📍नई दिल्ली | 11 Aug, 2026, 7:00 AM
Indian Navy Loitering Munition: भारतीय नौसेना अपने वॉरशिप्स से लंबी दूरी तक काम करने वाले लॉइटरिंग म्यूनिशन को शामिल करने की तैयारी कर रही है। रक्षा मंत्रालय ने लॉइटरिंग म्यूनिशन-मीडियम रेंज यानी एलएम (एमआर) के लिए रिक्वेस्ट फॉर इन्फॉर्मेशन (आरएफआई) जारी किया है। इसमें ऐसे सिस्टम की जानकारी मांगी गई है, जिसे नौसेना के जहाजों से लॉन्च किया जा सके और जो समुद्र के साथ-साथ जमीन पर भी टारगेट्स के खिलाफ इस्तेमाल हो सके।
Indian Navy Loitering Munition: जहाज से लॉन्च होंगे लॉइटरिंग म्यूनिशन
नौसेना के लिए प्रस्तावित एलएम (एमआर) सामान्य ड्रोन से अलग होगा। इसे वॉरशिप पर कैनिस्टर में रखा जाएगा और जरूरत के समय जहाज से लॉन्च किया जा सकेगा।
आरएफआई में इसे समुद्र आधारित यानी शिप-माउंटेड सिस्टम के तौर पर डेवलप किया जाएगा। इसका इस्तेमाल समुद्र और जमीन पर मौजूद टारगेट्स के खिलाफ किया जा सकेगा। साथ ही, सिस्टम दिन और रात तथा अलग-अलग मौसम की परिस्थितियों में काम कर सके।
वहीं, इसके साथ मिशन कंट्रोल कंसोल, ग्राउंड कंट्रोल कंसोल, ग्राउंड डेटा टर्मिनल, लॉन्चर, रिकॉर्डिंग यूनिट और प्रशिक्षण के लिए एम्बेडेड सिम्युलेटर भी शामिल होंगे।
इसे भारतीय नौसेना के कॉम्बैट मैनेजमेंट सिस्टम से भी जोड़ा जाएगा। साथ ही, जहाज के सेंसरों से मिलने वाली जानकारी को लॉइटरिंग म्यूनिशन के मिशन सिस्टम के साथ इस्तेमाल किया जा सकेगा।
1,000 किलोमीटर की रेंज, 9 घंटे तक हवा में रहने की क्षमता
आरएफआई में एलएम (एमआर) की उड़ान क्षमता को लेकर स्पष्ट मापदंड दिए गए हैं। इसकी अधिकतम रेंज कम से कम 1,000 किलोमीटर होनी चाहिए। वहीं इसे कम से कम 9 घंटे तक हवा में रहने की क्षमता रखनी होगी।
लॉइटरिंग के दौरान इसकी न्यूनतम गति 75 नॉट और हमले के दौरान न्यूनतम गति 200 नॉट रखी गई है। इसकी अधिकतम उड़ान ऊंचाई 15,000 फीट होगी।
वहीं, इसका सीईपी यानी सर्कुलर एरर प्रोबेबल एक मीटर से कम हो। आरएफआई में आरएफ और सैटकॉम दोनों तरह के डेटा लिंक का प्रावधान भी रखा गया है।
इसका आकार भी सीमित रखा गया है। एलएम की लंबाई अधिकतम 2.5 मीटर और विंगस्पैन अधिकतम तीन मीटर होना चाहिए। इसका रडार क्रॉस सेक्शन यानी आरसीएस भी एक वर्ग मीटर से ज्यादा नहीं होना चाहिए। (Indian Navy Loitering Munition)
डेटा लिंक टूटने पर भी रहेगी नेविगेशन क्षमता
इस सिस्टम में ऑटोमैटिक नेविगेशन की क्षमता भी होनी चाहिए। ऑपरेटर आरएफ या सैटकॉम डेटा लिंक के जरिए से एलएम को कंट्रोल कर सकेगा। मिशन शुरू करने से पहले कई कॉर्डिनेट्स तय किए जा सकेंगे। इसके बाद एलएम इन कॉर्डिनेट्स के बीच अपने आप नेविगेट कर सकेगा।
अगर उड़ान के दौरान डेटा लिंक टूट जाता है तो एलएम के पास आखिरी ज्ञात ग्राउंड डेटा टर्मिनल की स्थिति की ओर वापस जाने का सिस्टम होगा। वहीं, अगर डेटा लिंक दोबारा स्थापित नहीं होता है तो पहले से तय टर्मिनेशन प्वाइंट की तरफ ऑटोमैटिक रूप से जाने की क्षमता भी हो।
एक ऑपरेटर संभाल सकेगा 10 एलएम
इस सिस्टम का मिशन कंट्रोल कंसोल इसका अहम हिस्सा होगा। आरएफआई में एमसीसी के लिए ओपन आर्किटेक्चर की मांग की गई है। इससे जरूरत के अनुसार नए सेंसर और अन्य उपकरण जोड़े जा सकेंगे।
एक ऑपरेटर एक समय में अधिकतम 10 लॉइटरिंग म्यूनिशन संभाल सकेगा। ऑपरेटर मिशन की योजना बनाने, एलएम की स्थिति देखने और मिशन के दौरान उपलब्ध डेटा का इस्तेमाल करने में सक्षम होगा।
एमसीसी को एलएम के अपने सेंसरों के साथ-साथ जहाज के सेंसरों से मिलने वाली जानकारी को भी एक साथ इस्तेमाल करने में सक्षम होना होगा। (Indian Navy Loitering Munition)
दूसरे जहाज से किया जा सकेगा कंट्रोल
आरएफआई में एलएम के कंट्रोल को एक प्लेटफॉर्म से दूसरे प्लेटफॉर्म पर ट्रांसफर करने की सुविधा भी होनी चाहिए। इसमें जिस जहाज से एलएम लॉन्च किया गया है, उसके अलावा दूसरे जहाज पर मौजूद मिशन कंट्रोल कंसोल और ग्राउंड डेटा टर्मिनल के जरिए भी उसका कंट्रोल लिया जा सकेगा।
इसके लिए दूसरे जहाज पर अलग लॉन्चर या ग्राउंड कंट्रोल कंसोल होना जरूरी नहीं होगा। इससे नौसेना के अलग-अलग प्लेटफॉर्म के बीच एलएम के कंट्रोल को शेयर करने का सिस्टम बनाया जा सकेगा। (Indian Navy Loitering Munition)
ईओ और आईआर सीकर से होगी निगरानी
एलएम में इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल और इन्फ्रारेड यानी ईओ/आईआर सीकर भी लगाया जाएगा। यह सीकर नेविगेशन, निगरानी, टारगेट की पहचान और हमले से जुड़े कामों में इस्तेमाल होगा।
इसमें फॉरवर्ड लुकिंग इन्फ्रारेड यानी एफएलआईआर के साथ एमडब्ल्यूआईआर क्षमता मांगी गई है। इसके अलावा डे कैमरा के साथ एसडब्ल्यूआईआर क्षमता भी रखी गई है।
वहीं, जहाज पर एलएम को कैनिस्टर में रखा जाएगा। कैनिस्टर को समुद्री वातावरण में सुरक्षित भंडारण, परिवहन, हैंडलिंग और लॉन्च के लिए तैयार किया जाना होगा।
एलएम को कैनिस्टर में रखने से पहले ईंधन भरने की व्यवस्था भी हो। इससे जरूरत के अनुसार इसे डी-फ्यूल्ड स्थिति में स्टोर किया जा सकेगा। कैनिस्टर से लॉन्च के लिए बूस्टर की भी जरूरत होगी। इसके अलावा जहाज पर किसी आपात स्थिति में एलएम को अलग करने के लिए इमरजेंसी जेटिसन की व्यवस्था भी रखी गई है।
नौसेना के सेंसरों से जुड़ेगा सिस्टम
एलएम (एमआर) को जहाज के मौजूदा डेटा नेटवर्क से जोड़ा जाएगा। आरएफआई में शिप डेटा नेटवर्क के जरिए कॉम्बैट मैनेजमेंट सिस्टम, जीएनएसएस, नाविक, जायरो और एनेमोमीटर जैसे सिस्टम के साथ इंटरफेस की जरूरत बताई गई है।
इसके साथ इलेक्ट्रॉनिक सपोर्ट मेजर्स यानी ईएसएम, निगरानी रडार और अर्ली वार्निंग रडार से भी डेटा लेने की क्षमता रखनी होगी। शिप वेपन इंटरलॉक एंड सेफ्टी सिस्टम के साथ भी इसका इंटरफेस होना चाहिए।
सिस्टम जीएनएसएस-डिनाइड एनवॉयरमेंट में भी काम कर सके। यानी ऐसी स्थिति में भी नेविगेशन की क्षमता बनी रहनी चाहिए जब सामान्य सैटेलाइट नेविगेशन संकेत उपलब्ध नहीं हों। (Indian Navy Loitering Munition)
समुद्र के कठिन माहौल में काम करने की क्षमता
युद्धपोत पर इस्तेमाल होने वाले सिस्टम को समुद्र की कठिन परिस्थितियों में काम करना होगा। एलएम प्रणाली को 40 डिग्री सेल्सियस तापमान पर 95 प्रतिशत रिलेटिव ह्यूमिडिटी और 50 नॉट तक की हवा में काम करने योग्य होना चाहिए। इसकी ऑपरेशनल तापमान सीमा माइनस 20 डिग्री सेल्सियस से प्लस 60 डिग्री सेल्सियस तक रखी गई है।
जहाज के इलेक्ट्रिकल सिस्टम को देखते हुए सिस्टम को 380 से 415 वोल्ट की इलेक्ट्रिकल सप्लाई पर काम करने में सक्षम होना होगा। (Indian Navy Loitering Munition)
10 साल की सर्विस लाइफ, अपग्रेड की हो सुविधा
आरएफआई के मुताबिक एलएम (एमआर) के महत्वपूर्ण हिस्सों की सेवा अवधि कम से कम 10 साल होनी चाहिए। इसे आगे 10 साल तक बढ़ाने की क्षमता भी रखी गई है।
वहीं यह सिस्टम मॉड्यूलर और ओपन आर्किटेक्चर पर बेस्ड हो। इसमें प्लग-एंड-प्ले सुविधा होगी, जिससे जरूरत के अनुसार नए उपकरण और सेंसर जोड़े जा सकेंगे। मैन्युफैक्चरर को सिस्टम के लिए हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर अपग्रेड की सुविधा भी देनी होगी। अपग्रेड इस तरह किए जाए कि मौजूदा सिस्टम में बड़े बदलाव की जरूरत कम से कम हो। (Indian Navy Loitering Munition)
भारतीय कंपनियों से मांगी गई जानकारी
रक्षा मंत्रालय ने आरएफआई के जरिए कंपनियों से उनकी तकनीकी और उत्पादन क्षमता की जानकारी मांगी है। इसमें यह भी पूछा गया है कि वे एलएम (एमआर) को बाय इंडियन-आईडीडीएम या बाय इंडियन कैटेगरी के तहत उपलब्ध करा सकती हैं या नहीं।
बाय इंडियन-आईडीडीएम के लिए स्वदेशी डिजाइन और कम से कम 50 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री से जुड़ी जानकारी मांगी गई है। बाय इंडियन श्रेणी में कम से कम 60 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री से संबंधित जानकारी मांगी गयी है।
इसके अलावा कंपनियों से उत्पादन क्षमता, जीएनएसएस-डिनाइड और एंटी-जैमिंग क्षमता, भारत में रखरखाव और ओवरहॉल की सुविधा तथा सप्लाई से जुड़े अनुभव की जानकारी भी मांगी गई है। (Indian Navy Loitering Munition)
Author
हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।





