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Explainer: भारत-चीन ने क्यों चुने जोशीमठ और तवांग? LAC पर क्या होने वाला है बड़ा बदलाव?

India-China LAC Military Communication
India-China Expand LAC Military Communication with New Hotlines and Meeting Points at Joshimath and Tawang

India-China LAC Military Communication: भारत और चीन के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर तनाव कम करने और सैन्य स्तर पर बेहतर संवाद स्थापित करने के लिए 25 अगस्त को बीजिंग में हुई स्पेशल रिप्रेजेंटेटिव की बातचीत के बाद दोनों देशों ने सीमा प्रबंधन से जुड़े आठ बिंदुओं पर सहमति बनाई। इनमें सबसे महत्वपूर्ण फैसला पूर्वी और मध्य सेक्टर में दो नए मिलिट्री मीटिंग पॉइंटस और दो नई मिलिट्री हॉटलाइन स्थापित करने का है।

रिपोर्टों के अनुसार भारत की ओर से उत्तराखंड के जोशीमठ और अरुणाचल प्रदेश के तवांग को नया संपर्क केंद्र बनाया जा सकता है। हालांकि आधिकारिक संयुक्त बयान में इन शहरों का नाम नहीं लिया गया है, लेकिन रक्षा सूत्रों का कहना है कि इन्हीं स्थानों से नए मिलिट्री कम्युनिकेश सिस्टम को ऑपरेट किया जा सकता है।

India-China LAC Military Communication: 18 घंटे बाद आया संयुक्त बयान

25 अगस्त को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और चीन के विदेश मंत्री वांग यी के बीच बीजिंग में विशेष प्रतिनिधियों की 25वीं बैठक हुई थी। बैठक के बाद दोनों देशों ने अलग-अलग बयान जारी किए।

भारत ने कहा कि दोनों पक्षों ने द्विपक्षीय संबंधों की समीक्षा की और सहयोग बढ़ाने तथा स्थिरता बनाए रखने के तरीकों पर चर्चा की। वहीं चीन ने वार्ता को व्यापक, गहन, मैत्रीपूर्ण और स्पष्ट बताया तथा कहा कि भारत-चीन संबंधों का वैश्विक और रणनीतिक महत्व है।

इन अलग-अलग बयानों के कारण यह अटकलें लगने लगीं कि सीमा विवाद जैसे संवेदनशील मुद्दों पर सहमति बनाना आसान नहीं रहा। लेकिन लगभग 18 घंटे बाद 26 अगस्त को दोनों देशों ने एक समान आठ सूत्रीय संयुक्त सहमति जारी की। इसमें सीमा निर्धारण, सैन्य संवाद, सीमा व्यापार, कैलाश मानसरोवर यात्रा और सीमा पार नदियों पर सहयोग जैसे मुद्दे शामिल थे।

खास बात यह रही कि संयुक्त बयान की भाषा में दोनों देशों ने “तिब्बत” या “शिजांग” जैसे संवेदनशील शब्दों का इस्तेमाल नहीं किया।

इसके बजाय केवल “कैलाश-मानसरोवर यात्रा” और “तीन दर्रों के माध्यम से सीमा व्यापार” जैसे शब्दों का उल्लेख किया गया। यहां भी दोनों पक्षों ने पर्वत और झील के भारतीय तथा तिब्बती नामों कैलाश और गंग रिनपोछे, मानसरोवर और मापाम युम त्सो का इस्तेमाल किया।

“अर्ली एंड सब्स्टेंशियल हार्वेस्ट” का क्या है मतलब?

“अर्ली एंड सब्स्टेंशियल हार्वेस्ट” शब्द का इस्तेमाल पहली बार 2024 और 2025 में किया गया था। इसका मतलब सीमा विवाद के अंतिम समाधान से पहले कुछ क्षेत्रों में सीमा निर्धारण और मैपिंग के काम में प्रगति करना है।

यह प्रक्रिया 2005 के “पॉलिटिकल पैरामीटर्स एंड गाइडिंग प्रिंसिपल्स” समझौते के दायरे में की जा रही है। इसका उद्देश्य यह तय करना है कि वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) किन क्षेत्रों से गुजरती है, जबकि अंतिम सीमा समझौता बाद में किया जा सकता है।

एलएसी पर क्या नया फैसला हुआ

एलएसी यानी लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल भारत और चीन के बीच औपचारिक रूप से तय अंतरराष्ट्रीय सीमा नहीं है। भारत के अनुसार इसकी लंबाई लगभग 3,488 किलोमीटर है।

एलएसी को तीन हिस्सों में बांटा जाता है। पश्चिमी सेक्टर में लद्दाख आता है। मध्य सेक्टर में हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड शामिल हैं। पूर्वी सेक्टर में सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश आते हैं।

संयुक्त सहमति के अनुसार भारत और चीन ने पूर्वी और मध्य सेक्टर में दो अतिरिक्त सीनियर मिलिट्री मीटिंग सेंटर स्थापित करने पर सहमति जताई है। साथ ही दो नई सैन्य हॉटलाइन भी शुरू की जाएंगी।

अब तक प्रभावी मिलिट्री हॉटलाइन मुख्य रूप से पश्चिमी सेक्टर यानी लद्दाख क्षेत्र तक सीमित थी। नई व्यवस्था के बाद उत्तराखंड और अरुणाचल प्रदेश जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में भी वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों के बीच सीधा संपर्क संभव होगा।

इसका फायदा यह होगा कि किसी पेट्रोलिंग पार्टी के आमने-सामने आने, सीमा पर गलतफहमी पैदा होने या किसी स्थानीय तनाव की स्थिति में वरिष्ठ अधिकारी सीधे बातचीत कर सकेंगे। इससे घटनाओं की पुष्टि और स्थिति को नियंत्रित करने में कम समय लगेगा। (India-China LAC Military Communication)

क्यों चुना जा सकता है जोशीमठ

मध्य सेक्टर में जोशीमठ भारतीय सेना के लिए एक महत्वपूर्ण सैन्य और लॉजिस्टिक केंद्र है। मध्य सेक्टर आमतौर पर लद्दाख या अरुणाचल प्रदेश की तुलना में अपेक्षाकृत शांत माना जाता है, लेकिन बराहोटी जैसे क्षेत्रों में दोनों देशों के बीच अलग-अलग दावे और धारणाएं मौजूद हैं। उत्तराखंड में एलएसी के कई संवेदनशील क्षेत्रों तक पहुंच के लिए यही प्रमुख आधार माना जाता है।

इस क्षेत्र के सामने चीन की ओर जांदा काउंटी स्थित है। यह इलाका तिब्बत क्षेत्र के नगारी मिलिट्री सब-डिस्ट्रिक्ट में आता है।

चीनी सेना का स्ट्रक्चर देखें तो भारत के साथ पूरी एलएसी की सैन्य जिम्मेदारी वेस्टर्न थिएटर कमांड के पास है, जिसका मुख्यालय चेंगदू में स्थित है। इसके अधीन दो प्रमुख सैन्य जिले हैं, तिब्बत मिलिट्री डिस्ट्रिक्ट और शिनजियांग मिलिट्री डिस्ट्रिक्ट।

तिब्बत मिलिट्री डिस्ट्रिक्ट को आगे कई मिलिट्री सब-डिस्ट्रिक्ट में बांटा गया है। इनमें नगारी मिलिट्री सब-डिस्ट्रिक्ट मध्य सेक्टर की जिम्मेदारी संभालता है। इसी वजह से माना जा रहा है कि भारतीय इलाके में जोशीमठ और चीनी इलाके में जांदा क्षेत्र सैन्य बैठकों के केंद्र बन सकते हैं। (India-China LAC Military Communication)

संवेदनशील है तवांग सेक्टर

पूर्वी सेक्टर में तवांग सबसे संवेदनशील क्षेत्रों में गिना जाता है। भारत अरुणाचल प्रदेश को अपना अभिन्न हिस्सा मानता है, जबकि चीन राज्य के बड़े हिस्से पर दावा करता है और इसे तथाकथित “दक्षिण तिब्बत” कहता है।

तवांग के सामने चीन की ओर कुओना काउंटी स्थित है, जो तिब्बत मिलिट्री डिस्ट्रिक्ट के निंगची मिलिट्री सब-डिस्ट्रिक्ट के अधीन आती है।

यह क्षेत्र पहले भी कई बार तनाव का केंद्र रहा है। दिसंबर 2022 में तवांग के यांग्त्से इलाके में भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच झड़प हुई थी। ऐसे में वरिष्ठ स्तर की सीधी सैन्य संपर्क व्यवस्था किसी भी घटना के बाद तेजी से संवाद स्थापित करने में मदद कर सकती है। (India-China LAC Military Communication)

कैसे काम करता है चीन का मिलिट्री स्ट्रक्चर

भारत के सामने तैनात चीनी सेना की कमान वेस्टर्न थिएटर कमांड के पास है। इसके भीतर विभिन्न मिलिट्री सब-डिस्ट्रिक्ट काम करते हैं।

हर मिलिट्री सब-डिस्ट्रिक्ट का नेतृत्व आमतौर पर एक सीनियर कर्नल करता है। यह रैंक भारतीय सेना के ब्रिगेडियर के लगभग बराबर मानी जाती है। हालांकि पीएलए यानी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी में पद से अधिक संगठनात्मक ग्रेड को महत्व दिया जाता है।

गलवान संघर्ष के बाद हुई कई सैन्य बैठकों में चीनी पक्ष का नेतृत्व मेजर जनरल लियू लिन ने किया था। उस समय वे दक्षिणी शिनजियांग मिलिट्री रीजन के कमांडर थे। जबकि भारतीय पक्ष की ओर से लद्दाख स्थित 14 कोर के कमांडर इन बैठकों का नेतृत्व करते थे।

इसी अनुभव के आधार पर माना जा रहा है कि नए बैठक केंद्रों पर भारतीय पक्ष की ओर से डिवीजन कमांडर या ब्रिगेड कमांडर स्तर के अधिकारी शामिल हो सकते हैं। (India-China LAC Military Communication)

गलवान के बाद बदला बॉर्डर मैनेजमेंट का स्ट्रक्चर

15 जून 2020 को गलवान घाटी में भारत और चीन के सैनिकों के बीच हिंसक संघर्ष हुआ था। इस घटना में 20 भारतीय सैनिक शहीद हुए थे। इसके बाद सीमा पर कई सालों तक तनाव बना रहा।

गलवान संकट के दौरान यह महसूस किया गया कि एलएसी के विभिन्न सेक्टरों में स्थानीय संपर्क तो मौजूद हैं, लेकिन हर सेक्टर में वरिष्ठ स्तर की मजबूत संवाद व्यवस्था नहीं है।

इसी के चलते कोर कमांडर स्तर की वार्ताएं लंबे समय तक सीमा प्रबंधन का मुख्य माध्यम बनी रहीं। अब भारत और चीन उसी अनुभव को पूर्वी और मध्य सेक्टर तक आगे बढ़ा रहे हैं। (India-China LAC Military Communication)

सीमा विवाद का समाधान नहीं, लेकिन संवाद का नया माध्यम

विशेषज्ञों का कहना है कि नई हॉटलाइन और बैठक केंद्र किसी भी तरह से सीमा विवाद का समाधान नहीं हैं। एलएसी अभी भी दोनों देशों के बीच औपचारिक रूप से निर्धारित सीमा नहीं है और कई क्षेत्रों में दोनों की धारणाएं अलग-अलग हैं।

इसके बावजूद ऐसे कॉन्टैक्ट सिस्टम का महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि हिमालयी इलाकों में किसी भी छोटे सैन्य घटनाक्रम के राजनीतिक और रणनीतिक प्रभाव बड़े हो सकते हैं।

यदि किसी क्षेत्र में गश्ती दल आमने-सामने आते हैं या किसी गतिविधि को लेकर संदेह पैदा होता है, तो वरिष्ठ अधिकारी सीधे संपर्क करके स्थिति की जानकारी साझा कर सकते हैं। इससे गलतफहमी और गलत आकलन की संभावना कम होती है। (India-China LAC Military Communication)

सीमा वार्ता के साथ अन्य मुद्दों पर भी सहमति

भारत और चीन के बीच बनी आठ सूत्रीय सहमति में दोनों पक्षों ने सीमा निर्धारण से जुड़े विशेषज्ञ समूहों को आगे काम करने का निर्देश दिया है।

इसके अलावा कैलाश मानसरोवर यात्रा को सुविधाजनक बनाने, सीमा व्यापार को बढ़ावा देने और सीमा पार बहने वाली नदियों पर विशेषज्ञ स्तर की बैठक आयोजित करने पर भी सहमति बनी है।

दोनों देशों ने यह भी तय किया है कि विशेष प्रतिनिधियों की अगली यानी 26वीं बैठक भारत में वर्ष 2027 में आयोजित की जाएगी। (India-China LAC Military Communication)

पहले से मौजूद हैं कई मीटिंग पॉइंट्स

भारत और चीन के बीच पहले से पांच प्रमुख बॉर्डर पर्सनल मीटिंग (बीपीएम) केंद्र मौजूद हैं। इनमें लद्दाख के दौलत बेग ओल्डी और चुशूल, सिक्किम का नाथू ला तथा अरुणाचल प्रदेश के बुम ला और किबिथू शामिल हैं।

हालांकि बीपीएम केंद्रों पर होने वाली बैठकें और वरिष्ठ सैन्य कमांडरों की वार्ताएं अलग प्रकार की होती हैं। नए केंद्रों का उद्देश्य उच्च स्तर पर सैन्य संपर्क को मजबूत करना है। (India-China LAC Military Communication)

दक्षिण कोरिया ने शुरू कर दी 6वीं पीढ़ी के फाइटर जेट की तैयारी, MUM-T और ब्रॉडबैंड स्टील्थ से लैस होगा जेट, लेकिन इंजन क्यों है बड़ी चुनौती?

South Korea 6th Generation Fighter
South Korea Launches Study for 6th-Generation Fighter Jet as India Advances AMCA Program. (Image for representational Purpose only. AI-Generated Image)

South Korea 6th Generation Fighter: दुनिया में लड़ाकू विमानों की नई दौड़ शुरू हो चुकी है। जहां भारत अपने स्वदेशी एएमसीए (एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट) कार्यक्रम के जरिए 5वीं पीढ़ी का स्टील्थ फाइटर जेट विकसित कर रहा है, वहीं दक्षिण कोरिया अब सीधे 6वीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान बनाने की तैयारी कर रहा है। दक्षिण कोरिया की डिफेंस एक्विजिशन प्रोग्राम एडमिनिस्ट्रेशन (DAPA) ने हाल ही में 21 अगस्त “कोरियन नेक्स्ट जेनरेशन फाइटर” के लिए कॉन्सेप्चुअल स्टडी का टेंडर जारी किया है।

यह 14 महीने का स्टडी कार्यक्रम है, जिसका बजट 90 करोड़ कोरियाई वॉन यानी करीब 6 करोड़ रुपये रखा गया है। इस स्टडी का उद्देश्य भविष्य के लड़ाकू विमान का ऑपरेशनल कॉन्सेप्ट, डिजाइन, मिशन क्षमता और टेक्नोलॉजी रोडमैप तैयार करना है। दक्षिण कोरिया की वायुसेना और रक्षा उद्योग इसे देश की अगली बड़ी सैन्य परियोजना के रूप में देख रहे हैं।

South Korea 6th Generation Fighter: 6वीं पीढ़ी के फाइटर के लिए तय होंगी बुनियादी जरूरतें

डीएपीए की ओर से जारी दस्तावेजों के अनुसार इस स्टडी में यह तय किया जाएगा कि भविष्य का कोरियाई फाइटर जेट किन क्षमताओं से लैस होगा। इसमें मैनड-अनमैनड टीमिंग (एमयूएम-टी), आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ब्रॉडबैंड स्टील्थ और नई पीढ़ी के सेंसर सिस्टम पर विशेष जोर दिया गया है।

स्टडी के दौरान विमान की बेसलाइन कॉन्फिगरेशन, मिशन प्रभावशीलता, ऑपरेशनल आवश्यकताएं और तकनीकी विकास की अल्पकालिक, मध्यमकालिक और दीर्घकालिक योजना तैयार की जाएगी। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार प्रस्ताव जमा करने की अंतिम तिथि अक्टूबर 2026 के आसपास रखी गई है।

कैसा होगा दक्षिण कोरिया का नया फाइटर जेट

दक्षिण कोरिया की एजेंसी फॉर डिफेंस डेवलपमेंट (ADD) ने जुलाई 2026 में डेयजॉन में आयोजित एयरोस्पेस कॉन्फ्रेंस के दौरान 6वीं पीढ़ी के फाइटर का एक संभावित डिजाइन भी पेश किया था।

इस डिजाइन की सबसे बड़ी खासियत यह है कि विमान पूरी तरह टेललेस स्टील्थ डिजाइन पर आधारित है। इसमें न तो पारंपरिक वर्टिकल टेल दिखाई देती है और न ही हॉरिजॉन्टल टेल। विमान में डबल डेल्टा विंग और कैनार्ड कॉन्फिगरेशन का उपयोग किया गया है। फ्यूजलेज और विंग्स को इस तरह जोड़ा गया है कि रडार पर इसकी पहचान बेहद कठिन हो जाए।

विमान की लंबाई लगभग 16 मीटर और विंगस्पैन करीब 11 मीटर होगा। इसके नीचे तीन इंटरनल वेपन बे दिखाई देते हैं। बीच वाले बे में चार एमबीडीए मेटेओर मिसाइल और दोनों साइड बे में एक-एक आईरिस-टी मिसाइल रखी जा सकती है।

South Korea 6th Generation Fighter
Concept model of South Korea 6th Generation Fighter

ब्रॉडबैंड स्टील्थ पर सबसे ज्यादा जोर

अब तक अधिकांश स्टील्थ फाइटर मुख्य रूप से एक्स-बैंड रडार से बचने के लिए डिजाइन किए जाते रहे हैं। लेकिन दक्षिण कोरिया के नए कॉन्सैप्टे में एल-बैंड, एस-बैंड और एक्स-बैंड जैसे कई रडार स्पेक्ट्रम से बचाव की क्षमता पर जोर दिया गया है।

इसे ब्रॉडबैंड स्टील्थ कहा जाता है। इसका उद्देश्य केवल एक प्रकार के रडार से नहीं बल्कि विभिन्न प्रकार की निगरानी प्रणालियों से विमान की पहचान को कठिन बनाना है। (South Korea 6th Generation Fighter)

AI और ड्रोन के साथ मिलकर करेगा मिशन

दक्षिण कोरिया के स्टडी में मैनड-अनमैनड टीमिंग को मुख्य जरूरत के तौर पर शामिल किया गया है। इसका मतलब है कि भविष्य का फाइटर जेट केवल अकेले मिशन नहीं उड़ाएगा, बल्कि उसके साथ कई अनमैनड कॉम्बैट एयरक्राफ्ट और ड्रोन भी काम करेंगे।

पायलट मुख्य विमान में रहेगा जबकि एआई आधारित सिस्टम कई ड्रोन को कंट्रोल करने में सहायता करेंगे। इससे युद्ध क्षेत्र में निगरानी, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर और वेपन ऑपरेशन की क्षमता बढ़ सकती है। (South Korea 6th Generation Fighter)

इंजन बना सबसे बड़ी चुनौती

दक्षिण कोरिया ने 2026 में अपने केएफ-21 बोरामे लड़ाकू विमान का सिस्टम डेवलपमेंट पूरा कर लिया है और इसके शुरुआती ब्लॉक-1 विमान अब दक्षिण कोरियाई वायुसेना में शामिल होने लगे हैं। केएफ-21 को 4.5 पीढ़ी का लड़ाकू विमान माना जाता है। यह दो जीई एफ414 इंजनों की ताकत से उड़ान भरता है। फिलहाल इसमें हथियार विमान के बाहरी पाइलन पर लगाए जाते हैं, इसलिए इसे पूरी तरह स्टील्थ फाइटर नहीं माना जाता।

दक्षिण कोरिया की सबसे बड़ी तकनीकी चुनौती इंजन तकनीक को माना जा रहा है। डीएपीए ने अपने स्टडी में ऐसे दो अडैप्टिव-साइकिल इंजन की मांग रखी है जो सुपरसोनिक क्रूज क्षमता प्रदान कर सकें। अडैप्टिव-साइकिल इंजन उड़ान के दौरान वे जरूरत पड़ने पर वे अधिक थ्रस्ट और दूसरी स्थिति में बेहतर ईंधन दक्षता उपलब्ध कराते हैं। हालांकि यह तकनीक दुनिया के चुनिंदा देशों के पास ही है।

दक्षिण कोरिया ने अपने 6वीं पीढ़ी के फाइटर के लिए एफ-414 का नाम नहीं लिखा है, लेकिन एडीडी के दिखाए गए कॉन्सेप्ट मॉडल के साइज और इंजन सेक्शन देखकर कई रक्षा विश्लेषकों का मानना है कि शुरुआती वर्जन में एफ-414 इंजन लगाया जा सकता है।

वैसे तो दक्षिण कोरिया फिलहाल केटीएफ-16000 इंजन डेवलप कर रहा है। यह इंजन केएफ-21 कार्यक्रम के लिए बनाया जा रहा है। इसकी अनुमानित क्षमता 16,000 पाउंड ड्राई थ्रस्ट और 24,000 पाउंड आफ्टरबर्नर थ्रस्ट की है।

रिपोर्टों के अनुसार केवल केटीएफ-16000 के आधार पर 6वीं पीढ़ी के विमान की सभी जरूरतों को पूरा करना आसान नहीं होगा। इसी वजह से इंजन कार्यक्रम को पूरे प्रोजेक्ट की सबसे कठिन कड़ी माना जा रहा है।

केएफ-21 से मिले अनुभव का होगा इस्तेमाल

दक्षिण कोरिया का मौजूदा केएफ-21 बोरामे कार्यक्रम भविष्य की इस परियोजना की नींव माना जा रहा है।

केएफ-21 एक 4.5 पीढ़ी का ट्विन इंजन लड़ाकू विमान है जिसने 2026 में अपना सिस्टम डेवलपमेंट चरण पूरा किया। शुरुआती ब्लॉक-1 संस्करण मुख्य रूप से एयर-टू-एयर मिशन के लिए तैयार किया गया है।

आने वाले वर्षों में ब्लॉक-2 और ब्लॉक-3 संस्करणों में ग्राउंड अटैक क्षमता, बेहतर स्टील्थ, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मैनड-अनमैनड टीमिंग जैसी तकनीकें जोड़ी जाएंगी।

दक्षिण कोरिया की कंपनियां केएफ-21 को 5.5 पीढ़ी के फाइटर में बदलने की संभावनाओं पर भी काम कर रही हैं। इसी अनुभव का उपयोग अगली पीढ़ी के लड़ाकू विमान में किया जाएगा। (South Korea 6th Generation Fighter)

कई बड़ी कंपनियां दौड़ में शामिल

इस स्टडी कार्यक्रम के लिए दक्षिण कोरिया की प्रमुख रक्षा कंपनियां दौड़ में हैं। एजेंसी फॉर डिफेंस डेवलपमेंट , कोरिया एयरोस्पेस इंडस्ट्रीज और कोरियन एयर को प्रमुख दावेदार माना जा रहा है। डीएपीए ने संयुक्त बोली की भी अनुमति दी है ताकि कई संस्थान मिलकर प्रस्ताव दे सकें।

इसके अलावा एलआईजी नेक्स1 जैसी कंपनियां इंटरनल वेपन बे और लो-ऑब्जर्वेबल टेक्नोलॉजी पर अलग से काम कर रही हैं। (South Korea 6th Generation Fighter)

दुनिया में तेज हो रही अगली पीढ़ी के फाइटरों की दौड़

दक्षिण कोरिया ऐसे समय में यह स्टडी शुरू कर रहा है जब दुनिया की कई बड़ी शक्तियां नई पीढ़ी के लड़ाकू विमानों पर काम कर रही हैं।

अमेरिका का एफ-47 कार्यक्रम, चीन के जे-36 और जे-50 प्लेटफॉर्म तथा जीकैप जैसे प्रोजेक्ट पहले से चर्चा में हैं। चीन के कुछ नए विमान उड़ान परीक्षण चरण तक पहुंच चुके हैं, जबकि अमेरिका का एफ-47 कार्यक्रम भी तेजी से आगे बढ़ रहा है। (South Korea 6th Generation Fighter)

डोकलाम-गलवान के मास्टरमाइंड जनरल झाओ जोंगकी पर चीन में गिरी गाज, शी जिनपिंग के भ्रष्टाचार अभियान में हुई कार्रवाई, सदस्यता रद्द

Zhao Zongqi Corruption Probe
China Removes Former PLA Commander Zhao Zongqi, Key Figure Behind Doklam and Galwan Standoffs, Amid Corruption Probe

Zhao Zongqi Corruption Probe: भारत के साथ 2017 के डोकलाम गतिरोध और 2020 के गलवान घाटी संघर्ष के दौरान चीन की पश्चिमी थिएटर कमांड का नेतृत्व करने वाले पूर्व पीएलए जनरल झाओ जोंगकी पर चीन में बड़ी कार्रवाई हुई है। चीन की शीर्ष राजनीतिक सलाहकार संस्था चीनी पीपुल्स पॉलिटिकल कंसल्टेटिव कॉन्फ्रेंस (सीपीपीसीसी) ने 26 अगस्त को उनकी सदस्यता समाप्त कर दी। इसके साथ ही उन्हें सीपीपीसीसी की स्थायी समिति और जातीय एवं धार्मिक मामलों की समिति के उप निदेशक पद से भी हटा दिया गया।

हॉन्गकॉन्ग के अखबार मिंग पाओ और अन्य मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, झाओ जोंगकी चीन की सेना में चल रहे भ्रष्टाचार विरोधी अभियान की चपेट में आ गए हैं। वहीं यह भी दावा किया गया है कि उन्हें जांच के तहत हिरासत में लिया गया है। हालांकि चीन सरकार ने उनकी गिरफ्तारी या जेल भेजे जाने की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है।

यह कार्रवाई ऐसे समय में सामने आई है जब राष्ट्रपति शी जिनपिंग के नेतृत्व में पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) के भीतर बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार विरोधी अभियान चल रहा है और कई वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों को पदों से हटाया जा चुका है।

Zhao Zongqi Corruption Probe: भारत-चीन सीमा विवाद से जुड़ा बड़ा नाम

जनरल झाओ जोंगकी का नाम भारत-चीन सीमा पर हुई दो महत्वपूर्ण घटनाओं से जुड़ा रहा है। साल 2017 में भूटान के डोकलाम क्षेत्र में भारत और चीन की सेनाओं के बीच 73 दिन तक फेसऑफ चला था। उस समय झाओ पश्चिमी थिएटर कमांड के प्रमुख थे।

इसके बाद साल 2020 में पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी में भारत और चीन के सैनिकों के बीच हिंसक झड़प हुई थी। 15 जून 2020 की रात हुए संघर्ष में भारतीय सेना के 20 जवान शहीद हुए थे। यह 1962 के युद्ध के बाद दोनों देशों के बीच सबसे गंभीर सैन्य टकरावों में से एक माना जाता है।

उस समय यह दावा किया गया था कि सीमा पर आक्रामक रुख अपनाने के पीछे झाओ की महत्वपूर्ण भूमिका थी। हालांकि चीन ने इन दावों पर कभी सार्वजनिक टिप्पणी नहीं की।

झाओ का भारत के प्रति बेहद सख्त रुख

अमेरिकी खुफिया आकलन और यूएस न्यूज एंड वर्ल्ड रिपोर्ट में प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार, उस समय पश्चिमी थिएटर कमांड के प्रमुख रहे जनरल झाओ जोंगकी को इस कार्रवाई का प्रमुख योजनाकार माना गया था। रिपोर्ट में अमेरिकी सूत्रों के हवाले से कहा गया था कि झाओ भारत के प्रति बेहद सख्त रुख रखते थे और सीमा पर चीन की स्थिति को कमजोर दिखाने के पक्ष में नहीं थे। इसी कारण उन्होंने आक्रामक रणनीति अपनाने का समर्थन किया था।

गलवान संघर्ष के बाद भारत-चीन संबंधों में तनाव लंबे समय तक बना रहा। दोनों देशों के बीच सैन्य और राजनयिक स्तर पर कई दौर की बातचीत हुई। कुछ क्षेत्रों में दोनों सेनाओं ने चरणबद्ध तरीके से पीछे हटने की प्रक्रिया पूरी की, लेकिन वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के कई संवेदनशील इलाकों में आज भी बफर जोन मौजूद हैं।

सीमा पर तनाव कम करने के लिए कोर कमांडर स्तर की कई बैठकें आयोजित की गईं, जबकि दोनों देशों ने सैन्य तैनाती और बुनियादी ढांचे को भी मजबूत किया। (Zhao Zongqi Corruption Probe)

झाओ जोंगकी पर क्या हैं आरोप

जनरल झाओ जोंगकी को हटाए जाने के बाद चीन सरकार ने उनके खिलाफ किसी विशिष्ट मामले या आरोप का सार्वजनिक रूप से खुलासा नहीं किया है। 26 अगस्त 2026 को चीनी जन राजनीतिक सलाहकार सम्मेलन (सीपीपीसीसी) ने केवल इतना घोषित किया कि झाओ को उसकी सदस्यता, स्थायी समिति की सदस्यता और जातीय एवं धार्मिक मामलों की समिति के उप निदेशक पद से हटा दिया गया है।

हालांकि, हॉन्गकॉन्ग के अखबार मिंग पाओ की रिपोर्ट में दावा किया गया कि चीन में आमतौर पर जब किसी वरिष्ठ सैन्य अधिकारी पर गंभीर अनुशासनात्मक या भ्रष्टाचार संबंधी जांच शुरू होती है, तो सबसे पहले उसके राजनीतिक और सार्वजनिक पद वापस लिए जाते हैं। इसके बाद आंतरिक जांच आगे बढ़ाई जाती है और विस्तृत आरोप बाद में सामने आते हैं।

शी जिनपिंग के भ्रष्टाचार विरोधी अभियान में जिन बड़े सैन्य अधिकारियों पर कार्रवाई हुई है, उन पर आमतौर पर सेना के ठेकों और हथियार खरीद में गड़बड़ी करने, रिश्वत लेने, अपने पद का इस्तेमाल कर परिवार या करीबी लोगों को फायदा पहुंचाने और पार्टी के प्रति पूरी निष्ठा नहीं दिखाने जैसे आरोप लगाए जाते हैं। (Zhao Zongqi Corruption Probe)

साधारण परिवार से सेना के शीर्ष पद तक का सफर

झाओ जोंगकी का जन्म अप्रैल 1955 में चीन के हेइलोंगजियांग प्रांत के बिन काउंटी में हुआ था। उन्होंने 1970 में केवल 15 वर्ष की आयु में पीएलए ज्वॉइन की थी।

सैन्य करियर की शुरुआत उन्होंने यूनान क्षेत्र की 14वीं सेना से की। बाद में वे टोही इकाइयों में शामिल हुए और 1979 के चीन-वियतनाम युद्ध के दौरान सीमा क्षेत्रों में ऑपरेशन का हिस्सा रहे।

1985 में, दस लाख सैनिकों की कटौती के दौरान, 11वीं और 14वीं सेनाओं के मुख्यालयों का विलय करके 14वीं समूह सेना बनाई गई, और उन्हें 14वीं समूह सेना की 40वीं डिवीजन की 118वीं रेजिमेंट का कमांडर नियुक्त किया गया। 1987 में, वे सैन्य सलाहकार समूह के प्रमुख के रूप में सेवा देने के लिए जैरे गए, और चीन लौटने के बाद, उन्होंने 40वीं डिवीजन के डिप्टी चीफ ऑफ स्टाफ के तौर पर काम किया।

1990 के दशक में उन्होंने तिब्बत सैन्य क्षेत्र में लंबे समय तक काम किया। ऊंचाई वाले इलाकों में ऑपरेशन और सीमा सुरक्षा से जुड़े अनुभव के कारण उन्हें धीरे-धीरे महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां मिलती गईं।

1992 में उन्हें 52वीं माउंटेन इन्फैंट्री ब्रिगेड का कमांडर बनाया गया। इसके बाद वे तिब्बत सैन्य क्षेत्र में चीफ ऑफ स्टाफ और फिर वरिष्ठ पदों पर पहुंचे। 2001 में उन्हें मेजर जनरल का रैंक मिला। (Zhao Zongqi Corruption Probe)

पश्चिमी थिएटर कमांड के पहले कमांडर बने

चीन ने 2016 में अपनी सेना का व्यापक पुनर्गठन किया और सात सैन्य क्षेत्रों की जगह पांच थिएटर कमांड बनाए गए। उसी दौरान झाओ जोंगकी को पश्चिमी थिएटर कमांड का पहला कमांडर नियुक्त किया गया।

पश्चिमी थिएटर कमांड चीन की सबसे बड़ी सैन्य कमांड मानी जाती है। इसके जिम्मे तिब्बत, शिनजियांग, भारत सीमा, पाकिस्तान सीमा और मध्य एशिया से जुड़े क्षेत्र आते हैं।

भारत के साथ पूरी वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) इसी कमांड के अधिकार क्षेत्र में आती है। इस वजह से झाओ चीन के सबसे प्रभावशाली सैन्य अधिकारियों में गिने जाते थे।

2015 में उन्हें पूर्ण जनरल रैंक प्रदान किया गया था, जो पीएलए में सर्वोच्च सक्रिय सैन्य रैंकों में से एक है।

जनरल झाओ जोंगकी को पश्चिमी थिएटर कमांड की पहचान के रूप में भी देखा जाता था। उन्होंने इस कमांड का युद्ध गीत भी लिखा था, जिसमें सीमा की रक्षा, सैनिकों के कर्तव्य और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के प्रति वफादारी जैसे विषयों को प्रमुखता दी गई थी। (Zhao Zongqi Corruption Probe)

रिटायरमेंट के बाद भी मिला था अहम पद

दिसंबर 2020 में आयु सीमा पूरी होने के बाद झाओ पश्चिमी थिएटर कमांड से सेवानिवृत्त हुए। इसके बाद उन्हें राष्ट्रीय पीपुल्स कांग्रेस और फिर सीपीपीसीसी में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दी गईं।

2023 में उन्हें सीपीपीसीसी की स्थायी समिति का सदस्य तथा जातीय एवं धार्मिक मामलों की समिति का उप निदेशक बनाया गया था। यह पद आमतौर पर चीन के वरिष्ठ और प्रभावशाली सेवानिवृत्त अधिकारियों को दिया जाता है।

लेकिन साल 2026 की शुरुआत से उनकी सार्वजनिक गतिविधियां कम होने लगीं। मार्च 2026 में सीपीपीसीसी की बैठकों में उनकी गैरमौजूदगी ने अटकलों को जन्म दिया। अगस्त 2026 में उनकी सदस्यता समाप्त किए जाने के साथ इन अटकलों को और बल मिला।

चीन में ऐसे मामलों में अधिकारियों को अक्सर “लियूझी” यानी पार्टी की आंतरिक हिरासत प्रणाली में रखा जाता है। यह व्यवस्था गुप्त होती है। उन्हें गुप्त जेल में भेजे जाने की बात कही गई है। हालांकि चीन सरकार ने अभी तक आधिकारिक तौर पर जेल भेजने की पुष्टि नहीं की है। (Zhao Zongqi Corruption Probe)

शी जिनपिंग के भ्रष्टाचार विरोधी अभियान का असर

राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने 2012 में सत्ता संभालने के बाद सेना में भ्रष्टाचार के खिलाफ व्यापक अभियान शुरू किया था। पिछले कुछ वर्षों में यह अभियान और तेज हुआ है।

रॉकेट फोर्स, स्ट्रैटेजिक सपोर्ट फोर्स, हथियार खरीद एजेंसियों और केंद्रीय सैन्य आयोग से जुड़े कई वरिष्ठ अधिकारी जांच के दायरे में आए हैं। 28 अगस्त 2026 को चीन की सरकारी समाचार एजेंसी शिन्हुआ ने बताया कि दो पूर्व रक्षा मंत्री और केंद्रीय सैन्य आयोग के उपाध्यक्ष तक इस अभियान में फंस चुके हैं। कुछ को मौत की सजा या आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई है। (Zhao Zongqi Corruption Probe)

J-10CE पर फंसा पाकिस्तान! पेमेंट विवाद के बीच चीन ने रोकी अगली डिलीवरी, बांग्लादेश खरीदने को तैयार

J-10CE Fighter Jet
China Halts Delivery of 16 J-10CE Fighter Jets to Pakistan? Payment Crisis, PAF Modernisation and Bangladesh Interest explained. (Image for representational Purpose only. AI-Generated Image)

J-10CE Fighter Jet: बांग्लादेश चीन के जे-10सीई मल्टीरोल लड़ाकू विमान खरीदने की तैयारी कर रहा है। 25 अगस्त को प्रधानमंत्री तारिक रहमान के सलाहकार जाहेद उर रहमान ने बताया कि जे-10सीई फाइटर जेट और अटैक हेलीकॉप्टर की खरीद के लिए ड्राफ्ट समझौता तैयार कर लिया गया है और अब औपचारिक बातचीत शुरू होने वाली है। वहीं, पाकिस्तान वायु सेना के लिए चीन से आने वाले जे-10सीई लड़ाकू विमानों को लेकर बुरी खबर सामने आई हैं। कहा जा रहा है कि भुगतान में देरी के कारण चीन ने पाकिस्तान के लिए 16 अतिरिक्त जे-10सीई लड़ाकू विमानों की डिलीवरी फिलहाल रोक दी है।

हालांकि इस संबंध में चीन या पाकिस्तान की ओर से कोई विस्तृत आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है, लेकिन विभिन्न रिपोर्ट्स में कहा गया है कि यह कदम अनुबंध की भुगतान शर्तों से जुड़ा हुआ है। पहले से पाकिस्तान को मिल चुके 20 जे-10सीई विमानों पर इसका कोई असर नहीं पड़ा है और वे पाकिस्तान वायु सेना में सक्रिय सेवा में बने हुए हैं।

J-10CE Fighter Jet: क्या है पूरा मामला?

पाकिस्तान ने चीन से कुल 36 जे-10सीई लड़ाकू विमान खरीदने का समझौता किया था। इस पैकेज में लगभग 250 पीएल-15ई लंबी दूरी की एयर-टू-एयर मिसाइलें भी शामिल थीं।

पहले चरण में 20 विमान पाकिस्तान को सौंपे जा चुके हैं। इन विमानों की डिलीवरी वर्ष 2022 से शुरू हुई थी। अब बाकी 16 विमानों की सप्लाई पेमेंट पूरी होने के बाद की जानी थी। रिपोर्ट्स के अनुसार पेमेंट में रुकावट आने के चलते डिलीवरी आगे नहीं बढ़ पाई है।

बताया जा रहा है कि शुरुआती बैच को फाइनेंस मुख्य रूप से चीनी वित्तीय संस्थानों से मिले लोन के जरिए किया गया था। जबकि अगले बैच की डिलीवरी से पहले एडवांस पेमेंट कॉन्ट्रैक्ट की अनिवार्य शर्त थी।

पांडा बॉन्ड से भी नहीं सुधरे हालात

पाकिस्तान पिछले कई सालों से गंभीर आर्थिक संकट का सामना कर रहा है। साल 2021 से 2024 के बीच देश विदेशी मुद्रा संकट, बढ़ते कर्ज और आयात भुगतान की समस्याओं से जूझता रहा।

साल 2024 में स्थिति इतनी गंभीर हो गई थी कि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के लगभग 7 अरब डॉलर के सहायता कार्यक्रम ने अर्थव्यवस्था को टिकाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

इसके बावजूद विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बना हुआ है। पाकिस्तान ने चीनी बॉन्ड बाजार में पांडा बॉन्ड जारी कर पूंजी जुटाने की भी कोशिश की, लेकिन रक्षा खरीद जैसे बड़े कार्यक्रमों के लिए लगातार वित्तीय संसाधनों की जरूरत बनी हुई है।

पांडा बॉन्ड ऐसे बॉन्ड होते हैं जिन्हें कोई विदेशी सरकार, विदेशी कंपनी या अंतरराष्ट्रीय संस्था चीन के घरेलू वित्तीय बाजार में जारी करती है और जिनमें निवेशकों से पैसा चीनी मुद्रा रेनमिन्बी (युआन) में जुटाया जाता है। (J-10CE Fighter Jet)

लाइफ-साइकिल सपोर्ट का खर्च बड़ी टेंशन

दरअसल आधुनिक लड़ाकू विमान में केवल एयरफ्रेम खरीदना काफी नहीं होता। बल्कि असली खर्च उसके पूरे लाइफ-साइकिल सपोर्ट पर होता है।

जे-10सीई जैसे आधुनिक फाइटर जेट के साथ इंजन मेंटेनेंस, एईएसए रडार के स्पेयर पार्ट्स, मिसाइल सपोर्ट, ग्राउंड इक्विपमेंट, सॉफ्टवेयर अपडेट, पायलट ट्रेनिंग, सिम्युलेटर, तकनीकी सहायता और लॉजिस्टिक नेटवर्क भी जरूरी होते हैं।

इसलिए आधुनिक फाइटर खरीदना वास्तव में एक पूरा वेपन सिस्टम खरीदने जैसा होता है। कई मामलों में ऑपरेशन और मेंटेनेंस की लागत विमान की मूल कीमत से भी अधिक हो सकती है। (J-10CE Fighter Jet)

पाकिस्तान वायु सेना के लिए क्यों महत्वपूर्ण है J-10CE?

जे-10सीई चीन के चेंगदू जे-10 लड़ाकू विमान का निर्यात संस्करण है। इसे चौथी पीढ़ी के एडवांस मल्टीरोल लड़ाकू विमान के तौर पर देखा जाता है।

इसमें एक्टिव इलेक्ट्रॉनिकली स्कैन्ड एरे (एईएसए) रडार लगाया गया है। यह लंबी दूरी की पीएल-15ई एयर-टू-एयर मिसाइल दाग सकता है। इसके अलावा इसमें आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम और एडवांस सेंसर भी शामिल हैं।

पाकिस्तान ने इन विमानों को अपनी वायु सेना की आधुनिक युद्ध क्षमता बढ़ाने के उद्देश्य से शामिल किया था। मई 2025 के भारत-पाकिस्तान सीमा तनाव के दौरान भी इन विमानों का इस्तेमाल किया गया था।

रिपोर्ट्स के अनुसार उस समय चीन की एविएशन इंडस्ट्री कॉरपोरेशन (एवीआईसी) के इंजीनियर तकनीकी सहायता के लिए पाकिस्तान में मौजूद थे। (J-10CE Fighter Jet)

पाकिस्तान की वायु सेना पर बढ़ रहा है वित्तीय दबाव

जे-10सीई कार्यक्रम के अलावा पाकिस्तान वायु सेना कई अन्य बड़े आधुनिकीकरण कार्यक्रम भी चला रही है।

पीएएफ के पास लगभग 150 जेएफ-17 लड़ाकू विमानों का बेड़ा है, जिनके लगातार अपग्रेड और रखरखाव की आवश्यकता होती है। इसके अलावा 75 से 85 एफ-16 विमान भी सेवा में हैं। इन अमेरिकी विमानों के लिए विदेशी मेंटेनेंस कॉन्ट्रैक्ट पर हर साल बड़ी राशि खर्च होती है।

साथ ही एयरबोर्न अर्ली वार्निंग एयरक्राफ्ट, एयर डिफेंस सिस्टम, हेलीकॉप्टर, ट्रांसपोर्ट विमान और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर प्लेटफॉर्म भी रक्षा बजट का बड़ा हिस्सा लेते हैं।

ऐसी स्थिति में नए लड़ाकू विमान कार्यक्रमों के लिए अतिरिक्त वित्त जुटाना आसान नहीं माना जा रहा है। (J-10CE Fighter Jet)

जे-35 स्टील्थ फाइटर प्रोग्राम भी चर्चा में

जे-10सीई के साथ-साथ पाकिस्तान चीन के जे-35ए स्टील्थ फाइटर कार्यक्रम को भी आगे बढ़ा रहा है।

मई 2026 में रिपोर्ट्स सामने आई थीं कि पाकिस्तान वायु सेना ने जे-35 कार्यक्रम पर प्रारंभिक सहयोग समझौते की पुष्टि की है। पाकिस्तान वायु सेना के उप प्रमुख तारिक गाजी ने भी आधुनिकीकरण कार्यक्रम के दौरान जे-10 सीरीज की खरीद, जेएफ-17 अपग्रेड और अगली पीढ़ी के लड़ाकू विमान शामिल करने की बात कही थी।

रिपोर्ट्स में यह भी दावा किया गया कि पाकिस्तान भविष्य में लगभग 40 जे-35ए लड़ाकू विमान खरीदने पर विचार कर रहा है। हालांकि इस पूरे कार्यक्रम की आधिकारिक पुष्टि अभी सीमित स्तर पर ही उपलब्ध है। (J-10CE Fighter Jet)

जे-35 सौदे में और क्या शामिल बताया जा रहा है?

कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया है कि प्रस्तावित पैकेज में केवल स्टील्थ फाइटर ही नहीं बल्कि केजे-500 अर्ली वार्निंग एयरक्राफ्ट और एचक्यू-19 मिसाइल डिफेंस सिस्टम जैसे प्लेटफॉर्म भी शामिल हो सकते हैं।

इसके अलावा पायलट प्रशिक्षण, स्पेयर पार्ट्स, सिम्युलेटर, बेस इंफ्रास्ट्रक्चर और तकनीकी सहायता जैसी सेवाओं का भी जिक्र किया गया है। (J-10CE Fighter Jet)

बांग्लादेश भी बन सकता है जे-10सीई का अगला विदेशी ग्राहक

पाकिस्तान के बाद अब बांग्लादेश भी चीनी जे-10सीई लड़ाकू विमान खरीदने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। 25 अगस्त 2026 को प्रधानमंत्री तारिक रहमान के सलाहकार जाहेद उर रहमान ने बताया कि सरकार की एक समिति ने जे-10सीई मल्टीरोल फाइटर जेट और अटैक हेलीकॉप्टर खरीदने के लिए ड्राफ्ट समझौता तैयार कर लिया है। इसके बाद औपचारिक बातचीत शुरू होने की तैयारी है।

बांग्लादेश वायु सेना अपने पुराने एफ-7 लड़ाकू विमानों को बदलना चाहती है। एफ-7 को मिग-21 के चीनी वर्जन के रूप में जाना जाता है और ये विमान लंबे समय से सेवा में हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार ढाका 20 से 24 जे-10सीई विमान खरीदने पर विचार कर रहा है।

पहले सामने आए अनुमानों के मुताबिक पूरे पैकेज की लागत लगभग 2.2 अरब डॉलर हो सकती है। इसमें केवल विमान ही नहीं, बल्कि पायलट प्रशिक्षण, स्पेयर पार्ट्स, तकनीकी सहायता और रखरखाव सुविधाएं भी शामिल हैं। यदि चालू वित्तीय वर्ष में फंड की मंजूरी मिल जाती है तो खरीद प्रक्रिया जल्द शुरू हो सकती है। (J-10CE Fighter Jet)

पाकिस्तान को लॉन्ग-रेंज स्ट्राइक ड्रोन की पेशकश कर रही है यूक्रेन की डिफेंस कंपनी, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर का भी दिया ऑफर

Fire Point Pakistan Drone Deal
Ukraine’s Fire Point Offers Long-Range FP-1 and FP-2 Strike Drones to Pakistan Amid Technology Transfer Talks

Fire Point Pakistan Drone Deal: यूक्रेन की डिफेंस कंपनी फायर पॉइंट ने पाकिस्तान की प्राइवेट डिफेंस कंपनियों को अपने लॉन्ग-रेंज लॉइटरिंग म्यूनिशन यानी वन-वे अटैक ड्रोन की पेशकश की है। कंपनी तकनीक और उत्पादों के आदान-प्रदान के साथ-साथ अपने रक्षा सिस्टम को पाकिस्तान की सेना तक पहुंचाने की कोशिश कर रही है। हालांकि अभी तक किसी बड़े रक्षा सौदे या बड़े पैमाने पर डिलीवरी की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

Fire Point Pakistan Drone Deal: मिसाइल और ड्रोन बनाती है फायर पॉइंट

फायर पॉइंट की स्थापना वर्ष 2022 में यूक्रेन की राजधानी कीव में हुई थी। रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान यह कंपनी तेजी से उभरी और कम लागत वाले लॉन्ग-रेंज स्ट्राइक सिस्टम विकसित करने के लिए जानी जाने लगी।

कंपनी सिर्फ लॉइटरिंग म्यूनिशन ही नहीं बनाती, बल्कि गाइडेड सरफेस-टू-सरफेस मिसाइल और टैक्टिकल बैलिस्टिक मिसाइलों पर भी काम कर रही है। कंपनी की एफपी-7 मिसाइल की रेंज लगभग 200 किलोमीटर बताई जाती है, जबकि विकासाधीन एफपी-9 मिसाइल की रेंज करीब 855 किलोमीटर हो सकती है। इसके अलावा कंपनी एफपी-7.एक्स फ्रेया नामक बैलिस्टिक मिसाइल इंटरसेप्टर पर भी काम कर रही है।

एफपी-5 फ्लेमिंगो को एल-39 ट्रेनर विमान के एआई-25टीएल टर्बोफैन इंजन के आधार पर डेवलप किया गया है। कंपनी के अनुसार इसकी मारक दूरी लगभग 3,000 किलोमीटर तक हो सकती है। कंपनी के अनुसार इसकी कीमत लगभग 6 लाख डॉलर तक हो सकती है, जो अमेरिकी टॉमहॉक क्रूज मिसाइल की तुलना में काफी कम है। वहीं एफपी-7 टैक्टिकल बैलिस्टिक मिसाइल की रेंज करीब 200 किलोमीटर बताई जाती है।

पाकिस्तान को कौन से ड्रोन का किया ऑफर

फायर पॉइंट पाकिस्तान में मुख्य रूप से दो सिस्टम को प्रमोट कर रही है। इनमें एफपी-1 डीप स्ट्राइक और एफपी-2 फ्रंट स्ट्राइक शामिल हैं।

एफपी-1 डीप स्ट्राइक एक लॉन्ग-रेंज लॉइटरिंग म्यूनिशन है। इसकी रेंज 1,600 से 2,600 किलोमीटर तक बताई जाती है। कुछ नए वर्जन में 3,400 किलोमीटर तक की क्षमता का दावा भी किया गया है। यह लगभग 60 किलोग्राम का वारहेड ले जा सकता है और सात घंटे तक हवा में रह सकता है।

इस ड्रोन को यूक्रेन ने ईरान के शाहेद-136 और रूस के गेरान-2 जैसे सिस्टम के जवाब में डेवलप किया था। इसकी अनुमानित कीमत करीब 55,000 डॉलर प्रति यूनिट बताई जाती है, जिससे यह अपेक्षाकृत कम लागत वाला स्ट्राइक प्लेटफॉर्म बन जाता है।

दूसरी ओर एफपी-2 फ्रंट स्ट्राइक की रेंज करीब 200 किलोमीटर बताई जाती है। यह 105 किलोग्राम तक का बड़ा वारहेड ले जाने में सक्षम माना जाता है और फ्रंटलाइन ऑपरेशन के लिए बनाया गया है। (Fire Point Pakistan Drone Deal)

टेक्नोलॉजी ट्रांसफर पर भी फोकस

ओपन सोर्स इंटेलिजेंस नेटवर्क से मिली जानकारी के अनुसार फायर पॉइंट सिर्फ तैयार ड्रोन बेचने तक सीमित नहीं रहना चाहती। कंपनी पाकिस्तान की निजी रक्षा कंपनियों के साथ टेक्नोलॉजी एक्सचेंज, संयुक्त उत्पादन और संभावित टेक्नोलॉजी ट्रांसफर पर भी बातचीत कर रही है।

कंपनी का कहना है कि आधुनिक युद्ध में केवल स्ट्रैटेजिक डेप्थ काफी नहीं है। बल्कि लंबी दूरी के सस्ते और बड़ी संख्या में बनाए जा सकने वाले ड्रोन किसी देश की स्ट्राइक क्षमता को काफी बढ़ा सकते हैं।

कंपनी का मानना है कि पाकिस्तान के पास भारत जैसी विशाल भौगोलिक गहराई नहीं है, लेकिन आधुनिक तकनीक, लंबी दूरी के ड्रोन और सही सैन्य सिद्धांतों के जरिए इस कमी को काफी हद तक पूरा किया जा सकता है।

वहीं पाकिस्तान को अगर बड़े पैमाने पर उत्पादन तकनीक, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर से बचाव की क्षमता और ऑपरेशनल अनुभव मिल जाए तो उसकी ड्रोन शक्ति तेजी से बढ़ सकती है।

अभी तक कोई बड़ी डील कन्फर्म नहीं

हालांकि पाकिस्तान और यूक्रेन के बीच ड्रोन डील की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। दिसंबर 2025 में यूक्रेन के एक वरिष्ठ अधिकारी ने स्पष्ट कहा था कि पाकिस्तान को कोई यूक्रेनी सैन्य ड्रोन नहीं भेजा गया है। उस समय उन्होंने बताया था कि कुछ लेटर ऑफ इंटेंट जरूर मौजूद थे, लेकिन वे किसी अंतिम रक्षा समझौते में नहीं बदले। (Fire Point Pakistan Drone Deal)

पाकिस्तान पहले से बढ़ा रहा है ड्रोन नेटवर्क

पाकिस्तान पिछले कुछ सालों में अपनी ड्रोन क्षमता बढ़ाने पर लगातार काम कर रहा है। वह केवल यूक्रेन पर निर्भर नहीं है।

तुर्किये से पाकिस्तान ने बायराक्तर टीबी-2, अकिनजी और एफपीवी कामिकाजे ड्रोन जैसे कई सिस्टम हासिल किए हैं। इसके अलावा चीन भी विभिन्न ड्रोन और एयर डिफेंस सिस्टम उपलब्ध करा रहा है।

जुलाई 2026 में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने कहा था कि देश में इस्तेमाल होने वाले लगभग 60 प्रतिशत ड्रोन अब स्थानीय स्तर पर बनाए जा रहे हैं। कई निजी कंपनियां इंजन, एयरफ्रेम और अन्य महत्वपूर्ण सिस्टम विकसित करने में लगी हुई हैं।

मई 2025 के ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान ने ड्रोन क्षमता को राष्ट्रीय प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में शामिल किया है। (Fire Point Pakistan Drone Deal)

Fire Point Pakistan Drone Deal

पाकिस्तान ने भी दिए थे हथियार

2022 और 2023 के दौरान कई अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया था कि पाकिस्तान ऑर्डनेंस फैक्ट्रीज के बनाए 155 मिमी तोप के गोले और 122 मिमी रॉकेट पश्चिमी देशों के जरिए यूक्रेन तक पहुंचे। बताया गया कि इन गोला-बारूद की खरीद अमेरिकी रक्षा कंपनियों ने की थी और बाद में उन्हें यूक्रेन की मदद के लिए भेजा गया।

इन रिपोर्ट्स के अनुसार हथियारों की सप्लाई सीधे पाकिस्तान से यूक्रेन नहीं हुई, बल्कि ब्रिटेन, पोलैंड, जर्मनी और रोमानिया जैसे देशों के माध्यम से पहुंचाई गई। कुछ तस्वीरों और वीडियो में यूक्रेनी सेना के पास पाकिस्तान में बने गोला-बारूद दिखाई देने के दावे भी किए गए थे। (Fire Point Pakistan Drone Deal)

युद्ध के अनुभव से मिली तकनीकी बढ़त

रूस-यूक्रेन युद्ध ने ड्रोन युद्ध की अवधारणा को पूरी तरह बदल दिया है। कम लागत वाले लॉइटरिंग म्यूनिशन और एफपीवी ड्रोन ने पारंपरिक सैन्य अभियानों में नई भूमिका निभाई है।

फायर पॉइंट जैसे यूक्रेनी निर्माताओं को वास्तविक युद्ध परिस्थितियों में अपने सिस्टम का परीक्षण करने का अवसर मिला है। इसी वजह से उनके उत्पादों में इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर रसिस्टेंट, लंबी दूरी की नेविगेशन क्षमता और बड़े पैमाने पर उत्पादन का अनुभव शामिल है।

युद्ध के दौरान यूक्रेन ने ऐसे ड्रोन का इस्तेमाल डीप स्ट्राइक के लिए किया है। इसी अनुभव के आधार पर कंपनी अब अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी मौजूदगी बढ़ाने की कोशिश कर रही है। (Fire Point Pakistan Drone Deal)

भारत के लिए क्या महत्वपूर्ण है?

भारत के लिए चिंता केवल ड्रोन की खरीद तक सीमित नहीं है। अधिक महत्वपूर्ण पहलू उत्पादन तकनीक, नेविगेशन सिस्टम, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर रेजिलिएंस और बड़े पैमाने पर ट्रांसफर ऑफ मैन्युफैक्चरिंग है।

क्योंकि अगर पाकिस्तान के हाथ सस्ते लॉन्ग-रेंज ड्रोन बनाने की तकनीक लग जाती है, तो उसकी स्ट्राइक क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है। इसी वजह से भारतीय सेनाएं काउंटर यूएएस सिस्टम, इंटरसेप्टर ड्रोन, रडार नेटवर्क और इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग क्षमताओं पर भी समान रूप से ध्यान दे रही हैं। (Fire Point Pakistan Drone Deal)

राजनाथ सिंह का बड़ा फैसला: अब निजी कंपनियों को मिलेगी DRDO की सभी कॉन्वेंशनल मिसाइल टेक्नोलॉजी, खुलेंगे नए अवसर

DRDO Missile Technology Transfer
Rajnath Singh Approves Transfer of DRDO Missile Technologies to Indian Industry, Opening New Opportunities for Private Defence Firms. (Image for representational Purpose only. AI-Generated Image)

DRDO Missile Technology Transfer: रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने मंगलवार को डीआरडीओ द्वारा विकसित सभी कॉन्वेंशनल मिसाइल सिस्टम्स की तकनीक भारतीय रक्षा उद्योग को ट्रांसफर करने की मंजूरी दे दी है। इस फैसले के बाद अब सिर्फ सरकारी कंपनियां ही नहीं, बल्कि निजी रक्षा कंपनियां और एमएसएमई भी मिसाइल निर्माण की प्रक्रिया में बड़ी भूमिका निभा सकेंगी।

रक्षा मंत्रालय के अनुसार यह फैसला आत्मनिर्भर भारत और स्वदेशी रक्षा उत्पादन को गति देने के उद्देश्य से लिया गया है। इससे डीआरडीओ की प्रयोगशालाओं में विकसित तकनीक सीधे उद्योग तक पहुंचेगी और मिसाइलों का उत्पादन भारत में ही बड़े पैमाने पर किया जा सकेगा।

DRDO Missile Technology Transfer: मिसाइल निर्माण में खत्म हो रही पुरानी व्यवस्था

पिछले कई सालों तक डीआरडीओ की ज्यादातर मिसाइल प्रोजेक्ट्स के उत्पादन की जिम्मेदारी मुख्य रूप से भारत डायनेमिक्स लिमिटेड (बीडीएल) और कुछ मामलों में भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (बीईएल) के पास रहती थी। डीआरडीओ तकनीक विकसित करता था और उत्पादन का बड़ा हिस्सा सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां संभालती थीं।

वहीं, अब रक्षा मंत्रालय ने इस मॉडल में बड़ा बदलाव किया है। डीआरडीओ की 10 से 12 प्रमुख टैक्टिकल मिसाइल प्रोजेक्ट्स को सार्वजनिक और निजी कंपनियों के बीच उनकी क्षमता के आधार पर बांटा जा रहा है। इसका उद्देश्य उत्पादन क्षमता बढ़ाना और रक्षा उद्योग को व्यापक बनाना है।

यह कदम प्रस्तावित डिफेंस एक्विजिशन प्रोसीजर (डीएपी) 2026 की जरूरतों के अनुरूप भी माना जा रहा है, जिसमें निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाने पर जोर दिया गया है।

क्या होती हैं टैक्टिकल मिसाइलें?

टैक्टिकल मिसाइलें ऐसी गाइडेड मिसाइलें होती हैं, जिनका इस्तेमाल युद्ध क्षेत्र में सीमित दूरी के भीतर सटीक हमले के लिए किया जाता है। इनका इस्तेमाल दुश्मन के सैन्य ठिकानों, रडार, एयर डिफेंस सिस्टम, बख्तरबंद वाहनों, युद्धपोतों और अन्य महत्वपूर्ण मिलिट्री टारगेट्स को निशाना बनाने के लिए किया जाता है।

ये मिसाइलें स्ट्रेटेजिक मिसाइलों से अलग होती हैं। स्ट्रेटेजिक मिसाइलें लंबी दूरी तक जाकर बड़े टारगेट्स पर हमला करने के लिए बनाई जाती हैं, जबकि टैक्टिकल मिसाइलें युद्ध क्षेत्र में त्वरित और सटीक कार्रवाई के लिए इस्तेमाल होती हैं।

राजनाथ सिंह की मंजूरी का क्या मतलब है?

रक्षा मंत्री की मंजूरी के बाद डीआरडीओ द्वारा विकसित सभी कॉन्वेंशनल मिसाइल सिस्टम्स की तकनीक भारतीय उद्योगों को ट्रांसफर की जा सकेगी। उद्योगों को यह तकनीक निर्धारित योग्यता, सुरक्षा मंजूरी, लाइसेंस और प्रमाणन प्रक्रियाओं के बाद दी जाएगी।

इससे मिसाइल विकास से लेकर उत्पादन तक का पूरा चक्र भारत में ही पूरा किया जा सकेगा। रक्षा मंत्रालय का कहना है कि इससे घरेलू विनिर्माण क्षमता मजबूत होगी, आयात पर निर्भरता कम होगी और भारतीय सप्लाई चेन को बढ़ावा मिलेगा।

किन कंपनियों को मिल रहा है मौका?

डीआरडीओ ने डेवलपमेंट-कम-प्रोडक्शन पार्टनर (DcPP) मॉडल के तहत कई निजी कंपनियों को शामिल किया है। इनमें अदाणी डिफेंस एंड एयरोस्पेस, भारत फोर्ज, आईकॉम और सोलर डिफेंस एंड एयरोस्पेस जैसी कंपनियां शामिल हैं।

इनके अलावा बीडीएल और बीईएल भी कई प्रोजेक्ट में उत्पादन साझेदार बने हुए हैं। कुछ प्रोजेक्ट्स में सार्वजनिक और निजी कंपनियां मिलकर काम कर रही हैं।

डीसीपीपी मॉडल में डीआरडीओ और उद्योग साझेदार मिलकर सिस्टम का विकास, प्रोटोटाइप निर्माण, परीक्षण और उत्पादन की तैयारी करते हैं। इसके बाद सशस्त्र बलों से ऑर्डर मिलने पर बड़े पैमाने पर निर्माण शुरू होता है। (DRDO Missile Technology Transfer)

कौन-कौन सी मिसाइलें हो सकती हैं शामिल?

यह फैसला डीआरडीओ की लगभग सभी कॉन्वेंशनल मिसाइल सिस्टम्स पर लागू होगा।

एयर डिफेंस क्षेत्र में आकाश, आकाश-एनजी, क्यूआरएसएएम और अन्य एयर डिफेंस सिस्टम्स शामिल हैं। एंटी-टैंक श्रेणी में नाग, हेलीना, ध्रुवास्त्र और एमपीएटीजीएम जैसी मिसाइलें आती हैं।

एयर-टू-एयर श्रेणी में अस्त्र एमके-1 और अस्त्र एमके-2 शामिल हैं। एंटी-शिप और क्रूज मिसाइलों में ब्रह्मोस, रुद्रम सीरीज, एलआरएलएसीएम, एनएएसएम-एसआर और एनएएसएम-एमआर जैसी मिसाइलें शामिल हैं।

टैक्टिकल बैलिस्टिक मिसाइल श्रेणी में प्रहार और प्रलय जैसे सिस्टम आते हैं। इसके अलावा पिनाका के गाइडेड रॉकेट और स्मार्ट (SMART) जैसे एडवांस सिस्टम्स प्रणालियां भी इस दायरे में मानी जा रही हैं।

हालांकि ब्रह्मोस मिसाइल भारत और रूस का जॉइंट डेवलपमेंट है। इस जॉइंट वेंचर में डीआरडीओ की हिस्सेदारी 50.5 प्रतिशत और रूसी कंपनी की हिस्सेदारी 49.5 प्रतिशत है। ब्रह्मोस एयरोस्पेस मिसाइल के डिजाइन, डेवलपमेंट, उत्पादन, इंटीग्रेशन, परीक्षण और वैश्विक मार्केटिंग की जिम्मेदारी संभालती है। ब्रह्मोस मिसाइल का अंतिम इंटीग्रेशन और असेंबली ब्रह्मोस एयरोस्पेस द्वारा की जाती है। मिसाइल के विभिन्न हिस्सों के निर्माण में 200 से अधिक भारतीय कंपनियां, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम और एमएसएमई शामिल हैं। (DRDO Missile Technology Transfer)

प्रलय और रुद्रम जैसे कार्यक्रमों में निजी कंपनियों की एंट्री

प्रलय मिसाइल कार्यक्रम में बीडीएल और बीईएल पहले से उत्पादन साझेदार हैं। इसके साथ अदाणी डिफेंस, भारत फोर्ज और सोलर डिफेंस जैसी कंपनियां भी जुड़ी हुई हैं।

प्रलय मिसाइल ने दिसंबर 2025 के अंत में यूजर इवैल्यूएशन ट्रायल पूरे किए थे। इसकी मारक क्षमता लगभग 150 से 500 किलोमीटर के बीच बताई जाती है।

वहीं, रुद्रम-1, रुद्रम-2 और रुद्रम-3 जैसी एयर-टू-सरफेस तथा एंटी-रेडिएशन मिसाइल प्रोजेक्ट्स में भी निजी कंपनियों की भागीदारी बढ़ाई गई है। ये मिसाइलें दुश्मन के रडार और एयर डिफेंस सिस्टम को निशाना बनाने के लिए विकसित की गई हैं।

हेलीकॉप्टर से दागी जाने वाली मिसाइलों पर भी काम

डीआरडीओ की नेवल एंटी-शिप मिसाइल-शॉर्ट रेंज (NASM-SR) भी उन प्रोजेक्ट्स में शामिल है जिनमें निजी उद्योग सहयोग कर रहा है। यह भारत की पहली स्वदेशी हेलीकॉप्टर लॉन्च एंटी-शिप मिसाइल मानी जाती है।

इसके अलावा वीएसएचओरैड्स, यूएलपीजीएम-वी3 और लॉन्ग रेंज ग्लाइड बम जैसे प्रोजेक्ट्स में भी निजी कंपनियों को जिम्मेदारी दी जा रही है। (DRDO Missile Technology Transfer)

डीआरडीओ की टीओटी पॉलिसी में क्या है खास?

डीआरडीओ की ट्रांसफर ऑफ टेक्नोलॉजी (ToT) पॉलिसी 2025 के तहत मिसाइल तकनीकें कैटेगरी-ए यानी मिलिटेक (MILTECH) के अंतर्गत आती हैं। इन तकनीकों का इस्तेमाल केवल भारतीय सशस्त्र बलों, गृह मंत्रालय या अन्य सरकारी एजेंसियों के लिए किया जा सकता है।

इसके तहत तकनीक केवल भारतीय उद्योगों को दी जाएगी और उत्पादन भारत में ही होगा। इसके लिए एंड यूजर सर्टिफिकेट, इंडस्ट्रियल लाइसेंस और अन्य सुरक्षा मंजूरियां जरूरी होंगी।

मिसाइलों में इस्तेमाल होने वाले विस्फोटक, प्रोपेलेंट और पायरो मैटेरियल से जुड़ी तकनीक केवल उन्हीं कंपनियों को मिलेगी जिनके पास पीईएसओ (PESO) लाइसेंस होगा।

फीस और रॉयल्टी में बड़ी राहत

डीआरडीओ की नई नीति के तहत डेवलपमेंट-कम-प्रोडक्शन पार्टनर और प्रोडक्शन एजेंसी के लिए टीओटी फीस पूरी तरह माफ रखी गई है। इसके अलावा भारतीय सेनाओं को सप्लाई किए जाने वाले प्रोडक्ट्स पर रॉयल्टी भी शून्य रखी गई है।

इसका उद्देश्य उद्योगों को अधिक से अधिक निवेश के लिए प्रोत्साहित करना है ताकि उत्पादन क्षमता तेजी से बढ़ाई जा सके। (DRDO Missile Technology Transfer)

डीआरडीओ ने निजी कंपनियों से मांगे आवेदन

हाल ही में डीआरडीओ के डायरेक्टर जनरल (मिसाइल्स एंड स्ट्रेटेजिक सिस्टम्स) क्लस्टर ने भविष्य की मिसाइल और बम वेपन सिस्टम के डेवलपमेंट एंड प्रोडक्शन के लिए निजी कंपनियों से आवेदन भी मांगे हैं। अब तक अग्नि सीरीज जैसी रणनीतिक मिसाइलों और अन्य संवेदनशील हथियार प्रणालियों के उत्पादन का काम मुख्य रूप से भारत डायनेमिक्स लिमिटेड (BDL) जैसी सरकारी कंपनियां करती रही हैं।

हैदराबाद स्थित रिसर्च सेंटर इमारत (आरसीआई) ने इसके लिए एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट जारी किया है। इस प्रक्रिया के तहत योग्य भारतीय कंपनियों का चयन किया जाएगा, जिन्हें बाद में विभिन्न प्रोजेक्ट्स के लिए निविदाएं भेजी जाएंगी।

डीआरडीओ डेवलपमेंट-कम-प्रोडक्शन पार्टनर (DcPP) मॉडल के तहत हर प्रोजेक्ट के लिए कम से कम दो कंपनियों का चयन करेगा। ये कंपनियां डीआरडीओ के साथ मिलकर प्रोटोटाइप तैयार करेंगी, उनका परीक्षण करेंगी और बाद में बड़े पैमाने पर उत्पादन में भी भागीदारी करेंगी।

इन कंपनियों के पास डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग लाइसेंस, पीईएसओ मंजूरी, पर्याप्त उत्पादन क्षमता, तकनीकी विशेषज्ञता और वित्तीय मजबूती होना जरूरी होगा। (DRDO Missile Technology Transfer)

रक्षा सचिव ने दिया था हिंट

इससे पहले मई में सीआईआई एनुअल बिजनेस समिट 2026 में बोलते हुए रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने कहा था कि सरकार अब बैलिस्टिक मिसाइलों के निर्माण में निजी कंपनियों को शामिल करने पर विचार कर रही है। अभी तक बैलिस्टिक मिसाइलों का उत्पादन मुख्य रूप से रक्षा क्षेत्र की सरकारी कंपनियों (डीपीएसयू) तक सीमित था, लेकिन सरकार निजी उद्योग को भी समान अवसर देना चाहती है। उनके अनुसार भविष्य में बैलिस्टिक मिसाइल उत्पादन में निजी उद्योग की भागीदारी बढ़ाने के लिए सरकार की ओर से महत्वपूर्ण फैसले लिए जा सकते हैं। (DRDO Missile Technology Transfer)

मेरठ में बनेगा देश का पहला ड्रोन रनवे, C-130 और C-295 विमान भी भर सकेंगे उड़ान

India First Drone Runway
India's First Dedicated Drone Runway To Be Built In Meerut, Rs 371 Crore BRO Project To Support UAVs And Military Aircraft. (Image for representational Purpose only. AI-Generated Image)

India First Drone Runway: भारत में ड्रोन और यूएवी के रणनीतिक महत्व को देखते हुए एक बड़े डिफेंस इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट की तैयारियां शुरू हो गई हैं। उत्तर प्रदेश के मेरठ कैंट में देश का पहला समर्पित ड्रोन और यूएवी रनवे बनाने की प्रक्रिया तेज हो गई है। बॉर्डर रोड्स ऑर्गेनाइजेशन (बीआरओ) ने इस प्रोजेक्ट के लिए 371.15 करोड़ रुपये का नया टेंडर जारी किया है।

यह प्रोजेक्ट मेरठ कैंटोनमेंट के किला रोड स्थित मिलिट्री फार्म क्षेत्र में तैयार की जाएगा। प्रस्तावित एविएशन इंफ्रास्ट्रक्चर लगभग 900 एकड़ भूमि पर बनाया जाना है। यह प्रोजेक्ट बीआरओ के प्रोजेक्ट शिवालिक के तहत बनाया जा रहा है और इसका उद्देश्य भविष्य की सैन्य जरूरतों, ड्रोन ऑपरेशंस और एयर मोबिलिटी क्षमताओं को मजबूत करना है।

बता दें कि रक्षा समाचार ने इस साल 15 फरवरी को सबसे पहले मेरठ में पहला ड्रोन एयरबेस बनाने की जानकारी दी थी।

India First Drone Runway: 371.15 करोड़ रुपये की लागत से बनेगा प्रोजेक्ट

बीआरओ की तरफ से जारी आरएफपी के मुताबिक प्रोजेक्ट की अनुमानित लागत 371.15 करोड़ रुपये रखी गई है। इससे पहले इसी प्रोजेक्ट के लिए करीब 406 करोड़ रुपये का टेंडर जारी किया गया था। बाद में प्रक्रिया में बदलाव होने के बाद चंडीगढ़ स्थित बीआरओ के अतिरिक्त महानिदेशक (नॉर्थ-वेस्ट) ने संशोधित लागत के साथ नया टेंडर जारी किया है।

टेंडर प्रक्रिया पूरी होने के बाद चयनित एजेंसी को विस्तृत प्रोजेक्ट रिपोर्ट यानी डीपीआर तैयार करने के लिए सात महीने का समय दिया जाएगा।

1,690 किलोमीटर लंबा होगा रनवे

प्रोजक्ट के तहत 45 मीटक चौड़ा और कम से कम 1,690 मीटर लंबा रनवे बनाया जाएगा। इसके साथ टैक्सीवे (जहां से विमान रनवे तक पहुंचते हैं) और एप्रन (जहां विमान खड़े किए जाते हैं) भी विकसित किए जाएंगे।

रनवे पर रात और खराब मौसम में सुरक्षित फ्लाइट ऑपरेशन के लिए आधुनिक रनवे लाइटिंग सिस्टम लगाया जाएगा। साथ ही पीएपीआई (प्रिसिजन अप्रोच पाथ इंडिकेटर) जैसी अप्रोच लाइटिंग सुविधा भी होगी, जो पायलटों को लैंडिंग के दौरान सही दिशा और ऊंचाई बनाए रखने में मदद करती है।

रनवे के साथ-साथ दो बड़े हैंगर भी बनाए जाएंगे। प्रत्येक हैंगर की चौड़ाई लगभग 60 मीटर और लंबाई 50 मीटर होगी। इन हैंगरों का इस्तेमाल ड्रोन, यूएवी और अन्य हवाई प्लेटफॉर्म को सुरक्षित रखने, रखरखाव और तकनीकी कार्यों के लिए किया जाएगा। साथ ही सुरक्षा के लिए आधुनिक फायर फाइटिंग और फायर अलार्म सिस्टम भी लगाए जाएंगे।

रनवे और हैंगर के अलावा टैक्सी ट्रैक, ऑपरेशनल एरिया, तकनीकी सपोर्ट सुविधाएं और अन्य एविएशन इंफ्रास्ट्रक्चर भी तैयार किया जाएगा।

सी-295 और सी-130 भी कर सकेंगे ऑपरेशन

इस प्रोजेक्ट की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक यह है कि यहां केवल ड्रोन ही नहीं, बल्कि भारतीय वायुसेना के ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट भी ऑपरेट कर सकेंगे। रनवे को इस तरह डिजाइन किया जा रहा है कि भारतीय वायुसेना के बड़े परिवहन विमान जैसे सी-295 और सी-130 भी यहां से उड़ान भर सकें और उतर सकें। भविष्य में इस रनवे का इस्तेमाल सैन्य लॉजिस्टिक्स और एयर सपोर्ट हब के रूप में भी इस्तेमाल किया जा सकेगा।

सी-295 एक आधुनिक टैक्टिकल ट्रांसपोर्ट विमान है, जिसे भारतीय वायुसेना पुराने एएन-32 और एव्रो विमानों के जगह पर शामिल कर रही है। वहीं सी-130जे सुपर हरक्यूलिस विशेष अभियान, सैनिकों की तैनाती, सैन्य उपकरणों की ढुलाई और आपातकालीन मिशनों के लिए इस्तेमाल किया जाता है।

उपकरण में नहीं हो सिम या ई-सिम स्लॉट

शर्तों के मुताबिक कंपनी की तरफ से इस्तेमाल होने वाले किसी भी उपकरण में सिम या ई-सिम स्लॉट नहीं होना चाहिए। साथ ही उसमें ऐसा कोई कम्युनिकेशन मॉड्यूल नहीं लगाया जा सकता, जो भारत की जमीनी सीमा साझा करने वाले किसी देश का हो और बाहरी मोबाइल या नेटवर्क कनेक्टिविटी प्रदान करता हो।

उपकरण में लगे इलेक्ट्रॉनिक कंट्रोल यूनिट (ईसीयू) या कंट्रोल यूनिट भी ऐसे किसी देश के नहीं होने चाहिए, जो भारत के साथ भूमि सीमा साझा करता है। यह शर्त मूल उपकरण और बाद में लगाए गए पुर्जों, दोनों पर लागू होगी।

उपकरण में मौजूद टेलीमैटिक्स सिस्टम या हार्डवेयर में ऐसे मल्टी-जीएनएसएस चिप्स का उपयोग नहीं किया जा सकेगा, जो जीपीएस और ग्लोनास के साथ-साथ चीन के बेइदोउ नेविगेशन सिस्टम को भी सपोर्ट करते हों।

इसके अलावा उपकरण में अनधिकृत रिमोट एक्सेस, रिमोट कंट्रोल या दूर से बंद करने जैसी कोई सुविधा नहीं होनी चाहिए।

पश्चिमी मोर्चे पर मजबूत तैयारी

मेरठ में बनाया जा रहा देश का पहला समर्पित ड्रोन और यूएवी रनवे पश्चिमी मोर्चे पर भारत की निगरानी और सैन्य तैयारियों को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण परियोजना माना जा रहा है। मई 2025 में हुए ऑपरेशन सिंदूर के दौरान ड्रोन आधारित निगरानी और अभियानों की उपयोगिता भी सामने आई थी।

मेरठ कैंट में बनने वाला यह रनवे मुख्य रूप से हाई एल्टीट्यूड लॉन्ग एंड्योरेंस (HALE) श्रेणी के रिमोटली पायलटेड एयरक्राफ्ट और बड़े ड्रोन के ऑपरेशनों के लिए बनाया जा रहा है। रनवे पर आधुनिक आईसीएओ कैट-2 लाइटिंग सिस्टम और एडवांस नेविगेशन सुविधाएं लगाई जाएंगी। इससे खराब मौसम, धुंध या कम दृश्यता की स्थिति में भी सुरक्षित उड़ान संचालन संभव हो सकेगा।

इस केंद्र की अनुमानित क्षमता हर साल लगभग 1,500 ड्रोन मिशन संचालित करने की होगी। यानी औसतन प्रतिदिन चार ड्रोन उड़ानें यहां से संचालित की जा सकेंगी।

मेरठ का यह रनवे  पाकिस्तान सीमा और अन्य संवेदनशील क्षेत्रों की रियल-टाइम इंटेलिजेंस, सर्विलांस और रिकॉनिसेंस (ISR) गतिविधियों के लिए एक महत्वपूर्ण हब के रूप में विकसित किया जा रहा है। यहां से संचालित होने वाले हाई एल्टीट्यूड लॉन्ग एंड्योरेंस ड्रोन लंबे समय तक हवा में रहकर पंजाब, राजस्थान और जम्मू सेक्टर सहित पश्चिमी सीमा क्षेत्रों की निगरानी कर सकेंगे और आवश्यक जानकारी सुरक्षा एजेंसियों तक पहुंचा सकेंगे।

प्रशिक्षण और परीक्षण गतिविधियों का भी बनेगा केंद्र

प्रस्तावित एविएशन इंफ्रास्ट्रक्चर में ड्रोन पायलट प्रशिक्षण, मिशन प्लानिंग, तकनीकी परीक्षण और ऑपरेशनल मूल्यांकन जैसी गतिविधियों के लिए भी सुविधाएं विकसित की जा सकती हैं।

रिमोटली पायलटेड एयरक्राफ्ट सिस्टम के ऑपरेशन के लिए विशेष प्रशिक्षण की जरूरत होती है। ऐसे में यह केंद्र सैन्य कर्मियों के लिए प्रशिक्षण स्थल के रूप में भी अहम भूमिका निभा सकता है। साथ ही नए ड्रोन प्लेटफॉर्म, सेंसर और तकनीकों के परीक्षण के लिए भी यहां सुविधाएं उपलब्ध कराई जा सकती हैं।

आपदा प्रबंधन में भी मिल सकती है मदद

यह प्रोजेक्ट आपदा प्रबंधन से जुड़े अभियानों में भी उपयोगी साबित हो सकती है। बड़े रनवे और ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट संचालन की क्षमता के कारण राहत सामग्री, चिकित्सा उपकरण और बचाव दलों को तेजी से प्रभावित क्षेत्रों तक पहुंचाया जा सकता है।

विशेष परिस्थितियों में ड्रोन के जरिए सर्वेक्षण, क्षति का आकलन और राहत कार्यों की निगरानी भी की जा सकती है। इसी कारण प्रोजेक्ट को केवल सैन्य दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि बहुउद्देश्यीय एविएशन इंफ्रास्ट्रक्चर के रूप में भी देखा जा रहा है।

18 महीने में निर्माण पूरा करने का लक्ष्य

बीआरओ ने इसका निर्माण कार्य पूरा करने के लिए 18 महीने यानी 548 दिन का समय निर्धारित किया है। प्रोजेक्ट पूरी होने के बाद पांच वर्ष की रखरखाव अवधि भी तय की गई है।

टेंडर में शामिल शर्तों के मुताबिक चयनित कंपनी को एविएशन इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण का अनुभव होना जरूरी है। बड़े एयरफील्ड, रनवे और हैंगर निर्माण से जुड़ी तकनीकी क्षमता को भी पात्रता मानदंड में शामिल किया गया है।

Explained: चीन के खिलाफ अमेरिका का बड़ा दांव? यूएस नेवी की नई मिसाइल AIM-424 Malice क्यों है खास?

AIM-424 Malice Missile
What Is the US Navy's AIM-424 Malice Missile and Why Does Its 465 km Range Matter?

AIM-424 Malice Missile: अमेरिकी नौसेना ने एक नई एयर-टू-एयर मिसाइल AIM-424 “मैलिस” (Malice) का खुलासा किया है। यह मिसाइल 250 नॉटिकल मील यानी 463 से 465 किलोमीटर से अधिक दूरी तक एरियल टारगेट्स को निशाना बना सकती है। यह दूरी मौजूदा अमेरिकी AIM-120 AMRAAM और कई अन्य एयर-टू-एयर मिसाइलों से काफी ज्यादा है।

अमेरिकी नौसेना ने अगस्त 2026 में नेवादा के रेनो शहर में आयोजित टेलहुक एसोसिएशन कन्वेंशन के दौरान पहली बार इस मिसाइल की जानकारी सार्वजनिक की। इसके साथ जारी तस्वीरों में F/A-18E/F सुपर हॉर्नेट लड़ाकू विमान पर एआईएम-424 मिसाइलें लगी दिखाई दीं। एक अन्य तस्वीर में इसे एफ-35सी स्टेल्थ फाइटर के इंटरनल वेपन बे में भी देखा गया।

AIM-424 Malice Missile क्या है?

एआईएम-424 मैलिस एक नई पीढ़ी की लॉन्ग रेंज एयर-टू-एयर मिसाइल है। अमेरिकी नौसेना इसे लॉन्ग रेंज एयर-टू-एयर मिसाइल (LRAAM) भी कहती है। इसे अमेरिकी डिफेंस कंपनी रेथियॉन ने किया है, जो आरटीएक्स कॉर्पोरेशन की सहायक कंपनी है।

यह मिसाइल दुश्मन के विमानों को बहुत लंबी दूरी से मार गिराने के लिए बनाई गई है। अमेरिकी नौसेना के अनुसार इसका मुख्य उद्देश्य बेड़े की सुरक्षा मजबूत करना और एडवांस खतरों के खिलाफ हवाई बढ़त बनाए रखना है। (AIM-424 Malice Missile)

कितनी है मिसाइल की मारक क्षमता?

अमेरिकी नौसेना द्वारा जारी तकनीकी विवरण के अनुसार एआईएम-424 की रेंज 250 नॉटिकल मील से अधिक है। यह लगभग 463 किलोमीटर या 465 किलोमीटर के बराबर है।

मिसाइल की लंबाई 13.5 फीट यानी करीब 4.11 मीटर है। इसका व्यास 13.5 इंच और विंगस्पैन 26.2 इंच बताया गया है। इसका कुल वजन लगभग 1500 पाउंड यानी 680 किलोग्राम से अधिक है।

तुलना करें तो एआईएम-120 AMRAAM का वजन इससे काफी कम है। एआईएम-424 का वजन लगभग तीन गुना अधिक है। ज्यादा वजन और दो-स्टेज डिजाइन इसकी लंबी दूरी और हाई स्पीड का आधार माना जा रहा है।

दो-स्टेज डिजाइन से बढ़ी क्षमता

रिपोर्टों के अनुसार एआईएम-424 एक टू-स्टेज मिसाइल है। इसमें सॉलिड प्रोपेलेंट रॉकेट मोटर का इस्तेमाल किया गया है।

पहला चरण मिसाइल को तेज गति और ऊंचाई देता है, जबकि दूसरा चरण उसे टारगेट की ओर लंबी दूरी तक आगे बढ़ाता है। यही डिजाइन इसे पारंपरिक एयर-टू-एयर मिसाइलों की तुलना में अधिक दूरी तय करने की क्षमता देता है। वहीं इससे मिसाइल को बहुत लंबी दूरी पर भी पर्याप्त ऊर्जा बनाए रखने में मदद मिलती है। (AIM-424 Malice Missile)

किन विमानों से दागी जा सकेगी?

एआईएम-424 को चौथी, पांचवीं और छठी पीढ़ी के लड़ाकू विमानों के लिए डिजाइन किया गया है।

अमेरिकी नौसेना के अनुसार इसे F/A-18E/F सुपर हॉर्नेट, एफ-35सी जॉइंट स्ट्राइक फाइटर और भविष्य के F/A-XX नेक्स्ट जेनरेशन नौसैनिक लड़ाकू विमान पर तैनात किया जाएगा।

दिलचस्प बात यह है कि इसका साइज ऐसा रखा गया है कि यह एफ-35सी के इंटरनल वेपन बे में भी फिट हो सके। इससे स्टेल्थ क्षमता प्रभावित नहीं होती और विमान दुश्मन के रडार से छिपकर मिशन पूरा कर सकता है।

अमेरिका को इतनी लंबी दूरी की मिसाइल की क्यों है जरूरत?

हाल के सालों में चीन ने अपनी लंबी दूरी की एयर-टू-एयर मिसाइल क्षमताओं को तेजी से बढ़ाया है। अमेरिकी रक्षा विभाग लंबे समय से ऐसी मिसाइल डेवलप करना चाहता था जो दुश्मन के विमान को बहुत दूर से निशाना बना सके।

भविष्य के युद्ध में अवॉक्स विमान, एयर टैंकर, कमांड एंड कंट्रोल एयरक्राफ्ट और अन्य हाई-वैल्यू सपोर्ट प्लेटफॉर्म प्रमुख टारगेट होंगे। ऐसे विमान सीधे लड़ाई नहीं करते, लेकिन पूरे एरियल मिशन को ऑपरेट करते हैं।

एआईएम-424 जैसी मिसाइलें ऐसे टारगेट्स को बहुत दूर से निशाना बनाने में मदद कर सकती हैं। (AIM-424 Malice Missile)

समुद्री युद्ध में भी हो सकती है अहम भूमिका

ऑस्ट्रेलियाई वायुसेना के पूर्व अधिकारी और ग्रिफिथ एशिया इंस्टीट्यूट के विजिटिंग फेलो पीटर लेटन के अनुसार इस तरह की मिसाइलें नौसैनिक बेड़ों की रक्षा में भी उपयोगी हो सकती हैं।

उन्होंने कहा कि चीन के कुछ बॉम्बर विमान लंबी दूरी की एंटी-शिप क्रूज मिसाइलें लेकर उड़ान भर सकते हैं। ऐसी स्थिति में एआईएम-424 जैसी मिसाइल दुश्मन के विमान को उसके हथियार दागने से पहले ही निशाना बना सकती है।

यानी यह केवल एरियल सुपीरियरिटी के लिए नहीं, बल्कि समुद्री सुरक्षा के लिए भी महत्वपूर्ण हथियार बन सकती है। (AIM-424 Malice Missile)

टारगेट तक पहुंचने की सबसे बड़ी चुनौती

विशेषज्ञों का कहना है कि 400 किलोमीटर से अधिक दूरी पर किसी विमान को मारना आसान नहीं होता। इसके लिए बेहद एडवांस सेंसर, रडार, डेटा लिंक और टारगेट की सटीक जानकारी जरूरी होती है। यदि दुश्मन का विमान समय रहते दिशा बदल ले या तेज गति से दूर जाने लगे, तो हमला कठिन हो सकता है।

यही कारण है कि ऐसी मिसाइलों के साथ नेटवर्क बेस्ड वेपन सिस्टम, सेटेलाइट, अवॉक्स विमान और अन्य सेंसर प्लेटफॉर्म भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। (AIM-424 Malice Missile)

“फर्स्ट लुक, फर्स्ट शॉट, फर्स्ट किल”

अमेरिकी नौसेना से मिली आधिकारिक जानकारी के अनुसार एआईएम-424 मैलिस को “फर्स्ट लुक, फर्स्ट शॉट, फर्स्ट किल” क्षमता को मजबूत करने के लिए डेवलप किया जा रहा है।

इसका मतलब है कि अमेरिकी पायलट दुश्मन को पहले देख सकें, पहले मिसाइल दाग सकें और टारगेट को पहले नष्ट कर सकें।

नौसेना ने अभी इसकी ऑपरेशनल तैनाती की तारीख नहीं बताई है, लेकिन तस्वीरों और परीक्षण गतिविधियों से स्पष्ट है कि यह कार्यक्रम परीक्षण चरण में काफी आगे बढ़ चुका है।

मिसाइल में ब्लास्ट-फ्रैगमेंटेशन वारहेड लगाया गया है, जो टारगेट के पास विस्फोट करके बड़े क्षेत्र में घातक टुकड़े फैलाता है और दुश्मन के विमान को नुकसान पहुंचाता है।

दुनिया की लॉन्ग रेंज वाली एयर-टू-एयर मिसाइलें

हवाई युद्ध में इस्तेमाल होने वाली एयर-टू-एयर मिसाइलों की रेंज लगातार बढ़ रही है। इस समय अमेरिकी नौसेना की नई एआईएम-424 मैलिस सबसे लंबी दूरी वाली मिसाइलों में शामिल हो गई है, जिसकी रेंज 450 किलोमीटर से अधिक है। इसके बाद अमेरिका की एआईएम-174 गनस्लिंगर आती है, जो 400 किलोमीटर से अधिक दूरी तक टारगेट को निशाना बना सकती है।

चीन के पास भी लंबी दूरी की मिसाइलें हैं। उसकी पीएल-17 मिसाइल की रेंज लगभग 400 किलोमीटर बताई जाती है। वहीं पीएल-15 मिसाइल करीब 200 किलोमीटर तक मार कर सकती है।

रूस की आर-37एम मिसाइल भी दुनिया की सबसे लंबी दूरी वाली एयर-टू-एयर मिसाइलों में गिनी जाती है। इसकी रेंज लगभग 300 किलोमीटर है।

अमेरिका की अगली पीढ़ी की एआईएम-260 JATM मिसाइल की रेंज 200 किलोमीटर से अधिक मानी जाती है। वहीं वर्तमान में व्यापक रूप से इस्तेमाल होने वाली एआईएम-120 AMRAAM मिसाइल लगभग 160 किलोमीटर तक लक्ष्य को भेद सकती है।

यूरोप की बनाई मेटियोर मिसाइल भी लंबी दूरी की आधुनिक एयर-टू-एयर मिसाइल है, जिसकी रेंज करीब 200 किलोमीटर बताई जाती है।

वहीं, भारत की अस्त्र मिसाइल परिवार की विभिन्न मिसाइलों की रेंज लगभग 160 किलोमीटर से लेकर 350 किलोमीटर तक है। अस्त्र मार्क-1 पहले से भारतीय वायुसेना में शामिल हो चुकी है। (AIM-424 Malice Missile)

हूती चेतावनी के बाद हॉर्मुज से लाल सागर तक अलर्ट, जहाज बदल रहे रास्ता; भारतीय नौसेना ने जारी की चेतावनी

Strait of Hormuz Maritime Security
Red Sea and Strait of Hormuz Crisis: 12 Ship Attacks, Houthi Embargo and Piracy Raise Global Maritime Security Concerns. (Image for representational Purpose only. AI-Generated Image)

Strait of Hormuz Maritime Security: दुनिया के सबसे अहम समुद्री व्यापार मार्गों में शामिल हॉर्मुज जलडमरूमध्य, अदन की खाड़ी, बाब-अल-मंदब और लाल सागर में सुरक्षा हालात लगातार तनावपूर्ण बने हुए हैं। भारतीय नौसेना के इन्फॉर्मेशन फ्यूजन सेंटर-इंडियन ओशन रीजन (आईएफसी-आईओआर) की तरफ से जारी मेरीटाइम सिक्योरिटी एडवाइजरी में इन इलाकों को लेकर गंभीर चेतावनी दी गई है। चेतावनी में कहा गया है कि हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब से जुड़े जहाजों के खिलाफ मेरीटाइम एम्बार्गो घोषित किया हुआ है और मौजूदा हालात को बेहद अस्थिर बताया है।

Strait of Hormuz Maritime Security: हॉर्मुज जलडमरूमध्य में लगातार हुए हमले

रिपोर्ट के मुताबिक अनुसार 2 जुलाई से 23 जुलाई के बीच हॉर्मुज जलडमरूमध्य, फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी में कुल 12 व्यापारी जहाजों पर हमले हुए। इनमें छह हमले प्रोजेक्टाइल, पांच मिसाइल और एक ड्रोन से हुआ।

7 जुलाई को मार्शल आइलैंड्स के झंडे वाले जहाज अल रेकय्यात पर ओमान के लिमाह क्षेत्र के पास प्रोजेक्टाइल हमला हुआ। उसी दिन सऊदी अरब के वेडयान और लाइबेरिया के साइप्रस प्रॉस्पेरिटी को भी निशाना बनाया गया। साइप्रस प्रॉस्पेरिटी पर ड्रोन हमला हुआ था।

इसके बाद 12 जुलाई को जीएफएस गैलेक्सी, 14 जुलाई को स्टोल्ट मैग्नीशियम, मोम्बासा बी और अल बहयाह पर हमले हुए। 15 जुलाई को कुरासाओ के झंडे वाले बेल्मा पर मिसाइल हमला दर्ज किया गया। 20 और 21 जुलाई को भी कई जहाजों को निशाना बनाया गया।

रिपोर्ट बताती है कि हमले उत्तरी और दक्षिणी दोनों समुद्री मार्गों पर हुए। दक्षिणी मार्ग ओमान और यूएई के तट के साथ चलता है, जबकि उत्तरी मार्ग ईरान के तट के नजदीक है। यही कारण है कि आईएफसी-आईओआर ने इस पूरे क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा खतरे को “क्रिटिकल” स्तर पर रखा है।

क्यों अहम है हॉर्मुज जलडमरूमध्य?

हॉर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे व्यस्त ऊर्जा मार्गों में गिना जाता है। फारस की खाड़ी से निकलने वाला बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंचता है। तेल टैंकर, गैस कैरियर और कंटेनर जहाज हर दिन इस मार्ग का इस्तेमाल करते हैं।

ऐसे में किसी भी प्रकार का हमला ग्लोबल सप्लाई चेन और एनर्जी मार्केट पर भी असर डाल सकता है। इसी वजह से इस क्षेत्र में होने वाली हर गतिविधि पर दुनिया भर की नौसेनाओं और शिपिंग कंपनियों की नजर रहती है। (Strait of Hormuz Maritime Security)

हूती विद्रोहियों का मेरीटाइम एम्बार्गो का एलान

20 जुलाई को यमन के हूती विद्रोहियों ने बाब-अल-मंदब क्षेत्र में सऊदी अरब से जुड़े जहाजों के खिलाफ मेरीटाइम एम्बार्गो की घोषणा कर दी। हूतियों ने कहा कि सऊदी बंदरगाहों की ओर जाने वाले या वहां से आने वाले जहाजों को सुरक्षित मार्ग नहीं मिलेगा।

इस घोषणा के बाद कम से कम 13 जहाजों ने अपना निर्धारित मार्ग बदल दिया। इनमें टैंकर, कंटेनर जहाज और बड़े कार्गो पोत शामिल थे।

सऊदी अरब का एनसीसी दानाह जहाज यानबू जा रहा था, लेकिन रास्ते से लौट गया। लाइबेरिया के मिका और रोडोस जैसे जहाजों ने भी अपनी दिशा बदल दी। सिंगापुर के शिन लॉन्ग यांग नामक वीएलसीसी टैंकर ने चीन के लिए सऊदी कच्चा तेल लोड किया था, लेकिन बाद में उसने भी अपना मार्ग बदल दिया।

23 जुलाई को हूती एम्बार्गो के बाद पहला हमला भी दर्ज किया गया। सऊदी अरब से जुड़े टैंकर एनसेलिया पर लाल सागर में जजान के पूर्व लगभग 67 समुद्री मील दूर प्रोजेक्टाइल हमला किया गया।

तेल बाजार पर भी दिखा असर

रिपोर्ट के अनुसार समुद्री खतरे बढ़ने के बाद सऊदी कच्चे तेल की लोडिंग में लगभग 36 फीसदी की कमी दर्ज की गई। इसी दौरान लंदन आईसीई एक्सचेंज में ब्रेंट क्रूड की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई, जो मई 2026 के बाद पहली बार हुआ।

शिपिंग कंपनियों और जहाज मालिकों को सलाह दी गई है कि सऊदी बंदरगाहों की यात्रा से पहले जोखिम का आकलन करें और वैकल्पिक मार्गों पर विचार करें। (Strait of Hormuz Maritime Security)

अदन की खाड़ी में फिर लौटे समुद्री डाकू

रिपोर्ट में अदन की खाड़ी और यमन तट के पास समुद्री डकैती की वापसी को भी गंभीर चिंता का विषय बताया गया है।

5 जुलाई को पलाऊ के झंडे वाले बल्क कैरियर लेडी नाएमा का पीछा एक आर्मर्ड बोट ने किया। जहाज पर मौजूद सुरक्षा गार्डों ने जवाबी फायरिंग की, जिसके बाद हमलावर पीछे हट गए।

13 जुलाई को अदन के दक्षिण में एक टैंकर का पीछा पांच छोटी नावों ने किया। चेतावनी फायरिंग के बाद वे भी लौट गईं।

सबसे गंभीर घटना 17 जुलाई को हुई, जब तंजानिया के झंडे वाले टैंकर असाना को यमन के अल मुकल्ला से लगभग 65 समुद्री मील दक्षिण में हाईजैक कर लिया गया। बाद में जहाज को सोमालिया के पुंटलैंड तट की ओर ले जाया गया।

रिपोर्ट के मुताबिक इस क्षेत्र में फिलहाल दो सक्रिय समुद्री डकैती समूहों की गतिविधियां देखी जा रही हैं। इसी वजह से अदन की खाड़ी में समुद्री डकैती और सशस्त्र लूट का खतरा “हाई” कैटेगरी में रखा गया है। (Strait of Hormuz Maritime Security)

जहाजों के लिए दी ये सलाह

आईएफसी-आईओआर ने अपनी एडवाइजरी में जहाज मालिकों, ऑपरेटरों और कप्तानों को कई सावधानियां अपनाने की सलाह दी है। इसमें यात्रा से पहले खतरे का आकलन करना, युद्ध जोखिम बीमा की समीक्षा करना, एआईएस और रडार चालू रखना तथा वीएचएफ चैनल-16 समेत वैकल्पिक नेविगेशन साधनों का इस्तेमाल करने को कहा है।

साथ ही, रिपोर्ट में कहा गया है कि केवल जीपीएस पर निर्भर रहना सही नहीं है। जीपीएस जैमिंग या एआईएस में दखल की आशंका को देखते हुए वैकल्पिक पोजिशनिंग सिस्टम भी तैयार रखने चाहिए। साथ ही, जहाज के चालक दल को संभावित खतरों के बारे में पहले से जानकारी दी जाए, नियमित मॉक ड्रिल कराई जाए और आपात स्थिति में इंजन बंद करने, जहाज को कंट्रोल करने तथा सिटाडेल से कम्युनिकेशन सिस्टम की जांच पहले से कर ली जाए।

हॉर्मुज जलडमरूमध्य, फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी में गैर-जरूरी यात्राओं पर पुनर्विचार करने की सलाह दी गई है। वहीं अदन की खाड़ी, बाब-अल-मंदब और लाल सागर से गुजरने वाले जहाजों को अतिरिक्त निगरानी, सुरक्षा उपाय और सशस्त्र सुरक्षा टीमों पर विचार करने को कहा गया है। आईएफसी-आईओआर ने विशेष रूप से चेतावनी दी है कि सोमालिया और यमन के तटों के पास हाल के दिनों में समुद्री डकैती की घटनाएं सामने आई हैं। इसलिए इन क्षेत्रों से गुजरते समय अतिरिक्त सतर्कता बरतने, जहाज की गति बढ़ाने और अतिरिक्त निगरानी कर्मियों को तैनात करने की सलाह दी गई है। (Strait of Hormuz Maritime Security)

पाकिस्तान सीमा पर ड्रोन वॉर की तैयारी! भारतीय सेना की Baaz Battalion अब आसमान से रखेगी दुश्मन की हर हरकत पर नजर

Indian Army Baaz Battalion
Indian Army Baaz Battalion: How the New Drone Unit Will Boost Surveillance Along Pakistan Border. (Image for representational Purpose only. AI-Generated Image)

Baaz Battalion: भारतीय सेना ने पश्चिमी मोर्चे पर अपनी ड्रोन क्षमताओं को और मजबूत करने के लिए पंजाब के जालंधर स्थित 11 कोर (वज्र कोर) के तहत एक विशेष ‘बाज बटालियन’ का गठन किया है। यह यूनिट पूरी तरह ड्रोन ऑपरेशंस, हवाई निगरानी और बैटलफील्ड इंटेलिजेंस पर केंद्रित होगी। सेना के अनुसार यह नई बटालियन वज्र कोर की हवाई पहुंच, प्रतिक्रिया क्षमता और युद्धक्षेत्र में निगरानी की ताकत को बढ़ाएगी।

वेस्टर्न कमांड के अंतर्गत बनाई गई इस यूनिट को ऑपरेशन सिंदूर के बाद शुरू किए गए सैन्य बदलावों का अहम हिस्सा माना जा रहा है। सेना का कहना है कि भविष्य के युद्धक्षेत्र में टेक्नोलॉजी, इनोवेशन और अनमैन्ड सिस्टम्स की भूमिका लगातार बढ़ रही है। इसी को ध्यान में रखते हुए बाज बटालियन जैसी विशेष ड्रोन यूनिट्स तैयार की जा रही हैं।

जालंधर में होगा Baaz Battalion का मुख्यालय

नई बनाई गई बाज बटालियन भारतीय सेना की 11 कोर के अधीन काम करेगी, जिसका मुख्यालय पंजाब के जालंधर में स्थित है। 11 कोर को वज्र कोर के नाम से भी जाना जाता है और यह पाकिस्तान से लगने वाले संवेदनशील क्षेत्रों की सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

सेना ने इन विशेष ड्रोन यूनिट्स का नाम “बाज” रखा है। बाज एक शिकारी पक्षी होता है, जो तेज नजर, लंबी दूरी तक निगरानी और सटीक टारगेट पहचानने की क्षमता के लिए जाना जाता है। इसी को ध्यान में रखते हुए इन बटालियनों का नामकरण किया गया है।

हाल के महीनों में इस यूनिट को खड़ा करने की प्रक्रिया शुरू हुई थी। जालंधर में स्थापित यह यूनिट पाकिस्तान सीमा से जुड़े इलाके में बनाई गई पहली बाज बटालियन मानी जा रही है। (Baaz Battalion)

Indian Army Baaz Battalion
(Image Source: VajraCorps-IndianArmy)

क्या होती है बाज बटालियन?

बाज बटालियन भारतीय सेना की विशेष ड्रोन यूनिट है, जिसे आर्मी एविएशन कॉर्प्स के तहत बनाया जा रहा है। इसका मुख्य उद्देश्य लंबी दूरी की निगरानी, टोही मिशन, लक्ष्य पहचान और युद्धक्षेत्र की लगातार जानकारी जुटाना है।

सेना में पहले से मौजूद छोटे ड्रोन प्लाटून और लोइटरिंग म्यूनिशन यूनिट्स की तुलना में बाज बटालियन कहीं बड़े स्तर पर काम करेगी। जहां इन्फैंट्री यूनिट्स के साथ “अश्नि ड्रोन प्लाटून” तत्काल इलाके की निगरानी करते हैं, वहीं बाज बटालियन कई किलोमीटर दूर तक निगरानी और डेटा एकत्र करने की क्षमता रखेगी।

इसका फोकस केवल ड्रोन उड़ाने तक सीमित नहीं होगा बल्कि पूरे ड्रोन इकोसिस्टम को संचालित करना होगा। इसमें ऑपरेशन, डेटा विश्लेषण, रखरखाव और जमीनी सैनिकों के साथ तालमेल शामिल रहेगा। (Baaz Battalion)

युद्धक्षेत्र में बढ़ेगी हवाई निगरानी

सेना के सूत्रों के अनुसार बाज बटालियन अग्रिम मोर्चे पर तैनात सैनिकों को बेहतर हवाई निगरानी और रियल टाइम सिचुएशनल अवेयरनेस उपलब्ध कराएगी।

आधुनिक युद्ध में यह जानना बेहद जरूरी होता है कि दुश्मन की गतिविधियां कहां हो रही हैं, कौन से क्षेत्र में सैनिकों की आवाजाही है और किस दिशा में खतरा बढ़ रहा है। ड्रोन लगातार हवा में रहकर यह जानकारी जुटा सकते हैं।

बाज बटालियन के जरिए सेना को सीमा क्षेत्रों और गहरे इलाकों में होने वाली गतिविधियों पर अधिक प्रभावी नजर रखने में मदद मिलेगी। इससे कमांडरों को तेजी से फैसले लेने के लिए जरूरी जानकारी मिल सकेगी। (Baaz Battalion)

Indian Army Baaz Battalion
(Image Source: VajraCorps-IndianArmy)

कई तरह के ड्रोन चला सकेगी यूनिट

जानकारी के अनुसार बाज़ बटालियन को अलग-अलग कैटेगरी के ड्रोन ऑपरेट करने के लिए तैयार किया जा रहा है। इसमें लंबी दूरी तक उड़ान भरने वाले यूएवी और कुछ लॉइटरिंग म्युनिशंस वाले ड्रोन भी शामिल हो सकते हैं।

इनमें अमेरिका की जनरल एटॉमिक्स कंपनी के एमक्यू-9बी, इजराइल के हेरॉन और हर्मीस जैसे प्लेटफॉर्म शामिल हैं। इसके अलावा डीआरडीओ द्वारा विकसित किए जा रहे घटक यूएवी तथा भारतीय कंपनियों आइडियाफोर्ज, एसएमपीपी और न्यूस्पेस रिसर्च द्वारा तैयार ड्रोन भी इस इकोसिस्टम का हिस्सा हो सकते हैं।

इन प्लेटफॉर्म की मदद से बेहतर निगरानी, टारगेट की पहचान, बॉर्डर मॉनिटरिंग और लंबे समय तक हवा में बने रहने जैसी क्षमताओं को मजबूती मिलेगी। (Baaz Battalion)

ड्रोन ऑपरेशंस का बनेगा केंद्रीय कमांड सेंटर

बाज बटालियन को केवल ड्रोन यूनिट नहीं बल्कि एक तरह का सेंट्रल ऑपरेशन सेंटर भी माना जा रहा है। सेना के पास अब अलग-अलग कंपनियों और अलग-अलग क्षमताओं वाले ड्रोन तेजी से बढ़ रहे हैं।

ऐसे में ट्रेनिंग, डेटा मैनेजमेंट, सॉफ्टवेयर अपडेट, रखरखाव और ऑपरेशनल कॉर्डिनेशन को एक जगह से ऑपरेट करने की जरूरत महसूस की जा रही थी। बाज बटालियन इसी भूमिका को निभाएगी।

सूत्रों के अनुसार आधुनिक ड्रोन बड़ी मात्रा में वीडियो, इमेज और सेंसर डेटा भेजते हैं। इस डेटा को प्रोसेस करना और उपयोगी इंटेलिजेंस में बदलना किसी भी ऑपरेशन की सफलता के लिए बेहद महत्वपूर्ण होता है।

Indian Army Baaz Battalion
(Image Source: VajraCorps-IndianArmy)

ऑपरेशन सिंदूर से मिला अनुभव

सेना के इस फैसले के पीछे हाल के सालों के कई सैन्य अनुभवों को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर चीन के साथ हुए सीमा गतिरोध और मई 2025 में पाकिस्तान के खिलाफ चलाए गए ऑपरेशन सिंदूर के दौरान ड्रोन और निगरानी सिस्टम्स की भूमिका काफी अहम रही थी।

इन अभियानों से यह स्पष्ट हुआ कि युद्धक्षेत्र में लगातार निगरानी और तेज सूचना प्रवाह सैन्य अभियानों की प्रभावशीलता को बढ़ाता है। इसी अनुभव के आधार पर सेना अपने ड्रोन स्ट्रक्चर का विस्तार कर रही है। (Baaz Battalion)

Indian Army Baaz Battalion
(Image Source: VajraCorps-IndianArmy)

अश्नि ड्रोन प्लाटून और दिव्यास्त्र के साथ होगा तालमेल

ऑपरेशन सिंदूर के बाद सेना ने विभिन्न स्तरों पर ड्रोन क्षमताओं को बढ़ाया है। प्रत्येक इन्फैंट्री बटालियन में “अश्नि ड्रोन प्लाटून” तैनात किए जा रहे हैं, जो आसपास के क्षेत्र की तत्काल निगरानी करते हैं।

वहीं आर्टिलरी रेजिमेंट्स ऐसे ड्रोन भी संचालित करती हैं जो लोइटरिंग म्यूनिशन ले जाते हैं। इन्हें वन-वे ड्रोन भी कहा जाता है क्योंकि ये टारगेट पर हमला करने के बाद वापस नहीं लौटते।

बाज बटालियन इन सभी क्षमताओं को बड़े स्तर की निगरानी और इंटेलिजेंस नेटवर्क से जोड़ने का काम करेगी। इसके लिए विशेष रूप से प्रशिक्षित सैनिकों और तकनीकी विशेषज्ञों की टीम तैयार की गई है, जो ड्रोन ऑपरेशंस, डेटा एक्सप्लॉइटेशन और जमीनी सैनिकों के साथ कॉर्डिनेशन करेगी। (Baaz Battalion)