📍मुंबई | 12 Oct, 2026, 9:03 PM
INS Mangrol Commissioned: भारतीय नौसेना ने 12 अक्टूबर को मुंबई के नेवल डॉकयार्ड में स्वदेशी एंटी-सबमरीन वॉरफेयर शैलो वॉटर क्राफ्ट आईएनएस मंगरोल (P82) को अपने बेड़े में शामिल कर लिया। कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड (सीएसएल) द्वारा निर्मित यह माहे-क्लास का तीसरा युद्धपोत है। इसमें 80 प्रतिशत से अधिक स्वदेशी सामग्री का इस्तेमाल किया गया है। करीब 78 मीटर लंबे इस जहाज को खास तौर पर तटीय इलाकों और कम गहराई वाले समुद्री क्षेत्रों में दुश्मन की पनडुब्बियों का पता लगाने और उनसे मुकाबला करने के लिए तैयार किया गया है।
इसकी कमीशनिंग सेरेमनी की अध्यक्षता पश्चिमी नौसेना कमान के फ्लैग ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ वाइस एडमिरल संजय वत्सायन ने की।
INS Mangrol Commissioned: 1. उथले पानी में भी ऑपरेशन करने की क्षमता
आईएनएस मंगरोल की सबसे बड़ी खूबी इसका डिजाइन है। इसे ऐसे समुद्री इलाकों में ऑपरेशन करने के लिए बनाया गया है, जहां समुद्र की गहराई कम होती है और बड़े युद्धपोतों के लिए आवाजाही करना मुश्किल हो सकता है।
जहाज की लंबाई लगभग 78 मीटर, चौड़ाई करीब 11.3 मीटर और ड्राफ्ट लगभग 2.7 मीटर है। ड्राफ्ट का मतलब जहाज के पानी में डूबे हुए हिस्से की गहराई से है। कम ड्राफ्ट होने के कारण मंगरोल तटीय जल, बंदरगाहों के आसपास और समुद्र के अपेक्षाकृत उथले हिस्सों में काम कर सकता है।
इसका मुख्य काम पानी के भीतर छिपी पनडुब्बियों का पता लगाना, उनकी गतिविधियों पर नजर रखना और जरूरत पड़ने पर उनके खिलाफ कार्रवाई करना है। इसके अलावा यह तटीय निगरानी, कम तीव्रता वाले समुद्री अभियानों और समुद्री माइंस से जुड़े कार्यों में भी इस्तेमाल किया जा सकता है। (INS Mangrol Commissioned)
2. अभय सोनार से पानी के भीतर तलाश
आईएनएस मंगरोल में लगा अभय हल-माउंटेड सोनार इसकी प्रमुख तकनीकी खूबियों में शामिल है। सोनार पानी के भीतर ध्वनि तरंगों की मदद से वस्तुओं का पता लगाने में मदद करता है।
पनडुब्बियां समुद्र के भीतर छिपकर काम करती हैं। ऐसे में उनका पता लगाने के लिए केवल रडार काफी नहीं होता। सोनार से मिलने वाले संकेतों के आधार पर पानी के भीतर मौजूद किसी वस्तु की पहचान करने और उसकी गतिविधियों का आकलन करने में मदद मिलती है।
अभय सोनार को डीआरडीओ की नेवल फिजिकल एंड ओशनोग्राफिक लेबोरेटरी (एनपीओएल) ने बनाया है, जबकि भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (बीईएल) इसके निर्माण से जुड़ी है।
जहाज में लो-फ्रीक्वेंसी वेरिएबल डेप्थ सोनार (एलएफवीडीएस) जैसी तकनीक भी शामिल है। इसे अलग-अलग गहराई पर इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे समुद्र की परिस्थितियों के अनुसार पानी के भीतर निगरानी करने में मदद मिलती है। (INS Mangrol Commissioned)
🇮🇳⚓ Indian Navy Commissions INS Mangrol: A New Boost to Indigenous Anti-Submarine Warfare Capabilities…
The Indian Navy commissioned INS Mangrol (P82), the third Mahe-class Anti-Submarine Warfare Shallow Water Craft (ASW-SWC), at the Naval Dockyard, Mumbai, on 12 October 2026. The ceremony was presided over by Vice Admiral Sanjay Vatsayan, Flag Officer Commanding-in-Chief, Western Naval Command.
INS Mangrol Built in India, Designed and constructed by Cochin Shipyard Limited, Kochi. INS Mangrol features over 80% indigenous content, reflecting India’s growing warship-building capabilities and commitment to Aatmanirbhar Bharat.
Designed for coastal and shallow-water operations, the vessel is equipped for anti-submarine warfare, underwater surveillance, low-intensity maritime operations and mine warfare-related tasks. Its advanced sonar, sensors and weapon systems enhance its ability to detect and counter underwater threats.
Named after the coastal town of Mangrol in Gujarat, the warship strengthens India’s coastal defence and maritime surveillance capabilities.
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3. टॉरपीडो और एंटी-सबमरीन रॉकेट से हमला
आईएनएस मंगरोल में पानी के भीतर मौजूद दुश्मन की पनडुब्बियों के खिलाफ इस्तेमाल होने वाले हथियार भी लगाए गए हैं।
इसमें आरबीयू-6000 एंटी-सबमरीन रॉकेट लॉन्चर और तीन-तीन ट्यूब वाले दो लाइटवेट टॉरपीडो लॉन्चिंग सिस्टम दिए गए हैं। इन ट्यूबों से एडवांस्ड लाइट-वेट टॉरपीडो (एएलडब्ल्यूटी) दागे जा सकते हैं।
टॉरपीडो पानी के भीतर इस्तेमाल होने वाला हथियार है, जिसका इस्तेमाल पनडुब्बियों और अन्य समुद्री में दूसरे लक्ष्यों के खिलाफ किया जाता है। वहीं, एंटी-सबमरीन रॉकेट लॉन्चर पनडुब्बी रोधी अभियानों में एक अन्य हथियार विकल्प देता है।
जहाज पर माइन-लेइंग रेल भी दी गई हैं। इनके जरिए समुद्री माइंस बिछाने से जुड़े कार्य किए जा सकते हैं। समुद्री माइंस का इस्तेमाल निर्धारित समुद्री क्षेत्रों में जहाजों की आवाजाही को सीमित करने या समुद्री सुरक्षा अभियानों के हिस्से के रूप में किया जाता है। (INS Mangrol Commissioned)
4. मारीच सिस्टम और तेज वॉटरजेट प्रोपल्शन
पनडुब्बियों के खिलाफ कार्रवाई करने वाले जहाज के लिए अपनी सुरक्षा करना भी जरूरी है। आईएनएस मंगरोल में स्वदेशी मारीच एडवांस्ड टॉरपीडो डिकॉय सिस्टम लगाया गया है। इसे डीआरडीओ और बीईएल के सहयोग से डेवलप किया गया है।
इस सिस्टम का उद्देश्य दुश्मन के टॉरपीडो को भ्रमित करके जहाज से दूर ले जाने में मदद करना है। डिकॉय ऐसे सिग्नल पैदा कर सकता है, जिनकी ओर आने वाला टॉरपीडो आकर्षित हो जाए। इससे जहाज को टॉरपीडो हमले से बचाव का एक अतिरिक्त विकल्प मिलता है।
जहाज में तीन मरीन डीजल इंजन और तीन वॉटरजेट प्रोपल्शन यूनिट लगी हैं। इनकी कुल शक्ति लगभग 6 मेगावाट बताई गई है।
वॉटरजेट सिस्टम में पानी को खींचकर तेज गति से पीछे की ओर छोड़ा जाता है, जिससे जहाज आगे बढ़ता है। इस तकनीक से कम गहराई वाले पानी में दिशा बदलने और सीमित जगह पर जहाज को कंट्रोल करने में मदद मिलती है।
आईएनएस मंगरोल की अधिकतम गति लगभग 25 नॉट, यानी करीब 46 किलोमीटर प्रति घंटा बताई गई है। 14 नॉट की गति पर इसकी रेंज लगभग 1,800 नॉटिकल मील है। यह करीब 14 दिन तक समुद्र में अभियान चला सकता है। (INS Mangrol Commissioned)
5. 80 प्रतिशत से अधिक स्वदेशी सामग्री
आईएनएस मंगरोल का निर्माण कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड ने केरल के कोच्चि में किया है। जहाज में 80 प्रतिशत से अधिक स्वदेशी सामग्री का इस्तेमाल हुआ है। इसमें भारतीय रक्षा उद्योगों और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) की भी भागीदारी है।
इसका वजन लगभग 896 से 1,100 टन के बीच है। जहाज पर सात अधिकारी और 50 नाविकों सहित कुल 57 लोगों का क्रू तैनात हो सकता है।
मंगरोल का नाम गुजरात के जूनागढ़ जिले के तटीय कस्बे मंगरोल के नाम पर रखा गया है। यह क्षेत्र मछली पकड़ने के प्रमुख बंदरगाहों में शामिल है। नए युद्धपोत के नाम से भारतीय नौसेना के पुराने आईएनएस मंगरोल (M85) की याद भी जुड़ी है। पुराना जहाज माइनस्वीपर था, जिसे 16 मई 1983 को नौसेना में शामिल किया गया था और 7 अप्रैल 2004 को सेवा से बाहर कर दिया गया था।
माहे-क्लास के शुरुआती तीन जहाजों- माहे, मालवन और मंगरोल को 30 नवंबर 2023 को एक साथ लॉन्च किया गया था। मंगरोल को 21 अगस्त को भारतीय नौसेना को सौंपा गया था।
पूरे एएसडब्ल्यू-एसडब्ल्यूसी कार्यक्रम के तहत 16 जहाज बनाए जा रहे हैं। इनमें आठ माहे-क्लास जहाज कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड और आठ अर्नाला-क्लास जहाज गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (जीआरएसई) द्वारा बनाए जा रहे हैं। इन जहाजों का उद्देश्य तटीय और उथले समुद्री क्षेत्रों में पनडुब्बी रोधी क्षमता मजबूत करना और पुराने अभय-क्लास कार्वेट की जगह लेना है। (INS Mangrol Commissioned)
Author
हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।





