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जानिए भारतीय सेना की AASHVAST लैब क्यों है खास? ड्रोन, सेंसर और मिलिट्री इलेक्ट्रॉनिक्स की करेगी सुरक्षा जांच

AASHVAST Facility
AASHVAST Explained: How Indian Army's New Facility Will Test Security and Cyber Resilience of Military Electronics and Drones

AASHVAST Facility: आधुनिक युद्ध में इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम, सेंसर, कम्युनिकेशन नेटवर्क, ड्रोन और सॉफ्टवेयर किसी भी सेना की ताकत का अहम हिस्सा बन चुके हैं। अगर इन सिस्टम्स में कोई कमजोरी छिपी रह जाए या दुश्मन साइबर हमले के जरिए इन्हें प्रभावित कर दे, तो पूरा सैन्य ऑपरेशन खतरे में पड़ सकता है।

इसी चुनौती को ध्यान में रखते हुए भारतीय सेना प्रमुख जनरल धीरज सेठ ने हाल ही में “आश्वस्त” (AASHVAST) नाम की एक खास सुविधा का उद्घाटन किया। इसका पूरा नाम असेसमेंट एंड एनालिसिस ऑफ इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम्स हार्डवेयर फॉर वल्नरेबिलिटीज एंड सिक्योरिटी थ्रेट्स है। यह सुविधा सेना के उन महत्वपूर्ण इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम्स की जांच करेगी, जिन पर मिशन की सफलता और सैनिकों की सुरक्षा निर्भर करती ह

AASHVAST Facility क्या है?

आश्वस्त को भारतीय सेना के हेडक्वॉर्टर टीजी ग्रुप ने डेवलप किया है। इसका उद्देश्य मिशन-क्रिटिकल सैन्य इलेक्ट्रॉनिक्स की सुरक्षा, विश्वसनीयता और मजबूती का आकलन करना है।

सरल शब्दों में समझें तो यह सुविधा यह पता लगाएगी कि सेना में इस्तेमाल होने वाले इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, कम्युनिकेशन सिस्टम, सेंसर, कंट्रोल यूनिट, प्रोसेसर और अन्य हार्डवेयर किसी साइबर हमले, छेड़छाड़ या तकनीकी कमजोरी के प्रति कितने सुरक्षित हैं।

आज किसी भी आधुनिक सैन्य प्लेटफॉर्म में हजारों इलेक्ट्रॉनिक पार्ट्स लगे होते हैं। इनमें से किसी एक कमजोर हिस्से का फायदा उठाकर दुश्मन पूरे सिस्टम को प्रभावित कर सकता है। आश्वस्त का काम ऐसी कमजोरियों को पहले ही पहचानना है।

इलेक्ट्रॉनिक्स पर निर्भर है सेना

कुछ साल पहले तक युद्ध का मतलब हथियारों और सैनिकों की संख्या से लगाया जाता था। लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। आज सेना की कमांड एंड कंट्रोल व्यवस्था, रडार, ड्रोन, मिसाइल गाइडेंस, नेविगेशन सिस्टम और संचार नेटवर्क पूरी तरह इलेक्ट्रॉनिक्स पर निर्भर हैं।

अगर किसी ड्रोन का कंट्रोल सिस्टम हैक हो जाए, किसी सेंसर में छिपा बैकडोर सक्रिय हो जाए या कम्युनिकेशन नेटवर्क बाधित हो जाए तो मिशन प्रभावित हो सकता है।

यही कारण है कि दुनिया की बड़ी सेनाएं अब साइबर सिक्योरिटी और हार्डवेयर सिक्योरिटी को भी किसी वेपन सिस्टम की तरह ही उतनी ही अहमियत दे रही हैं।

आश्वस्त को मिली कई महत्वपूर्ण मान्यताएं

आश्वस्त को कई महत्वपूर्ण संस्थाओं से मान्यता भी मिली है। आश्वस्त को मेइटी-एनआईसीएसआई लिस्टिंग, एनएबीएल एक्रिडिटेशन और एमएसडीई स्किल इंडिया द्वारा सेंटर ऑफ एक्सीलेंस का दर्जा मिला है।

जिसका मतलब है कि यहां होने वाली जांच और परीक्षण निर्धारित तकनीकी मानकों के अनुसार किए जाएंगे। साथ ही यह सुविधा डिफेंस सेक्टर के लिए विशेषज्ञ मानव संसाधन तैयार करने में भी भूमिका निभाएगी।

ड्रोन सेक्टर के लिए क्यों महत्वपूर्ण है आश्वस्त?

भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना में ड्रोन का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। निगरानी, टोही मिशन, लक्ष्य पहचान, संचार और कई अन्य कार्यों में ड्रोन अहम भूमिका निभा रहे हैं।

लेकिन किसी ड्रोन की असली ताकत सिर्फ उसकी उड़ान क्षमता नहीं होती। उसके भीतर लगे फ्लाइट कंट्रोलर, प्रोसेसर, सेंसर, नेविगेशन मॉड्यूल, कम्युनिकेशन सिस्टम, फर्मवेयर और सॉफ्टवेयर भी उतने ही महत्वपूर्ण होते हैं।

अगर इनमें कोई तकनीकी कमजोरी हो या सप्लाई चेन सुरक्षित न हो तो पूरा सिस्टम जोखिम में आ सकता है।

इसी वजह से रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि आश्वस्त जैसी सुविधा का दायरा सैन्य ड्रोन इकोसिस्टम तक भी बढ़ाया जाना चाहिए।

व्हाइट लेबल से व्हाइट लिस्टिंग की ओर बढ़ने की जरूरत

भारतीय डिफेंस सेक्टर में “मेक इन इंडिया” के तहत कई प्लेटफॉर्म तैयार किए जाते हैं। हालांकि कई बार ऐसा होता है कि किसी विदेशी तकनीक या विदेशी पार्ट्स को जोड़कर तैयार उत्पाद को भारतीय उत्पाद के रूप में पेश किया जाता है।

सूत्रों का कहना है कि अब केवल “इंडियन लेबल” लगाना काफी नहीं है। जरूरत “व्हाइट लिस्टिंग” की है, जहां हर महत्वपूर्ण तकनीक की विश्वसनीयता और सोर्स की पुष्टि हो।

सेना को यह पता होना चाहिए कि किसी ड्रोन या सैन्य सिस्टम में लगा प्रोसेसर कहां बना, उसका सॉफ्टवेयर किसके कंट्रोल में है और उसकी सप्लाई चेन कितनी सुरक्षित है।

हर मिलिट्री ड्रोन की गहन तकनीकी जांच जरूरी

सूत्रों के मुताबिक भविष्य में एक राष्ट्रीय व्हाइट लिस्ट ऑफ ट्रस्टेड ड्रोन प्लेटफॉर्म्स एंड क्रिटिकल कंपोनेंट्स बनाई जा सकती है।

इसके तहत हर सैन्य ड्रोन के फ्लाइट कंट्रोलर, प्रोसेसर, सेंसर, कम्युनिकेशन सिस्टम, नेविगेशन मॉड्यूल, फर्मवेयर, सॉफ्टवेयर और आईएसआर पेलोड की जांच की जा सकती है।

इससे यह सुनिश्चित होगा कि सिस्टम साइबर हमलों के खिलाफ कितना सुरक्षित है, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर की स्थिति में कैसे काम करेगा और उसके अंदर कोई छिपी कमजोरी तो नहीं है।

“ट्रस्टेड बाय डिजाइन” मॉडल पर जोर

आश्वस्त का उद्देश्य ऐसा डिफेंस टेक्नोलॉजी इकोसिस्टम बनाना है जिसे शुरुआत से ही भरोसेमंद तरीके से डिजाइन किया गया हो।

इस मॉडल में स्वदेशी डिजाइन अथॉरिटी, आईपीआर राइट्स पर कंट्रोल, सुरक्षित सप्लाई चेन, सोर्स कोड पर अधिकार और भारत में ही सिस्टम को अपग्रेड करने की क्षमता शामिल होती है। जिसे डिफेंस सेक्टर में इसे “ट्रस्टेड बाय डिजाइन” अप्रोच कहा जाता है।

आत्मनिर्भर भारत और टेक्नोलॉजी सॉवरेनिटी से जुड़ा कदम

आश्वस्त सुविधा आत्मनिर्भर भारत अभियान के रक्षा आयाम को मजबूत करने वाली पहल मानी जा रही है।

इसका फोकस केवल भारत में असेंबली करने पर नहीं बल्कि भारत में तकनीक विकसित करने, उसकी सुरक्षा जांचने और उस पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित करने पर है।

क्योंकि किसी भी देश की वास्तविक तकनीकी ताकत तब मानी जाती है जब वह अपने महत्वपूर्ण सैन्य सिस्टम की डिजाइन, सॉफ्टवेयर, हार्डवेयर और सप्लाई चेन पर पूरा नियंत्रण रखता हो। (AASHVAST Facility)

AMCA प्रोजेक्ट में बड़ा अपडेट! ADA ने इंडस्ट्री पार्टनर्स के लिए बदले कई नियम, स्टेल्थ फाइटर प्रोग्राम में जुड़ी नई टेस्टिंग शर्तें

AMCA RFP Changes
DRDO-ADA Revises AMCA RFP: Major Changes in Testing Infrastructure, Insurance Rules and Payment Structure.(Image for representational Purpose only. AI-Generated Image)

AMCA RFP Changes: भारत के सबसे महत्वाकांक्षी फाइटर एयरक्राफ्ट प्रोग्राम एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (एएमसीए) में एयरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी (एडीए) ने कई जरूरी संशोधन किए हैं। एडीए ने एएमसीए के आरएफपी में कई टेक्निकल और कमर्शियल बदलावों को शामिल किया है। हालांकि प्रोजेक्ट पूरा होने की समयसीमा, पांच फ्लाइंग प्रोटोटाइप और 1800 फ्लाइट सॉर्टी वाले ट्रायल प्रोग्राम्स में कोई बदलाव नहीं किया गया है।

एएमसीए भारत का पहला स्वदेशी पांचवीं पीढ़ी का स्टेल्थ लड़ाकू विमान होगा। इसे एडीए ने डिजाइन किया है जबकि इंडस्ट्री पार्टनर्स इसके निर्माण, इंटीग्रेशन, परीक्षण और सर्टिफिकेशन सपोर्ट में शामिल लेंगे। बता दें कि मई 2026 में रक्षा मंत्रालय ने इस प्रोजेक्ट के लिए आरएफपी जारी किया था।

AMCA RFP Changes: पहला बड़ा बदलाव: जोड़ा गया लाइटनिंग टेस्ट रिग

इसमें सबसे महत्वपूर्ण तकनीकी बदलाव लाइटनिंग टेस्ट रिग को शामिल करना है। ऑरिजनल आरएफपी में 24वें महीने तक तैयार होने वाली टेस्टिंग फैसिलिटीज में केवल मोबाइल ईएमआई/ईएमसी रिग शामिल था। अब नए संशोधन में मोबाइल ईएमआई/ईएमसी रिग के साथ लाइटनिंग टेस्ट रिग भी जोड़ा गया है।

आधुनिक लड़ाकू विमानों में बड़ी मात्रा में इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम लगे होते हैं। इनमें मिशन कंप्यूटर, फ्लाइट कंट्रोल सिस्टम, एईएसए रडार, डेटा लिंक, सेंसर और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम शामिल हैं। यदि उड़ान के दौरान विमान पर बिजली गिरती है तो इन सिस्टम्स पर गंभीर असर पड़ सकता है।

लाइटनिंग टेस्ट रिग का इस्तेमाल यह जांचने के लिए किया जाता है कि विमान का स्ट्रक्चर और उसके इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम बिजली गिरने जैसी स्थिति में कितने सुरक्षित रहते हैं। यह परीक्षण विशेष रूप से स्टेल्थ विमानों के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि उनमें बड़े पैमाने पर कंपोजिट मटेरियल और कॉम्प्लैक्स इलेक्ट्रॉनिक नेटवर्क का इस्तेमाल होता है।

एएमसीए में रडार एब्जॉर्बिंग मटेरियल, डिजिटल एवियोनिक्स और कॉम्प्रिहेंसिव कंपोजिट स्ट्रक्चर होने के चलते यह टेस्ट सर्टिफिकेशन प्रक्रिया का अहम हिस्सा माना जा रहा है। (AMCA RFP Changes)

डिलिवरेबल्स लिस्ट में भी हुआ बदलाव

नए संशोधन में डिलिवरेबल्स सेक्शन को भी अपडेट किया गया है। ऑरिजनल आरएफपी में कुछ टूलिंग और जिग्स की एंट्री दोहराई गई थी। विशेष रूप से वर्टिकल टेल असेंबली और सब-असेंबली जिग्स से जुड़ी एंट्री को सिस्टेमेटिक किया गया है।

संशोधन में उन सभी टेस्टिंग फैसिलिटीज की लिस्ट स्पष्ट रूप से दी गई है जिन्हें इंडस्ट्री पार्टनर को डेवलप करना होगा।

इनमें डायनामोमीटर, ईसीएस रिग, फ्यूल रिग, आईफास्ट, मोबाइल ईएमआई/ईएमसी रिग, लाइटनिंग टेस्ट रिग, एएचएमआई रिग, यूएटीएस, हाफ विंग टेस्ट रिग और रेन वाटर टेस्ट रिग शामिल हैं।

सूत्रों का कहना है कि एडीए एएमसीए के लिए कॉम्प्रिहेंसिव ग्राउंड टेस्टिंग इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करवाना चाहती है ताकि फ्लाइट ट्रायल्स शुरू होने से पहले सभी प्रमुख सिस्टम का सर्टिफिकेशन किया जा सके।

फ्री इश्यू मैटेरियल के बदले नियम

तीसरा बड़ा बदलाव फ्री इश्यू मैटेरियल यानी एफआईएम से जुड़ा है। एफआईएम वह मैटेरियल होती है जो एडीए इंडस्ट्री पार्टनर को उपलब्ध कराती है। ऑरिजनल आरएफपी में इन मैटेरियल्स के लिए कॉम्प्रिहेंसिव इंश्योरेंस कवर का प्रावधान था। यानी मैटेरियल के नुकसान की स्थिति में बीमा कवरेज मिलता।

लेकिन संशोधित नियमों में इसमें बदलाव किया गया है। अब एडीए केवल ट्रांजिट के दौरान एफआईएम का बीमा कवर करेगी। जिसके बाद मैटेरियल के एडीए से इंडस्ट्री पार्टनर तक पहुंचने तक ही बीमा कवर मिलेगा।

इसके बाद मैटेरियल की सेफ्टी, स्टोरेज, मैंटेनेंस और इस्तेमाल की जिम्मेदारी इंडस्ट्री पार्टनर की होगी।

यदि किसी मैटेरियल को गलत हैंडलिंग, अनुचित स्टोरेज या मैंटेनेंस की कमी के कारण नुकसान होता है तो उसकी मरम्मत या रिप्लेसमेंट कॉस्ट इंडस्ट्री पार्टनर को चुकानी पड़ सकती है। (AMCA RFP Changes)

पेमेंट सिस्टम में भी बदलाव

नए संशोधन में माइलस्टोन बेस्ड पेमेंट सिस्टम में भी बदलाव किए गए हैं। पहले कुछ कार्यों को एक ही पेमेंट कैटेगरी में रखा गया था, लेकिन अब उन्हें अलग-अलग हिस्सों में बांटा गया है।

उदाहरण के तौर पर 24वें महीने तक पूरे होने वाले कई कामों का भुगतान प्रतिशत अलग-अलग निर्धारित किया गया हैं। इससे इंडस्ट्री पार्टनर्स के लिए कैश फ्लो मैनेजमेंट अधिक सिस्टेमेटिक हो सकेगा।

इसके अलावा परफॉर्मेंस कम वारंटी बैंक गारंटी से जुड़े प्रावधानों को भी संशोधित किया गया है।

ऑरिजनल आरएफपी के तहत पूरी प्रोजेक्ट अवधि के दौरान पांच फीसदी बैंक गारंटी बनाए रखनी थी। संशोधित नियमों में कहा गया है कि प्रोजेक्ट पूरा होने के दो महीने बाद बैंक गारंटी को वारंटी हिस्से के अनुपात तक कम किया जा सकेगा। इससे इंडस्ट्री पार्टनर्स पर वित्तीय बोझ कुछ हद तक कम होगा। (AMCA RFP Changes)

साथ ही, संशोधन में एक और महत्वपूर्ण बदलाव प्राइस एडजस्टमेंट से जुड़ा है।

पहले लागत वृद्धि की गणना कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स फॉर इंडस्ट्रियल वर्कर्स के आधार पर की जानी थी। अब इसे होलसेल प्राइस इंडेक्स बेस्ड सिस्टम में बदला गया है। इसी तरह प्रोटोटाइप मैंटेनेंस कॉस्ट से जुड़े प्रावधानों में भी संशोधन किया गया है। (AMCA RFP Changes)

क्या है एएमसीए प्रोजेक्ट?

एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट एक ट्विन इंजन, मल्टी रोल और लो ऑब्जर्वेबल स्टेल्थ फाइटर जेट है। इसे भारतीय वायुसेना की भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखकर डेवलप किया जा रहा है। विमान में स्टेल्थ डिजाइन, इंटरनल वेपन बे, एडवांस्ड एईएसए रडार, सेंसर फ्यूजन, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सूट और आधुनिक एवियोनिक्स सिस्टम शामिल होंगे। एएमसीए मार्क1 में जीई एफ414 इंजन इस्तेमाल किए जाने की योजना है।

एएमसीए में एडवांस्ड एईएसए रडार, इंफ्रारेड सर्च एंड ट्रैक सिस्टम, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सूट, सुरक्षित डेटा लिंक और सेंसर फ्यूजन तकनीक शामिल होगी।

विमान के डिजिटल कॉकपिट में बड़े पैनोरमिक डिस्प्ले, हेलमेट माउंटेड डिस्प्ले और आधुनिक मिशन कंप्यूटर लगाए जाएंगे। फ्लाई-बाय-वायर तकनीक और एआई बेस्ड असिस्टेंस सिस्टम भी इसका हिस्सा होगी।

आरएफपी के अनुसार विमान पर लगभग 1800 फ्लाइट सॉर्टी परीक्षण किए जाएंगे। इसके लिए ग्राउंड टेस्ट रिग्स, स्ट्रक्चरल टेस्ट फैसिलिटी, ईएमआई-ईएमसी परीक्षण व्यवस्था और टेलीमेट्री सिस्टम विकसित किए जाएंगे।

आरएफपी के अनुसार इंडस्ट्री पार्टनर को पांच फ्लाइंग प्रोटोटाइप और एक स्ट्रक्चरल टेस्ट स्पेसिमेन तैयार करना होगा। इसके अलावा कई ग्राउंड टेस्ट रिग, जिग्स, फिक्स्चर और टेस्टिंग फैसिलिटीज भी डेवलप करनी होंगी। प्रोजेक्ट की कुल अवधि 84 महीने निर्धारित की गई है। (AMCA RFP Changes)

समयसीमा में कोई बदलाव नहीं

नए संशोधन में प्रोजेक्ट की मूल समयसीमा में कोई बदलाव नहीं किया गया है। योजना के अनुसार पहले प्रोटोटाइप की पहली उड़ान 30वें महीने में, दूसरे की 37वें महीने में, तीसरे की 46वें महीने में, चौथे की 52वें महीने में और पांचवें की 64वें महीने में प्रस्तावित है। इसी तरह 300, 600, 900, 1200, 1500 और 1800 फ्लाइट सॉर्टी तक का परीक्षण कार्यक्रम भी वैसे ही रखा गया है। (AMCA RFP Changes)

DRDO ने प्राइवेट इंडस्ट्री को दिया बड़ा मौका! अब निजी कंपनियां बनाएंगी स्ट्रेटेजिक मिसाइलें और बम सिस्टम

DRDO strategic weapons
DRDO Opens Strategic Missile and Bomb Weapon Programs to Private Industry, Invites Indian Firms as Development Partners. (Image for representational Purpose only. AI-Generated Image)

DRDO strategic weapons: डीआरडीओ ने मिसाइल और बम वेपन सिस्टम से जुड़े भविष्य के विकास और उत्पादन कार्यक्रमों के लिए निजी कंपनियों से आवेदन मांगे हैं। यह पहल डीआरडीओ के डायरेक्टर जनरल (मिसाइल्स एंड स्ट्रैटेजिक सिस्टम्स) यानी डीजी (एमएसएस) क्लस्टर के तहत शुरू की गई है। इसके लिए हैदराबाद स्थित रिसर्च सेंटर इमारत (आरसीआई) ने एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (ईओआई) जारी किया है।

यही क्लस्टर भारत की कई प्रमुख रणनीतिक मिसाइल परियोजनाओं पर काम करता है। इनमें अग्नि सीरीज की बैलिस्टिक मिसाइलें, पनडुब्बी से दागी जाने वाली मिसाइल प्रणालियां और अन्य सामरिक हथियार शामिल हैं।

अब तक ऐसे हथियारों का उत्पादन मुख्य रूप से सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां करती थीं। लेकिन नई व्यवस्था के तहत निजी उद्योग भी विकास से लेकर बड़े पैमाने पर उत्पादन तक की प्रक्रिया में भागीदार बन सकेंगे।

DRDO strategic weapons: क्या है डीजी (एमएसएस) क्लस्टर?

डीजी एमएसएस यानी डायरेक्टर जनरल (मिसाइल्स एंड स्ट्रैटेजिक सिस्टम्स) डीआरडीओ का सबसे महत्वपूर्ण टेक्नोलॉजी क्लस्टर माना जाता है। इसका मुख्यालय हैदराबाद में स्थित है।

इस क्लस्टर के अंतर्गत डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट लेबोरेटरी (डीआरडीएल), रिसर्च सेंटर इमारत (आरसीआई), एडवांस्ड सिस्टम्स लेबोरेटरी (एएसएल), टर्मिनल बैलिस्टिक्स रिसर्च लेबोरेटरी (टीबीआरएल) और इंटीग्रेटेड टेस्ट रेंज (आईटीआर) जैसी प्रमुख प्रयोगशालाएं आती हैं।

यही संस्थान देश की मिसाइल तकनीक, गाइडेंस सिस्टम, नेविगेशन, प्रोपल्शन, वारहेड, लॉन्चर और कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम विकसित करते हैं।

क्या चाहता है डीआरडीओ?

डीआरडीओ की इस पहल के तहत भविष्य में आने वाली विभिन्न मिसाइल और बम वेपन सिस्टम परियोजनाओं के लिए योग्य निजी कंपनियों की पहचान की जाएगी।

इन कंपनियों को डेवलपमेंट कम प्रोडक्शन पार्टनर यानी डीसीपीपी बनाया जाएगा। बाद में जब किसी विशेष मिसाइल या हथियार परियोजना के लिए आरएफपी जारी होगा तो इन्हीं शॉर्टलिस्ट कंपनियों में से चयन किया जाएगा।

डीआरडीओ चाहता है कि उद्योग केवल प्रोडक्शन तक सीमित न रहे बल्कि डिजाइन सपोर्ट, इंटीग्रेशन, ट्रायल, दस्तावेजीकरण, सप्लाई चेन और लाइफ साइकिल सपोर्ट जैसी जिम्मेदारियां भी संभाले। (DRDO strategic weapons)

किन कंपनियों को मिलेगा मौका?

डीआरडीओ ने स्पष्ट किया है कि केवल भारतीय कंपनियां ही इस प्रक्रिया में भाग ले सकती हैं। कंपनी के पास रक्षा उत्पादन के लिए इंडस्ट्रियल लाइसेंस होना जरूरी है। इसके साथ विस्फोटकों के स्टोरज और ऑपरेशन के लिए पीईएसओ लाइसेंस भी आवश्यक होगा।

यदि किसी कंपनी के पास अभी कुछ लाइसेंस नहीं हैं तो उसे निर्धारित समय सीमा के भीतर उन्हें हासिल करने का आश्वासन देना होगा।

वित्तीय योग्यता भी होगी अहम

डीआरडीओ ने केवल तकनीकी क्षमता ही नहीं बल्कि वित्तीय मजबूती को भी महत्वपूर्ण माना है। ईओआई के अनुसार कंपनी का न्यूनतम वार्षिक कारोबार 100 करोड़ रुपये होना चाहिए। कंपनी की नेटवर्थ कम से कम 34 करोड़ रुपये या प्रस्तावित परियोजना मूल्य के 5 फीसदी से अधिक होनी चाहिए।

पिछले पांच वर्षों में कम से कम दो वर्षों तक कंपनी लाभ में रही हो। इसके अलावा क्रिसिल, आईसीआरए या समकक्ष एजेंसी से कम से कम बीबीबी रेटिंग होना भी जरूरी है। (DRDO strategic weapons)

हर परियोजना के लिए चुनी जाएंगी दो कंपनियां

डीआरडीओ ने एक नया मॉडल अपनाया है। इसके तहत प्रत्येक परियोजना के लिए आमतौर पर दो डेवलपमेंट और प्रोडक्शन के लिए साझेदार चुने जाएंगे।

दोनों कंपनियां डीआरडीओ के साथ मिलकर प्रोटोटाइप तैयार करेंगी। परीक्षण सफल होने के बाद बड़े पैमाने पर उत्पादन में भी उनकी भूमिका रहेगी। साथ ही इससे कंपनियों में प्रतिस्पर्धा भी बनी रहेगी और उत्पादन क्षमता को भी बढ़ावा मिलेगा।

किन क्षमताओं की होगी जांच?

डीआरडीओ की विशेषज्ञ समिति कंपनियों की तकनीकी क्षमता का विस्तृत मूल्यांकन करेगी। कंपनियों के पास मिसाइल इंटीग्रेशन, परीक्षण, क्वालिटी एश्योरेंस और सिस्टम इंजीनियरिंग का अनुभव होना चाहिए।

विशेष रूप से रेडियो फ्रीक्वेंसी सीकर, इंफ्रारेड इमेजिंग सीकर, एम्बेडेड सिस्टम, कंट्रोल सिस्टम, सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट और एयरवर्दीनेस क्वालिफिकेशन जैसे क्षेत्रों में विशेषज्ञता रखने वाली कंपनियों को लाभ मिल सकता है।

इसके अलावा उत्पादन सुविधाएं, पर्यावरण परीक्षण लैब, ईएमआई-ईएमसी टेस्ट सुविधा, मैकेनिकल वर्कशॉप और बड़े पैमाने पर उत्पादन की क्षमता भी देखी जाएगी।

वहीं, डीआरडीओ की विशेषज्ञ टीम कंपनियों के कारखानों और सुविधाओं का दौरा भी करेगी। टीम यह जांचेगी कि कंपनी के पास आवश्यक मशीनरी, तकनीकी विशेषज्ञ, सुरक्षा व्यवस्था और उत्पादन क्षमता मौजूद है या नहीं।

इसी मूल्यांकन के आधार पर अंतिम शॉर्टलिस्ट तैयार की जाएगी। (DRDO strategic weapons)

मिसाइल निर्माण में क्या होगी निजी उद्योग की भूमिका?

चयनित कंपनियां केवल पार्ट्स सप्लाई नहीं करेंगी। उन्हें डीआरडीओ की परियोजनाओं में इंजीनियर और तकनीशियन तैनात करने होंगे। वे इंटीग्रेशन टूल्स, जिग्स, हैंडलिंग इक्विपमेंट और उत्पादन दस्तावेज तैयार करेंगी।

इसके अलावा वे परीक्षण प्रक्रिया में भाग लेंगी, सप्लाई चेन का प्रबंधन करेंगी और उत्पादन शुरू होने के बाद रखरखाव तथा तकनीकी सहायता भी उपलब्ध कराएंगी।

उन्हें पूरी लाइफ साइकल के दौरान सिस्टम सपोर्ट की जिम्मेदारी भी दी जा सकती है। (DRDO strategic weapons)

ट्रांसफर ऑफ टेक्नोलॉजी भी मिलेगा

डीआरडीओ ने ईओआई में कहा है कि चयनित साझेदारों को ट्रांसफर ऑफ टेक्नोलॉजी यानी टीओटी उपलब्ध कराया जाएगा। यह टीओटी नॉन-स्पेसिफिक बेस पर होगी, यानी एक से अधिक कंपनियां इसका लाभ ले सकेंगी।

हालांकि विस्फोटक और प्रोपेलेंट से जुड़ी तकनीकों के लिए अतिरिक्त सरकारी मंजूरी आवश्यक होगी। (DRDO strategic weapons)

भारतीय सेना के 2 हेरॉन ड्रोन रनवे पर हुए क्षतिग्रस्त? इजरायली कंपनी करेगी मरम्मत, 6 महीने में होंगे ऑपरेशनल

Indian Army Heron Drone Repair
Why Did Indian Army's Heron Drones Get Damaged? Inside the New Repair Contract for Two Accident-Hit UAVs. (Image for representational Purpose only. AI-Generated Image)

Indian Army Heron Drone Repair: भारतीय सेना ने अपने दो दुर्घटनाग्रस्त हेरॉन रिमोटली पायलटेड एयरक्राफ्ट सिस्टम (आरपीएएस) की मरम्मत के लिए नई आरएफपी जारी की है। सेना के हेरॉन ड्रोन रनवे साइन से टकराने के कारण क्षतिग्रस्त हो गए थे। इन दोनों प्लेटफॉर्म को फिर से ऑपरेशनल करने के लिए रक्षा मंत्रालय के इंटीग्रेटेड एचक्यू ऑफ एमओडी ने आरएफपी जारी की है।

दिलचस्प बात यह है कि इसी साल की शुरुआत में भारतीय सेना ने तीन अन्य दुर्घटनाग्रस्त हेरॉन ड्रोन की मरम्मत के लिए भी अलग आरएफपी जारी किया था।

Indian Army Heron Drone Repair: क्या है पूरा मामला?

ये दोनों हेरॉन आरपीएएस किसी समय रनवे पर लगे साइन बोर्ड से टकरा गए थे। सेना ने इस मरम्मत कार्य के लिए इजरायली मूल उपकरण निर्माता (ओईएम) आईएआई की मैलेट डिवीजन और उसकी भारतीय सहयोगी कंपनी एलकॉम के माध्यम से काम कराने का फैसला किया है। मैलेट हेरॉन ड्रोन परिवार की ऑरिजनल मैन्युफैक्चरिंग युनिट है, जबकि एलकॉम भारत में इनके रखरखाव, मरम्मत और ओवरहॉल का काम देखती है।

किन ड्रोन की होगी मरम्मत?

आरएफपी में दो अलग-अलग प्लेटफॉर्म का उल्लेख किया गया है। पहले हेरॉन आरपीए में सेंट्रल विंग, फ्लैप्स, आउटबोर्ड विंग, ऐलरॉन और अन्य स्ट्रक्चरल हिस्सों को नुकसान पहुंचा है। इस प्लेटफॉर्म पर स्ट्रक्चरल रिपेयर, ग्राउंड एक्सेप्टेंस टेस्ट प्रोसीजर और फंक्शनल चेक फ्लाइट कराई जाएगी।

दूसरे हेरॉन आरपीए के फ्यूजलाज, विंग्स, इंजन काउलिंग और अन्य स्ट्रक्चरल हिस्सों को क्षति पहुंची है। इस ड्रोन में इंजन ओवरहॉल के बाद सर्विसेबल इंजन लगाया जाएगा। नया प्रोपेलर भी लगाया जाएगा और फिर पूरे प्लेटफॉर्म का इंटीग्रेशन तथा टेस्टिंग की जाएगी।

दोनों की मरम्मत के बाद ग्राउंड टेस्ट, वेट एंड बैलेंस चेक, परफॉर्मेंस टेस्ट फ्लाइट और ऑन-साइट एक्सेप्टेंस फ्लाइट टेस्ट अनिवार्य होंगे।

हेरॉन ड्रोन क्यों हैं महत्वपूर्ण?

हेरॉन आरपीएएस भारतीय सेना की इंटेलिजेंस, सर्विलांस और रिकॉनिसेंस क्षमताओं का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इन्हें इजरायल एयरोस्पेस इंडस्ट्रीज ने डेवलप किया है और भारतीय सेनाएं दो दशकों से अधिक समय से इनका इस्तेमाल कर रही हैं।

ऑपरेशन सिंदूर में भी हेरॉन एमके-2 ड्रोन ने महत्वपूर्ण आईएसआर भूमिका निभाई थी।

कारगिल युद्ध के बाद सीमावर्ती इलाकों में बेहतर निगरानी की आवश्यकता महसूस हुई थी। इसके बाद भारतीय सेना, वायुसेना और नौसेना ने हेरॉन ड्रोन को अपने बेड़े में शामिल किया। समय के साथ इन प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल एलएसी, एलओसी और अन्य संवेदनशील क्षेत्रों में निगरानी के लिए किया जाने लगा।

समय के साथ इनकी संख्या और क्षमता दोनों बढ़ीं। पहले हेरॉन एमके-1 वर्जनआया और बाद में अधिक एडवांस हेरॉन एमके-2 को शामिल किया गया। हेरॉन एमके-2 में सैटेलाइट कम्युनिकेशन, लंबी उड़ान क्षमता और बेहतर सेंसर जैसी सुविधाएं मौजूद हैं।

हेरॉन एक मीडियम एल्टीट्यूड लॉन्ग एंड्योरेंस यानी एमएएलई श्रेणी का ड्रोन है। आधुनिक संस्करण 35,000 फीट तक उड़ान भर सकते हैं और 45 घंटे से अधिक समय तक हवा में बने रह सकते हैं। इनमें इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल सेंसर, इंफ्रारेड कैमरे, सिंथेटिक एपर्चर रडार (एसएआर) और सिग्नल इंटेलिजेंस उपकरण लगाए जा सकते हैं। यही वजह है कि हेरॉन ड्रोन को सीमा निगरानी और खुफिया जानकारी जुटाने के लिए बेहद उपयोगी माना जाता है।
छह महीने में पूरा होगा काम

आरएफपी के अनुसार कॉन्ट्रैक्ट प्रभावी होने की तारीख से छह महीने के भीतर मरम्मत कार्य पूरा करना होगा। डिलीवरी डीडीपी आधार पर होगी, यानी मरम्मत के बाद ड्रोन भारतीय सेना की बताई जगह पर पहुंचाए जाएंगे।

दुर्घटनाएं क्यों बनीं चिंता की वजह?

हालांकि हेरॉन ड्रोन लंबे समय से सफलतापूर्वक ऑपरेशन में इस्तेमाल किए जा रहे हैं, लेकिन पिछले कुछ सालों में कई हादसे भी हुए हैं। लगभग 23 सालों के ऑपरेशन के दौरान भारतीय हेरॉन बेड़े को करीब 14 दुर्घटनाओं का सामना करना पड़ा है।

2025 में भी कुछ हेरॉन एमके-2 ड्रोन नियमित उड़ान और लैंडिंग के दौरान दुर्घटनाग्रस्त हुए थे। ऐसी घटनाओं में अक्सर विंग, इंजन, लैंडिंग गियर और एयरफ्रेम जैसे महत्वपूर्ण हिस्सों को नुकसान पहुंचता है। इनकी मरम्मत सामान्य स्तर पर नहीं की जा सकती और इसके लिए मूल निर्माता या अधिकृत तकनीकी साझेदार की आवश्यकता होती है।

इसी साल पहले भी निकाला था आरएफपी

जनवरी 2026 में भारतीय सेना ने तीन दुर्घटनाग्रस्त हेरॉन आरपीएएस की मरम्मत के लिए भी आरएफपी जारी किया था। मरम्मत के दौरान नए सेंट्रल विंग तैयार किए जाने थे। सेंट्रल विंग किसी भी ड्रोन का सबसे महत्वपूर्ण संरचनात्मक हिस्सा होता है, क्योंकि वही पूरे प्लेटफॉर्म की एयरोडायनामिक स्थिरता और भार वहन क्षमता सुनिश्चित करता है।

इसके अलावा इंजन बिल्ड-अप असेंबली बॉक्स को भी पुनर्निर्मित किया जाना था। यह हिस्सा इंजन और अन्य प्रणालियों के बीच समन्वय स्थापित करता है और ड्रोन के प्रदर्शन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

लैंडिंग गियर जैसे महत्वपूर्ण हिस्सों की मरम्मत या बदलाव भी प्रस्ताव का हिस्सा था। लैंडिंग गियर आमतौर पर हार्ड लैंडिंग या जमीन पर होने वाली दुर्घटनाओं में सबसे पहले क्षतिग्रस्त होते हैं।

भारतीय सेना के पास कितने हैं हेरॉन ड्रोन?

भारतीय सेनाओं के पास हेरॉन यूएवी (अनमैन्ड एरियल व्हीकल) का बड़ा बेड़ा है। भारत को अब तक लगभग 68 हेरॉन ड्रोन मिल चुके हैं।

हालांकि इनमें से कुछ ड्रोन समय-समय पर हादसों में क्षतिग्रस्त या नष्ट भी हुए हैं। रिपोर्टों के अनुसार 2024 तक कम से कम 12 हेरॉन एमके-1 ड्रोन दुर्घटनाओं क शिकार हो चुके हैं।

भारतीय सेना के पास 30 से अधिक हेरॉन एमके-1 ड्रोन हैं। इनमें पूर्वी कमान के तहत तैनात कई ड्रोन भी शामिल हैं। इसके अलावा सेना ने 2022 में चीन सीमा पर निगरानी बढ़ाने के लिए 4 हेरॉन एमके-2 ड्रोन भी शामिल किए थे।

भारतीय वायु सेना के पास भी हेरॉन एमके-1 ड्रोन का एक बड़ा हिस्सा है। इसके साथ उसे कम से कम 4 हेरॉन एमके-2 मिले हैं और पहले अतिरिक्त एमके-2 ड्रोन का भी ऑर्डर दिया गया था।

भारतीय नौसेना के पास लगभग 8 हेरॉन एमके-1 ड्रोन हैं, जिनका इस्तेमाल समुद्री निगरानी और हिंद महासागर क्षेत्र में गतिविधियों पर नजर रखने के लिए किया जाता है।

गलवान घाटी की घटना के बाद 2020 में भारत ने आपातकालीन खरीद के तहत हेरॉन एमके-2 ड्रोन हासिल करने की प्रक्रिया तेज की थी। बाद में इनकी संख्या और बढ़ाई गई। (Indian Army Heron Drone Repair)

1950 से शुरू हुई परंपरा, लेकिन 1969 में पहली बार नेपाली सेना प्रमुख बने थे भारतीय सेना के मानद जनरल, पढ़ें 76 साल पुरानी परंपरा की कहानी

Honorary General Rank Nepal India
Why Nepal Conferred the Honorary Rank of General on Indian Army Chief Gen Dhiraj Seth: The 76-Year-Old Military Tradition Explained

Honorary General Rank Nepal India: भारतीय सेना प्रमुख जनरल धीरज सेठ को सोमवार को नेपाल के राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल ने काठमांडू स्थित शीतल निवास में आयोजित विशेष समारोह में नेपाली सेना के मानद जनरल (ऑनरेरी जनरल) की रैंक प्रदान की। इस अवसर पर उन्हें पारंपरिक तलवार, रैंक इंसिग्निया और आधिकारिक प्रमाणपत्र भी सौंपा गया।

हालांकि कहने के लिए यह सम्मान केवल एक औपचारिक सैन्य समारोह है, लेकिन इसके पीछे भारत और नेपाल के बीच सात दशक से भी अधिक पुराना सैन्य इतिहास, रणनीतिक विश्वास और विशेष संबंध जुड़े हुए हैं। दुनिया में बहुत कम ऐसे उदाहरण मिलते हैं, जहां दो पड़ोसी देशों की सेनाएं एक-दूसरे के सेना प्रमुखों को अपनी सेना का मानद जनरल नियुक्त करती हों।

Honorary General Rank Nepal India: जनरल धीरज सेठ की नेपाल यात्रा

भारतीय सेना की ओर से जारी बयान के मुताबिक जनरल धीरज सेठ 17 से 19 अगस्त 2026 तक नेपाल की आधिकारिक यात्रा पर हैं।

इस दौरान उन्होंने नेपाल के शीर्ष सैन्य और राजनीतिक नेतृत्व से मुलाकात की। मानद जनरल की रैंक प्रदान किया जाना इस यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण कार्यक्रम रहा।

भारतीय सेना ने अपने बयान में कहा कि यह सम्मान केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि दोनों सेनाओं के बीच पारस्परिक विश्वास, पेशेवर सम्मान और सैन्य भाईचारे की संस्थागत अभिव्यक्ति है।

काठमांडू में आयोजित समारोह ने एक बार फिर उस सैन्य परंपरा को दोहराया, जो दशकों से भारत और नेपाल के रक्षा संबंधों की पहचान बनी हुई है।

क्या है मानद जनरल की रैंक?

मानद जनरल की रैंक पूरी तरह से एक सेरेमोनियल सैन्य सम्मान है। इसका मतलब यह नहीं होता कि किसी देश का सेना प्रमुख दूसरे देश की सेना में कमांड संभाल सकता है या उसे वहां कोई सैन्य अधिकार मिल जाता है।

यह सम्मान दोनों सेनाओं के बीच विश्वास, पेशेवर सम्मान और लंबे समय से चले आ रहे रिश्तों का प्रतीक माना जाता है। इसी कारण नेपाल के सेना प्रमुख को भारतीय सेना का मानद जनरल बनाया जाता है और भारतीय सेना प्रमुख को नेपाली सेना का। (Honorary General Rank Nepal India)

17 अगस्त को हुए समारोह में जनरल धीरज सेठ को यही सम्मान प्रदान किया गया।

1950 से शुरू हुई परंपरा

इस परंपरा की जड़ें भारत और नेपाल के ऐतिहासिक संबंधों में हैं। जुलाई 1950 में भारत और नेपाल के बीच शांति एवं मैत्री संधि पर हस्ताक्षर हुए थे। इसी दौर में दोनों देशों ने सैन्य संबंधों को भी नई दिशा दी।

नेपाल ने सबसे पहले 1952 में भारतीय सेना प्रमुख जनरल केएम करियप्पा को मानद जनरल की रैंक प्रदान की थी।

उस समय नेपाल में राजनीतिक परिवर्तन का दौर चल रहा था और राणा शासन समाप्ति की ओर बढ़ रहा था। भारत और नेपाल दोनों ही नए संबंधों को संस्थागत रूप देने की कोशिश कर रहे थे। (Honorary General Rank Nepal India)

क्या भारत ने भी नेपाली सेना प्रमुख को दिया था सम्मान?

इस विषय पर अक्सर भ्रम देखने को मिलता है। राणा शासन के खत्म होने के बाद भारत ने नेपाल के राजाओं को मानद सैन्य रैंक देना शुरू किया। 1950 के राजनीतिक बदलाव के बाद नेपाल सेना के प्रमुख बने कैसर शमशेर राणा और किरण शमशेर राणा भारत नहीं आए, इसलिए उन्हें यह सम्मान नहीं मिल सका। बाद में नेपाल सेना प्रमुख के रूप में तोरण शमशेर ने 1958 और निर शमशेर ने 1964 में भारत का दौरा किया, लेकिन उन्हें भी भारतीय सेना का मानद जनरल नहीं बनाया गया।

राजनीतिक बदलाव के बाद भारत ने पहले नेपाल के राजा त्रिभुवन और बाद में राजा महेंद्र को मानद सैन्य रैंक प्रदान की थी। लेकिन किसी सेवारत नेपाली सेना प्रमुख को भारतीय सेना का मानद जनरल बनाने की औपचारिक परंपरा बाद में स्थापित हुई। (Honorary General Rank Nepal India)

1969 में हुआ पहला पूर्ण पारस्परिक कदम

इस बीच 1960 में नेपाल ने स्वतंत्र भारत के दूसरे सेना प्रमुख जनरल के.एस. थिमैया को नेपाली सेना का मानद जनरल नियुक्त किया।

नेपाल सेना के प्रमुख के रूप में निर शमशेर राणा के बाद जनरल सुरेन्द्र बहादुर शाह नियुक्त हुए। वे 1966 में दो सप्ताह की भारत यात्रा पर आए थे, लेकिन तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के निधन के कारण उन्हें अपनी यात्रा बीच में ही छोड़कर नेपाल लौटना पड़ा।

इसके बाद दिसंबर 1969 में भारतीय सेना प्रमुख जनरल सैम मानेकशॉ के निमंत्रण पर जनरल सुरेन्द्र बहादुर शाह फिर भारत आए। वे भारतीय वायुसेना के विशेष विमान से 10 दिन की यात्रा पर नई दिल्ली पहुंचे। पालम हवाई अड्डे पर स्वयं जनरल मानेकशॉ ने उनका स्वागत किया और उन्हें गार्ड ऑफ ऑनर भी दिया गया।

दिल्ली पहुंचने के बाद जनरल शाह ने गांधी स्मारक पर श्रद्धांजलि अर्पित की। उसी शाम हैदराबाद हाउस में भारतीय सेना प्रमुख की ओर से उनके सम्मान में रात्रिभोज का आयोजन किया गया।

अगले दिन उन्होंने तत्कालीन रक्षा मंत्री सरदार स्वर्ण सिंह और रक्षा सचिव हरिश्चंद्र सरिन से मुलाकात की। इसी दिन राष्ट्रपति भवन में आयोजित विशेष समारोह में तत्कालीन राष्ट्रपति वी.वी. गिरि ने जनरल सुरेन्द्र बहादुर शाह को भारतीय सेना के मानद जनरल की रैंक, इंसिग्निया और तलवार प्रदान की।

राणा और शाह शासकों के दौर के बाद यह पहला अवसर था जब नेपाल सेना के किसी सेवारत प्रमुख को भारतीय सेना का मानद जनरल बनाया गया। उनके सम्मान में एक विशेष दोपहर भोज का भी आयोजन किया गया।

इस दौरान जनरल सुरेन्द्र बहादुर शाह ने भारतीय सेना प्रमुख जनरल सैम मानेकशॉ को स्मृति चिह्न के रूप में चांदी की एक खुकरी भेंट की। (मिलिट्री न्यूज, इंडिया वॉल्यूम 51, 28 दिसंबर, 1969)

जनरल शाह ने दिल्ली में दो दिन बिताए। इसके बाद उन्होंने जम्मू-कश्मीर, देहरादून और आगरा सहित कई सैन्य और ऐतिहासिक स्थलों का दौरा किया। अपनी 10 दिन की यात्रा पूरी करने के बाद वे दिसंबर 1969 में नेपाल लौट गए। यह यात्रा भारत और नेपाल की सेनाओं के बीच मानद जनरल की परंपरा को औपचारिक और मजबूत आधार देने वाली महत्वपूर्ण घटना मानी जाती है। (भारतीय सेना का 1 दिसंबर, 1969 का प्रेस वक्तव्य) (Honorary General Rank Nepal India)

विवादों में भी जारी रही यह परंपरा

भारत और नेपाल के संबंधों में समय-समय पर कई राजनीतिक उतार-चढ़ाव आए। 2015 का सीमा और आपूर्ति विवाद हो या अन्य कूटनीतिक मतभेद, लेकिन सैन्य स्तर पर यह परंपरा लगातार जारी रही।

उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार पिछले करीब 76 वर्षों में यह सम्मान देने की प्रक्रिया कभी औपचारिक रूप से रुकी नहीं।

यही कारण है कि इसे दोनों देशों के बीच सबसे स्थायी और मजबूत संस्थागत संबंधों में से एक माना जाता है।

मानद जनरल की रैंक प्रदान करने के दौरान आमतौर पर एक औपचारिक सैन्य समारोह आयोजित किया जाता है।

इसमें संबंधित सेना प्रमुख को मानद रैंक का इंसिग्निया, आधिकारिक प्रमाणपत्र और पारंपरिक सैन्य तलवार प्रदान की जाती है। नेपाल में यह तलवार विशेष महत्व रखती है क्योंकि यह वहां की सैन्य परंपरा और गौरव का प्रतीक मानी जाती है।

17 अगस्त 2026 को जनरल धीरज सेठ को भी यही सम्मान दिया गया। (Honorary General Rank Nepal India)

भारत-नेपाल सैन्य संबंध इतने खास क्यों हैं?

भारत और नेपाल के सैन्य संबंध केवल औपचारिक रक्षा सहयोग तक सीमित नहीं हैं। दोनों देशों की सेनाओं के बीच लंबे समय से प्रशिक्षण, सैन्य अभ्यास, आपदा राहत और सीमा सुरक्षा को लेकर सहयोग चलता रहा है।

नेपाल की भौगोलिक स्थिति भी भारत के लिए महत्वपूर्ण है। नेपाल की लगभग 1,850 किलोमीटर लंबी सीमा भारत के पांच राज्यों—सिक्किम, पश्चिम बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड—से लगती है।

खुली सीमा व्यवस्था के कारण दोनों देशों के लोगों के बीच भी गहरे सामाजिक और सांस्कृतिक संबंध हैं। (Honorary General Rank Nepal India)

गोरखा सैनिकों का भी है बड़ा योगदान

भारत और नेपाल के सैन्य रिश्तों की चर्चा गोरखा सैनिकों के बिना अधूरी मानी जाती है। दो सौ साल से अधिक समय से नेपाली मूल के गोरखा सैनिक विभिन्न सैन्य इकाइयों में सेवा देते रहे हैं। स्वतंत्रता के बाद भारत, नेपाल और ब्रिटेन के बीच हुए त्रिपक्षीय समझौते के तहत भारतीय सेना में गोरखा भर्ती जारी रही।

हाल के वर्षों में अग्निपथ योजना लागू होने के बाद नेपाली नागरिकों की नई भर्ती प्रभावित हुई है, लेकिन गोरखा रेजिमेंटों का ऐतिहासिक महत्व आज भी बना हुआ है। (Honorary General Rank Nepal India)

भारत ने फिर लीज पर क्यों लिए 2 MQ-9B Sea Guardian, 2029 तक इंतजार क्यों नहीं कर सकती थी नेवी?

MQ-9B Sea Guardian Lease Deal
Why Did Indian Navy Lease Two MQ-9B Sea Guardian Drones Despite Buying 31 MQ-9Bs? Explained (Image for representational Purpose only. AI-Generated Image)

रक्षा मंत्रालय ने अमेरिकी कंपनी जनरल एटॉमिक्स एरोनॉटिकल सिस्टम्स इंक (GA-ASI) के साथ भारतीय नौसेना के लिए दो एमक्यू-9बी सी गार्डियन हाई-एल्टीट्यूड लॉन्ग-एंड्योरेंस रिमोटली पायलटेड एयरक्राफ्ट सिस्टम्स की लीज का समझौता किया है। यह कॉन्ट्रैक्ट करीब 1,943 करोड़ रुपये का है और यह 30 महीने यानी ढाई साल के लिए लीज पर लिए गए हैं।

MQ-9B Sea Guardian Lease Deal: क्या है एमक्यू-9बी सी गार्डियन?

एमक्यू-9बी सी गार्डियन दुनिया के सबसे एडवांस समुद्री निगरानी ड्रोन में गिना जाता है। इसे अमेरिकी कंपनी जनरल एटॉमिक्स ने डेवलप किया है। इसे विशेष रूप से समुद्री क्षेत्र में लंबी दूरी की निगरानी, खुफिया जानकारी जुटाने और संदिग्ध गतिविधियों पर नजर रखने के लिए डिजाइन किया गया है।

यह एक हाई-एल्टीट्यूड लॉन्ग-एंड्योरेंस (HALE) प्लेटफॉर्म है। यह बहुत अधिक ऊंचाई पर लंबे समय तक उड़ान भर सकता है। ड्रोन करीब 40,000 फीट की ऊंचाई तक ऑपरेट कर सकता है और लगातार 40 घंटे तक हवा में रह सकता है।

इसमें हनीवेल टीपीई331-10 टर्बोप्रॉप इंजन लगा है, जिसकी मदद से यह 310 किलोमीटर प्रति घंटे से अधिक की गति से उड़ सकता है।

नेवी को अभी इन ड्रोन की जरूरत क्यों पड़ी?

इस डील को समझने के लिए 2024 में हुए भारत-अमेरिका ड्रोन समझौते को देखना जरूरी है।

अक्टूबर 2024 में भारत ने अमेरिका से 31 एमक्यू-9बी ड्रोन खरीदने का लगभग 4 अरब डॉलर का समझौता किया था। इनमें 15 सी गार्डियन ड्रोन नौसेना, 8 स्काई गार्डियन थल सेना और 8 वायुसेना को मिलने हैं।

लेकिन इन ड्रोन की डिलीवरी में अभी वक्त है। सूत्रों के मुताबिक पहला ड्रोन जनवरी 2029 में मिलेगा, जबकि आखिरी ड्रोन सितंबर 2030 तक पहुंचेगा।

भारत के पास अभी और 2029 के बीच एक बड़ा अंतराल है। नौसेना को हिंद महासागर क्षेत्र में लगातार निगरानी की जरूरत है। इसी अंतर को भरने के लिए रक्षा मंत्रालय ने दो अतिरिक्त सी गार्डियन ड्रोन लीज पर लेने का फैसला किया।

यह एक इंटरिम अरेंजमेंट है, जिससे नौसेना को तत्काल क्षमता मिल सके और 2029 तक इंतजार न करना पड़े। (MQ-9B Sea Guardian Lease Deal)

हिंद महासागर में क्यों बढ़ी जरूरत?

पिछले कुछ सालों में हिंद महासागर क्षेत्र में चीन की नौसैनिक गतिविधियां तेजी से बढ़ी हैं। चीनी युद्धपोत, सर्वेक्षण पोत, पनडुब्बियां और अनुसंधान जहाज लगातार इस क्षेत्र में दिखाई दे रहे हैं।

भारत के लिए हिंद महासागर केवल समुद्री सीमा नहीं बल्कि व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और सामरिक सुरक्षा का महत्वपूर्ण क्षेत्र है। ऐसे में हजारों किलोमीटर लंबे समुद्री क्षेत्र पर लगातार निगरानी रखना जरूरी हो जाता है।

यहीं पर एमक्यू-9बी सी गार्डियन जैसे ड्रोन की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। यह एक ही मिशन में विशाल समुद्री क्षेत्र को कवर कर सकता है और कई घंटों तक टारगेट पर नजर बनाए रख सकता है। (MQ-9B Sea Guardian Lease Deal)

कौन-कौन से सेंसर लगे हैं?

सी गार्डियन की सबसे बड़ी ताकत इसके आधुनिक सेंसर और निगरानी उपकरण हैं।

इसमें सिंथेटिक एपर्चर रडार (SAR) लगाया गया है, जो बादलों और खराब मौसम में भी लक्ष्य की पहचान कर सकता है।

इसके अलावा इनवर्स सिंथेटिक एपर्चर रडार (ISAR) समुद्र में चल रहे जहाजों की पहचान करने में मदद करता है।

ड्रोन में इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल और इंफ्रारेड सेंसर (EO/IR) भी लगे हैं, जो दिन और रात दोनों समय निगरानी कर सकते हैं।

इसके साथ ऑटोमेटिक आइडेंटिफिकेशन सिस्टम (AIS) रिसीवर भी मौजूद है। यह समुद्र में चलने वाले जहाजों की पहचान, लोकेशन और मूवमेंट की जानकारी देता है।

इन सभी प्रणालियों की मदद से नौसेना को वास्तविक समय में समुद्री गतिविधियों की जानकारी मिल सकती है। (MQ-9B Sea Guardian Lease Deal)

2020 में पहली बार लिए थे लीज पर

यह पहली बार नहीं है जब भारतीय नौसेना एमक्यू-9बी सी गार्डियन का इस्तेमाल कर रही है। नवंबर 2020 में भारत ने पहली बार दो सी गार्डियन ड्रोन एक साल की लीज पर लिए थे। ये ड्रोन मिड नवंबर 2020 में भारत पहुंचे और 21 नवंबर 2020 से ऑपरेशनल हो गए।

इन्हें आईएनएस राजाली, अरक्कोणम (तमिलनाडु) से ऑपरेट किया जा रहा है।

शुरुआत में इनकी लीज एक साल के लिए थी, लेकिन बाद में इसे बढ़ाया गया। नौसेना के अनुसार ये ड्रोन अब तक 15,000 से अधिक उड़ान घंटे पूरे कर चुके हैं।

यह अनुभव भी नई लीज डील का एक बड़ा कारण माना जा रहा है, क्योंकि नौसेना पहले से इस प्लेटफॉर्म की क्षमता और उपयोगिता को देख चुकी है।

वहीं, इस नए समझौते के बाद भारतीय नौसेना के पास फिलहाल कुल चार लीज्ड एमक्यू-9बी सी गार्डियन ड्रोन होंगे। इससे नौसेना को अरब सागर और बंगाल की खाड़ी दोनों क्षेत्रों में एक साथ बेहतर निगरानी और मैरीटाइम डोमेन अवेयरनेस बनाए रखने में मदद मिलेगी। जहां तक पुराने दो ड्रोन की लीज समाप्त होने की बात है, तो उनकी लीज संभवतः 2027 के अंत या 2028 के आसपास समाप्त हो सकती है। इसके बाद पुराने ड्रोन धीरे-धीरे सेवा से बाहर होंगे और उनकी जगह खरीदे गए एमक्यू-9बी बेड़े ले लेंगे। (MQ-9B Sea Guardian Lease Deal)

क्या लीज डील खरीद से महंगी है?

1,943 करोड़ रुपये में केवल दो ड्रोन मिलने की वजह से कई लोगों को यह डील महंगी लग सकती है। लेकिन इसकी तुलना सीधे खरीद से करना सही नहीं होगा।

लीज और खरीद दो अलग मॉडल हैं।

लीज में केवल ड्रोन नहीं मिलता, बल्कि उसके साथ रखरखाव, स्पेयर पार्ट्स, तकनीकी सहायता, लॉजिस्टिक सपोर्ट और अन्य सेवाएं भी शामिल होती हैं। ड्रोन की ओनरशिप कंपनी के पास रहती है।

दूसरी तरफ खरीद में प्लेटफॉर्म स्थायी रूप से भारत के पास आता है, लेकिन उसके मेंटेनेंस और ऑपरेशन पर अलग खर्च करना पड़ता है। इसलिए दोनों की लागत की सीधी तुलना नहीं की जाती। (MQ-9B Sea Guardian Lease Deal)

2024 में हादसे का शिकार हो गया था ड्रोन

18 सितंबर 2024 को भारतीय नौसेना का एक लीज पर लिया गया एमक्यू-9बी सी गार्डियन ड्रोन चेन्नई के पास बंगाल की खाड़ी में दुर्घटनाग्रस्त हो गया था। यह ड्रोन तमिलनाडु के अरक्कोणम स्थित आईएनएस राजली एयर स्टेशन से नियमित समुद्री निगरानी मिशन पर उड़ान भर रहा था। मिशन के दौरान ड्रोन में तकनीकी खराबी आ गई। रिपोर्टों के अनुसार, पावर फेल्योर की समस्या पैदा हुई, जिसे उड़ान के दौरान रीसेट करने की कोशिश की गई, लेकिन सिस्टम सामान्य स्थिति में नहीं लौट सका। हादसे में ड्रोन पूरी तरह नष्ट हो गया और उसे सेवा से बाहर मानते हुए राइट-ऑफ कर दिया गया।

उस समय भारतीय नौसेना के पास लीज पर लिए गए दो सी गार्डियन ड्रोन थे, जिन्होंने मिलकर 18,000 घंटे से अधिक उड़ान पूरी कर ली थी। दुर्घटना के बाद भी नौसेना की निगरानी क्षमता पर लंबे समय तक असर नहीं पड़ा, क्योंकि लीज समझौते के तहत अमेरिकी कंपनी जनरल एटोमिक्स ने जल्द ही एक नया रिप्लेसमेंट ड्रोन उपलब्ध करा दिया। फरवरी 2025 तक यह प्रतिस्थापन ड्रोन भारतीय नौसेना को मिल गया, जिससे समुद्री निगरानी अभियानों की निरंतरता बनी रही।

समुद्री निगरानी में क्या बदलाव आएगा?

भारतीय नौसेना लंबे समय से पी-8आई पोसाइडन समुद्री गश्ती विमानों का इस्तेमाल कर रही है। ये बेहद सक्षम प्लेटफॉर्म हैं, लेकिन हर मिशन के लिए मानव चालक दल की जरूरत होती है।

एमक्यू-9बी सी गार्डियन लंबे समय तक हवा में रह सकता है और लगातार निगरानी कर सकता है। इससे नौसेना को विशाल समुद्री क्षेत्रों में लगातार इंटेलिजेंस, सर्विलांस और रिकॉनिसेंस (ISR) कवरेज मिलती है।

यह संदिग्ध जहाजों, पनडुब्बियों की गतिविधियों, समुद्री मार्गों और रणनीतिक क्षेत्रों पर लगातार नजर रख सकता है। (MQ-9B Sea Guardian Lease Deal)

रक्षा खरीद प्रक्रिया में लीज मॉडल का बढ़ता इस्तेमाल

भारत की डिफेंस एक्विजिशन प्रोसीजर 2020 में पहली बार सैन्य प्लेटफॉर्म लीज पर लेने का विकल्प शामिल किया गया था।

इसका उद्देश्य ऐसी स्थितियों में तुरंत क्षमता हासिल करना है, जहां किसी बड़े प्लेटफॉर्म की खरीद में कई साल लग सकते हैं।

एमक्यू-9बी सी गार्डियन इसका सबसे प्रमुख उदाहरण है। 2020 में पहली लीज और 2026 में नई लीज डील इसी नीति के तहत हुई है।

इस मॉडल से सेना को जरूरी क्षमता जल्दी मिल जाती है, जबकि स्थायी खरीद की प्रक्रिया समानांतर रूप से चलती रहती है। (MQ-9B Sea Guardian Lease Deal)

AMCA इंजन रेस में बड़ा मोड़! रिलायंस-रोल्स रॉयस की एंट्री, भारत का सबसे बड़ा एयरो इंजन मिशन शुरू

AMCA indigenous engine
Reliance Industries and Rolls-Royce Join Hands to Develop Indigenous Combat Engine for India’s AMCA Fighter Jet Programme. (Image for representational Purpose only. AI-Generated Image)

AMCA indigenous engine: भारत के महत्वाकांक्षी एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) प्रोग्राम को लेकर 14 अगस्त को एक बड़ा ऐलान हुआ। रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड और ब्रिटेन की एयरोस्पेस दिग्गज कंपनी रोल्स-रॉयस ने भारत के लिए स्वदेशी कॉम्बैट इंजन डेवलप करने के उद्देश्य से रणनीतिक साझेदारी की घोषणा की है।

दोनों कंपनियों ने कहा है कि वे एएमसीए प्रोग्राम के लिए एक संप्रभु और स्वदेशी लड़ाकू विमान इंजन के डिजाइन, डेवलपमेंट, मैन्युफैक्चरिंग और डिलीवरी की दिशा में साथ काम करने की संभावनाओं पर आगे बढ़ेंगी। इस साझेदारी का उद्देश्य केवल एक इंजन बनाना नहीं, बल्कि भारत में एक संपूर्ण एयरो-इंजन इकोसिस्टम तैयार करना है।

यह घोषणा ऐसे समय में हुई है जब भारत पांचवीं पीढ़ी के स्टील्थ फाइटर जेट एएमसीए को डेवलप करने के लिए स्वदेशी इंजन की तलाश में है और इस परियोजना को देश के सबसे महत्वपूर्ण रक्षा प्रोग्रामों में गिना जा रहा है।

AMCA indigenous engine: एएमसीए के लिए क्यों जरूरी है नया इंजन?

एएमसीए भारतीय वायुसेना की भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखकर डेवलप किया जा रहा पांचवीं पीढ़ी का स्टील्थ लड़ाकू विमान है। इस विमान को कम रडार सिग्नेचर, लंबी दूरी की मारक क्षमता, एडवांस्ड सेंसर और नेटवर्क-सेंट्रिक वॉरफेयर क्षमताओं के साथ डिजाइन किया जा रहा है।

फिलहाल एएमसीए एमके-1 वर्जन में अमेरिकी कंपनी जीई का एफ-414 इंजन इस्तेमाल करने की योजना है। यह इंजन लगभग 98 किलो न्यूटन थ्रस्ट पैदा करता है।

हालांकि एएमसीए एमके-2 के लिए अधिक ताकतवर इंजन की जरूरत होगी। विशेषज्ञों के अनुसार इसके लिए 110 से 130 किलो न्यूटन क्लास, यानी लगभग 120 किलो न्यूटन या उससे अधिक थ्रस्ट वाला इंजन जरूरी माना जा रहा है। इसी जरूरत को पूरा करने के लिए नया स्वदेशी इंजन डेवलप करने की प्रक्रिया चल रही है।

बनाएंगी एयरोस्पेस गैस टरबाइन कॉम्प्लेक्स

संयुक्त बयान में कहा गया कि दोनों कंपनियां भारत में एक समर्पित “एयरोस्पेस गैस टरबाइन कॉम्प्लेक्स” स्थापित करने की संभावनाओं पर विचार करेंगी।

यह कॉम्प्लेक्स पावर और प्रोपल्शन टेक्नोलॉजी का सेंटर ऑफ एक्सीलेंस होगा। यहां इंजन डिजाइन, डेवलपमेंट, मैन्युफैक्चरिंग, टेस्टिंग, प्रोडक्शन और लाइफ-साइकिल सपोर्ट जैसी पूरी क्षमताएं डेवलप की जाएंगी।

कंपनियों के अनुसार इस पहल का उद्देश्य भारत में एंड-टू-एंड एयरो इंजन क्षमता डेवलप करना है ताकि भविष्य में देश को महत्वपूर्ण सैन्य इंजन तकनीकों के लिए बाहरी देशों पर निर्भर न रहना पड़े।

रिलायंस इंडस्ट्रीज के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर अनंत अंबानी ने कहा कि भारत की रणनीतिक स्वायत्तता के लिए महत्वपूर्ण तकनीकों में आत्मनिर्भरता जरूरी है।

उन्होंने कहा कि रोल्स-रॉयस की इंजन तकनीक और रिलायंस की तकनीक, उत्पादन और बड़े प्रोजेक्ट संभालने की क्षमता को मिलाकर भारत में एक मजबूत एयरो-इंजन इकोसिस्टम बनाया जा सकता है।

अनंत अंबानी ने कहा कि यह पहल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आत्मनिर्भर डेवलप भारत के विजन की दिशा में योगदान है। (AMCA indigenous engine)

रोल्स-रॉयस ने बताया बड़ा कदम

रोल्स-रॉयस पीएलसी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी तुफान एरगिनबिलगिच ने इस साझेदारी को भारत के एयरोस्पेस क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण बताया।

उन्होंने कहा कि रोल्स-रॉयस के पास एडवांस इंजीनियरिंग और इंजन विकास का एक सदी से अधिक का अनुभव है। वहीं रिलायंस भारत के सबसे बड़े औद्योगिक समूहों में शामिल है। दोनों की ताकत को मिलाकर देश में आत्मनिर्भर एयरोस्पेस इकोसिस्टम को मजबूत किया जा सकता है।

एएमसीए इंजन रेस में बड़ा मुकाबला

रोल्स-रॉयस की यह घोषणा ऐसे समय आई है जब एएमसीए इंजन प्रोग्राम को लेकर वैश्विक प्रतिस्पर्धा अपने अंतिम चरण में मानी जा रही है।

फ्रांस की सफरान कंपनी पहले से ही गैस टरबाइन रिसर्च एस्टैब्लिशमेंट (GTRE) के साथ जॉइंट वेंचर का प्रस्ताव दे चुकी है। रक्षा क्षेत्र में चर्चा रही है कि साफरान का प्रस्ताव सरकारी मंजूरी के काफी करीब पहुंच चुका था।

दूसरी ओर अमेरिकी कंपनी जीई भी शुरुआत में दौड़ में शामिल थी, लेकिन एफ-414 इंजन की लागत और अन्य मुद्दों के कारण उसकी स्थिति कमजोर बताई जा रही थी।

रोल्स-रॉयस ने इससे पहले भारत को 100 प्रतिशत टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और बौद्धिक संपदा अधिकारों से जुड़ा व्यापक प्रस्ताव भी दिया था। यही कारण है कि यह नई साझेदारी एएमसीए इंजन प्रोग्राम में महत्वपूर्ण मानी जा रही है। (AMCA indigenous engine)

पूरी तरह नया होगा इंजन डिजाइन

रक्षा क्षेत्र से जुड़े सूत्रों के अनुसार प्रस्तावित इंजन किसी पुराने इंजन का रिवाइज्ड वर्जन नहीं होगा। यह एक “क्लीन-शीट डिजाइन” होगा, यानी शुरुआत से तैयार किया जाने वाला नया इंजन। इसे विशेष रूप से एएमसीए की जरूरतों को ध्यान में रखकर डेवलप किया जाएगा।

प्रस्तावित इंजन का शुरुआती थ्रस्ट 110 से 120 किलो न्यूटन के बीच रखा जा सकता है। डिजाइन को इस तरह डेवलप करने की बात कही गई है कि भविष्य में इसे 140 किलो न्यूटन तक अपग्रेड किया जा सके।

भारत को इस इंजन पर डिजाइन अथॉरिटी, कॉन्फिगरेशन कंट्रोल और लाइफ-साइकिल ओनरशिप मिलने की भी चर्चा है। (AMCA indigenous engine)

एयरोस्पेस गैस टरबाइन कॉम्प्लेक्स क्या होगा?

रोल्स-रॉयस ने 2026 की शुरुआत में एयरो गैस टरबाइन कॉम्प्लेक्स का विचार सामने रखा था। अब रिलायंस इस योजना में संभावित औद्योगिक साझेदार के रूप में जुड़ा है।

इस कॉम्प्लेक्स में इंजन के डिजाइन से लेकर परीक्षण, उत्पादन और रखरखाव तक की पूरी व्यवस्था डेवलप करने का लक्ष्य रखा गया है।

सिर्फ रक्षा क्षेत्र ही नहीं, बल्कि सिविल एविएशन, नए पावर सिस्टम और भविष्य की प्रोपल्शन तकनीकों पर भी यहां काम किया जा सकेगा। (AMCA indigenous engine)

रिलायंस की एयरोस्पेस सेक्टर में बढ़ती मौजूदगी

रिलायंस पहले से ही रक्षा और एयरोस्पेस क्षेत्र में सक्रिय है। नागपुर के मिहान क्षेत्र में दसॉ रिलायंस एयरोस्पेस लिमिटेड (DRAL) के माध्यम से राफेल और फाल्कन 2000 विमानों के कई एयरोस्ट्रक्चर तैयार किए जाते हैं। इनमें विंग्स, फ्यूजलेज सेक्शन और अन्य महत्वपूर्ण हिस्से शामिल हैं।

इसके अलावा थेल्स के साथ भी रिलायंस की साझेदारी है, जहां इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और नेविगेशन सिस्टम से जुड़े कार्य किए जाते हैं।

हालांकि गैस टरबाइन आधारित लड़ाकू विमान इंजन के डिजाइन और निर्माण में यह रिलायंस की पहली बड़ी एंट्री मानी जा रही है। (AMCA indigenous engine)

कावेरी इंजन प्रोग्राम से मिला अनुभव

भारत लंबे समय से स्वदेशी लड़ाकू विमान इंजन डेवलप करने का प्रयास कर रहा है। जीटीआरई द्वारा डेवलप कावेरी इंजन प्रोग्राम इसी दिशा में शुरू किया गया था।

हालांकि कावेरी इंजन तेजस लड़ाकू विमान के लिए आवश्यक परफॉरमेंस स्टैंडर्ड्स को पूरी तरह हासिल नहीं कर सका, लेकिन इस प्रोजेक्ट ने भारत को गैस टरबाइन तकनीक के क्षेत्र में महत्वपूर्ण अनुभव दिया।

हाल के वर्षों में कावेरी के आफ्टरबर्निंग संस्करण पर भी प्रगति दर्ज की गई है। एएमसीए इंजन प्रोग्राम को उसी तकनीकी अनुभव की अगली कड़ी के रूप में देखा जा रहा है। (AMCA indigenous engine)

भारत के लिए क्यों अहम है यह प्रोजेक्ट?

फाइटर जेट इंजन को दुनिया की सबसे मुश्किल मिलिट्री टेक्नोलॉजी में गिना जाता है। अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, फ्रांस और चीन जैसे कुछ चुनिंदा देशों के पास ही पूरी तरह स्वदेशी लड़ाकू विमान इंजन डेवलप करने की क्षमता है।

एएमसीए इंजन प्रोग्राम को राष्ट्रीय एयरो इंजन मिशन का हिस्सा माना जा रहा है। इसकी अनुमानित लागत 5 अरब डॉलर से अधिक है। (AMCA indigenous engine)

नेपाल को भारत का ‘दुश्मन’ बनाने वाली होउ यानकी अब भारत-चीन सीमा वार्ता की प्रमुख, अरुणाचल पर क्या है चीन का इरादा?

Hou Yanqi WMCC
From Nepal Diplomacy to India-China Border Talks: Why Hou Yanqi’s New Role Is Drawing Attention Amid Arunachal Tensions. (Image for representational Purpose only. AI-Generated Image)

Hou Yanqi WMCC: भारत और चीन के बीच सीमा मामलों पर बातचीत के लिए बनाए गए वर्किंग मैकेनिज्म फॉर कंसल्टेशन एंड कोऑर्डिनेशन ऑन इंडिया-चाइना बॉर्डर अफेयर्स (WMCC) की 36वीं बैठक 6 अगस्त को नई दिल्ली में हुई। यह बैठक कई वजहों से महत्वपूर्ण रही। पहली वजह यह थी कि अरुणाचल प्रदेश के ऊपरी सुबनसिरी जिले के तकसिंग क्षेत्र में भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच पेट्रोलिंग के दौरान हुआ फेसऑफ चर्चा का विषय बना हुआ था। दूसरी वजह थी चीनी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व कर रहीं होउ यानकी, जिनका नाम नेपाल में चीन की बेहद सक्रिय और विवादास्पद कूटनीति से जुड़ा रहा है।

वहीं, अब सवाल यह उठ रहा है कि नेपाल में भारत विरोधी माहौल बनाने के आरोपों से घिरी रहीं होउ यानकी को चीन ने सीमा मामलों के सबसे महत्वपूर्ण विभाग की जिम्मेदारी क्यों सौंपी है और क्या इससे चीन की सीमा नीति में किसी बदलाव का संकेत मिलता है।

Hou Yanqi WMCC: कौन हैं होउ यानकी?

होउ यानकी ने बीजिंग की पेकिंग यूनिवर्सिटी से उर्दू भाषा की पढ़ाई की। वर्ष 1996 में वह चीन के विदेश मंत्रालय में शामिल हुईं। पाकिस्तान में विभिन्न राजनयिक जिम्मेदारियां निभाने के बाद उन्होंने अमेरिका के लॉस एंजिल्स में भी काम किया।

दक्षिण एशियाई मामलों की विशेषज्ञ मानी जाने वाली होउ यानकी को दिसंबर 2018 से 2022 तक नेपाल में चीन का राजदूत नियुक्त किया गया। उस समय नेपाल में केपी शर्मा ओली की सरकार थी और भारत-नेपाल संबंध पहले से कई मुद्दों पर तनावपूर्ण थे।

नेपाल में रहते हुए होउ यानकी ने असाधारण रूप से सक्रिय भूमिका निभाई। वह केवल राजनयिक बैठकों तक सीमित नहीं रहीं बल्कि नेपाल की राजनीति, आर्थिक परियोजनाओं और चीन-नेपाल संबंधों के विस्तार में भी लगातार दिखाई देती रहीं।

2020 का कालापानी, लिपुलेख नक्शा विवाद 

मई 2020 में नेपाल सरकार ने नया राजनीतिक नक्शा जारी किया था। इस नक्शे में कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा को नेपाल का हिस्सा दिखाया गया था। बाद में नेपाल की संसद ने संवैधानिक संशोधन के जरिए इसे मंजूरी भी दे दी।

यह वही समय था जब लद्दाख में भारत और चीन के बीच तनाव बढ़ रहा था और गलवान घाटी की घटना हुई थी। भारतीय रणनीतिक हलकों में यह धारणा बनी कि नेपाल के इस कदम को चीन का अप्रत्यक्ष समर्थन प्राप्त था।

उस समय होउ यानकी नेपाल के तत्कालीन प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली और सत्तारूढ़ नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं के साथ लगातार संपर्क में थीं।

भारतीय खुफिया एजेंसियों ने उस समय दावा किया था कि होउ यानकी ने नेपाल के इस कदम को समर्थन देने में भूमिका निभाई थी। उनकी तत्कालीन प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली और सत्तारूढ़ नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं तक सीधी पहुंच थी।और वे अक्सर प्रधानमंत्री कार्यालय और ओली के आवास पर जाती थीं तथा पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं से लगातार संपर्क में रहती थीं।

जून 2020 में गलवान घाटी में भारत और चीन के बीच हुए सैन्य तनाव के आसपास नेपाल द्वारा नया नक्शा जारी किया जाना केवल संयोग नहीं था। (Hou Yanqi WMCC)

Hou Yanqi WMCC

नेपाल में चीन का प्रभाव बढ़ाने की कोशिश

होउ यानकी के कार्यकाल में चीन ने नेपाल में बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) से जुड़ी परियोजनाओं को आगे बढ़ाया। कोविड-19 महामारी के दौरान चीन की वैक्सीन डिप्लोमेसी में भी उनकी अहम भूमिका रही।

नेपाल में कई सार्वजनिक परियोजनाओं, शिक्षा संस्थानों और इंफ्रास्ट्रक्चर कार्यक्रमों में चीन की मौजूदगी बढ़ी। इसी दौरान चीन और नेपाल के बीच सैन्य सहयोग भी बढ़ता दिखाई दिया।

मई 2020 में काठमांडू में पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) के एक कार्यक्रम में नेपाल के तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल पूर्ण चंद्र थापा को मुख्य अतिथि बनाया गया था। इस कार्यक्रम में होउ यानकी भी प्रमुख भूमिका में थीं।

Hou Yanqi WMCC
Director General of the Department of Boundary and Ocean Affairs of the Foreign Minstry Hou Yanqi…(Image Source: China MFA)

अब बनीं सीमा मामलों की प्रमुख

दिसंबर 2025 में होउ यानकी को चीन के विदेश मंत्रालय के बॉउंड्री एंड ओशन अफेयर्स विभाग का महानिदेशक बनाया गया। यह वही विभाग है जो भारत, भूटान और अन्य पड़ोसी देशों से जुड़े सीमा मामलों को संभालता है।

उनसे पहले इस पद पर हांग लियांग थे, जिन्हें अपेक्षाकृत पेशेवर और कम विवादास्पद राजनयिक माना जाता था।

मई 2026 में बीजिंग में हुई 35वीं WMCC बैठक और अगस्त 2026 में नई दिल्ली में हुई 36वीं WMCC बैठक में चीनी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व होउ यानकी ने किया।

भारतीय पक्ष का नेतृत्व दोनों बैठकों में विदेश मंत्रालय के संयुक्त सचिव (पूर्वी एशिया) सुजीत घोष ने किया।

वर्किंग मैकेनिज्म फॉर कंसल्टेशन एंड कोऑर्डिनेशन ऑन इंडिया-चाइना बॉर्डर अफेयर्स (WMCC) की स्थापना 2012 में हुई थी। इसका उद्देश्य भारत और चीन के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) से जुड़े मुद्दों पर संवाद बनाए रखना, सीमा प्रबंधन को बेहतर बनाना और किसी भी तनावपूर्ण स्थिति को बढ़ने से रोकना है।

इस सिस्टम के जरिए दोनों देश सीमा प्रबंधन, गश्त, संचार तंत्र, स्थानीय सैन्य संपर्क और सीमा निर्धारण से जुड़े मुद्दों पर चर्चा करते हैं। (Hou Yanqi WMCC)

क्या हुआ 36वीं बैठक में

6 अगस्त 2026 को नई दिल्ली में हुई 36वीं WMCC बैठक में दोनों देशों ने एलएसी के हालात की समीक्षा की।
भारत ने अपने आधिकारिक बयान में कहा कि सीमा क्षेत्रों में शांति और स्थिरता दोनों देशों के संबंधों के विकास के लिए आवश्यक है।

भारत ने यह भी कहा कि मौजूदा राजनयिक और सैन्य तंत्रों का इस्तेमाल केवल संपर्क बनाए रखने के लिए नहीं बल्कि लंबित मुद्दों को सुलझाने और LAC पर गलतफहमी तथा गलत आकलन से बचने के लिए किया जाना चाहिए।

यहीं भारत और चीन के बयानों में एक महत्वपूर्ण अंतर दिखाई देता है। (Hou Yanqi WMCC)

भारत और चीन के बयानों में अंतर

चीन की तरफ से जारी बयान में कहा गया, “भारत और चीन ने नई दिल्ली में भारत-चीन सीमा मामलों पर परामर्श एवं समन्वय तंत्र (WMCC) की 36वीं बैठक आयोजित की। दोनों पक्षों ने सीमा निर्धारण, सीमा प्रबंधन और नियंत्रण, विभिन्न तंत्रों के विकास तथा सीमा-पार सहयोग जैसे मुद्दों पर विचारों का आदान-प्रदान किया। दोनों देशों ने राजनयिक और सैन्य माध्यमों से संपर्क बनाए रखने तथा सीमा क्षेत्रों में शांति और स्थिरता बनाए रखने के लिए मिलकर काम करने पर सहमति जताई।” (Hou Yanqi WMCC)

इसके विपरीत भारत के बयान में दो अतिरिक्त बातें थीं।

पहली, लंबित मुद्दों को हल करने की आवश्यकता। दूसरी, एलएसी पर गलतफहमी और गलत आकलन से बचने की जरूरत।

भारत ने अपने आधिकारिक बयान में कहा, “दोनों पक्षों ने वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) की स्थिति पर खुलकर चर्चा की और इसकी समीक्षा की। इस बात पर जोर दिया गया कि सीमा क्षेत्रों में शांति और स्थिरता बनाए रखना भारत-चीन संबंधों के समग्र विकास के लिए आवश्यक है।”

“दोनों देशों ने सहमति व्यक्त की कि लंबित मुद्दों के समाधान और एलएसी पर किसी भी गलतफहमी या गलत आकलन से बचने के लिए WMCC, स्थानीय कमांडर स्तर की बैठकों और अन्य सहमत तंत्रों सहित मौजूदा राजनयिक और सैन्य चैनलों का उपयोग जारी रखा जाएगा।”

“24वें स्पेशल रिप्रेजेंटेटिव (SR) वार्ता के परिणामों के क्रम में दोनों पक्षों ने सीमा निर्धारण, सीमा प्रबंधन, विभिन्न तंत्रों के विकास और सीमा-पार सहयोग से जुड़े मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की।”

“भारतीय पक्ष ने सीमा-पार नदियों पर एक्सपर्ट लेवल मैकेनिज्म की अगली बैठक जल्द आयोजित करने की आवश्यकता दोहराई और चीन के अपस्ट्रीम प्रोजेक्ट्स से जुड़ी तकनीकी जानकारी साझा करने के महत्व पर जोर दिया।”

दोनों के बयानों में यह अंतर बताता है कि भारत केवल बातचीत जारी रखने की बात नहीं कर रहा बल्कि बातचीत से ठोस परिणाम भी चाहता है। (Hou Yanqi WMCC)

Hou Yanqi WMCC
Hou Yanqi

ट्रांस-बॉर्डर नदियों पर भारत का लगातार जोर

35वीं और 36वीं दोनों बैठकों में भारत ने ट्रांस-बॉर्डर नदियों के मुद्दे को प्रमुखता से उठाया।

36वीं बैठक में भारत ने इससे एक कदम आगे बढ़कर चीन के अपस्ट्रीम प्रोजेक्ट्स की तकनीकी जानकारी साझा करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया। यह मुद्दा महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि तिब्बत क्षेत्र में कई प्रमुख नदियों का उद्गम है, जो बाद में भारत में प्रवेश करती हैं।

वहीं, 35वीं बैठक के बाद भारत की तरफ से जारी बयान में कहा, बैठक में सीमा निर्धारण, सीमा प्रबंधन, विभिन्न समन्वय तंत्रों को मजबूत करने और सीमा पार सहयोग से जुड़े मुद्दों पर चर्चा हुई। भारत ने सीमा पार नदियों से जुड़े विशेषज्ञ स्तर के तंत्र (एक्सपर्ट लेवल मैकेनिज्म) की अगली बैठक जल्द बुलाने की आवश्यकता पर जोर दिया।”

जबकि चीन के आधिकारिक बयान में इस विषय का कोई उल्लेख नहीं था। (Hou Yanqi WMCC)

तकसिंग फेसऑफ के बाद पहली बड़ी बैठक

यह बैठक अरुणाचल प्रदेश के ऊपरी सुबनसिरी जिले के तकसिंग क्षेत्र में हुए फेसऑफ के बाद हुई। जून 2026 के आखिर में नाह वेलफेयर सोसायटी (NWS) नामक स्थानीय संगठन ने प्रशासन को पत्र लिखकर दावा किया कि चीनी सेना ने तकसिंग क्षेत्र में कुछ जगहों पर सड़कें, पुल और अस्थायी ढांचे बनाए हैं।

संगठन ने ओयिंग, पनियार, मारपन, पोटरांग झील और तिंदिंगतांग जैसे इलाकों का नाम लेते हुए कहा कि ये स्थान पहले भारतीय नियंत्रण में थे और स्थानीय लोगों के लिए चरागाह, शिकार तथा धार्मिक महत्व रखते हैं। संगठन का आरोप था कि पिछले कई वर्षों से चीन धीरे-धीरे इस क्षेत्र में अपनी मौजूदगी बढ़ा रहा है।

हालांकि भारतीय सेना ने इन दावों को तुरंत खारिज कर दिया। सेना ने कहा कि अरुणाचल प्रदेश में चीनी घुसपैठ और नए शिविरों की खबरें सही नहीं हैं और इनके समर्थन में कोई ठोस आधार नहीं है।

वहीं, 25 जुलाई 2026 को अरुणाचल प्रदेश के ऊपरी सुबनसिरी जिले में भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच पेट्रोलिंग के दौरान आमना-सामना (फेसऑफ) हुआ था। यह स्थिति करीब दो सप्ताह तक बनी रही। हालांकि भारतीय सेना ने किसी बड़े टकराव या घुसपैठ की पुष्टि नहीं की।

हालांकि 25 जुलाई के फेसऑफ के बाद 6 अगस्त को नई दिल्ली में भारत-चीन सीमा मामलों पर हुई 36वीं WMCC बैठक में भारत की तरफ से इस मुद्दे को चीन के सामने उठाया गया।

चीन ने रोकी गश्त!

अगस्त 2026 में यह मुद्दा फिर गरमाया। स्थानीय लोगों और पीपुल्स पार्टी ऑफ अरुणाचल (PPA) की फैक्ट-फाइंडिंग टीम ने आरोप लगाया कि पीएलए ने शेरा 5 पॉइंट जैसे भारतीय गश्ती बिंदुओं तक भारतीय जवानों की पहुंच रोक दी है। 2023 में यहां आमना-सामना होने के बाद भारतीय पक्ष वापस चला गया था और तब से पीएलए ने भारतीय चिह्नों को हटा दिया। पुकर ला और ओलो में भी कथित घुसपैठ की खबरें आईं। (Hou Yanqi WMCC)

भारत ने बैठक के अगले दिन बदले 27 जगहों के नाम

7 अगस्त 2026 को भारत सरकार ने अरुणाचल प्रदेश के 27 स्थानों और भौगोलिक क्षेत्रों के आधिकारिक नाम सर्वे ऑफ इंडिया के नक्शों में दर्ज किए। इनमें थग ला, ड्जो ला, रिज ला, पुकर ला, माजा गांव, बीसा, लॉन्गजू, सांभो सरोवर झील और शेर-ए-थापा स्मारक जैसे स्थान शामिल हैं। गृह मंत्रालय के अनुसार इसका उद्देश्य इन स्थानों की सही पहचान सुनिश्चित करना और आधिकारिक रिकॉर्ड को स्पष्ट बनाना है।

हालांकि पिछले कई सालों से चीन अरुणाचल प्रदेश के विभिन्न स्थानों के चीनी और तिब्बती नाम जारी करता रहा है। चीन अरुणाचल प्रदेश को “जांगनान” या “दक्षिणी तिब्बत” कहता है। 2017 से अब तक चीन छह चरणों में 100 से अधिक स्थानों के नए नाम घोषित कर चुका है।

भारत का कहना है कि केवल नाम बदल देने से जमीन पर स्थिति नहीं बदलती। भारत अरुणाचल प्रदेश को अपना अभिन्न और अविभाज्य हिस्सा मानता है।

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जयसवाल ने 12 अगस्त को नियमित प्रेस ब्रिफिंग में कहा, “अरुणाचल प्रदेश भारत का अभिन्न हिस्सा है। यह एक स्थापित और निर्विवाद तथ्य है। किसी भी तरह के दावे या नाम बदलने की कोशिश से यह सच्चाई नहीं बदल सकती।”

भारत पहले भी कई बार कह चुका है कि चीन द्वारा नाम बदलने की कोशिशों का कोई कानूनी या वास्तविक महत्व नहीं है।

वहीं, चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता गुओ जियाकुन ने कहा, “जांगनान क्षेत्र चीन का हिस्सा है। चीन तथाकथित अरुणाचल प्रदेश को स्वीकार नहीं करता। भारत द्वारा नए नाम जारी करने से स्थिति नहीं बदलती।” (Hou Yanqi WMCC)

सरकार और सेना ने साधी चुप्पी!

लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने एक्स पर लिखा, “अरुणाचल प्रदेश में कई जगहों पर चीन ने हमारी सेना को पेट्रोलिंग करने से रोक दिया है। यह बेहद चिंताजनक मामला है। लेकिन इससे भी ज्यादा चिंता की बात यह है कि रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, गृह मंत्री अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस मुद्दे पर पूरी तरह चुप हैं।”

उन्होंने लिखा, “मोदी सरकार चीन को रोकने के बजाय इस खबर को दबाने और मीडिया पर दबाव बनाने की कोशिश कर रही है। देश को गलवान घाटी की घटना के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का वह बयान आज भी याद है, जिसमें उन्होंने कहा था कि चीन ने भारत की एक इंच जमीन भी नहीं ली। उस बयान से देश को भारी नुकसान हुआ था।”

उन्होंने आगे लिखा, “आज भी सरकार अपनी छवि बचाने में लगी हुई है। देश की सुरक्षा से ज्यादा अपनी छवि को प्राथमिकता देना खतरनाक है। प्रधानमंत्री को देश के सामने सच्चाई रखनी चाहिए और चीन से जुड़े मुद्दों पर स्पष्ट जवाब देना चाहिए।” (Hou Yanqi WMCC)

पूर्व केंद्रीय मंत्री ने भी सरकार से पूछा सवाल

पूर्व केंद्रीय मंत्री और पूर्व गृह सचिव आरके सिंह ने अरुणाचल प्रदेश के तकसिंग क्षेत्र में स्थित शेरा-5 पेट्रोलिंग पॉइंट को लेकर चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि भारतीय सेना ने वहां पेट्रोलिंग बंद कर दी है और चीन ने उस इलाके में अपनी स्थिति मजबूत कर ली है। आरके सिंह के अनुसार, किसी पेट्रोलिंग पॉइंट पर नियमित गश्त भारत के क्षेत्रीय दावे का प्रतीक होती है। यदि पेट्रोलिंग बंद हो जाती है और दूसरी तरफ की सेना वहां सक्रिय हो जाती है, तो इससे भारत के दावे पर असर पड़ सकता है।

उन्होंने सवाल उठाया कि शेरा-5 पर पेट्रोलिंग रोकने का फैसला किसने लिया और क्या इसके लिए सरकार की मंजूरी थी। आरके सिंह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह से जवाब मांगा। उन्होंने यह भी पूछा कि 2014 के बाद क्या केवल शेरा-5 ही ऐसा मामला है या अन्य पेट्रोलिंग पॉइंट्स पर भी ऐसी स्थिति बनी है। (Hou Yanqi WMCC)

भारतीय सेना में हथियारों से हुए 269 हादसे, 366 करोड़ रुपये का हुआ घाटा, पुरानी राइफलें और खराब पुर्जे बने वजह

Indian Army Small Arms Accidents
PAC Report Flags 269 Indian Army Small Arms Accidents, Raises Concerns Over Aging INSAS Rifles and Quality Control Failures. (Image for representational Purpose only. AI-Generated Image)

Indian Army Small Arms Accidents: भारतीय सेना में इस्तेमाल होने वाले छोटे हथियारों से जुड़े 269 हादसों ने डिफेंस प्रोडक्शन सिस्टम और क्वालिटी कंट्रोल सिस्टम पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। संसद की लोक लेखा समिति (पीएसी) की 54वीं रिपोर्ट में सामने आया है कि साल 2015-16 से अगले पांच सालों के दौरान सेना के चार प्रमुख स्मॉल आर्म्स से जुड़े कुल 269 हादसे दर्ज किए गए। रिपोर्ट के अनुसार इन घटनाओं के पीछे हथियारों की बढ़ती उम्र, मैन्युफैक्चरिंग क्वॉलिटी में खामियां, घटिया कच्चे माल का इस्तेमाल और जांच प्रक्रिया में देरी जैसे कई कारण जिम्मेदार रहे।

सीएजी की 2023 की रिपोर्ट नंबर-5 में रक्षा मंत्रालय के रक्षा उत्पादन विभाग और सरकारी रक्षा उत्पादन इकाइयों के कामकाज की समीक्षा की गई थी। रिपोर्ट में खास तौर पर एडवांस्ड वेपंस एंड इक्विपमेंट इंडिया लिमिटेड (एडब्ल्यूईआईएल) की कामकाज और हथियार निर्माण से जुड़ी प्रक्रियाओं पर सवाल उठाए गए हैं।

Indian Army Small Arms Accidents: किन हथियारों में सामने आईं सबसे ज्यादा समस्याएं?

पीएसी रिपोर्ट के मुताबिक जांच में पाया गया कि कई मामलों में हथियारों के महत्वपूर्ण पुर्जों की गुणवत्ता निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं थी। डिफेक्ट इन्वेस्टिगेशन कमेटी ने दुर्घटनाओं के पीछे कंपोनेंट्स की क्वालिटी, हार्डनेस पैरामीटर्स में अंतर और इनपुट मटेरियल के स्पेसिफिकेशन के अनुरूप नहीं होने को मुख्य वजह बताया।

रिपोर्ट में विशेष रूप से 5.56 एमएम इंसास राइफल से जुड़े मामलों का उल्लेख किया गया है। ऑडिट के दौरान जांचे गए 26 डिफेक्ट इन्वेस्टिगेशन मामलों में से 14 मामले इंसास राइफल से जुड़े थे। इनमें कार्ट्रिज केस का चैंबर के भीतर फटना, हाउसिंग बॉडी में उभार आना और ब्रीच ब्लॉक तथा बैरल एक्सटेंशन में दरारें पड़ना जैसी समस्याएं सामने आईं।

जांच में यह भी पाया गया कि कई दिक्कतें मेटलर्जिकल कमियों, हार्डनेस में अंतर और हीट ट्रीटमेंट प्रोसेस में खामियों के चलते हुईं थीं। (Indian Army Small Arms Accidents)

22 साल पुरानी राइफलों का इस्तेमाल भी बनी वजह

रक्षा मंत्रालय ने पीएसी को बताया कि डिफेक्ट इन्वेस्टिगेशन रिपोर्ट में शामिल अधिकांश इंसास राइफलों का निर्माण साल 1998, 1999 और 2003 में हुआ था। इसका मतलब है कि कई हथियार 22 साल से अधिक पुराने हो चुके थे।

मंत्रालय के अनुसार इंसास राइफल को सेवा से हटाने का स्टैंडर्ड 22 साल या 10,000 राउंड फायरिंग पूरा होना है, जो भी पहले हो। कई मामलों में हथियार अपनी निर्धारित सर्विस लाइफ पूरी कर चुके थे या उसके करीब पहुंच चुके थे। रिपोर्ट में कहा गया है कि ऐसे पुराने हथियारों में खराबी आना कई हादसों की वजह रहा। (Indian Army Small Arms Accidents)

जांच में देरी पर पीएसी की नाराजगी

रिपोर्ट में केवल तकनीकी कमियों की ही बात नहीं की गई है, बल्कि जांच प्रक्रिया में देरी को भी गंभीर समस्या बताया गया है।

सामान्य नियमों के मुताबिक किसी भी हथियार दुर्घटना की रिपोर्ट 30 दिनों के भीतर तैयार की जानी चाहिए। लेकिन कई मामलों में यूजर यूनिट, आयुध फैक्ट्री, डीआरडीओ और क्वालिटी एजेंसियों के बीच कॉर्डिनेशन में देरी के चलते जांच लंबी खिंचती रही।

पीएसी ने कहा कि डिफेक्ट इन्वेस्टिगेशन कमेटी समय पर जांच पूरी करने और तत्काल सुधारात्मक कदम लागू करने में विफल रही। इससे कई मामलों में एक जैसी समस्याएं दोबारा सामने आती रहीं।

कॉरपोरेटाइजेशन के बाद उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार कुछ मामलों में डिफेक्ट दर्ज होने और जांच रिपोर्ट साझा होने के बीच 11 महीने तक का समय लग गया। वित्त साल 2022-23 में यह अवधि घटकर तीन महीने हुई, जबकि 2025-26 के दर्ज मामलों में औसतन साढ़े छह महीने का अंतर देखा गया। (Indian Army Small Arms Accidents)

क्वॉलिटी कंट्रोल सिस्टम में भी मिली कमी

सीएजी ऑडिट में पश्चिम बंगाल स्थित राइफल फैक्ट्री ईशापुर की कामकाज पर भी सवाल उठाए गए हैं।

रिपोर्ट के अनुसार क्वालिटी एश्योरेंस प्लान में जहां इनपुट मटेरियल की 100 प्रतिशत जांच अनिवार्य थी, वहीं फैक्ट्री का क्वालिटी कंट्रोल सेक्शन केवल सैंपल आधारित जांच कर रहा था। इससे दोषपूर्ण सामग्री उत्पादन प्रक्रिया में प्रवेश कर सकती थी।

पीएसी ने माना कि केवल अंतिम चरण में निरीक्षण करने के बजाय उत्पादन प्रक्रिया के दौरान ही नियमित क्वालिटी चेक होने चाहिए, ताकि खामियों को शुरुआती स्तर पर ही पकड़ा जा सके। (Indian Army Small Arms Accidents)

सेना की मांग घटी, फैक्ट्रियों की क्षमता खाली रही

रिपोर्ट में एक और महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया है। साल 2015-16 से 2019-20 के बीच भारतीय सेना ने कई प्रमुख हथियारों के लिए या तो बहुत कम मांग भेजी या कुछ मामलों में मांग ही नहीं दी।

5.56 एमएम इंसास राइफल, 5.56 एमएम लाइट मशीन गन और 9 एमएम ऑटो पिस्टल जैसे हथियारों के लिए सेना की हिस्सेदारी कुल सप्लाई का केवल 10 फीसदी रही।

इसके कारण सरकारी हथियार फैक्ट्रियां मुख्य रूप से गृह मंत्रालय और अर्धसैनिक बलों के ऑर्डर पर निर्भर रहीं। इसके बावजूद उत्पादन क्षमता का पूरा इस्तेमाल नहीं हो पाया। इंसास और एलएमजी प्रोडक्शन युनिट्स की क्षमता उपयोग दर अधिकतम 29 फीसदी तक ही पहुंच सकी। (Indian Army Small Arms Accidents)

366 करोड़ रुपये का नुकसान

कम मांग और लागत से कम कीमत पर सप्लाई का असर वित्तीय स्थिति पर भी पड़ा। रिपोर्ट के अनुसार राइफल फैक्ट्री ईशापुर, स्मॉल आर्म्स फैक्ट्री कानपुर और ऑर्डनेंस फैक्ट्री तिरुचिरापल्ली ने साल 2015 से 2020 के दौरान 12 प्रमुख हथियारों के उत्पादन में कुल 366 करोड़ रुपये का नुकसान उठाया।

इस अवधि में कई उत्पादों की इश्यू प्राइस वास्तविक उत्पादन लागत से कम रखी गई थी, जिससे वित्तीय दबाव बढ़ा।

641 करोड़ रुपये की इन्वेंटरी

ऑडिट में यह भी सामने आया कि 31 मार्च 2020 तक तीनों फैक्ट्रियों में 641 करोड़ रुपये मूल्य की इन्वेंटरी जमा थी। यह इन इकाइयों की कुल उत्पादन लागत का लगभग 72 प्रतिशत हिस्सा था।

विशेषज्ञों के अनुसार इतनी बड़ी मात्रा में स्टॉक जमा होना मांग और उत्पादन योजना के बीच संतुलन की कमी को दर्शाता है। (Indian Army Small Arms Accidents)

कॉरपोरेटाइजेशन के बाद बनी एडब्ल्यूईआईएल

साल 2021 में ऑर्डनेंस फैक्ट्री बोर्ड के कॉरपोरेटाइजेशन के बाद एडवांस्ड वेपन्स एंड इक्विपमेंट इंडिया लिमिटेड यानी एडब्ल्यूईआईएल का गठन किया गया था।

यह कंपनी अब कानपुर की स्मॉल आर्म्स फैक्ट्री, राइफल फैक्ट्री ईशापुर, ऑर्डनेंस फैक्ट्री तिरुचिरापल्ली और ऑर्डनेंस फैक्ट्री प्रोजेक्ट कोरवा सहित आठ प्रोडक्शन युनिट्स का ऑपरेशन करती है।

रक्षा मंत्रालय ने पीएसी को बताया कि अब मुख्यालय स्तर पर तिमाही समीक्षा बैठकें आयोजित की जा रही हैं। साथ ही डायरेक्टरेट जनरल ऑफ क्वालिटी एश्योरेंस और अन्य एजेंसियों के बीच समन्वय बढ़ाने के प्रयास किए जा रहे हैं। (Indian Army Small Arms Accidents)

पीएसी ने क्या सिफारिश की?

पीएसी ने कहा कि केवल उत्पादन बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। हथियार निर्माण में गुणवत्ता, विश्वसनीयता और समय पर जांच व्यवस्था को समान महत्व दिया जाना चाहिए।

समिति ने सेना, गृह मंत्रालय, राज्य पुलिस बलों और एडब्ल्यूईआईएल के बीच मल्टी-ईयर रोल-ऑन डिमांड प्लान बनाने की सिफारिश की है, ताकि मांग में अचानक उतार-चढ़ाव से बचा जा सके और उत्पादन क्षमता का बेहतर उपयोग हो सके।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि स्मॉल आर्म्स मैन्युफैक्चरिंग युनिट्स को मजबूत बनाने के लिए कंवॉलिटी कंट्रोल, सप्लाई चेन मैनेजमेंट और तकनीकी प्रक्रियाओं में सुधार की जरूरत है। (Indian Army Small Arms Accidents)

नेटफ्लिक्स वेब सीरीज ‘ऑपरेशन सफेद सागर’ के बीच चर्चा में IAF का 1985 का सीक्रेट मिशन, PoK के स्कार्दू तक पहुंचा था मिग-21

IAF Skardu Mission 1985
Netflix's Operation Safed Sagar Revives IAF's Secret 1985 MiG-21 Mission Deep Inside PoK. (Image for representational Purpose only. AI-Generated Image)

IAF Skardu Mission 1985: 1999 के कारगिल युद्ध में भारतीय वायुसेना के शौर्य पर बनी ऑपरेशन सफेद सागर वेब सीरीज को इन दिनों नेटफ्लिक्स पर खूब वाहवाही मिल रही है। इसी ऑपरेशन में पहली बार पहाड़ी इलाकों में लो-लेवल नाइट बॉम्बिंग जैसी जटिल सैन्य कार्रवाई को अंजाम दिया गया था। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि कारगिल युद्ध से करीब 14 साल पहले भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) के भीतर एक ऐसा जोखिम भरा मिशन चलाया था, जिसने सियाचिन में पाकिस्तान की गतिविधियों पर अहम जानकारी जुटाई थी।

यह मिशन 1985 में भारतीय वायुसेना की नंबर-101 स्क्वाड्रन, जिसे “फाल्कन्स” के नाम से जाना जाता है, उन्होंने अंजाम दिया था। इस मिशन में सोवियत मूल के मिग-21एम लड़ाकू विमान का इस्तेमाल किया गया था। मिशन का उद्देश्य स्कार्दू एयरबेस और उससे जुड़े मिलिट्री स्ट्रक्चर तस्वीरें जुटाना था, ताकि सियाचिन में पाकिस्तान की गतिविधियों को समझा जा सके।

IAF Skardu Mission 1985: ऑपरेशन मेघदूत के बाद बढ़ी स्कार्दू की अहमियत

13 अप्रैल 1984 में भारत ने ऑपरेशन मेघदूत शुरू किया था। इस ऑपरेशन के तहत भारतीय सेना ने दुनिया के सबसे ऊंचे युद्धक्षेत्र सियाचिन ग्लेशियर पर रणनीतिक बढ़त हासिल की थी। इसके बाद पाकिस्तान ने भी इस क्षेत्र में अपनी सैन्य गतिविधियां बढ़ानी शुरू कर दी थीं।

सियाचिन के नजदीक स्थित स्कार्दू पाकिस्तान के लिए एक महत्वपूर्ण मिलिट्री सेंटर था। यह गिलगित-बाल्टिस्तान क्षेत्र में स्थित यह इलाका नियंत्रण रेखा से लगभग 100 किलोमीटर तथा लेह से करीब 230 किलोमीटर उत्तर-पश्चिम में है। यहां एक बड़ा एयरबेस, लॉजिस्टिक सुविधाएं और कई सैन्य इकाइयां मौजूद थीं।

श्योक सिंधु नदी की एक बड़ी सहायक नदी है जो पूर्वी काराकोरम में रिमो ग्लेशियर से निकलती है और उत्तरी लद्दाख से गिलगित-बाल्टिस्तान में बहती है और फिर स्कार्दू के पास सिंधु नदी में मिल जाती है। स्कार्दू 7,300 फीट की ऊंचाई पर है। जबकि लेह एयरबेस की ऊंचाई 10,680 फीट है।

भारतीय सैन्य योजनाकारों के लिए यह जानना जरूरी था कि स्कार्दू में किस स्तर की गतिविधियां चल रही हैं और वहां कौन-कौन से विमान तथा सैन्य संसाधन तैनात हैं। (IAF Skardu Mission 1985)

मिग-21 ने बेहद कम ऊंचाई पर भरी उड़ान

सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, नंबर-101 स्क्वाड्रन का एक मिग-21एम टाइप-96 विमान विशेष रिकॉनिसेंस यानी हवाई टोही मिशन पर भेजा गया था।

विमान के नीचे एक विशेष पॉड लगाया गया था, जिसमें विंटन-751 पैनोरमिक कैमरा फिट था। यह कैमरा बड़े क्षेत्र की लगातार तस्वीरें लेने में सक्षम था।

मिशन के दौरान मिग-21 ने श्योक घाटी का रास्ता अपनाया। विमान जमीन से केवल लगभग 200 फीट की ऊंचाई पर बेहद तेज रफ्तार से उड़ रहा था। इतनी कम ऊंचाई पर उड़ान का उद्देश्य पाकिस्तानी रडार से बचना था।

पायलट ने आधुनिक नेविगेशन सिस्टम के बजाय नक्शों और दृश्य पहचान बिंदुओं की मदद से रास्ता तय किया। उस समय इस क्षेत्र में एडवांस नेविगेशन सपोर्ट उपलब्ध नहीं था। (IAF Skardu Mission 1985)

स्कार्दू के ऊपर सीधी उड़ान

स्कार्दू पहुंचने के बाद मिग-21 ने एयरफील्ड के ऊपर एक सीधी और तेज उड़ान भरी। इसी दौरान कैमरे ने रनवे, सैन्य ढांचे और आसपास के क्षेत्रों की विस्तृत तस्वीरें रिकॉर्ड कीं।

रिपोर्टों के अनुसार कैमरा पहले से सक्रिय कर दिया गया था और वह लगातार तस्वीरें ले रहा था। इससे स्कार्दू एयरबेस की स्थिति, वहां मौजूद विमान, लॉजिस्टिक सुविधाओं और अन्य सैन्य गतिविधियों की जानकारी जुटाई गई।

यह मिशन केवल साहस का उदाहरण नहीं था बल्कि बेहद सटीक सैन्य योजना का परिणाम था। फ्लाइट पाथ, रडार कवरेज, खतरे का आकलन और वापसी का रास्ता पहले से तय किया गया था। (IAF Skardu Mission 1985)

दूसरे फाइटर जेट्स ने दिया कवर

यह मिशन अकेले नहीं चलाया गया था। दूसरे लड़ाकू विमानों ने भी सिक्योरिटी कवर दिया था। उस समय नंबर-101 स्क्वाड्रन की कमान विंग कमांडर जेफ्री रेजिनाल्ड मैकेरो के पास थी। वे 96वें पायलट कोर्स के तहत 1966 में भारतीय वायुसेना में कमीशन हुए थे और 1984 से 1987 तक स्क्वाड्रन के कमांडिंग ऑफिसर रहे।

इसी बैच से बाद में भारतीय वायुसेना के पहले मिराज-2000 स्क्वाड्रन कमांडिंग ऑफिसर भी निकले। साल 1985 में जब मिराज-2000 लड़ाकू विमान चंडीगढ़ से ग्वालियर ट्रांसफर होने के बाद नंबर-7 स्क्वाड्रन में शामिल किए गए, तब उसी बैच के अधिकारियों ने इस नई क्षमता को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

दो मिग-21 विमानों का फॉर्मेशन इस मिशन में शामिल था और दोनों विमान बिना किसी चुनौती के सुरक्षित वापस लौट आए थे। (IAF Skardu Mission 1985)

तस्वीरों ने बदले हालात

इस मिशन का सबसे महत्वपूर्ण पहलू वह जानकारी थी जो तस्वीरों के माध्यम से प्राप्त हुई।

बताया जाता है कि मिशन के अगले दिन ही फिल्म डेवलप कर ली गई थी। तस्वीरों में स्कार्दू एयरफील्ड के सही हालात दिखाई दिए। जिससे वहां चल रहीं गतिविधियों का प्रूफ मिला।

फोटोग्राफ्स में सामने आया कि जिन गन पोजीशनों को पहले निष्क्रिय माना जा रहा था, वे बाद में सक्रिय दिखाई देने लगीं। इस तरह एक हवाई टोही मिशन ने पाकिस्तान की सैन्य तैयारियों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध कराई। (IAF Skardu Mission 1985)

विंटन-751 कैमरा था मिशन की असली ताकत

मिशन में इस्तेमाल हुआ विंटन-751 पैनोरमिक कैमरा उस दौर की अत्याधुनिक तकनीक माना जाता था।

इसे एक संशोधित 800 लीटर ड्रॉप टैंक में लगाया गया था। कैमरे में इमेज मोशन कम्पेनसेशन तकनीक थी, जिससे तेज रफ्तार के बावजूद तस्वीरें धुंधली नहीं होती थीं।

पायलट कॉकपिट से कैमरे को नियंत्रित कर सकता था। वह फ्रेम रेट बदल सकता था और जरूरत के अनुसार तस्वीरों की संख्या तय कर सकता था।

कैमरा उड़ान पथ के दोनों ओर लगभग 60 डिग्री क्षेत्र की तस्वीरें लेने में सक्षम था। इससे कम समय में बड़े इलाके का सर्वेक्षण किया जा सकता था। (IAF Skardu Mission 1985)

इस्लामाबाद के ऊपर सोनिक बूम

शांतिकाल के दौरान भारतीय वायुसेना द्वारा दुश्मन के हवाई क्षेत्र के ऊपर जाकर टोही मिशन चलाने की घटनाएं बहुत कम सार्वजनिक रूप से सामने आई हैं। हालांकि, भारतीय वायुसेना का मिग-25आर टोही विमान ऐसे मिशनों के लिए लंबे समय तक इस्तेमाल किया जाता रहा। यह विमान लगभग मैक-3 की रफ्तार से उड़ सकता था और इतनी ऊंचाई पर ऑपरेट करता था कि उस समय पाकिस्तान और चीन की अधिकांश मिसाइलें उसे निशाना नहीं बना सकती थीं।

ऐसे ही एक चर्चित मिशन का उल्लेख वर्ष 1997 में मिलता है, जब एक मिग-25आर पायलट ने कथित तौर पर इस्लामाबाद के ऊपर जानबूझकर ध्वनि की गति पार कर “सोनिक बूम” पैदा किया था। इस घटना ने पाकिस्तान की एयर डिफेंस सिस्टम पर भी सवाल खड़े किए थे। (IAF Skardu Mission 1985)

101 स्क्वाड्रन का लंबा इतिहास

नंबर-101 स्क्वाड्रन का नाम “फाल्कन्स” उसके प्रतीक चिह्न पर बने प्रशिक्षित शिकारी बाज से लिया गया है। यह बाज तेज नजर और सटीक हमला करने की क्षमता का प्रतीक माना जाता है। यह भारतीय वायुसेना की पहली समर्पित फोटो टोही यूनिट थी।

नंबर-101 स्क्वाड्रन भारतीय वायुसेना की सबसे प्रतिष्ठित युनिट्स में से एक रही है। इसकी शुरुआत जनवरी 1948 में फोटो रिकॉनिसेंस फ्लाइट के रूप में हुई थी।

उस समय स्क्वाड्रन स्पिटफायर विमान उड़ाती थी। अप्रैल 1950 में इसे पूर्ण स्क्वाड्रन का दर्जा मिला।

इसके बाद इस यूनिट ने हार्वर्ड, वैम्पायर, एसयू-7 और मिग-21 जैसे कई विमान उड़ाए। 1962 में हिमालयी सीमाओं पर टोही मिशन, 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में आदमपुर एयरबेस से बमबारी अभियान और 1971 के युद्ध में पश्चिमी मोर्चे पर महत्वपूर्ण कार्रवाई में इस स्क्वाड्रन की भूमिका रही।

इसके बाद स्क्वाड्रन ने सोवियत मूल के एसयू-7 ग्राउंड अटैक विमान अपनाए और सुपरसोनिक युग में प्रवेश किया। वर्ष 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में इसी एसयू-7 विमान के साथ फाल्कन्स ने पश्चिमी मोर्चे के छंब सेक्टर में पाकिस्तानी टैंकों, तोपों की तैनाती और सैनिक जमावड़ों पर हमले किए। इस शानदार प्रदर्शन के कारण स्क्वाड्रन को “फाल्कन्स ऑफ छंब” के नाम से पहचान मिली। (IAF Skardu Mission 1985)

स्कार्दू मिशन और कारगिल का संबंध

सैन्य इतिहासकारों के अनुसार 1980 के दशक में विकसित हुई टोही तकनीकों और अनुभवों ने बाद में भारतीय वायुसेना की अन्य युनिट्स को भी फायदा पहुंचाया।

कारगिल संघर्ष के दौरान नंबर-17 स्क्वाड्रन “गोल्डन एरोज” ने पहले फोटो रिकॉनिसेंस और बाद में लो-लेवल नाइट बॉम्बिंग मिशन डेवलप किए। दोनों स्क्वाड्रनों ने अलग-अलग समय पर मिग-21 का इस्तेमाल किया और बाद में दोनों को राफेल लड़ाकू विमान मिले।

आज नंबर-17 स्क्वाड्रन अंबाला में और नंबर-101 स्क्वाड्रन पूर्वोत्तर क्षेत्र में राफेल ऑपरेट कर रही हैं। (IAF Skardu Mission 1985)

राफेल युग में पहुंची फाल्कन्स स्क्वाड्रन

साल 1981 में स्क्वाड्रन को मिग-21एम लड़ाकू विमानों से लैस किया गया। इसके बाद यूनिट को सिरसा एयरबेस ट्रासंफर किया गया। साल 2002 में यह फिर से आदमपुर लौट आई। कई दशकों तक सेवा देने के बाद साल 2011 में स्क्वाड्रन को “नंबर-प्लेट” कर दिया गया, जिसका अर्थ है कि यूनिट को निष्क्रिय कर दिया गया। ऐसा उसके मिग-21एम विमानों के सेवा से हटने के बाद किया गया था।

इसके बाद जून 2021 में इसे दोबारा सक्रिय किया गया। नई शुरुआत के साथ स्क्वाड्रन को राफेल लड़ाकू विमान मिले। यह भारतीय वायुसेना की दूसरी राफेल स्क्वाड्रन बनी।

हाल ही में फाल्कन्स स्क्वाड्रन ने बंगाल की खाड़ी, हिंद महासागर और तिमोर सागर के ऊपर लगभग 7,000 किलोमीटर की उड़ान भरते हुए ऑस्ट्रेलिया के डार्विन में आयोजित एक्सरसाइज पिच ब्लैक में हिस्सा लिया। इस बहुराष्ट्रीय सैन्य अभ्यास में 21 देशों के करीब 100 विमान और 2,500 सैन्यकर्मी शामिल थे।

1985 का स्कार्दू टोही मिशन भारतीय वायुसेना के उन दुर्लभ अभियानों में गिना जाता है, जिनके बारे में आधिकारिक जानकारी सीमित है, लेकिन इसेस पता चलता है कि सियाचिन क्षेत्र में रणनीतिक जानकारी जुटाने के लिए उस दौर में कितनी मुश्किल और जोखिम भरी हवाई कार्रवाइयां की गई थीं। (IAF Skardu Mission 1985)