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समुद्र में दुश्मन की पनडुब्बियों की खैर नहीं! 12 अक्टूबर को नौसेना में शामिल होगा एंटी-सबमरीन वॉरशिप INS Mangrol, मारीच सिस्टम से है लैस

78 मीटर लंबा आईएनएस मंगरोल उथले समुद्र में दुश्मन की पनडुब्बियों का पता लगाने और उनका मुकाबला करने में सक्षम है। इसमें अभय सोनार, हल्के टॉरपीडो और स्वदेशी मारीच टॉरपीडो डिकॉय सिस्टम लगाया गया है...

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📍नई दिल्ली | 9 Oct, 2026, 7:35 PM

INS Mangrol Commissioning: भारतीय नौसेना 12 अक्टूबर को मुंबई के नेवल डॉकयार्ड में स्वदेशी एंटी-सबमरीन वारफेयर शैलो वॉटर क्राफ्ट (एएसडब्ल्यू-एसडब्ल्यूसी) आईएनएस मंगरोल को अपने बेड़े में शामिल करेगी। अब तक भारतीय नौसेना को सात एंटी-सबमरीन वारफेयर शैलो वॉटर क्राफ्ट डिलीवर हो चुके हैं। यह कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड (सीएसएल) निर्मित यह माहे-क्लास का तीसरा युद्धपोत है। इसका मुख्य काम तटीय और उथले समुद्री क्षेत्रों में दुश्मन की पनडुब्बियों का पता लगाना और उनका मुकाबला करना है।

INS Mangrol Commissioning: निगरानी और एंटी-सबमरीन ऑपरेशन में करेग मदद

समुद्र में पनडुब्बियों का पता लगाना आसान नहीं होता। पनडुब्बियां पानी के भीतर छिपकर युद्धपोतों, बंदरगाहों और समुद्री रास्तों के लिए खतरा पैदा कर सकती हैं। ऐसे में नौसेना को ऐसे जहाजों की जरूरत होती है, जो कम गहराई वाले समुद्री क्षेत्रों में भी पनडुब्बियों की गतिविधियों का पता लगा सकें।

आईएनएस मंगरोल को इसी भूमिका के लिए तैयार किया गया है। इसका डिजाइन तटीय क्षेत्रों और उथले पानी में ऑपरेशन को ध्यान में रखकर बनाया गया है। बड़े युद्धपोतों कम गहराई वाले इलाकों में ऑपरेशन नहीं कर पाते हैं, जबकि मंगरोल जैसे छोटे युद्धपोत ऐसे क्षेत्रों में निगरानी और एंटी-सबमरीन ऑपरेशन चला सकते हैं।

इसकी मदद से नौसेना बंदरगाहों, समुद्री ठिकानों और तटीय समुद्री रास्तों की सुरक्षा मजबूत कर सकती है।

गुजरात के तटीय शहर के नाम पर रखा गया नाम

आईएनएस मंगरोल का नाम गुजरात के जूनागढ़ जिले के तटीय कस्बे मंगरोल पर रखा गया है। यह इलाका मछली पकड़ने के प्रमुख बंदरगाहों में गिना जाता है।

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इस नाम का संबंध भारतीय नौसेना के पुराने जहाज आईएनएस मंगरोल (एम85) से भी है। वह एक माइनस्वीपर था, जिसका काम समुद्र में बिछाई गई माइंस का पता लगाने और उनसे निपटने से जुड़ा था। पुराने जहाज को 16 मई 1983 को नौसेना में कमीशन किया गया था और 7 अप्रैल 2004 को कोच्चि में सेवा से हटा दिया गया था।

नए आईएनएस मंगरोल के कमीशन होने के साथ भारतीय नौसेना की तटीय पनडुब्बी रोधी क्षमता में एक और स्वदेशी युद्धपोत जुड़ जाएगा। (INS Mangrol Commissioning)

कोचीन शिपयार्ड में हुआ निर्माण

मंगरोल का नाम गुजरात के मंगरोल तटीय शहर से है और पुराने आईएनएस मंगरोल (माइंसवीपर) की विरासत भी रखता है। आईएनएस मंगरोल का निर्माण कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड ने किया है। जहाज में 80 प्रतिशत से अधिक स्वदेशी सामग्री का इस्तेमाल किया गया है। यह जहाज शैलो वॉटर एएसडब्ल्यू, सर्विलांस, लो इंटेंसिटी मैरिटाइम ऑपरेशंस (LIMO) और माइन-लेइंग के लिए डिजाइन किया गया है।

रक्षा मंत्रालय और सीएसएल के बीच अप्रैल 2019 में आठ एंटी-सबमरीन शैलो वॉटर क्राफ्ट बनाने का कॉन्ट्रैक्ट हुआ था। मंगरोल इसी प्रोजेक्ट का तीसरा जहाज है। इसे 21 अगस्त को कोचीन शिपयार्ड ने भारतीय नौसेना को सौंप दिया था।

इस क्लास के शुरुआती तीन जहाज माहे, मालवन और मंगरोल को 30 नवंबर को एक साथ लॉन्च किया गया था। इस क्लास का पहला जहाज आईएनएस माहे नवंबर 2025 में नौसेना में शामिल हुआ था, जबकि आईएनएस मालवन को जुलाई 2026 में कारवार में कमीशन किया गया। माहे क्लास के बाकी जहाज मालपे, मुलकी, मगदला और मचिलीपट्टनम शामिल हैं, जिनकी डिलीवरी 2027 तक होने की उम्मीद है। ये सभी जहाज मुख्य रूप से पश्चिमी बेड़े में शामिल होंगे।

पूरे एएसडब्ल्यू-एसडब्ल्यूसी कार्यक्रम में 16 जहाज शामिल हैं। ये पूर्वी बेड़े की तरफ हैं। इनमें आठ जहाज कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड बना रहा है, जबकि आठ अर्नाला-क्लास जहाज गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (जीआरएसई) द्वारा बनाए जा रहे हैं। सभी जहाजों की डिलीवरी 2028 तक पूरी होने की उम्मीद है।

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ये सभी जहाज पुरानी अभय-क्लास कार्वेटों की जगह तटीय और उथले पानी की एंटी-सबमरीन भूमिका निभाएंगे। (INS Mangrol Commissioning)

78 मीटर लंबा जहाज, तीन डीजल इंजन से मिलेगी ताकत

आईएनएस मंगरोल की लंबाई लगभग 78 मीटर और चौड़ाई करीब 11.3 मीटर है। इसका ड्राफ्ट लगभग 2.7 मीटर बताया गया है। कम ड्राफ्ट के चलते यह अपेक्षाकृत कम गहराई वाले समुद्री क्षेत्रों में ऑपरेशन कर सकता है।

जहाज का वजन लगभग 896 से 1,100 टन के बीच है। इसमें तीन डीजल इंजन और वॉटरजेट प्रोपल्शन सिस्टम लगाया गया है। वॉटरजेट सिस्टम में पानी को खींचकर तेज गति से पीछे की ओर छोड़ा जाता है, जिससे जहाज आगे बढ़ता है।

जिससे जहाज को तटीय जल में तेजी से दिशा बदलने और सीमित जगह में बेहतर नियंत्रण रखने में मदद मिलती है। इसकी अधिकतम गति लगभग 25 नॉट, यानी करीब 46 किलोमीटर प्रति घंटा बताई गई है। 14 नॉट की गति पर इसकी रेंज लगभग 1,800 नॉटिकल मील है। जहाज करीब 14 दिनों तक समुद्र में अभियान चला सकता है।

इसमें सात अधिकारियों और 50 नाविकों सहित लगभग 57 लोगों का क्रू तैनात हो सकता है। (INS Mangrol Commissioning)

अभय सोनार से पानी के भीतर दुश्मन की तलाश

आईएनएस मंगरोल का प्रमुख उपकरण अभय हल-माउंटेड सोनार है। सोनार पानी के भीतर ध्वनि तरंगों की मदद से वस्तुओं का पता लगाने की तकनीक है। यह पनडुब्बियों की मौजूदगी और उनकी गतिविधियों का पता लगाने में मदद करता है।

अभय सोनार को डीआरडीओ की नेवल फिजिकल एंड ओशनोग्राफिक लेबोरेटरी (एनपीओएल) ने डेवलप किया है और भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (बीईएल) इसका निर्माण करती है।

जहाज में लो फ्रीक्वेंसी वेरिएबल डेप्थ सोनार यानी एलएफवीडीएस जैसी तकनीकें भी शामिल हैं। वेरिएबल डेप्थ सोनार को अलग-अलग गहराई पर इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे समुद्र की परिस्थितियों के अनुसार पानी के भीतर निगरानी करने में मदद मिलती है।

सोनार से मिली जानकारी का इस्तेमाल जहाज के अन्य सेंसर और कॉम्बैट मैनेजमेंट सिस्टम के साथ मिलकर किया जा सकता है। इससे पनडुब्बी की गतिविधियों का आकलन करने और जरूरी कार्रवाई के लिए निर्णय लेने में सहायता मिलती है। (INS Mangrol Commissioning)

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हल्के टॉरपीडो और स्वदेशी रॉकेट लॉन्चर

आईएनएस मंगरोल में पनडुब्बियों के खिलाफ इस्तेमाल होने वाले हल्के टॉरपीडो और स्वदेशी एंटी-सबमरीन रॉकेट लॉन्चर लगाए गए हैं। टॉरपीडो पानी के भीतर चलने वाला हथियार है, जिसे पनडुब्बी या अन्य समुद्री लक्ष्य को निशाना बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है।

हल्के टॉरपीडो जहाज को पानी के भीतर मौजूद खतरे के खिलाफ हमला करने का विकल्प देते हैं। इसके अलावा एंटी-सबमरीन रॉकेट लॉन्चर भी पनडुब्बी रोधी अभियान में इस्तेमाल किया जा सकता है।

जहाज पर माइन बिछाने की क्षमता भी है। समुद्री माइंस का इस्तेमाल किसी निर्धारित समुद्री क्षेत्र में जहाजों की आवाजाही को सीमित करने या समुद्री सुरक्षा व्यवस्था के हिस्से के रूप में किया जाता है।

सेल्फ डिफेंस के लिए जहाज पर 30 मिलीमीटर की नौसैनिक तोप और 12.7 मिलीमीटर की स्टेबलाइज्ड रिमोट-कंट्रोल्ड गन भी लगाई गई है। (INS Mangrol Commissioning)

मारीच सिस्टम टॉरपीडो से बचाव में करेगा मदद

पनडुब्बी रोधी हथियारों के साथ जहाज की अपनी सुरक्षा भी महत्वपूर्ण है। आईएनएस मंगरोल में स्वदेशी मारीच एडवांस्ड टॉरपीडो डिकॉय सिस्टम लगाया गया है।

इस सिस्टम का काम आने वाले दुश्मन के टॉरपीडो को भ्रमित करना और उसे जहाज से दूर ले जाने में मदद करना है। टॉरपीडो डिकॉय पानी के भीतर ऐसे सिग्नल पैदा कर सकता है, जिनसे दुश्मन का हथियार अपने वास्तविक लक्ष्य के बजाय दूसरे सिगन्ल की ओर आकर्षित हो जाए।

जहाज में इलेक्ट्रॉनिक सपोर्ट मेजर्स (ईएसएम), इलेक्ट्रॉनिक इंटेलिजेंस (ईएलआईएनटी) और अन्य सेंसर भी शामिल हैं। ये उपकरण आसपास के इलेक्ट्रॉनिक संकेतों की पहचान और निगरानी में मदद करते हैं। (INS Mangrol Commissioning)

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  • herry passport

    हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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