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LAC पर चीन ने तैनात किया नया खास आर्मर्ड व्हीकल, वेस्टर्न थिएटर कमांड में मीडियम कॉम्बाइंड आर्म्स ब्रिगेड को कर रहा मजबूत

China ZBL-19 IFV
China Deploys New ZBL-19 IFV in Tibet Sector Near Indian Border, Boosting PLA Mobile Firepower.

China ZBL-19 IFV: चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) ने भारत से लगते पश्चिमी थिएटर कमांड में अपने नए ZBL-19 इन्फैंट्री फाइटिंग व्हीकल (IFV) की तैनाती तेज कर दी है। हाल ही में सामने आई तस्वीरों और ओपन सोर्स इंटेलिजेंस रिपोर्ट्स से संकेत मिले हैं कि अब 76वीं ग्रुप आर्मी के साथ-साथ 77वीं ग्रुप आर्मी की यूनिट्स भी इस नए आर्मर्ड व्हीकल को हासिल कर रही हैं।

यह वही पश्चिमी थिएटर कमांड है, जो तिब्बत, शिनजियांग और भारत के साथ लगने वाली सीमा की जिम्मेदारी संभालता है। वहीं, इस इलाके में ZBL-19 की तैनाती चीन की तेजी से मूव करने वाली मीडियम कॉम्बाइंड आर्म्स ब्रिगेड्स को और मजबूत बनाने की दिशा में बड़ा कदम है।

China ZBL-19 IFV: 77वीं ग्रुप आर्मी में भी दिखा नया IFV

हाल ही में जारी एक चीनी सैन्य तस्वीर में LX31 टैक्टिकल नंबरिंग वाला ZBL-19-T12 वर्जन दिखाई दिया। यह वाहन 77वीं ग्रुप आर्मी की 39वीं कॉम्बाइंड आर्म्स ब्रिगेड से जुड़ा माना जा रहा है।

पहले माना जा रहा था कि इस ब्रिगेड को पुराने टाइप-59 टैंक मिले हैं, लेकिन तिब्बत मिलिट्री रीजन जैसे कठिन इलाके में पुराने टैंकों की तैनाती को लेकर सवाल उठ रहे थे। वहीं, अब ZBL-19 की मौजूदगी यह संकेत देती है कि इस यूनिट को आधुनिक मीडियम ब्रिगेड के रूप में तैयार किया जा रहा है।

2025 में शुरू हुई थी तैनाती

चीन के सरकारी मीडिया ग्लोबल टाइम्स ने 11 अगस्त 2026 को प्रकाशित रिपोर्ट में पुष्टि की थी कि 76वीं ग्रुप आर्मी की एक ब्रिगेड को 2025 में ZBL-19 व्हीकल मिले थे। माना जाता है कि यह 149वीं मीडियम कॉम्बाइंड आर्म्स ब्रिगेड थी।

उस समय गोबी रेगिस्तान में हुई ट्रेनिंग एक्सरसाइज के दौरान पहली बार बड़ी संख्या में इन व्हीकल्स को देखा गया था। (China ZBL-19 IFV)

टाइप-08 का पूरी तरह नया अवतार

ZBL-19 को चीन के टाइप-08 व्हील्ड आर्मर्ड व्हीकल फैमिली का डीप री-डिजाइन माना जा रहा है। इसमें फायरपावर, सुरक्षा, मोबिलिटी, डिजिटल नेटवर्किंग और सैनिकों की सुविधा से जुड़े कई बड़े बदलाव किए गए हैं।

यह 8×8 व्हील कॉन्फिगरेशन वाला व्हीकल है, जिसे अलग-अलग तरह के युद्धक्षेत्रों में तेजी से ऑपरेशन के लिए बनाया गया है। चीन के सैन्य विशेषज्ञ झांग जुनशे के अनुसार यह वाहन पुराने टाइप-08 की तुलना में हर क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन देता है। (China ZBL-19 IFV)

पहली बार मिला अनमैन्ड टर्रेट

ZBL-19 की सबसे बड़ी खूबी इसका अनमैन्ड टर्रेट है। यानी हथियारों वाला टर्रेट सीधे चालक दल के ऊपर नहीं होता।

इससे वाहन के अंदर अधिक जगह मिलती है और चालक दल की सुरक्षा बढ़ जाती है। साथ ही ऑटोमेशन के कारण टारगेट ट्रैकिंग और वेपन ऑपरेट करना भी आसान होता है। अनमैन्ड टर्रेट की वजह से व्हीकल का प्रोफाइल भी अपेक्षाकृत कम दिखाई देता है, जिससे युद्धक्षेत्र में इसकी सर्वाइवेबिलिटी बढ़ती है। (China ZBL-19 IFV)

China ZBL-19 IFV
China ZBL-19 IFV

30 मिमी चेन गन और एंटी-टैंक मिसाइलें

ZBL-19 में नई पीढ़ी की 30 मिमी चेन गन लगाई गई है। इसकी फायरिंग रेट जरूरत के अनुसार बदली जा सकती है।

वाहन में चार एचजे-16 एंटी-टैंक मिसाइलें भी लगाई गई हैं। ये मिसाइलें लंबी दूरी पर दुश्मन के टैंकों और बख्तरबंद वाहनों को निशाना बना सकती हैं।

चीनी विशेषज्ञों का दावा है कि यह सिस्टम दुश्मन के टैंक की सीधी फायरिंग रेंज के भीतर भी हमला करने में सक्षम है। (China ZBL-19 IFV)

पानी में भी चल सकता है व्हीकल

ZBL-19 को एम्फीबियस क्षमता के साथ डेवलप किया गया है। यह सड़क, पहाड़ी इलाके और पानी में भी चल सकता है।

इसकी हाई मोबिलिटी इसे तेजी से सैनिकों और हथियारों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने में सक्षम बनाती है। तिब्बत और पश्चिमी चीन के कठिन इलाकों में यह क्षमता काफी महत्वपूर्ण मानी जाती है।

सुरक्षा में भी बड़ा सुधार

पुराने टाइप-08 प्लेटफॉर्म की तुलना में ZBL-19 में सुरक्षा को काफी मजबूत किया गया है।

व्हीकल पर मोटा कम्पोजिट एड-ऑन आर्मर लगाया है। इसके अलावा इसके स्ट्रक्चर को इस तरह डिजाइन किया गया है कि यह माइंस और इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइसेज (IED) के असर को कम कर सके।

रिपोर्ट्स के अनुसार इसमें इंफ्रारेड सिग्नेचर कम करने वाली तकनीक भी शामिल है, जिससे दुश्मन के सेंसर और थर्मल सिस्टम के लिए इसे पहचानना कठिन हो सकता है। (China ZBL-19 IFV)

हाइड्रोलिक सस्पेंशन से बेहतर ऑफ-रोड प्रदर्शन

इस वाहन में हाइड्रोलिक सस्पेंशन सिस्टम लगाया गया है। इससे यह ऊबड़-खाबड़ इलाकों में भी बेहतर संतुलन बनाए रखता है।

चीन का दावा है कि इसकी ऑफ-रोड क्लाइम्बिंग क्षमता टाइप-08 से बेहतर है। यही कारण है कि इसे पहाड़ी और कठिन इलाकों में ऑपरेशन के लिए उपयुक्त माना जा रहा है। (China ZBL-19 IFV)

नेटवर्क-सेंट्रिक युद्ध का हिस्सा

ZBL-19 आधुनिक नेटवर्क-सेंट्रिक युद्ध का हिस्सा भी है। इसमें एडवांस सिचुएशनल अवेयरनेस सिस्टम, डेटा इंटीग्रेशन और डिजिटल कम्युनिकेशन क्षमताएं दी गई हैं। इससे चालक दल को आसपास की स्थिति की बेहतर जानकारी मिलती है और दूसरे मिलिट्री प्लेटफॉर्म के बीच कॉर्डिनेशन आसान होता है। (China ZBL-19 IFV)

एक चेसिस, कई वेरिएंट

चीन इस प्लेटफॉर्म को “वन चेसिस, मल्टीपल वेरिएंट” मॉडल पर डेवलप कर रहा है। एक ही बेस प्लेटफॉर्म पर कमांड, रिकॉनिसेंस, स्ट्राइक और सपोर्ट मिशनों के लिए अलग-अलग वाहन बनाए जा सकते हैं। इससे लॉजिस्टिक सपोर्ट आसान होता है और रखरखाव की लागत भी कम रहती है।

टाइप-08 और टाइप-11 व्हील्ड असॉल्ट गन की तरह ZBL-19 परिवार में भी आने वाले समय में कई अलग-अलग संस्करण शामिल किए जा सकते हैं। (China ZBL-19 IFV)

पश्चिमी थिएटर कमांड में क्यों बढ़ रहा है महत्व

पश्चिमी थिएटर कमांड चीन का सबसे बड़ा सैन्य कमांड है। इसके जिम्मे भारत से लगने वाली सीमा, तिब्बत और शिनजियांग क्षेत्र आते हैं।

पिछले कुछ सालों में चीन ने तिब्बत क्षेत्र में सड़क और परिवहन नेटवर्क का तेजी से विस्तार किया है। जी4219, जी4218, जी219, जी695 और जी94 जैसे हाईवे प्रोजेक्ट्स ने सेना की आवाजाही को आसान बनाया है।

ऐसे में हल्के लेकिन शक्तिशाली व्हील्ड आईएफवी पारंपरिक भारी ट्रैक्ड वाहनों की तुलना में अधिक तेजी से तैनात किए जा सकते हैं। इसी वजह से ZBL-19 को पश्चिमी थिएटर कमांड की नई मीडियम कॉम्बाइंड आर्म्स ब्रिगेड्स का प्रमुख प्लेटफॉर्म माना जा रहा है। (China ZBL-19 IFV)

भारत में बनेंगे बेल्जियम के हथियार, 70mm रॉकेट और काउंटर-ड्रोन सिस्टम; दोनों देशों के बीच हुए 10 बड़े डिफेंस समझौते

India-Belgium Defence Pact
India-Belgium Defence Pact: 10 Major Agreements Signed for Rockets, Counter-Drone Systems and Defence Manufacturing. (Image Source: PIB)

India-Belgium Defence Pact: भारत और बेल्जियम ने रक्षा सहयोग को नई गति देने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। गुरुवार को नई दिल्ली में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और बेल्जियम के रक्षा एवं विदेश व्यापार मंत्री थियो फ्रैंकेन के बीच हुई बैठक में दोनों देशों ने रक्षा उद्योग, सैन्य तकनीक, संयुक्त उत्पादन और सुरक्षा सहयोग को मजबूत करने पर चर्चा की। इस दौरान कई एमओयू, लेटर ऑफ इंटेंट और औद्योगिक समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए।

राजनाथ सिंह ने बैठक के बाद कहा कि मौजूदा समय में दुनिया भू-राजनीतिक और आर्थिक चुनौतियों से गुजर रही है। ऐसे माहौल में भारत और बेल्जियम जैसे साझेदार देशों के बीच रक्षा सहयोग को और मजबूत करने की जरूरत है। उन्होंने भारतीय और बेल्जियम रक्षा कंपनियों के बीच अधिक साझेदारी का स्वागत किया।

India-Belgium Defence Pact: भारत-बेल्जियम डिफेंस पैक्ट पर खास फोकस

इस दौरे का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा भारत और बेल्जियम के बीच बना नया डिफेंस इंडस्ट्रियल फ्रेमवर्क रहा। बेल्जियम के प्रधानमंत्री बार्ट डे वेवर और रक्षा मंत्री थियो फ्रैंकेन 2 से 4 सितंबर तक भारत दौरे पर हैं।

बेल्जियम सरकार द्वारा जारी दस्तावेजों के अनुसार, दोनों देशों के बीच रक्षा उद्योग में सहयोग बढ़ाने के लिए 10 बड़े औद्योगिक समझौतों को आगे बढ़ाया जा रहा है। इन समझौतों का मकसद बेल्जियम की रक्षा तकनीक को भारत की मैन्युफैक्चरिंग क्षमता के साथ जोड़ना है।

बैठक में भारत और बेल्जियम ने डिफेंस प्रोडक्शन, समुद्री सुरक्षा, काउंटर-ड्रोन सिस्टम, मिसाइल, रॉकेट, रडार, इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल सेंसर और सैन्य वाहनों से जुड़ी तकनीकों पर सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया।

भारत में बनेगी बेल्जियम की 70 मिमी रॉकेट तकनीक

थेल्स बेल्जियम और कल्याणी स्ट्रैटेजिक सिस्टम्स के बीच अहम समझौता हुआ है। इस साझेदारी के तहत थेल्स बेल्जियम की 70 मिमी रॉकेट तकनीक का उत्पादन भारत में किया जाएगा। भारतीय सप्लायर्स भी उत्पादन प्रक्रिया में शामिल होंगे। वहीं, भारत में पूरी तरह निर्मित पहला रॉकेट वर्ष 2027 की शुरुआत में तैयार होने की उम्मीद है। (India-Belgium Defence Pact)

भारत में बनेगा एफएन हर्स्टल का संयुक्त उत्पादन केंद्र

बेल्जियम की प्रसिद्ध हथियार निर्माता कंपनी एफएन हर्स्टल और भारत फोर्ज की डिफेंस युनिट कल्याणी स्ट्रैटेजिक सिस्टम्स भारत में एक संयुक्त उत्पादन केंद्र स्थापित करने की संभावना पर काम कर रही हैं।

इस प्रस्तावित सुविधा में एफएन के हथियार, इंटीग्रेटेड वेपन सिस्टम और काउंटर-ड्रोन सिस्टम का उत्पादन किया जा सकता है। यदि भारतीय सशस्त्र बलों से ऑर्डर मिलते हैं तो यह प्रोजेक्ट दोनों देशों के रक्षा उद्योग के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। (India-Belgium Defence Pact)

भारत आएंगे काउंटर-ड्रोन सिस्टम

बेल्जियम की ड्रोन कंपनी सोल.वन भारतीय साझेदार डीजीवीके एंटरप्राइजेज के साथ मिलकर अपने सबोटर ड्रोन और बज़किल तथा हिचहाइकर इंटरसेप्टर सिस्टम भारत में लाने पर काम कर रही है।

भारतीय सशस्त्र बलों ने इन प्रणालियों के बारे में जानकारी मांगी है और परीक्षण में भी रुचि दिखाई है। ये सिस्टम दुश्मन के ड्रोन को पहचानने और रोकने के लिए विकसित किए गए हैं। (India-Belgium Defence Pact)

अर्जुन टैंक के लिए बेल्जियम की तकनीक

ओआईपी सेंसर सिस्टम्स और इंडिया ऑप्टेल लिमिटेड के बीच सहयोग भी जारी रहेगा। ओआईपी पहले अर्जुन एमके-1 टैंक के लिए 130 से अधिक विजन सिस्टम उपलब्ध करा चुकी है। अर्जुन एमके-1ए के लिए कंपनी ने नया फायर कंट्रोल सिस्टम डेवलप किया है जो लेजर गाइडेड मिसाइल भी दाग सकता है।

यह सहयोग इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल सिस्टम और आर्मर्ड व्हीकल्स की अगली पीढ़ी की तकनीक से जुड़ा हुआ है।

जोरावर लाइट टैंक प्रोजेक्ट के लिए हुआ समझौता

बेल्जियम की जॉन कॉकरिल डिफेंस और लार्सन एंड टुब्रो के बीच भी सहयोग पर काम हो रहा है।

जॉन कॉकरिल डिफेंस भारतीय सेना के लिए विकसित किए जा रहे जोरावर लाइट टैंक के टर्रेट की सप्लाई की दावेदार कंपनियों में शामिल है। यह टैंक विशेष रूप से ऊंचाई वाले क्षेत्रों में ऑपरेशन के लिए विकसित किया जा रहा है। (India-Belgium Defence Pact)

एयर डिफेंस सिस्टम नेटवर्क में भी सहयोग

ऑक्टेव और भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड के बीच भी सहयोग जारी है। ऑक्टेव का विजुअलाइजेशन सॉफ्टवेयर पहले से ही भारतीय एयर डिफेंस सिस्टम प्रोग्राम्स में इस्तेमाल हो रहा है। इनमें आकाश तीर, अरुध्रा, आईपीएसएस और आईएसीसीएस जैसे महत्वपूर्ण एयर डिफेंस नेटवर्क शामिल हैं। यह तकनीक विभिन्न सेंसरों और डिफेंस सिस्टम्स से मिली जानकारी को इंटीग्रेट करती है। (India-Belgium Defence Pact)

नौसेना के लिए इंजन और माइन काउंटरमेजर तकनीक

एंग्लो बेल्जियन कॉरपोरेशन और किरलोस्कर ऑयल इंजन्स के बीच समुद्री इंजन तकनीक पर बातचीत चल रही है।
किर्लोस्कर को भारत का पहला 6 मेगावाट मरीन डीजल इंजन डेवलप करने का कार्य मिला है। इस परियोजना में बेल्जियम की विशेषज्ञता का उपयोग किया जा सकता है।

वहीं एक्साइल बेल्जियम और लार्सन एंड टुब्रो माइन काउंटरमेजर वेसल प्रोग्रााम में सहयोग कर रहे हैं। इस परियोजना के तहत समुद्र में बिछाई गई नेवी माइंस का पता लगाने और उन्हें निष्क्रिय करने वाले ऑटोनॉमस सिस्टम डेवलप किए जा रहे हैं। (India-Belgium Defence Pact)

गोला-बारूद उत्पादन क्षमता बढ़ाने की तैयारी

न्यू लाचौसे और टेम्बो क्लासिक इंजीनियरिंग के बीच एक बड़ा औद्योगिक समझौता हुआ है। इसके तहत भारत में दो प्रकार के गोला-बारूद के लिए पूरी उत्पादन लाइन स्थापित की जाएगी। इस सुविधा की अनुमानित क्षमता प्रति वर्ष करीब 10 करोड़ राउंड उत्पादन की होगी। परियोजना का मूल्य लगभग 5 करोड़ यूरो बताया गया है। (India-Belgium Defence Pact)

एसआईडीएम और बीएसडीआई के बीच सहयोग

भारत की सोसाइटी ऑफ इंडियन डिफेंस मैन्युफैक्चरर्स (SIDM) और बेल्जियन सिक्योरिटी एंड डिफेंस इंडस्ट्री (BSDI) के बीच भी सहयोग समझौता हुआ है।

इस समझौते का उद्देश्य दोनों देशों की रक्षा कंपनियों को को-डेवलपमेंट, संयुक्त उत्पादन और तकनीकी साझेदारी के लिए एक मंच उपलब्ध कराना है। बेल्जियम के रक्षा मंत्री थियो फ्रैंकेन ने कहा कि भारत दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य आधुनिकीकरण प्रक्रियाओं में से एक पर काम कर रहा है और इसमें शामिल होने वाली कंपनियों के लिए बड़े अवसर मौजूद हैं। (India-Belgium Defence Pact)

Explainer: क्या है खगंतक-243? स्पाइस-2000, हैमर, साव और गौरव से कितना अलग है IAF का नया ग्लाइड बम

Khagantak-243 Glide Bomb
Explainer: What is the Khagantak-243 Glide Bomb? How IAF’s New Indigenous Weapon Compares with SPICE-2000, HAMMER, SAAW and Gaurav

Khagantak-243 Glide Bomb: भारतीय वायुसेना ने हाल ही में स्वदेशी लॉन्ग रेंज ग्लाइड बम खगंतक-243 का सफल परीक्षण किया। वायुसेना ने बताया कि इस परीक्षण के दौरान सभी निर्धारित टारगेट हासिल किए गए। यह हथियार भारत के प्रिसिजन स्ट्राइक वेपंस प्रोग्राम की एक अहम उपलब्धि माना जा रहा है। खास बात यह है कि यह पूरी तरह स्वदेशी से है, जिसे लंबी दूरी से सटीक हमला करने के लिए तैयार किया गया है। इस हथियार का उद्देश्य लड़ाकू विमानों को दुश्मन के एयर डिफेंस क्षेत्र में घुसे बिना दूर से हमला करने की क्षमता देना है।

Khagantak-243 Glide Bomb: क्या होता है ग्लाइड बम?

सामान्य बम विमान से गिराए जाने के बाद गुरुत्वाकर्षण के सहारे नीचे गिरते हैं। ऐसे बमों की मारक दूरी सीमित होती है और विमान को टारगेट के काफी करीब जाना पड़ता है।

लेकिन ग्लाइड बम इससे अलग होते हैं। इनमें विशेष पंख और कंट्रोल सरफेस लगे होते हैं। विमान से छोड़े जाने के बाद ये हवा में लंबी दूरी तक ग्लाइड करते हुए टारगेट तक पहुंचते हैं। इनमें इंजन नहीं होता, इसलिए इनकी लागत क्रूज मिसाइल की तुलना में काफी कम रहती है।

यही वजह है कि आधुनिक वायु सेनाएं ग्लाइड बमों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल कर रही हैं। ये रनवे, रडार स्टेशन, कमांड सेंटर, गोला-बारूद डिपो और अन्य महत्वपूर्ण ठिकानों पर सटीक हमला कर सकते हैं। (Khagantak-243 Glide Bomb)

300 किलोग्राम कैटेगरी का ग्लाइड म्यूनिशन

खगंतक-243 लगभग 300 किलोग्राम कैटेगरी का स्टैंड-ऑफ ग्लाइड म्यूनिशन है। इसे जेएसआर डायनेमिक्स और भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (बीईएल) ने मिल कर बनाया है।

इस हथियार में लगभग 125 किलोग्राम वजन वाला एमके-81 कैटेगरी का वारहेड लगाया जा सकता है। इसकी सबसे बड़ी खासियत इसकी लंबी मारक क्षमता है।

अगर इसे लगभग 12 किलोमीटर की ऊंचाई से छोड़ा जाए तो यह 140 किलोमीटर से अधिक दूरी तक टारगेट को निशाना बना सकता है। कुछ टेस्टिंग प्रोफाइल में इसकी रेंज इससे भी अधिक हो सकती है।

खगंतक-243 को इस तरह बनाया गया है कि विमान से अलग होने के बाद इसके पंख खुल जाते हैं और यह नियंत्रित उड़ान भरते हुए टारगेट की ओर बढ़ता है। (Khagantak-243 Glide Bomb)

कैसे काम करता है गाइडेंस सिस्टम?

खगंतक-243 में आधुनिक नेविगेशन और गाइडेंस तकनीक का इस्तेमाल किया गया है। इसके शुरुआती चरण में आईएनएस यानी इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम और सैटेलाइट बेस्ड नेविगेशन का इस्तेमाल होता है।

टर्मिनल फेज यानी टारगेट के अंतिम हिस्से में इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल और इन्फ्रारेड सीकर का इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके अलावा पैसिव होमिंग हेड का विकल्प भी उपलब्ध है।

सिर्फ नेविगेशन आधारित मोड में इसकी सटीकता लगभग 10 मीटर के भीतर बताई जाती है। वहीं सीकर के इस्तेमाल पर यह सटीकता 5 मीटर से भी कम हो सकती है। जिससे यह किसी विशेष भवन, बंकर, रडार या अन्य छोटे टारगेट को भी सटीकता के साथ निशाना बना सकता है। (Khagantak-243 Glide Bomb)

सु-30एमकेआई से हुआ परीक्षण

भारतीय वायुसेना ने अपने आधिकारिक बयान में लॉन्च प्लेटफॉर्म का नाम सार्वजनिक नहीं किया है। लेकिन सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक खगंतक-243 को सु-30एमकेआई लड़ाकू विमान के साथ जोड़ा गया है।

फरवरी 2025 में बीईएल ने बताया था कि खगंतक-243 का पहला फ्लाइट टेस्ट सु-30एमकेआई से किया जाएगा।

सु-30एमकेआई भारतीय वायुसेना का सबसे ताकतवर मल्टीरोल फाइटर जेट है। यह भारी हथियार ले जाने में सक्षम है और इसमें ब्रह्मोस, रुद्रम तथा कई अन्य स्वदेशी हथियार लगाए जाा सकते हैं। भविष्य में इस हथियार को मिग-29के जैसे अन्य प्लेटफॉर्म पर भी लगाया जा सकता है। (Khagantak-243 Glide Bomb)

2019 में एरो इंडिया में हुआ था समझौता

खगंतक-243 प्रोजेक्ट को शुरू करने का श्रेय भारतीय वायुसेना के पूर्व उप प्रमुख एयर मार्शल शिरीष बबन देव को जाता है। वायुसेना में सेवा के दौरान उन्होंने जोधपुर में अपनी एक छोटी रिसर्च लैब में इस तकनीक पर काम शुरू किया था। उस समय डीआरडीओ के प्रमुख रहे डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने इस पहल को देखा और लैब को 10 लाख रुपये की मदद भी दी थी। इसके बाद इस प्रोजेक्ट पर लगातार 12 साल से अधिक समय तक काम चलता रहा।

बाद में वर्ष 2018 के आसपास नागपुर में जेएसआर डायनेमिक्स की स्थापना हुई और 2019 के एरो इंडिया शो में कंपनी ने भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (बीईएल) के साथ साझेदारी की। इस साझेदारी के तहत जेएसआर डायनेमिक्स बम की बॉडी और कंट्रोल सिस्टम तैयार करती है, जबकि बीईएल गाइडेंस सिस्टम, इलेक्ट्रॉनिक्स और अन्य महत्वपूर्ण सब-सिस्टम उपलब्ध कराती है। खास बात यह है कि इस प्रोजेक्ट में 90 प्रतिशत तक स्वदेशी सामग्री का इस्तेमाल किया गया है।

फरवरी 2025 में एरो इंडिया के दौरान बीईएल ने बताया था कि भारतीय वायुसेना ने खगंतक-243 की सीमित संख्या के लिए शुरुआती ऑर्डर दिया है।

खगंतक के कई अलग-अलग वर्जन भी डेवलप किए जा रहे हैं। खगंतक-225 एलडब्ल्यू इसका हल्का वर्जन माना जाता है, जिसकी रेंज 180 किलोमीटर तक है। वहीं खगंतक-306 को अधिक एडवांस गाइडेंस और कंट्रोल सिस्टम के साथ डेवलप किया गया है। इसके अलावा 450 किलोग्राम, 720 किलोग्राम और 1260 किलोग्राम कैटेगरी के बड़े वर्जन पर भी काम जारी है। (Khagantak-243 Glide Bomb)

दूसरे ग्लाइड बमों से कितना अलग?

भारतीय वायुसेना के पास पहले से कई तरह के प्रिसिजन स्ट्राइक हथियार मौजूद हैं। इजरायल का स्पाइस-2000 बम बालाकोट ऑपरेशन के बाद काफी चर्चित हुआ था। इसकी ग्लाइड रेंज लगभग 60 किलोमीटर मानी जाती है और इसका लक्ष्य पहचान सिस्टम काफी परिपक्व माना जाता है। फ्रांस का हैमर हथियार भी स्टैंड-ऑफ अटैक क्षमता देता है। वहीं डीआरडीओ का स्मार्ट एंटी-एयरफील्ड वेपन (साव) करीब 125 किलोग्राम श्रेणी का हथियार है, जिसे रनवे और हवाई अड्डों को नुकसान पहुंचाने के लिए विकसित किया गया है। इसकी रेंज लगभग 100 किलोमीटर तक बताई जाती है। इसके अलावा 2025 में डीआरडीओ ने गौरव नामक 1,000 किलोग्राम श्रेणी के भारी ग्लाइड बम का भी परीक्षण किया था।

हालांकि खगंतक-243 गौरव की तुलना में काफी हल्का है, इसलिए एक लड़ाकू विमान एक साथ अधिक संख्या में ऐसे हथियार ले जा सकता है।

साथ ही यह पूरी तरह स्वदेशी सप्लाई चेन पर आधारित है, जिससे आयात पर निर्भरता कम होती है।

जहां ब्रह्मोस जैसी मिसाइलें अत्यधिक महंगी और सीमित संख्या में उपलब्ध होती हैं, वहीं खगंतक-243 जैसे ग्लाइड बम अपेक्षाकृत कम लागत में बड़ी संख्या में तैयार किए जा सकते हैं। (Khagantak-243 Glide Bomb)

लंबी दूरी से हमला करने की क्षमता

आधुनिक युद्ध में एयर डिफेंस सिस्टम लगातार मजबूत हो रहे हैं। ऐसे में लड़ाकू विमान के लिए टारगेट के बहुत करीब जाना जोखिम भरा हो सकता है।

खगंतक-243 की 140 किलोमीटर से अधिक की स्टैंड-ऑफ क्षमता विमान को अपेक्षाकृत सुरक्षित दूरी से हमला करने का विकल्प देती है।

इससे पायलट और विमान दोनों के जोखिम में कमी आती है। साथ ही दुश्मन के महत्वपूर्ण सैन्य ठिकानों पर तेज और सटीक हमला संभव होता है।

इस हथियार में मल्टी-जीएनएसएस बेस्ड नेविगेशन का इस्तेमाल किया गया है, जिससे विभिन्न सैटेलाइट नेविगेशन सिस्टम्स का फायदा मिलता है। साथ ही, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर में भी यह सिस्टम कारगर है। (Khagantak-243 Glide Bomb)

सेना-वायुसेना में बड़ा फेरबदल: चेतक और ब्रह्मास्त्र कॉर्प्स को मिले कमांडर, IAF को मिला नया मेंटेनेंस चीफ

Armed Forces Appointments 2026
Major Leadership Reshuffle in Indian Army and Air Force: New Commanders Appointed in Strategic Corps, Air Defence and Medical Services

Armed Forces Appointments 2026: भारतीय सेना और भारतीय वायुसेना में सितंबर 2026 की शुरुआत के साथ कई महत्वपूर्ण टॉप लेवल अपॉइंटमेंट्स हुए हैं। सेना की प्रमुख फॉर्मेशनों, एयर डिफेंस संगठन, सैन्य शिक्षा संस्थानों और सशस्त्र बलों की मेडिकल सेवाओं में नए अधिकारियों ने जिम्मेदारी संभाली है। इन नियुक्तियों में पश्चिमी और उत्तरी सीमाओं की सुरक्षा से जुड़े कोर मुख्यालयों से लेकर सैन्य स्वास्थ्य सेवाओं और वायुसेना के मेंटेनेंस नेटवर्क तक कई अहम पद शामिल हैं।

Armed Forces Appointments 2026: चेतक कोर की कमान संभालेंगे ले. जन. देशपांडे

लेफ्टिनेंट जनरल विक्रांत सुरेश देशपांडे ने बठिंडा स्थित चेतक कॉर्प्स के जनरल ऑफिसर कमांडिंग (जीओसी) बने हैं। उन्होंने लेफ्टिनेंट जनरल शमशेर सिंह विर्क की जगह ली है। चेतक कॉर्प्स भारतीय सेना की दक्षिण-पश्चिमी कमान के अंतर्गत आने वाली एक महत्वपूर्ण फॉर्मेशन है, जिसकी जिम्मेदारी दक्षिणी पंजाब और उत्तरी राजस्थान क्षेत्र की सुरक्षा से जुड़ी है। यह इलाका भारत की पश्चिमी सीमा के लिहाज से रणनीतिक महत्व रखता है।

इन्फैंट्री अधिकारी रहे लेफ्टिनेंट जनरल देशपांडे को जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर भारत में काउंटर-इन्फिल्ट्रेशन तथा काउंटर-टेररिज्म ऑपरेशनों का लंबा अनुभव है। इसके अलावा वह उत्तरी सीमाओं पर एक इन्फैंट्री डिवीजन की कमान भी संभाल चुके हैं।

पदभार ग्रहण करने के बाद उन्होंने सभी रैंकों से ऑपरेशनल इफेक्टिवनेस और कॉम्बैट रेडीनेस को और मजबूत करने के लिए लगातार प्रयास जारी रखने का आह्वान किया।

वहीं लेफ्टिनेंट जनरल शमशेर सिंह विर्क ने मई 2025 से चेतक कॉर्प्स का नेतृत्व किया था। उनके कार्यकाल में ऑपरेशनल तैयारी, संयुक्त सैन्य संचालन और सैन्य-नागरिक समन्वय को मजबूत करने पर विशेष ध्यान दिया गया। (Armed Forces Appointments 2026)

ब्रह्मास्त्र कॉर्प्स को मिला नया कमांडर

पश्चिम बंगाल के पानागढ़ स्थित ब्रह्मास्त्र कॉर्प्स की कमान अब लेफ्टिनेंट जनरल एस.एस. कार्तिकेय के हाथों में होगी। उन्होंने लेफ्टिनेंट जनरल यश अहलावत से जिम्मेदारी संभाली है।

ब्रह्मास्त्र कॉर्प्स भारतीय सेना की सबसे महत्वपूर्ण स्ट्राइक फॉर्मेशनों में गिनी जाती है। इसे विशेष रूप से चीन सीमा के ऊंचाई वाले क्षेत्रों में संभावित सैन्य अभियानों के लिए तैयार किया गया है।

लेफ्टिनेंट जनरल कार्तिकेय इससे पहले मणिपुर के लीमाखोंग स्थित रेड शील्ड डिवीजन के जनरल ऑफिसर कमांडिंग रह चुके हैं। पूर्वोत्तर क्षेत्र में उनके अनुभव को इस नई जिम्मेदारी में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। (Armed Forces Appointments 2026)

सेना के एयर डिफेंस संगठन में भी बदलाव

भारतीय सेना के एयर डिफेंस नेटवर्क में भी टॉप लेवल पर बदलाव हुआ है। लेफ्टिनेंट जनरल आई.एस. पंजरथ ने सेना मुख्यालय में डायरेक्टर जनरल आर्मी एयर डिफेंस का पद संभाला है।

आर्मी एयर डिफेंस भारतीय सेना की वह ब्रांच है जो दुश्मन के विमान, हेलीकॉप्टर, ड्रोन, क्रूज मिसाइल और अन्य हवाई खतरों से सुरक्षा प्रदान करती है। यह ब्रांच आधुनिक रडार, मिसाइल सिस्टम और गन सिस्टम को ऑपरेट करती है।

इसके साथ ही लेफ्टिनेंट जनरल अमित राव ने ओडिशा के गोपालपुर स्थित आर्मी एयर डिफेंस कॉलेज के कमांडेंट के रूप में कार्यभार ग्रहण किया है। यह संस्थान सेना के एयर डिफेंस अधिकारियों और जवानों के प्रशिक्षण का प्रमुख केंद्र है। (Armed Forces Appointments 2026)

जबलपुर के मिलिट्री मैनेजमेंट कॉलेज को मिला नया चीफ

लेफ्टिनेंट जनरल संदीप नारंग ने जबलपुर स्थित मिलिट्री कॉलेज ऑफ मटेरियल्स मैनेजमेंट के कमांडेंट का पद संभाला है। उन्होंने लेफ्टिनेंट जनरल संजय सेठी की जगह ली है। जो हाल ही में रिटायर हुए हैं।

यह संस्थान सेना की लॉजिस्टिक्स, सप्लाई चेन, स्टोरेज, ट्रांसपोर्टेशन और संसाधन प्रबंधन से जुड़े अधिकारियों को प्रशिक्षण देता है। आधुनिक युद्ध में रसद प्रबंधन को सेना की रीढ़ माना जाता है और इस कॉलेज की भूमिका उसी क्षेत्र में महत्वपूर्ण है। (Armed Forces Appointments 2026)

एयर मार्शल संदीप थरेजा बने डीजीएएफएमएस

एयर मार्शल संदीप थरेजा ने 47वें डायरेक्टर जनरल आर्म्ड फोर्सेज मेडिकल सर्विसेज (डीजीएएफएमएस) के रूप में पदभार ग्रहण किया है। एयर मार्शल थरेजा एएफएमसी पुणे के पूर्व छात्र हैं और एक प्रतिष्ठित गैस्ट्रोएंटरोलॉजिस्ट के रूप में जाने जाते हैं। लगभग चार दशक के करियर में उन्होंने क्लीनिकल मेडिसिन, मेडिकल एजुकेशन, ऑपरेशनल मेडिसिन और हेल्थकेयर एडमिनिस्ट्रेशन के विभिन्न क्षेत्रों में काम किया है।

वह पहले कमांड हॉस्पिटल लखनऊ के कमांडेंट, एएफएमसी पुणे के डायरेक्टर एवं कमांडेंट और डीजीएमएस (एयर) जैसे महत्वपूर्ण पदों पर रह चुके हैं। (Armed Forces Appointments 2026)

वायुसेना के मेंटेनेंस प्रमुख बने एयर मार्शल केएए संजीब

भारतीय वायुसेना में एक अन्य महत्वपूर्ण नियुक्ति एयर मार्शल केएए संजीब की हुई है। उन्होंने एयर ऑफिसर-इन-चार्ज मेंटेनेंस (एओएम) का पद संभाला है।

सितंबर 1988 में एरोनॉटिकल इंजीनियरिंग (मैकेनिकल) शाखा में कमीशन प्राप्त करने वाले एयर मार्शल संजीब को वायुसेना के कई महत्वपूर्ण प्लेटफॉर्म्स पर काम करने का अनुभव है।

उन्होंने आईएल-76 परिवहन विमान, आईएल-78 फ्लाइट रिफ्यूलर एयरक्राफ्ट, एडब्ल्यूएसीएस बेड़े और बोइंग 737-200 विमान प्रणालियों पर लंबे समय तक कार्य किया है।

वर्ष 2003 में भारतीय वायुसेना में पहले आईएल-78 फ्लाइट रिफ्यूलर एयरक्राफ्ट को शामिल करने वाली परियोजना में वह प्रमुख इंजीनियर और टीम लीडर रहे थे। इसके अलावा अवॉक्स बेड़े को वायुसेना में शामिल करने और ऑपरेशनल बनाने वाली शुरुआती टीम का भी हिस्सा रहे।

एयर मार्शल संजीब को वर्ष 2015 में विशिष्ट सेवा मेडल और 2026 में अति विशिष्ट सेवा मेडल से सम्मानित किया जा चुका है। उन्होंने एयर मार्शल संजीव घुराटिया का स्थान लिया है, जिन्होंने लगभग 39 वर्षों की सेवा के बाद रिटायर हुए हैं। पदभार ग्रहण करने के बाद एयर मार्शल संजीब ने नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय युद्ध स्मारक पर पुष्पचक्र अर्पित कर शहीद सैनिकों को श्रद्धांजलि दी। (Armed Forces Appointments 2026)

एयर मार्शल विवेक हांडे बने डीजीएमएस (एयर)

एयर मार्शल विवेक हांडे ने डायरेक्टर जनरल मेडिकल सर्विसेज (एयर) का पद संभाला है। वह स्थायी सेकेंडमेंट पर भारतीय वायुसेना में यह जिम्मेदारी निभाएंगे।

एएफएमसी पुणे, टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल मुंबई और नेशनल डिफेंस कॉलेज के पूर्व छात्र एयर मार्शल हांडे को देश के प्रमुख गैस्ट्रोएंटरोलॉजिस्ट में गिना जाता है। उन्हें लगभग 40 वर्षों का सैन्य चिकित्सा अनुभव है।

उनकी सबसे खास उपलब्धि यह है कि उन्होंने भारतीय सशस्त्र बलों की तीनों सेवाओं में काम किया है। फ्लैग ऑफिसर के रूप में उन्होंने भारतीय नौसेना के प्रमुख अस्पताल आईएनएचएस अश्विनी की कमान भी संभाली थी। बाद में वह डीजीएएफएमएस कार्यालय में डायरेक्टर जनरल (ऑर्गेनाइजेशन एंड पर्सोनल) भी रहे। (Armed Forces Appointments 2026)

आर्मर्ड फोर्सेज मेडिकल सर्विसेज में बड़ा बदलाव

सर्जिकल वाइस एडमिरल दिलीप राघवन को डायरेक्टर जनरल हॉस्पिटल सर्विसेज (आर्म्ड फोर्सेज) नियुक्त किया गया है। वह आर्म्ड फोर्सेज मेडिकल कॉलेज (एएफएमसी), पुणे के पूर्व छात्र हैं और ईएनटी तथा न्यूरो-ओटोलॉजी के क्षेत्र में विशेषज्ञ माने जाते हैं।

डायरेक्टर जनरल हॉस्पिटल सर्विसेज का कार्यालय तीनों सेनाओं के अस्पतालों और स्वास्थ्य सुविधाओं के प्रशासन और समन्वय से जुड़ा होता है। (Armed Forces Appointments 2026)

भारतीय नौसेना के जहाजों में लगेंगे स्वदेशी शिप-बेस्ड सैटकॉम टर्मिनल, जीसैट-7आर से जुड़ेगा पूरा फ्लीट

Indian Navy SATCOM Terminal
Indian Navy Launches Indigenous Ship-Based SATCOM Terminal Program for GSAT-7R Network

Indian Navy SATCOM Terminal: भारतीय नौसेना ने अपने युद्धपोतों पर इस्तेमाल होने वाले सैटेलाइट कम्युनिकेशन सिस्टम को पूरी तरह स्वदेशी बनाने का फैसला किया है। नौसेना ने स्वदेशी शिप-बेस्ड सैटकॉम टर्मिनल्स डेवलप करने के लिए एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (ईओआई) जारी किया है। इस प्रोजेक्ट के तहत भारतीय कंपनियां ऐसे अत्याधुनिक सी-बैंड और कु-बैंड टर्मिनल तैयार करेंगी, जिनकी मदद से युद्धपोत समुद्र में हजारों किलोमीटर दूर रहते हुए भी सुरक्षित वॉयस, डेटा और वीडियो कम्युनिकेशन बनाए रख सकेंगे।

यह प्रोजेक्ट रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया डीएपी-2020 के मेक-II कैटेगरी के तहत अप्रूव की गई है। नौसेना की योजना लगभग 10 सी-बैंड और 20 कु-बैंड सैटकॉम टर्मिनलों के डेवलपमेंट और प्रोक्योरमेंट की है।

Indian Navy SATCOM Terminal: जीसैट-7आर के लिए तैयार होगा नया सिस्टम

यह प्रोजेक्ट भारतीय नौसेना के नए मिलिट्री कम्युनिकेशंस सैटेलाइट जीसैट-7आर, जिसे सीएमएस-03 भी कहा जाता है, के साथ पूरी तरह कंपेटेबल टर्मिनल डेवलप करने पर फोकस है।

भारतीय नौसेना साल 2013 से जीसैट-7 ‘रुक्मिणी’ सैटेलाइट का इस्तेमाल कर रही है। यह सैटेलाइट नौसेना के जहाजों, पनडुब्बियों और विमानों को एक सिक्योर नेटवर्क में जोड़ता है। नवंबर 2025 में लॉन्च किए गए जीसैट-7आर ने इस क्षमता को और बढ़ा दिया।

करीब 4,410 किलोग्राम वजनी यह कम्युनिकेशन सैटेलाइट यूएचएफ, एस, सी और कु-बैंड में काम करता है। इसकी मदद से भारतीय नौसेना को भारतीय महासागर क्षेत्र में लगभग 2,000 किलोमीटर तक सुरक्षित वॉयस, डेटा और वीडियो कम्युनिकेशन की सुविधा मिलती है। इसकी अनुमानित सर्विस लाइफ 15 साल तक है।

अब नौसेना चाहती है कि इस सैटेलाइट के साथ काम करने वाले शिप बेस्ड टर्मिनल भी भारत में ही डेवलप किए जाएं ताकि विदेशी उपकरणों पर निर्भरता कम हो सके। (Indian Navy SATCOM Terminal)

अभी आयातित हैं कई महत्वपूर्ण सिस्टम

वर्तमान में इस्तेमाल किए जा रहे कई सी-बैंड और कु-बैंड हार्डवेयर बाहर से खरीदे हुए हैं। समुद्र में सैटेलाइट कम्युनिकेशन बनाए रखने के लिए जहाजों पर विशेष एंटीना और ट्रैकिंग सिस्टम लगाए जाते हैं।

नए स्वदेशी टर्मिनलों में ऐसी तकनीक डेवलप करने पर जोर दिया गया है जिससे मैकेनिकल पार्ट्स की संख्या कम हो या उन्हें पूरी तरह हटाया जा सके। इससे रखरखाव कम होगा और समुद्री परिस्थितियों में सिस्टम की विश्वसनीयता बढ़ेगी। इन सिस्टम्स को ‘रुक्मिणी टर्मिनल्स’ नाम दिया गया है। (Indian Navy SATCOM Terminal)

पहले बनेगा प्रोटोटाइप

प्रोजेक्ट के तहत सबसे पहले प्रोटोटाइप डेवलप किए जाएंगे। इसमें एक सी-बैंड लार्ज शिप सैटकॉम टर्मिनल, एक कु-बैंड लार्ज शिप सैटकॉम टर्मिनल और एक कु-बैंड स्मॉल शिप सैटकॉम टर्मिनल तैयार किया जाएगा।

इनके सफल परीक्षण के बाद प्रोडक्शन शुरू होगा। जिसमें लगभग 10 बड़े सी-बैंड टर्मिनल, 10 बड़े कु-बैंड टर्मिनल और 10 छोटे कु-बैंड टर्मिनल खरीदे जाएंगे। मेक-II प्रोजेक्ट की तरह डेवलपमेंट पर आने वाला पूरा खर्च उद्योग को स्वयं वहन करना होगा।

समुद्र के कठिन हालातों में भी करना होगा काम

नौसेना ने इस प्रोजेक्ट के लिए कई तकनीकी आवश्यकताएं तय की हैं। सैटकॉम टर्मिनल को समुद्र में लगातार बदलती परिस्थितियों में भी सैटेलाइट की दिशा में सटीक पॉइंटिंग बनाए रखनी होगी।

युद्धपोतों को लगातार रोल, पिच और यॉ जैसी गतियों का सामना करना पड़ता है। इसके अलावा नमकयुक्त वातावरण, तेज हवा, कंपन और खराब मौसम भी चुनौती पैदा करते हैं। इन सभी परिस्थितियों के बावजूद टर्मिनल को बिना लिंक टूटे कम्युनिकेशन बनाए रखना होगा। (Indian Navy SATCOM Terminal)

स्वदेशी सामग्री पर विशेष जोर

नौसेना ने प्रोजेक्ट में न्यूनतम 50 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री की शर्त रखी है। यह शर्त हार्डवेयर के साथ पूरे एम्बेडेड सॉफ्टवेयर पर भी लागू होगी। उद्योगों को यह प्रमाणित करना होगा कि डिजाइन स्वदेशी है।

प्रोजेक्ट के तहत डेवलप बौद्धिक संपदा अधिकार डेवलपमेंट एजेंसी के पास रहेंगे, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में सरकार को विशेष अधिकार प्राप्त होंगे।

किसी भी विदेशी सरकार या एजेंसी को इन प्रणालियों का निरीक्षण या ऑडिट करने के लिए रक्षा मंत्रालय की पूर्व अनुमति आवश्यक होगी। (Indian Navy SATCOM Terminal)

सैटेलाइट कम्युनिकेशन और एंटीना डिजाइन पर फोकस

नौसेना ने स्पष्ट किया है कि प्रोजेक्ट की सबसे महत्वपूर्ण तकनीकी क्षमता सैटेलाइट कम्युनिकेशन और एंटीना डिजाइन होगी। भाग लेने वाली कंपनियों को रक्षा, एयरोस्पेस, अनुसंधान या औद्योगिक क्षेत्रों में डिजाइन और विकास का अनुभव दिखाना होगा। साथ ही यह भी बताना होगा कि उन्होंने कौन-कौन सी महत्वपूर्ण तकनीकों का स्वदेशीकरण किया है।

विदेशी साझेदारी की अनुमति दी गई है, लेकिन कंपनियों को यह स्पष्ट करना होगा कि कौन सी तकनीक बाहर से आ रही है और कौन सी भारत में डेवलप की जाएगी। (Indian Navy SATCOM Terminal)

थ्री-डी मोशन टेबल टेस्ट जरूरी

इस प्रोजेक्ट की परीक्षण प्रक्रिया काफी व्यापक रखी गई है। कंपनियों को अपनी व्यवस्था से सभी लैब परीक्षण सुविधाएं उपलब्ध करानी होंगी।

विशेष रूप से थ्री-डी मोशन टेबल टेस्ट जरूरी हैं। इन परीक्षणों में जहाज की वास्तविक गति का कृत्रिम वातावरण तैयार किया जाएगा ताकि यह देखा जा सके कि टर्मिनल लगातार सैटेलाइट लिंक बनाए रख सकता है या नहीं।

इसके अलावा स्पेस एप्लीकेशन्स सेंटर (एसएसी), अहमदाबाद या समकक्ष संस्थान में भी परीक्षण कराना होगा।

नौसेना के नेटवर्क में इंटीग्रेशन से पहले सिस्टम को वल्नरेबिलिटी असेसमेंट (वीए) क्लियरेंस प्राप्त करनी होगी। इसके बाद वास्तविक नौसैनिक प्लेटफॉर्म पर सिंगल स्टेज कंपोजिट यूजर ट्रायल्स आयोजित किए जाएंगे। (Indian Navy SATCOM Terminal)

एमएसएमई और स्टार्टअप्स को प्राथमिकता

यह प्रोजेक्ट फिलहाल एमएसएमई क्षेत्र के लिए आरक्षित रखी गई है। यदि कम से कम दो पात्र एमएसएमई आवेदन नहीं करते हैं, तभी अन्य कंपनियों पर विचार किया जाएगा।

स्टार्टअप्स भी इस प्रोजेक्ट में भाग ले सकते हैं, बशर्ते वे इंजीनियरिंग, मैन्युफैक्चरिंग, रिसर्च या डिफेंस टेक्नोलॉजी क्षेत्रों में रजिस्टर्ड हों।

कंसोर्टियम मॉडल की भी अनुमति दी गई है। अधिकतम पांच सदस्य मिलकर एक समूह बना सकते हैं, लेकिन उन्हें एक लीड मेंबर नामित करना होगा।

ईओआई जमा करने की अंतिम तिथि 24 अक्टूबर है। इच्छुक कंपनियां 22 सितंबर 2026 तक अपने प्रश्न और स्पष्टीकरण भेज सकती हैं।

प्रोटोटाइप डेवलप करने के लिए कंपनियों को 104 सप्ताह यानी लगभग दो साल का समय मिलेगा। इसके बाद परीक्षण और मूल्यांकन की प्रक्रिया चलेगी।

नेटवर्क-सेंट्रिक वॉरफेयर को मिलेगी मजबूती

भारतीय नौसेना पहले ही अपने जहाजों, पनडुब्बियों और विमानों को नेटवर्क बेस्ड ऑपरेशन से जोड़ चुकी है। साल 2014 में आयोजित ट्रोपेक्स अभ्यास के दौरान जीसैट-7 रुक्मिणी ने लगभग 60 युद्धपोतों और 75 विमानों को एक साझा नेटवर्क में जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

जीसैट-7आर के आने के बाद बैंडविड्थ, कवरेज और कम्युनिकेशन क्षमता में वृद्धि हुई है। अब जहाजों पर इस्तेमाल होने वाले सैटकॉम टर्मिनलों का स्वदेशी विकास भारतीय नौसेना के कम्युनिकेशन नेटवर्क को और अधिक आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। (Indian Navy SATCOM Terminal)

1 अक्टूबर से चीन में नया डिफेंस कानून लागू, कंपनियों और नागरिक संपत्तियों पर बढ़ेगा सेना का कंट्रोल

China Defence Mobilization Law
China Revises Defence Mobilization Law, Expands Military Access to Data, Technology, Industry and Civilian Resources

China Defence Mobilization Law: चीन ने अपने नेशनल डिफेंस मोबिलाइजेशन लॉ में बड़ा संशोधन किया है। चीन की टॉप विधायी संस्था ने 29 अगस्त को संशोधित कानून को मंजूरी दी, जो 1 अक्टूबर से लागू होगा। इस बदलाव को चीन की सैन्य तैयारी, औद्योगिक क्षमता, डेटा प्रबंधन और नागरिक संसाधनों को रक्षा जरूरतों से जोड़ने की व्यापक कानूनी व्यवस्था के रूप में देखा जा रहा है।

यह कानून पहली बार 2010 में लागू हुआ था। अब 16 साल बाद इसमें बड़े बदलाव किए गए हैं। संशोधित कानून में पहले 72 अनुच्छेद थे, जिन्हें बढ़ाकर 82 कर दिया गया है। नए प्रावधानों के जरिए चीन ने यह स्पष्ट किया है कि किसी भी राष्ट्रीय सुरक्षा चुनौती की स्थिति में नागरिक और औद्योगिक संसाधनों को सैन्य क्षमता में बदलने की प्रक्रिया कैसे ऑपरेट की जाएगी।

China Defence Mobilization Law: कानून में जोड़ा गया “डेवलपमेंट इंटरेस्ट” का नया आधार

संशोधित कानून में सबसे महत्वपूर्ण बदलावों में से एक “डेवलपमेंट इंटरेस्ट” यानी विकास हितों को शामिल करना है। पहले कानून मुख्य रूप से राष्ट्रीय संप्रभुता, एकता, क्षेत्रीय अखंडता और सुरक्षा से जुड़े खतरों पर केंद्रित था।

अब इसमें विकास हितों को भी जोड़ा गया है। कानून के अनुसार यदि चीन के विकास हितों को खतरा माना जाता है तो भी राष्ट्रीय रक्षा मोबिलाइजेशन से जुड़े कदम उठाए जा सकते हैं। हालांकि कानून में “डेवलपमेंट इंटरेस्ट” की स्पष्ट परिभाषा नहीं दी गई है।

इस बदलाव से उन परिस्थितियों का दायरा बढ़ गया है, जिनमें सरकार मोबिलाइजेशन से जुड़े कदमों पर विचार कर सकती है।

कम्युनिस्ट पार्टी की भूमिका और मजबूत  

संशोधित कानून में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की भूमिका को और स्पष्ट किया गया है। राष्ट्रीय और स्थानीय स्तर पर काम करने वाले डिफेंस मोबिलाइजेशन आयोगों को औपचारिक रूप से पार्टी नेतृत्व के अधीन रखा गया है।

इसका मतलब है कि रक्षा तैयारी और संसाधनों के प्रबंधन से जुड़े निर्णयों में पार्टी की सीधी निगरानी और नियंत्रण पहले से अधिक स्पष्ट रूप से दर्ज किया गया है।

चीन में पहले भी डिफेंस और सिक्योरिटी स्ट्रक्चर में पार्टी की महत्वपूर्ण भूमिका रही है, लेकिन अब इसे कानून में स्पष्ट रूप से शामिल कर दिया गया है।

डेटा आधारित तैयारी पर फोकस

नए कानून का एक बड़ा हिस्सा डेटा और सूचना प्रबंधन से जुड़ा है। चीन अब एक स्थायी और डेटा आधारित मोबिलाइजेशन प्रणाली डेवलप करना चाहता है।

कानून के तहत संबंधित सरकारी एजेंसियां मोबिलाइजेशन से जुड़ा डेटा एकत्र कर सकती हैं, उसका विश्लेषण कर सकती हैं और क्षमता का आकलन कर सकती हैं।

व्यक्तियों, कंपनियों और संगठनों को आवश्यक आंकड़े और जानकारी उपलब्ध करानी होगी। यदि कोई संस्था गलत जानकारी देती है, जानकारी देने में देरी करती है या आंकड़े छिपाती है तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है।

इसका उद्देश्य यह है कि किसी भी आपातस्थिति में उपलब्ध संसाधनों की सही तस्वीर सरकार के पास मौजूद रहे।

उद्योग और सप्लाई चेन भी कानून में शामिल  

संशोधित कानून का सबसे व्यापक असर चीन के औद्योगिक क्षेत्र पर पड़ सकता है। नए प्रावधानों में सप्लाई चेन सुरक्षा, उत्पादन क्षमता, तकनीकी संसाधन, सॉफ्टवेयर, लॉजिस्टिक्स नेटवर्क और उभरते तकनीकी क्षेत्रों को राष्ट्रीय रक्षा मोबिलाइजेशन का हिस्सा बनाया गया है।

कानून में “इमर्जिंग फील्ड्स” यानी उभरते क्षेत्रों की मोबिलाइजेशन क्षमता विकसित करने की बात कही गई है। इसमें एडवांस्ड टेक्नोलॉजी, डिजिटल सिस्टम, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और अन्य आधुनिक तकनीकी क्षेत्रों को शामिल माना जा रहा है।

इसके तहत कंपनियों और संस्थाओं से अपेक्षा की जा सकती है कि वे जरूरत पड़ने पर अपनी उत्पादन क्षमता और संसाधनों को राष्ट्रीय रक्षा आवश्यकताओं के अनुरूप प्राथमिकता दें।

रिजर्व सिस्टम का दायरा बढ़ाया 

संशोधित कानून में सैन्य मानव संसाधन व्यवस्था का भी विस्तार किया गया है। पहले कानून मुख्य रूप से “रिजर्व पर्सनल” पर केंद्रित था।

अब इसे व्यापक बनाकर “रिजर्व मैनपावर” की अवधारणा अपनाई गई है। इसमें सक्रिय मिलिट्री युनिट्स से जुड़े लोग, रिजर्व बल, मिलिशिया सदस्य और मिलिट्री सर्विस रजिस्ट्रेशन सिस्टम के तहत चिन्हित अन्य व्यक्ति भी शामिल हो सकते हैं।

इस बदलाव का उद्देश्य जरूरत पड़ने पर उपलब्ध मानव संसाधनों का बेहतर उपयोग करना बताया गया है।

संपत्ति अधिग्रहण से जुड़ा बड़ा बदलाव

नए कानून में संपत्ति से संबंधित प्रावधानों को भी विस्तारित किया गया है। पहले कानून के तहत सरकार अस्थायी रूप से किसी संपत्ति का इस्तेमाल कर सकती थी और सामान्य हालात में उसे वापस करना होता था।

अब संशोधित कानून में “एक्सप्रोप्रियेशन” यानी अनिवार्य अधिग्रहण का प्रावधान भी शामिल किया गया है। जिसके तहत विशेष परिस्थितियों में सरकार किसी संपत्ति का स्वामित्व अपने पास ले सकती है।

हालांकि कानून में यह भी कहा गया है कि ऐसी स्थिति में उचित और न्यायसंगत मुआवजा दिया जाएगा।

सूचना नियंत्रण पर भी नए प्रावधान

संशोधित कानून में सूचना प्रबंधन और संचार नियंत्रण से जुड़े नए प्रावधान जोड़े गए हैं। यदि मोबिलाइजेशन से संबंधित कोई प्रक्रिया शुरू होती है तो संबंधित अधिकारी आधिकारिक जानकारी जारी करेंगे, संचार मंचों का प्रबंधन करेंगे और सूचना के प्रसार को नियंत्रित करेंगे।

कानून में गलत मोबिलाइजेशन सूचना तैयार करना या उसे फैलाना स्पष्ट रूप से उल्लंघन की श्रेणी में रखा गया है।

इसका उद्देश्य आधिकारिक सूचना व्यवस्था को बनाए रखना बताया गया है।

क्या यह युद्ध की तैयारी का संकेत?

कानून में किए गए बदलावों के बावजूद इसमें एक महत्वपूर्ण बात स्पष्ट की गई है। संशोधित कानून अपने आप किसी राष्ट्रीय मोबिलाइजेशन या युद्ध की घोषणा नहीं करता।

चीन में सामान्य या आंशिक मोबिलाइजेशन का निर्णय अभी भी नेशनल पीपुल्स कांग्रेस की स्थायी समिति द्वारा लिया जाएगा। इसके बाद राष्ट्रपति की ओर से औपचारिक मोबिलाइजेशन आदेश जारी किया जाएगा।

साथ ही, स्टेट काउंसिल और सेंट्रल मिलिट्री कमीशन के पास आपात स्थिति में आवश्यक कदम उठाने की पहले से मौजूद शक्तियां बनी रहेंगी।

आधुनिक युद्ध की जरूरतों के अनुरूप बदलाव

चीनी अधिकारियों के अनुसार कानून में बदलाव आधुनिक युद्ध और राष्ट्रीय सुरक्षा की बदलती जरूरतों को ध्यान में रखकर किए गए हैं।

कानून में मिलिट्री रिसर्च, औद्योगिक क्षमता, मानव संसाधन, लॉजिस्टिक्स, तकनीकी विकास, नागरिक संसाधनों के इस्तेमाल और आर्थिक शक्ति को रक्षा क्षमता में बदलने की व्यवस्था को अपडेट किया गया है।

इसके साथ ही उभरती तकनीकों के इस्तेमाल को बढ़ावा देने और नई तकनीकी क्षमताओं को राष्ट्रीय रक्षा व्यवस्था से जोड़ने पर भी विशेष जोर दिया गया है। (China Defence Mobilization Law)

Explained: क्या भारत में बनेगी अमेरिकी जेवलिन मिसाइल? जानिए क्या है टाटा-लॉकहीड डील का पूरा गणित

Javelin Missile Deal Explained
Javelin Missile Deal Explained: Why India Will Assemble, Not Fully Manufacture the US Anti-Tank Missile

Javelin Missile Deal Explained: हाल ही में भारतीय सेना ने अमेरिका से जेवलिन एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल (एटीजीएम) खरीदने का समझौता किया है। इसे लेकर टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लिमिटेड (टीएएसएल) और जेवलिन जॉइंट वेंचर (जेजेवी) के बीच एक नया समझौता भी हुआ है। हालांकि इस समझौते की बारीकियों को देखें तो तस्वीर कुछ अलग है। समझौते के तहत भारत में जेवलिन मिसाइल का पूरा निर्माण नहीं होगा। भारत में केवल मिसाइल की फाइनल असेंबली और इंटीग्रेशन की सुविधा स्थापित करने की संभावना पर काम किया जाएगा। मिसाइल के सबसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील हिस्से अमेरिका में ही बनते रहेंगे।

Javelin Missile Deal Explained: क्या है जेवलिन मिसाइल?

जेवलिन दुनिया की सबसे आधुनिक और प्रभावी एंटी-टैंक मिसाइल प्रणालियों में से एक मानी जाती है। इसे अमेरिकी सेना ने वर्ष 1996 में सेवा में शामिल किया था।

यह एक मैन-पोर्टेबल मिसाइल है, यानी एक सैनिक इसे अपने कंधे पर लेकर युद्धक्षेत्र में इस्तेमाल कर सकता है। यह “फायर एंड फॉरगेट” तकनीक पर आधारित है। इसका मतलब है कि मिसाइल दागने के बाद सैनिक को टारगेट पर लगातार नजर रखने की जरूरत नहीं पड़ती। मिसाइल अपने गाइडेंस सिस्टम की मदद से खुद टारगेट तक पहुंच जाती है।

जेवलिन का इस्तेमाल टैंक, आर्मर्ड व्हीकल, बंकर और अन्य मजबूत सैन्य ठिकानों को नष्ट करने के लिए किया जाता है। इसकी प्रभावी मारक क्षमता करीब 2.5 किलोमीटर तक मानी जाती है।

भारत ने क्यों किया जेवलिन खरीदने का फैसला?

भारतीय सेना लंबे समय से तीसरी पीढ़ी की आधुनिक एंटी-टैंक मिसाइलों की कमी का सामना कर रही है। सेना के पास अभी भी मिलान-2टी और कोंकुर्स-एम जैसी वायर-गाइडेड मिसाइलें मौजूद हैं।

दूसरी ओर डीआरडीओ की मैन-पोर्टेबल एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल (एमपीएटीजीएम) का डेवलपमेंट भी चल रहा है। लेकिन सेना को तत्काल जरूरतों के लिए एक युद्ध में सिद्ध और आधुनिक प्रणाली की जरूरत थी।

इसी कारण भारत ने अमेरिकी फॉरेन मिलिट्री सेल्स (एफएमएस) प्रक्रिया के तहत जेवलिन मिसाइल खरीदने का फैसले लिया।

अमेरिकी डिफेंस सिक्योरिटी कोऑपरेशन एजेंसी ने पहले ही लगभग 4.57 करोड़ डॉलर के संभावित पैकेज की जानकारी दी थी। इसमें 100 एफजीएम-148 जेवलिन मिसाइलें, एक फ्लाई-टू-बाय मिसाइल और 25 लाइटवेट कमांड लॉन्च यूनिट शामिल थीं। (Javelin Missile Deal Explained)

टाटा और अमेरिकी कंपनियों के बीच क्या हुआ समझौता?

31 अगस्त को टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स और जेवलिन जॉइंट वेंचर के बीच समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर हुए। जेवलिन जॉइंट वेंचर अमेरिका की दो प्रमुख डिफेंस कंपनियों लॉकहीड मार्टिन और रेथियॉन का जॉइंट वेंचर है। इन दोनों कंपनियों ने अब तक 55,000 से अधिक जेवलिन मिसाइलें और 12,000 से ज्यादा लॉन्च यूनिट तैयार की हैं।

समझौते के अनुसार दोनों पक्ष भारत में जेवलिन ऑल-अप राउंड (एयूआर) के लिए फाइनल असेंबली और इंटीग्रेशन सुविधा स्थापित करने की संभावना तलाशेंगे।

टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स को कई भारतीय कंपनियों के मूल्यांकन के बाद इस परियोजना के लिए प्रमुख भारतीय भागीदार चुना गया है। (Javelin Missile Deal Explained)

क्या भारत में पूरी जेवलिन मिसाइल बनेगी?

इस समझौते का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है। जारी प्रेस रिलीज के मुताबिक फिलहाल भारत में पूरी मिसाइल का निर्माण नहीं होगा। मिसाइल के मुख्य और संवेदनशील हिस्से अमेरिका में ही बनते रहेंगे।

लॉकहीड मार्टिन अपने ट्रॉय, अलबामा स्थित संयंत्र में मिसाइल के सब-असेंबली किट तैयार करेगी। वहीं रेथियॉन अपने टक्सन, एरिजोना संयंत्र में गाइडेंस इलेक्ट्रॉनिक्स यूनिट बनाएगी।

गाइडेंस इलेक्ट्रॉनिक्स यूनिट मिसाइल का सबसे अहम हिस्सा माना जाता है। यही मिसाइल का ऑनबोर्ड कंप्यूटर होता है, जो टारगेट की पहचान करता है और मिसाइल को लक्ष्य तक पहुंचाता है।

ये सभी प्रमुख हिस्से अमेरिका से भारत भेजे जाएंगे। इसके बाद टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स भारत में उनकी फाइनल असेंबली और इंटीग्रेशन करेगी। (Javelin Missile Deal Explained)

क्या टेक्नोलॉजी ट्रांसफर होगा?

भारतीय सेना पहली बार 2009 में जेवलिन खरीदने की दिशा में आगे बढ़ी थी। उस समय भारत की प्राथमिकता केवल मिसाइल खरीदना नहीं बल्कि महत्वपूर्ण तकनीकों तक पहुंच हासिल करना भी था।

लेकिन 2012 तक चली बातचीत के दौरान टेक्नोलॉजी ट्रांसफर को लेकर सहमति नहीं बन सकी। इसके बाद यह मामला लंबे समय तक आगे नहीं बढ़ पाया।

वर्तमान समझौते में भी किसी संवेदनशील टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की घोषणा नहीं की गई है। न ही कोई स्वदेशीकरण लक्ष्य, निवेश राशि या भारतीय सामग्री का प्रतिशत घोषित किया गया है।

संयुक्त बयान में केवल इतना कहा गया है कि भारत में कंपोनेंट निर्माण की संभावनाओं पर विचार किया जाएगा। (Javelin Missile Deal Explained)

भारतीय रक्षा उद्योग को क्या फायदा होगा?

हालांकि यह फुल मैन्युफैक्चरिंग प्रोजेक्ट नहीं है, फिर भी इससे भारतीय उद्योग को कुछ महत्वपूर्ण अनुभव मिल सकते हैं। भारत में फाइनल असेंबली और इंटीग्रेशन की सुविधा स्थापित होने पर इंजीनियरों और तकनीशियनों को आधुनिक मिसाइल सिस्टम्स के साथ काम करने का अवसर मिलेगा।

टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स का कहना है कि इससे भारत के रक्षा औद्योगिक इकोसिस्टम में नई असेंबली विशेषज्ञता आएगी और हाई-टेक रोजगार के अवसर बढ़ेंगे।

इसके अलावा भारतीय सेना को आवश्यकता पड़ने पर मिसाइलों की उपलब्धता और सपोर्ट व्यवस्था को भी बेहतर तरीके से प्रबंधित किया जा सकेगा। (Javelin Missile Deal Explained)

जेवलिन क्यों मानी जाती है इतनी खास?

जेवलिन की सबसे बड़ी ताकत इसका फायर एंड फॉरगेट सिस्टम है। ऑपरेटर टारगेट को लॉक करता है और मिसाइल दाग देता है। इसके बाद मिसाइल खुद लक्ष्य तक पहुंचती है। मिसाइल में इंफ्रारेड सीकर लगा होता है, जो लक्ष्य की गर्मी को पहचानकर उसका पीछा करता है।

इसमें दो प्रकार के अटैक मोड उपलब्ध हैं। पहला डायरेक्ट अटैक मोड है, जिसका इस्तेमाल बंकर और अन्य स्थिर लक्ष्यों के खिलाफ किया जाता है। दूसरा टॉप अटैक मोड है। इसमें मिसाइल पहले ऊपर उठती है और फिर टैंक की छत पर हमला करती है। चूंकि अधिकांश टैंकों की छत अपेक्षाकृत कमजोर होती है, इसलिए यह तरीका बेहद प्रभावी माना जाता है।

इराक और अफगानिस्तान में किया इस्तेमल

जेवलिन का इस्तेमाल अमेरिकी सेना ने इराक और अफगानिस्तान में किया है। लेकिन इसकी सबसे ज्यादा चर्चा रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान हुई।

यूक्रेनी सेना ने रूसी टैंकों और बख्तरबंद वाहनों के खिलाफ बड़ी संख्या में जेवलिन मिसाइलों का इस्तेमाल किया था। इस युद्ध के दौरान जेवलिन दुनिया की सबसे चर्चित एंटी-टैंक मिसाइल प्रणालियों में शामिल हो गई। (Javelin Missile Deal Explained)

पहले बीडीएल था भारतीय भागीदार

दिलचस्प बात यह है कि जेवलिन प्रोजेक्ट में पहले भारत डायनेमिक्स लिमिटेड (बीडीएल) को भारतीय भागीदार माना जा रहा था। फरवरी 2020 में डिफेंस एक्सपो लखनऊ के दौरान बीडीएल और जेवलिन जॉइंट वेंचर के बीच भी एक समझौता हुआ था। उस समय दोनों पक्ष भारत में जेवलिन के प्रोडक्शन की संभावनाओं पर काम कर रहे थे। (Javelin Missile Deal Explained)

भारत की GCAP में बड़ी एंट्री, यूके, जापान और इटली के छठवीं पीढ़ी के फाइटर जेट प्रोग्राम में मिला खास दर्जा

India GCAP Dialogue Partner
India Joins GCAP as Dialogue Partner, Expands Access to Future Sixth-Generation Fighter Technologies Alongside AMCA

India GCAP Dialogue Partner: भारत को यूनाइटेड किंगडम, जापान और इटली के नेतृत्व वाले ग्लोबल कॉम्बैट एयर प्रोग्राम (जीसीएपी) में “डायलॉग पार्टनर” यानी संवाद भागीदार का दर्जा मिला है। जीसीएपी दुनिया के सबसे महत्वाकांक्षी छठी पीढ़ी (सिक्स्थ जेनरेशन) के लड़ाकू विमान कार्यक्रमों में से एक माना जाता है। इस कार्यक्रम का नेतृत्व ब्रिटेन, जापान और इटली कर रहे हैं। इसका लक्ष्य वर्ष 2035 के आसपास एक अत्याधुनिक लड़ाकू विमान को सेवा में शामिल करना है।

भारत को डायलॉग पार्टनर बनाने का यह कदम ऐसे समय में सामने आया है जब भारत अपने स्वदेशी एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (एएमसीए) कार्यक्रम को आगे बढ़ा रहा है और साथ ही भविष्य की एयर कॉम्बैट टेक्नोलॉजी पर भी नजर बनाए हुए है।

India GCAP Dialogue Partner: क्या है जीसीएपी कार्यक्रम?

ग्लोबल कॉम्बैट एयर प्रोग्राम की शुरुआत साल 2022 में हुई थी, जब ब्रिटेन, जापान और इटली ने अपने-अपने अगली पीढ़ी के लड़ाकू विमान कार्यक्रमों को एक मंच पर लाने का फैसला किया था। इसका उद्देश्य एक ऐसा एयर कॉम्बैट सिस्टम तैयार करना है, जिसमें स्टेल्थ तकनीक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, एडवांस्ड सेंसर, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम, हाई-स्पीड डाटा लिंक और मानवरहित प्लेटफॉर्म के साथ मिलकर काम करने की क्षमता शामिल हो।

जीसीएपी के तहत डेवलप होने वाला विमान ड्रोन, सैटेलाइट, एयरबोर्न सेंसर और अन्य प्लेटफॉर्म के साथ नेटवर्क के रूप में काम करेगा। इसलिए इसे केवल एक विमान नहीं बल्कि भविष्य के युद्ध का पूरा कॉम्बैट इकोसिस्टम माना जा रहा है।

भारत को क्या फायदा होगा?

भारत को मिले डायलॉग पार्टनर स्टेटस का मतलब यह नहीं है कि वह फिलहाल कार्यक्रम का पूर्ण सदस्य बन गया है। लेकिन इससे भारत को भविष्य की युद्धक विमान तकनीकों, सुरक्षा जरूरतों और औद्योगिक सहयोग के अवसरों पर तीनों देशों के साथ बातचीत करने का मौका मिलेगा।

डायलॉग पार्टनर का दर्जा मिलने के बाद भारत को कार्यक्रम की दिशा, तकनीकी जरूरतों और औद्योगिक सहयोग के विषयों पर चर्चा का अवसर मिलेगा।

हालांकि भारत को इस स्तर पर सीक्रेट डिजाइन जानकारी, संवेदनशील तकनीकों या कार्यक्रम के प्रबंधन में कोई भूमिका नहीं मिलेगी। वह अभी कार्यक्रम की फंडिंग या विकास का साझेदार भी नहीं है।

इसके बावजूद रक्षा विशेषज्ञ इसे महत्वपूर्ण कदम मान रहे हैं क्योंकि इससे भारत को उन तकनीकों को करीब से समझने का अवसर मिलेगा जिन्हें डेवलप करने में सामान्य तौर पर कई दशक लग सकते हैं।

साथ ही, भारतीय कंपनियों के लिए भी भविष्य में ग्लोबल सप्लाई चेन का हिस्सा बनने के अवसर खुल सकते हैं। (India GCAP Dialogue Partner)

एएमसीए बना हुआ है भारत की सबसे बड़ी उम्मीद

भारत का अपना एएमसीए कार्यक्रम देश के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। एएमसीए एक स्वदेशी पांचवीं पीढ़ी का स्टेल्थ लड़ाकू विमान है जिसे भारतीय वायु सेना की भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखकर डेवलप किया जा रहा है।

इस प्रोजेक्ट के जरिए भारत केवल एक नया लड़ाकू विमान नहीं बना रहा, बल्कि स्टेल्थ डिजाइन, एडवांस्ड एवियोनिक्स, सेंसर, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर और वेपन इंटीग्रेशन जैसी महत्वपूर्ण तकनीकों में भी अनुभव हासिल कर रहा है। (India GCAP Dialogue Partner)

यूरोप का एफसीएएस भी विकल्पों में शामिल

जीसीएपी के अलावा भारत यूरोप के फ्यूचर कॉम्बैट एयर सिस्टम (एफसीएएस) कार्यक्रम पर भी नजर रखे हुए है।
एफसीएएस की शुरुआत फ्रांस, जर्मनी और स्पेन के संयुक्त कार्यक्रम के रूप में हुई थी। इसका फोकस नेक्स्ट जेनरेशन फाइटर, ड्रोन, सेंसर और कॉम्बैट क्लाउड नेटवर्क था।

हालांकि जून 2026 में फ्रांस और जर्मनी के बीच औद्योगिक जिम्मेदारियों को लेकर मतभेद बढ़ने के बाद संयुक्त फाइटर प्रोजेक्ट आगे नहीं बढ़ सकी।

इसके बावजूद फ्रांस अपने अगली पीढ़ी के लड़ाकू विमान कार्यक्रम पर काम जारी रखे हुए है। एफसीएएस के भविष्य के स्ट्रक्चर और अंतरराष्ट्रीय भागीदारी को लेकर अभी भी चर्चाएं जारी हैं।

भारत दोनों कार्यक्रमों पर नजर बनाए हुए है और विभिन्न स्तरों पर सहयोग की संभावनाओं का अध्ययन कर रहा है। (India GCAP Dialogue Partner)

केवल विमान नहीं, पूरी तकनीकी क्षमता पर नजर

छठवीं पीढ़ी के लड़ाकू की असली ताकत विभिन्न तकनीकों के इंटीग्रेशन में होगी। इनमें लो-ऑब्जर्वेबल डिजाइन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस बेस्ड डिसिजन सिस्टम, लंबी दूरी की सेंसर क्षमता, सिक्योर कम्युनिकेशन, नेटवर्क-सेंट्रिक ऑपरेशन और मैन्ड-अनमैन्ड टीमिंग जैसी खूबियां शामिल होंगी।

इसी वजह से भारत केवल विमान खरीदने के बजाय डिजाइन, सॉफ्टवेयर, सेंसर, प्रोपल्शन, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर और मैन्युफैक्चरिंग जैसे क्षेत्रों में भी भागीदारी चाहता है। (India GCAP Dialogue Partner)

चीन की बढ़ती ताकत के बीच बढ़ा महत्व

भारत की इस पहल को एशिया में बदलते सैन्य संतुलन से भी जोड़कर देखा जा रहा है। चीन साल 2025 के अंत तक कम से कम 13 रेजिमेंट में करीब 300 जे-20 स्टेल्थ लड़ाकू विमान तैनात कर चुका था। कुछ विश्लेषणों का अनुमान है कि 2026 के मध्य तक यह संख्या 500 से अधिक हो सकती है।

चीन का जे-20 पहले से ही उसकी वायु सेना का प्रमुख स्टेल्थ फाइटर बन चुका है। इसके अलावा चीन नए जे-36 और जे-50 जैसे एडवांस प्रोग्राम पर भी तेजी से काम कर रहा है।

दिसंबर 2024 में जे-36 ने पहली उड़ान भरी थी। इस विमान की खासियत इसका डायमंड विंग डिजाइन, बिना टेल वाला ढांचा और तीन इंजन वाला कॉन्फिगरेशन है। इसके कई प्रोटोटाइप उड़ान परीक्षणों में देखे जा चुके हैं।

चीन के इन कार्यक्रमों ने दुनिया की प्रमुख वायु सेनाओं के बीच नई पीढ़ी के लड़ाकू विमानों की दौड़ को और तेज कर दिया है। (India GCAP Dialogue Partner)

भारतीय वायु सेना के सामने स्क्वाड्रन की चुनौती

भारतीय वायु सेना को अधिकृत जरूरत 42 फाइटर स्क्वाड्रन की है, लेकिन वर्तमान में उसके पास लगभग 29 से 32 स्क्वाड्रन ही मौजूद हैं। आने वाले सालों में जगुआर, मिग-29 और मिराज-2000 जैसे पुराने विमानों की संख्या धीरे-धीरे कम होगी। 110 से 120 जगुआर विमान 2028 से लेकर अगले दशक के मध्य तक सेवा से बाहर होने वाले हैं। ऐसे में भारतीय वायु सेना को एक तरफ मौजूदा लड़ाकू बेड़े को मजबूत रखना है, वहीं दूसरी तरफ भविष्य की तकनीकों के लिए भी तैयारी करनी है। (India GCAP Dialogue Partner)

अर्जुन टैंकों को मिलेगा नया जीवन! भारतीय सेना शुरू करेगी एमके-1 में बड़ा हाईटेक अपग्रेड, लगाए जाएंगे नए सेंसर और फायर कंट्रोल सिस्टम

Arjun Mk-1 Tank Upgrade
Indian Army Begins Arjun Mk-1 Tank Overhaul Program with 26 Mk-1A Upgrades.

Arjun Mk-1 Tank Upgrade: भारतीय सेना के स्वदेशी मुख्य युद्धक टैंक अर्जुन एमके-1 को अब नई तकनीक और बेहतर क्षमताओं के साथ अपग्रेड करने की प्रक्रिया शुरू हो गई है। आवडी स्थित हेवी व्हीकल्स फैक्ट्री (एचवीएफ) दो अर्जुन एमके-1 टैंकों के पायलट ओवरहॉल का काम शुरू करने जा रही है। यह काम आर्म्ड व्हीकल्स निगम लिमिटेड (एवीएनएल) के तहत किया जाएगा। इस प्रोजेक्ट के तहत सिर्फ टैंकों की मरम्मत नहीं होगी, बल्कि उनमें अर्जुन एमके-1ए वर्जन के 26 महत्वपूर्ण अपग्रेड भी लगाए जाएंगे।

Arjun Mk-1 Tank Upgrade: भारत का स्वदेशी मुख्य युद्धक टैंक है अर्जुन

अर्जुन एमके-1 भारत का स्वदेशी मेन बैटल टैंक है, जिसे डीआरडीओ की चेन्नई स्थित कॉम्बैट व्हीकल्स रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टैब्लिशमेंट (सीवीआरडीई) ने डेवलप किया था। इसका उत्पादन आवडी में हेवी व्हीकल्स फैक्ट्री में किया गया। अब तक करीब 124 अर्जुन एमके-1 टैंक भारतीय सेना को सौंपे जा चुके हैं और ये दो रेजिमेंट में तैनात हैं।

टैंक में 1400 हॉर्सपावर का जर्मन एमटीयू वी-10 डीजल इंजन और रेंक ट्रांसमिशन लगाया गया है। इस पावरपैक की निर्धारित उम्र 600 इंजन घंटे या 5,000 किलोमीटर तक मानी जाती है। इसके बाद टैंक को बड़े स्तर के ओवरहॉल की जरूरत होती है।

अब तक अर्जुन टैंकों के लिए व्यापक ओवरहॉल प्रक्रिया नहीं थी। इसी वजह से पहले चरण में दो टैंकों को चुनकर पायलट ओवरहॉल किया जा रहा है।

चार चरणों में होगा पूरा ओवरहॉल

ओवरहॉल प्रक्रिया कई स्तरों पर पूरी की जाएगी। सबसे पहले आवडी स्थित ऑर्डनेंस डिपो में टैंकों की प्रारंभिक जांच होगी। यहां टैंक की मौजूदा स्थिति, क्षतिग्रस्त हिस्सों, यूसेज हिस्ट्री और तकनीकी रिकॉर्ड की जांच की जाएगी।

इसके बाद टैंकों को एचवीएफ आवडी भेजा जाएगा, जहां विशेषज्ञ उसके प्रमुख सिस्टमों की जांच करेंगे। इसमें पावरपैक, गन कंट्रोल सिस्टम और गन माउंटिंग सिस्टम जैसे महत्वपूर्ण हिस्से शामिल होंगे।

तीसरे चरण में टैंक को पूरी तरह खोला जाएगा। इसके बाद सभी प्रमुख सिस्टमों का अलग-अलग निरीक्षण और ओवरहॉल होगा। जरूरत पड़ने पर कई पुराने हिस्सों को पूरी तरह नए सिस्टम से बदला जाएगा। (Arjun Mk-1 Tank Upgrade)

एमके-1ए के 26 बड़े अपग्रेड लगाए जाएंगे

इस प्रोजेक्ट की सबसे बड़ी खासियत यह है कि पुराने अर्जुन एमके-1 टैंकों को एमके-1ए वर्जन की कई आधुनिक क्षमताएं मिलेंगी।

टैंक में नया कमांडर पैनोरामिक साइट लगाया जाएगा, जिससे कमांडर को युद्धक्षेत्र में बेहतर निगरानी क्षमता मिलेगी। गनर मेन साइट को एमके-2 संस्करण में अपग्रेड किया जाएगा। इसके साथ ऑटोमैटिक टारगेट ट्रैकर भी लगाया जाएगा, जो टारगेट को स्वतः ट्रैक कर सकेगा।

फायर कंट्रोल सिस्टम को भी आधुनिक बनाया जाएगा। नया फायर कंट्रोल कंप्यूटर और एडवांस सेंसर टैंक की सटीकता बढ़ाएंगे। बेहतर ट्रैक सिस्टम और एडवांस्ड रनिंग गियर सिस्टम से टैंक की मोबिलिटी में सुधार होगा।

इसके अलावा 8 किलोवाट का कॉम्पैक्ट ऑक्जिलरी पावर यूनिट (एपीयू), एडवांस फायर डिटेक्शन और सप्रेशन सिस्टम, केमिकल सेंसर, एलईडी हेडलैंप और कई अन्य सुधार भी किए जाएंगे। (Arjun Mk-1 Tank Upgrade)

परीक्षण के बाद ही सेना को मिलेंगे टैंक

ओवरहॉल पूरा होने के बाद टैंकों पर कई तरह के परीक्षण किए जाएंगे। पहले हल और टर्रेट का अलग-अलग परीक्षण होगा। इसके बाद दोनों को जोड़कर स्थिरता परीक्षण और रनिंग ट्रायल किए जाएंगे।

टैंक की फायरिंग सटीकता की जांच भी की जाएगी। सभी परीक्षण सफल होने के बाद सेना, ईएमई और अन्य एजेंसियों की मौजूदगी में अंतिम निरीक्षण होगा। इसके कुछ परीक्षण राजस्थान के पोखरण फील्ड फायरिंग रेंज या अन्य सैन्य परीक्षण क्षेत्रों में भी किए जा सकते हैं। (Arjun Mk-1 Tank Upgrade)

18 महीने में पूरा करना होगा काम

रक्षा मंत्रालय ने प्रोजेक्ट के लिए 18 महीने की समयसीमा तय की है। कॉन्ट्रैक्ट मिलने के बाद एचवीएफ को दोनों टैंकों का ओवरहॉल और अपग्रेड पूरा करके सेना को सौंपना होगा। समयसीमा से देरी होने पर आर्थिक दंड का भी प्रावधान रखा गया है। वहीं टैंकों पर 24 महीने या 150 इंजन घंटे की वारंटी भी दी जाएगी।

इस प्रोजेक्ट में एचवीएफ के अलावा डीआरडीओ की सीवीआरडीई, क्वालिटी एश्योरेंस एजेंसियां, ईएफए आवडी, रेंक इंडिया, भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड, टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स और अन्य रक्षा उद्योग भी शामिल हैं। (Arjun Mk-1 Tank Upgrade)

वजनी होने से ऑपरेशन में हैं दिक्कतें

साल 2004 से 2012 के बीच कुल 124 अर्जुन एमके-1 टैंक भारतीय सेना को सौंपे गए थे। ये टैंक वर्तमान में 43वीं आर्मर्ड रेजिमेंट और 75वीं आर्मर्ड रेजिमेंट में तैनात हैं। इनकी तैनाती मुख्य रूप से राजस्थान के पश्चिमी रेगिस्तानी इलाकों में की गई है, जहां इनकी क्षमताओं का बेहतर उपयोग किया जा सकता है। लगभग 58.5 टन वजन होने के चलते कुछ पुलों और कठिन इलाकों में इनके संचालन की सीमाएं हैं, इसलिए इन्हें रेगिस्तानी युद्धक्षेत्र के लिए अधिक उपयुक्त माना जाता है।

अर्जुन एमके-1 टैंक अभी भी भारतीय सेना की सक्रिय सेवा में हैं। हालांकि शुरुआत में स्पेयर पार्ट्स की कमी के कारण कई टैंकों के रखरखाव में दिक्कतें आई थीं और 2013 से 2015 के बीच कुछ टैंक लंबे समय तक खड़े रहे थे। बाद में इन्हें जरूरी स्पेयर उपलब्ध कराए गए। हाल के सालों में युद्धक्षेत्र की बदलती चुनौतियों को देखते हुए कुछ अर्जुन टैंकों पर ड्रोन हमलों से सुरक्षा के लिए “कोप केज” जैसी स्ट्रक्चर भी लगाए गए हैं।

इसके अलावा अर्जुन एमके-1 टैंकों में गन से लॉन्च होने वाली एसएएमएचओ एंटी-टैंक मिसाइल को अभी तक नियमित रूप से शामिल नहीं किया गया है, हालांकि इसका सफल परीक्षण किया जा चुका है। (Arjun Mk-1 Tank Upgrade)

अर्जुन एमके-1ए का ऑर्डर अभी पेंडिंग

वहीं, साल 2021 में भारतीय सेना ने 118 अर्जुन एमके-1ए टैंकों का ऑर्डर दिया था। एमके-1ए वर्जन में कई नई क्षमताएं जोड़ी गई हैं, जिनमें बेहतर फायर कंट्रोल सिस्टम, आधुनिक निगरानी उपकरण और एडवांस सुरक्षा सुविधाएं शामिल हैं। हालांकि इस प्रोजेक्ट को इंजन संबंधी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।

अर्जुन टैंक में इस्तेमाल होने वाले जर्मन एमटीयू इंजन की प्रोडक्शन लाइन बंद होने के कारण सीरियल प्रोडक्शन शुरू नहीं हो पाया है। जुलाई-अगस्त 2026 तक सेना को एक भी सीरियल प्रोडक्शन एमके-1ए टैंक नहीं मिला है। वर्तमान में दो प्रोटोटाइप उपलब्ध हैं, जबकि बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए नए इंजन का इंतजार किया जा रहा है। इसके लिए स्वदेशी डैट्रान 1500 हॉर्सपावर इंजन और एमटीयू बेस्ड नए विकल्पों पर काम चल रहा है। (Arjun Mk-1 Tank Upgrade)

INS Nistar के बाद भारतीय नौसेना को मिला दूसरा डाइविंग सपोर्ट वेसल INS Nipun, अब पूर्वी और पश्चिमी दोनों मोर्चों पर बढ़ी सबमरीन रेस्क्यू क्षमता

INS Nipun Commissioned
INS Nipun Commissioned into Indian Navy, Boosting Deep-Sea Diving and Submarine Rescue Capabilities.

INS Nipun Commissioned: भारतीय नौसेना ने सोमवार अपना दूसरा स्वदेशी डाइविंग सपोर्ट वेसल (डीएसवी) आईएनएस निपुण को औपचारिक रूप से सेवा में शामिल कर लिया। मुंबई स्थित नेवल डॉकयार्ड में आयोजित समारोह में नौसेना प्रमुख एडमिरल कृष्णास्वामिनाथन ने जहाज को कमीशन किया। इसके साथ ही भारतीय नौसेना की गहरे समुद्र में गोताखोरी, पानी के भीतर बचाव अभियान और पनडुब्बी रेस्क्यू क्षमता को बड़ी ताकत मिली है। बता दें कि 30 जुलाई को ही हिंदुस्तान शिपयार्ड लिमिटेड ने निपुण को नौसेना को सौंपा था।

आईएनएस निपुण (ए-17) को हिंदुस्तान शिपयार्ड लिमिटेड (एचएसएल), विशाखापत्तनम ने डिजाइन और निर्मित किया है। यह निस्तार-क्लास का दूसरा डाइविंग सपोर्ट वेसल है। इससे पहले इसी कैटेगरी का पहला जहाज आईएनएस निस्तार (ए-16) पिछले साल 18 जुलाई को विशाखापत्तनम में भारतीय नौसेना में शामिल किया गया था। इसे भी हिंदुस्तान शिपयार्ड लिमिटेड ने बनाया था।

INS Nipun Commissioned: नौसेना को हर तरह की स्थिति के लिए तैयार रहना जरूरी

आईएनएस निपुण को भारतीय नौसेना में शामिल करते हुए नौसेना प्रमुख एडमिरल कृष्णास्वामिनाथन ने कहा कि यह भारत का दूसरा स्वदेशी डाइविंग सपोर्ट वेसल है और इसके शामिल होने से नौसेना की समुद्र के भीतर काम करने की क्षमता काफी मजबूत हुई है।

उन्होंने कहा कि भारतीय नौसेना की सबसे बड़ी जिम्मेदारी देश की समुद्री सुरक्षा और युद्धक तैयारियों को मजबूत रखना है। आज समुद्री क्षेत्र में चुनौतियां लगातार बढ़ रही हैं और सुरक्षा से जुड़े खतरे भी बदल रहे हैं। ऐसे समय में नौसेना को हर तरह की स्थिति के लिए तैयार रहना जरूरी है।

एडमिरल कृष्णास्वामिनाथन ने बताया कि आईएनएस निपुण पश्चिमी नौसेना कमान के तहत पश्चिमी तट पर तैनात रहेगा। यह जहाज गहरे समुद्र में ऑपरेशन, पानी के नीचे बचाव कार्य और पनडुब्बी रेस्क्यू जैसे विशेष मिशनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। (INS Nipun Commissioned)

कई खास क्षमताओं से है लैस

नौसेना प्रमुख ने कहा कि करीब 9,000 टन वजनी यह जहाज कई ऐसी क्षमताओं से लैस है जो दुनिया की केवल कुछ ही नौसेनाओं के पास हैं। इसमें 300 मीटर तक सैचुरेशन डाइविंग की सुविधा, डायनामिक पोजिशनिंग सिस्टम, डाइविंग डिकम्प्रेशन चैंबर, हाइपरबेरिक लाइफबोट, रिमोटली ऑपरेटेड व्हीकल (आरओवी) और डीप सबमर्जेंस रेस्क्यू व्हीकल (डीएसआरवी) को संचालित करने की क्षमता मौजूद है।

नौसेना प्रमुख ने कहा कि आईएनएस निपुण केवल एक जहाज नहीं, बल्कि भारत की समुद्री सुरक्षा क्षमता को मजबूत करने वाला एक महत्वपूर्ण प्लेटफॉर्म है। यह पानी के नीचे बचाव कार्य, समुद्री साल्वेज ऑपरेशन और मानवीय सहायता एवं आपदा राहत अभियानों में भी काम करेगा।

नौसेना प्रमुख ने कहा कि आईएनएस निपुण का आदर्श वाक्य “निश्चय, निर्भय, निपुण” है और जहाज का दल इसी भावना के साथ भारतीय नौसेना और देश की सेवा करेगा। (INS Nipun Commissioned)

पश्चिमी तट पर तैनात होगा आईएनएस निपुण

जहां आईएनएस निस्तार पूर्वी नौसेना कमान के तहत विशाखापत्तनम में तैनात है, जबकि आईएनएस निपुण पश्चिमी नौसेना कमान के तहत मुंबई में तैनात रहेगा। दोनों जहाजों की अलग-अलग तैनाती से भारतीय नौसेना को अरब सागर और बंगाल की खाड़ी दोनों क्षेत्रों में पनडुब्बी बचाव और गहरे समुद्र के अभियानों के लिए त्वरित प्रतिक्रिया देने की क्षमता मिली है।

नौसेना के मुताबिक पहले पूरे भारतीय महासागर क्षेत्र में ऐसी विशेष क्षमताओं के लिए सीमित प्लेटफॉर्म उपलब्ध थे, लेकिन अब पूर्वी और पश्चिमी दोनों समुद्री मोर्चों पर अलग-अलग सहायता उपलब्ध रहेगी।

75 प्रतिशत से अधिक स्वदेशी सामग्री

आईएनएस निपुण में 75 प्रतिशत से अधिक स्वदेशी सामग्री का इस्तेमाल किया गया है। पश्चिमी नौसेना कमान के फ्लैग ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ वाइस एडमिरल संजय वात्सायन ने कहा कि यह जहाज रक्षा निर्माण क्षेत्र में भारत की बढ़ती आत्मनिर्भरता का प्रतीक है।

उन्होंने बताया कि आईएनएस निपुण अत्याधुनिक डाइविंग सपोर्ट वेसल है, जिसे सैचुरेशन डाइविंग, सबमरीन रेस्क्यू, मेरीटाइम साल्वेज ऑपरेशन और गहरे समुद्र में विशेष अभियानों के लिए तैयार किया गया है। उनके अनुसार भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल है जिनके पास समर्पित सबमरीन रेस्क्यू सिस्टम मौजूद है।

उन्होंने कहा कि संस्कृत और हिंदी में “निपुण” का अर्थ किसी विशेष क्षेत्र में दक्ष, सक्षम और कुशल व्यक्ति होता है। इसी भावना को यह जहाज भी दर्शाता है। (INS Nipun Commissioned)

क्या है आईएनएस निपुण की खासियत

करीब 9,000 टन से अधिक क्षमता वाला यह जहाज भारतीय नौसेना के सबसे एडवांस मिशन प्लेटफॉर्म में शामिल है। इसकी लंबाई लगभग 118 मीटर और चौड़ाई करीब 23 मीटर है। जहाज पर 200 से अधिक कर्मियों के रहने की सुविधा है और यह लंबे समय तक समुद्र में बिना बाहरी सहायता के अभियान चला सकता है।

आईएनएस निपुण की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता इसकी 300 मीटर तक सैचुरेशन डाइविंग क्षमता है। इस तकनीक की मदद से गोताखोर लंबे समय तक उच्च दबाव वाले वातावरण में रहकर समुद्र की गहराई में काम कर सकते हैं। इसमें 1,000 मीटर की गहराई तक काम करने वाले रिमोटली ऑपरेटेड व्हीकल (ROVs) और 15 टन की सबसी क्रेन मौजूद है।

जहाज में 8 बेड का अस्पताल, आधुनिक डाइविंग डिकम्प्रेशन चैंबर, हाइपरबेरिक सुविधाएं, ऑपरेशन थिएटर, आईसीयू और विशेष चिकित्सा प्रणाली भी लगाई गई हैं। (INS Nipun Commissioned)

पनडुब्बी बचाव में निभाएगा अहम भूमिका

आईएनएस निपुण को भारतीय नौसेना के डीप सबमर्जेंस रेस्क्यू व्हीकल (डीएसआरवी) के लिए मदर शिप के रूप में डिजाइन किया गया है। यदि किसी पनडुब्बी को समुद्र के भीतर आपात स्थिति का सामना करना पड़ता है, तो डीएसआरवी के माध्यम से उसमें फंसे कर्मियों को बाहर निकाला जा सकता है।

नौसेना प्रमुख एडमिरल कृष्णास्वामिनाथन ने कहा कि पनडुब्बी बचाव ऐसा क्षेत्र है जहां देरी की बहुत कम गुंजाइश होती है। आईएनएस निपुण की डीएसआरवी संचालित करने की क्षमता भारतीय नौसेना की आपातकालीन प्रतिक्रिया क्षमता को काफी बढ़ाती है। उन्होंने कहा कि यह जहाज केवल भारतीय नौसेना ही नहीं बल्कि मित्र देशों की नौसेनाओं की सहायता करने में भी सक्षम होगा। (INS Nipun Commissioned)

डायनामिक पोजिशनिंग सिस्टम से लैस

आईएनएस निपुण में अत्याधुनिक डायनामिक पोजिशनिंग सिस्टम लगाया गया है। यह प्रणाली समुद्र में तेज धाराओं और ऊंची लहरों के बीच भी जहाज को एक निश्चित स्थान पर स्थिर बनाए रखती है। गहरे समुद्र में डाइविंग और रेस्क्यू ऑपरेशन के दौरान यह क्षमता बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है।

एचएसएल के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक रियर एडमिरल (सेवानिवृत्त) चंद्रशेखरन रघुराम ने बताया कि जहाज की डायनामिक पोजिशनिंग और फेल्योर मोड एंड इफेक्ट एनालिसिस सर्टिफिकेशन प्रोसेस 11 दिन तक लगातार समुद्र में चलाए गए परीक्षणों के दौरान पूरा किया गया था।

उन्होंने यह भी बताया कि 300 मीटर तक सैचुरेशन डाइविंग क्षमता वाली प्रणालियों का लगातार आठ दिन तक परीक्षण किया गया, जिसके बाद जहाज को नौसेना को सौंपा गया। (INS Nipun Commissioned)

एचएसएल और नौसेना के संयुक्त प्रयास का परिणाम

रियर एडमिरल रघुराम ने कहा कि आईएनएस निपुण केवल एक जहाज नहीं बल्कि भारत की समुद्री क्षमता का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसके निर्माण में डिजाइनरों, इंजीनियरों, गोताखोरों, उत्पादन टीम, गुणवत्ता विशेषज्ञों और नौसेना के निरीक्षण दलों ने मिलकर काम किया।

उन्होंने बताया कि आईएनएस निस्तार के निर्माण के दौरान मिले अनुभवों का इस्तेमाल आईएनएस निपुण में किया गया, जिससे इसकी तैयारी और ऑपरेशनल क्षमता को और बेहतर बनाया जा सका। (INS Nipun Commissioned)

कमांडिंग ऑफिसर ने बताई जहाज की भूमिका

आईएनएस निपुण के कमांडिंग ऑफिसर कैप्टन एल. एस. सुब्रमणियन ने कहा कि यह भारतीय नौसेना का अनूठा प्लेटफॉर्म है। उन्होंने बताया कि जहाज पर लगे सभी प्रमुख सिस्टम गहरे समुद्र में गोताखोरी और पनडुब्बी बचाव अभियानों के लिए तैयार किए गए हैं।

उनके अनुसार इस जहाज का सबसे बड़ा हथियार इसके प्रशिक्षित गोताखोर और रेस्क्यू सिस्टम हैं। यह प्लेटफॉर्म मुख्य रूप से गहरे समुद्र में विशेष अभियानों के लिए काम करेगा। (INS Nipun Commissioned)