📍नई दिल्ली | 13 Oct, 2026, 11:58 AM
Indian Coast Guard MALE Drones: भारत की समुद्री सीमाओं की निगरानी और समुद्र में संकट के दौरान लोगों को बचाने की क्षमता मजबूत करने के लिए भारतीय तटरक्षक बल 10 मीडियम एल्टीट्यूड लॉन्ग एंड्योरेंस (MALE) रिमोटली पायलटेड एयरक्राफ्ट (RPA) खरीदने की तैयारी कर रहा है। रक्षा मंत्रालय ने इस खरीद के लिए रिक्वेस्ट फॉर इन्फॉर्मेशन यानी आरएफआई जारी किया है।
इन ड्रोन का इस्तेमाल समुद्र में लंबे समय तक निगरानी करने, संदिग्ध जहाजों की पहचान करने, सर्च एंड रेस्क्यू ऑपरेशन में मदद देने और समुद्री प्रदूषण पर नजर रखने के लिए किया जा सकता है। खास बात यह है कि प्रस्तावित ड्रोन सैटकॉम यानी सैटेलाइट कम्युनिकेशन से लैस होंगे। इससे वे ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन से सीधी रेडियो संपर्क सीमा से बाहर रहने के बावजूद जानकारी भेज सकेंगे।
Indian Coast Guard MALE Drones: भारत के लिए समुद्री निगरानी क्यों जरूरी?
रक्षा मंत्रालय ने भारतीय तटरक्षक बल के लिए 10 MALE रिमोटली पायलटेड एयरक्राफ्ट की खरीद का आरएफआई 15 जुलाई 2026 को जारी किया था। जिसकी अंतिम तारीख बढ़ाकर 7 दिसंबर 2026 कर दी गई है।
भारत की समुद्री सुरक्षा का दायरा काफी बड़ा है। उपलब्ध सरकारी आंकड़ों के अनुसार, देश की तटरेखा लगभग 11,099 किलोमीटर लंबी है। भारत का एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक जोन यानी ईईजेड करीब 20.1 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला है। इसके अलावा इंडियन सर्च एंड रेस्क्यू रीजन यानी आईएसआरआर का क्षेत्र कुछ हिस्सों में तट से 1,000 नॉटिकल मील तक पहुंचता है।
ईईजेड में तट से 200 नॉटिकल मील तक का समुद्री क्षेत्र शामिल होता है। इस क्षेत्र में समुद्री संसाधनों और आर्थिक गतिविधियों से जुड़े अधिकारों की सुरक्षा महत्वपूर्ण होती है। वहीं, आईएसआरआर वह समुद्री क्षेत्र है जहां संकट में फंसे जहाजों और लोगों के लिए सर्च एंड रेस्क्यू से जुड़ी जिम्मेदारियां निभाई जाती हैं।
भारतीय तटरक्षक बल को समुद्री कानून लागू करने, जहाजों की निगरानी, समुद्र में फंसे लोगों को बचाने, समुद्री प्रदूषण से निपटने और ऑफशोर प्रतिष्ठानों की सुरक्षा जैसी जिम्मेदारियां सौंपी गई हैं। इतने बड़े क्षेत्र में लगातार निगरानी के लिए केवल जहाजों और हेलीकॉप्टरों पर निर्भर रहना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। लंबे समय तक हवा में रहने वाले ड्रोन इस काम में अतिरिक्त मदद दे सकते हैं।
सैटेलाइट से जुड़े होंगे ड्रोन
आरएफआई में सैटेलाइट कम्युनिकेशन से लैस मेल ड्रोन की जरूरत बताई गई है। ये ड्रोन मध्यम ऊंचाई पर लंबे समय तक उड़ान भरने और निगरानी करने का काम करते हैं। इनमें लाइन ऑफ साइट यानी एलओएस और सैटेलाइट कम्युनिकेशन आधारित डेटालिंक का सिस्टम होना जरूरी है। एलओएस लिंक में ड्रोन और ग्राउंड स्टेशन के बीच सीधा संपर्क जरूरी होता है। वहीं, सैटकॉम की मदद से ज्यादा दूरी पर मौजूद ड्रोन से भी संपर्क बनाए रखने की सुविधा मिल सकती है।
इन प्लेटफॉर्म से दिन और रात में निगरानी, संदिग्ध गतिविधियों का पता लगाने, जहाजों की पहचान करने और उनकी आवाजाही पर नजर रखने की क्षमता मांगी गई है। ड्रोन से मिलने वाली तस्वीरें और वीडियो वास्तविक समय में संबंधित कंट्रोल स्टेशन तक पहुंचाए जा सकेंगे।
इसके अलावा जहाजों के साथ संचार, मौसम संबंधी चेतावनी प्रसारित करने और अन्य सिस्टम के साथ डेटा शेयर करने की क्षमता भी महत्वपूर्ण है। (Indian Coast Guard MALE Drones)
कैमरे से लेकर मैरीटाइम रडार तक होंगे विकल्प
आरएफआई में अलग-अलग काम के लिए कई तरह के पेलोड और सेंसरों होने चाहिए। इनमें इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल और इन्फ्रारेड कैमरे, मैरीटाइम पेट्रोल रडार, सिंथेटिक अपर्चर रडार और पैनोरमिक कैमरे शामिल हैं।
इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल कैमरे से दिन के समय तस्वीरें ली जा सकती हैं, जबकि इन्फ्रारेड सेंसर कम रोशनी और रात में निगरानी में मदद करते हैं। मैरीटाइम पेट्रोल रडार का इस्तेमाल समुद्र में जहाजों का पता लगाने और उनकी गतिविधियों पर नजर रखने के लिए किया जा सकता है।
सिंथेटिक अपर्चर रडार यानी एसएआर अलग तरह की रडार तकनीक है, जो निर्धारित परिस्थितियों में जमीन या सतह की विस्तृत तस्वीर तैयार कर सकती है। इसके अलावा प्रस्तावित पेलोड में रडार वॉर्निंग रिसीवर, कम्युनिकेशन रिले और जहाजों की पहचान से जुड़े सिस्टम भी शामिल हैं।
ऑटोमैटिक आइडेंटिफिकेशन सिस्टम यानी एआईएस जहाजों की पहचान और उनसे संबंधित जानकारी हासिल करने में उपयोगी होता है। वहीं, आइडेंटिफिकेशन फ्रेंड ऑर फो यानी आईएफएफ और ट्रैफिक अलर्ट एंड कोलिजन अवॉइडेंस सिस्टम यानी टीसीएएस जैसे उपकरण हवाई क्षेत्र में पहचान और सुरक्षा से जुड़े काम करते हैं।
तटरक्षक बल ने प्रदूषण की निगरानी के लिए भी विशेष उपकरणों का विकल्प रखा है। इनमें एसएलएआर एंटीना, आईआर और यूवी कैमरे तथा लेजर फ्लोरोसेंसर जैसे सिस्टम शामिल हैं। इनका इस्तेमाल समुद्र में तेल या अन्य प्रदूषण का पता लगाने के लिए किया जा सकता है।
आरएफआई में कम्युनिकेशन इंटेलिजेंस यानी कॉमिंट सिस्टम, एचएनएस डिटेक्शन पॉड और गन पॉड की क्षमता का भी उल्लेख है। हालांकि, सभी उपकरण हर ड्रोन में लगाए जाएंगे या नहीं, इसका अंतिम फैसला अभी तय नहीं हुआ है। (Indian Coast Guard MALE Drones)
जीपीएस जाम होने पर भी काम करने की क्षमता
समुद्री निगरानी वाले ड्रोन को अलग-अलग मौसम और कठिन परिस्थितियों में काम करना होगा। इसलिए आरएफआई में बारिश, बादल, धूल, रेत और नमक वाली समुद्री हवा जैसे वातावरण में संचालन की क्षमता पर जोर दिया गया है।
ड्रोन में एंटी-जैमिंग और एंटी-स्पूफिंग क्षमता भी होनी चाहिए। जैमिंग में किसी संचार या नेविगेशन सिग्नल को बाधित करने की कोशिश की जाती है, जबकि स्पूफिंग में गलत सिग्नल देकर सिस्टम को भ्रमित किया जा सकता है।
वहीं, जीपीएस उपलब्ध न होने की स्थिति में नेविक के साथ नेविगेशन की क्षमता होनी चाहिए। नेविक भारत की क्षेत्रीय सैटेलाइट नेविगेशन प्रणाली है। हालांकि, किसी विशेष ड्रोन में इसकी वास्तविक क्षमता का आकलन उसके तकनीकी विवरण और परीक्षणों के आधार पर किया जाएगा।
सुरक्षा के लिए साइबर सिक्योरिटी, सिस्टम में अतिरिक्त बैकअप व्यवस्था और ड्रोन का पता लगाने या काउंटर-ड्रोन सिस्टम से जुड़ी क्षमताएं भी तकनीकी जरूरतों में शामिल हैं। (Indian Coast Guard MALE Drones)
ट्रेनिंग, मरम्मत और भारत में रखरखाव पर जोर
सिस्टम में ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन, एलओएस और सैटकॉम डेटालिंक, मैनपोर्टेबल तथा वाहन पर लगाए जा सकने वाले रिमोट वीडियो टर्मिनल, ग्राउंड सपोर्ट उपकरण और ट्रेनिंग सिम्युलेटर भी शामिल हैं। ड्रोन में ऑटोमैटिक टैक्सी, टेकऑफ एंड लैंडिंग यानी एटीओएल सिस्टम होना चााहिए।
रक्षा मंत्रालय ने विक्रेताओं से ट्रांसफर ऑफ टेक्नोलॉजी यानी टीओटी की जानकारी भी मांगी है। इसमें यह स्पष्ट करना होगा कि तकनीक का कितना हिस्सा भारत में उपलब्ध कराया जा सकता है। इसके साथ ही स्पेयर पार्ट्स, मरम्मत के उपकरण, परीक्षण सुविधाओं और भारत में मेंटेनेंस, रिपेयर एंड ओवरहॉल यानी एमआरओ व्यवस्था की क्षमता भी महत्वपूर्ण होगी।
ड्रोन में इस्तेमाल होने वाले उपकरणों को भारतीय सेना, नौसेना, वायुसेना और तटरक्षक बल के अन्य आरपीए सिस्टम के साथ काम करने योग्य बनाना भी जरूरी है। इसके लिए इंटरऑपरेबिलिटी और संबंधित तकनीकी मानकों का पालन करना होगा।
साथ ही, ड्रोन को अलग-अलग तरह के हवाई क्षेत्र में ऑपरेट करने और अन्य विमानों से टकराव से बचने वाली प्रणाली की क्षमता भी प्रदर्शित करनी होगी।
यह खरीद डिफेंस एक्विजिशन प्रोसीजर यानी डीएपी 2020 के तहत आगे बढ़ेगी। आरएफआई के अनुसार, प्रक्रिया में सिंगल स्टेज-टू बिड सिस्टम अपनाने का प्रस्ताव है। (Indian Coast Guard MALE Drones)
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हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।





