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Explained: भारत की तीनों सेनाओं के लिए अलग-अलग कम्युनिकेशन सैटेलाइट क्यों? चीन के इंटीग्रेटेड मिलिट्री स्पेस नेटवर्क नेटवर्क से कितनी अलग है रणनीति

मिलिट्री कम्युनिकेशन सैटेलाइट का मुख्य काम सेना की अलग-अलग यूनिट्स के बीच आवाज, डेटा और वीडियो का सुरक्षित आदान-प्रदान कराना है। सामान्य मोबाइल नेटवर्क की तरह मिलिट्री कम्युनिकेशन सिस्टम हर जगह जमीन पर मौजूद टावरों पर निर्भर नहीं रह सकता...

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📍नई दिल्ली | 24 Oct, 2026, 12:26 PM

India military communication satellites: मॉडर्न वॉरफेयर में लड़ाकू विमान, युद्धपोत, पनडुब्बियां और जमीन पर तैनात सैनिकों का कमांड सेंटर से कनेक्ट रहना बेहद जरूरी है, जिसके लिए सुरक्षित और तेज कम्युनिकेशन चाहिए। जो मिलिट्री कम्युनिकेशन सैटेलाइट के बिना संभव नहीं है। इसी जरूरत को ध्यान में रखते हुए भारत तीनों सेनाओं के लिए अलग-अलग डेडिकेटेड मिलिट्री कम्युनिकेशन सैटेलाइट डेवलप कर रहा है। नौसेना के पास जीसैट-7आर है, वायुसेना पहले से जीसैट-7ए का इस्तेमाल कर रही है। वहीं, थलसेना के लिए जीसैट-7बी प्रोजेक्ट पर काम चल रहा है।

हाल ही में 15 अक्टूबर को रक्षा मंत्रालय ने वायुसेना के लिए दूसरे नए कम्युनिकेशन सैटेलाइट जीसैट-7सी को लेकर 2,563 करोड़ रुपये का समझौता किया है। यह सैटेलाइट वायुसेना के विमानों, रडार नेटवर्क और कमांड सेंटर के बीच सिक्योर कम्युनिकेशन को मजबूत करने के लिए तैयार किया जाएगा। इसके शुरू होने के बाद वायुसेना की कम्युनिकेशन व्यवस्था को अतिरिक्त क्षमता मिलेगी।

दूसरी तरफ, चीन ने अपनी मिलिट्री स्पेस कैपेबिलिटीज के मैनेजमेंट और ऑपरेशन को अधिक इंटीग्रेट बनाने की दिशा में काम किया है। ऐसे में सवाल उठता है कि भारत ने तीनों सेनाओं के लिए अलग-अलग सैटेलाइट का रास्ता क्यों चुना और इस सिस्टम से उसे क्या फायदा मिल सकता है?

India military communication satellites: मिलिट्री कम्युनिकेशन सैटेलाइट की जरूरत क्यों?

मिलिट्री कम्युनिकेशन सैटेलाइट का मुख्य काम सेना की अलग-अलग यूनिट्स के बीच आवाज, डेटा और वीडियो का सुरक्षित आदान-प्रदान कराना है। सामान्य मोबाइल नेटवर्क की तरह मिलिट्री कम्युनिकेशन सिस्टम हर जगह जमीन पर मौजूद टावरों पर निर्भर नहीं रह सकता। समुद्र के बीच तैनात युद्धपोत, दूरदराज के पहाड़ों में मौजूद सैनिक और हवा में उड़ते फाइटर जेट कई बार सामान्य कम्युनिकेशन नेटवर्क की पहुंच से बाहर होते हैं।

ऐसे हालात में सैटेलाइट एक कड़ी का काम करता है। उसके जरिए दूर स्थित मिलिट्री यूनिट्स आपस में संपर्क बनाए रख सकती हैं। इससे कमांडर को ऑपरेशन की जानकारी पहुंचाने, निर्देश देने और अलग-अलग प्लेटफॉर्म के बीच कॉर्डिनेशन बनाने में मदद मिलती है।

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मिसाल के तौर पर, समुद्र में मौजूद युद्धपोत को अपने मुख्यालय से संपर्क करना हो या किसी ऑपरेशन में शामिल विमान को जमीन पर मौजूद कमांड सेंटर से सूचना लेनी हो, तो सैटेलाइट कम्युनिकेशन ही सुरक्षित माध्यम है। हालांकि, कम्युनिकेशन सैटेलाइट का काम दुश्मन का पता लगाना या हमला करना नहीं है। इसका मुख्य उद्देश्य इनफॉरमेशन को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाना है। वहीं सैटेलाइट के सॉफ्टवेयर डिफाइंड रेडियो (एसडीआर) से लैस होने का फायदा यह है कि इसमें रेडियो की कई क्षमताओं को हार्डवेयर के बजाय सॉफ्टवेयर के माध्यम से बदला या अपडेट किया जा सकता है। इससे अलग-अलग मिलिट्री युनिट्स के बीच कम्युनिकेशन और डेटा शेयर करना अधिक आसान हो सकता है।

नौसेना के पास जीसैट-7आर

भारतीय नौसेना ने साल 2013 में जीसैट-7 ‘रुक्मिणी’ के जरिए डेडिकेटेड मिलिट्री कम्युनिकेशन सैटेलाइट क्षमता हासिल की थी। यह सैटेलाइट समुद्र में तैनात युद्धपोतों, पनडुब्बियों, विमानों और जमीन पर मौजूद नौसैनिक ठिकानों के बीच कम्युनिकेशन में मदद करता था।

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इसके बाद 2 नवंबर 2025 को भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने एलवीएम3-एम5 रॉकेट से रुक्मिणी का रिप्लेसमेंट जीसैट-7आर, जिसे सीएमएस-03 भी कहा जाता है, को जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट में स्थापित किया। इसका वजन लगभग 4,400 किलोग्राम है और इसे भारतीय नौसेना की जरूरतों के हिसाब से तैयार किया गया है। यह भारत का सबसे हैवी कम्युनिकेशन सैटेलाइट है। वहीं इसकी लाइफ 15 साल है।

यह मल्टी-बैंड कम्युनिकेशन सैटेलाइट है। इसके पेलोड में ऐसे ट्रांसपोंडर हैं जो आवाज, डेटा और वीडियो कम्युनिकेशन को सपोर्ट करते हैं। इसका कवरेज भारतीय महासागर क्षेत्र में नौसेना की कम्युनिकेशन जरूरतों को पूरा करने के लिए तैयार किया गया है।

नौसेना के लिए इसकी अहमियत इसलिए है क्योंकि भारतीय युद्धपोत हिंद महासागर के बड़े हिस्से में तैनात रहते हैं। इन जहाजों को समुद्र में रहते हुए भी मुख्यालय और दूसरे नौसैनिक प्लेटफॉर्म से संपर्क बनाए रखना पड़ता है। डेडिकेटेड सैटेलाइट इस कम्युनिकेशन सिस्टम को मजबूत करता है। (India military communication satellites)

वायुसेना को क्यों चाहिए दूसरा सैटेलाइट?

भारतीय वायुसेना के पास दिसंबर 2018 से जीसैट-7ए (एंग्री बर्ड) है। इसका इस्तेमाल एयरबेस, जमीन पर मौजूद रडार, एयरबोर्न अर्ली वॉर्निंग विमान और अन्य एयर बोर्न रिसोर्सेज के बीच कम्युनिकेशन को बेहतर बनाने के लिए किया जाता है। जीसैट-7ए भी वायुसेना के कम्युनिकेशन नेटवर्क में अहम भूमिका निभाता है। यह कू-बैंड कम्युनिकेशन के जरिए विमानों, एयरबोर्न वॉर्निंग एंड कंट्रोल सिस्टम (एडब्ल्यूएसीएस), रडार और ग्राउंड स्टेशनों को जोड़ने में मदद करता है।

यह सैटेलाइट रिमोटली ऑपरेटेड अनमैन्ड एरियल प्लेटफॉर्म के कम्युनिकेशन में भी मदद करता है। लेकिन इसकी क्षमता का लगभग 30 फीसदी हिस्सा भारतीय सेना को भी अलोकेट किया गया था। लेकिन जीसैट-7ए की सर्विस लाइफ खत्म हो रही है।

मिलिट्री टेक्नोलॉजी और कम्युनिकेशन की जरूरतें लगातार बढ़ रही हैं। फाइटर जेट्स, सर्विलांस सिस्टम्स और अलग-अलग कमांड सेंटर के बीच सुरक्षित कम्युनिकेशन के लिए अधिक क्षमता की जरूरत पड़ती है। जीसैट-7सी को खास तौर पर वायुसेना के सॉफ्टवेयर डिफाइंड रेडियो को सपोर्ट करने के लिए डिजाइन किया गया है। इसका उद्देश्य विमानों, ग्राउंड स्टेशनों और अन्य एयर युनिट्स के बीच बियॉन्ड लाइन ऑफ साइट (बीएलओएस) यानी सीधी रेडियो पहुंच से बाहर होने पर भी रियल-टाइम कम्युनिकेशन उपलब्ध कराना है।

हाल ही में रक्षा मंत्रालय के न्यू स्पेस इंडिया लिमिटेड के साथ हुए कॉन्ट्रैक्ट के तहत यह सैटेलाइट भारत में डिजाइन, विकसित और निर्मित किया जाएगा। इसका उद्देश्य वायुसेना के संसाधनों के बीच सुरक्षित, मजबूत और निर्बाध कम्युनिकेशन क्षमता बढ़ाना है।

जीसैट-7सी का कॉन्ट्रैक्ट नवंबर 2021 में रक्षा अधिग्रहण परिषद से मिली मंजूरी के लगभग पांच साल बाद हुआ है। उस समय इस प्रोजेक्ट की अनुमानित लागत 2,236 करोड़ रुपये बताई गई थी। नए कॉन्ट्रैक्ट की लागत इससे ज्यादा है। इस प्रोजेक्ट को लॉन्च होने में लगभग 36 से 40 महीने लग सकते हैं। वहीं, इसकी लॉन्चिंग 2027 के अंत या 2028 में हो सकती है। जबकि इसे पूरी तरह ऑपरेशनल बनाने का लक्ष्य 2030 तक रखा गया है। (India military communication satellites)

थलसेना के लिए जीसैट-7बी क्यों महत्वपूर्ण है?

थलसेना के लिए जीसैट-7बी का डेवलपमेंट भी इसी रणनीति का हिस्सा है। मार्च 2023 में इस सैटेलाइट के लिए न्यू स्पेस इंडिया लिमिटेड के साथ लगभग 3,000 करोड़ रुपये का कॉन्ट्रैक्ट किया गया था। जीसैट-7बी को थलसेना की सुरक्षित संचार जरूरतों के लिए डेवलप किया गया है और यह आधुनिक एसडीआर सिस्टम से लैस होगा।

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जीसैट-7बी का वजन करीब पांच टन होगा। इसे ज्योस्टेशनरी ऑर्बिट में स्थापित किया जाएगा। इस कक्षा में मौजूद सैटेलाइट पृथ्वी के घूमने के साथ उसी गति से चक्कर लगाता है, इसलिए जमीन से देखने पर वह लगभग एक ही जगह पर दिखाई देता है। इस तरह के सैटेलाइट का इस्तेमाल बड़े क्षेत्र में संचार सुविधा उपलब्ध कराने के लिए किया जाता है।

थलसेना की जरूरतें नौसेना और वायुसेना से अलग हैं। उसके सैनिक पहाड़ी सीमाओं, रेगिस्तानी इलाकों और दूरदराज के सैन्य ठिकानों पर तैनात रहते हैं। वहां सामान्य कम्युनिकेशन नेटवर्क उपलब्ध नहीं होता या उसकी पहुंच सीमित हो सकती है।

ऐसे में डेडिकेटेड कम्युनिकेशन सैटेलाइट से सैनिकों, मिलिट्री फॉर्मेशन, वेपन सिस्टम्लऔर कमांड सेंटर के बीच संपर्क बनाए रखने में मदद मिल सकती है। खासकर उन इलाकों में जहां लंबी दूरी और कठिन भौगोलिक परिस्थितियां कम्युनिकेशन को चुनौतीपूर्ण बनाती हैं।

युद्ध के दौरान इसका महत्व और बढ़ जाता है। दुश्मन के हमले से जमीन पर मौजूद कम्युनिकेशन नेटवर्क को नुकसान पहुंच सकता है। ऐसे हालात में सैटेलाइट से संपर्क बनाए रखने में मदद मिलेगी। इससे सेना के कमांडर सैनिकों की स्थिति और ऑपरेशन से जुड़ी जानकारी प्राप्त कर सकेंगे तथा जरूरी निर्देश दे सकेंगे।

जीसैट-7बी के पूरी तरह शुरू होने से थलसेना को अपने कम्युनिकेशन संसाधनों पर अधिक सीधा नियंत्रण मिल सकेगा। जीसैट-7बी को इसरो 2028 के मध्य तक लॉन्च कर सकता है। इससे सेना को दूरदराज के सीमावर्ती इलाकों और मुश्किल भौगोलिक हालात में सुरक्षित संचार की सुविधा मिलेगी। पहले इस सैटेलाइट की लॉन्चिंग नवंबर 2027 में होनी थी, लेकिन तकनीकी वजहों से इसमें करीब छह माह की देरी हो रही है। (India military communication satellites)

भारत का मॉडल चीन से कैसे अलग है?

भारत तीनों सेनाओं की खास जरूरतों के लिए डेडिकेटेड कम्युनिकेशन सैटेलाइट डेवलप कर रहा है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि तीनों सेनाएं एक-दूसरे से अलग रहकर काम करती हैं। जरूरत पड़ने पर जॉइंट ऑपरेशंस में अलग-अलग कम्युनिकेशन नेटवर्क और अन्य शेयर्ड सिस्टम्स के जरिए कॉर्डिनेट किया जा सकता है।

वहीं, चीन ने अपनी मिलिट्री स्पेस कैपेबिलिटीज को अधिक इंटीग्रेट कमान के तहत लाने के लिए संगठनात्मक बदलाव किए हैं। अप्रैल 2024 में पीपुल्स लिबरेशन आर्मी की स्ट्रैटेजिक सपोर्ट फोर्स को भंग करने के बाद एयरोस्पेस फोर्स को अलग मिलिट्री ब्रांच के तौर पर स्थापित किया गया था। इसका उद्देश्य अंतरिक्ष से जुड़ी सैन्य क्षमताओं के मैनेजमेंट और कॉर्डिनेशन को मजबूत करना था।

चीन के मॉडल में इंटीग्रेट कमान और शेयर्ड मिलिट्री स्पेस रिसोर्सेज के बीच तालमेल पर जोर है। भारत का सर्विस स्पेसिफिक मॉडल प्रत्येक सेना की ऑपरेशनल जरूरतों के अनुसार कम्युनिकेशन क्षमता डेवलप करने पर फोकस है।

दोनों व्यवस्थाओं के अपने फायदे और चुनौतियां हैं। इंटीग्रेट नेटवर्क से अलग-अलग सेनाओं के बीच इनफॉरमेशन शेयर करना आसान हो सकता है। दूसरी तरफ, अलग-अलग डेडिकेटेड सैटेलाइट होने से किसी एक सर्विस की विशेष कम्युनिकेशन जरूरतों के अनुसार रिर्सोसेज तैयार किए जा सकते हैं। (India military communication satellites)

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क्या अलग-अलग सैटेलाइट होने से बढ़ती है सुरक्षा?

डेडिकेटेड सैटेलाइट सिस्टम का एक फायदा यह हो सकता है कि हर सेना को अपनी जरूरतों के मुताबिक कम्युनिकेशन क्षमता मिले। उदाहरण के लिए, नौसेना को समुद्र में दूर तक संपर्क बनाए रखने की जरूरत होती है, जबकि वायुसेना को विमानों, एयरबेस और रडार नेटवर्क के बीच तेज कम्युनिकेशन चाहिए। थलसेना के लिए दूरदराज के इलाकों में तैनात सैनिकों और कमांड सेंटर के बीच संपर्क महत्वपूर्ण है।

चीन के पास सैटेलाइट सिग्नल को ब्लॉक करने के लिए जैमर और अन्य एंटी-सैटेलाइट तकनीकों की क्षमता है। ऐसी तकनीकों का इस्तेमाल संचार सेवाओं को बाधित करने के लिए किया जा सकता है।

इसके अलावा, अलग-अलग सैटेलाइट होने से किसी एक सैटेलाइट में तकनीकी खराबी आने पर सभी सेवाओं का डेडिकेटेड कम्युनिकेशन एक साथ प्रभावित होने का जोखिम कम हो सकता है। लेकिन इसे पूरी सुरक्षा की गारंटी नहीं माना जा सकता। वास्तविक मजबूती इस बात पर भी निर्भर करती है कि वैकल्पिक कम्युनिकेशन व्यवस्था कितनी उपलब्ध है, जमीन पर मौजूद नेटवर्क कितना सुरक्षित है और सैटेलाइट को जामिंग या अन्य तकनीकी खतरों से बचाने के लिए क्या इंतजाम किए गए हैं।

यही वजह है कि आधुनिक मिलिट्री कम्युनिकेशन में केवल सैटेलाइट की संख्या नहीं, बल्कि नेटवर्क की सुरक्षा, उपलब्धता और अलग-अलग प्रणालियों के बीच तालमेल भी महत्वपूर्ण होता है। (India military communication satellites)

भारत लॉन्च करेगा 52 डेडिकेटेड मिलिट्री सैटेलाइट

भारतीय सेना का फोकस अब अंतरिक्ष को राष्ट्रीय सुरक्षा के एक महत्वपूर्ण क्षेत्र के रूप में विकसित करने पर भी है। सितंबर 2025 में कोलकाता में आयोजित संयुक्त कमांडर सम्मेलन के दौरान भारत ने अपना जॉइंट मिलिट्री स्पेस डॉक्ट्रिन जारी किया था।

इसके साथ ही भारत नेशनल मिलिट्री स्पेस पॉलिसी तैयार करने पर भी काम कर रहा है। इसका उद्देश्य अंतरिक्ष आधारित सैन्य संसाधनों की सुरक्षा करना, सैन्य क्षमताओं को मजबूत बनाना और अंतरिक्ष क्षेत्र में पैदा हो रही नई सुरक्षा चुनौतियों से निपटना है।

भारत की योजना स्पेस बेस्ड सर्विलांस यानी अंतरिक्ष आधारित निगरानी मिशन के तीसरे चरण के तहत अगले तीन सालों में 52 समर्पित सैन्य सैटेलाइट लॉन्च करने की भी है।

इस परियोजना को अक्टूबर 2024 में सुरक्षा मामलों की कैबिनेट समिति ने मंजूरी दी थी। इसकी कुल लागत करीब 26,968 करोड़ रुपये है। इस योजना के तहत इसरो 21 सैटेलाइट का निर्माण और लॉन्च करेगा, जबकि बाकी 31 सैटेलाइट बनाने की जिम्मेदारी निजी कंपनियों को दी जाएगी। इस कार्यक्रम का नेतृत्व मुख्यालय इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ के अंतर्गत आने वाली डिफेंस स्पेस एजेंसी कर रही है। (India military communication satellites)

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    हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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