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Explained: क्या है ब्रह्मोस फायर कंट्रोल सिस्टम? भारतीय नौसेना के वीर और रणवीर क्लास युद्धपोतों को कैसे बनाएगा ‘किलर स्क्वाड्रन’

ब्रह्मोस फायर कंट्रोल सिस्टम युद्धपोत पर लगा वह डिजिटल कमांड और कंट्रोल सिस्टम है जो टारगेट की पहचान, ट्रैकिंग, डेटा प्रोसेसिंग और मिसाइल लॉन्चिंग की पूरी प्रक्रिया को नियंत्रित करता है...

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📍नई दिल्ली | 6 Oct, 2026, 6:01 PM

BrahMos Fire Control System: भारतीय नौसेना की लंबी दूरी की स्ट्राइक क्षमता को मजबूत करने के लिए रक्षा मंत्रालय ने मंगलवार को एक महत्वपूर्ण समझौते पर दस्तखत हुए। रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह की मौजूदगी में रक्षा मंत्रालय और ब्रह्मोस एयरोस्पेस प्राइवेट लिमिटेड (बीएपीएल) के बीच 661.50 करोड़ रुपये के इस समझौते के तहत भारतीय नौसेना के वीर और रणवीर क्लास के युद्धपोतों के लिए ब्रह्मोस फायर कंट्रोल सिस्टम और लॉन्चर खरीदे जाएंगे।

बता दें कि ब्रह्मोस भारत की सबसे ताकतवर सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों में से एक है, जो समुद्र और जमीन दोनों पर मौजूद टारगेट्स को लंबी दूरी से निशाना बना सकती है।

क्या करता है BrahMos Fire Control System?

इस सौदे के तहत वह सिस्टम खरीदे जाएंगे, जिनकी मदद से युद्धपोत पर टारगेट को निशाना बनाकर ब्रह्मोस मिसाइल को दागा जाता है। इसमें दो प्रमुख हिस्से शामिल हैं। पहला फायर कंट्रोल सिस्टम और दूसरा लॉन्चर।

मिसाइल खुद में हथियार होती है। वहीं, लॉन्चर वह प्लेटफॉर्म होता है जिसमें मिसाइल रखी जाती है और वहीं से उसे छोड़ा जाता है। जबकि फायर कंट्रोल सिस्टम डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम है जो तय करता है कि किस टारगेट पर, कब और किस तरीके से हमला किया जाएगा।

आधुनिक युद्धपोतों पर फायर कंट्रोल सिस्टम जहाज के कॉम्बैट मैनेजमेंट सिस्टम से जुड़ा होता है। यह अलग-अलग सेंसरों से जानकारी प्राप्त करता है।

जहाज का सरफेस सर्च रडार, इलेक्ट्रॉनिक सपोर्ट सिस्टम, डेटा लिंक नेटवर्क, नौसैनिक हेलीकॉप्टर और समुद्री गश्ती विमान लगातार टारगेट संबंधी जानकारी भेजते हैं। यह सारी जानकारी फायर कंट्रोल सिस्टम में पहुंचती है।

इसके बाद सिस्टम टारगेट की दूरी, दिशा, रफ्तार, समुद्री परिस्थितियां और खतरे के स्तर का एनालिसिस करता है। अगर टारगेट समुद्र में मौजूद दुश्मन का युद्धपोत है तो सिस्टम उसके मूवमेंट को ट्रैक करता है। अगर टारगेट जमीन पर है तो उसके कॉर्डिनेट्स और फ्लाइट पाथ तय किए जाते हैं।

इसके बाद फायर कंट्रोल सिस्टम ब्रह्मोस मिसाइल को मिशन डेटा भेजता है। इसमें वेपॉइंट, फ्लाइट प्रोफाइल, टर्मिनल अटैक मोड और टारगेट से संबंधित अन्य जानकारियां शामिल होती हैं।

लॉन्च से पहले यही सिस्टम सुरक्षा जांच पूरी करता है और फिर लॉन्चर को मिसाइल दागने की अनुमति देता है।

BrahMos Fire Control System
MoD signs Rs 661.50 crore contract with BrahMos Aerospace Pvt Ltd for BrahMos Fire Control Systems & Launchers for
Indian Navy
ships under Buy (Indian-IDDM). With 68%+ indigenous content. (Photo: MoD)

सुपरसोनिक मिसाइल के लिए सटीक गणना क्यों है जरूरी?

ब्रह्मोस दुनिया की सबसे तेज ऑपरेशनल सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों में गिनी जाती है। इसकी रफ्तार ध्वनि की रफ्तार से लगभग तीन गुना तक पहुंच सकती है।

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इतनी तेज रफ्तार पर टारगेट तक पहुंचने में बहुत कम समय लगता है। इसी वजह से लॉन्च से पहले सभी गणनाएं बेहद सटीक होनी चाहिए।

अगर टारगेट की स्थिति, दिशा या रफ्तार का अनुमान गलत हो जाए, तो मिसाइल का निशाना चूक सकता है। इसलिए फायर कंट्रोल सिस्टम आधुनिक नौसैनिक युद्ध में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। (BrahMos Fire Control System)

आधुनिक युद्ध में सेंसर और शूटर अलग

आज का समुद्री युद्ध केवल उस जहाज तक सीमित नहीं है जो मिसाइल दाग रहा है। कई बार टारगेट को कोई दूसरा प्लेटफॉर्म देखता है और हमला कोई दूसरा प्लेटफॉर्म करता है। उदाहरण के लिए किसी नौसैनिक हेलीकॉप्टर, समुद्री गश्ती विमान या दूसरे युद्धपोत ने दुश्मन का जहाज खोजा हो।

उस स्थिति में टारगेट की जानकारी डेटा लिंक के जरिए ब्रह्मोस से लैस युद्धपोत तक पहुंचाई जाती है। फायर कंट्रोल सिस्टम इस बाहरी डेटा को स्वीकार करता है और उसी के आधार पर मिसाइल दागी जाती है।

यही नेटवर्क बेस्ड कॉम्बैट सिस्टम आधुनिक नौसेनाओं की सबसे बड़ी ताकत मानी जाती है। (BrahMos Fire Control System)

क्या होती है ब्रह्मोस लॉन्चर की भूमिका?

लॉन्चर में ब्रह्मोस मिसाइल रखी जाती है। युद्धपोत लगातार समुद्री लहरों, नमक, नमी और कंपन का सामना करते हैं। ऐसे माहौल में लॉन्चर को मिसाइल को सुरक्षित रखना होता है।

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लॉन्च के समय यही सिस्टम मिसाइल को सही दिशा में छोड़ती है और यह सुनिश्चित करती है कि जहाज तथा उसके उपकरणों को कोई नुकसान न पहुंचे।

भारतीय नौसेना के कई युद्धपोतों पर ब्रह्मोस के झुके हुए कैनिस्तर लॉन्चर लगाए गए हैं। इनमें मिसाइल लंबे समय तक सुरक्षित रखी जा सकती है। (BrahMos Fire Control System)

वीर क्लास के जहाजों को क्यों मिल रहा है ब्रह्मोस?

वीर क्लास के जहाज सोवियत संघ के तारांतुल क्लास मिसाइल कोरवेट पर बेस्ड हैं, जो छोटे लेकिन तेज युद्धपोत हैं। इनका वजन लगभग 455 टन है और ये भारतीय नौसेना की प्रसिद्ध 22वीं मिसाइल वेसल स्क्वाड्रन, जिसे “किलर स्क्वाड्रन” भी कहा जाता है, का हिस्सा हैं।

इन जहाजों पर सोवियत पी-15 टर्मिट मिसाइल लगी थीं, जिसे नाटो में एसएस-एन-2 स्टिक्स कहा जाता है। इस मिसाइल की मारक दूरी लगभग 40 से 80 किलोमीटर थी और यह सबसोनिक रफ्तार से उड़ती थी। आधुनिक नौसैनिक युद्ध में यह मिसाइल अब काफी पुरानी मानी जाती है और एडवांस डिफेंस सिस्टम्स के आगे बेकार हैं।

यही कारण है कि नौसेना इन छोटे जहाजों को ब्रह्मोस से लैस कर रही है। इससे जहाज का आकार बदले बिना उसकी मारक क्षमता कई गुना बढ़ जाएगी। आईएनएस विद्युत (K48) पर पहले ही दो ट्विन लॉन्चर, यानी चार ब्रह्मोस मिसाइलें लगाई जा चुकी हैं।

चार सुपरसोनिक ब्रह्मोस मिसाइलों से लैस होने के बाद ये छोटे युद्धपोत समुद्री और तटीय दोनों प्रकार के टारगेट्स पर लंबी दूरी से हमला कर सकेंगे। इससे तटीय क्षेत्रों और संकरी समुद्री पट्टियों में इनकी भूमिका काफी बढ़ जाएगी। (BrahMos Fire Control System)

रणवीर क्लास के युद्धपोतों का अपग्रेड

रणवीर क्लास के जहाज वास्तव में भारतीय नौसेना के राजपूत क्लास गाइडेड मिसाइल डिस्ट्रॉयर हैं, जो सोवियत काशिन डिजाइन पर आधारित हैं। इनका वजन लगभग 5,000 टन है।

राजपूत और रंजीत पहले ही सेवा से बाहर हो चुके हैं, जबकि राणा, रणवीर और रणविजय लंबे समय तक सेवा में रहे हैं। इनमें से आईएनएस रणवीर और आईएनएस रणविजय पर पहले से 8-सेल ब्रह्मोस लॉन्चर लगाए जा चुके हैं। दिसंबर 2008 में आईएनएस रणवीर से ब्रह्मोस का शुरुआती समुद्री परीक्षण भी किया गया था।

अब दो रणवीर क्लास के जहाजों के लिए नए फायर कंट्रोल सिस्टम और लॉन्चर की खरीद का उद्देश्य मौजूदा सिस्टम को अपग्रेड करना है।

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इन जहाजों पर पहले सोवियत पी-20 एंटी-शिप मिसाइल लॉन्चर और अन्य पुराने हथियार लगे थे। ब्रह्मोस के आने से ये पुराने युद्धपोत भी आधुनिक सुपरसोनिक स्ट्राइक प्लेटफॉर्म में बदल जाएंगे। बड़े साइज के कारण इन जहाजों पर वीर क्लास की तुलना में अधिक मिसाइलें तैनात की जा सकती हैं और एक साथ बड़ी संख्या में मिसाइलें दागी जा सकती हैं। (BrahMos Fire Control System)

नौसेना के लिए ब्रह्मोस क्यों बन रही है स्टैंडर्ड मिसाइल?

भारतीय नौसेना अब ब्रह्मोस को अपनी मुख्य सरफेस-टू-सरफेस स्ट्राइक मिसाइल बना रही है। नए फ्रिगेट और डिस्ट्रॉयर में यह पहले से स्टैंडर्ड हथियार के रूप में शामिल है। अब पुराने जहाजों को भी चरणबद्ध तरीके से इसी मिसाइल परिवार से लैस किया जा रहा है।

इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि पूरे बेड़े में एक समान मिसाइल सिस्टम होने से प्रशिक्षण, रखरखाव, लॉजिस्टिक्स और गोला-बारूद प्रबंधन आसान हो जाता है।

पुरानी स्टिक्स और पी-20 मिसाइलों की जगह अब लगभग मैक 2.8 से 3 गति वाली ब्रह्मोस मिसाइलें ले रही हैं। ये समुद्र की सतह के बेहद करीब उड़ान भर सकती हैं और अंतिम चरण में दिशा बदल सकती हैं, जिससे इन्हें रोकना कठिन हो जाता है।

ब्रह्मोस केवल दुश्मन जहाजों के खिलाफ ही नहीं, बल्कि जमीन पर मौजूद टारगेट्स पर भी हमला कर सकती है। वहीं, भारत के एमटीसीआर में शामिल होने के बाद इसकी रेंज पर लगी पुरानी सीमाएं भी हट गईं हैं और अब लंबी दूरी वाले वर्जन का परीक्षण भी हो चुका है। (BrahMos Fire Control System)

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  • herry passport

    हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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