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मेरठ में बनेगा देश का पहला ड्रोन रनवे, C-130 और C-295 विमान भी भर सकेंगे उड़ान

बीआरओ की तरफ से जारी आरएफपी के मुताबिक प्रोजेक्ट की अनुमानित लागत 371.15 करोड़ रुपये रखी गई है। इससे पहले इसी प्रोजेक्ट के लिए करीब 406 करोड़ रुपये का टेंडर जारी किया गया था...

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📍नई दिल्ली/मेरठ | 25 Aug, 2026, 12:04 PM

India First Drone Runway: भारत में ड्रोन और यूएवी के रणनीतिक महत्व को देखते हुए एक बड़े डिफेंस इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट की तैयारियां शुरू हो गई हैं। उत्तर प्रदेश के मेरठ कैंट में देश का पहला समर्पित ड्रोन और यूएवी रनवे बनाने की प्रक्रिया तेज हो गई है। बॉर्डर रोड्स ऑर्गेनाइजेशन (बीआरओ) ने इस प्रोजेक्ट के लिए 371.15 करोड़ रुपये का नया टेंडर जारी किया है।

यह प्रोजेक्ट मेरठ कैंटोनमेंट के किला रोड स्थित मिलिट्री फार्म क्षेत्र में तैयार की जाएगा। प्रस्तावित एविएशन इंफ्रास्ट्रक्चर लगभग 900 एकड़ भूमि पर बनाया जाना है। यह प्रोजेक्ट बीआरओ के प्रोजेक्ट शिवालिक के तहत बनाया जा रहा है और इसका उद्देश्य भविष्य की सैन्य जरूरतों, ड्रोन ऑपरेशंस और एयर मोबिलिटी क्षमताओं को मजबूत करना है।

बता दें कि रक्षा समाचार ने इस साल 15 फरवरी को सबसे पहले मेरठ में पहला ड्रोन एयरबेस बनाने की जानकारी दी थी।

India First Drone Runway: 371.15 करोड़ रुपये की लागत से बनेगा प्रोजेक्ट

बीआरओ की तरफ से जारी आरएफपी के मुताबिक प्रोजेक्ट की अनुमानित लागत 371.15 करोड़ रुपये रखी गई है। इससे पहले इसी प्रोजेक्ट के लिए करीब 406 करोड़ रुपये का टेंडर जारी किया गया था। बाद में प्रक्रिया में बदलाव होने के बाद चंडीगढ़ स्थित बीआरओ के अतिरिक्त महानिदेशक (नॉर्थ-वेस्ट) ने संशोधित लागत के साथ नया टेंडर जारी किया है।

टेंडर प्रक्रिया पूरी होने के बाद चयनित एजेंसी को विस्तृत प्रोजेक्ट रिपोर्ट यानी डीपीआर तैयार करने के लिए सात महीने का समय दिया जाएगा।

1,690 किलोमीटर लंबा होगा रनवे

प्रोजक्ट के तहत 45 मीटक चौड़ा और कम से कम 1,690 मीटर लंबा रनवे बनाया जाएगा। इसके साथ टैक्सीवे (जहां से विमान रनवे तक पहुंचते हैं) और एप्रन (जहां विमान खड़े किए जाते हैं) भी विकसित किए जाएंगे।

रनवे पर रात और खराब मौसम में सुरक्षित फ्लाइट ऑपरेशन के लिए आधुनिक रनवे लाइटिंग सिस्टम लगाया जाएगा। साथ ही पीएपीआई (प्रिसिजन अप्रोच पाथ इंडिकेटर) जैसी अप्रोच लाइटिंग सुविधा भी होगी, जो पायलटों को लैंडिंग के दौरान सही दिशा और ऊंचाई बनाए रखने में मदद करती है।

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रनवे के साथ-साथ दो बड़े हैंगर भी बनाए जाएंगे। प्रत्येक हैंगर की चौड़ाई लगभग 60 मीटर और लंबाई 50 मीटर होगी। इन हैंगरों का इस्तेमाल ड्रोन, यूएवी और अन्य हवाई प्लेटफॉर्म को सुरक्षित रखने, रखरखाव और तकनीकी कार्यों के लिए किया जाएगा। साथ ही सुरक्षा के लिए आधुनिक फायर फाइटिंग और फायर अलार्म सिस्टम भी लगाए जाएंगे।

रनवे और हैंगर के अलावा टैक्सी ट्रैक, ऑपरेशनल एरिया, तकनीकी सपोर्ट सुविधाएं और अन्य एविएशन इंफ्रास्ट्रक्चर भी तैयार किया जाएगा।

सी-295 और सी-130 भी कर सकेंगे ऑपरेशन

इस प्रोजेक्ट की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक यह है कि यहां केवल ड्रोन ही नहीं, बल्कि भारतीय वायुसेना के ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट भी ऑपरेट कर सकेंगे। रनवे को इस तरह डिजाइन किया जा रहा है कि भारतीय वायुसेना के बड़े परिवहन विमान जैसे सी-295 और सी-130 भी यहां से उड़ान भर सकें और उतर सकें। भविष्य में इस रनवे का इस्तेमाल सैन्य लॉजिस्टिक्स और एयर सपोर्ट हब के रूप में भी इस्तेमाल किया जा सकेगा।

सी-295 एक आधुनिक टैक्टिकल ट्रांसपोर्ट विमान है, जिसे भारतीय वायुसेना पुराने एएन-32 और एव्रो विमानों के जगह पर शामिल कर रही है। वहीं सी-130जे सुपर हरक्यूलिस विशेष अभियान, सैनिकों की तैनाती, सैन्य उपकरणों की ढुलाई और आपातकालीन मिशनों के लिए इस्तेमाल किया जाता है।

उपकरण में नहीं हो सिम या ई-सिम स्लॉट

शर्तों के मुताबिक कंपनी की तरफ से इस्तेमाल होने वाले किसी भी उपकरण में सिम या ई-सिम स्लॉट नहीं होना चाहिए। साथ ही उसमें ऐसा कोई कम्युनिकेशन मॉड्यूल नहीं लगाया जा सकता, जो भारत की जमीनी सीमा साझा करने वाले किसी देश का हो और बाहरी मोबाइल या नेटवर्क कनेक्टिविटी प्रदान करता हो।

उपकरण में लगे इलेक्ट्रॉनिक कंट्रोल यूनिट (ईसीयू) या कंट्रोल यूनिट भी ऐसे किसी देश के नहीं होने चाहिए, जो भारत के साथ भूमि सीमा साझा करता है। यह शर्त मूल उपकरण और बाद में लगाए गए पुर्जों, दोनों पर लागू होगी।

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उपकरण में मौजूद टेलीमैटिक्स सिस्टम या हार्डवेयर में ऐसे मल्टी-जीएनएसएस चिप्स का उपयोग नहीं किया जा सकेगा, जो जीपीएस और ग्लोनास के साथ-साथ चीन के बेइदोउ नेविगेशन सिस्टम को भी सपोर्ट करते हों।

इसके अलावा उपकरण में अनधिकृत रिमोट एक्सेस, रिमोट कंट्रोल या दूर से बंद करने जैसी कोई सुविधा नहीं होनी चाहिए।

पश्चिमी मोर्चे पर मजबूत तैयारी

मेरठ में बनाया जा रहा देश का पहला समर्पित ड्रोन और यूएवी रनवे पश्चिमी मोर्चे पर भारत की निगरानी और सैन्य तैयारियों को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण परियोजना माना जा रहा है। मई 2025 में हुए ऑपरेशन सिंदूर के दौरान ड्रोन आधारित निगरानी और अभियानों की उपयोगिता भी सामने आई थी।

मेरठ कैंट में बनने वाला यह रनवे मुख्य रूप से हाई एल्टीट्यूड लॉन्ग एंड्योरेंस (HALE) श्रेणी के रिमोटली पायलटेड एयरक्राफ्ट और बड़े ड्रोन के ऑपरेशनों के लिए बनाया जा रहा है। रनवे पर आधुनिक आईसीएओ कैट-2 लाइटिंग सिस्टम और एडवांस नेविगेशन सुविधाएं लगाई जाएंगी। इससे खराब मौसम, धुंध या कम दृश्यता की स्थिति में भी सुरक्षित उड़ान संचालन संभव हो सकेगा।

इस केंद्र की अनुमानित क्षमता हर साल लगभग 1,500 ड्रोन मिशन संचालित करने की होगी। यानी औसतन प्रतिदिन चार ड्रोन उड़ानें यहां से संचालित की जा सकेंगी।

मेरठ का यह रनवे  पाकिस्तान सीमा और अन्य संवेदनशील क्षेत्रों की रियल-टाइम इंटेलिजेंस, सर्विलांस और रिकॉनिसेंस (ISR) गतिविधियों के लिए एक महत्वपूर्ण हब के रूप में विकसित किया जा रहा है। यहां से संचालित होने वाले हाई एल्टीट्यूड लॉन्ग एंड्योरेंस ड्रोन लंबे समय तक हवा में रहकर पंजाब, राजस्थान और जम्मू सेक्टर सहित पश्चिमी सीमा क्षेत्रों की निगरानी कर सकेंगे और आवश्यक जानकारी सुरक्षा एजेंसियों तक पहुंचा सकेंगे।

प्रशिक्षण और परीक्षण गतिविधियों का भी बनेगा केंद्र

प्रस्तावित एविएशन इंफ्रास्ट्रक्चर में ड्रोन पायलट प्रशिक्षण, मिशन प्लानिंग, तकनीकी परीक्षण और ऑपरेशनल मूल्यांकन जैसी गतिविधियों के लिए भी सुविधाएं विकसित की जा सकती हैं।

रिमोटली पायलटेड एयरक्राफ्ट सिस्टम के ऑपरेशन के लिए विशेष प्रशिक्षण की जरूरत होती है। ऐसे में यह केंद्र सैन्य कर्मियों के लिए प्रशिक्षण स्थल के रूप में भी अहम भूमिका निभा सकता है। साथ ही नए ड्रोन प्लेटफॉर्म, सेंसर और तकनीकों के परीक्षण के लिए भी यहां सुविधाएं उपलब्ध कराई जा सकती हैं।

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आपदा प्रबंधन में भी मिल सकती है मदद

यह प्रोजेक्ट आपदा प्रबंधन से जुड़े अभियानों में भी उपयोगी साबित हो सकती है। बड़े रनवे और ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट संचालन की क्षमता के कारण राहत सामग्री, चिकित्सा उपकरण और बचाव दलों को तेजी से प्रभावित क्षेत्रों तक पहुंचाया जा सकता है।

विशेष परिस्थितियों में ड्रोन के जरिए सर्वेक्षण, क्षति का आकलन और राहत कार्यों की निगरानी भी की जा सकती है। इसी कारण प्रोजेक्ट को केवल सैन्य दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि बहुउद्देश्यीय एविएशन इंफ्रास्ट्रक्चर के रूप में भी देखा जा रहा है।

18 महीने में निर्माण पूरा करने का लक्ष्य

बीआरओ ने इसका निर्माण कार्य पूरा करने के लिए 18 महीने यानी 548 दिन का समय निर्धारित किया है। प्रोजेक्ट पूरी होने के बाद पांच वर्ष की रखरखाव अवधि भी तय की गई है।

टेंडर में शामिल शर्तों के मुताबिक चयनित कंपनी को एविएशन इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण का अनुभव होना जरूरी है। बड़े एयरफील्ड, रनवे और हैंगर निर्माण से जुड़ी तकनीकी क्षमता को भी पात्रता मानदंड में शामिल किया गया है।

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    हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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