📍नई दिल्ली | 25 Aug, 2026, 3:32 PM
DRDO Missile Technology Transfer: रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने मंगलवार को डीआरडीओ द्वारा विकसित सभी कॉन्वेंशनल मिसाइल सिस्टम्स की तकनीक भारतीय रक्षा उद्योग को ट्रांसफर करने की मंजूरी दे दी है। इस फैसले के बाद अब सिर्फ सरकारी कंपनियां ही नहीं, बल्कि निजी रक्षा कंपनियां और एमएसएमई भी मिसाइल निर्माण की प्रक्रिया में बड़ी भूमिका निभा सकेंगी।
रक्षा मंत्रालय के अनुसार यह फैसला आत्मनिर्भर भारत और स्वदेशी रक्षा उत्पादन को गति देने के उद्देश्य से लिया गया है। इससे डीआरडीओ की प्रयोगशालाओं में विकसित तकनीक सीधे उद्योग तक पहुंचेगी और मिसाइलों का उत्पादन भारत में ही बड़े पैमाने पर किया जा सकेगा।
DRDO Missile Technology Transfer: मिसाइल निर्माण में खत्म हो रही पुरानी व्यवस्था
पिछले कई सालों तक डीआरडीओ की ज्यादातर मिसाइल प्रोजेक्ट्स के उत्पादन की जिम्मेदारी मुख्य रूप से भारत डायनेमिक्स लिमिटेड (बीडीएल) और कुछ मामलों में भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (बीईएल) के पास रहती थी। डीआरडीओ तकनीक विकसित करता था और उत्पादन का बड़ा हिस्सा सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां संभालती थीं।
वहीं, अब रक्षा मंत्रालय ने इस मॉडल में बड़ा बदलाव किया है। डीआरडीओ की 10 से 12 प्रमुख टैक्टिकल मिसाइल प्रोजेक्ट्स को सार्वजनिक और निजी कंपनियों के बीच उनकी क्षमता के आधार पर बांटा जा रहा है। इसका उद्देश्य उत्पादन क्षमता बढ़ाना और रक्षा उद्योग को व्यापक बनाना है।
यह कदम प्रस्तावित डिफेंस एक्विजिशन प्रोसीजर (डीएपी) 2026 की जरूरतों के अनुरूप भी माना जा रहा है, जिसमें निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाने पर जोर दिया गया है।
क्या होती हैं टैक्टिकल मिसाइलें?
टैक्टिकल मिसाइलें ऐसी गाइडेड मिसाइलें होती हैं, जिनका इस्तेमाल युद्ध क्षेत्र में सीमित दूरी के भीतर सटीक हमले के लिए किया जाता है। इनका इस्तेमाल दुश्मन के सैन्य ठिकानों, रडार, एयर डिफेंस सिस्टम, बख्तरबंद वाहनों, युद्धपोतों और अन्य महत्वपूर्ण मिलिट्री टारगेट्स को निशाना बनाने के लिए किया जाता है।
ये मिसाइलें स्ट्रेटेजिक मिसाइलों से अलग होती हैं। स्ट्रेटेजिक मिसाइलें लंबी दूरी तक जाकर बड़े टारगेट्स पर हमला करने के लिए बनाई जाती हैं, जबकि टैक्टिकल मिसाइलें युद्ध क्षेत्र में त्वरित और सटीक कार्रवाई के लिए इस्तेमाल होती हैं।
राजनाथ सिंह की मंजूरी का क्या मतलब है?
रक्षा मंत्री की मंजूरी के बाद डीआरडीओ द्वारा विकसित सभी कॉन्वेंशनल मिसाइल सिस्टम्स की तकनीक भारतीय उद्योगों को ट्रांसफर की जा सकेगी। उद्योगों को यह तकनीक निर्धारित योग्यता, सुरक्षा मंजूरी, लाइसेंस और प्रमाणन प्रक्रियाओं के बाद दी जाएगी।
इससे मिसाइल विकास से लेकर उत्पादन तक का पूरा चक्र भारत में ही पूरा किया जा सकेगा। रक्षा मंत्रालय का कहना है कि इससे घरेलू विनिर्माण क्षमता मजबूत होगी, आयात पर निर्भरता कम होगी और भारतीय सप्लाई चेन को बढ़ावा मिलेगा।
किन कंपनियों को मिल रहा है मौका?
डीआरडीओ ने डेवलपमेंट-कम-प्रोडक्शन पार्टनर (DcPP) मॉडल के तहत कई निजी कंपनियों को शामिल किया है। इनमें अदाणी डिफेंस एंड एयरोस्पेस, भारत फोर्ज, आईकॉम और सोलर डिफेंस एंड एयरोस्पेस जैसी कंपनियां शामिल हैं।
इनके अलावा बीडीएल और बीईएल भी कई प्रोजेक्ट में उत्पादन साझेदार बने हुए हैं। कुछ प्रोजेक्ट्स में सार्वजनिक और निजी कंपनियां मिलकर काम कर रही हैं।
डीसीपीपी मॉडल में डीआरडीओ और उद्योग साझेदार मिलकर सिस्टम का विकास, प्रोटोटाइप निर्माण, परीक्षण और उत्पादन की तैयारी करते हैं। इसके बाद सशस्त्र बलों से ऑर्डर मिलने पर बड़े पैमाने पर निर्माण शुरू होता है। (DRDO Missile Technology Transfer)
कौन-कौन सी मिसाइलें हो सकती हैं शामिल?
यह फैसला डीआरडीओ की लगभग सभी कॉन्वेंशनल मिसाइल सिस्टम्स पर लागू होगा।
एयर डिफेंस क्षेत्र में आकाश, आकाश-एनजी, क्यूआरएसएएम और अन्य एयर डिफेंस सिस्टम्स शामिल हैं। एंटी-टैंक श्रेणी में नाग, हेलीना, ध्रुवास्त्र और एमपीएटीजीएम जैसी मिसाइलें आती हैं।
एयर-टू-एयर श्रेणी में अस्त्र एमके-1 और अस्त्र एमके-2 शामिल हैं। एंटी-शिप और क्रूज मिसाइलों में ब्रह्मोस, रुद्रम सीरीज, एलआरएलएसीएम, एनएएसएम-एसआर और एनएएसएम-एमआर जैसी मिसाइलें शामिल हैं।
टैक्टिकल बैलिस्टिक मिसाइल श्रेणी में प्रहार और प्रलय जैसे सिस्टम आते हैं। इसके अलावा पिनाका के गाइडेड रॉकेट और स्मार्ट (SMART) जैसे एडवांस सिस्टम्स प्रणालियां भी इस दायरे में मानी जा रही हैं।
हालांकि ब्रह्मोस मिसाइल भारत और रूस का जॉइंट डेवलपमेंट है। इस जॉइंट वेंचर में डीआरडीओ की हिस्सेदारी 50.5 प्रतिशत और रूसी कंपनी की हिस्सेदारी 49.5 प्रतिशत है। ब्रह्मोस एयरोस्पेस मिसाइल के डिजाइन, डेवलपमेंट, उत्पादन, इंटीग्रेशन, परीक्षण और वैश्विक मार्केटिंग की जिम्मेदारी संभालती है। ब्रह्मोस मिसाइल का अंतिम इंटीग्रेशन और असेंबली ब्रह्मोस एयरोस्पेस द्वारा की जाती है। मिसाइल के विभिन्न हिस्सों के निर्माण में 200 से अधिक भारतीय कंपनियां, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम और एमएसएमई शामिल हैं। (DRDO Missile Technology Transfer)
🚨 Big Boost for India’s Missile Manufacturing Ecosystem!
Raksha Mantri Rajnath Singh has approved the Transfer of Technology (ToT) of DRDO-developed conventional missile systems to Indian defence industry, paving the way for large-scale indigenous production under the… pic.twitter.com/edomn6syMP— Raksha Samachar | रक्षा समाचार 🇮🇳 (@RakshaSamachar) August 25, 2026
प्रलय और रुद्रम जैसे कार्यक्रमों में निजी कंपनियों की एंट्री
प्रलय मिसाइल कार्यक्रम में बीडीएल और बीईएल पहले से उत्पादन साझेदार हैं। इसके साथ अदाणी डिफेंस, भारत फोर्ज और सोलर डिफेंस जैसी कंपनियां भी जुड़ी हुई हैं।
प्रलय मिसाइल ने दिसंबर 2025 के अंत में यूजर इवैल्यूएशन ट्रायल पूरे किए थे। इसकी मारक क्षमता लगभग 150 से 500 किलोमीटर के बीच बताई जाती है।
वहीं, रुद्रम-1, रुद्रम-2 और रुद्रम-3 जैसी एयर-टू-सरफेस तथा एंटी-रेडिएशन मिसाइल प्रोजेक्ट्स में भी निजी कंपनियों की भागीदारी बढ़ाई गई है। ये मिसाइलें दुश्मन के रडार और एयर डिफेंस सिस्टम को निशाना बनाने के लिए विकसित की गई हैं।
हेलीकॉप्टर से दागी जाने वाली मिसाइलों पर भी काम
डीआरडीओ की नेवल एंटी-शिप मिसाइल-शॉर्ट रेंज (NASM-SR) भी उन प्रोजेक्ट्स में शामिल है जिनमें निजी उद्योग सहयोग कर रहा है। यह भारत की पहली स्वदेशी हेलीकॉप्टर लॉन्च एंटी-शिप मिसाइल मानी जाती है।
इसके अलावा वीएसएचओरैड्स, यूएलपीजीएम-वी3 और लॉन्ग रेंज ग्लाइड बम जैसे प्रोजेक्ट्स में भी निजी कंपनियों को जिम्मेदारी दी जा रही है। (DRDO Missile Technology Transfer)
डीआरडीओ की टीओटी पॉलिसी में क्या है खास?
डीआरडीओ की ट्रांसफर ऑफ टेक्नोलॉजी (ToT) पॉलिसी 2025 के तहत मिसाइल तकनीकें कैटेगरी-ए यानी मिलिटेक (MILTECH) के अंतर्गत आती हैं। इन तकनीकों का इस्तेमाल केवल भारतीय सशस्त्र बलों, गृह मंत्रालय या अन्य सरकारी एजेंसियों के लिए किया जा सकता है।
इसके तहत तकनीक केवल भारतीय उद्योगों को दी जाएगी और उत्पादन भारत में ही होगा। इसके लिए एंड यूजर सर्टिफिकेट, इंडस्ट्रियल लाइसेंस और अन्य सुरक्षा मंजूरियां जरूरी होंगी।
मिसाइलों में इस्तेमाल होने वाले विस्फोटक, प्रोपेलेंट और पायरो मैटेरियल से जुड़ी तकनीक केवल उन्हीं कंपनियों को मिलेगी जिनके पास पीईएसओ (PESO) लाइसेंस होगा।
फीस और रॉयल्टी में बड़ी राहत
डीआरडीओ की नई नीति के तहत डेवलपमेंट-कम-प्रोडक्शन पार्टनर और प्रोडक्शन एजेंसी के लिए टीओटी फीस पूरी तरह माफ रखी गई है। इसके अलावा भारतीय सेनाओं को सप्लाई किए जाने वाले प्रोडक्ट्स पर रॉयल्टी भी शून्य रखी गई है।
इसका उद्देश्य उद्योगों को अधिक से अधिक निवेश के लिए प्रोत्साहित करना है ताकि उत्पादन क्षमता तेजी से बढ़ाई जा सके। (DRDO Missile Technology Transfer)
डीआरडीओ ने निजी कंपनियों से मांगे आवेदन
हाल ही में डीआरडीओ के डायरेक्टर जनरल (मिसाइल्स एंड स्ट्रेटेजिक सिस्टम्स) क्लस्टर ने भविष्य की मिसाइल और बम वेपन सिस्टम के डेवलपमेंट एंड प्रोडक्शन के लिए निजी कंपनियों से आवेदन भी मांगे हैं। अब तक अग्नि सीरीज जैसी रणनीतिक मिसाइलों और अन्य संवेदनशील हथियार प्रणालियों के उत्पादन का काम मुख्य रूप से भारत डायनेमिक्स लिमिटेड (BDL) जैसी सरकारी कंपनियां करती रही हैं।
हैदराबाद स्थित रिसर्च सेंटर इमारत (आरसीआई) ने इसके लिए एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट जारी किया है। इस प्रक्रिया के तहत योग्य भारतीय कंपनियों का चयन किया जाएगा, जिन्हें बाद में विभिन्न प्रोजेक्ट्स के लिए निविदाएं भेजी जाएंगी।
डीआरडीओ डेवलपमेंट-कम-प्रोडक्शन पार्टनर (DcPP) मॉडल के तहत हर प्रोजेक्ट के लिए कम से कम दो कंपनियों का चयन करेगा। ये कंपनियां डीआरडीओ के साथ मिलकर प्रोटोटाइप तैयार करेंगी, उनका परीक्षण करेंगी और बाद में बड़े पैमाने पर उत्पादन में भी भागीदारी करेंगी।
इन कंपनियों के पास डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग लाइसेंस, पीईएसओ मंजूरी, पर्याप्त उत्पादन क्षमता, तकनीकी विशेषज्ञता और वित्तीय मजबूती होना जरूरी होगा। (DRDO Missile Technology Transfer)
रक्षा सचिव ने दिया था हिंट
इससे पहले मई में सीआईआई एनुअल बिजनेस समिट 2026 में बोलते हुए रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने कहा था कि सरकार अब बैलिस्टिक मिसाइलों के निर्माण में निजी कंपनियों को शामिल करने पर विचार कर रही है। अभी तक बैलिस्टिक मिसाइलों का उत्पादन मुख्य रूप से रक्षा क्षेत्र की सरकारी कंपनियों (डीपीएसयू) तक सीमित था, लेकिन सरकार निजी उद्योग को भी समान अवसर देना चाहती है। उनके अनुसार भविष्य में बैलिस्टिक मिसाइल उत्पादन में निजी उद्योग की भागीदारी बढ़ाने के लिए सरकार की ओर से महत्वपूर्ण फैसले लिए जा सकते हैं। (DRDO Missile Technology Transfer)
Author
हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।





