📍नई दिल्ली | 1 Sep, 2026, 9:58 PM
Indian Navy SATCOM Terminal: भारतीय नौसेना ने अपने युद्धपोतों पर इस्तेमाल होने वाले सैटेलाइट कम्युनिकेशन सिस्टम को पूरी तरह स्वदेशी बनाने का फैसला किया है। नौसेना ने स्वदेशी शिप-बेस्ड सैटकॉम टर्मिनल्स डेवलप करने के लिए एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (ईओआई) जारी किया है। इस प्रोजेक्ट के तहत भारतीय कंपनियां ऐसे अत्याधुनिक सी-बैंड और कु-बैंड टर्मिनल तैयार करेंगी, जिनकी मदद से युद्धपोत समुद्र में हजारों किलोमीटर दूर रहते हुए भी सुरक्षित वॉयस, डेटा और वीडियो कम्युनिकेशन बनाए रख सकेंगे।
यह प्रोजेक्ट रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया डीएपी-2020 के मेक-II कैटेगरी के तहत अप्रूव की गई है। नौसेना की योजना लगभग 10 सी-बैंड और 20 कु-बैंड सैटकॉम टर्मिनलों के डेवलपमेंट और प्रोक्योरमेंट की है।
Indian Navy SATCOM Terminal: जीसैट-7आर के लिए तैयार होगा नया सिस्टम
यह प्रोजेक्ट भारतीय नौसेना के नए मिलिट्री कम्युनिकेशंस सैटेलाइट जीसैट-7आर, जिसे सीएमएस-03 भी कहा जाता है, के साथ पूरी तरह कंपेटेबल टर्मिनल डेवलप करने पर फोकस है।
भारतीय नौसेना साल 2013 से जीसैट-7 ‘रुक्मिणी’ सैटेलाइट का इस्तेमाल कर रही है। यह सैटेलाइट नौसेना के जहाजों, पनडुब्बियों और विमानों को एक सिक्योर नेटवर्क में जोड़ता है। नवंबर 2025 में लॉन्च किए गए जीसैट-7आर ने इस क्षमता को और बढ़ा दिया।
करीब 4,410 किलोग्राम वजनी यह कम्युनिकेशन सैटेलाइट यूएचएफ, एस, सी और कु-बैंड में काम करता है। इसकी मदद से भारतीय नौसेना को भारतीय महासागर क्षेत्र में लगभग 2,000 किलोमीटर तक सुरक्षित वॉयस, डेटा और वीडियो कम्युनिकेशन की सुविधा मिलती है। इसकी अनुमानित सर्विस लाइफ 15 साल तक है।
अब नौसेना चाहती है कि इस सैटेलाइट के साथ काम करने वाले शिप बेस्ड टर्मिनल भी भारत में ही डेवलप किए जाएं ताकि विदेशी उपकरणों पर निर्भरता कम हो सके। (Indian Navy SATCOM Terminal)
अभी आयातित हैं कई महत्वपूर्ण सिस्टम
वर्तमान में इस्तेमाल किए जा रहे कई सी-बैंड और कु-बैंड हार्डवेयर बाहर से खरीदे हुए हैं। समुद्र में सैटेलाइट कम्युनिकेशन बनाए रखने के लिए जहाजों पर विशेष एंटीना और ट्रैकिंग सिस्टम लगाए जाते हैं।
नए स्वदेशी टर्मिनलों में ऐसी तकनीक डेवलप करने पर जोर दिया गया है जिससे मैकेनिकल पार्ट्स की संख्या कम हो या उन्हें पूरी तरह हटाया जा सके। इससे रखरखाव कम होगा और समुद्री परिस्थितियों में सिस्टम की विश्वसनीयता बढ़ेगी। इन सिस्टम्स को ‘रुक्मिणी टर्मिनल्स’ नाम दिया गया है। (Indian Navy SATCOM Terminal)
पहले बनेगा प्रोटोटाइप
प्रोजेक्ट के तहत सबसे पहले प्रोटोटाइप डेवलप किए जाएंगे। इसमें एक सी-बैंड लार्ज शिप सैटकॉम टर्मिनल, एक कु-बैंड लार्ज शिप सैटकॉम टर्मिनल और एक कु-बैंड स्मॉल शिप सैटकॉम टर्मिनल तैयार किया जाएगा।
इनके सफल परीक्षण के बाद प्रोडक्शन शुरू होगा। जिसमें लगभग 10 बड़े सी-बैंड टर्मिनल, 10 बड़े कु-बैंड टर्मिनल और 10 छोटे कु-बैंड टर्मिनल खरीदे जाएंगे। मेक-II प्रोजेक्ट की तरह डेवलपमेंट पर आने वाला पूरा खर्च उद्योग को स्वयं वहन करना होगा।
समुद्र के कठिन हालातों में भी करना होगा काम
नौसेना ने इस प्रोजेक्ट के लिए कई तकनीकी आवश्यकताएं तय की हैं। सैटकॉम टर्मिनल को समुद्र में लगातार बदलती परिस्थितियों में भी सैटेलाइट की दिशा में सटीक पॉइंटिंग बनाए रखनी होगी।
युद्धपोतों को लगातार रोल, पिच और यॉ जैसी गतियों का सामना करना पड़ता है। इसके अलावा नमकयुक्त वातावरण, तेज हवा, कंपन और खराब मौसम भी चुनौती पैदा करते हैं। इन सभी परिस्थितियों के बावजूद टर्मिनल को बिना लिंक टूटे कम्युनिकेशन बनाए रखना होगा। (Indian Navy SATCOM Terminal)
स्वदेशी सामग्री पर विशेष जोर
नौसेना ने प्रोजेक्ट में न्यूनतम 50 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री की शर्त रखी है। यह शर्त हार्डवेयर के साथ पूरे एम्बेडेड सॉफ्टवेयर पर भी लागू होगी। उद्योगों को यह प्रमाणित करना होगा कि डिजाइन स्वदेशी है।
प्रोजेक्ट के तहत डेवलप बौद्धिक संपदा अधिकार डेवलपमेंट एजेंसी के पास रहेंगे, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में सरकार को विशेष अधिकार प्राप्त होंगे।
किसी भी विदेशी सरकार या एजेंसी को इन प्रणालियों का निरीक्षण या ऑडिट करने के लिए रक्षा मंत्रालय की पूर्व अनुमति आवश्यक होगी। (Indian Navy SATCOM Terminal)
सैटेलाइट कम्युनिकेशन और एंटीना डिजाइन पर फोकस
नौसेना ने स्पष्ट किया है कि प्रोजेक्ट की सबसे महत्वपूर्ण तकनीकी क्षमता सैटेलाइट कम्युनिकेशन और एंटीना डिजाइन होगी। भाग लेने वाली कंपनियों को रक्षा, एयरोस्पेस, अनुसंधान या औद्योगिक क्षेत्रों में डिजाइन और विकास का अनुभव दिखाना होगा। साथ ही यह भी बताना होगा कि उन्होंने कौन-कौन सी महत्वपूर्ण तकनीकों का स्वदेशीकरण किया है।
विदेशी साझेदारी की अनुमति दी गई है, लेकिन कंपनियों को यह स्पष्ट करना होगा कि कौन सी तकनीक बाहर से आ रही है और कौन सी भारत में डेवलप की जाएगी। (Indian Navy SATCOM Terminal)
थ्री-डी मोशन टेबल टेस्ट जरूरी
इस प्रोजेक्ट की परीक्षण प्रक्रिया काफी व्यापक रखी गई है। कंपनियों को अपनी व्यवस्था से सभी लैब परीक्षण सुविधाएं उपलब्ध करानी होंगी।
विशेष रूप से थ्री-डी मोशन टेबल टेस्ट जरूरी हैं। इन परीक्षणों में जहाज की वास्तविक गति का कृत्रिम वातावरण तैयार किया जाएगा ताकि यह देखा जा सके कि टर्मिनल लगातार सैटेलाइट लिंक बनाए रख सकता है या नहीं।
इसके अलावा स्पेस एप्लीकेशन्स सेंटर (एसएसी), अहमदाबाद या समकक्ष संस्थान में भी परीक्षण कराना होगा।
नौसेना के नेटवर्क में इंटीग्रेशन से पहले सिस्टम को वल्नरेबिलिटी असेसमेंट (वीए) क्लियरेंस प्राप्त करनी होगी। इसके बाद वास्तविक नौसैनिक प्लेटफॉर्म पर सिंगल स्टेज कंपोजिट यूजर ट्रायल्स आयोजित किए जाएंगे। (Indian Navy SATCOM Terminal)
एमएसएमई और स्टार्टअप्स को प्राथमिकता
यह प्रोजेक्ट फिलहाल एमएसएमई क्षेत्र के लिए आरक्षित रखी गई है। यदि कम से कम दो पात्र एमएसएमई आवेदन नहीं करते हैं, तभी अन्य कंपनियों पर विचार किया जाएगा।
स्टार्टअप्स भी इस प्रोजेक्ट में भाग ले सकते हैं, बशर्ते वे इंजीनियरिंग, मैन्युफैक्चरिंग, रिसर्च या डिफेंस टेक्नोलॉजी क्षेत्रों में रजिस्टर्ड हों।
कंसोर्टियम मॉडल की भी अनुमति दी गई है। अधिकतम पांच सदस्य मिलकर एक समूह बना सकते हैं, लेकिन उन्हें एक लीड मेंबर नामित करना होगा।
ईओआई जमा करने की अंतिम तिथि 24 अक्टूबर है। इच्छुक कंपनियां 22 सितंबर 2026 तक अपने प्रश्न और स्पष्टीकरण भेज सकती हैं।
प्रोटोटाइप डेवलप करने के लिए कंपनियों को 104 सप्ताह यानी लगभग दो साल का समय मिलेगा। इसके बाद परीक्षण और मूल्यांकन की प्रक्रिया चलेगी।
नेटवर्क-सेंट्रिक वॉरफेयर को मिलेगी मजबूती
भारतीय नौसेना पहले ही अपने जहाजों, पनडुब्बियों और विमानों को नेटवर्क बेस्ड ऑपरेशन से जोड़ चुकी है। साल 2014 में आयोजित ट्रोपेक्स अभ्यास के दौरान जीसैट-7 रुक्मिणी ने लगभग 60 युद्धपोतों और 75 विमानों को एक साझा नेटवर्क में जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
जीसैट-7आर के आने के बाद बैंडविड्थ, कवरेज और कम्युनिकेशन क्षमता में वृद्धि हुई है। अब जहाजों पर इस्तेमाल होने वाले सैटकॉम टर्मिनलों का स्वदेशी विकास भारतीय नौसेना के कम्युनिकेशन नेटवर्क को और अधिक आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। (Indian Navy SATCOM Terminal)
Author
हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।





