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सेना ‘K-9 वॉरियर्स’ को दे रही है पैराशूट से जंप करने की ट्रेनिंग, पहली बार डॉग हैंडलर और कॉम्बैट डॉग ने किया टैंडम जंप

सूर्या कमांड यानी सेंट्रल कमांड ने 15 सितंबर को इस अभ्यास का वीडियो जारी किया। सेना ने इस उपलब्धि को “पॉज इन द स्काई, करेज ऑन द ग्राउंड” नाम दिया...

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📍नई दिल्ली | 16 Sep, 2026, 11:38 AM

Airborne Combat Dogs: भारतीय सेना के कॉम्बैट डॉग्स अब सिर्फ जमीन पर ही नहीं, बल्कि आसमान से भी ऑपरेशन एरिया में पहुंचने के लिए तैयार किए जा रहे हैं। सेना ने पहली बार एक ऐसी एयरबोर्न ट्रेनिंग का प्रदर्शन किया है, जिसमें एक पैराट्रूपर, डॉग हैंडलर और कॉम्बैट डॉग ने फुल कॉम्बैट लोड के साथ टैंडम पैराशूट जंप किया। यह अभ्यास मध्य भारत के बेहट ड्रॉप जोन में किया गया और इसे भारतीय सेना की एयरबोर्न क्षमताओं में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

सूर्य कमांड यानी सेंट्रल कमांड ने 15 सितंबर 2026 को इस अभ्यास का वीडियो जारी किया। सेना ने इस उपलब्धि को “पॉज इन द स्काई, करेज ऑन द ग्राउंड” नाम दिया। कमांड ने कहा, “यह सैनिक और उसके कैनाइन साथी के बीच भरोसे, टीमवर्क और अटूट संबंध का शानदार उदाहरण है। दोनों हर मिशन के लिए तैयार हैं।”

Airborne Combat Dogs: पहली बार डॉग हैंडलर और कॉम्बैट डॉग के साथ टैंडम जंप

सेना के मुताबिक, ऐसा बहुत कम देखने को मिला है, जब किसी डॉग हैंडलर और उसके कॉम्बैट डॉग ने टैंडम पैराशूट डिसेंट किया है। इस दौरान एक प्रशिक्षित पैराट्रूपर के साथ डॉग हैंडलर और उसके मिलिट्री डॉग एक ही जंप प्रोफाइल में शामिल रहे। इस अभ्यास की खास बात यह भी थी कि तीनों के पास पूरा कॉम्बैट लोड मौजूद था।

सेना ने बताया कि इससे पहले संबंधित कॉम्बैट डॉग के साथ मिलिट्री फ्री फॉल जंप भी किए जा चुके थे। अब फुल कॉम्बैट लोड के साथ टैंडम जंप और लैंडिंग का अभ्यास किया गया है।

क्यों जरूरी है एयरबोर्न कॉम्बैट डॉग क्षमता

आधुनिक युद्ध और आतंकवाद विरोधी अभियानों में कई बार सैनिकों को ऐसे इलाकों में उतरना पड़ता है, जहां रनवे, सड़क या हेलिपैड उपलब्ध नहीं होते। ऐसे हालात में स्पेशल फोर्सेज को पैराशूट के जरिए टारगेट एरिया के पास उतारा जाता है।

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अब यदि कॉम्बैट डॉग्स भी उसी समय सैनिकों के साथ उतर सकें, तो ऑपरेशन शुरू होने के तुरंत बाद विस्फोटक खोजने, संदिग्धों का पीछा करने, इमारतों की तलाशी लेने और ट्रैकिंग जैसे कार्य शुरू किए जा सकते हैं। यही वजह है कि अमेरिका, फ्रांस और रूस जैसे देशों की स्पेशल फोर्सेज लंबे समय से एयरबोर्न कैनाइन टीमों का इस्तेमाल करती रही हैं। यहां तक कि पाकिस्तान के ऐब्टाबाद में छिपे बैठे आतंकी ओसामा बिन लादेन को मारने के लिए यूएस नेवी सील्स उस समय अपने साथ कॉम्बैट डॉग कायरो (मेलिनोइस) को लेकर गए थे। (Airborne Combat Dogs)

पैराशूट जंप से पहले होती है विशेष ट्रेनिंग

किसी सैन्य कुत्ते को सीधे विमान से कूदने के लिए तैयार नहीं किया जाता। इसके पीछे कई महीनों की विशेष ट्रेनिंग होती है। भारतीय सेना के कॉम्बैट डॉग्स की प्राइमरी ट्रेनिंग मेरठ स्थित रिमाउंट एंड वेटरिनरी कॉर्प्स (आरवीसी) सेंटर एंड कॉलेज में होती है। यहां उन्हें आज्ञापालन, ट्रैकिंग, विस्फोटक पहचान, हमला और सुरक्षा से जुड़ी ट्रेनिंग दी जाती है।

इसके बाद यूनिट स्तर पर बैटल इनोक्यूलेशन कराया जाता है। इस दौरान कुत्तों को गोलीबारी, विस्फोट, धुआं, तेज आवाज और युद्ध जैसी परिस्थितियों का सामना कराया जाता है ताकि वास्तविक ऑपरेशन के दौरान वे घबराएं नहीं। एयरबोर्न ट्रेनिंग के लिए उन्हें स्पेशल फोर्सेज और पैराट्रूपर्स के साथ अतिरिक्त अभ्यास कराया जाता है। (Airborne Combat Dogs)

पहले सिखाई गई हेलीकॉप्टर से रस्सी के जरिए उतरने की तकनीक

पैराशूट जंप से पहले सेना ने कॉम्बैट डॉग्स को हेलीकॉप्टर से स्लिदरिंग तकनीक भी सिखाई थी। स्लिदरिंग में सैनिक और कुत्ता हेलीकॉप्टर से रस्सी के सहारे जमीन पर उतरते हैं।

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मई 2026 में मणिपुर के लेइमाखोंग क्षेत्र में स्पीयर कॉर्प्स की रेड शील्ड डिवीजन की पांच के-9 टीमों ने एडवांस हेली-स्लिदरिंग ट्रेनिंग पूरी की थी।

सदर्न कमांड की 25 आर्मी डॉग यूनिट ने पुणे में 12 मीटर ऊंचा स्लिदरिंग टावर भी बनाया है। इसका उद्देश्य कुत्तों को ऊंचाई के डर से मुक्त करना और हैंडलर के साथ संतुलन बनाए रखने की ट्रेनिंग देना है। (Airborne Combat Dogs)

कौन सी नस्लें निभा रही हैं सबसे बड़ी भूमिका

भारतीय सेना में कई नस्लों के सैन्य कुत्ते तैनात हैं। इनमें बेल्जियन मेलिनोइस, जर्मन शेफर्ड और लैब्राडोर प्रमुख हैं। बेल्जियन मेलिनोइस को स्पेशल फोर्सेज के अभियानों के लिए सबसे उपयुक्त माना जाता है क्योंकि यह तेज, फुर्तीला और अत्यधिक प्रशिक्षित होने वाला कुत्ता है।

सेना अब स्वदेशी नस्लों जैसे मुदहोल हाउंड और रामपुर हाउंड को भी बढ़ावा दे रही है। इन नस्लों को भारतीय मौसम और भौगोलिक परिस्थितियों के लिए बेहतर माना जाता है। (Airborne Combat Dogs)

सेना के लिए क्यों महत्वपूर्ण हैं कॉम्बैट डॉग्स

दशकों से सेना, केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों और अन्य सुरक्षा एजेंसियों के लिए सैन्य कुत्ते महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं। इनका इस्तेमाल सीमा सुरक्षा, गश्त, आतंकवाद विरोधी अभियान, विस्फोटक और बारूदी सुरंगों की पहचान, वीआईपी सुरक्षा, तस्करी रोकने और सर्च एंड रेस्क्यू ऑपरेशन में किया जाता है।

कॉम्बैट डॉग्स को फोर्स मल्टीप्लायर माना जाता है क्योंकि वे ऐसे स्थानों तक पहुंच सकते हैं जहां इंसानों का पहुंचना मुश्किल होता है। कई कुत्तों को कैमरों और सेंसर से भी लैस किया जाता है, जिससे वे रियल टाइम टैक्टिकल जानकारी उपलब्ध करा सकते हैं। (Airborne Combat Dogs)

कई कैनाइन वॉरियर्स ने दिखाई है वीरता

भारतीय सेना के कई कॉम्बैट डॉग्स ने आतंकवाद विरोधी अभियानों में असाधारण साहस दिखाया है। बेल्जियन मेलिनोइस नस्ल का फैंटम, जो 9 पैरा स्पेशल फोर्सेज के साथ तैनात था, 2024 में अखनूर सेक्टर में अभियान के दौरान शहीद हो गया था। उसे 2025 में मेंशन-इन-डिस्पैचेज सम्मान दिया गया था।

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फरवरी 2026 में किश्तवाड़ ऑपरेशन के दौरान 2 पैरा स्पेशल फोर्सेज के जर्मन शेफर्ड टायसन को गोली लगी थी। घायल होने के बावजूद उसने ऑपरेशन में सहयोग जारी रखा। राजौरी में 2023 के एक ऑपरेशन के दौरान लैब्राडोर केंट ने अपने हैंडलर को बचाते हुए चोटें झेली थीं। सेना में सेवा के दौरान शहीद होने वाले सैन्य कुत्तों को पूर्ण सैन्य सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी जाती है। (Airborne Combat Dogs)

डॉग्स के लिए तैयार हो रहे स्मार्ट कॉलर और बुलेटप्रूफ वेस्ट

भारतीय सेना अपने कैनाइन वॉरियर्स के लिए नई सुरक्षा तकनीक भी डेवलप कर रही है। मॉड्यूलर बुलेटप्रूफ वेस्ट तैयार किए जा रहे हैं, जो आतंकवाद विरोधी अभियानों और नियंत्रण रेखा जैसे संवेदनशील इलाकों में कुत्तों को गोलियों और छर्रों से सुरक्षा प्रदान करेंगे।

इसके अलावा स्मार्ट कॉलर भी विकसित किए जा रहे हैं। ये कॉलर शरीर का तापमान, पल्स, सांस लेने की गति, हृदय गति में बदलाव और कैलोरी खर्च जैसी जानकारियां रिकॉर्ड करेंगे।

सेना का मानना है कि अत्यधिक गर्मी, ठंड, थकान, जहरीले वातावरण और लंबे अभियानों के दौरान इन जानकारियों से कुत्तों की सेहत पर नजर रखने में मदद मिलेगी। (Airborne Combat Dogs)

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  • herry passport

    हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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