📍नई दिल्ली | 1 Sep, 2026, 8:08 PM
AFT Agniveer case: आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल (एएफटी) ने भारतीय सेना के एक अहम फैसले को रद्द करते हुए पूर्व अग्निवीर अनस चौहान की सेवा में बहाली का आदेश दिया है। ट्रिब्यूनल ने कहा कि नाबालिग उम्र में दर्ज एक लंबित आपराधिक मामले की जानकारी न देने के आधार पर किसी अग्निवीर को सेवा से हटाना कानून के अनुरूप नहीं है। एएफटी ने सेना के डिस्चार्ज आदेश को “अनसस्टेनेबल इन लॉ” यानी कानून की नजर में टिकाऊ नहीं माना।
17 अगस्त को एएफटी की चंडीगढ़ बेंच ने यह फैसला सुनाया। बेंच में चेयरपर्सन जस्टिस राजेंद्र मेनन और एडमिनिस्ट्रेटिव मेंबर रसिका चौबे शामिल थे। ट्रिब्यूनल ने 20 जनवरी 2026 को जारी सेना के डिस्चार्ज आदेश को रद्द करते हुए अनस चौहान को सभी सेवा लाभों के साथ दोबारा अग्निवीर सेवा में लेने का आदेश दिया।
AFT Agniveer case: क्या है पूरा मामला?
अनस चौहान का चयन वर्ष 2024-25 की अग्निवीर भर्ती रैली में हुआ था। उन्होंने फिजिकल टेस्ट और अन्य चयन प्रक्रियाएं सफलतापूर्वक पूरी की थीं। चयन के बाद पुलिस वेरिफिकेशन के दौरान एक पुराना आपराधिक मामला सामने आया।
यह एफआईआर 3 अक्टूबर 2020 को उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में दर्ज हुई थी। गांव में हुए एक झगड़े के बाद 16 लोगों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं में मामला दर्ज किया गया था। उस समय अनस चौहान की उम्र लगभग 17 साल थी और वह कानूनी रूप से नाबालिग था।
पुलिस वेरिफिकेशन रिपोर्ट आने के बाद सेना ने 12 सितंबर 2025 को उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी किया। इसके बाद 20 जनवरी 2026 को सेना ने उन्हें सेवा से हटा दिया। (AFT Agniveer case)
सेना ने किस आधार पर हटाया?
भारतीय सेना ने अनस चौहान को आर्मी रूल्स 1954 के रूल 13(3) आइटम-4 के तहत हटाया था। सेना का कहना था कि उन्होंने भर्ती फॉर्म में अपने खिलाफ दर्ज लंबित एफआईआर की जानकारी नहीं दी।
सेना ने इसे महत्वपूर्ण जानकारी छिपाना माना और कहा कि यह वर्दीधारी व्यक्ति के लिए उचित आचरण नहीं है। इसी आधार पर डिस्चार्ज का आदेश जारी किया गया।
जिसके बाद अनस चौहान ने इस फैसले को आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल में चुनौती दी।
इलाहाबाद हाईकोर्ट का आदेश बना सबसे अहम आधार
मामले की सुनवाई के दौरान अनस चौहान की ओर से इलाहाबाद हाईकोर्ट का एक आदेश पेश किया गया। हाईकोर्ट ने 10 अप्रैल 2025 को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 528 के तहत दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणी की थी।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि इस एफआईआर को अग्निवीर भर्ती या नियुक्ति प्रक्रिया के लिए लंबित आपराधिक मामला नहीं माना जाएगा। जिसके बाद यही आदेश बाद में पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण कानूनी आधार बन गया। (AFT Agniveer case)
एएफटी ने सेना को क्या कहा?
एएफटी ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा कि इलाहाबाद हाईकोर्ट का निर्देश सेना और ट्रिब्यूनल दोनों पर बाध्यकारी था। जब तक हाईकोर्ट उस आदेश में कोई बदलाव नहीं करता, तब तक सेना एफआईआर को नियुक्ति में अयोग्यता का आधार नहीं बना सकती थी।
ट्रिब्यूनल ने कहा कि अगर सेना को लगता था कि हाईकोर्ट का आदेश केवल चयन प्रक्रिया तक सीमित है और भर्ती फॉर्म में जानकारी छिपाने के मामले पर लागू नहीं होता, तो उसे हाईकोर्ट से स्पष्टीकरण मांगना चाहिए था।
एएफटी ने माना कि सेना ने स्वयं फैसला लेकर कार्रवाई की, जो कानूनी रूप से उचित नहीं थी। (AFT Agniveer case)
जुवेनाइल जस्टिस एक्ट भी बना राहत का आधार
ट्रिब्यूनल ने अपने फैसले में जुवेनाइल जस्टिस (केयर एंड प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन) एक्ट का भी उल्लेख किया।
कानून का मूल सिद्धांत यह है कि नाबालिग उम्र में किसी मामले में शामिल व्यक्ति को वयस्क होने के बाद रोजगार के अवसरों से वंचित नहीं किया जाना चाहिए। विशेष रूप से तब, जब मामला गंभीर प्रकृति का न हो और अदालत ने कोई अलग निर्देश न दिया हो।
एएफटी ने सुप्रीम कोर्ट, दिल्ली हाईकोर्ट और अपने पुराने फैसलों का भी हवाला दिया। इन सभी में यह सिद्धांत दोहराया गया था कि किशोरावस्था के मामलों को भविष्य के रोजगार में बाधा नहीं बनाया जाना चाहिए।
इसी आधार पर ट्रिब्यूनल ने कहा कि अनस चौहान के खिलाफ केवल लंबित एफआईआर का हवाला देकर कार्रवाई नहीं की जा सकती थी। (AFT Agniveer case)
2020 की एफआईआर में क्या था?
रिकॉर्ड के अनुसार मेरठ में दर्ज एफआईआर गांव के एक विवाद और झगड़े से जुड़ी थी। इसमें कुल 16 लोगों के नाम शामिल थे।
अनस चौहान के वकील ने दलील दी कि एफआईआर में उनके खिलाफ कोई विशेष और व्यक्तिगत गंभीर आरोप नहीं थे। मामला सामूहिक आरोपों वाला था और वे उस समय नाबालिग थे।
ट्रिब्यूनल ने भी इस तथ्य को महत्वपूर्ण माना कि एफआईआर के समय उनकी उम्र 18 वर्ष से कम थी। (AFT Agniveer case)
बहाली के साथ मिलेंगे सेवा लाभ
एएफटी ने केवल डिस्चार्ज आदेश रद्द नहीं किया बल्कि अनस चौहान की सेवा में बहाली का भी आदेश दिया।
ट्रिब्यूनल ने कहा कि उन्हें उसी नियुक्ति के आधार पर दोबारा सेवा में लिया जाए जिसके तहत उनका चयन हुआ था। साथ ही सभी “कांसिक्वेंशल बेनिफिट्स” भी दिए जाएं।
कानूनी रूप से इसका अर्थ सेवा की निरंतरता, वेतन-भत्तों से जुड़े अधिकार और अन्य सेवा लाभों से जुड़ा माना जाता है।
हालांकि ट्रिब्यूनल ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि भविष्य में केंद्र सरकार को इलाहाबाद हाईकोर्ट से आदेश में कोई संशोधन या स्पष्टीकरण मिलता है, तो उसका असर इस राहत पर पड़ सकता है। (AFT Agniveer case)
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