनी ही अधिक मानी जाती है। यही वजह है कि दुनिया की प्रमुख नौसेनाएं अब पारंपरिक लेड-एसिड बैटरियों की जगह एडवांस लिथियम-आयन बैटरी तकनीक पर तेजी से काम कर रही हैं।

भारतीय नौसेना भी अपनी अगली पीढ़ी की पनडुब्बियों के लिए इसी दिशा में बड़ा कदम उठा रही है। नई पीढ़ी की पनडुब्बियों को अधिक ऊर्जा, लंबी अंडरवाटर एंड्योरेंस, तेज चार्जिंग और बेहतर सुरक्षा देने के लिए स्वदेशी लिथियम-आयन बैटरी सिस्टम विकसित करने की प्रक्रिया शुरू की गई है। इस पहल का उद्देश्य केवल पनडुब्बियों की क्षमता बढ़ाना ही नहीं, बल्कि रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण ऊर्जा भंडारण तकनीक में आत्मनिर्भरता हासिल करना भी है।

मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड (एमडीएल) ने पी-75 इंडिया प्रोजेक्ट के लिए लिथियम-आयन बैटरी सिस्टम और बैटरी मैनेजमेंट सिस्टम के डिजाइन, डेवलपमेंट और सप्लाई के लिए कंपनियों से एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट मांगा है। इस बैटरी सिस्टम का उपयोग उन छह नई डीजल-इलेक्ट्रिक अटैक पनडुब्बियों में किया जाएगा, जिन्हें पी-75 इंडिया कार्यक्रम के तहत बनाया जाना है।

P75 India submarine: क्या है पी-75 इंडिया प्रोजेक्ट?

पी-75 इंडिया भारतीय नौसेना के सबसे महत्वपूर्ण पनडुब्बी प्रोजेक्ट्स में से एक है। इसके तहत छह अत्याधुनिक डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों का निर्माण किया जाना है। इन पनडुब्बियों में एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन यानी एआईपी तकनीक, एडवांस सेंसर, मॉडर्न वेपन सिस्टम और नेक्स्ट जनरेशन एनर्जी सिस्टम शामिल होगा।

वर्तमान में भारतीय नौसेना की कलवरी श्रेणी की पनडुब्बियां प्रोजेक्ट-75 के तहत बनाई गई हैं। जनवरी 2025 में आईएनएस वाग्शीर के शामिल होने के साथ इस सीरीज की सभी छह पनडुब्बियां नौसेना को मिल चुकी हैं। अब नौसेना का ध्यान अगली पीढ़ी की और अधिक सक्षम पनडुब्बियों पर है।

इसी नए प्रोजेक्ट में लिथियम-आयन बैटरी सिस्टम एक प्रमुख भूमिका निभाने वाला है।

एमडीएल ने क्या मांगा है?

एमडीएल ऐसी भारतीय कंपनियों को शॉर्टलिस्ट करना चाहती है जो लिथियम-आयन बैटरी सिस्टम और बैटरी मैनेजमेंट सिस्टम का डिजाइन, डेवलपमेंट, ट्रायल्स और सप्लाई कर सकें।

इन छह पनडुब्बियों के लिए लगभग 20.64 मेगावाट-घंटा क्षमता वाले बैटरी सिस्टम की जरूरत है। वहीं, बैटरी पैक का रेटेड वोल्टेज लगभग 740 से 800 वोल्ट डीसी होगा।

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कंपनियों को केवल बैटरी सेल उपलब्ध नहीं कराने होंगे, बल्कि पूरा बैटरी सिस्टम डेवलप करना होगा। इसमें सेल सिलेक्शन, बैटरी मॉड्यूल डिजाइन, बैटरी पैक, बैटरी मैनेजमेंट सिस्टम, कूलिंग सिस्टम, ट्रायल और प्रोडक्शन सीरीज तक की पूरी जिम्मेदारी शामिल होगी। (P75 India submarine)

पनडुब्बी के लिए बैटरी इतनी महत्वपूर्ण क्यों होती है?

पनडुब्बी को अक्सर समुद्र के भीतर एक चलता-फिरता इलेक्ट्रिसिटी सिस्टम कहा जाता है। जब पनडुब्बी सतह पर होती है या स्नॉर्कलिंग मोड में चलती है, तब डीजल जनरेटर बिजली बनाते हैं। लेकिन जब वह पूरी तरह पानी के भीतर होती है, तब उसे अपनी बैटरियों पर निर्भर रहना पड़ता है।

यही बैटरियां पनडुब्बी के सेंसर, नेविगेशन सिस्टम, वेपन कंट्रोल सिस्टम, जीवन रक्षक उपकरणों और प्रोपल्शन सिस्टम को ऊर्जा उपलब्ध कराती हैं।

यदि बैटरी की क्षमता अधिक होगी तो पनडुब्बी लंबे समय तक पानी के भीतर रह सकेगी। यही वजह है कि आधुनिक नौसैनिक युद्ध में बैटरी तकनीक को बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।

लिथियम-आयन बैटरी और लेड-एसिड बैटरी में क्या अंतर है?

दुनिया की अधिकांश पारंपरिक डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियां लंबे समय तक लेड-एसिड बैटरियों का उपयोग करती रही हैं। हालांकि नई पीढ़ी की पनडुब्बियां तेजी से लिथियम-आयन बैटरियों की ओर बढ़ रही हैं।

लिथियम-आयन बैटरियों की एनर्जी डेंसिटी अधिक होती है। इसका मतलब है कि समान जगह में अधिक ऊर्जा संग्रहित की जा सकती है। ये बैटरियां तेजी से चार्ज होती हैं, उनका जीवनकाल अधिक होता है और उनका रखरखाव भी अपेक्षाकृत कम होता है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ऐसी बैटरियां पनडुब्बी को अधिक समय तक पानी के भीतर रहने की क्षमता प्रदान करती हैं। इससे उसकी गोपनीयता और युद्धक क्षमता दोनों बढ़ती हैं। (P75 India submarine)

एलएफपी तकनीक को ही क्यों चुना गया?

वहीं, इस प्रोजेक्ट में केवल लिथियम-आयरन फॉस्फेट (एलएफपी) रसायन तकनीक का उपयोग किया जाएगा। एलएफपी बैटरियां अन्य लिथियम-आयन तकनीकों की तुलना में अधिक सुरक्षित मानी जाती हैं। इनमें थर्मल रनअवे यानी अत्यधिक गर्म होकर आग लगने का खतरा कम होता है।

पनडुब्बी जैसे बंद और संवेदनशील वातावरण में सुरक्षा सबसे बड़ी प्राथमिकता होती है। इसलिए एलएफपी तकनीक को चुना गया है। इसके अलावा एलएफपी बैटरियां लंबी आयु और स्थिर प्रदर्शन के लिए भी जानी जाती हैं।

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बैटरी मैनेजमेंट सिस्टम क्या करेगा?

केवल बैटरी होना काफी नहीं होता। आधुनिक बैटरी सिस्टम में बैटरी मैनेजमेंट सिस्टम यानी बीएमएस भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है। बीएमएस बैटरी के हर सेल की निगरानी करता है। यह तापमान, वोल्टेज, चार्ज स्तर और प्रदर्शन पर लगातार नजर रखता है।

यदि किसी सेल में असामान्य गतिविधि दिखाई देती है तो बीएमएस तुरंत चेतावनी देता है और आवश्यक सुरक्षा कदम उठाता है। पनडुब्बी में जहां हजारों बैटरी सेल एक साथ जुड़े होते हैं, वहां बीएमएस पूरी प्रणाली की सुरक्षा और विश्वसनीयता सुनिश्चित करता है। (P75 India submarine)

कूलिंग सिस्टम भी होगा बेहद महत्वपूर्ण

ज्यादा क्षमता वाली बैटरियां ऑपरेशन के दौरान हीट पैदा करती हैं। यदि इस हीट को कंट्रोल नहीं किया जाए तो प्रदर्शन प्रभावित हो सकता है। इसी कारण एमडीएल ने कंपनियों से प्रभावी थर्मल मैनेजमेंट यानी कूलिंग सिस्टम विकसित करने की मांग की है। यह प्रणाली बैटरियों को सुरक्षित तापमान पर बनाए रखेगी और लंबे समय तक उनकी कार्यक्षमता सुनिश्चित करेगी।

भारत में ही बनेंगे बैटरी सेल

ईओआई की सबसे महत्वपूर्ण शर्तों में से एक यह है कि सभी बैटरी सेल भारत में निर्मित होने चाहिए। एमडीएल ने यह भी स्पष्ट किया है कि उत्पादन तकनीक किसी ऐसे देश से नहीं ली जा सकती जो भारत के साथ भूमि सीमा साझा करता हो। यह शर्त राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक आत्मनिर्भरता को ध्यान में रखकर रखी गई है।

डिफेंस सेक्टर में इस्तेमाल होने वाले महत्वपूर्ण उपकरणों में विदेशी निर्भरता कम करना सरकार की प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल है। (P75 India submarine)

केवल नई पनडुब्बियां ही नहीं, पुरानी पनडुब्बियों पर भी फोकस

जहां एक ओर पी-75 इंडिया प्रोजेक्ट के लिए नई बैटरी टेक्नोलॉजी डेवलप की जा रही है, वहीं दूसरी ओर भारतीय नौसेना अपनी मौजूदा कलवरी श्रेणी की पनडुब्बियों के मेंटेनेंस और लाइफसाइकिल सपोर्ट पर भी ध्यान दे रही है।

हाल ही में नौसेना ने पी-75 बेड़े के लिए स्टैटिक फ्रीक्वेंसी कन्वर्टर और स्टीयरिंग गियर कंसोल जैसे महत्वपूर्ण स्पेयर पार्ट्स की खरीद प्रक्रिया शुरू की है। (P75 India submarine)

ये ऐसे उपकरण हैं जो पनडुब्बी के इलेक्ट्रिकल सिस्टम और डायरेक्शन कंट्रोल के लिए बेहद महत्वपूर्ण होते हैं।

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क्या करते हैं स्टैटिक फ्रीक्वेंसी कन्वर्टर?

पनडुब्बी के भीतर अलग-अलग सोर्सेज से आने वाली बिजली को कंट्रोल और स्टेबल बनाना जरूरी होता है।

स्टैटिक फ्रीक्वेंसी कन्वर्टर यही काम करते हैं। वे बिजली को ऐसे रूप में बदलते हैं जिसे पनडुब्बी के संवेदनशील उपकरण सुरक्षित रूप से उपयोग कर सकें।

यदि यह सिस्टम खराब हो जाए तो नेविगेशन, निगरानी और हथियार नियंत्रण जैसी महत्वपूर्ण प्रणालियां प्रभावित हो सकती हैं। (P75 India submarine)

क्यों जरूरी हैं स्टीयरिंग गियर कंसोल ?

स्टीयरिंग गियर कंसोल पनडुब्बी की दिशा और गहराई नियंत्रण प्रणाली का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

इन्हीं के माध्यम से चालक दल पनडुब्बी को मोड़ता है, उसकी गहराई नियंत्रित करता है और सुरक्षित ऑपरेशन सुनिश्चित करता है। ऐसे उपकरणों के लिए उच्च गुणवत्ता वाले स्पेयर पार्ट्स की उपलब्धता आवश्यक होती है क्योंकि इनकी विफलता गंभीर परिचालन जोखिम पैदा कर सकती है।

प्रोटोटाइप से शुरू होगी प्रक्रिया

एमडीएल सीधे प्रोडक्शन नहीं करेगा। सबसे पहले कंपनियों को प्रोटोटाइप विकसित करना होगा। इसके लिए भूमि आधारित परीक्षण सुविधा की व्यवस्था भी संबंधित कंपनी को स्वयं करनी होगी। प्रोटोटाइप के सफल परीक्षण के बाद ही प्रोडक्शन सीरीज शुरू होगी।

कंपनियों को तकनीक सत्यापन प्रक्रिया, रिस्क मैनेजमेंट प्लान और विस्तृत विकास समयसीमा भी प्रस्तुत करनी होगी। (P75 India submarine)

36 महीने में पूरा करना होगा काम

वहीं, ऑर्डर मिलने के बाद एक सेट के डिजाइन, विकास, परीक्षण और आपूर्ति का काम 36 महीने के भीतर पूरा करना होगा। इसमें प्रोटोटाइप परीक्षण भी शामिल होगा। इसके बाद प्रोडक्शन सीरीज के लिए आगे की प्रक्रिया शुरू होगी। (P75 India submarine)

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  • herry passport

    हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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