📍नई दिल्ली | 19 Aug, 2026, 11:58 AM
DRDO strategic weapons: डीआरडीओ ने मिसाइल और बम वेपन सिस्टम से जुड़े भविष्य के विकास और उत्पादन कार्यक्रमों के लिए निजी कंपनियों से आवेदन मांगे हैं। यह पहल डीआरडीओ के डायरेक्टर जनरल (मिसाइल्स एंड स्ट्रैटेजिक सिस्टम्स) यानी डीजी (एमएसएस) क्लस्टर के तहत शुरू की गई है। इसके लिए हैदराबाद स्थित रिसर्च सेंटर इमारत (आरसीआई) ने एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (ईओआई) जारी किया है।
यही क्लस्टर भारत की कई प्रमुख रणनीतिक मिसाइल परियोजनाओं पर काम करता है। इनमें अग्नि सीरीज की बैलिस्टिक मिसाइलें, पनडुब्बी से दागी जाने वाली मिसाइल प्रणालियां और अन्य सामरिक हथियार शामिल हैं।
अब तक ऐसे हथियारों का उत्पादन मुख्य रूप से सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां करती थीं। लेकिन नई व्यवस्था के तहत निजी उद्योग भी विकास से लेकर बड़े पैमाने पर उत्पादन तक की प्रक्रिया में भागीदार बन सकेंगे।
DRDO strategic weapons: क्या है डीजी (एमएसएस) क्लस्टर?
डीजी एमएसएस यानी डायरेक्टर जनरल (मिसाइल्स एंड स्ट्रैटेजिक सिस्टम्स) डीआरडीओ का सबसे महत्वपूर्ण टेक्नोलॉजी क्लस्टर माना जाता है। इसका मुख्यालय हैदराबाद में स्थित है।
इस क्लस्टर के अंतर्गत डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट लेबोरेटरी (डीआरडीएल), रिसर्च सेंटर इमारत (आरसीआई), एडवांस्ड सिस्टम्स लेबोरेटरी (एएसएल), टर्मिनल बैलिस्टिक्स रिसर्च लेबोरेटरी (टीबीआरएल) और इंटीग्रेटेड टेस्ट रेंज (आईटीआर) जैसी प्रमुख प्रयोगशालाएं आती हैं।
यही संस्थान देश की मिसाइल तकनीक, गाइडेंस सिस्टम, नेविगेशन, प्रोपल्शन, वारहेड, लॉन्चर और कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम विकसित करते हैं।
क्या चाहता है डीआरडीओ?
डीआरडीओ की इस पहल के तहत भविष्य में आने वाली विभिन्न मिसाइल और बम वेपन सिस्टम परियोजनाओं के लिए योग्य निजी कंपनियों की पहचान की जाएगी।
इन कंपनियों को डेवलपमेंट कम प्रोडक्शन पार्टनर यानी डीसीपीपी बनाया जाएगा। बाद में जब किसी विशेष मिसाइल या हथियार परियोजना के लिए आरएफपी जारी होगा तो इन्हीं शॉर्टलिस्ट कंपनियों में से चयन किया जाएगा।
डीआरडीओ चाहता है कि उद्योग केवल प्रोडक्शन तक सीमित न रहे बल्कि डिजाइन सपोर्ट, इंटीग्रेशन, ट्रायल, दस्तावेजीकरण, सप्लाई चेन और लाइफ साइकिल सपोर्ट जैसी जिम्मेदारियां भी संभाले। (DRDO strategic weapons)
किन कंपनियों को मिलेगा मौका?
डीआरडीओ ने स्पष्ट किया है कि केवल भारतीय कंपनियां ही इस प्रक्रिया में भाग ले सकती हैं। कंपनी के पास रक्षा उत्पादन के लिए इंडस्ट्रियल लाइसेंस होना जरूरी है। इसके साथ विस्फोटकों के स्टोरज और ऑपरेशन के लिए पीईएसओ लाइसेंस भी आवश्यक होगा।
यदि किसी कंपनी के पास अभी कुछ लाइसेंस नहीं हैं तो उसे निर्धारित समय सीमा के भीतर उन्हें हासिल करने का आश्वासन देना होगा।
वित्तीय योग्यता भी होगी अहम
डीआरडीओ ने केवल तकनीकी क्षमता ही नहीं बल्कि वित्तीय मजबूती को भी महत्वपूर्ण माना है। ईओआई के अनुसार कंपनी का न्यूनतम वार्षिक कारोबार 100 करोड़ रुपये होना चाहिए। कंपनी की नेटवर्थ कम से कम 34 करोड़ रुपये या प्रस्तावित परियोजना मूल्य के 5 फीसदी से अधिक होनी चाहिए।
पिछले पांच वर्षों में कम से कम दो वर्षों तक कंपनी लाभ में रही हो। इसके अलावा क्रिसिल, आईसीआरए या समकक्ष एजेंसी से कम से कम बीबीबी रेटिंग होना भी जरूरी है। (DRDO strategic weapons)
हर परियोजना के लिए चुनी जाएंगी दो कंपनियां
डीआरडीओ ने एक नया मॉडल अपनाया है। इसके तहत प्रत्येक परियोजना के लिए आमतौर पर दो डेवलपमेंट और प्रोडक्शन के लिए साझेदार चुने जाएंगे।
दोनों कंपनियां डीआरडीओ के साथ मिलकर प्रोटोटाइप तैयार करेंगी। परीक्षण सफल होने के बाद बड़े पैमाने पर उत्पादन में भी उनकी भूमिका रहेगी। साथ ही इससे कंपनियों में प्रतिस्पर्धा भी बनी रहेगी और उत्पादन क्षमता को भी बढ़ावा मिलेगा।
किन क्षमताओं की होगी जांच?
डीआरडीओ की विशेषज्ञ समिति कंपनियों की तकनीकी क्षमता का विस्तृत मूल्यांकन करेगी। कंपनियों के पास मिसाइल इंटीग्रेशन, परीक्षण, क्वालिटी एश्योरेंस और सिस्टम इंजीनियरिंग का अनुभव होना चाहिए।
विशेष रूप से रेडियो फ्रीक्वेंसी सीकर, इंफ्रारेड इमेजिंग सीकर, एम्बेडेड सिस्टम, कंट्रोल सिस्टम, सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट और एयरवर्दीनेस क्वालिफिकेशन जैसे क्षेत्रों में विशेषज्ञता रखने वाली कंपनियों को लाभ मिल सकता है।
इसके अलावा उत्पादन सुविधाएं, पर्यावरण परीक्षण लैब, ईएमआई-ईएमसी टेस्ट सुविधा, मैकेनिकल वर्कशॉप और बड़े पैमाने पर उत्पादन की क्षमता भी देखी जाएगी।
वहीं, डीआरडीओ की विशेषज्ञ टीम कंपनियों के कारखानों और सुविधाओं का दौरा भी करेगी। टीम यह जांचेगी कि कंपनी के पास आवश्यक मशीनरी, तकनीकी विशेषज्ञ, सुरक्षा व्यवस्था और उत्पादन क्षमता मौजूद है या नहीं।
इसी मूल्यांकन के आधार पर अंतिम शॉर्टलिस्ट तैयार की जाएगी। (DRDO strategic weapons)
मिसाइल निर्माण में क्या होगी निजी उद्योग की भूमिका?
चयनित कंपनियां केवल पार्ट्स सप्लाई नहीं करेंगी। उन्हें डीआरडीओ की परियोजनाओं में इंजीनियर और तकनीशियन तैनात करने होंगे। वे इंटीग्रेशन टूल्स, जिग्स, हैंडलिंग इक्विपमेंट और उत्पादन दस्तावेज तैयार करेंगी।
इसके अलावा वे परीक्षण प्रक्रिया में भाग लेंगी, सप्लाई चेन का प्रबंधन करेंगी और उत्पादन शुरू होने के बाद रखरखाव तथा तकनीकी सहायता भी उपलब्ध कराएंगी।
उन्हें पूरी लाइफ साइकल के दौरान सिस्टम सपोर्ट की जिम्मेदारी भी दी जा सकती है। (DRDO strategic weapons)
ट्रांसफर ऑफ टेक्नोलॉजी भी मिलेगा
डीआरडीओ ने ईओआई में कहा है कि चयनित साझेदारों को ट्रांसफर ऑफ टेक्नोलॉजी यानी टीओटी उपलब्ध कराया जाएगा। यह टीओटी नॉन-स्पेसिफिक बेस पर होगी, यानी एक से अधिक कंपनियां इसका लाभ ले सकेंगी।
हालांकि विस्फोटक और प्रोपेलेंट से जुड़ी तकनीकों के लिए अतिरिक्त सरकारी मंजूरी आवश्यक होगी। (DRDO strategic weapons)
Author
हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।





