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BrahMos Missile Export: ब्रह्मोस मिसाइल बेचने के लिए इन दो आसियान देशों से चल रही बातचीत, इस साल के आखिर तक फाइनल हो सकती है डील

दक्षिण-पूर्व एशिया के कई देश इन दिनों में समुद्री विवादों और सुरक्षा चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। चीन के बढ़ते प्रभाव और समुद्री दावों के बीच इन देशों को एक ऐसी मिसाइल सिस्टम की जरूरत थी जो तेज, भरोसेमंद और सटीक हो...

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📍नई दिल्ली | 24 Oct, 2025, 1:14 PM

BrahMos Missile Export: भारत अपनी सबसे ताकतवर ब्रह्मोस सुपरसॉनिक क्रूज मिसाइल को दो आसियान देशों को बेचने की तैयारी कर रहा है। दक्षिण-पूर्व एशिया के दो और देशों, वियतनाम और इंडोनेशिया के साथ कुल 455 मिलियन अमेरिकी डॉलर (करीब 3,800 करोड़ रुपये) के दो बड़े सौदों पर इस साल दिसंबर तक दस्तखत होने की उम्मीद है। रक्षा और सुरक्षा के वरिष्ठ अधिकारियों ने इसकी पुष्टि की है।

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यह भारत के रक्षा निर्यात इतिहास के सबसे बड़े सौदों में से एक होगा। इससे न केवल भारत की ‘एक्ट ईस्ट पॉलिसी’ को मजबूती मिलेगी, बल्कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की रणनीतिक मौजूदगी भी और मजबूत होगी।

ब्रह्मोस मिसाइल को भारत के डीआरडीओ और रूस की एनपीओ माशिनोस्ट्रोयेनिया के संयुक्त सहयोग के साथ डेवलप किया था। यह मिसाइल मैक 3 की रफ्तार से उड़ान भर सकती है और 400 किलोमीटर से अधिक दूरी पर भी सटीक निशाना साध सकती है। इसे जमीन, समुद्र और हवा तीनों प्लेटफॉर्म से दागा जा सकता है।

फिलीपींस के साथ 2022 में हुआ सौदा सफल रहा था। भारत ने फिलिपींस को 375 मिलियन डॉलर की डील के तहत ब्रह्मोस का कोस्टल डिफेंस सिस्टम दिया था। जिसके बाद आसियान देशों का भारत पर भरोसा और बढ़ा है। फिलिपींस में ब्रह्मोस की सफलता के बाद अब वियतनाम और इंडोनेशिया भी इसे अपने नेवल एंड कोस्टल सिक्युरिटी सिस्टम्स का हिस्सा बनाना चाहते हैं। रक्षा सूत्रों के अनुसार, दोनों देशों के साथ बातचीत अंतिम चरण में है और कॉन्ट्रैक्ट दिसंबर तक साइन हो जाएंगे।

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BrahMos Missile Export: आसियान देशों में क्यों बढ़ रही है ब्रह्मोस की मांग

दक्षिण-पूर्व एशिया के कई देश इन दिनों में समुद्री विवादों और सुरक्षा चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। चीन के बढ़ते प्रभाव और समुद्री दावों के बीच इन देशों को एक ऐसी मिसाइल सिस्टम की जरूरत थी जो तेज, भरोसेमंद और सटीक हो। ब्रह्मोस इस जरूरत को हर तरह से पूरा करती है।

यह मिसाइल कम ऊंचाई पर उड़ती है, इसे ट्रैक करना कठिन है और यह भारी पेलोड ले जा सकती है। इसके रखरखाव की लागत भी पश्चिमी देशों के वेपन सिस्टम की तुलना में कम है। साथ ही, भारत इन देशों को ट्रेनिंग, तकनीकी मदद और लॉजिस्टिक सपोर्ट भी दे रहा है।

भारत का सबसे बड़ा लाभ यह है कि वह किसी सैन्य गठबंधन का हिस्सा नहीं है। इस कारण वह बिना किसी राजनीतिक शर्त या दबाव के हथियारों की सप्लाई करता है। यही वजह है कि आसियान देशों में भारत के डिफेंस इक्विपमेंट्स पर भरोसा बढ़ा है।

ग्रीस, ब्राजील और आर्मेनिया भी इच्छुक

सूत्रों ने बताया कि ग्रीस, ब्राजील और आर्मेनिया के साथ भी ब्रह्मोस को लेकर बात चल रही है। दो अरब डॉलर से ज्यादा के सौदे संभव हैं। ग्रीस सिटी टाइम्स का कहना है कि ईस्टर्न एजियन द्वीपों पर ब्रह्मोस लगाने से तुर्की नौसेना को रोकना आसान होगा। पेंता पोस्टाग्मा भी ब्रह्मोस को तुर्की के खिलाफ समुद्री वर्चस्व के लिए जरूरी बता चुका है। वहीं, ब्राजील अटलांटिक में अपनी सुरक्षा बढ़ाने के लिए ब्रह्मोस पर विचार कर रहा है।

लगातार बढ़ रहा डिफेंस एक्सपोर्ट

वहीं, ब्रह्मोस एक्सपोर्ट कॉन्ट्रैक्ट मिलने से भारत के रक्षा उद्योग को बड़ा आर्थिक लाभ मिलेगा। लखनऊ स्थित ब्रह्मोस इंटीग्रेशन एंड टेस्टिंग फैसिलिटी में हर साल करीब 100 मिसाइलें बनाने की क्षमता है। इससे भारत की न केवल उत्पादन क्षमता बढ़ेगी बल्कि रोजगार के अवसरों में भी बढ़ोतरी होगी।

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रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भी कहा है कि ब्रह्मोस सिर्फ एक हथियार नहीं है, बल्कि भारत की तकनीकी आत्मनिर्भरता और इनोवेशन की पहचान है। उन्होंने हाल ही में कहा था कि दुनिया अब भारत की डिफेंस तकनीक पर भरोसा करती है और यह हमारे आत्मनिर्भर भारत मिशन के लिए बड़ी उपलब्धि है।

भारत का रक्षा निर्यात पिछले कुछ सालों में तेजी से बढ़ा है। वित्त वर्ष 2024–25 में भारत ने 2.76 बिलियन डॉलर का डिफेंस एक्सपोर्ट किया, जो पिछले वर्ष की तुलना में 12 फीसदी अधिक है। अब भारत के रक्षा उत्पाद 100 से अधिक देशों में एक्सपोर्ट किए जा रहे हैं।

BrahMos Missile Export: 800 किमी रेंज वाला वर्जन भी तैयार

इसके अलावा भारत ब्रह्मोस का 800 किमी रेंज वाला वर्जन भी तैयार कर रहा है। हाल ही में बंगाल की खाड़ी में ब्रह्मोस का सफल परीक्षण भी किया गया था। यह परीक्षण अक्टूबर महीने में हुआ। मिसाइल में नया रामजेट इंजन और हाइब्रिड नेविगेशन सिस्टम लगाया गया, जो इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम और जीएनएसएस का कंपोजिशन है। इससे जैमिंग से बचाव होता है। वहीं इसकी सटीकता एक मीटर से भी कम रही। ब्रह्मोस पहले 290 किलोमीटर तक मार कर सकती थी। एमटीसीआर नियमों के बाद 2017 में इसे 450-500 किलोमीटर तक बढ़ाया गया। अब 800 किलोमीटर रेंज के लिए ईंधन टैंक बढ़ाया गया है। सॉफ्टवेयर में बदलाव किया गया है। साथ ही कंपोजिट मैटेरियल का इस्तेमाल हुआ है। इससे यह ईंधन ज्यादा ले जा सकती है। डीआरडीओ सूत्रों ने बताया कि 800 किलोमीटर रेंज वाला वर्जन 2027 के आखिर तक पूरी तरह तैयार हो जाएगा।

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    हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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