📍नई दिल्ली | 13 Aug, 2026, 12:13 PM
IAF Skardu Mission 1985: 1999 के कारगिल युद्ध में भारतीय वायुसेना के शौर्य पर बनी ऑपरेशन सफेद सागर वेब सीरीज को इन दिनों नेटफ्लिक्स पर खूब वाहवाही मिल रही है। इसी ऑपरेशन में पहली बार पहाड़ी इलाकों में लो-लेवल नाइट बॉम्बिंग जैसी जटिल सैन्य कार्रवाई को अंजाम दिया गया था। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि कारगिल युद्ध से करीब 14 साल पहले भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) के भीतर एक ऐसा जोखिम भरा मिशन चलाया था, जिसने सियाचिन में पाकिस्तान की गतिविधियों पर अहम जानकारी जुटाई थी।
यह मिशन 1985 में भारतीय वायुसेना की नंबर-101 स्क्वाड्रन, जिसे “फाल्कन्स” के नाम से जाना जाता है, उन्होंने अंजाम दिया था। इस मिशन में सोवियत मूल के मिग-21एम लड़ाकू विमान का इस्तेमाल किया गया था। मिशन का उद्देश्य स्कार्दू एयरबेस और उससे जुड़े मिलिट्री स्ट्रक्चर तस्वीरें जुटाना था, ताकि सियाचिन में पाकिस्तान की गतिविधियों को समझा जा सके।
IAF Skardu Mission 1985: ऑपरेशन मेघदूत के बाद बढ़ी स्कार्दू की अहमियत
13 अप्रैल 1984 में भारत ने ऑपरेशन मेघदूत शुरू किया था। इस ऑपरेशन के तहत भारतीय सेना ने दुनिया के सबसे ऊंचे युद्धक्षेत्र सियाचिन ग्लेशियर पर रणनीतिक बढ़त हासिल की थी। इसके बाद पाकिस्तान ने भी इस क्षेत्र में अपनी सैन्य गतिविधियां बढ़ानी शुरू कर दी थीं।
सियाचिन के नजदीक स्थित स्कार्दू पाकिस्तान के लिए एक महत्वपूर्ण मिलिट्री सेंटर था। यह गिलगित-बाल्टिस्तान क्षेत्र में स्थित यह इलाका नियंत्रण रेखा से लगभग 100 किलोमीटर तथा लेह से करीब 230 किलोमीटर उत्तर-पश्चिम में है। यहां एक बड़ा एयरबेस, लॉजिस्टिक सुविधाएं और कई सैन्य इकाइयां मौजूद थीं।
श्योक सिंधु नदी की एक बड़ी सहायक नदी है जो पूर्वी काराकोरम में रिमो ग्लेशियर से निकलती है और उत्तरी लद्दाख से गिलगित-बाल्टिस्तान में बहती है और फिर स्कार्दू के पास सिंधु नदी में मिल जाती है। स्कार्दू 7,300 फीट की ऊंचाई पर है। जबकि लेह एयरबेस की ऊंचाई 10,680 फीट है।
भारतीय सैन्य योजनाकारों के लिए यह जानना जरूरी था कि स्कार्दू में किस स्तर की गतिविधियां चल रही हैं और वहां कौन-कौन से विमान तथा सैन्य संसाधन तैनात हैं। (IAF Skardu Mission 1985)
मिग-21 ने बेहद कम ऊंचाई पर भरी उड़ान
सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, नंबर-101 स्क्वाड्रन का एक मिग-21एम टाइप-96 विमान विशेष रिकॉनिसेंस यानी हवाई टोही मिशन पर भेजा गया था।
विमान के नीचे एक विशेष पॉड लगाया गया था, जिसमें विंटन-751 पैनोरमिक कैमरा फिट था। यह कैमरा बड़े क्षेत्र की लगातार तस्वीरें लेने में सक्षम था।
मिशन के दौरान मिग-21 ने श्योक घाटी का रास्ता अपनाया। विमान जमीन से केवल लगभग 200 फीट की ऊंचाई पर बेहद तेज रफ्तार से उड़ रहा था। इतनी कम ऊंचाई पर उड़ान का उद्देश्य पाकिस्तानी रडार से बचना था।
पायलट ने आधुनिक नेविगेशन सिस्टम के बजाय नक्शों और दृश्य पहचान बिंदुओं की मदद से रास्ता तय किया। उस समय इस क्षेत्र में एडवांस नेविगेशन सपोर्ट उपलब्ध नहीं था। (IAF Skardu Mission 1985)
स्कार्दू के ऊपर सीधी उड़ान
स्कार्दू पहुंचने के बाद मिग-21 ने एयरफील्ड के ऊपर एक सीधी और तेज उड़ान भरी। इसी दौरान कैमरे ने रनवे, सैन्य ढांचे और आसपास के क्षेत्रों की विस्तृत तस्वीरें रिकॉर्ड कीं।
रिपोर्टों के अनुसार कैमरा पहले से सक्रिय कर दिया गया था और वह लगातार तस्वीरें ले रहा था। इससे स्कार्दू एयरबेस की स्थिति, वहां मौजूद विमान, लॉजिस्टिक सुविधाओं और अन्य सैन्य गतिविधियों की जानकारी जुटाई गई।
यह मिशन केवल साहस का उदाहरण नहीं था बल्कि बेहद सटीक सैन्य योजना का परिणाम था। फ्लाइट पाथ, रडार कवरेज, खतरे का आकलन और वापसी का रास्ता पहले से तय किया गया था। (IAF Skardu Mission 1985)
दूसरे फाइटर जेट्स ने दिया कवर
यह मिशन अकेले नहीं चलाया गया था। दूसरे लड़ाकू विमानों ने भी सिक्योरिटी कवर दिया था। उस समय नंबर-101 स्क्वाड्रन की कमान विंग कमांडर जेफ्री रेजिनाल्ड मैकेरो के पास थी। वे 96वें पायलट कोर्स के तहत 1966 में भारतीय वायुसेना में कमीशन हुए थे और 1984 से 1987 तक स्क्वाड्रन के कमांडिंग ऑफिसर रहे।
इसी बैच से बाद में भारतीय वायुसेना के पहले मिराज-2000 स्क्वाड्रन कमांडिंग ऑफिसर भी निकले। साल 1985 में जब मिराज-2000 लड़ाकू विमान चंडीगढ़ से ग्वालियर ट्रांसफर होने के बाद नंबर-7 स्क्वाड्रन में शामिल किए गए, तब उसी बैच के अधिकारियों ने इस नई क्षमता को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
दो मिग-21 विमानों का फॉर्मेशन इस मिशन में शामिल था और दोनों विमान बिना किसी चुनौती के सुरक्षित वापस लौट आए थे। (IAF Skardu Mission 1985)
तस्वीरों ने बदले हालात
इस मिशन का सबसे महत्वपूर्ण पहलू वह जानकारी थी जो तस्वीरों के माध्यम से प्राप्त हुई।
बताया जाता है कि मिशन के अगले दिन ही फिल्म डेवलप कर ली गई थी। तस्वीरों में स्कार्दू एयरफील्ड के सही हालात दिखाई दिए। जिससे वहां चल रहीं गतिविधियों का प्रूफ मिला।
फोटोग्राफ्स में सामने आया कि जिन गन पोजीशनों को पहले निष्क्रिय माना जा रहा था, वे बाद में सक्रिय दिखाई देने लगीं। इस तरह एक हवाई टोही मिशन ने पाकिस्तान की सैन्य तैयारियों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध कराई। (IAF Skardu Mission 1985)
विंटन-751 कैमरा था मिशन की असली ताकत
मिशन में इस्तेमाल हुआ विंटन-751 पैनोरमिक कैमरा उस दौर की अत्याधुनिक तकनीक माना जाता था।
इसे एक संशोधित 800 लीटर ड्रॉप टैंक में लगाया गया था। कैमरे में इमेज मोशन कम्पेनसेशन तकनीक थी, जिससे तेज रफ्तार के बावजूद तस्वीरें धुंधली नहीं होती थीं।
पायलट कॉकपिट से कैमरे को नियंत्रित कर सकता था। वह फ्रेम रेट बदल सकता था और जरूरत के अनुसार तस्वीरों की संख्या तय कर सकता था।
कैमरा उड़ान पथ के दोनों ओर लगभग 60 डिग्री क्षेत्र की तस्वीरें लेने में सक्षम था। इससे कम समय में बड़े इलाके का सर्वेक्षण किया जा सकता था। (IAF Skardu Mission 1985)
इस्लामाबाद के ऊपर सोनिक बूम
शांतिकाल के दौरान भारतीय वायुसेना द्वारा दुश्मन के हवाई क्षेत्र के ऊपर जाकर टोही मिशन चलाने की घटनाएं बहुत कम सार्वजनिक रूप से सामने आई हैं। हालांकि, भारतीय वायुसेना का मिग-25आर टोही विमान ऐसे मिशनों के लिए लंबे समय तक इस्तेमाल किया जाता रहा। यह विमान लगभग मैक-3 की रफ्तार से उड़ सकता था और इतनी ऊंचाई पर ऑपरेट करता था कि उस समय पाकिस्तान और चीन की अधिकांश मिसाइलें उसे निशाना नहीं बना सकती थीं।
ऐसे ही एक चर्चित मिशन का उल्लेख वर्ष 1997 में मिलता है, जब एक मिग-25आर पायलट ने कथित तौर पर इस्लामाबाद के ऊपर जानबूझकर ध्वनि की गति पार कर “सोनिक बूम” पैदा किया था। इस घटना ने पाकिस्तान की एयर डिफेंस सिस्टम पर भी सवाल खड़े किए थे। (IAF Skardu Mission 1985)
101 स्क्वाड्रन का लंबा इतिहास
नंबर-101 स्क्वाड्रन का नाम “फाल्कन्स” उसके प्रतीक चिह्न पर बने प्रशिक्षित शिकारी बाज से लिया गया है। यह बाज तेज नजर और सटीक हमला करने की क्षमता का प्रतीक माना जाता है। यह भारतीय वायुसेना की पहली समर्पित फोटो टोही यूनिट थी।
नंबर-101 स्क्वाड्रन भारतीय वायुसेना की सबसे प्रतिष्ठित युनिट्स में से एक रही है। इसकी शुरुआत जनवरी 1948 में फोटो रिकॉनिसेंस फ्लाइट के रूप में हुई थी।
उस समय स्क्वाड्रन स्पिटफायर विमान उड़ाती थी। अप्रैल 1950 में इसे पूर्ण स्क्वाड्रन का दर्जा मिला।
इसके बाद इस यूनिट ने हार्वर्ड, वैम्पायर, एसयू-7 और मिग-21 जैसे कई विमान उड़ाए। 1962 में हिमालयी सीमाओं पर टोही मिशन, 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में आदमपुर एयरबेस से बमबारी अभियान और 1971 के युद्ध में पश्चिमी मोर्चे पर महत्वपूर्ण कार्रवाई में इस स्क्वाड्रन की भूमिका रही।
इसके बाद स्क्वाड्रन ने सोवियत मूल के एसयू-7 ग्राउंड अटैक विमान अपनाए और सुपरसोनिक युग में प्रवेश किया। वर्ष 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में इसी एसयू-7 विमान के साथ फाल्कन्स ने पश्चिमी मोर्चे के छंब सेक्टर में पाकिस्तानी टैंकों, तोपों की तैनाती और सैनिक जमावड़ों पर हमले किए। इस शानदार प्रदर्शन के कारण स्क्वाड्रन को “फाल्कन्स ऑफ छंब” के नाम से पहचान मिली। (IAF Skardu Mission 1985)
स्कार्दू मिशन और कारगिल का संबंध
सैन्य इतिहासकारों के अनुसार 1980 के दशक में विकसित हुई टोही तकनीकों और अनुभवों ने बाद में भारतीय वायुसेना की अन्य युनिट्स को भी फायदा पहुंचाया।
कारगिल संघर्ष के दौरान नंबर-17 स्क्वाड्रन “गोल्डन एरोज” ने पहले फोटो रिकॉनिसेंस और बाद में लो-लेवल नाइट बॉम्बिंग मिशन डेवलप किए। दोनों स्क्वाड्रनों ने अलग-अलग समय पर मिग-21 का इस्तेमाल किया और बाद में दोनों को राफेल लड़ाकू विमान मिले।
आज नंबर-17 स्क्वाड्रन अंबाला में और नंबर-101 स्क्वाड्रन पूर्वोत्तर क्षेत्र में राफेल ऑपरेट कर रही हैं। (IAF Skardu Mission 1985)
राफेल युग में पहुंची फाल्कन्स स्क्वाड्रन
साल 1981 में स्क्वाड्रन को मिग-21एम लड़ाकू विमानों से लैस किया गया। इसके बाद यूनिट को सिरसा एयरबेस ट्रासंफर किया गया। साल 2002 में यह फिर से आदमपुर लौट आई। कई दशकों तक सेवा देने के बाद साल 2011 में स्क्वाड्रन को “नंबर-प्लेट” कर दिया गया, जिसका अर्थ है कि यूनिट को निष्क्रिय कर दिया गया। ऐसा उसके मिग-21एम विमानों के सेवा से हटने के बाद किया गया था।
इसके बाद जून 2021 में इसे दोबारा सक्रिय किया गया। नई शुरुआत के साथ स्क्वाड्रन को राफेल लड़ाकू विमान मिले। यह भारतीय वायुसेना की दूसरी राफेल स्क्वाड्रन बनी।
हाल ही में फाल्कन्स स्क्वाड्रन ने बंगाल की खाड़ी, हिंद महासागर और तिमोर सागर के ऊपर लगभग 7,000 किलोमीटर की उड़ान भरते हुए ऑस्ट्रेलिया के डार्विन में आयोजित एक्सरसाइज पिच ब्लैक में हिस्सा लिया। इस बहुराष्ट्रीय सैन्य अभ्यास में 21 देशों के करीब 100 विमान और 2,500 सैन्यकर्मी शामिल थे।
1985 का स्कार्दू टोही मिशन भारतीय वायुसेना के उन दुर्लभ अभियानों में गिना जाता है, जिनके बारे में आधिकारिक जानकारी सीमित है, लेकिन इसेस पता चलता है कि सियाचिन क्षेत्र में रणनीतिक जानकारी जुटाने के लिए उस दौर में कितनी मुश्किल और जोखिम भरी हवाई कार्रवाइयां की गई थीं। (IAF Skardu Mission 1985)
Author
हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।





