📍नई दिल्ली | 11 Sep, 2026, 2:33 PM
FW-HAPS India: भारतीय वायुसेना अब तेजी से हाई एल्टीट्यूड स्यूडो सैटेलाइट्स (HAPS) पर फोकस कर रही है। एयर शिप-हैप्स के बाद वायुसेना फिक्स्ड-विंग बेस्ड हाई एल्टीट्यूड स्यूडो सैटेलाइट (FW-HAPS) पर काम कर रही है। वायुसेना ऐसे प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल सर्विलांस और कम्युनिकेशन के लिए करना चाहती है। हाल ही में रक्षा मंत्रालय ने इसके डिजाइन और डेवलपमेंट के लिए मेक-I श्रेणी में इंडस्ट्री से एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (ईओआई) जारी किया है। ये हाईटेक प्लेटफॉर्म जमीन से करीब 18 से 23 किलोमीटर की ऊंचाई पर लंबे समय तक उड़ सकते हैं।
इससे पहले 3 जुलाई को रक्षा अधिग्रहण परिषद (DAC) ने भारतीय वायुसेना के लिए FW-HAPS की खरीद को आवश्यकता की स्वीकृति (AoN) दिया था। डीएसी की तरफ से करीब 52,000 करोड़ रुपये के कई रक्षा प्रस्तावों को मंजूरी दी गई थी।
FW-HAPS India: क्या है FW-HAPS?
FW-HAPS बेहद ऊंचाई पर उड़ने वाला सोलर-पावर्ड अनमैन्ड एयरक्राफ्ट है। यह सामान्य ड्रोन से काफी ऊपर और सैटेलाइट से काफी नीचे उड़ता है। इसी वजह से इसे स्यूडो सैटेलाइट यानी छद्म उपग्रह कहा जाता है।
आमतौर पर ऐसे प्लेटफॉर्म करीब 18 से 23 किलोमीटर, यानी लगभग 60,000 से 75,000 फीट की ऊंचाई पर ऑपरेट करने के लिए डिजाइन किए जाते हैं। इतनी ऊंचाई पर उड़ने की वजह से यह एक बड़े इलाके पर लंबे समय तक नजर रख सकता है। FW-HAPS का इस्तेमाल लगातार इंटेलिजेंस, सर्विलांस एंड रिकॉनिसेंस यानी ISR, दूरसंचार और रिमोट सेंसिंग जैसे कामों के लिए किया जाएगा।
इसकी खासियत यह है कि यह सैटेलाइट की तरह अंतरिक्ष में नहीं जाता। यह एक विमान की तरह उड़ता है और जरूरत के हिसाब से इसकी जगह बदली जा सकती है। दिन के समय इसके बड़े विंग्स पर लगे सोलर पैनल बिजली पैदा करते हैं और बैटरियों को चार्ज करते हैं। रात में यही बैटरी इलेक्ट्रिक मोटर, एवियोनिक्स और मिशन पेलोड को एनर्जी देती है।
ऑपरेशन सिंदूर से मिला सबक
ऑपरेशन सिंदूर और हाल के सैन्य संघर्षों ने यह साबित किया है कि दुश्मन की गतिविधियों पर लगातार और रियल-टाइम नजर रखना कितना महत्वपूर्ण है। इसके लिए इंटेलिजेंस, निगरानी और टोही (आईएसआर) क्षमताओं का मजबूत होना जरूरी है।
फिलहाल इस्तेमाल होने वाले हाई एल्टीट्यूड ड्रोन आमतौर पर करीब 12 किलोमीटर की ऊंचाई तक उड़ते हैं और हवा में लंबे समय तक नहीं रह पाते। दूसरी ओर, सैटेलाइट बहुत महंगे होते हैं। उन्हें किसी नए क्षेत्र पर तुरंत फोकस करना आसान नहीं होता और वे हर समय एक ही इलाके की निगरानी भी नहीं कर सकते।
ऐसे में फिक्स्ड-विंग हाई एल्टीट्यूड प्सूडो सैटेलाइट (एफडब्ल्यू-एचएपीएस) इस कमी को पूरा कर सकता है। यह एक ऐसा प्लेटफॉर्म है जो बहुत अधिक ऊंचाई पर लंबे समय तक उड़ते हुए लगातार निगरानी कर सकता है।
ड्रोन और सैटेलाइट के बीच की कड़ी
FW-HAPS को समझने के लिए इसे ड्रोन और सैटेलाइट के बीच की कड़ी माना जा सकता है। सामान्य निगरानी ड्रोन अपेक्षाकृत कम ऊंचाई पर उड़ते हैं और उनका एंड्योरेंस सीमित होता है। दूसरी तरफ सैटेलाइट बहुत ज्यादा ऊंचाई पर मौजूद होते हैं और उन्हें किसी खास इलाके पर लगातार निगरानी के लिए तुरंत रीपोजीशन करना आसान नहीं होता।
FW-HAPS इन दोनों के बीच एक अलग क्षमता देता है। यह एक ही इलाके के ऊपर लंबे समय तक रह सकता है और जरूरत के अनुसार अपना मिशन बदला जा सकता है।
भारतीय वायुसेना इसके जरिए सीमा पर दुश्मन सैनिकों की गतिविधि, सैन्य वाहनों की आवाजाही, एयरबेस, समुद्री क्षेत्र और दूसरे महत्वपूर्ण इलाकों पर लगातार नजर रख सकती है। (FW-HAPS India)
इतनी ऊंचाई पर उड़ने का फायदा
18 से 23 किलोमीटर की ऊंचाई पर उड़ने से FW-HAPS को जमीन के मुकाबले काफी बड़ा विजुअल एरिया मिलता है। इसमें लगे सेंसर दूर तक निगरानी कर सकते हैं।
इस प्लेटफॉर्म में इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल और इंफ्रारेड कैमरे, सिंथेटिक अपर्चर रडार, इलेक्ट्रॉनिक इंटेलिजेंस (ईएलआईएनटी), कम्युनिकेशन इंटेलिजेंस (कॉमिंट) सिस्टम और कम्युनिकेशन रिले उपकरण लगाए जा सकते हैं।
इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल कैमरा दिन में तस्वीरें लेने के लिए उपयोगी होता है, जबकि इंफ्रारेड सेंसर रात में और गर्मी के अंतर के आधार पर टारगेट की पहचान में मदद करता है। SAR रडार आधारित इमेजिंग करता है और खराब मौसम या कम रोशनी में भी निगरानी की क्षमता देता है।
कम्युनिकेशन रिले के तौर पर FW-HAPS अलग-अलग सैन्य यूनिट्स के बीच डेटा लिंक बनाए रखने में भी मदद कर सकता है। (FW-HAPS India)
सोलर पावर से चलेगा पूरा सिस्टम
FW-HAPS की सबसे मुश्किल टेक्नोलॉजी इसका एनर्जी सिस्टम है। प्लेटफॉर्म को कई दिनों या हफ्तों तक हवा में रखना है, लेकिन इसके लिए लगातार ईंधन भरना संभव नहीं है। इसलिए इसके विंग पर बड़े सोलर पैनल लगाए जाते हैं। दिन में सूर्य की रोशनी से बिजली बनती है। इसी बिजली से मोटर और दूसरे सिस्टम चलते हैं और अतिरिक्त ऊर्जा बैटरी में जमा होती है।
रात के समय सोलर पैनल बिजली नहीं बनाते, इसलिए बैटरी सिस्टम को ऊर्जा देता है। इसका मतलब है कि सोलर सेल, बैटरी, इलेक्ट्रिक मोटर और फ्लाइट कंट्रोल सिस्टम को बेहद कम वजन और कम ऊर्जा खपत के साथ डिजाइन करना पड़ता है। (FW-HAPS India)
स्ट्रेटोस्फियर में उड़ना आसान नहीं
FW-HAPS की असली तकनीकी चुनौती इसकी ऊंचाई है। स्ट्रेटोस्फियर में हवा काफी पतली होती है। कम हवा में विमान को पर्याप्त लिफ्ट देने के लिए इसका विंग बहुत बड़ा लेकिन बेहद हल्का रखना पड़ता है।
इसके साथ ही प्लेटफॉर्म को तेज हवाओं, कम तापमान और लंबे समय तक लगातार उड़ान की स्थिति झेलनी होती है। वजन बढ़ने पर ज्यादा एनर्जी चाहिए और एनर्जी की जरूरत बढ़ने पर सोलर पैनल और बैटरी का आकार बढ़ता है। इससे फिर विमान का वजन बढ़ जाता है।
यही वजह है कि HAPS के डिजाइन में लाइटवेट कंपोजिट मटेरियल, हाई एफिशिएंसी इलेक्ट्रिक मोटर, एडवांस्ड बैटरी और ऑटोनॉमस फ्लाइट कंट्रोल बेहद महत्वपूर्ण तकनीकें हैं। (FW-HAPS India)
AS-HAPS से कैसे अलग है FW-HAPS?
भारत न सिर्फ फिक्स्ड-विंग HAPS बल्कि एयरशिप बेस्ड AS-HAPS पर भी अलग कार्यक्रम चल रहा है। फरवरी 2026 में डीएसी ने एयरशिप बेस्ड HAPS कार्यक्रम को मंजूरी दी थी।
लेकिन दोनों की बनावट और इस्तेमाल अलग है। एयरशिप बेस्ड हैप्स हल्के-से-हवा वाले एयरशिप की तरह होता है और लंबे समय तक किसी इलाके के ऊपर लगभग स्थिर रह सकता है। इसके विपरीत फिकस्ड विंग-हैप्स विमान जैसा होता है। यह रनवे से उड़ान भर सकता है और जरूरत के अनुसार दूसरे क्षेत्र में जा सकता है।
जहां एक सिस्टम को लंबे समय तक एक जगह निगरानी के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है, जबकि फिक्स्ड-विंग प्लेटफॉर्म ज्यादा गतिशील निगरानी के लिए उपयोगी है। (FW-HAPS India)
भारत में पहले से चल रही है रिसर्च
भारत में HAPS तकनीक पर पहले से काम चल रहा है। बेंगलुरु स्थित सीएसआईआर-नेशनल एयरोस्पेस लेबोरेटरीज (NAL) एक ऐसे बड़े सोलर पावर्ड फिक्स्ड-विंग एयरक्राफ्ट का विकास कर रही है, जो बहुत अधिक ऊंचाई पर लंबे समय तक उड़ सके।
इसका छोटा प्रोटोटाइप पहले ही 25,000 फीट की ऊंचाई पर 10-11 घंटे तक सफल उड़ान भर चुका है। अब फुल-स्केल मॉडल तैयार किया जा रहा है, जिसका विंगस्पैन लगभग 24 से 30 मीटर, टेकऑफ वजन 150 से 450 किलोग्राम और पेलोड क्षमता 10 से 35 किलोग्राम तक हो सकती है।
इस प्रोजेक्ट के तहत ऐसा विमान बनाना है जो करीब 20 किलोमीटर (65,000 फीट) की ऊंचाई पर सोलर ऊर्जा के सहारे कई हफ्तों तक लगातार उड़ान भर सके। इसके फ्लाइट टेस्ट 2026-27 के दौरान शुरू होने की उम्मीद है।
इसी क्षेत्र में बेंगलुरु की न्यूस्पेस रिसर्च एंड टेक्नोलॉजीज भी काम कर रही है। कंपनी ने आईडीईएक्स (iDEX) कार्यक्रम के तहत कई प्रोजेक्ट विकसित किए हैं और भारतीय नौसेना ने भी इस तकनीक में रुचि दिखाई है।
वहीं, वेदा एयरोनॉटिक्स संयुक्त अरब अमीरात की मीरा एयरोस्पेस के साथ मिलकर हाई एल्टीट्यूड प्लेटफॉर्म विकसित कर रही है।
दूसरी तरफ, डीआरडीओ की एडीआरडीई (ADRDE) प्रयोगशाला ने मई 2025 में मध्य प्रदेश में एयरशिप प्रोटोटाइप को लगभग 17 किलोमीटर की ऊंचाई तक सफलतापूर्वक उड़ाया था। (FW-HAPS India)
मेक-I मॉडल में सरकार देगी डेवलपमेंट सपोर्ट
FW-HAPS को मेक-I कैटेगरी में रखा गया है। इस मॉडल में सरकार प्रोटोटाइप विकसित करने की लागत का 70 प्रतिशत तक खर्च उठाती है। सरकार स्वदेशी प्रोटोटाइप के डिजाइन और डेवलपमेंट में वित्तीय मदद देती है। सफल डेवलपमेंट के बाद इसकी खरीद बाय इंडियन-आईडीडीएम (इंडिजिनसली डिजाइन्ड, डेवलप्ड एंड मैन्युफैक्चर्ड) श्रेणी के तहत की जाएगी, जिसमें स्वदेशी सामग्री का न्यूनतम स्तर जरूरी होगा। (FW-HAPS India)
Author
हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।





