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चीन से बढ़ते खतरे को देखते हुए जापान बना रहा अंडरवॉटर हाइपरसोनिक मिसाइलें, पनडुब्बियों से होंगी लॉन्च

जापान के रक्षा मंत्रालय की तरफ से जारी कॉन्सैप्ट पेंटिंग्स में नई पनडुब्बियों को वर्टिकल लॉन्च सिस्टम यानी वीएलएस ट्यूबों से लैस दिखाया गया है। प्रत्येक लॉन्च ट्यूब में सात से आठ हाइपरसोनिक मिसाइलें रखी जा सकेंगी...

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📍टोक्यो | 4 Sep, 2026, 5:19 PM

Japan Submarine-Launched Hypersonic Missile: जापान ने अपनी डिफेंस स्ट्रेटेजी में एक बड़ा बदलाव किय है। वित्त वर्ष 2027 के रक्षा बजट प्रस्ताव में जापान के रक्षा मंत्रालय ने अंडरवॉटर-लॉन्च हाइपरसोनिक वेपन प्रोग्राम को शामिल किया है। इन हाइपरसोनिक मिसाइलों को पनडुब्बियों से लॉन्च किया जाएगा। इसका उद्देश्य लंबी दूरी से दुश्मन के सैन्य ठिकानों को निशाना बनाने की क्षमता बढ़ाना और समुद्र के भीतर से सुरक्षित स्ट्राइक प्लेटफॉर्म तैयार करना है।

यह कदम ऐसे समय उठाया गया है जब पूर्वी एशिया में सुरक्षा चुनौतियां बढ़ रही हैं और ताइवान स्ट्रेट, पूर्वी चीन सागर तथा पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में सैन्य गतिविधियां लगातार तेज हो रही हैं। जापान अब अपने पारंपरिक डिफेंस मॉडल से आगे बढ़कर ऐसी क्षमता विकसित कर रहा है जो उसे दुश्मन के हमले की स्थिति में जवाबी कार्रवाई के अधिक विकल्प दे सके।

Japan Submarine-Launched Hypersonic Missile: पनडुब्बियों से लॉन्च होंगी हाइपरसोनिक मिसाइलें

जापान के रक्षा मंत्रालय की तरफ से जारी कॉन्सैप्ट पेंटिंग्स में नई पनडुब्बियों को वर्टिकल लॉन्च सिस्टम यानी वीएलएस ट्यूबों से लैस दिखाया गया है। प्रत्येक लॉन्च ट्यूब में सात से आठ हाइपरसोनिक मिसाइलें रखी जा सकेंगी।

इन मिसाइलों में मुख्य रूप से हाइपर वेलोसिटी ग्लाइडिंग प्रोजेक्टाइल (एचवीजीपी) तकनीक का उपयोग किया जाएगा। यह एक बूस्ट-ग्लाइड वेपन है जिसमें पहले रॉकेट बूस्टर मिसाइल को ऊपरी वायुमंडल तक पहुंचाता है। इसके बाद ग्लाइड व्हीकल मैक-5 से अधिक की रफ्तार पर टारगेट की ओर बढ़ता है।

हाइपरसोनिक हथियारों की सबसे बड़ी खूबी उनकी तेज रफ्तार और उड़ान के दौरान दिशा बदलने की क्षमता होती है। यही कारण है कि पारंपरिक एयर डिफेंस सिस्टम के लिए उन्हें रोकना बेहद कठिन माना जाता है।

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3,000 किलोमीटर तक पहुंच सकती है मारक क्षमता

जापान पहले से एचवीजीपी कार्यक्रम पर काम कर रहा है। इसके एडवांस वर्जन में रेंज लगातार बढ़ाई जा रही है।
ब्लॉक-2ए वर्जन की अनुमानित मारक क्षमता लगभग 2,000 किलोमीटर बताई गई है। वहीं ब्लॉक-2बी वर्जन को लगभग 3,000 किलोमीटर तक की दूरी पर टारगेट भेदने के लिए डेवलप किया जा रहा है।

इतनी लंबी दूरी जापान को अपने तटीय क्षेत्रों से काफी दूर स्थित मिलिट्री टारगेट्स तक पहुंचने की क्षमता दे सकती है। विशेष रूप से पश्चिमी प्रशांत और फर्स्ट आइलैंड चेन क्षेत्र में यह क्षमता रणनीतिक महत्व रखती है।

हाइपरसोनिक क्रूज मिसाइल पर भी काम

बूस्ट-ग्लाइड हथियारों के अलावा जापान स्क्रैमजेट आधारित हाइपरसोनिक क्रूज मिसाइल तकनीक भी डेवलप कर रहा है। इस तकनीक में शुरुआती चरण में रॉकेट बूस्टर मिसाइल को जरूरी रफ्तार तक पहुंचाता है। इसके बाद स्क्रैमजेट इंजन हवा से ऑक्सीजन लेकर लगातार थ्रस्ट पैदा करता है और मिसाइल की तेज रफ्तार बनाए रखता है।

हालांकि यह तकनीक काफी जटिल मानी जाती है और अभी विकास के चरण में है, लेकिन सफल होने पर इससे अपेक्षाकृत छोटे आकार की लंबी दूरी की मिसाइलें तैयार की जा सकेंगी।

ड्रोन ‘पनडुब्बियों’ को भी हथियारों से लैस करने की तैयरी

जापान केवल पारंपरिक पनडुब्बियों पर निर्भर नहीं रहना चाहता। रक्षा मंत्रालय मानव रहित अंडरवॉटर व्हीकल यानी यूयूवी को भी लंबी दूरी के हथियारों से लैस करने की संभावनाओं पर काम कर रहा है।

इन मॉड्यूलर सिस्टम्स का उपयोग समुद्र में लंबे समय तक गुप्त रूप से तैनात रहने और आवश्यक समय पर हमला करने के लिए किया जा सकता है। (Japan Submarine-Launched Hypersonic Missile)

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चीन की नौसैनिक गतिविधियों पर नजर

जापान की यह नई योजना ऐसे क्षेत्रों पर केंद्रित है जहां चीनी नौसेना नियमित रूप से गतिविधियां करती है। विशेष रूप से मियाको स्ट्रेट को रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है।

यह समुद्री मार्ग चीन की नौसेना को पश्चिमी प्रशांत महासागर तक पहुंच प्रदान करता है। किसी संभावित क्षेत्रीय संघर्ष की स्थिति में यही मार्ग नौसैनिक अभियानों के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।

जापान का मानना है कि समुद्र के भीतर छिपी पनडुब्बियों से लॉन्च होने वाले हाइपरसोनिक हथियार दुश्मन के युद्धपोतों, एयरक्राफ्ट कैरियर्स और एंफीबियस बेड़ों के लिए गंभीर चुनौती बन सकते हैं। (Japan Submarine-Launched Hypersonic Missile)

मौजूदा मिसाइलों की सीमाएं

जापान के पास पहले से टाइप-88 जैसी एंटी-शिप मिसाइलें मौजूद हैं। लेकिन इनकी रेंज लगभग 100 किलोमीटर है और ये सबसोनिक कैटेगरी में आती है।

आधुनिक युद्धपोत अब मल्टी-लेयर एयर डिफेंस सिस्टम, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम, क्लोज-इन वेपन सिस्टम और एडवांस रडार से लैस हैं। ऐसे में पुराने हथियारों की प्रभावशीलता सीमित मानी जाती है।

इसी कारण जापान एक तरफ स्टेल्थ आधारित टाइप-12 एंटी-शिप मिसाइल विकसित कर रहा है, जबकि दूसरी तरफ हाइपरसोनिक कार्यक्रम को भी आगे बढ़ा रहा है। (Japan Submarine-Launched Hypersonic Missile)

वायुसेना ठिकानों की सुरक्षा चिंता की वजह

जापान ने अपने एयरबेस इन्फ्रास्ट्रक्चर को लेकर भी चिंता जताई है। जापान के पास आधुनिक हार्डनड एयरक्राफ्ट शेल्टर की संख्या सीमित है। अधिकांश संरक्षित शेल्टर शीत युद्ध काल के हैं और पिछले एक दशक में बहुत कम नए शेल्टर बनाए गए हैं।

इसी तरह एयर डिफेंस इंटरसेप्टर मिसाइलों की उपलब्धता को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। हाई इंटेसिटी वाले जंग के हालात में मौजूदा भंडार जल्दी समाप्त होने की आशंका जताई गई है।

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ऐसे माहौल में समुद्र के भीतर तैनात पनडुब्बियां अधिक सुरक्षित और टिकाऊ स्ट्राइक प्लेटफॉर्म मानी जा रही हैं। (Japan Submarine-Launched Hypersonic Missile)

निगरानी और टारगेट की पहचान भी बड़ी चुनौती

हालांकि लंबी दूरी की हाइपरसोनिक मिसाइलें तभी प्रभावी होंगी जब उनके लिए सटीक लक्ष्य जानकारी उपलब्ध हो।
मार्च 2026 तक जापान के पास केवल नौ सैन्य निगरानी उपग्रह सक्रिय बताए गए हैं। यही वजह है कि जापान अभी भी कई मामलों में अमेरिका की इंटेलिजेंस, सर्विलांस और रिकॉनिसेंस क्षमताओं पर निर्भर है।

लंबी दूरी की स्ट्राइक क्षमता के लिए टारगेट की पहचान, संचार नेटवर्क और रियल-टाइम डेटा बेहद महत्वपूर्ण माने जाते हैं। (Japan Submarine-Launched Hypersonic Missile)

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    रक्षा समाचार न्यूज डेस्क भारत की अग्रणी हिंदी रक्षा समाचार टीम है, जो Indian Army, Navy, Air Force, DRDO, रक्षा उपकरण, युद्ध रणनीति और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी विश्वसनीय और विश्लेषणात्मक खबरें पेश करती है। हम लाते हैं सटीक, सरल और अपडेटेड Defence News in Hindi। हमारा उद्देश्य है – "हर खबर, देश की रक्षा से जुड़ी।"

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