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जानिए भारतीय सेना की AASHVAST लैब क्यों है खास? ड्रोन, सेंसर और मिलिट्री इलेक्ट्रॉनिक्स की करेगी सुरक्षा जांच

भारतीय सेना प्रमुख जनरल धीरज सेठ ने हाल ही में "आश्वस्त" (AASHVAST) नाम की एक खास सुविधा का उद्घाटन किया। इसका पूरा नाम असेसमेंट एंड एनालिसिस ऑफ इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम्स हार्डवेयर फॉर वल्नरेबिलिटीज एंड सिक्योरिटी थ्रेट्स है...

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📍नई दिल्ली | 21 Aug, 2026, 12:31 PM

AASHVAST Facility: आधुनिक युद्ध में इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम, सेंसर, कम्युनिकेशन नेटवर्क, ड्रोन और सॉफ्टवेयर किसी भी सेना की ताकत का अहम हिस्सा बन चुके हैं। अगर इन सिस्टम्स में कोई कमजोरी छिपी रह जाए या दुश्मन साइबर हमले के जरिए इन्हें प्रभावित कर दे, तो पूरा सैन्य ऑपरेशन खतरे में पड़ सकता है।

इसी चुनौती को ध्यान में रखते हुए भारतीय सेना प्रमुख जनरल धीरज सेठ ने हाल ही में “आश्वस्त” (AASHVAST) नाम की एक खास सुविधा का उद्घाटन किया। इसका पूरा नाम असेसमेंट एंड एनालिसिस ऑफ इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम्स हार्डवेयर फॉर वल्नरेबिलिटीज एंड सिक्योरिटी थ्रेट्स है। यह सुविधा सेना के उन महत्वपूर्ण इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम्स की जांच करेगी, जिन पर मिशन की सफलता और सैनिकों की सुरक्षा निर्भर करती ह

AASHVAST Facility क्या है?

आश्वस्त को भारतीय सेना के हेडक्वॉर्टर टीजी ग्रुप ने डेवलप किया है। इसका उद्देश्य मिशन-क्रिटिकल सैन्य इलेक्ट्रॉनिक्स की सुरक्षा, विश्वसनीयता और मजबूती का आकलन करना है।

सरल शब्दों में समझें तो यह सुविधा यह पता लगाएगी कि सेना में इस्तेमाल होने वाले इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, कम्युनिकेशन सिस्टम, सेंसर, कंट्रोल यूनिट, प्रोसेसर और अन्य हार्डवेयर किसी साइबर हमले, छेड़छाड़ या तकनीकी कमजोरी के प्रति कितने सुरक्षित हैं।

आज किसी भी आधुनिक सैन्य प्लेटफॉर्म में हजारों इलेक्ट्रॉनिक पार्ट्स लगे होते हैं। इनमें से किसी एक कमजोर हिस्से का फायदा उठाकर दुश्मन पूरे सिस्टम को प्रभावित कर सकता है। आश्वस्त का काम ऐसी कमजोरियों को पहले ही पहचानना है।

इलेक्ट्रॉनिक्स पर निर्भर है सेना

कुछ साल पहले तक युद्ध का मतलब हथियारों और सैनिकों की संख्या से लगाया जाता था। लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। आज सेना की कमांड एंड कंट्रोल व्यवस्था, रडार, ड्रोन, मिसाइल गाइडेंस, नेविगेशन सिस्टम और संचार नेटवर्क पूरी तरह इलेक्ट्रॉनिक्स पर निर्भर हैं।

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अगर किसी ड्रोन का कंट्रोल सिस्टम हैक हो जाए, किसी सेंसर में छिपा बैकडोर सक्रिय हो जाए या कम्युनिकेशन नेटवर्क बाधित हो जाए तो मिशन प्रभावित हो सकता है।

यही कारण है कि दुनिया की बड़ी सेनाएं अब साइबर सिक्योरिटी और हार्डवेयर सिक्योरिटी को भी किसी वेपन सिस्टम की तरह ही उतनी ही अहमियत दे रही हैं।

आश्वस्त को मिली कई महत्वपूर्ण मान्यताएं

आश्वस्त को कई महत्वपूर्ण संस्थाओं से मान्यता भी मिली है। आश्वस्त को मेइटी-एनआईसीएसआई लिस्टिंग, एनएबीएल एक्रिडिटेशन और एमएसडीई स्किल इंडिया द्वारा सेंटर ऑफ एक्सीलेंस का दर्जा मिला है।

जिसका मतलब है कि यहां होने वाली जांच और परीक्षण निर्धारित तकनीकी मानकों के अनुसार किए जाएंगे। साथ ही यह सुविधा डिफेंस सेक्टर के लिए विशेषज्ञ मानव संसाधन तैयार करने में भी भूमिका निभाएगी।

ड्रोन सेक्टर के लिए क्यों महत्वपूर्ण है आश्वस्त?

भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना में ड्रोन का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। निगरानी, टोही मिशन, लक्ष्य पहचान, संचार और कई अन्य कार्यों में ड्रोन अहम भूमिका निभा रहे हैं।

लेकिन किसी ड्रोन की असली ताकत सिर्फ उसकी उड़ान क्षमता नहीं होती। उसके भीतर लगे फ्लाइट कंट्रोलर, प्रोसेसर, सेंसर, नेविगेशन मॉड्यूल, कम्युनिकेशन सिस्टम, फर्मवेयर और सॉफ्टवेयर भी उतने ही महत्वपूर्ण होते हैं।

अगर इनमें कोई तकनीकी कमजोरी हो या सप्लाई चेन सुरक्षित न हो तो पूरा सिस्टम जोखिम में आ सकता है।

इसी वजह से रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि आश्वस्त जैसी सुविधा का दायरा सैन्य ड्रोन इकोसिस्टम तक भी बढ़ाया जाना चाहिए।

व्हाइट लेबल से व्हाइट लिस्टिंग की ओर बढ़ने की जरूरत

भारतीय डिफेंस सेक्टर में “मेक इन इंडिया” के तहत कई प्लेटफॉर्म तैयार किए जाते हैं। हालांकि कई बार ऐसा होता है कि किसी विदेशी तकनीक या विदेशी पार्ट्स को जोड़कर तैयार उत्पाद को भारतीय उत्पाद के रूप में पेश किया जाता है।

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सूत्रों का कहना है कि अब केवल “इंडियन लेबल” लगाना काफी नहीं है। जरूरत “व्हाइट लिस्टिंग” की है, जहां हर महत्वपूर्ण तकनीक की विश्वसनीयता और सोर्स की पुष्टि हो।

सेना को यह पता होना चाहिए कि किसी ड्रोन या सैन्य सिस्टम में लगा प्रोसेसर कहां बना, उसका सॉफ्टवेयर किसके कंट्रोल में है और उसकी सप्लाई चेन कितनी सुरक्षित है।

हर मिलिट्री ड्रोन की गहन तकनीकी जांच जरूरी

सूत्रों के मुताबिक भविष्य में एक राष्ट्रीय व्हाइट लिस्ट ऑफ ट्रस्टेड ड्रोन प्लेटफॉर्म्स एंड क्रिटिकल कंपोनेंट्स बनाई जा सकती है।

इसके तहत हर सैन्य ड्रोन के फ्लाइट कंट्रोलर, प्रोसेसर, सेंसर, कम्युनिकेशन सिस्टम, नेविगेशन मॉड्यूल, फर्मवेयर, सॉफ्टवेयर और आईएसआर पेलोड की जांच की जा सकती है।

इससे यह सुनिश्चित होगा कि सिस्टम साइबर हमलों के खिलाफ कितना सुरक्षित है, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर की स्थिति में कैसे काम करेगा और उसके अंदर कोई छिपी कमजोरी तो नहीं है।

“ट्रस्टेड बाय डिजाइन” मॉडल पर जोर

आश्वस्त का उद्देश्य ऐसा डिफेंस टेक्नोलॉजी इकोसिस्टम बनाना है जिसे शुरुआत से ही भरोसेमंद तरीके से डिजाइन किया गया हो।

इस मॉडल में स्वदेशी डिजाइन अथॉरिटी, आईपीआर राइट्स पर कंट्रोल, सुरक्षित सप्लाई चेन, सोर्स कोड पर अधिकार और भारत में ही सिस्टम को अपग्रेड करने की क्षमता शामिल होती है। जिसे डिफेंस सेक्टर में इसे “ट्रस्टेड बाय डिजाइन” अप्रोच कहा जाता है।

आत्मनिर्भर भारत और टेक्नोलॉजी सॉवरेनिटी से जुड़ा कदम

आश्वस्त सुविधा आत्मनिर्भर भारत अभियान के रक्षा आयाम को मजबूत करने वाली पहल मानी जा रही है।

इसका फोकस केवल भारत में असेंबली करने पर नहीं बल्कि भारत में तकनीक विकसित करने, उसकी सुरक्षा जांचने और उस पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित करने पर है।

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क्योंकि किसी भी देश की वास्तविक तकनीकी ताकत तब मानी जाती है जब वह अपने महत्वपूर्ण सैन्य सिस्टम की डिजाइन, सॉफ्टवेयर, हार्डवेयर और सप्लाई चेन पर पूरा नियंत्रण रखता हो। (AASHVAST Facility)

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  • herry passport

    हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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