📍नई दिल्ली | 11 Sep, 2026, 11:12 AM
BRICS Summit 2026: भारत 12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली में होने वाले 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी करने जा रहा है। यह सम्मेलन ऐसे समय में हो रहा है जब ब्रिक्स अपनी स्थापना के 20 साल पूरे कर रहा है। साल 2006 में शुरू हुआ यह मंच अब केवल आर्थिक सहयोग का समूह नहीं रह गया है, बल्कि वैश्विक राजनीति, व्यापार, वित्त और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था पर चर्चा करने वाला एक महत्वपूर्ण मंच बन चुका है।
ब्राजील, रूस, भारत और चीन से शुरू हुआ यह समूह आज 11 सदस्य देशों तक पहुंच चुका है। हाल के सालों में मिस्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और इंडोनेशिया जैसे देशों के शामिल होने से इसकी वैश्विक मौजूदगी और बढ़ी है। ऐसे में यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या ब्रिक्स अपने मूल उद्देश्यों पर कायम है या फिर बदलती भू-राजनीतिक परिस्थितियों ने इसके सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं।
BRICS Summit 2026: भारत कर रहा चौथी बार ब्रिक्स की मेजबानी
इस बार समिट का आयोजन भारत मंडपम में किया जा रहा है। भारत ने 1 जनवरी 2026 को ब्राजील से ब्रिक्स की अध्यक्षता संभाली थी। यह चौथी बार है जब भारत इस संगठन की चेयरशिप कर रहा है। इससे पहले 2012, 2016 और 2021 में भी भारत यह जिम्मेदारी निभा चुका है।
समिट की थीम “बिल्डिंग फॉर रेजिलिएंस, इनोवेशन, कोऑपरेशन एंड सस्टेनेबिलिटी” रखी गई है। इसका मकसद बदलती वैश्विक परिस्थितियों के बीच सहयोग, आर्थिक विकास और बहुपक्षीय व्यवस्था को मजबूत करना है।
जी-7 को पीछे छोड़ चुका है ब्रिक्स
बीते दो दशकों में वैश्विक अर्थव्यवस्था में ब्रिक्स देशों की हिस्सेदारी तेजी से बढ़ी है। साल 2000 में ब्राजील, रूस, भारत और चीन की संयुक्त हिस्सेदारी वैश्विक जीडीपी (परचेजिंग पावर पैरिटी) का लगभग 23 फीसदी थी। उसी समय जी-7 देशों की हिस्सेदारी करीब 52 फीसदी थी।
लेकिन 2024 तक तस्वीर बदल गई। 11 सदस्यीय विस्तारित ब्रिक्स समूह वैश्विक जीडीपी का लगभग 36.8 प्रतिशत की हिस्सेदारी रखने लगा, जबकि जी-7 की हिस्सेदारी 29 प्रतिशत से नीचे आ गई। यह बदलाव दुनिया की आर्थिक ताकत के केंद्र में आए परिवर्तन को दर्शाता है।
हालांकि प्रति व्यक्ति आय के मामले में अभी भी बड़ा अंतर बना हुआ है। जी-7 देशों में औसत प्रति व्यक्ति जीडीपी लगभग 53 हजार डॉलर है, जबकि ब्रिक्स देशों में यह करीब 8,200 डॉलर के आसपास है। इसका मतलब है कि ब्रिक्स की ताकत मुख्य रूप से उसकी विशाल आबादी, प्राकृतिक संसाधनों और बड़े बाजारों से आती है। (BRICS Summit 2026)
BRICS diplomacy intensifies in Delhi: Russian President Vladimir Putin arrives at 1:15 am Friday, followed by Iranian President Masoud Pezeshkian at 2 pm. #ChinesePresident #XiJinping lands at 12:30 pm Saturday and is set to hold a bilateral meeting with PM Modi in the evening.…
— Raksha Samachar | रक्षा समाचार 🇮🇳 (@RakshaSamachar) September 10, 2026
कैसे शुरू हुआ था ब्रिक्स?
ब्रिक्स की शुरुआत साल 2006 में ब्रिक (BRIC) के तौर पर हुई थी। उस समय ब्राजील, रूस, भारत और चीन को भविष्य की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं के रूप में देखा जा रहा था। बाद में 2009 में रूस के येकातेरिनबर्ग शहर में पहला ब्रिक शिखर सम्मेलन आयोजित हुआ।
साल 2010 में दक्षिण अफ्रीका शामिल हुआ और समूह का नाम ब्रिक्स हो गया। इसके बाद 2024 में मिस्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब और यूएई को सदस्य बनाया गया। जनवरी 2025 में इंडोनेशिया भी पूर्ण सदस्य बन गया।
आज यह समूह दुनिया की बड़ी उभरती अर्थव्यवस्थाओं का प्रतिनिधित्व करता है और खुद को ग्लोबल साउथ यानी विकासशील देशों की आवाज के रूप में प्रस्तुत करता है। (BRICS Summit 2026)
वैश्विक संस्थानों में सुधार की मांग अब भी कायम
ब्रिक्स की स्थापना के समय से ही इसकी एक प्रमुख मांग रही है कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में सुधार किया जाए। संयुक्त राष्ट्र, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) और विश्व बैंक जैसी संस्थाओं में आज भी पश्चिमी देशों का प्रभाव अधिक माना जाता है।
ब्रिक्स देशों का तर्क है कि दुनिया की आर्थिक और राजनीतिक शक्ति में जो बदलाव आया है, उसका प्रतिबिंब इन संस्थाओं में दिखाई नहीं देता। इसी वजह से समूह लंबे समय से अधिक प्रतिनिधित्व, वित्तीय सुधार और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की मांग करता रहा है। (BRICS Summit 2026)
भारत की रणनीति: सभी मंचों पर सक्रिय भूमिका
भारत का ब्रिक्स में शामिल होना उसकी व्यापक रणनीतिक नीति का हिस्सा माना जाता है। नई दिल्ली एक साथ ब्रिक्स, जी-20, क्वाड और शंघाई सहयोग संगठन जैसे मंचों में सक्रिय है।
भारत किसी सैन्य गठबंधन का हिस्सा बने बिना अलग-अलग मंचों पर अपने हितों को आगे बढ़ाने की नीति अपनाता है। इसी कारण भारत ब्रिक्स में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है।
साल 2012 में नई दिल्ली में हुए ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान भारत ने एक विकास बैंक बनाने का प्रस्ताव रखा था। बाद में यही प्रस्ताव न्यू डेवलपमेंट बैंक (एनडीबी) के रूप में सामने आया। (BRICS Summit 2026)
न्यू डेवलपमेंट बैंक की बढ़ती भूमिका
ब्रिक्स देशों द्वारा स्थापित न्यू डेवलपमेंट बैंक आज समूह की सबसे बड़ी संस्थागत उपलब्धियों में गिना जाता है।
2026 के मध्य तक बैंक लगभग 141 परियोजनाओं को मंजूरी दे चुका था, जिनकी कुल कीमत करीब 44 अरब डॉलर बताई गई है। इन परियोजनाओं का संबंध बुनियादी ढांचे, ऊर्जा, परिवहन और सतत विकास से जुड़ा है।
भारत इस बैंक को विकासशील देशों के लिए वित्तीय सहयोग का एक महत्वपूर्ण माध्यम मानता है। (BRICS Summit 2026)
लेकिन ब्रिक्स के भीतर बढ़ रहे मतभेद
ब्रिक्स की बढ़ती ताकत के साथ-साथ इसके भीतर मतभेद भी सामने आने लगे हैं। सबसे बड़ा अंतर इस बात को लेकर है कि समूह का मूल उद्देश्य क्या होना चाहिए।
चीन और रूस ब्रिक्स को पश्चिमी प्रभाव और अमेरिकी नेतृत्व वाली व्यवस्था के विकल्प के रूप में देखते हैं। दोनों देश इसे वैश्विक शक्ति संतुलन बदलने का मंच मानते हैं।
चीन का मानना है कि ब्रिक्स के विस्तार से “ग्लोबल साउथ” यानी विकासशील देशों की आवाज मजबूत होगी। वहीं रूस, पश्चिमी प्रतिबंधों और स्विफ्ट भुगतान प्रणाली से बाहर किए जाने के बाद ब्रिक्स को आर्थिक सहयोग और व्यापार के लिए महत्वपूर्ण मंच मानता है।
दूसरी ओर भारत और ब्राजील का दृष्टिकोण अलग है। भारत और ब्राजील ब्रिक्स को मुख्य रूप से आर्थिक विकास, व्यापार, निवेश और वैश्विक आर्थिक सुधार से जुड़ा मंच मानते हैं। वे इसे किसी राजनीतिक या रणनीतिक गठबंधन के रूप में नहीं देखते।
यह अंतर कई मौकों पर खुलकर सामने आया है। उदाहरण के तौर पर रूस ने 2023 में भारत से तेल भुगतान युआन में करने का सुझाव दिया था, लेकिन भारत ने डॉलर और रुपये में भुगतान को प्राथमिकता दी।
विशेषज्ञों के अनुसार भारत “मल्टी-अलाइनमेंट” की नीति अपनाता है। इसका मतलब है कि भारत एक साथ कई अंतरराष्ट्रीय समूहों का सदस्य बना रहता है और किसी एक खेमे में नहीं जाता। यही कारण है कि भारत ब्रिक्स, जी-20, क्वाड और शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गनाइजेशन (एससीओ) जैसे अलग-अलग मंचों में सक्रिय है, लेकिन किसी सैन्य गठबंधन का हिस्सा नहीं है। (BRICS Summit 2026)
ईरान और यूएई ने बढ़ाई नई चुनौती
ब्रिक्स के विस्तार के बाद समूह के भीतर भू-राजनीतिक चुनौतियां भी बढ़ी हैं। इसका उदाहरण मई 2026 में नई दिल्ली में हुई ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक में देखने को मिला।
बैठक के दौरान सदस्य देश संयुक्त घोषणा पत्र पर सहमत नहीं हो सके। इसकी मुख्य वजह ईरान और संयुक्त अरब अमीरात के बीच मतभेद थे। दोनों देश एक ही समूह के सदस्य हैं, लेकिन पश्चिम एशिया के कई मुद्दों पर उनके दृष्टिकोण अलग हैं।
भारत को मेजबान देश के रूप में चेयर स्टेटमेंट जारी करना पड़ा, जिसमें कहा गया कि कुछ सदस्य देशों के बीच पश्चिम एशिया की स्थिति को लेकर अलग-अलग विचार हैं।
इस घटना ने दिखाया कि सदस्य देशों की संख्या बढ़ने के साथ सर्वसम्मति बनाना पहले की तुलना में अधिक मुश्किल हो गया है। (BRICS Summit 2026)
डॉलर से दूरी बनाने की कोशिश
ब्रिक्स देशों के बीच डॉलर पर निर्भरता कम करने को लेकर लंबे समय से चर्चा होती रही है। हालांकि एक साझा ब्रिक्स मुद्रा बनाने का विचार फिलहाल आगे नहीं बढ़ पाया है। इसकी वजह है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चेतावनी दी थी कि डॉलर की जगह नई मुद्रा लाने पर 100 प्रतिशत टैरिफ लग सकते हैं।
इसके बजाय सदस्य देश अपने-अपने राष्ट्रीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने पर ध्यान दे रहे हैं।
रूस और चीन अब अपने 90 प्रतिशत से अधिक द्विपक्षीय व्यापार का निपटान रूबल और युआन में कर रहे हैं। भारत और रूस के बीच भी बड़ी मात्रा में भुगतान राष्ट्रीय मुद्राओं में होने लगा है।
भारत और यूएई के बीच जुलाई 2023 से रुपया-दिरहम भुगतान प्रणाली लागू है। वहीं भारत और इंडोनेशिया ने जुलाई 2026 में रुपया-रुपिया भुगतान व्यवस्था शुरू की। (BRICS Summit 2026)
ब्रिक्स पे सिस्टम पर फोकस
2026 के शिखर सम्मेलन में ब्रिक्स पे सिस्टम भी चर्चा का प्रमुख विषय है। इस प्रणाली का उद्देश्य सदस्य देशों के भुगतान नेटवर्क को आपस में जोड़ना है।
इसमें रूस का एसपीएफएस, चीन का सीआईपीएस, भारत का यूपीआई और ब्राजील का पिक्स नेटवर्क शामिल किए जाने की योजना है। इससे सदस्य देशों के बीच व्यापारिक भुगतान डॉलर आधारित बैंकिंग चैनलों पर निर्भर हुए बिना किए जा सकेंगे।
भारत इस दिशा में इंटरऑपरेबल सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी और डिजिटल भुगतान सहयोग को अधिक व्यावहारिक विकल्प मानता है। (BRICS Summit 2026)
नई दिल्ली शिखर सम्मेलन पर दुनिया की नजर
नई दिल्ली में होने वाला 18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन ऐसे समय में हो रहा है जब पश्चिम एशिया, रूस-यूक्रेन संघर्ष और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता जैसे कई मुद्दे दुनिया के सामने हैं।
सम्मेलन में सप्लाई चेन को मजबूत बनाने, वैश्विक वित्तीय संस्थाओं में सुधार, न्यू डेवलपमेंट बैंक की भूमिका बढ़ाने और सदस्य देशों के बीच व्यापार विस्तार जैसे विषयों पर चर्चा होने की उम्मीद है।
भारत का ध्यान डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, जलवायु वित्त, स्वास्थ्य सहयोग, महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति, स्थानीय मुद्रा भुगतान और कनेक्टिविटी जैसे व्यावहारिक क्षेत्रों पर केंद्रित है। (BRICS Summit 2026)
Author
हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।





