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Explainer: भारत-चीन ने क्यों चुने जोशीमठ और तवांग? LAC पर क्या होने वाला है बड़ा बदलाव?

संयुक्त बयान की भाषा में दोनों देशों ने "तिब्बत" या "शिजांग" जैसे संवेदनशील शब्दों का इस्तेमाल नहीं किया। इसके बजाय केवल "कैलाश-मानसरोवर यात्रा" और "तीन दर्रों के माध्यम से सीमा व्यापार" जैसे शब्दों का उल्लेख किया गया...

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📍नई दिल्ली/बीजिंग | 30 Aug, 2026, 8:00 AM

India-China LAC Military Communication: भारत और चीन के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर तनाव कम करने और सैन्य स्तर पर बेहतर संवाद स्थापित करने के लिए 25 अगस्त को बीजिंग में हुई स्पेशल रिप्रेजेंटेटिव की बातचीत के बाद दोनों देशों ने सीमा प्रबंधन से जुड़े आठ बिंदुओं पर सहमति बनाई। इनमें सबसे महत्वपूर्ण फैसला पूर्वी और मध्य सेक्टर में दो नए मिलिट्री मीटिंग पॉइंटस और दो नई मिलिट्री हॉटलाइन स्थापित करने का है।

रिपोर्टों के अनुसार भारत की ओर से उत्तराखंड के जोशीमठ और अरुणाचल प्रदेश के तवांग को नया संपर्क केंद्र बनाया जा सकता है। हालांकि आधिकारिक संयुक्त बयान में इन शहरों का नाम नहीं लिया गया है, लेकिन रक्षा सूत्रों का कहना है कि इन्हीं स्थानों से नए मिलिट्री कम्युनिकेश सिस्टम को ऑपरेट किया जा सकता है।

India-China LAC Military Communication: 18 घंटे बाद आया संयुक्त बयान

25 अगस्त को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और चीन के विदेश मंत्री वांग यी के बीच बीजिंग में विशेष प्रतिनिधियों की 25वीं बैठक हुई थी। बैठक के बाद दोनों देशों ने अलग-अलग बयान जारी किए।

भारत ने कहा कि दोनों पक्षों ने द्विपक्षीय संबंधों की समीक्षा की और सहयोग बढ़ाने तथा स्थिरता बनाए रखने के तरीकों पर चर्चा की। वहीं चीन ने वार्ता को व्यापक, गहन, मैत्रीपूर्ण और स्पष्ट बताया तथा कहा कि भारत-चीन संबंधों का वैश्विक और रणनीतिक महत्व है।

इन अलग-अलग बयानों के कारण यह अटकलें लगने लगीं कि सीमा विवाद जैसे संवेदनशील मुद्दों पर सहमति बनाना आसान नहीं रहा। लेकिन लगभग 18 घंटे बाद 26 अगस्त को दोनों देशों ने एक समान आठ सूत्रीय संयुक्त सहमति जारी की। इसमें सीमा निर्धारण, सैन्य संवाद, सीमा व्यापार, कैलाश मानसरोवर यात्रा और सीमा पार नदियों पर सहयोग जैसे मुद्दे शामिल थे।

खास बात यह रही कि संयुक्त बयान की भाषा में दोनों देशों ने “तिब्बत” या “शिजांग” जैसे संवेदनशील शब्दों का इस्तेमाल नहीं किया।

इसके बजाय केवल “कैलाश-मानसरोवर यात्रा” और “तीन दर्रों के माध्यम से सीमा व्यापार” जैसे शब्दों का उल्लेख किया गया। यहां भी दोनों पक्षों ने पर्वत और झील के भारतीय तथा तिब्बती नामों कैलाश और गंग रिनपोछे, मानसरोवर और मापाम युम त्सो का इस्तेमाल किया।

“अर्ली एंड सब्स्टेंशियल हार्वेस्ट” का क्या है मतलब?

“अर्ली एंड सब्स्टेंशियल हार्वेस्ट” शब्द का इस्तेमाल पहली बार 2024 और 2025 में किया गया था। इसका मतलब सीमा विवाद के अंतिम समाधान से पहले कुछ क्षेत्रों में सीमा निर्धारण और मैपिंग के काम में प्रगति करना है।

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यह प्रक्रिया 2005 के “पॉलिटिकल पैरामीटर्स एंड गाइडिंग प्रिंसिपल्स” समझौते के दायरे में की जा रही है। इसका उद्देश्य यह तय करना है कि वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) किन क्षेत्रों से गुजरती है, जबकि अंतिम सीमा समझौता बाद में किया जा सकता है।

एलएसी पर क्या नया फैसला हुआ

एलएसी यानी लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल भारत और चीन के बीच औपचारिक रूप से तय अंतरराष्ट्रीय सीमा नहीं है। भारत के अनुसार इसकी लंबाई लगभग 3,488 किलोमीटर है।

एलएसी को तीन हिस्सों में बांटा जाता है। पश्चिमी सेक्टर में लद्दाख आता है। मध्य सेक्टर में हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड शामिल हैं। पूर्वी सेक्टर में सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश आते हैं।

संयुक्त सहमति के अनुसार भारत और चीन ने पूर्वी और मध्य सेक्टर में दो अतिरिक्त सीनियर मिलिट्री मीटिंग सेंटर स्थापित करने पर सहमति जताई है। साथ ही दो नई सैन्य हॉटलाइन भी शुरू की जाएंगी।

अब तक प्रभावी मिलिट्री हॉटलाइन मुख्य रूप से पश्चिमी सेक्टर यानी लद्दाख क्षेत्र तक सीमित थी। नई व्यवस्था के बाद उत्तराखंड और अरुणाचल प्रदेश जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में भी वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों के बीच सीधा संपर्क संभव होगा।

इसका फायदा यह होगा कि किसी पेट्रोलिंग पार्टी के आमने-सामने आने, सीमा पर गलतफहमी पैदा होने या किसी स्थानीय तनाव की स्थिति में वरिष्ठ अधिकारी सीधे बातचीत कर सकेंगे। इससे घटनाओं की पुष्टि और स्थिति को नियंत्रित करने में कम समय लगेगा। (India-China LAC Military Communication)

क्यों चुना जा सकता है जोशीमठ

मध्य सेक्टर में जोशीमठ भारतीय सेना के लिए एक महत्वपूर्ण सैन्य और लॉजिस्टिक केंद्र है। मध्य सेक्टर आमतौर पर लद्दाख या अरुणाचल प्रदेश की तुलना में अपेक्षाकृत शांत माना जाता है, लेकिन बराहोटी जैसे क्षेत्रों में दोनों देशों के बीच अलग-अलग दावे और धारणाएं मौजूद हैं। उत्तराखंड में एलएसी के कई संवेदनशील क्षेत्रों तक पहुंच के लिए यही प्रमुख आधार माना जाता है।

इस क्षेत्र के सामने चीन की ओर जांदा काउंटी स्थित है। यह इलाका तिब्बत क्षेत्र के नगारी मिलिट्री सब-डिस्ट्रिक्ट में आता है।

चीनी सेना का स्ट्रक्चर देखें तो भारत के साथ पूरी एलएसी की सैन्य जिम्मेदारी वेस्टर्न थिएटर कमांड के पास है, जिसका मुख्यालय चेंगदू में स्थित है। इसके अधीन दो प्रमुख सैन्य जिले हैं, तिब्बत मिलिट्री डिस्ट्रिक्ट और शिनजियांग मिलिट्री डिस्ट्रिक्ट।

तिब्बत मिलिट्री डिस्ट्रिक्ट को आगे कई मिलिट्री सब-डिस्ट्रिक्ट में बांटा गया है। इनमें नगारी मिलिट्री सब-डिस्ट्रिक्ट मध्य सेक्टर की जिम्मेदारी संभालता है। इसी वजह से माना जा रहा है कि भारतीय इलाके में जोशीमठ और चीनी इलाके में जांदा क्षेत्र सैन्य बैठकों के केंद्र बन सकते हैं। (India-China LAC Military Communication)

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संवेदनशील है तवांग सेक्टर

पूर्वी सेक्टर में तवांग सबसे संवेदनशील क्षेत्रों में गिना जाता है। भारत अरुणाचल प्रदेश को अपना अभिन्न हिस्सा मानता है, जबकि चीन राज्य के बड़े हिस्से पर दावा करता है और इसे तथाकथित “दक्षिण तिब्बत” कहता है।

तवांग के सामने चीन की ओर कुओना काउंटी स्थित है, जो तिब्बत मिलिट्री डिस्ट्रिक्ट के निंगची मिलिट्री सब-डिस्ट्रिक्ट के अधीन आती है।

यह क्षेत्र पहले भी कई बार तनाव का केंद्र रहा है। दिसंबर 2022 में तवांग के यांग्त्से इलाके में भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच झड़प हुई थी। ऐसे में वरिष्ठ स्तर की सीधी सैन्य संपर्क व्यवस्था किसी भी घटना के बाद तेजी से संवाद स्थापित करने में मदद कर सकती है। (India-China LAC Military Communication)

कैसे काम करता है चीन का मिलिट्री स्ट्रक्चर

भारत के सामने तैनात चीनी सेना की कमान वेस्टर्न थिएटर कमांड के पास है। इसके भीतर विभिन्न मिलिट्री सब-डिस्ट्रिक्ट काम करते हैं।

हर मिलिट्री सब-डिस्ट्रिक्ट का नेतृत्व आमतौर पर एक सीनियर कर्नल करता है। यह रैंक भारतीय सेना के ब्रिगेडियर के लगभग बराबर मानी जाती है। हालांकि पीएलए यानी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी में पद से अधिक संगठनात्मक ग्रेड को महत्व दिया जाता है।

गलवान संघर्ष के बाद हुई कई सैन्य बैठकों में चीनी पक्ष का नेतृत्व मेजर जनरल लियू लिन ने किया था। उस समय वे दक्षिणी शिनजियांग मिलिट्री रीजन के कमांडर थे। जबकि भारतीय पक्ष की ओर से लद्दाख स्थित 14 कोर के कमांडर इन बैठकों का नेतृत्व करते थे।

इसी अनुभव के आधार पर माना जा रहा है कि नए बैठक केंद्रों पर भारतीय पक्ष की ओर से डिवीजन कमांडर या ब्रिगेड कमांडर स्तर के अधिकारी शामिल हो सकते हैं। (India-China LAC Military Communication)

गलवान के बाद बदला बॉर्डर मैनेजमेंट का स्ट्रक्चर

15 जून 2020 को गलवान घाटी में भारत और चीन के सैनिकों के बीच हिंसक संघर्ष हुआ था। इस घटना में 20 भारतीय सैनिक शहीद हुए थे। इसके बाद सीमा पर कई सालों तक तनाव बना रहा।

गलवान संकट के दौरान यह महसूस किया गया कि एलएसी के विभिन्न सेक्टरों में स्थानीय संपर्क तो मौजूद हैं, लेकिन हर सेक्टर में वरिष्ठ स्तर की मजबूत संवाद व्यवस्था नहीं है।

इसी के चलते कोर कमांडर स्तर की वार्ताएं लंबे समय तक सीमा प्रबंधन का मुख्य माध्यम बनी रहीं। अब भारत और चीन उसी अनुभव को पूर्वी और मध्य सेक्टर तक आगे बढ़ा रहे हैं। (India-China LAC Military Communication)

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सीमा विवाद का समाधान नहीं, लेकिन संवाद का नया माध्यम

विशेषज्ञों का कहना है कि नई हॉटलाइन और बैठक केंद्र किसी भी तरह से सीमा विवाद का समाधान नहीं हैं। एलएसी अभी भी दोनों देशों के बीच औपचारिक रूप से निर्धारित सीमा नहीं है और कई क्षेत्रों में दोनों की धारणाएं अलग-अलग हैं।

इसके बावजूद ऐसे कॉन्टैक्ट सिस्टम का महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि हिमालयी इलाकों में किसी भी छोटे सैन्य घटनाक्रम के राजनीतिक और रणनीतिक प्रभाव बड़े हो सकते हैं।

यदि किसी क्षेत्र में गश्ती दल आमने-सामने आते हैं या किसी गतिविधि को लेकर संदेह पैदा होता है, तो वरिष्ठ अधिकारी सीधे संपर्क करके स्थिति की जानकारी साझा कर सकते हैं। इससे गलतफहमी और गलत आकलन की संभावना कम होती है। (India-China LAC Military Communication)

सीमा वार्ता के साथ अन्य मुद्दों पर भी सहमति

भारत और चीन के बीच बनी आठ सूत्रीय सहमति में दोनों पक्षों ने सीमा निर्धारण से जुड़े विशेषज्ञ समूहों को आगे काम करने का निर्देश दिया है।

इसके अलावा कैलाश मानसरोवर यात्रा को सुविधाजनक बनाने, सीमा व्यापार को बढ़ावा देने और सीमा पार बहने वाली नदियों पर विशेषज्ञ स्तर की बैठक आयोजित करने पर भी सहमति बनी है।

दोनों देशों ने यह भी तय किया है कि विशेष प्रतिनिधियों की अगली यानी 26वीं बैठक भारत में वर्ष 2027 में आयोजित की जाएगी। (India-China LAC Military Communication)

पहले से मौजूद हैं कई मीटिंग पॉइंट्स

भारत और चीन के बीच पहले से पांच प्रमुख बॉर्डर पर्सनल मीटिंग (बीपीएम) केंद्र मौजूद हैं। इनमें लद्दाख के दौलत बेग ओल्डी और चुशूल, सिक्किम का नाथू ला तथा अरुणाचल प्रदेश के बुम ला और किबिथू शामिल हैं।

हालांकि बीपीएम केंद्रों पर होने वाली बैठकें और वरिष्ठ सैन्य कमांडरों की वार्ताएं अलग प्रकार की होती हैं। नए केंद्रों का उद्देश्य उच्च स्तर पर सैन्य संपर्क को मजबूत करना है। (India-China LAC Military Communication)

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    हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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