📍नई दिल्ली | 12 Aug, 2026, 11:32 PM
IAF 150 trainer aircraft: भारतीय वायुसेना ने अपने फाइटर पायलट ट्रेनिंग सिस्टम को अपग्रेड करने की तैयारी कर रही है। वायुसेना ने 150 नए एडवांस्ड जेट ट्रेनर विमानों की खरीद प्रक्रिया शुरू करने के लिए रिक्वेस्ट फॉर इन्फॉर्मेशन यानी आरएफआई जारी की है। इसके तहत मौजूदा हॉक एमके-132 एडवांस्ड जेट ट्रेनर की जगह अगली पीढ़ी के ट्रेनर एयरक्राफ्ट खरीदे जाएंगे।
इन्हें ऐसे समय में इस्तेमाल किया जाएगा जब पायलट को ट्रेनर विमान से निकलकर आधुनिक लड़ाकू विमान की कॉकपिट में जाने के लिए तैयार किया जाता है। जहां पर पायलट को रडार, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर, डेटा लिंक और आधुनिक वेपन सिस्टम से जुड़ी ट्रेनिंग की जरूरत होती है।
यह स्टेज-3 ट्रेनर कैटेगरी का विमान होगा। यह विमान ट्रेनिंग की फाइनल फ्लाइट स्टेज में इस्तेमाल होगा, जिसके बाद पायलट ऑपरेशनल फाइटर स्क्वाड्रन में जाता है।
IAF 150 trainer aircraft: 150 विमानों के लिए शुरू हुई खरीद प्रक्रिया
भारतीय वायुसेना को करीब 150 नेक्स्ट-जेनरेशन ट्रेनर एयरक्राफ्ट की जरूरत है। फिलहाल कंपनियों और विमान निर्माताओं से तकनीकी जानकारी मांगी गई है। आरएफआई के जवाब जमा करने की अंतिम तारीख 5 अक्टूबर 2026 है।
इसके बाद अगले चरण में रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल यानी आरएफपी जारी किया जाएगा। आरएफपी जारी करने का लक्ष्य दिसंबर 2027 रखा गया है। कॉन्ट्रैक्ट प्रभावी होने के बाद विमानों की डिलीवरी और सिस्टम की इंडक्शन 60 महीने के भीतर पूरी करने की शर्त रखी गई है। (IAF 150 trainer aircraft)
हॉक एमके-132 की जगह आएगा नया ट्रेनर
भारतीय वायुसेना में हॉक एमके-132 ने फरवरी 2008 में सेवा शुरू की थी। लंबे समय से यही विमान स्टेज-3 ट्रेनिंग में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
हॉक का इस्तेमाल उस समय किया जाता है जब पायलट बेसिक और इंटरमीडिएट ट्रेनिंग पूरी करने के बाद तेज गति वाले जेट और लड़ाकू विमान के ऑपरेशन के लिए तैयार होता है। इस ट्रेनिंग में पायलट को फाइटर जेट जैसी उड़ान परिस्थितियों से परिचित कराया जाता है।
अब वायुसेना ऐसा विमान चाहती है जिसमें आधुनिक फाइटर जेट के ज्यादा सिस्टम को ट्रेनिंग के दौरान ही इस्तेमाल किया जा सके। (IAF 150 trainer aircraft)
क्या होती है स्टेज-3 ट्रेनिंग?
फाइटर पायलट बनने की ट्रेनिंग कई चरणों में होती है। शुरुआती चरण में पायलट को बेसिक उड़ान कौशल सिखाया जाता है। इसके बाद इंटरमीडिएट ट्रेनर के जरिए जेट उड़ान और अधिक मुश्किल तकनीकों की ट्रेनिंग होती है।
स्टेज-3 में पायलट को फाइटर जेट उड़ाने वाली ट्रेनिंग दी जाती है। इसी स्टेज में तेज गति, आधुनिक कॉकपिट, वेपन सिस्टम, रडार और मिशन से जुड़ीं कई तरह की ट्रेनिंग दी जाती हैं।
नए विमान को इसी जरूरत को ध्यान में रखकर तैयार किया जाना है। इसका उद्देश्य पायलट को सुखोई-30एमकेआई, राफेल, तेजस और आगे चलकर एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट यानी एएमसीए जैसे विमानों की ट्रेनिंग के लिए तैयार करना है।
नए ट्रेनर में फ्लाई-बाय-वायर सिस्टम
आरएफआई में नए ट्रेनर के लिए सबसे महत्वपूर्ण फ्लाई-बाय-वायर फ्लाइट कंट्रोल सिस्टम है। फ्लाई-बाय-वायर में पायलट के कंट्रोल इनपुट को इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम के जरिए प्रोसेस करके विमान के कंट्रोल सरफेस तक पहुंचाया जाता है। इससे विमान को कंट्रोल करने में कंप्यूटर बेस्ड मदद मिलती है और आधुनिक लड़ाकू विमान जैसे फ्लाइट कंट्रोल सिस्टम का अनुभव ट्रेनिंग के दौरान ही मिल सकता है।
विमान में ग्लास कॉकपिट की भी मांग की गई है। ग्लास कॉकपिट में पारंपरिक एनालॉग मीटर की जगह डिजिटल डिस्प्ले का इस्तेमाल होता है। इसमें उड़ान, नेविगेशन और विमान से जुड़ी दूसरी महत्वपूर्ण जानकारी स्क्रीन पर दिखाई जाती है। (IAF 150 trainer aircraft)
एचओटीएएस कंट्रोल से फाइटर जैसी ट्रेनिंग
नए ट्रेनर में हैंड्स ऑन थ्रॉटल एंड स्टिक यानी एचओटीएएस सिस्टम की भी जरूरत बताई गई है।
एचओटीएएस का मतलब है कि पायलट कई महत्वपूर्ण कंट्रोल बिना हाथों को मुख्य स्टिक और थ्रॉटल से हटाए ऑपरेट कर सकता है। आधुनिक फाइटर जेट में इससे पायलट के काम में आसानी होती है क्योंकि उसे बार-बार अलग-अलग स्विच या कंट्रोल तक हाथ ले जाने की जरूरत नहीं पड़ती।
ट्रेनर में इसका इस्तेमाल पायलट को आधुनिक फाइटर कॉकपिट के ऑपरेशन से परिचित कराने के लिए किया जाएगा।
नाविक, जीपीएस और ग्लोनास से नेविगेशन
नया विमान भारत के नाविक सैटेलाइट नेविगेशन सिस्टम के साथ जीपीएस और ग्लोनास नेविगेशन सिस्टम लैस होगा। इस तरह के मल्टी-सिस्टम नेविगेशन से विमान को अपनी स्थिति और दिशा की जानकारी अलग-अलग सैटेलाइट नेविगेशन सोर्सेज से मिल सकती है। (IAF 150 trainer aircraft)
कंट्रोल छूटने पर खुद संभल सकेगा विमान
नए ट्रेनर की सुरक्षा से जुड़ी एक महत्वपूर्ण जरूरत यह है कि विमान अचानक अनियंत्रित उड़ान स्थिति में जाने से बच सके।
आरएफआई में ऐसे विमान की मांग की गई है जो डिपार्चर जैसी स्थिति के प्रति प्रतिरोधी हो। अगर किसी स्थिति में पायलट विमान पर नियंत्रण छोड़ देता है तो सिस्टम विमान को वापस नियंत्रित उड़ान में लाने में सक्षम होना चाहिए।
इस तरह की सुविधा ट्रेनिंग विमान में खास महत्व रखती है, क्योंकि नए पायलट जटिल उड़ान परिस्थितियों का अभ्यास करते हैं।
जीरो-जीरो इजेक्शन सीट भी जरूरी
विमान में जीरो-जीरो इजेक्शन सीट की आवश्यकता भी रखी गई है। इसका मतलब ऐसी इजेक्शन सीट से है जिसे विमान के जमीन पर खड़े होने या बहुत कम ऊंचाई और गति की स्थिति में भी पायलट की सुरक्षा के लिए इस्तेमाल किया जा सके।
ट्रेनिंग के दौरान सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए इजेक्शन सिस्टम विमान के महत्वपूर्ण सुरक्षा उपकरणों में शामिल होता है। (IAF 150 trainer aircraft)
तेजस और एएमसीए के दौर में क्यों जरूरी है नया ट्रेनर?
भारतीय वायुसेना के लड़ाकू विमान बेड़े में तेजस और राफेल जैसे आधुनिक प्लेटफॉर्म शामिल हैं। इसके अलावा तेजस एमके-2 और एएमसीए जैसे कार्यक्रम भी लड़ाकू विमान क्षमता से जुड़े हैं।
ऐसे विमानों को उड़ाने वाले पायलटों को केवल सामान्य जेट उड़ान का अनुभव देना काफी नहीं होता। उन्हें आधुनिक कॉकपिट, डिजिटल एवियोनिक्स, रडार, इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम और नेटवर्क आधारित युद्ध प्रणाली के अनुरूप तैयार करना पड़ता है।
इसी वजह से नया ट्रेनर केवल एक उड़ान प्रशिक्षण विमान नहीं, बल्कि लीड-इन फाइटर ट्रेनर यानी लिफ्ट की भूमिका निभाने वाला प्लेटफॉर्म होगा। (IAF 150 trainer aircraft)
एचएएल भी दौड़ में
इस कार्यक्रम में भारतीय और विदेशी विमान निर्माता दोनों अपनी टेक्नोलॉजी पेश कर सकते हैं। भारतीय पक्ष में हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड यानी एचएएल प्रमुख दावेदार है।
एचएएल ने एचएलएफटी-42 नाम का सुपरसोनिक लीड-इन फाइटर ट्रेनर डेवलप करने की योजना पेश की है। यह विमान आधुनिक लड़ाकू विमानों की ट्रेनिंग जरूरतों को ध्यान में रखकर डिजाइन किया गया है।
एचएलएफटी-42 को एयरो इंडिया 2023 में मॉडल के रूप में प्रदर्शित किया गया था। इससे जुड़े कार्यक्रम में 95 से 100 केएन श्रेणी के इंजन की जरूरत बताई गई है। हालांकि इस कार्यक्रम के मौजूदा विकास चरण को लेकर पूरी जानकारी नहीं दी गई है। (IAF 150 trainer aircraft)
विदेशी कंपनियां भी कर सकती हैं दावेदारी
आरएफआई में भारतीय कंपनियों के साथ विदेशी विमान निर्माताओं के लिए भी अवसर है। संभावित अंतरराष्ट्रीय प्लेटफॉर्म में इटली का लियोनार्डो एम-346, दक्षिण कोरिया का केएआई टी-50, रूस का याक-130 और अमेरिका का बोइंग टी-7ए जैसे विमान चर्चा में हैं।
इनमें एम-346 और टी-50 जैसे विमान पहले से कई देशों की मिलिट्री ट्रेनिंग में इस्तेमाल किए जा रहे हैं। वहीं टी-7ए एक डिजिटल डिजाइन वाले नए सुपरसोनिक ट्रेनर के रूप में विकसित किया गया है।
अंतिम चयन केवल विमान के नाम या प्रदर्शन के आधार पर नहीं होगा। तकनीकी मूल्यांकन के बाद योग्य विमानों का भारत में फील्ड ट्रायल किया जाएगा। इसके बाद तकनीकी रूप से योग्य प्रस्तावों में से खरीद प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। (IAF 150 trainer aircraft)
यशस और एचएलएफटी-42
भारतीय ट्रेनर विमान कार्यक्रम में एचजेटी-36 भी महत्वपूर्ण रहा है। इस विमान का नाम एयरो इंडिया 2025 में बदलकर यशस किया गया था। इसके विकास के दौरान विमान की हैंडलिंग से जुड़ी कई तकनीकी समस्याओं पर लंबे समय तक काम किया गया।
दूसरी तरफ एचएलएफटी-42 अभी विकास कार्यक्रम के स्तर पर है। इसलिए 150 विमानों वाला नया कार्यक्रम भारतीय और विदेशी दोनों प्लेटफॉर्म के लिए बड़े स्तर की तकनीकी जांच से जुड़ा है। (IAF 150 trainer aircraft)
Author
हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।





