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अब समंदर में दुश्मन की पनडुब्बियों की खैर नहीं, दो नए भारतीय युद्धपोतों पर लगे हैं ये खास स्वदेशी एडवांस्ड सोनार, 16 पर लगाने की तैयारी

कोच्चि स्थित NPOL के विकसित HUMSA-2020 और Abhay PG सोनार सिस्टम से भारतीय नौसेना को मिली एडवांस अंडरवॉटर निगरानी और एंटी-सबमरीन वॉरफेयर क्षमता...

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📍नई दिल्ली | 12 Aug, 2026, 12:52 PM

NPOL Indigenous Sonar System: भारतीय नौसेना की ताकत बढ़ाने में केवल मिसाइलों, युद्धपोतों और पनडुब्बियों को ही रोल नहीं है, बल्कि उन तकनीकों से भी बढ़ी है जो समुद्र के भीतर छिपे खतरों को समय रहते पहचान सकें। हाल ही में कमीशन किए गए भारतीय नौसेना के दो स्वदेशी युद्धपोतों आईएनएस दुनागिरी और आईएनएस अग्रय में पूरी तरह स्वदेशी सोनार सिस्टम तैनात किए गए हैं। 21 जून को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोलकाता में इन दोनों स्वदेशी युद्धपोतों को नौसेना में शामिल किया था। इन जहाजों में 75 प्रतिशत से अधिक स्वदेशी सामग्री का इस्तेमाल किया गया है।

सूत्रों ने बताया कि ये सोनार सिस्टम कोच्चि स्थित डीआरडीओ की प्रयोगशाला नेवल फिजिकल एंड ओशनोग्राफिक लेबोरेटरी (एनपीओएल) ने डेवलप किए हैं।

बता दें कि स्टेल्थ फ्रिगेट आईएनएस दुनागिरी और एंटी-सबमरीन वॉरफेयर शैलो वॉटर क्राफ्ट आईएनएस अग्रय को गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (जीआरएसई) ने बनाया है।

NPOL Indigenous Sonar System: समुद्र के भीतर कैसे काम करता है सोनार?

समुद्र के भीतर किसी भी युद्धपोत के लिए सोनार उतना ही महत्वपूर्ण होता है, जितना आसमान में उड़ने वाले विमान के लिए रडार। यही सिस्टम पानी के भीतर छिपी पनडुब्बियों, टॉरपीडो और अन्य खतरों का पता लगाने का काम करता है।

सोनार को किसी भी युद्धपोत की पानी के भीतर देखने और सुनने वाली आंख और कान माना जाता है। समुद्र के अंदर पनडुब्बियां, टॉरपीडो और अन्य अंडरवॉटर प्लेटफॉर्म सामान्य रडार से दिखाई नहीं देते। ऐसे में सोनार ध्वनि तरंगों के जरिए उनकी पहचान करता है।

सोनार दो तरीकों से काम करता है। एक्टिव मोड में यह ध्वनि तरंग भेजता है और लौटने वाली गूंज से टारगेट की लोकेशन का पता लगाता है। पैसिव मोड में यह केवल आसपास मौजूद ध्वनियों को सुनता है और उनके आधार पर टारगेट की पहचान करता है। आधुनिक नौसैनिक युद्ध में सोनार की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है क्योंकि पनडुब्बियों से होने वाले खतरे लगातार बढ़ रहे हैं।

NPOL क्यों है खास?

कोच्चि स्थित नेवल फिजिकल एंड ओशनोग्राफिक लेबोरेटरी (NPOL) को भारत की अंडरवाटर सर्विलांस और एंटी-सबमरीन वॉरफेयर तकनीकों की रीढ़ माना जाता है। यह प्रयोगशाला वर्षों से भारतीय नौसेना के लिए सोनार और अंडरवाटर सेंसर डेवलप कर रही है।

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भारतीय महासागर क्षेत्र में समुद्र का तापमान, पानी की गहराई, समुद्री धाराएं और जहाजों की आवाजाही लगातार बदलती रहती है। ऐसे माहौल में पनडुब्बियों का पता लगाना आसान नहीं होता। एनपीओएल के बनाए सिस्टम इन्हीं चुनौतियों को ध्यान में रखकर तैयार किए गए हैं। (NPOL Indigenous Sonar System)

आईएनएस दुनागिरी पर लगा है HUMSA-2020

प्रोजेक्ट-17ए के तहत तैयार आईएनएस दुनागिरी एक आधुनिक स्टेल्थ गाइडेड मिसाइल फ्रिगेट है। इस युद्धपोत को लंबी दूरी पर दुश्मन की पनडुब्बियों और अन्य अंडरवॉटर खतरों की पहचान करने की जरूरत होती है।

सूत्रों के मुताबिक इस युद्धपोत को HUMSA-2020 यानी HUMSA-NG मार्क-II सोनार से लैस किया गया है।

यह चौथी पीढ़ी का हुल-माउंटेड एक्टिव-कम-पैसिव सोनार है। इसे एनपीओएल ने डिजाइन किया है, जबकि इसका निर्माण बेंगलुरु स्थित भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड ने किया है।

यह सिस्टम एक्टिव और पैसिव दोनों मोड में काम करता है। HUMSA-2020 की एक्टिव डिटेक्शन रेंज लगभग 40 किलोमीटर तक है। यह एक साथ आठ अलग-अलग टारगेट्स को ट्रैक कर सकता है। इसमें ऑटोमेटेड टॉरपीडो डिटेक्शन, डिजिटल डेटा रिकॉर्डिंग, टारगेट लाइब्रेरी और एडवांस्ड सिग्नल प्रोसेसिंग जैसी सुविधाएं मौजूद हैं।

युद्धपोत के ऑपरेटरों को जानकारी देने के लिए इसमें हाई-रिजॉल्यूशन मल्टी-फंक्शन कंसोल लगाए गए हैं। ये कंसोल सोनार और अन्य सेंसर से मिलने वाले डेटा को एक साथ दिखाते हैं, जिससे ऑपरेटर तेजी से फैसला ले सकते हैं। (NPOL Indigenous Sonar System)

दुश्मन की पनडुब्बी की गतिविधि पर रखता है नजर

HUMSA-2020 में कई एडवांस्ड फीचर्स शामिल किए गए हैं। इसमें एडैप्टिव प्रोसेसिंग, ब्रॉडबैंड और नैरोबैंड एनालिसिस, डिजिटल डेटा रिकॉर्डिंग और ऑटोमेटेड टॉरपीडो डिटेक्शन जैसी क्षमताएं मौजूद हैं।

सिस्टम टारगेट की ध्वनिक पहचान के लिए टारगेट लाइब्रेरी भी तैयार करता है। इससे किसी पनडुब्बी या अंडरवॉटर प्लेटफॉर्म की पहचान अधिक सटीकता से की जा सकती है।

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यदि किसी दुश्मन पनडुब्बी का पता पहले ही चल जाए तो युद्धपोत टॉरपीडो, एंटी-सबमरीन रॉकेट या अन्य हथियारों का इस्तेमाल सुरक्षित दूरी से कर सकता है।

इसमें सोनार परफॉर्मेंस मॉडलिंग सिस्टम और नियर-फील्ड अकॉस्टिक कैरेक्टराइजेशन सिस्टम जैसी सुविधाएं भी जोड़ी गई हैं। ऑपरेटरों के लिए हाई-रिजोल्यूशन मल्टी-फंक्शन कंसोल उपलब्ध हैं, जहां रडार और सोनार से मिलने वाली जानकारी एक साथ देखी जा सकती है। (NPOL Indigenous Sonar System)

कई युद्धपोतों पर पहले से तैनात है यह सिस्टम

सूत्रों ने बताया कि डीआरडीओ ने 2019 से 2022 के बीच HUMSA-NG को नई इलेक्ट्रॉनिक आर्किटेक्चर के साथ अपग्रेड करके HUMSA-2020 डेवलप किया था। यह सिस्टम पहले ही भारतीय नौसेना के कई युद्धपोतों पर तैनात किया जा चुका है।

अब तक इसके लिए 16 से अधिक ऑर्डर दिए जा चुके हैं। इनमें प्रोजेक्ट-17ए के सात युद्धपोत, तलवार श्रेणी के युद्धपोत, अतिरिक्त तलवार क्लास जहाज, आईएनएस राणा और आईएनएस ब्रह्मपुत्र शामिल हैं। (NPOL Indigenous Sonar System)

आईएनएस अग्रय के लिए खास तौर पर बनाया गया Abhay PG

जहां आईएनएस दुनागिरी खुले समुद्र में काम करता है, वहीं आईएनएस अग्रय का मुख्य काम तटीय और उथले समुद्री क्षेत्रों में पनडुब्बियों का पता लगाना है। ऐसे इलाकों में सोनार ऑपरेशन ज्यादा चुनौतीपूर्ण होता है क्योंकि समुद्री लहरें, चट्टानें, समुद्र तल की बनावट और जहाजों का ट्रैफिक ध्वनि संकेतों को प्रभावित करते हैं।

इसी कारण एनपीओएल ने आईएनएस अग्रय के लिए Abhay PG नाम का विशेष शैलो वॉटर सोनार डेवलप किया है। यह भी एक्टिव और पैसिव दोनों मोड में काम करता है।

यह एक कॉम्पैक्ट हुल-माउंटेड एक्टिव-कम-पैसिव सोनार है जिसे खास तौर पर छोटे युद्धपोतों और एंटी-सबमरीन वॉरफेयर प्लेटफॉर्म के लिए डिजाइन किया गया है। (NPOL Indigenous Sonar System)

उथले समुद्र में पनडुब्बियों की पहचान में सक्षम

अभय पीजी शैलो वॉटर सोनार सूट का हिस्सा है। यह सतह और पानी के भीतर मौजूद दोनों तरह के टारगेट्स को डिटेक्ट, लोकेलाइज, क्लासिफाई और ट्रैक कर सकता है।

इस सिस्टम में ट्रांसड्यूसर एरे, डेटा एक्विजिशन सिस्टम, पावर एम्प्लीफायर और ड्यूल मल्टी-फंक्शन कंसोल शामिल हैं। इसमें एडवांस्ड सिग्नल प्रोसेसिंग तकनीक का उपयोग किया गया है, जिससे समुद्र में मौजूद अनचाहे शोर को अलग करके वास्तविक लक्ष्य की पहचान की जा सकती है।

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यह सिस्टम पहले इस्तेमाल किए जा रहे विदेशी और रूसी मूल के सिस्टम का स्वदेशी विकल्प मानी जा रही है। (NPOL Indigenous Sonar System)

16 एंटी-सबमरीन युद्धपोतों में लगेगा यह सोनार

सूत्रों ने बताया कि अभय पीजी को भारतीय नौसेना के 16 शैलो वॉटर क्राफ्ट्स में लगाने की योजना है। इनमें जीआरएसई और कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड द्वारा बनाए जा रहे अर्नाला क्लास एंटी-सबमरीन वॉरफेयर शिप शामिल हैं।

इन युद्धपोतों का मुख्य कार्य भारत के तटीय क्षेत्रों और महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों की सुरक्षा करना है। ऐसे में इनके लिए उथले समुद्र में प्रभावी रूप से काम करने वाला सोनार जरूरी माना जाता है। (NPOL Indigenous Sonar System)

भारतीय महासागर की परिस्थितियों के लिए खास डिजाइन

सूत्रों ने बताया कि दोनों सोनार सिस्टम भारतीय महासागर क्षेत्र की विशेष परिस्थितियों को ध्यान में रखकर विकसित किए गए हैं। उष्णकटिबंधीय समुद्री क्षेत्रों में ध्वनि का व्यवहार ठंडे समुद्रों से अलग होता है। इसी वजह से विदेशी सिस्टम हमेशा सर्वोत्तम परिणाम नहीं दे पाते।

एनपीओएल ने इन सिस्टम्स को भारतीय समुद्री परिस्थितियों के अनुरूप तैयार किया है। इससे भारतीय नौसेना को स्थानीय वातावरण में बेहतर अंडरवाटर निगरानी क्षमता मिलती है। (NPOL Indigenous Sonar System)

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    हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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