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Project-18 पर बड़ा अपडेट: भारतीय नौसेना के लिए आ रहे हैं नए ‘सुपर डिस्ट्रॉयर’, 144 मिसाइलों से होंगे लैस!

प्रोजेक्ट-18 या नेक्स्ट जेनरेशन डिस्ट्रॉयर (एनजीडी) के नाम से जाना जाता है। इसकी अनुमानित लागत करीब 80,000 करोड़ रुपये है। योजना के तहत भारतीय शिपयार्ड में नए युद्धपोत बनाए जाएंगे और इनमें स्वदेशी तकनीक का इस्तेमाल अधिकतम स्तर तक किया जाएगा...

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📍नई दिल्ली | 19 Aug, 2026, 1:08 PM

Indian Navy Super Destroyer Project 18: भारतीय नौसेना अब तक के सबसे ताकतवर और बड़े युद्धपोतों में शामिल होने वाले नेक्स्ट जेनरेशन डिस्ट्रॉयर (एनजीडी) प्रोजेक्ट पर बड़ा कदम उठाने वाली है। रक्षा मंत्रालय के भीतर इस महत्वाकांक्षी परियोजना को आगे बढ़ाने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। प्रस्ताव जल्द ही डिफेंस प्रोक्योरमेंट बोर्ड (डीपीबी) के सामने रखा जाएगा।

इस परियोजना को आमतौर पर प्रोजेक्ट-18 या नेक्स्ट जेनरेशन डिस्ट्रॉयर (एनजीडी) के नाम से जाना जाता है। इसकी अनुमानित लागत करीब 80,000 करोड़ रुपये है। योजना के तहत भारतीय शिपयार्ड में नए युद्धपोत बनाए जाएंगे और इनमें स्वदेशी तकनीक का इस्तेमाल अधिकतम स्तर तक किया जाएगा।

Indian Navy Super Destroyer Project 18: मौजूदा डिस्ट्रॉयर से कहीं बड़े होंगे नए युद्धपोत

भारतीय नौसेना के पास इस समय विशाखापत्तनम क्लास, कोलकाता क्लास और दिल्ली क्लास जैसे डिस्ट्रॉयर मौजूद हैं। इनमें से सबसे आधुनिक विशाखापत्तनम क्लास का वजन लगभग 7,500 से 8,000 टन के बीच है।

नए नेक्स्ट जेनरेशन डिस्ट्रॉयर इससे काफी बड़े होंगे। शुरुआती जानकारी के अनुसार इनका डिस्प्लेसमेंट करीब 11,000 से 13,000 टन तक होगा। लंबाई लगभग 180 मीटर रहेगी। अपने इस साइज के चलते ये पारंपरिक डिस्ट्रॉयर की श्रेणी से आगे बढ़कर क्रूजर क्लास के करीब पहुंच जाते हैं।

भारतीय शिपयार्डों के बीच होगी प्रतिस्पर्धा

इस परियोजना की खास बात यह है कि युद्धपोतों के निर्माण के लिए प्रतिस्पर्धी प्रक्रिया अपनाई जाएगी। सरकारी और निजी दोनों क्षेत्रों के भारतीय शिपयार्ड इसमें भाग ले सकेंगे।

मुंबई स्थित मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड (एमडीएल) ने अब तक भारतीय नौसेना के अधिकांश डिस्ट्रॉयर बनाए हैं। हालांकि इस बार अन्य भारतीय शिपयार्डों को भी मौका मिलने की संभावना है। परियोजना के लिए बोली प्रक्रिया सरकार की मंजूरी मिलने के बाद शुरू होगी।

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लगभग पूरी तरह स्वदेशी बनाने का लक्ष्य

इस कार्यक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पहलू इसका स्वदेशीकरण है। नौसेना और रक्षा मंत्रालय चाहते हैं कि इन युद्धपोतों में इस्तेमाल होने वाले अधिकतर सिस्टम भारत में विकसित किए जाएं।

योजना के अनुसार स्वदेशी डीजल इंजन को वर्ष 2028 तक और गैस टर्बाइन इंजन को 2031 तक तैयार करने का लक्ष्य रखा गया है। यदि यह समयसीमा पूरी होती है तो जहाजों के प्रोपल्शन सिस्टम में विदेशी निर्भरता काफी कम हो जाएगी।

इन युद्धपोतों में इंटीग्रेटेड इलेक्ट्रिक प्रोपल्शन जैसी आधुनिक तकनीक शामिल किए जाने पर भी काम चल रहा है। यह प्रणाली जहाज को बेहतर ऊर्जा प्रबंधन और अधिक दक्षता प्रदान करती है।

ब्रह्मोस और एयर डिफेंस मिसाइलों से लैस 

नए डिस्ट्रॉयर की मारक क्षमता भी काफी अधिक होगी। इनमें एक्सटेंडेड रेंज ब्रह्मोस क्रूज मिसाइल लगाने की योजना है। यह मिसाइल लगभग 800 किलोमीटर तक लक्ष्य को निशाना बना सकती है। शुरुआती ब्रह्मोस मिसाइलों की रेंज करीब 290 किलोमीटर थी। ब्रह्मोस की गति ध्वनि की गति से ढाई गुना से भी अधिक होती है, जिससे इसे रोकना बेहद कठिन माना जाता है।

इसके अलावा जहाजों में लंबी दूरी की एयर डिफेंस मिसाइलें भी लगाई जाएंगी। स्वदेशी लंबी दूरी की सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल प्रणाली पर भी काम चल रहा है, जिसके 2028-29 के आसपास उपलब्ध होने की उम्मीद जताई गई है।

144 से ज्यादा मिसाइल सेल्स की तैयारी

इन युद्धपोतों में लगभग 144 वर्टिकल लॉन्च सिस्टम (वीएलएस) सेल्स हो सकती हैं। इनके अलावा अलग लॉन्चर भी लगाए जा सकते हैं।

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यही सिस्टम विभिन्न प्रकार की मिसाइलों को ले जाने और लॉन्च करने का काम करते हैं। तुलना करें तो मौजूदा विशाखापत्तनम क्लास डिस्ट्रॉयर में इससे कम मिसाइल क्षमता है। अधिक वीएलएस सेल्स होने का मतलब है कि जहाज एक साथ ज्यादा प्रकार के हथियार अपने साथ ले जा सकेगा।

आधुनिक रडार और सेंसर भी होंगे शामिल

इन युद्धपोतों में नई पीढ़ी के एईएसए रडार, मल्टी-फंक्शन सेंसर और एडवांस्ड फायर कंट्रोल सिस्टम लगाए जाने की योजना है।

इनमें से कुछ रडार 500 किलोमीटर से अधिक दूरी तक एरियल टारगेट्स का पता लगा सकते हैं। इसके साथ सोनार, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम और सैटेलाइट आधारित कम्युनिकेशन सिस्टम भी शामिल होंगे।

जहाजों को स्टेल्थ डिजाइन के साथ विकसित किया जाएगा ताकि दुश्मन के रडार पर उनकी पहचान करना मुश्किल हो।

पुराने युद्धपोतों की जगह लेंगे नए प्लेटफॉर्म

भारतीय नौसेना के पास वर्तमान में 10 स्वदेशी डिस्ट्रॉयर हैं। इनमें चार विशाखापत्तनम क्लास और तीन कोलकाता क्लास जहाज शामिल हैं। इसके अलावा दिल्ली क्लास के युद्धपोत 25 से 30 वर्ष पुराने हो चुके हैं।

रूसी मूल के काशिन क्लास युद्धपोत भी लंबे समय से सेवा में हैं। नए डिस्ट्रॉयर तैयार होने के बाद पुराने जहाजों को चरणबद्ध तरीके से सेवा से हटाया जा सकता है। (Indian Navy Super Destroyer Project 18)

2034-35 तक होगी डिलीवरी

प्रोजेक्ट को सबसे पहले डिफेंस प्रोक्योरमेंट बोर्ड के सामने रखा जाएगा। वहां से मंजूरी मिलने के बाद मामला डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल (डीएसी) के पास जाएगा, जिसकी अध्यक्षता रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह करते हैं।

इसके बाद अंतिम स्वीकृति के लिए प्रस्ताव कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (सीसीएस) के पास जाएगा, जिसकी अध्यक्षता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी करते हैं।

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इन मंजूरियों के बाद निर्माण के लिए औपचारिक बोली प्रक्रिया शुरू होगी। पहले युद्धपोत के 2034-35 के आसपास तैयार होने की संभावना है।

यह परियोजना भारतीय नौसेना के अब तक के सबसे बड़े और तकनीकी रूप से सबसे उन्नत स्वदेशी युद्धपोत कार्यक्रमों में से एक मानी जा रही है, जिसमें जहाज के ढांचे से लेकर हथियार, सेंसर और प्रोपल्शन सिस्टम तक अधिकतम स्वदेशी तकनीक को शामिल करने पर जोर दिया गया है। (Indian Navy Super Destroyer Project 18)

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  • News Desk

    रक्षा समाचार न्यूज डेस्क भारत की अग्रणी हिंदी रक्षा समाचार टीम है, जो Indian Army, Navy, Air Force, DRDO, रक्षा उपकरण, युद्ध रणनीति और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी विश्वसनीय और विश्लेषणात्मक खबरें पेश करती है। हम लाते हैं सटीक, सरल और अपडेटेड Defence News in Hindi। हमारा उद्देश्य है – "हर खबर, देश की रक्षा से जुड़ी।"

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