📍नई दिल्ली | 17 Aug, 2026, 7:35 PM
रक्षा मंत्रालय ने अमेरिकी कंपनी जनरल एटॉमिक्स एरोनॉटिकल सिस्टम्स इंक (GA-ASI) के साथ भारतीय नौसेना के लिए दो एमक्यू-9बी सी गार्डियन हाई-एल्टीट्यूड लॉन्ग-एंड्योरेंस रिमोटली पायलटेड एयरक्राफ्ट सिस्टम्स की लीज का समझौता किया है। यह कॉन्ट्रैक्ट करीब 1,943 करोड़ रुपये का है और यह 30 महीने यानी ढाई साल के लिए लीज पर लिए गए हैं।
MQ-9B Sea Guardian Lease Deal: क्या है एमक्यू-9बी सी गार्डियन?
एमक्यू-9बी सी गार्डियन दुनिया के सबसे एडवांस समुद्री निगरानी ड्रोन में गिना जाता है। इसे अमेरिकी कंपनी जनरल एटॉमिक्स ने डेवलप किया है। इसे विशेष रूप से समुद्री क्षेत्र में लंबी दूरी की निगरानी, खुफिया जानकारी जुटाने और संदिग्ध गतिविधियों पर नजर रखने के लिए डिजाइन किया गया है।
यह एक हाई-एल्टीट्यूड लॉन्ग-एंड्योरेंस (HALE) प्लेटफॉर्म है। यह बहुत अधिक ऊंचाई पर लंबे समय तक उड़ान भर सकता है। ड्रोन करीब 40,000 फीट की ऊंचाई तक ऑपरेट कर सकता है और लगातार 40 घंटे तक हवा में रह सकता है।
इसमें हनीवेल टीपीई331-10 टर्बोप्रॉप इंजन लगा है, जिसकी मदद से यह 310 किलोमीटर प्रति घंटे से अधिक की गति से उड़ सकता है।
नेवी को अभी इन ड्रोन की जरूरत क्यों पड़ी?
इस डील को समझने के लिए 2024 में हुए भारत-अमेरिका ड्रोन समझौते को देखना जरूरी है।
अक्टूबर 2024 में भारत ने अमेरिका से 31 एमक्यू-9बी ड्रोन खरीदने का लगभग 4 अरब डॉलर का समझौता किया था। इनमें 15 सी गार्डियन ड्रोन नौसेना, 8 स्काई गार्डियन थल सेना और 8 वायुसेना को मिलने हैं।
लेकिन इन ड्रोन की डिलीवरी में अभी वक्त है। सूत्रों के मुताबिक पहला ड्रोन जनवरी 2029 में मिलेगा, जबकि आखिरी ड्रोन सितंबर 2030 तक पहुंचेगा।
भारत के पास अभी और 2029 के बीच एक बड़ा अंतराल है। नौसेना को हिंद महासागर क्षेत्र में लगातार निगरानी की जरूरत है। इसी अंतर को भरने के लिए रक्षा मंत्रालय ने दो अतिरिक्त सी गार्डियन ड्रोन लीज पर लेने का फैसला किया।
यह एक इंटरिम अरेंजमेंट है, जिससे नौसेना को तत्काल क्षमता मिल सके और 2029 तक इंतजार न करना पड़े। (MQ-9B Sea Guardian Lease Deal)
हिंद महासागर में क्यों बढ़ी जरूरत?
पिछले कुछ सालों में हिंद महासागर क्षेत्र में चीन की नौसैनिक गतिविधियां तेजी से बढ़ी हैं। चीनी युद्धपोत, सर्वेक्षण पोत, पनडुब्बियां और अनुसंधान जहाज लगातार इस क्षेत्र में दिखाई दे रहे हैं।
भारत के लिए हिंद महासागर केवल समुद्री सीमा नहीं बल्कि व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और सामरिक सुरक्षा का महत्वपूर्ण क्षेत्र है। ऐसे में हजारों किलोमीटर लंबे समुद्री क्षेत्र पर लगातार निगरानी रखना जरूरी हो जाता है।
यहीं पर एमक्यू-9बी सी गार्डियन जैसे ड्रोन की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। यह एक ही मिशन में विशाल समुद्री क्षेत्र को कवर कर सकता है और कई घंटों तक टारगेट पर नजर बनाए रख सकता है। (MQ-9B Sea Guardian Lease Deal)
India boosts maritime surveillance
MoD signs ₹1,943 crore contract with General Atomics to lease two MQ-9B Sea Guardian HALE RPAS for the Indian Navy for 30 months.
The advanced drones will provide persistent ISR coverage, strengthening Maritime Domain Awareness across the… pic.twitter.com/NOUBHpBIch
— Raksha Samachar | रक्षा समाचार 🇮🇳 (@RakshaSamachar) August 17, 2026
कौन-कौन से सेंसर लगे हैं?
सी गार्डियन की सबसे बड़ी ताकत इसके आधुनिक सेंसर और निगरानी उपकरण हैं।
इसमें सिंथेटिक एपर्चर रडार (SAR) लगाया गया है, जो बादलों और खराब मौसम में भी लक्ष्य की पहचान कर सकता है।
इसके अलावा इनवर्स सिंथेटिक एपर्चर रडार (ISAR) समुद्र में चल रहे जहाजों की पहचान करने में मदद करता है।
ड्रोन में इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल और इंफ्रारेड सेंसर (EO/IR) भी लगे हैं, जो दिन और रात दोनों समय निगरानी कर सकते हैं।
इसके साथ ऑटोमेटिक आइडेंटिफिकेशन सिस्टम (AIS) रिसीवर भी मौजूद है। यह समुद्र में चलने वाले जहाजों की पहचान, लोकेशन और मूवमेंट की जानकारी देता है।
इन सभी प्रणालियों की मदद से नौसेना को वास्तविक समय में समुद्री गतिविधियों की जानकारी मिल सकती है। (MQ-9B Sea Guardian Lease Deal)
2020 में पहली बार लिए थे लीज पर
यह पहली बार नहीं है जब भारतीय नौसेना एमक्यू-9बी सी गार्डियन का इस्तेमाल कर रही है। नवंबर 2020 में भारत ने पहली बार दो सी गार्डियन ड्रोन एक साल की लीज पर लिए थे। ये ड्रोन मिड नवंबर 2020 में भारत पहुंचे और 21 नवंबर 2020 से ऑपरेशनल हो गए।
इन्हें आईएनएस राजाली, अरक्कोणम (तमिलनाडु) से ऑपरेट किया जा रहा है।
शुरुआत में इनकी लीज एक साल के लिए थी, लेकिन बाद में इसे बढ़ाया गया। नौसेना के अनुसार ये ड्रोन अब तक 15,000 से अधिक उड़ान घंटे पूरे कर चुके हैं।
यह अनुभव भी नई लीज डील का एक बड़ा कारण माना जा रहा है, क्योंकि नौसेना पहले से इस प्लेटफॉर्म की क्षमता और उपयोगिता को देख चुकी है।
वहीं, इस नए समझौते के बाद भारतीय नौसेना के पास फिलहाल कुल चार लीज्ड एमक्यू-9बी सी गार्डियन ड्रोन होंगे। इससे नौसेना को अरब सागर और बंगाल की खाड़ी दोनों क्षेत्रों में एक साथ बेहतर निगरानी और मैरीटाइम डोमेन अवेयरनेस बनाए रखने में मदद मिलेगी। जहां तक पुराने दो ड्रोन की लीज समाप्त होने की बात है, तो उनकी लीज संभवतः 2027 के अंत या 2028 के आसपास समाप्त हो सकती है। इसके बाद पुराने ड्रोन धीरे-धीरे सेवा से बाहर होंगे और उनकी जगह खरीदे गए एमक्यू-9बी बेड़े ले लेंगे। (MQ-9B Sea Guardian Lease Deal)
क्या लीज डील खरीद से महंगी है?
1,943 करोड़ रुपये में केवल दो ड्रोन मिलने की वजह से कई लोगों को यह डील महंगी लग सकती है। लेकिन इसकी तुलना सीधे खरीद से करना सही नहीं होगा।
लीज और खरीद दो अलग मॉडल हैं।
लीज में केवल ड्रोन नहीं मिलता, बल्कि उसके साथ रखरखाव, स्पेयर पार्ट्स, तकनीकी सहायता, लॉजिस्टिक सपोर्ट और अन्य सेवाएं भी शामिल होती हैं। ड्रोन की ओनरशिप कंपनी के पास रहती है।
दूसरी तरफ खरीद में प्लेटफॉर्म स्थायी रूप से भारत के पास आता है, लेकिन उसके मेंटेनेंस और ऑपरेशन पर अलग खर्च करना पड़ता है। इसलिए दोनों की लागत की सीधी तुलना नहीं की जाती। (MQ-9B Sea Guardian Lease Deal)
2024 में हादसे का शिकार हो गया था ड्रोन
18 सितंबर 2024 को भारतीय नौसेना का एक लीज पर लिया गया एमक्यू-9बी सी गार्डियन ड्रोन चेन्नई के पास बंगाल की खाड़ी में दुर्घटनाग्रस्त हो गया था। यह ड्रोन तमिलनाडु के अरक्कोणम स्थित आईएनएस राजली एयर स्टेशन से नियमित समुद्री निगरानी मिशन पर उड़ान भर रहा था। मिशन के दौरान ड्रोन में तकनीकी खराबी आ गई। रिपोर्टों के अनुसार, पावर फेल्योर की समस्या पैदा हुई, जिसे उड़ान के दौरान रीसेट करने की कोशिश की गई, लेकिन सिस्टम सामान्य स्थिति में नहीं लौट सका। हादसे में ड्रोन पूरी तरह नष्ट हो गया और उसे सेवा से बाहर मानते हुए राइट-ऑफ कर दिया गया।
उस समय भारतीय नौसेना के पास लीज पर लिए गए दो सी गार्डियन ड्रोन थे, जिन्होंने मिलकर 18,000 घंटे से अधिक उड़ान पूरी कर ली थी। दुर्घटना के बाद भी नौसेना की निगरानी क्षमता पर लंबे समय तक असर नहीं पड़ा, क्योंकि लीज समझौते के तहत अमेरिकी कंपनी जनरल एटोमिक्स ने जल्द ही एक नया रिप्लेसमेंट ड्रोन उपलब्ध करा दिया। फरवरी 2025 तक यह प्रतिस्थापन ड्रोन भारतीय नौसेना को मिल गया, जिससे समुद्री निगरानी अभियानों की निरंतरता बनी रही।
समुद्री निगरानी में क्या बदलाव आएगा?
भारतीय नौसेना लंबे समय से पी-8आई पोसाइडन समुद्री गश्ती विमानों का इस्तेमाल कर रही है। ये बेहद सक्षम प्लेटफॉर्म हैं, लेकिन हर मिशन के लिए मानव चालक दल की जरूरत होती है।
एमक्यू-9बी सी गार्डियन लंबे समय तक हवा में रह सकता है और लगातार निगरानी कर सकता है। इससे नौसेना को विशाल समुद्री क्षेत्रों में लगातार इंटेलिजेंस, सर्विलांस और रिकॉनिसेंस (ISR) कवरेज मिलती है।
यह संदिग्ध जहाजों, पनडुब्बियों की गतिविधियों, समुद्री मार्गों और रणनीतिक क्षेत्रों पर लगातार नजर रख सकता है। (MQ-9B Sea Guardian Lease Deal)
रक्षा खरीद प्रक्रिया में लीज मॉडल का बढ़ता इस्तेमाल
भारत की डिफेंस एक्विजिशन प्रोसीजर 2020 में पहली बार सैन्य प्लेटफॉर्म लीज पर लेने का विकल्प शामिल किया गया था।
इसका उद्देश्य ऐसी स्थितियों में तुरंत क्षमता हासिल करना है, जहां किसी बड़े प्लेटफॉर्म की खरीद में कई साल लग सकते हैं।
एमक्यू-9बी सी गार्डियन इसका सबसे प्रमुख उदाहरण है। 2020 में पहली लीज और 2026 में नई लीज डील इसी नीति के तहत हुई है।
इस मॉडल से सेना को जरूरी क्षमता जल्दी मिल जाती है, जबकि स्थायी खरीद की प्रक्रिया समानांतर रूप से चलती रहती है। (MQ-9B Sea Guardian Lease Deal)
Author
हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।





