📍नई दिल्ली | 13 Aug, 2026, 7:00 AM
Dhanush gun production delay: संसद की लोक लेखा समिति यानी पब्लिक अकाउंट्स कमेटी (पीएसी) ने भारतीय सेना की स्वदेशी धनुष 155 एमएम/45 कैलिबर तोप के उत्पादन में हुई देरी पर चिंता जताई है। से जुड़ी कई अहम बातें सामने आई हैं। यह रिपोर्ट सिर्फ धनुष तोप की डिलीवरी में देरी की बात नहीं करती, बल्कि यह भी बताती है कि इस सिस्टम को भारत में विकसित करते समय किन तकनीकी मुश्किलों, इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी और स्किल गैप का सामना करना पड़ा।
पीएसी की रिपोर्ट के मुताबिक धनुष प्रोजेक्ट की शुरुआत 2011 में हुई थी। इसका मकसद भारतीय सेना के लिए 155 एमएम/45 कैलिबर की इलेक्ट्रॉनिक और मैकेनिकल रूप से अपग्रेडेड तोप तैयार करना था। इस काम में पहले ऑर्डनेंस फैक्ट्री बोर्ड यानी ओएफबी की प्रमुख भूमिका थी। बाद में ओएफबी के कॉरपोरेटाइजेशन के बाद एआरमामेंट्स से जुड़ी कंपनी एआईडब्ल्यूईआईएल यानी एडवांस्ड वेपन्स एंड इक्विपमेंट इंडिया लिमिटेड (AWEIL) उत्पादन से जुड़ी।
Dhanush gun production delay: क्यों पड़ी धनुष प्रोजेक्ट की जरूरत?
भारतीय सेना के पास लंबे समय से 155 एमएम/39 कैलिबर की बोफोर्स तोपें मौजूद थीं। इन तोपों की खरीद का कॉन्ट्रैक्ट 1986 में स्वीडन की कंपनी एबी बोफोर्स के साथ हुआ था। इस समझौते में टेक्नोलॉजी ट्रांसफर भी शामिल था, जिससे भारत में कुछ असेंबली और सब-असेंबली तैयार की जाती थीं।
लेकिन लंबे समय तक नई आर्टिलरी गन शामिल नहीं की जा सकी। साल 2009 तक 39 कैलिबर तोपों की कमी काफी बढ़ गई थी। इसके बाद भारत ने अपनी मौजूदा क्षमता के आधार पर नई तोप विकसित करने का रास्ता चुना। डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल यानी डीएसी ने अक्टूबर 2011 में 155 एमएम/39 और 45 कैलिबर गन की खरीद के लिए ‘बाय इंडियन’ श्रेणी में मंजूरी दी। इसके बाद धनुष प्रोजेक्ट शुरू हुआ।
शुरुआत में ही सामने आई तकनीकी चुनौती
रिपोर्ट में रक्षा मंत्रालय ने बताया कि भारत में इससे पहले ऐसी आर्टिलरी गन का डिजाइन और निर्माण नहीं किया गया था। पहले दो प्रोटोटाइप डीएसी की मंजूरी के करीब 12 महीने के भीतर तैयार किए गए। इसके बाद इनकी विस्तृत जांच और ट्रायल शुरू हुए। ट्रायल के नतीजों के आधार पर आगे के प्रोटोटाइप तैयार किए गए।
रक्षा मंत्रालय के मुताबिक समस्या यह थी कि गन के साथ-साथ इसके कई महत्वपूर्ण हिस्सों को भी भारत में पहली बार डिजाइन और विकसित करना पड़ रहा था। इसलिए प्रोडक्शन के साथ-साथ टेस्टिंग और मूल्यांकन का तरीका भी धीरे-धीरे विकसित हुआ। (Dhanush gun production delay)
2012 में टेस्ट के दौरान बैरल और मजल ब्रेक को नुकसान
धनुष के विकास के शुरुआती चरण में मई 2012 में वैलिडेशन फायरिंग की गई। इस दौरान गन के बैरल और मजल ब्रेक को नुकसान पहुंचा।
इसके बाद 45 कैलिबर बैरल और इलेक्ट्रॉनिक सब-सिस्टम की जांच के आधार पर सितंबर 2012 में आगे की प्रक्रिया के लिए नई मंजूरी दी गई। मार्च 2013 में ओएफबी को गन बनाने का इंडेंट दिया गया।
बाद के परीक्षणों में भी कुछ तकनीकी समस्याएं सामने आईं। जुलाई 2017 में यूजर एक्सप्लॉइटेशन फायरिंग के दौरान मजल ब्रेक और उससे जुड़े सब-सिस्टम में खराबी हुई। इसके बाद इसकी जांच की गई।
रक्षा मंत्रालय के अनुसार बाद में हुई जांच में किसी एक कारण को इस घटना के लिए जिम्मेदार नहीं पाया गया। बालासोर स्थित प्रूफ एंड एक्सपेरिमेंटल एस्टेब्लिशमेंट यानी पीएक्सई में जांच के दौरान प्रोपेलेंट के जलने के चलते प्रेशर ऑसिलेशन की दिक्कत देखी गई। जुलाई 2018 में बोर्ड ऑफ ऑफिसर्स की जांच रिपोर्ट में मजल ब्रेक के फेल होने को वेपन सिस्टम से नहीं जोड़ा गया। (Dhanush gun production delay)
सामान्य गन से ज्यादा लंबे थे यूजर ट्रायल
धनुष की टेस्टिंग भी सामान्य प्रक्रिया से ज्यादा लंबी रही। मंत्रालय ने पीएसी को बताया कि धनुष को तीन गन की ट्रूप फॉर्मेशन और छह गन की बैटरी फॉर्मेशन में भी टेस्ट किया गया।
सामान्य तौर पर किसी नई गन को यूजर ट्रायल के दौरान सिंगल गन के रूप में भी जांचा जा सकता है। लेकिन धनुष को सेना की जरूरत के अनुसार अलग-अलग फॉर्मेशन में परखा गया।
रिपोर्ट के मुताबिक धनुष के लिए बुल्क प्रोडक्शन क्लीयरेंस (बीपीसी) फरवरी 2019 में मिली। इससे पहले इसका लंबा डेवलपमेंट, ट्रायल और इवैल्यूएशन चरण चला। (Dhanush gun production delay)
2019 में बीपीसी मिली, फिर भी उत्पादन अटका
बीपीसी मिलने के बाद मार्च 2019 में कुछ धनुष गन सेना को जारी की गईं। इसके बाद फैक्ट्री ने बड़े पैमाने पर उत्पादन की तैयारी शुरू की।
फैक्ट्री ने अपने स्तर पर कई सब-असेंबली तैयार कर ली थीं। लेकिन गन का अंतिम इंटीग्रेशन इलेक्ट्रॉनिक सूट और इलेक्ट्रिकल सिस्टम से जुड़ा हुआ था। रिपोर्ट के मुताबिक बीईएल से मिलने वाले ये सिस्टम जनवरी 2020 में मिले।
इसके बाद कुछ गन को अंतिम प्रूफ टेस्ट के लिए 20 मार्च 2020 तक पीएक्सई बालासोर भेजा गया। इसी दौरान देश में कोविड-19 महामारी के चलते राष्ट्रीय लॉकडाउन शुरू हो गया।
2021 में फिर हुई तकनीकी समीक्षा
धनुष प्रोजेक्ट से जुड़े सभी पक्षों की समीक्षा के लिए रक्षा उत्पादन विभाग के अतिरिक्त सचिव ने 29 जुलाई 2021 को बैठक की। मंत्रालय के अनुसार इस बैठक में उठाए गए तकनीकी मुद्दों को संबंधित पक्षों के संयुक्त प्रयास से बाद में हल किया गया।
इसके बाद गन को प्रूफ पास किया गया और 8 मार्च 2022 को पोखरण फील्ड फायरिंग रेंज में सफल कॉन्फिडेंस फायरिंग हुई। इसके बाद गन को सेना में शामिल करने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया गया। (Dhanush gun production delay)
स्वदेशी पावर पैक भी जोड़ा गया
धनुष प्रोजेक्ट में एक महत्वपूर्ण बदलाव पावर पैक को लेकर हुआ। शुरुआत में यह पावर पैक फॉरेन ऑरिजनल इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरर से आयात किया जाता था।
बाद में इसे स्वदेशी पावर पैक से बदल दिया गया। रिपोर्ट के अनुसार नए पावर पैक वाली धनुष गन सेना की यूनिट्स को दी जा चुकी हैं। इससे आयात पर निर्भरता कम हुई और स्वदेशी सामग्री का हिस्सा बढ़ा। (Dhanush gun production delay)
उत्पादन में देरी की बड़ी वजह क्या थी?
पीएसी की रिपोर्ट में कई कारण सामने आए हैं। सबसे बड़ी समस्या यह थी कि भारत में इस स्तर की आर्टिलरी गन बनाने का पहले का अनुभव नहीं था।
प्रोजेक्ट के दौरान स्वदेशी 155 एमएम बैरल डिजाइन, नया मजल ब्रेक, बैलिस्टिक्स विशेषज्ञता, गन इलेक्ट्रॉनिक्स, नेविगेशन सिस्टम और एडवांस साइटिंग सिस्टम को बैलिस्टिक कंप्यूटर के साथ इंटीग्रेशन जैसी चुनौतियां सामने आईं।
इसके अलावा ऑटो-लेइंग तकनीक, माइक्रो-अलॉय स्टील, कास्टिंग, फोर्जिंग और इलेक्ट्रॉनिक रिले जैसे महत्वपूर्ण हिस्सों को भी स्वदेशी बनाने की चुनौती थी। (Dhanush gun production delay)
इंफ्रास्ट्रक्चर और सप्लाई चेन भी बनी चुनौती
मंत्रालय ने समिति को बताया कि धनुष जैसा बड़ा प्रोजेक्ट शुरू करने के समय उपलब्ध प्रोडक्शन इंफ्रास्ट्रक्चर उसकी जरूरत के मुताबिक काफी नहीं था। इंफ्रास्ट्रक्चर को धीरे-धीरे मजबूत किया गया।
इसके अलावा शुरुआत में ऐसी सप्लाई चेन भी मौजूद नहीं थी, जो इस स्तर के जटिल आर्टिलरी कंपोनेंट तैयार कर सके। धनुष प्रोजेक्ट के दौरान कई नए सप्लायर और तकनीकी क्षमताएं विकसित हुईं। (Dhanush gun production delay)
प्रोजेक्ट की निगरानी के लिए बना था टेक्निकल ओवरसाइट ग्रुप
धनुष प्रोजेक्ट की निगरानी के लिए पुराने ओएफबी के स्तर पर नियमित मॉनिटरिंग की जाती थी। इसके अलावा भारतीय सेना के आर्टिलरी डायरेक्टोरेट ने टेक्निकल ओवरसाइट ग्रुप यानी टीओजी बनाया था।
इस ग्रुप में प्रोजेक्ट से जुड़े अलग-अलग पक्ष शामिल थे। इसका उद्देश्य तकनीकी मुद्दों की समीक्षा करना और प्रोजेक्ट की प्रगति को आगे बढ़ाना था।
इसके बावजूद पीएसी ने पाया कि प्रोजेक्ट कई समय-सीमाओं से पीछे रहा। समिति ने उत्पादन, सप्लाई चेन और तकनीकी समस्याओं पर ज्यादा सक्रिय निगरानी की जरूरत बताई है। (Dhanush gun production delay)
देरी से सेना की आर्टिलरी तैयारी पर पड़ा असर
रक्षा मंत्रालय ने खुद पीएसी को बताया कि धनुष के उत्पादन में देरी का असर भारतीय सेना की ऑपरेशनल प्रिपेयर्डनेस, खासकर आर्टिलरी पर पड़ा।
इस क्षमता के अंतर को कम करने के लिए सेना ने कई दूसरे उपाय किए। इनमें 130 एमएम गनों को 155 एमएम/45 कैलिबर सारंग और सोल्टम गन में अपग्रेड करना, अमेरिकी एम-777ए2 155 एमएम/39 कैलिबर गन शामिल करना, 155 एमएम/52 कैलिबर एटीएजीएस का स्वदेशी विकास और के-9 वज्र-टी गनों को शामिल करना शामिल था। पुरानी गनों की लाइफ एक्सटेंशन भी की गई। (Dhanush gun production delay)
प्रोडक्शन की नई समय-सीमा मार्च 2027
मूल योजना के अनुसार मार्च 2013 में दिए गए इंडेंट के बाद बुल्क प्रोडक्शन क्लीयरेंस मिलने के 36 महीने के भीतर उत्पादन और डिलीवरी का टारगेट रखा गया था।
ओएफबी के कॉरपोरेटाइजेशन के बाद 28 सितंबर 2021 को डीडीम्ड कॉन्ट्रैक्ट किया गया, जिसे 10 अक्टूबर 2023 को संशोधित किया गया। मौजूदा योजना के अनुसार एआईडब्ल्यूईआईएल ने सभी ऑर्डर वाली धनुष गनों की डिलीवरी मार्च 2027 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा है। (Dhanush gun production delay)
पीएसी ने देरी पर क्या कहा?
पीएसी ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि धनुष के मामले में देरी सिर्फ एक प्रोडक्शन समस्या नहीं थी। समिति ने घरेलू तकनीकी क्षमता, इंफ्रास्ट्रक्चर, स्किल और सप्लाई चेन की तैयारी को प्रोजेक्ट शुरू करने से पहले पर्याप्त रूप से जांचने की जरूरत बताई।
समिति ने यह भी कहा कि डिफेंस सेक्टर के मुश्किल स्वदेशी प्रोजेक्ट्स के लिए तकनीकी विशेषज्ञता और प्रशिक्षित मानव संसाधन की जरूरत को पहले ही पहचानना जरूरी है। रिपोर्ट में आईआईटी जैसे तकनीकी संस्थानों के जरिए विशेष स्किल डेवलपमेंट कोर्स शुरू करने और डिफेंस पीएसयू सेक्टर की कंपनियों के कर्मचारियों को नियमित रूप से अपस्किल करने की सिफारिश की गई है।
धनुष प्रोजेक्ट की प्रक्रिया में 155 एमएम का 23-लीटर चैंबर बैरल, स्वदेशी बैलिस्टिक्स, गन इलेक्ट्रॉनिक्स, नेविगेशन, एडवांस साइटिंग, ऑटो-लेइंग, माइक्रो-अलॉय स्टील और कई महत्वपूर्ण सब-सिस्टम डेवलप किए गए। पीएसी रिपोर्ट में इन क्षमताओं को इस प्रोजेक्ट से मिली प्रमुख तकनीकी सीख के रूप में बताया गया है। (Dhanush gun production delay)
Author
हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।





