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जी-7 को पीछे छोड़ने वाला 11 देशों का ब्रिक्स कितना ताकतवर, क्या बदल रहा है दुनिया का पावर बैलेंस, कितनी बड़ी हैं चुनौतियां?

BRICS Summit 2026
BRICS at 20: How the Bloc Became a Global Economic Powerhouse and the Challenges It Faces Ahead. (AI Generated Image)

BRICS Summit 2026: भारत 12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली में होने वाले 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी करने जा रहा है। यह सम्मेलन ऐसे समय में हो रहा है जब ब्रिक्स अपनी स्थापना के 20 साल पूरे कर रहा है। साल 2006 में शुरू हुआ यह मंच अब केवल आर्थिक सहयोग का समूह नहीं रह गया है, बल्कि वैश्विक राजनीति, व्यापार, वित्त और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था पर चर्चा करने वाला एक महत्वपूर्ण मंच बन चुका है।

ब्राजील, रूस, भारत और चीन से शुरू हुआ यह समूह आज 11 सदस्य देशों तक पहुंच चुका है। हाल के सालों में मिस्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और इंडोनेशिया जैसे देशों के शामिल होने से इसकी वैश्विक मौजूदगी और बढ़ी है। ऐसे में यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या ब्रिक्स अपने मूल उद्देश्यों पर कायम है या फिर बदलती भू-राजनीतिक परिस्थितियों ने इसके सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं।

BRICS Summit 2026: भारत कर रहा चौथी बार ब्रिक्स की मेजबानी

इस बार समिट का आयोजन भारत मंडपम में किया जा रहा है। भारत ने 1 जनवरी 2026 को ब्राजील से ब्रिक्स की अध्यक्षता संभाली थी। यह चौथी बार है जब भारत इस संगठन की चेयरशिप कर रहा है। इससे पहले 2012, 2016 और 2021 में भी भारत यह जिम्मेदारी निभा चुका है।

समिट की थीम “बिल्डिंग फॉर रेजिलिएंस, इनोवेशन, कोऑपरेशन एंड सस्टेनेबिलिटी” रखी गई है। इसका मकसद बदलती वैश्विक परिस्थितियों के बीच सहयोग, आर्थिक विकास और बहुपक्षीय व्यवस्था को मजबूत करना है।

जी-7 को पीछे छोड़ चुका है ब्रिक्स

बीते दो दशकों में वैश्विक अर्थव्यवस्था में ब्रिक्स देशों की हिस्सेदारी तेजी से बढ़ी है। साल 2000 में ब्राजील, रूस, भारत और चीन की संयुक्त हिस्सेदारी वैश्विक जीडीपी (परचेजिंग पावर पैरिटी) का लगभग 23 फीसदी थी। उसी समय जी-7 देशों की हिस्सेदारी करीब 52 फीसदी थी।

लेकिन 2024 तक तस्वीर बदल गई। 11 सदस्यीय विस्तारित ब्रिक्स समूह वैश्विक जीडीपी का लगभग 36.8 प्रतिशत की हिस्सेदारी रखने लगा, जबकि जी-7 की हिस्सेदारी 29 प्रतिशत से नीचे आ गई। यह बदलाव दुनिया की आर्थिक ताकत के केंद्र में आए परिवर्तन को दर्शाता है।

हालांकि प्रति व्यक्ति आय के मामले में अभी भी बड़ा अंतर बना हुआ है। जी-7 देशों में औसत प्रति व्यक्ति जीडीपी लगभग 53 हजार डॉलर है, जबकि ब्रिक्स देशों में यह करीब 8,200 डॉलर के आसपास है। इसका मतलब है कि ब्रिक्स की ताकत मुख्य रूप से उसकी विशाल आबादी, प्राकृतिक संसाधनों और बड़े बाजारों से आती है। (BRICS Summit 2026)

कैसे शुरू हुआ था ब्रिक्स?

ब्रिक्स की शुरुआत साल 2006 में ब्रिक (BRIC) के तौर पर हुई थी। उस समय ब्राजील, रूस, भारत और चीन को भविष्य की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं के रूप में देखा जा रहा था। बाद में 2009 में रूस के येकातेरिनबर्ग शहर में पहला ब्रिक शिखर सम्मेलन आयोजित हुआ।

साल 2010 में दक्षिण अफ्रीका शामिल हुआ और समूह का नाम ब्रिक्स हो गया। इसके बाद 2024 में मिस्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब और यूएई को सदस्य बनाया गया। जनवरी 2025 में इंडोनेशिया भी पूर्ण सदस्य बन गया।

आज यह समूह दुनिया की बड़ी उभरती अर्थव्यवस्थाओं का प्रतिनिधित्व करता है और खुद को ग्लोबल साउथ यानी विकासशील देशों की आवाज के रूप में प्रस्तुत करता है। (BRICS Summit 2026)

वैश्विक संस्थानों में सुधार की मांग अब भी कायम

ब्रिक्स की स्थापना के समय से ही इसकी एक प्रमुख मांग रही है कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में सुधार किया जाए। संयुक्त राष्ट्र, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) और विश्व बैंक जैसी संस्थाओं में आज भी पश्चिमी देशों का प्रभाव अधिक माना जाता है।

ब्रिक्स देशों का तर्क है कि दुनिया की आर्थिक और राजनीतिक शक्ति में जो बदलाव आया है, उसका प्रतिबिंब इन संस्थाओं में दिखाई नहीं देता। इसी वजह से समूह लंबे समय से अधिक प्रतिनिधित्व, वित्तीय सुधार और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की मांग करता रहा है। (BRICS Summit 2026)

भारत की रणनीति: सभी मंचों पर सक्रिय भूमिका

भारत का ब्रिक्स में शामिल होना उसकी व्यापक रणनीतिक नीति का हिस्सा माना जाता है। नई दिल्ली एक साथ ब्रिक्स, जी-20, क्वाड और शंघाई सहयोग संगठन जैसे मंचों में सक्रिय है।

भारत किसी सैन्य गठबंधन का हिस्सा बने बिना अलग-अलग मंचों पर अपने हितों को आगे बढ़ाने की नीति अपनाता है। इसी कारण भारत ब्रिक्स में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है।

साल 2012 में नई दिल्ली में हुए ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान भारत ने एक विकास बैंक बनाने का प्रस्ताव रखा था। बाद में यही प्रस्ताव न्यू डेवलपमेंट बैंक (एनडीबी) के रूप में सामने आया। (BRICS Summit 2026)

न्यू डेवलपमेंट बैंक की बढ़ती भूमिका

ब्रिक्स देशों द्वारा स्थापित न्यू डेवलपमेंट बैंक आज समूह की सबसे बड़ी संस्थागत उपलब्धियों में गिना जाता है।

2026 के मध्य तक बैंक लगभग 141 परियोजनाओं को मंजूरी दे चुका था, जिनकी कुल कीमत करीब 44 अरब डॉलर बताई गई है। इन परियोजनाओं का संबंध बुनियादी ढांचे, ऊर्जा, परिवहन और सतत विकास से जुड़ा है।

भारत इस बैंक को विकासशील देशों के लिए वित्तीय सहयोग का एक महत्वपूर्ण माध्यम मानता है। (BRICS Summit 2026)

लेकिन ब्रिक्स के भीतर बढ़ रहे मतभेद

ब्रिक्स की बढ़ती ताकत के साथ-साथ इसके भीतर मतभेद भी सामने आने लगे हैं। सबसे बड़ा अंतर इस बात को लेकर है कि समूह का मूल उद्देश्य क्या होना चाहिए।

चीन और रूस ब्रिक्स को पश्चिमी प्रभाव और अमेरिकी नेतृत्व वाली व्यवस्था के विकल्प के रूप में देखते हैं। दोनों देश इसे वैश्विक शक्ति संतुलन बदलने का मंच मानते हैं।

चीन का मानना है कि ब्रिक्स के विस्तार से “ग्लोबल साउथ” यानी विकासशील देशों की आवाज मजबूत होगी। वहीं रूस, पश्चिमी प्रतिबंधों और स्विफ्ट भुगतान प्रणाली से बाहर किए जाने के बाद ब्रिक्स को आर्थिक सहयोग और व्यापार के लिए महत्वपूर्ण मंच मानता है।

दूसरी ओर भारत और ब्राजील का दृष्टिकोण अलग है। भारत और ब्राजील ब्रिक्स को मुख्य रूप से आर्थिक विकास, व्यापार, निवेश और वैश्विक आर्थिक सुधार से जुड़ा मंच मानते हैं। वे इसे किसी राजनीतिक या रणनीतिक गठबंधन के रूप में नहीं देखते।

यह अंतर कई मौकों पर खुलकर सामने आया है। उदाहरण के तौर पर रूस ने 2023 में भारत से तेल भुगतान युआन में करने का सुझाव दिया था, लेकिन भारत ने डॉलर और रुपये में भुगतान को प्राथमिकता दी।

विशेषज्ञों के अनुसार भारत “मल्टी-अलाइनमेंट” की नीति अपनाता है। इसका मतलब है कि भारत एक साथ कई अंतरराष्ट्रीय समूहों का सदस्य बना रहता है और किसी एक खेमे में नहीं जाता। यही कारण है कि भारत ब्रिक्स, जी-20, क्वाड और शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गनाइजेशन (एससीओ) जैसे अलग-अलग मंचों में सक्रिय है, लेकिन किसी सैन्य गठबंधन का हिस्सा नहीं है। (BRICS Summit 2026)

ईरान और यूएई ने बढ़ाई नई चुनौती

ब्रिक्स के विस्तार के बाद समूह के भीतर भू-राजनीतिक चुनौतियां भी बढ़ी हैं। इसका उदाहरण मई 2026 में नई दिल्ली में हुई ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक में देखने को मिला।

बैठक के दौरान सदस्य देश संयुक्त घोषणा पत्र पर सहमत नहीं हो सके। इसकी मुख्य वजह ईरान और संयुक्त अरब अमीरात के बीच मतभेद थे। दोनों देश एक ही समूह के सदस्य हैं, लेकिन पश्चिम एशिया के कई मुद्दों पर उनके दृष्टिकोण अलग हैं।

भारत को मेजबान देश के रूप में चेयर स्टेटमेंट जारी करना पड़ा, जिसमें कहा गया कि कुछ सदस्य देशों के बीच पश्चिम एशिया की स्थिति को लेकर अलग-अलग विचार हैं।

इस घटना ने दिखाया कि सदस्य देशों की संख्या बढ़ने के साथ सर्वसम्मति बनाना पहले की तुलना में अधिक मुश्किल हो गया है। (BRICS Summit 2026)

डॉलर से दूरी बनाने की कोशिश

ब्रिक्स देशों के बीच डॉलर पर निर्भरता कम करने को लेकर लंबे समय से चर्चा होती रही है। हालांकि एक साझा ब्रिक्स मुद्रा बनाने का विचार फिलहाल आगे नहीं बढ़ पाया है। इसकी वजह है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चेतावनी दी थी कि डॉलर की जगह नई मुद्रा लाने पर 100 प्रतिशत टैरिफ लग सकते हैं।

इसके बजाय सदस्य देश अपने-अपने राष्ट्रीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने पर ध्यान दे रहे हैं।

रूस और चीन अब अपने 90 प्रतिशत से अधिक द्विपक्षीय व्यापार का निपटान रूबल और युआन में कर रहे हैं। भारत और रूस के बीच भी बड़ी मात्रा में भुगतान राष्ट्रीय मुद्राओं में होने लगा है।

भारत और यूएई के बीच जुलाई 2023 से रुपया-दिरहम भुगतान प्रणाली लागू है। वहीं भारत और इंडोनेशिया ने जुलाई 2026 में रुपया-रुपिया भुगतान व्यवस्था शुरू की। (BRICS Summit 2026)

ब्रिक्स पे सिस्टम पर फोकस

2026 के शिखर सम्मेलन में ब्रिक्स पे सिस्टम भी चर्चा का प्रमुख विषय है। इस प्रणाली का उद्देश्य सदस्य देशों के भुगतान नेटवर्क को आपस में जोड़ना है।

इसमें रूस का एसपीएफएस, चीन का सीआईपीएस, भारत का यूपीआई और ब्राजील का पिक्स नेटवर्क शामिल किए जाने की योजना है। इससे सदस्य देशों के बीच व्यापारिक भुगतान डॉलर आधारित बैंकिंग चैनलों पर निर्भर हुए बिना किए जा सकेंगे।

भारत इस दिशा में इंटरऑपरेबल सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी और डिजिटल भुगतान सहयोग को अधिक व्यावहारिक विकल्प मानता है। (BRICS Summit 2026)

नई दिल्ली शिखर सम्मेलन पर दुनिया की नजर

नई दिल्ली में होने वाला 18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन ऐसे समय में हो रहा है जब पश्चिम एशिया, रूस-यूक्रेन संघर्ष और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता जैसे कई मुद्दे दुनिया के सामने हैं।

सम्मेलन में सप्लाई चेन को मजबूत बनाने, वैश्विक वित्तीय संस्थाओं में सुधार, न्यू डेवलपमेंट बैंक की भूमिका बढ़ाने और सदस्य देशों के बीच व्यापार विस्तार जैसे विषयों पर चर्चा होने की उम्मीद है।

भारत का ध्यान डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, जलवायु वित्त, स्वास्थ्य सहयोग, महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति, स्थानीय मुद्रा भुगतान और कनेक्टिविटी जैसे व्यावहारिक क्षेत्रों पर केंद्रित है। (BRICS Summit 2026)

Super Garuda Shield 2026 में पहली बार भारतीय सेना के पैरा एसएफ जवानों ने किया एयरबोर्न जंप, अमेरिका, जापान और फ्रांस समेत 21 देश ले रहे हिस्सा

Super Garuda Shield 2026
India's Para SF Joins Super Garuda Shield 2026, Participates in Major Multinational Military Exercise in Indonesia. (AI Generated Image)

Super Garuda Shield 2026: इंडोनेशिया में इन दिनों बहुराष्ट्रीय सैन्य अभ्यास सुपर गरुड़ा शील्ड 2026 चल रही है। इस एक्सरसाइज में पहली बार भारत सक्रिय तौर पर शामिल हुआ है। भारत ने पहली बार इस अभ्यास में अपने स्पेशल फोर्सेज के जवानों को भेजा है। 31 अगस्त से 11 सितंबर तक आयोजित इस बड़े सैन्य अभ्यास में 21 देशों के कुल 4,743 सैनिक हिस्सा ले रहे हैं।

इंडोनेशिया की सरकारी समाचार एजेंसी अंतारा और सैन्य सूत्रों के अनुसार भारतीय सेना के 40 पैरा ट्रूपर्स ने एयरबोर्न जंप और फायरिंग अभ्यास में हिस्सा लिया।

यह अभ्यास इंडोनेशिया की सेना टीएनआई (टेंटारा नेशनल इंडोनेशिया) और अमेरिकी इंडो-पैसिफिक कमांड के सहयोग से आयोजित किया जा रहा है। इसका उद्देश्य विभिन्न देशों की सेनाओं के बीच तालमेल बढ़ाना, ऑपरेशनल रेडीनेस मजबूत करना और क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियों से निपटने की क्षमता विकसित करना है।

Super Garuda Shield 2026: 21 देशों के सैनिक एक मंच पर

अंतारा के मुताबिक, इस साल के सुपर गरुड़ा शील्ड में इंडोनेशिया, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, भारत, जापान, फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन, कनाडा, दक्षिण कोरिया, सिंगापुर, थाईलैंड, वियतनाम और अन्य देशों के सैनिक शामिल हैं।

सुपर गरुड़ा शील्ड हर साल आयोजित किया जाता है। इस बार 21 देशों के 4,743 सैनिक 12 अलग-अलग प्रशिक्षण गतिविधियों में भाग ले रहे हैं। अभ्यास इंडोनेशिया के बांडुंग, जकार्ता, लाम्पुंग, दक्षिण सुमात्रा के बातुराजा और उत्तरी कालीमंतान के नुनुकान क्षेत्रों में आयोजित किया जा रहा है। इसका समापन 11 सितंबर को जकार्ता में होगा।

भारत की सक्रिय भागीदारी

सूत्रों के अनुसार भारत की ओर से इस अभ्यास में 50वीं इंडिपेंडेंट पैरा स्पेशल फोर्स (पैरा एसएफ) के जवान शामिल हुए हैं। यह भागीदारी इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि पहले कई मौकों पर भारत की भूमिका या तो बेहद सीमित रही या फिर ऑब्जर्वर स्तर की रही थी।

लेकिन इस बार भारतीय सैनिकों ने सीधे ऑपरेशनल ट्रेनिंग में हिस्सा लिया। दक्षिण सुमात्रा के बातुराजा कॉम्बैट ट्रेनिंग सेंटर में आयोजित एयरबोर्न ड्रिल में भारतीय पैरा ट्रूपर्स ने अन्य देशों के सैनिकों के साथ पैराशूट जंप किए। (Super Garuda Shield 2026)

Super Garuda Shield 2026
Ex Super Garuda Shield 2026: India is participating in Ex Super Garuda Shield 2026, keystone Multinational Military exercise of TNI. Participating in Airborne & Cyber exercises, live firing and Exercise planning for 2027 edition. (Image Source: Anatara)

भारत के 40 पैराट्रूपर्स हुए शामिल

अंतारा के अनुसार एयरबोर्न ट्रेनिंग में इंडोनेशिया, अमेरिका, भारत, जापान और फ्रांस के सैनिक शामिल हुए। इस अभ्यास में इंडोनेशिया के 110, अमेरिका के 147, भारत के 40, जापान के 17 और फ्रांस के 6 पैराट्रूपर्स ने हिस्सा लिया।

जवानों ने सी-130 हरक्यूलिस विमान से 1,200 फीट की ऊंचाई से स्टैटिक लाइन जंप किए। इस दौरान इंडोनेशियाई वायुसेना के दो हरक्यूलिस विमान और अमेरिकी वायुसेना के तीन हरक्यूलिस विमान तैनात रहे।

टीएनआई के मुताबिक, “इस प्रशिक्षण का उद्देश्य विभिन्न देशों के पैराट्रूपर्स की सुरक्षित और सटीक एयरबोर्न ऑपरेशन क्षमता को मजबूत करना है।”

इस अभ्यास के दौरान विभिन्न सेनाओं की प्रक्रियाओं को एक-दूसरे के साथ कॉर्डिनेट करने और संयुक्त अभियान चलाने की क्षमता को भी परखा गया। (Super Garuda Shield 2026)

भारतीय पैरा एसएफ ने फायरिंग ड्रिल में भी लिया हिस्सा

एयरबोर्न ऑपरेशन के अलावा भारतीय सैनिकों ने सॉफ फ्लैट रेंज एडवांस शूटिंग अभ्यास में भी हिस्सा लिया। यह अभ्यास दक्षिण सुमात्रा के मार्तापुरा स्थित फायरिंग रेंज में आयोजित किया गया।

सूत्रों के अनुसार इस ड्रिल में कुल 270 सैनिक शामिल हुए। इनमें इंडोनेशिया के 110 सैनिक, अमेरिका के 80 सैनिक, न्यूजीलैंड के 45 सैनिक और भारत के 40 पैरा एसएफ कमांडो शामिल थे।

अभ्यास का उद्देश्य विभिन्न देशों की सेनाओं की युद्धक क्षमता और इंटरऑपरेबिलिटी बढ़ाना था। अधिकारियों के अनुसार पूरा प्रशिक्षण सफलतापूर्वक पूरा किया गया। (Super Garuda Shield 2026)

साइबर, एयर असॉल्ट और लाइव फायर ट्रेनिंग पर जोर

सुपर गरुड़ा शील्ड 2026 केवल जमीनी युद्ध अभ्यास तक सीमित नहीं है। इसमें साइबर सुरक्षा, कमांड एंड कंट्रोल, एयर असॉल्ट, जंगल वारफेयर, अर्बन ऑपरेशन, मेडिकल इवैक्यूएशन और डिजास्टर रिलीफ जैसे कई मॉड्यूल शामिल हैं।

टीएनआई के मुताबिक, इंडोनेशिया की साइबर यूनिट केवल तीन साल पहले स्थापित हुई थी। ऐसे में दूसरे देशों के साथ संयुक्त साइबर अभ्यास अनुभव साझा करने और क्षमताएं विकसित करने का महत्वपूर्ण अवसर प्रदान कर रहा है। (Super Garuda Shield 2026)

Super Garuda Shield 2026
Ex Super Garuda Shield 2026: India is participating in Ex Super Garuda Shield 2026, keystone Multinational Military exercise of TNI. Participating in Airborne & Cyber exercises, live firing and Exercise planning for 2027 edition. (Image Source: Anatara)

मानवीय सहायता और आपदा राहत भी अभ्यास का हिस्सा

इस बार अभ्यास में एचएडीआर (ह्यूमैनिटेरियन असिस्टेंस एंड डिजास्टर रिलीफ) गतिविधियों को भी प्रमुखता दी गई है। उत्तरी कालीमंतान क्षेत्र में प्राकृतिक आपदा प्रतिक्रिया से जुड़े विशेष प्रशिक्षण आयोजित किए जा रहे हैं।

इंडोनेशियाई सेना का कहना है कि आधुनिक सुरक्षा चुनौतियां केवल सैन्य संघर्ष तक सीमित नहीं हैं। प्राकृतिक आपदाओं और मानवीय संकटों में भी सेनाओं की भूमिका लगातार बढ़ रही है। इसी कारण राहत और बचाव अभियानों को प्रशिक्षण कार्यक्रम का हिस्सा बनाया गया है। (Super Garuda Shield 2026)

2007 में शुरू हुई थी गरुड़ा शील्ड

सुपर गरुड़ा शील्ड की शुरुआत वर्ष 2007 में गरुड़ा शील्ड नामक द्विपक्षीय अभ्यास के रूप में हुई थी। उस समय इसमें केवल इंडोनेशिया और अमेरिका हिस्सा लेते थे।

बाद के सालों में इसका विस्तार किया गया और कई देशों को इसमें शामिल किया गया। इसके बाद इसे सुपर गरुड़ा शील्ड नाम दिया गया। अब यह इंडो-पैसिफिक क्षेत्र के सबसे बड़े बहुराष्ट्रीय सैन्य अभ्यासों में गिनी जाती है। (Super Garuda Shield 2026)

अंतारा के अनुसार इंडोनेशिया इस अभ्यास को क्षेत्रीय स्थिरता, सुरक्षा और रक्षा कूटनीति का मंच मानता है। यह अभ्यास इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में शांति, सुरक्षा और स्थिरता बनाए रखने के लिए इंडोनेशिया की रक्षा कूटनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। (Super Garuda Shield 2026)

LAC से 95 किमी दूर शुरू हुआ भारत-अमेरिका का सबसे बड़ा “युद्ध अभ्यास”, पहली बार तैनात हुआ अमेरिकी MLIDS सिस्टम

Yudh Abhyas 2026
India-US Yudh Abhyas 2026 Begins: Apache Helicopters, MLIDS Counter-Drone System and Multi-Domain Operations Take Center Stage. (AI Generated Image)

Yudh Abhyas 2026: भारत और अमेरिका की सेनाओं के बीच होने वाली सालाना जॉइंट मिलिट्री एक्सरसाइज युद्ध अभ्यास-2026 शुरू हो गई है। यह दोनों देशों के बीच होने वाले सबसे बड़े द्विपक्षीय सैन्य अभ्यास का 22वां संस्करण है। इस बार का अभ्यास कई मायनों में खास माना जा रहा है, क्योंकि पहली बार इसमें हाई-एल्टीट्यूड ऑपरेशन, डेजर्ट वॉरफेयर, अपाचे अटैक हेलीकॉप्टर, मल्टी-डोमेन लॉन्ग-रेंज फायर सिस्टम और अमेरिकी मोबाइल काउंटर-ड्रोन सिस्टम को एक ही अभ्यास में शामिल किया गया है।

यह संयुक्त अभ्यास 9 सितंबर से 28 सितंबर तक चलेगा। इसमें भारत और अमेरिका की सेनाओं के लगभग 700 सैनिक हिस्सा ले रहे हैं। दोनों देशों की तरफ से करीब 350-350 जवान तैनात किए गए हैं।

Yudh Abhyas 2026: दो अलग-अलग युद्धक्षेत्रों में होगा अभ्यास

सूत्रों के अनुसार पहली बार एक ही संस्करण में पहाड़ी और रेगिस्तानी दोनों तरह के युद्धक्षेत्रों को शामिल किया गया है। पहला औली, उत्तराखंड है, जो समुद्र तल से करीब 2,500 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यह इलाका वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) से लगभग 95 किलोमीटर दूर माना जाता है। 2020 के भारत-चीन सैन्य तनाव के बाद यह क्षेत्र भारतीय सेना के हाई-एल्टीट्यूड ऑपरेशन के लिए महत्वपूर्ण बन गया है।

दूसरा इलाका राजस्थान में महाजन फील्ड फायरिंग रेंज है। यह भारत की सबसे बड़ी लाइव-फायर ट्रेनिंग रेंज में शामिल है और पाकिस्तान सीमा के नजदीक स्थित है। यहां मैकेनाइज्ड ऑपरेशन, आर्टिलरी फायरिंग, एयर-ग्राउंड कोऑर्डिनेशन और बड़े पैमाने पर युद्धाभ्यास किए जाते हैं।

इस साल के अभ्यास में दोनों सेनाएं हाई-एल्टीट्यूड ऑपरेशन, रेगिस्तानी युद्ध, काउंटर-ड्रोन तकनीक, डिजिटल फायर कंट्रोल और संयुक्त कमांड सिस्टम जैसे आधुनिक सैन्य क्षेत्रों में प्रशिक्षण ले रही हैं। (Yudh Abhyas 2026)

थर्ड मल्टी-डोमेन टास्क फोर्स ले रही हिस्सा

अमेरिकी सेना की ओर से इस अभ्यास में 11वीं एयरबोर्न डिवीजन के सैनिक शामिल हैं। यह यूनिट अलास्का के फोर्ट वेनराइट में तैनात है और आर्कटिक परिस्थितियों में वॉर ऑपरेशन के लिए प्रशिक्षित मानी जाती है।

आर्कटिक क्षेत्र में ट्रेनिंग प्राप्त सैनिकों का भारत के ऊंचाई वाले इलाकों में प्रशिक्षण दोनों सेनाओं को कठिन परिस्थितियों में संयुक्त अभियान चलाने का अनुभव देगा।

अमेरिकी सेना की थर्ड मल्टी-डोमेन टास्क फोर्स (3एमडीटीएफ) भी इस अभ्यास का हिस्सा है। यह यूनिट केवल पारंपरिक सैन्य अभियान नहीं बल्कि साइबर, स्पेस, इन्फॉर्मेशन और लॉन्ग-रेंज प्रिसिजन फायर जैसी आधुनिक युद्ध क्षमताओं पर काम करती है। (Yudh Abhyas 2026)

पहली बार भारत में तैनात हुआ अमेरिकी एमएलआईडीएस सिस्टम

युद्ध अभ्यास-2026 में सबसे अहम अमेरिकी एमएलआईडीएस (मोबाइल लो, स्लो, स्मॉल अनमैन्ड एयरक्राफ्ट इंटीग्रेटेड डिफीट सिस्टम) है, जिसकी भारत में पहली बार किसी एक्सरसाइज में ऑपरेशनल तैनाती की गई है।

यह एक मोबाइल काउंटर-ड्रोन सिस्टम है, जिसे छोटे, कम ऊंचाई और कम गति से उड़ने वाले ड्रोन को पहचानने और नष्ट करने के लिए विकसित किया गया है।

इस सिस्टम में रडार, इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल सेंसर, इन्फ्रारेड सेंसर, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर उपकरण और वेपन सिस्टम शामिल होते हैं। आधुनिक युद्ध में ड्रोन खतरों को देखते हुए यह सिस्टम बेहद अहम है।

अमेरिकी सेना ने इस सिस्टम का इस्तेमाल पहले रोमानिया और मध्य पूर्व के कुछ क्षेत्रों में भी किया है।

अपाचे हेलीकॉप्टर और लॉन्ग-रेंज फायर सिस्टम पर फोकस

इस साल के युद्ध अभ्यास में एएच-64 अपाचे अटैक हेलीकॉप्टर भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। इनका इस्तेमाल क्लोज एयर सपोर्ट और प्रिसिजन स्ट्राइक मिशनों में किया जाएगा।

साथ ही भारतीय और अमेरिकी सेना के रॉकेट तथा आर्टिलरी सिस्टम को डिजिटल नेटवर्क के जरिए जोड़ने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।

अमेरिकी 3एमडीटीएफ लॉन्ग-रेंज प्रिसिजन फायर क्षमताओं के लिए जानी जाती है। अभ्यास के दौरान टारगेट संबंधी सूचनाओं को साझा करने और संयुक्त फायर मिशन चलाने की प्रक्रिया पर काम किया जाएगा।

सूत्रों के मुताबिक यह आधुनिक युद्ध की उस अवधारणा का हिस्सा है जिसमें कई तरह के हथियार एक साझा डिजिटल नेटवर्क पर काम करते हैं। (Yudh Abhyas 2026)

कमांड पोस्ट और लाइव फायरिंग होगी मुख्य आकर्षण

युद्ध अभ्यास-2026 में कमांड पोस्ट एक्सरसाइज और फील्ड ट्रेनिंग एक्सरसाइज दोनों शामिल हैं। कमांड पोस्ट फेज में दोनों सेनाओं के अधिकारी संयुक्त योजना, निर्णय प्रक्रिया और युद्ध संचालन के विभिन्न पहलुओं पर काम करेंगे।

इसके बाद फील्ड ट्रेनिंग चरण में सैनिक वास्तविक परिस्थितियों में संयुक्त अभियान चलाने का अभ्यास करेंगे।

अभ्यास का समापन कंबाइंड लाइव-फायर डेमोंस्ट्रेशन के साथ होगा। इसमें भारतीय और अमेरिकी रॉकेट, आर्टिलरी और दूसरे वेपन सिस्टम्स मिल कर टारगेट पर अटैक करेंगे। (Yudh Abhyas 2026)

अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने कही ये बात

भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने कहा, “युद्ध अभ्यास दिखाता है कि भारत और अमेरिका की रक्षा साझेदारी कितनी मजबूत हो चुकी है। हमारे सैनिक एक-दूसरे से सीख रहे हैं, साथ प्रशिक्षण ले रहे हैं और ऐसा भरोसा विकसित कर रहे हैं जो दोनों देशों को अधिक सुरक्षित बनाता है।”

वहीं, अमेरिकी सेना प्रशांत क्षेत्र के डिप्टी कमांडिंग जनरल लेफ्टिनेंट जनरल जोएल ‘जेबी’ वोवेल ने कहा, “युद्ध अभ्यास भरोसा बनाने, विशेषज्ञता साझा करने और मुक्त एवं खुले इंडो-पैसिफिक के प्रति हमारी प्रतिबद्धता को दर्शाने का मंच है। हर वर्ष भारतीय सेना के साथ हमारी साझेदारी और मजबूत होती जा रही है।” (Yudh Abhyas 2026)

2004 से जारी है युद्ध अभ्यास

युद्ध अभ्यास की शुरुआत साल 2004 में हुई थी। शुरुआती वर्षों में इसका मुख्य उद्देश्य काउंटर-इंसर्जेंसी और शांति स्थापना अभियानों में सहयोग बढ़ाना था।

समय के साथ यह अभ्यास लगातार विकसित होता गया। अब इसमें मल्टी-डोमेन ऑपरेशन, ड्रोन विरोधी क्षमताएं, लॉन्ग-रेंज फायर सिस्टम, डिजिटल कमांड नेटवर्क और आधुनिक युद्ध तकनीकों को शामिल किया जाता है।

2024 में राजस्थान के महाजन में हुए संस्करण में हिमार्स, पिनाका, एम-777 हॉवित्जर, अपाचे और अन्य हथियार प्रणालियों का प्रदर्शन हुआ था। वहीं 2025 का अभ्यास अलास्का में आयोजित किया गया था, जिसमें भारतीय सेना के जवानों ने सब-आर्कटिक परिस्थितियों में प्रशिक्षण लिया था। (Yudh Abhyas 2026)

Explainer: पुतिन बार-बार क्यों दे रहे हैं भारत को Su-57 का ऑफर? फिर भी नई दिल्ली क्यों नहीं दिखा रही दिलचस्पी, ये है वजह

Su-57 Fighter Jet India
Why Is Russia Repeatedly Offering the Su-57 Stealth Fighter to India, and Why Is New Delhi Still Reluctant? (AI Generated Image)

Su-57 Fighter Jet India: रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन एक बार फिर भारत को अपने सबसे आधुनिक फिफ्थ जेनरेशन स्टील्थ फाइटर जेट सु-57 की पेशकश कर रहे हैं। 11 सितंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पुतिन की प्रस्तावित द्विपक्षीय बैठक से पहले क्रेमलिन ने साफ कर दिया है कि रक्षा सहयोग और सु-57 लड़ाकू विमान का मुद्दा बातचीत के एजेंडे में शामिल रहेगा।

वहीं, रूस सु-57 के साथ टेक्नोलॉजी ट्रांसफर, भारत में प्रोडक्शन और आगे के डेवलपमेंट में साझेदारी जैसी शर्तें भी दे रहा है। इसके बावजूद भारत की तरफ से ठंडा रुख अपनाया जा रहा है। जानते हैं आखिर इसके पीछे वजह क्या है?

Su-57 Fighter Jet India: ब्रिक्स समिट से पहले फिर क्रेमलिन ने किया सु-57 का जिक्र

12-13 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में होने वाले 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से पहले सु-57 एक बार फिर चर्चा में है। इस बैठक से ठीक पहले 8 सितंबर को एक कार्यक्रम के दौरान क्रेमलिन प्रवक्ता ने भारतीय मीडिया के साथ वर्चुअल ब्रीफिंग में कहा कि सु-57 दुनिया के सबसे एडवांस फाइटर जेट्स में से एक है और इस विषय पर दोनों देशों के बीच चर्चा जारी है। पेसकोव ने कहा कि भारत को सु-57 लड़ाकू विमान की बिक्री का मुद्दा राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 11 सितंबर को होने वाली द्विपक्षीय बैठक के एजेंडे में शामिल है।

उन्होंने कहा, “सु-57 दुनिया के सबसे बेहतरीन और सबसे परिष्कृत लड़ाकू विमानों में से एक है। भारत को इसकी बिक्री दोनों नेताओं की बैठक में चर्चा के विषयों में शामिल है।”

पेसकोव ने कहा, “हर देश अपनी नई और जटिल सैन्य तकनीकों को अपने पास रखना चाहता है। लेकिन भारत के साथ हमारे एडवांस रणनीतिक संबंध हैं, इसलिए हम इस संभावना पर चर्चा करेंगे कि क्या यह तकनीक भारत को दी जा सकती है।”

पुतिन खुद भी दे चुके हैं ऑफर

जून 2026 में सेंट पीटर्सबर्ग इंटरनेशनल इकोनॉमिक फोरम के दौरान राष्ट्रपति पुतिन ने भारतीय मीडिया से बातचीत में कहा था, “हमने भारतीय मित्रों को पांचवीं पीढ़ी के इस विमान को संयुक्त रूप से विकसित करने का प्रस्ताव दिया था। मुझे लगता है कि यह दुनिया के सबसे अच्छे विमानों में से एक है। भारतीय मित्रों ने कहा था कि वे इस पर विचार करेंगे।”

उन्होंने जोड़ा कि सैद्धांतिक रूप से यह रूस-भारत का संयुक्त उत्पाद हो सकता था, लेकिन रूस ने इसे अकेले विकसित किया। अब वे भारत के साथ काम करने, विमान सप्लाई करने और आगे विकसित करने को तैयार हैं। कोई पाबंदी नहीं होगी।

पुतिन ने यह भी कहा था कि रूस भारत को विमान सप्लाई करने, तकनीक साझा करने और आगे के विकास में भागीदारी देने के लिए तैयार है। उन्होंने जोर देकर कहा कि इस सहयोग पर किसी प्रकार की पाबंदी नहीं होगी।

पुतिन ने भारत को एक्सपोर्ट वर्जन सु-57ई नहीं, बल्कि पूरे सु-57 फैमिली का ऑफर दिया है। जिसमें दो सीटों वाला सु-57डी भी शामिल है, जिसका मई 2026 में पहला उड़ान परीक्षण हुआ है। (Su-57 Fighter Jet India)

2007 में शुरू हुआ था जॉइंट फाइटर प्रोग्राम

साल 2007 में दोनों देशों ने फिफ्थ जेनरेशन फाइटर एयरक्राफ्ट (FGFA) प्रोग्राम शुरू किया था। यह प्रोजेक्ट सु-57 प्लेटफॉर्म पर आधारित था। भारत चाहता था कि उसे डिजाइन, इंजन, एवियोनिक्स और स्टील्थ टेक्नोलॉजी से जुड़ी महत्वपूर्ण तकनीकों तक पहुंच मिले। लेकिन समय के साथ प्रोजेक्ट की लागत बढ़ती गई और तकनीकी मुद्दों को लेकर मतभेद सामने आने लगे।

करीब एक दशक तक चली बातचीत के बाद तत्कालीन नरेंद्र मोदी सरकार ने 2018 में इस कार्यक्रम से खुद को अलग कर लिया। इसके बाद रूस ने सु-57 को अपने दम पर डेवलप किया और उसे रूसी एयरोस्पेस फोर्सेज में शामिल करना शुरू कर दिया।

वहीं, अब रूस पुरानी साझेदारी को पुनर्जीवित करने की कोशिश कर रहा है। प्रस्ताव में फुल टेक्नोलॉजी ट्रांसफर, सोर्स कोड तक पहुंच, भारत में लाइसेंस के तहत उत्पादन, दो सीटों वाला वेरिएंट और भारतीय हथियारों का इंटीग्रेशन शामिल है। (Su-57 Fighter Jet India)

रूस के लिए भारत क्यों है इतना महत्वपूर्ण?

रूस की सु-57 बेचने की कोशिश के पीछे आर्थिक और रणनीतिक दोनों कारण हैं। दरअसल यूक्रेन युद्ध के बाद रूस पर पश्चिमी देशों के प्रतिबंध बढ़े हैं। इससे रूसी रक्षा उद्योग को झटका लगा है। कई पारंपरिक ग्राहक देश पश्चिमी दबाव और वित्तीय प्रतिबंधों के चलते रूसी हथियार नहीं खरीद रहे हैं।

ऐसे माहौल में भारत रूस का सबसे बड़ा और सबसे भरोसेमंद रक्षा साझेदार बना हुआ है। भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना के पास आज भी बड़ी संख्या में रूसी मूल के प्लेटफॉर्म मौजूद हैं।

सु-30एमकेआई इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड ने नासिक में लाइसेंस के तहत लगभग 222 सु-30एमकेआई बनाए हैं। वायुसेना के कुल बेड़े में करीब 260 सु-30एमकेआई हैं इनमें से लगभग 50 विमान रूस में बनकर सीधे भारत आए थे। रूस चाहता है कि एचएएल के इसी इन्फ्रास्ट्रक्चर का इस्तेमाल सु-57 के लिए भी किया जाए। इसके लिए रूस ने सितंबर 2025 में सु-57 के संभावित भारतीय उत्पादन का जायजा लेने के लिए एक तकनीकी टीम एचएएल के प्लांटों पर भेजी थी। जिनमें सुखोई डिजाइन ब्यूरो के प्रतिनिधि और अन्य रूसी रक्षा कंपनियों के इंजीनियर व अधिकारी शामिल थे।

अक्टूबर-नवंबर 2025 में टीम ने एचएएल को रिपोर्ट सौंपी। जिसमें लिखा था कि एचएएल के पास सु-57 बनाने की करीब 50 प्रतिशत क्षमता पहले से मौजूद है। नासिक की सु-30एमकेआई लाइन को थोड़े बदलाव से सु-57 के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। बाकी 50 प्रतिशत के लिए नई टूलिंग, स्टील्थ कोटिंग, कंपोजिट और सेंसर फ्यूजन लैब की जरूरत बताई थी। खुद तत्कालीन एचएएल चेयरमैन डी.के. सुनील ने इसकी पुष्टि भी की थी। (Su-57 Fighter Jet India)

सु-57 पर भारत ने जताई थीं ये आपत्तियां?

सु-57 रूस का पहला ऑपरेशनल फिफ्थ जेनरेशन स्टील्थ फाइटर है। इसे अमेरिकी एफ-22 रैप्टर और एफ-35 के मुकाबले डेवलप किया गया है। इस विमान में स्टील्थ डिजाइन, सुपरक्रूज क्षमता, एडवांस्ड रडार, इंटीग्रेटेड सेंसर सिस्टम और लंबी दूरी की एयर-टू-एयर तथा एयर-टू-ग्राउंड मिसाइलें शामिल हैं।

विमान में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित कुछ सिस्टम, इंटरनल वेपन बे और नेटवर्क-सेंट्रिक वॉरफेयर क्षमताएं भी जोड़ी गई हैं। हालांकि कई रक्षा विशेषज्ञ इसकी स्टील्थ क्षमता को अमेरिकी एफ-35 या एफ-22 के बराबर नहीं मानते। यही वजह है कि भारत ने पहले भी इसके कुछ तकनीकी पहलुओं पर सवाल उठाए थे।

भारतीय वायुसेना की सबसे बड़ा आपत्ति यही थी। आईएएफ का मानना था कि सु-57 (तब टी-50/पीएके एफए) की रडार क्रॉस सेक्शन पांचवीं पीढ़ी के मानकों पर खरी नहीं उतरती। फ्रंट से कुछ हद तक स्टील्थ है, लेकिन साइड और रियर से रडार सिग्नेचर ज्यादा है। आईएएफ ने प्रोटोटाइप देखने के बाद 40 से ज्यादा बदलाव मांगे थे, जिनमें स्टील्थ सुधार प्रमुख था। जबकि रूस का कहना था विमान उसकी जरूरतों के हिसाब से ठीक है।

साथ ही तब विमान में एएल-41एफ1 इंजन था (सु-35 वाला एडवांस वर्जन) और नया इज्देलिये-30 इंजन तैयार नहीं था। आईएएफ को सुपरक्रूज (आफ्टरबर्नर के बिना सुपरसोनिक उड़ान) चाहिए थी, जो उस इंजन से पूरी नहीं हो रही थी। इंजन की विश्वसनीयता और रखरखाव पर भी सवाल थे।

वहीं, भारत चाहता था कि वह आगे विमान खुद अपग्रेड कर सके। इसके लिए सोर्स कोड और डिजाइन डेटा चाहिए था। जबकि रूस इसे देने को तैयार नहीं था। एचएएल और डीआरडीओ को रूसी आरएंडडी सुविधाओं तक पर्याप्त पहुंच नहीं मिली थी और काम का बंटवारा भी भारत के पक्ष में कम था।

फिफ्थ जेनरेशन फाइटर एयरक्राफ्ट के शुरुआती डिजाइन पर भारत ने करीब 295 मिलियन डॉलर खर्च किए थे। जबकि आगे पूरा कार्यक्रम अरबों डॉलर का हो रहा था। जिससे प्रति विमान कीमत 150-200 मिलियन डॉलर तक पहुंच रही थीं। (Su-57 Fighter Jet India)

रूस जानता है भारतीय वायुसेना को चाहिए फाइटर जेट्स

भारतीय वायुसेना लंबे समय से स्क्वाड्रन की कमी का सामना कर रही है। वायुसेना की जरूरत 42 स्क्वाड्रन की है, जबकि मौजूदा संख्या लगभग 29 से 31 स्क्वाड्रन के बीच है। पुराने मिग-21 रिटायर हो चुके हैं। 2035 तक भारतीय वायुसेना के सामने सिर्फ मौजूदा स्क्वाड्रन की कमी पूरी करने की चुनौती नहीं होगी, बल्कि बड़ी संख्या में पुराने लड़ाकू विमानों को बदलने की जरूरत भी पड़ेगी।

भारतीय वायुसेना के पास जगुआर फाइटर जेट के करीब 6 स्क्वाड्रन हैं, यानी लगभग 110-120 विमान। इनकी रिटायरमेंट 2028 से शुरू होने की संभावना है। इसके बाद मिग-29 के करीब 3 स्क्वाड्रन हैं, जिनके 2030 के दशक के मध्य तक सेवा से बाहर होने की उम्मीद है। वहीं मिराज-2000 बेड़े के करीब 3 स्क्वाड्रन भी 2030 के दशक के मध्य से अंत तक रिटायरमेंट होने शुरू हो जाएंगे। मिराज-2000 को हाल के सालों में अपग्रेड जरूर किया गया है, लेकिन उनकी उम्र भी धीरे-धीरे पूरी हो रही है।

इस तरह देखें तो 2035 तक जगुआर, मिग-29 और मिराज-2000 मिलाकर लगभग 12 फाइटर स्क्वाड्रन भारतीय वायुसेना से बाहर हो सकते हैं।

यही वजह है कि कई विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत को किसी फिफ्थ जेनरेशन फाइटर की जरूरत है। चीन पहले से जे-20 स्टील्थ फाइटर का संचालन कर रहा है। वहीं पाकिस्तान भी चीनी जे-35 खरीदने की तैयारी कर रहा है। (Su-57 Fighter Jet India)

क्या है रूस का “स्टॉप-गैप” तर्क?

रूस का कहना है कि एएमसीए को पूरी तरह सेवा में आने में अभी लगभग 8 से 10 साल लग सकते हैं। इस बीच क्षेत्रीय सुरक्षा माहौल तेजी से बदल रहा है। भारत के पास फिलहाल कोई ऑपरेशनल स्टील्थ फाइटर नहीं है।

तेजस एमके-1ए के 180 विमानों का ऑर्डर दिया जा चुका है। इनका इंडक्शन 2026-27 से शुरू होगा, लेकिन सभी विमान वायुसेना को मिलने में 2030 के दशक के मध्य तक का समय लग सकता है। इसके बाद तेजस एमके-2 कार्यक्रम है। लगभग 120 विमानों की योजना पर काम चल रहा है, लेकिन इसका बड़े पैमाने पर उत्पादन 2030 के दशक के मध्य में शुरू होने की उम्मीद है।

भारत 114 नए लड़ाकू विमानों की की डिलीवरी भी कई वर्षों में चरणबद्ध तरीके से होगी और इसका बड़ा हिस्सा “मेक इन इंडिया” मॉडल के तहत तैयार किया जाएगा।

जबकि एएमसीए अभी डेवलपमेंट फेज में है। इसकी पहली उड़ान लगभग 2029 के आसपास होने की उम्मीद है, जबकि पहली स्क्वाड्रन 2034-35 से पहले ऑपरेशनल नहीं हो पाएगी।

यही वजह है कि 2030 से 2035 के बीच भी स्क्वाड्रन संख्या में एक बड़ा अंतर बना रह सकता है।

रूस का तर्क है कि यदि भारत अभी 36 से 40 सु-57 स्टील्थ फाइटर खरीदता है, तो लगभग दो स्क्वाड्रन 2028 से 2032 के बीच सर्विस में आ सकती हैं। इससे वायुसेना को अस्थायी राहत मिलेगी और एएमसीए के आने तक स्टील्थ क्षमता भी मिल जाएगी। (Su-57 Fighter Jet India)

भारत क्यों नहीं दिखा रहा उत्साह?

भारत का सबसे बड़ा फोकस इस समय तेजस एमके-1ए, तेजस एमके-2 और सबसे महत्वपूर्ण एएमसीए (एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट) स्वदेशी लड़ाकू विमान कार्यक्रमों पर है। जुलाई 2026 में रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने भी संकेत दिया था कि नई सुखोई-57 खरीदने की फिलहाल कोई योजना नहीं है और मौजूदा सु-30एमकेआई के अपग्रेड का काम जारी रहेगा और देश स्वदेशी कार्यक्रमों पर ध्यान केंद्रित करेगा। खुद वायुसेना के टॉप सूत्रों ने भी रक्षा समाचार को पुष्टि की थी कि वायुसेना की सु-57 में कोई दिलचस्पी नहीं है।

वहीं, अमेरिका का CAATSA (Countering America’s Adversaries Through Sanctions Act) कानून रूस से बड़े रक्षा सौदों पर प्रतिबंध लगाने की अनुमति देता है। भारत को एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम खरीदने पर अभी तक छूट मिली हुई है। लेकिन किसी नए बड़े सौदे की स्थिति में ट्रंप की प्रतिक्रिया क्या होगी, यह सवाल हमेशा बना रहता है। क्योंकि 2026 में सीनेट में रूस से सैन्य उपकरण खरीदने वाले देशों पर 100 फीसदी कड़े टैरिफ लगाने वाले विधेयक भी पास हुआ।

इसके अलावा फरवरी 2026 में भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते को लेकर एक प्रारंभिक स्ट्रक्चर पर सहमति बनी थी। उस समय अमेरिका ने भारत पर लगाए जाने वाले पारस्परिक टैरिफ को 18 प्रतिशत तक कम करने का संकेत दिया था। हालांकि कई दौर की बातचीत के बावजूद यह समझौता अभी तक अंतिम रूप नहीं ले सका है।

भारत की कोशिश है कि उसे अन्य देशों के मुकाबले अधिक अनुकूल और बेहतर व्यापारिक शर्तें मिलें। वहीं अमेरिका की ओर से कुछ कानूनी और नीतिगत प्रक्रियाओं, अतिरिक्त जांच-पड़ताल तथा कृषि क्षेत्र जैसे संवेदनशील मुद्दों पर मतभेद के कारण बातचीत अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ पाई। इसी वजह से अभी तक यह व्यापार समझौता लंबित है। क्योंकि भारत के बड़े रूसी रक्षा सौदे के चलते अमेरिका के साथ उसके आर्थिक और रणनीतिक संबंध मुश्किल हो सकते हैं।

हालांकि रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भी सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं कि बाहरी प्रतिबंधों या दबावों के जरिए देशों के रणनीतिक फैसलों को प्रभावित करना आसान नहीं है। (Su-57 Fighter Jet India)

किन देशों के पास है सु-57?

रूस के पास इस समय लगभग 40 से 44 सु-57 पांचवीं पीढ़ी के स्टील्थ फाइटर विमान हैं। रूसी एयरोस्पेस फोर्सेज इसका सबसे बड़ा ऑपरेटर है। रूस ने कुल 76 प्रोडक्शन सु-57 विमानों का ऑर्डर दिया है, जिनकी डिलीवरी 2028 तक पूरी करने की योजना है।

विदेशी ग्राहकों में अल्जीरिया पहला और फिलहाल एकमात्र पुष्टि किया गया खरीदार है। नवंबर 2025 में उसे पहले दो सु-57ई विमान मिले और 2026 की शुरुआत में ये विमान अल्जीरिया में उड़ान भरते दिखाई दिए। अल्जीरिया का शुरुआती ऑर्डर 12 से 14 विमानों का है।

रूसी कंपनियों का दावा है कि कई अन्य देशों ने भी सु-57ई के लिए कॉन्ट्रैक्ट किए हैं, लेकिन उनके नाम सार्वजनिक नहीं किए गए हैं। कजाकिस्तान, ईरान और उत्तर कोरिया को संभावित ग्राहकों के रूप में देखा जा रहा है, हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। (Su-57 Fighter Jet India)

भारतीय सेना बना रही है खास CEMA प्लाटून! निशाने पर होंगे दुश्मन के ड्रोन, रडार और नेटवर्क

Indian Army CEMA Platoons
Indian Army Raises CEMA Platoons to Integrate Cyber and Electronic Warfare Capabilities. (AI Generated Image)

Indian Army CEMA Platoons: दुश्मन के कम्युनिकेशन नेटवर्क को जाम करना, ड्रोन को निष्क्रिय करना, रडार सिस्टम को ब्लाइंड करना और कंप्यूटर नेटवर्क पर साइबर अटैक करना मॉडर्न वॉरफेयर का अहम हिस्सा हैं। दुनिया की प्रमुख सेनाएं अब साइबर वॉरफेयर और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर को एक साथ जोड़कर नई युद्ध रणनीतियां तैयार कर रही हैं।

वहीं, भारतीय सेना भी इसी दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए साइबर इलेक्ट्रोमैग्नेटिक एक्टिविटीज (सीईएमए) प्लाटून बनाने की तैयारी कर रही है, जिससे भविष्य के मल्टी-डोमेन बैटलफील्ड में डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक दोनों मोर्चों पर एक साथ कार्रवाई की जा सके।

हालांकि सेना में साइबर और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर से जुड़ी विशेष यूनिट्स पहले ही ऑपरेशनल की जा चुकी हैं। लेकिन अब इन क्षमताओं को ब्रिगेड और कमांड स्तर पर और अधिक मजबूत बनाया जा रहा है, ताकि भविष्य के मल्टी-डोमेन युद्ध में भारत को बढ़त मिल सके।

Indian Army CEMA Platoons: क्या है CEMA और क्यों है जरूरी?

सीईएमए का मतलब है साइबर ऑपरेशंस और इलेक्ट्रोमैग्नेटिक स्पेक्ट्रम ऑपरेशंस को एक साथ जोड़ना। इलेक्ट्रोमैग्नेटिक स्पेक्ट्रम में रेडियो, रडार, सैटेलाइट कम्युनिकेशन, ड्रोन कंट्रोल लिंक और मिलिट्री डेटा नेटवर्क शामिल होते हैं।

अगर किसी सेना के पास मजबूत सीईएमए क्षमता है तो वह दुश्मन की कम्युनिकेशन लाइन बाधित कर सकती है, उसके ड्रोन को जाम कर सकती है, रडार को ब्लाइंड कर सकती है और साथ ही साइबर माध्यम से नेटवर्क में घुसपैठ भी कर सकती है।

अमेरिका, ब्रिटेन और नीदरलैंड जैसी सेनाएं कई सालों से सीईएमए प्लाटून जैसी युनिट्स टैक्टिकल स्तर पर काम कर रही हैं, जहां साइबर और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर टीमें मिलकर ऑपरेशन को सपोर्ट करती हैं। भारतीय सेना भी अब इसी दिशा में अपनी क्षमताओं का विस्तार कर रही है और मुख्य रूप से ब्रिगेड, कोर और कमांड स्तर पर तथा विशेष साइबर और ईडब्ल्यू यूनिट्स के माध्यम से विकसित की जा रही हैं।

एमसीटीई में हुई थी खास सेमिनार

अप्रैल 2026 में मध्य प्रदेश के महू स्थित मिलिट्री कॉलेज ऑफ टेलीकम्युनिकेशन इंजीनियरिंग (एमसीटीई) में काउंटर-यूएएस और सीईएमए (साइबर एंड इलेक्ट्रोमैग्नेटिक एक्टिविटीज) पर एक महत्वपूर्ण सेमिनार आयोजित की गई थी।

इस दौरान आधुनिक युद्धक्षेत्र में साइबर और इलेक्ट्रोमैग्नेटिक डोमिनेंस की बढ़ती भूमिका पर विस्तार से चर्चा हुई। सेमिनार में ड्रोन खतरों से निपटने, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर क्षमताओं को मजबूत करने, संचार नेटवर्क की सुरक्षा और साइबर स्पेस में सैन्य बढ़त हासिल करने जैसे विषयों पर विचार-विमर्श किया गया। विशेषज्ञों ने इस बात पर जोर दिया कि भविष्य के युद्धों में केवल पारंपरिक हथियार ही नहीं, बल्कि साइबर और इलेक्ट्रोमैग्नेटिक स्पेक्ट्रम पर नियंत्रण भी जीत और हार तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

सेना ने बताई हाइब्रिड वॉरफेयर की तैयारियां

मार्च 2026 में संसद की रक्षा संबंधी स्थायी समिति के सामने भारतीय सेना ने अपनी तैयारियों के बारे में बताया था। सेना ने बताया था कि आधुनिक हाइब्रिड वॉरफेयर में केवल पारंपरिक सैन्य कार्रवाई ही काफी नहीं होती, बल्कि साइबर, इलेक्ट्रॉनिक, सूचना और स्पेस बेस्ड एक्टिविटीज भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

सेना के अनुसार सभी सक्रिय सीमाओं पर उच्च स्तर की ऑपरेशनल तैयारी बनाए रखी गई है। इसके लिए नियमित ट्रेनिंग, रियलिस्टक फील्ड एक्सरसाइज, इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट और नई तकनीकों को शामिल किया गया है। (Indian Army CEMA Platoons)

साइबर और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर यूनिट्स हुईं ऑपरेशनल

भारतीय सेना ने पहली बार आधिकारिक रूप से पुष्टि करते हुए मार्च 2026 में संसदीय समिति को बताया कि डेडिकेटेड साइबर डिफेंस और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर यूनिट्स को ऑपरेशनल किया जा चुका है। इन यूनिट्स का मुख्य काम मिलिट्री नेटवर्क की सुरक्षा, साइबर हमलों से बचाव, इलेक्ट्रॉनिक निगरानी और स्पेक्ट्रम मैनेजमेंट है।

सिक्योर कम्युनिकेशन नेटवर्क भी डेवलप किए गए हैं ताकि युद्ध के दौरान दुश्मन की साइबर या इलेक्ट्रॉनिक कार्रवाई से कमांड और कंट्रोल सिस्टम प्रभावित न हो।

सेना आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डेटा एनालिटिक्स और स्वदेशी तकनीकों का भी इस्तेमाल कर रही है ताकि युद्धक्षेत्र की स्थिति का तेजी से विश्लेषण किया जा सके और कमांडरों को बेहतर निर्णय लेने में सहायता मिल सके। (Indian Army CEMA Platoons)

चीन और पाकिस्तान सीमा पर बनेंगी खास ब्रिगेड्स

जून 2026 में भारतीय सेना ने एक बड़ा फैसला लेते हुए पाकिस्तान और चीन से लगी सीमाओं पर डेडिकेटेड इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर ब्रिगेड्स स्थापित करने की प्रक्रिया शुरू कर चुकी है। इन ब्रिगेड्स का काम दुश्मन की रेडियो कम्युनिकेशन, रडार नेटवर्क, ड्रोन लिंक और अन्य इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम की निगरानी करना है। ये रुद्र ब्रिगेड्स का हिस्सा हैं।

जरूरत पड़ने पर ये ये ब्रिगेड्स दुश्मन की कम्युनिकेशन, रडार नेटवर्क और यूएवी को इंटरसेप्ट, ट्रैक और जाम करेंगी। अब तक ऐसे कामों की जिम्मेदारी भारतीय सेना की सिग्नल्स यूनिट्स संभालती रही हैं। लेकिन नए सिस्टम में इन्हें एक डेडिकेटेड ऑफेंसिव इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर फोर्स के रूप में तैयार किया जा रहा है।

कमांड स्तर पर बने साइबर ऑपरेशन विंग

भारतीय सेना ने विभिन्न कमांड मुख्यालयों में कमांड साइबर ऑपरेशन्स एंड सपोर्ट विंग्स (CCOSW) भी बनाए गए हैं। ये विंग साइबर सर्विलांस, नेटवर्क सुरक्षा और डिजिटल खतरों की निगरानी करते हैं।

इसके साथ ही इंफॉर्मेशन वॉरफेयर ऑर्गनाइजेशन का भी विस्तार किया जा रहा है। इसका उद्देश्य डिजिटल स्पेस में गलत सूचना, साइबर खतरों और सूचना आधारित अभियानों का मुकाबला करना है। (Indian Army CEMA Platoons)

ऑपरेशन सिंदूर के बाद बढ़ा फोकस

बता दें कि 2025 में हुए ऑपरेशन सिंदूर और दुनिया के कई देशों में चल रहे विभिन्न संघर्षों से मिले अनुभवों से भारतीय सेना ने यह सीख ली है कि भविष्य के युद्ध में ड्रोन, साइबर हमले और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।

इसी वजह से सेना अब जमीन, हवा, साइबर, सूचना और अंतरिक्ष सभी क्षेत्रों को जोड़कर मल्टी-डोमेन ऑपरेशन्स पर जोर दे रही है।

उद्देश्य केवल दुश्मन को शारीरिक नुकसान पहुंचाना नहीं, बल्कि उसकी कमांड क्षमता और निर्णय प्रक्रिया को भी प्रभावित करना है। (Indian Army CEMA Platoons)

धाराशक्ति सिस्टम पर 5,150 करोड़ रुपये का निवेश

अक्टूबर 2025 में रक्षा अधिग्रहण परिषद (डीएसी) ने स्वदेशी धाराशक्ति इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम के अपग्रेडेशन के लिए 5,150 करोड़ रुपये की मंजूरी दी थी। डीआरडीओ के बनाए इस सिस्टम में यह सिस्टम के निर्माण में भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड तथा एलएंडटी जैसी कंपनियां शामिल हैं।

सितंबर 2025 में हुए जॉइंट आर्मी-एयरफोर्स एक्सरसाइज के दौरान धाराशक्ति सिस्टम ने लगभग 150 किलोमीटर दूरी तक दुश्मन के यूएवी खतरों का पता लगाने और उन्हें निष्क्रिय करने की क्षमता का प्रदर्शन किया था।
साथ ही यह सिस्टम रियल-टाइम थ्रेट एनालिसिस भी उपलब्ध कराता है, जिससे कमांडरों को तुरंत फैसले लेने में मदद मिलती है। (Indian Army CEMA Platoons)

मोबाइल EW सिस्टम भी सेना में शामिल

भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड के साथ 1,476 करोड़ रुपये का कॉन्ट्रैक्ट भी किया गया है। इस समझौते के तहत सेना को पांच एडवांस्ड मोबाइल ग्राउंड-बेस्ड इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम मिलेंगे।

इनका इस्तेमाल फ्रंटलाइन और ऊंचाई वाले इलाकों में किया जाएगा, जहां दुश्मन की कम्युनिकेशन और ड्रोन गतिविधियों पर निगरानी रखना महत्वपूर्ण होता है।

इसके अलावा सेना पहले से ही सम्युक्त और हिमशक्ति जैसे स्वदेशी इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम का इस्तेमाल कर रही है।

काउंटर-ड्रोन ग्रिड पर भी फोकस

दुनिया भर में ड्रोन के बढ़ते इस्तेमाल को देखते हुए भारतीय सेना ने इंटीग्रेटेड काउंटर-ड्रोन ग्रिड्स और इलेक्ट्रॉनिक काउंटर-मेजर सिस्टम की तैनाती भी बढ़ाई है। इन सिस्टम्स की मदद से संदिग्ध ड्रोन की पहचान, ट्रैकिंग और इलेक्ट्रॉनिक तरीके से उन्हें निष्क्रिय किया जा सकता है। साथ ही, सेना स्वदेशी उद्योग और डिफेंस रिसर्च आर्गेनाइजेशंस के साथ मिलकर नई तकनीकों के विकास पर भी काम कर रही है। (Indian Army CEMA Platoons)

नई फॉरमेशंस में भी शामिल हो रही CEMA क्षमता

2025 में सेना ने बड़े स्तर पर बदलाव किए थे। जिसमें रुद्र ब्रिगेड, भैरव बटालियन, अश्नि ड्रोन प्लाटून और शक्तिमान रेजिमेंट जैसी नई फॉरमेशंस बनाई गईं थीं।

रुद्र ब्रिगेड में इन्फैंट्री, आर्मर्ड, आर्टिलरी, इंजीनियर्स, सिग्नल्स, एयर डिफेंस, ड्रोन और लॉजिस्टिक्स को इंटीग्रेट किया किया गया है।

साथ ही इन नई फॉरमेशंस में साइबर और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर क्षमताओं को भी शामिल किया जा रहा है ताकि बैटलफील्ड में रियल-टाइम इनफॉरमेशन, ड्रोन ऑपरेशन और इलेक्ट्रॉनिक डोमिनेंस हासिल किया जा सके। (Indian Army CEMA Platoons)

मल्टी-डोमेन युद्ध की ओर बढ़ रही सेना

भारतीय सेना, भारतीय वायुसेना और भारतीय नौसेना अब जॉइंट ऑपरेशन पर विशेष ध्यान दे रही हैं। सभी तीनों सेनाएं जॉइंट ऑपरेशनल प्लानिंग, टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट, इंटेलिजेंस रिसोर्सेज के बेहतर इस्तेमाल और जॉइंट मिलिट्री डॉक्टराइंस पर काम कर रही हैं।

आकाशतीर कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम को भारतीय वायुसेना के इंटीग्रेटेड एयर कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम से जोड़कर बैटलफील्ड की इंटीग्रेटेड पिक्चर तैयार की जा रही है।

इसी व्यापक बदलाव के बीच साइबर और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर को जोड़ने वाली सीईएमए क्षमता भारतीय सेना की नई युद्ध तैयारी का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है, जहां फोकस केवल दुश्मन से लड़ना नहीं बल्कि उसके पूरे डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक इकोसिस्टम को चुनौती देना है। (Indian Army CEMA Platoons)

2030 तक 90 देशों में पहुंचेगा भारत का डिफेंस नेटवर्क, रक्षा निर्यात बढ़ाने का बड़ा प्लान तैयार

India Defence Diplomacy
India Plans 90 Defence Wings by 2030, Expands Global Military Diplomacy and Defence Export Network.

India Defence Diplomacy: भारत अब अपनी डिफेंस डिप्लोमेसी को नए स्तर पर ले जाने की तैयारी कर रहा है। रक्षा मंत्रालय ने 2030 तक दुनिया भर में 85 से 90 डिफेंस विंग स्थापित करने की योजना बनाई है। अभी भारत के पास विदेशों में करीब 54 डिफेंस विंग हैं, जबकि 2024 में मंजूर किए गए 10 नए विंग जुड़ने के बाद यह संख्या 62 तक पहुंच जाएगी।

बता दें कि डिफेंस विंग बनाने के पीछे असली वजह भारत के बढ़ते रक्षा निर्यात को बढ़ाने, सामरिक साझेदारी, समुद्री सुरक्षा और वैश्विक प्रभाव को माना रहा है। हाल ही में 3 सितंबर को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने ‘रक्षा’ (RAKSHA) फ्रेमवर्क जारी किया था, जिसे अगले 10 सालों के लिए भारत की रक्षा कूटनीति का रोडमैप माना जा रहा है।

India Defence Diplomacy: ‘रक्षा’ फ्रेमवर्क है दूर की सोच?

रक्षा मंत्रालय का यह दस्तावेज पूरी तरह सार्वजनिक नहीं किया गया है। यह मुख्य रूप से भारतीय दूतावासों में तैनात डिफेंस अताशे (डीए), सेना, नौसेना और वायुसेना के अधिकारियों को दिशा देने के लिए तैयार किया गया आंतरिक रोडमैप है।

इस फ्रेमवर्क के चार प्रमुख स्तंभ हैं। इनमें सामरिक साझेदारी, क्षमता निर्माण, स्वदेशी रक्षा निर्यात को बढ़ावा देना और हिंद महासागर क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा को मजबूत करना शामिल है।

पहले डिफेंस डिप्लोमेसी का मतलब मुख्य रूप से सैन्य अभ्यास, उच्च स्तरीय दौरे और औपचारिक कार्यक्रम होते थे। लेकिन अब इसे सीधे रक्षा उद्योग, हथियार निर्यात और रणनीतिक सहयोग से जोड़ा जा रहा है।

डिफेंस अताशे की भूमिका में बड़ा बदलाव

भारतीय दूतावासों में तैनात डिफेंस अताशे सेना, नौसेना और वायुसेना के अधिकारी होते हैं। पहले उनकी भूमिका मुख्य रूप से उन देशों के साथ मिलिट्री कॉर्डिनेशन बनाए रखने की होती थी, जहां से भारत हथियार और सैन्य उपकरण खरीदता था।

लेकिन अब सरकार ने उनकी प्राथमिकता बदल दी है। पूर्व चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान ने संसदीय समिति को बताया था कि कई ऐसे देशों से डिफेंस अताशे हटाए या कम किए जा रहे हैं, जहां भारत पहले से हथियार खरीदता रहा है। इसके बदले उन्हें उन देशों में भेजा जा रहा है जहां भारतीय हथियारों और सैन्य प्रणालियों के लिए बाजार मौजूद है।

इसी रणनीति के तहत इथियोपिया, आइवरी कोस्ट, मोजाम्बिक, जिबूती, तंजानिया, पोलैंड, आर्मेनिया और फिलीपींस जैसे देशों में भारतीय डिफेंस अताशे की नियुक्तियां की जा रही हैं।

आर्मेनिया इसका बड़ा उदाहरण है। भारत ने हाल के सालों में वहां पिनाका मल्टी बैरल रॉकेट लॉन्चर, आकाश एयर डिफेंस सिस्टम और गोला-बारूद की सप्लाई की है। इसी वजह से वहां पहली बार भारतीय डिफेंस अताशे की नियुक्ति की गई। (India Defence Diplomacy)

2030 तक 157 देशों तक पहुंच बनाने की योजना

हर देश में अलग डिफेंस विंग खोलना आसान नहीं है। इसके लिए अधिकारियों, कार्यालयों, आवास, सुरक्षा और स्थानीय स्टाफ की जरूरत होती है। इसलिए रक्षा मंत्रालय ने एक अलग मॉडल अपनाया है। भारत का लक्ष्य वर्ष 2030 तक अपने डिफेंस विंग की संख्या बढ़ाकर लगभग 85 से 90 तक पहुंचाना है।

करीब 50 मौजूदा डिफेंस विंग को पड़ोसी देशों की अतिरिक्त जिम्मेदारी दी जा रही है। इसे एक्रीडिटेशन मॉडल कहा जाता है। इसके तहत एक ही डिफेंस अताशे कई देशों को कवर करेगा।

यही वजह है कि 62 डिफेंस विंग होने के बावजूद भारत की पहुंच 157 देशों तक बढ़ाने की योजना बनाई गई है।

12 देशों में प्राथमिकता से खुलेगी नई व्यवस्था

रक्षा मंत्रालय की प्राथमिकताओं में ऐसे 12 देश शामिल हैं जहां पहले से उनके डिफेंस अताशे नई दिल्ली में मौजूद हैं, लेकिन भारत ने अभी तक वहां अपना डिफेंस विंग नहीं खोला है। बता दें कि दिल्ली में करीब 160 से ज्यादा विदेशी मिशन हैं।

इसे “रेसिप्रोकल गैप” कहा जा रहा है। बेल्जियम इसका हालिया उदाहरण है। बेल्जियम ने भारत में अपना डिफेंस प्रतिनिधि तैनात किया हुआ है और अब भारत भी ब्रुसेल्स में अपनी सैन्य उपस्थिति मजबूत करने की तैयारी कर रहा है। (India Defence Diplomacy)

400 करोड़ रुपये का डिफेंस डिप्लोमेसी फंड

भारत ने रक्षा कूटनीति को मजबूत करने के लिए वित्त वर्ष 2025-26 में 400 करोड़ रुपये का विशेष फंड आवंटित किया है। यह रकम पिछले वित्त वर्ष की तुलना में 100 करोड़ रुपये अधिक है।

यह फंड पहली बार 2021-22 में 110 करोड़ के साथ शुरू किया गया था। इसके बाद 2023 में इसे 150 करोड़ किया गया। 2025 में यह बढ़कर 300 करोड़ और अब 400 करोड़ तक पहुंच गया है।

यह पैसा किसी नए हथियार खरीदने के लिए नहीं बल्कि रणनीतिक सहयोग बढ़ाने के लिए इस्तेमाल होता है। (India Defence Diplomacy)

कहां इस्तेमाल होता है यह फंड

यह फंड भारतीय सेना, नौसेना, वायुसेना और अब भारतीय तटरक्षक बल के राजस्व बजट का हिस्सा है। इसका इस्तेमाल मित्र देशों को सैन्य उपकरण, प्रशिक्षण और मदद देने में किया जाता है। अफ्रीका और हिंद महासागर क्षेत्र में भारत कई देशों को गश्ती नौकाएं, राइफल, रडार सिस्टम, वाहन और प्रशिक्षण सुविधाएं उपलब्ध करा चुका है।

केन्या को इंसास राइफलें, गोला-बारूद और एमआरआई मशीन दी गई। मोजाम्बिक को हाई-स्पीड इंटरसेप्टर बोट और ट्रेनिंग सिम्युलेटर मिले है। सेशेल्स को पेट्रोलिंग बोट, डोर्नियर विमान और कोस्टल रडार नेटवर्क दिया गया। जबकि युगांडा को वाहन, मोटरसाइकिल और प्रशिक्षण सुविधाएं उपलब्ध कराई गईं। (India Defence Diplomacy)

रक्षा निर्यात बढ़ाने पर फोकस

भारत ने 2030 तक 50,000 करोड़ रुपये का रक्षा निर्यात लक्ष्य तय किया है। वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का रक्षा निर्यात 38,424 करोड़ तक पहुंच गया, जो पिछले साल की तुलना में लगभग 63 फीसदी अधिक था।

दिलचस्प बात यह है कि अमेरिका भारत का सबसे बड़ा ग्राहक बन गया है। हालांकि यहां भारत पूरे हथियार सप्लाई करता है, बल्कि एयरक्राफ्ट स्ट्रक्चर, फ्यूजलेज, विंग और अन्य को-असेंबली का निर्यात करता है।

दूसरी ओर फिलीपींस को ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल, आर्मेनिया को पिनाका और आकाश सिस्टम, जबकि कई अफ्रीकी देशों को गश्ती नौकाएं और छोटे हथियार निर्यात किए जा रहे हैं। (India Defence Diplomacy)

डिफेंस क्रेडिट लाइन की डिप्लोमेसी

भारत केवल हथियार ही नहीं बेच रहा, बल्कि कई देशों को रियायती रक्षा ऋण भी उपलब्ध करा रहा है। भारत मैत्री शक्ति योजना और डिफेंस लाइन ऑफ क्रेडिट के तहत मित्र देशों को कम ब्याज दर पर लंबी अवधि के लिए वित्तीय मदद दी जाती है।

वियतनाम को समुद्री सुरक्षा कार्यक्रमों के लिए विशेष सहायता दी गई। मॉरीशस, मालदीव, श्रीलंका और बांग्लादेश को समुद्री निगरानी, हेलीकॉप्टर और सिक्योरिटी इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी मदद मिली।

अफ्रीकी देशों में भी डिफेंस सेक्टर से जुड़ी कई क्रेडिट लाइनें ऑपरेट की जा रही हैं। (India Defence Diplomacy)

चीन की बढ़ती मौजूदगी के बीच अपनाई नई रणनीति

रक्षा मंत्रालय की रणनीतिक योजना में यह भी स्पष्ट किया गया है कि भारत वैश्विक स्तर पर अपनी समुद्री और रक्षा उपस्थिति बढ़ाना चाहता है। विशेष रूप से अफ्रीका, प्रशांत द्वीप समूह, लैटिन अमेरिका और हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की सक्रियता बढ़ रही है।

चीन से तुलना करें तो भारत का डिफेंस अताशे नेटवर्क अभी भी अपेक्षाकृत छोटा माना जाता है। ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन (ओआरएफ) समेत कई आकलनों के अनुसार, चीन के डिफेंस अताशे और सैन्य प्रतिनिधि करीब 110 देशों में तैनात हैं, जबकि भारत के पास वर्तमान में लगभग 54 से 62 डिफेंस विंग और अताशे नेटवर्क मौजूद है।

जहां चीन पर कई देशों को कर्ज के जाल में फंसाने के आरोप लगते रहे हैं, वहीं भारत अपने मॉडल को “कैपेसिटी बिल्डिंग” यानी क्षमता निर्माण आधारित साझेदारी बताता है। इसके तहत मित्र देशों की सेनाओं को प्रशिक्षण, रक्षा उपकरणों का सहयोग, सैन्य शिक्षा, संयुक्त अभ्यास और संस्थागत क्षमता विकसित करने पर अधिक जोर दिया जाता है। (India Defence Diplomacy)

चीन की सेना में बड़ा भूचाल! शी जिनपिंग के ‘आंख और कान’ माने जाने वाले सबसे करीबी जनरल पर गिरी गाज

Zhong Shaojun PLA Purge
Xi Jinping’s Trusted Military Aide Zhong Shaojun Removed as PLA Purge Expands Across Top Ranks.

Zhong Shaojun PLA Purge: चीन की सेना पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) में चल रही बड़े स्तर पर कार्रवाई लगातार जारी है।28 अगस्त को चीन की नेशनल पीपुल्स कांग्रेस (एनपीसी) की स्थायी समिति ने कई वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों को उनके पदों से हटाने की घोषणा की। इनमें चीन के सबसे वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों में शामिल झांग यूक्सिया, लियू जेनली, जू कियानशेंग शामिल थे। लेकिन अब एक ऐसा चौंकाने वाला नाम सामने आया है, जिसने चीन की राजनीति और सेना पर नजर रखने वालों को भी चौंका दिया है। यह नाम है लेफ्टिनेंट जनरल झोंग शाओजुन का। झोंग शाओजुन को सालों तक राष्ट्रपति शी जिनपिंग का सबसे करीबी सहयोगी, निजी सचिव और सेना के भीतर उनका सबसे भरोसेमंद व्यक्ति माना जाता रहा।

वहीं, पूर्व वेस्टर्न थिएटर कमांडर झाओ जोंगकी को भी चीनी पीपुल्स पॉलिटिकल कंसल्टेटिव कॉन्फ्रेंस (सीपीपीसीसी) से बाहर कर दिया गया। झाओ जोंगकी वही सैन्य कमांडर थे जो 2017 के डोकलाम संकट और 2020 के गलवान संघर्ष के दौरान पश्चिमी थिएटर कमांड की कमान संभाल रहे थे।

Zhong Shaojun PLA Purge: अब तक 57 जनरल जांच के दायरे में

28 अगस्त को चीन की नेशनल पीपुल्स कांग्रेस (एनपीसी) की स्थायी समिति ने झोंग शाओजुन समेत चार वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों की प्रतिनिधि सदस्यता समाप्त करने की घोषणा की। यह कार्रवाई ऐसे समय हुई है जब चीन की सेना में पिछले तीन वर्षों के दौरान अभूतपूर्व स्तर पर वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ जांच और कार्रवाई देखने को मिली है। रिपोर्टों के अनुसार, 2023 से अब तक 57 जनरल या तो जांच के दायरे में आए हैं, पदों से हटाए गए हैं या सार्वजनिक जीवन से गायब हो चुके हैं।

कौन हैं झोंग शाओजुन?

झोंग शाओजुन का जन्म 19 अक्टूबर 1968 को चीन के झेजियांग प्रांत के काइहुआ काउंटी में हुआ था। उन्होंने 1990 में हांगझोउ विश्वविद्यालय से कंप्यूटर एप्लिकेशन विषय में स्नातक की डिग्री हासिल की। बाद में झेजियांग विश्वविद्यालय से एप्लाइड साइकोलॉजी में मास्टर्स किया और आगे चलकर सिंघुआ विश्वविद्यालय में डॉक्टरेट अध्ययन से भी जुड़े।

दिलचस्प बात यह है कि झोंग शाओजुन का शुरुआती करियर सेना में नहीं बल्कि चीन की पार्टी और प्रशासनिक व्यवस्था में रहा। वे झेजियांग प्रांतीय पार्टी समिति के संगठन विभाग में काम करते थे। इसी दौरान उनका संपर्क उस समय के झेजियांग पार्टी सचिव शी जिनपिंग से हुआ। (Zhong Shaojun PLA Purge)

2002 में शुरू हुआ शी जिनपिंग के साथ सफर

वर्ष 2002 में शी जिनपिंग को फुजियान से झेजियांग प्रांत का पार्टी सचिव बनाकर भेजा गया था। बताया जाता है कि उसी दौरान झोंग शाओजुन उनके करीबी सहयोगियों में शामिल हुए।

अगले पांच सालों में दोनों के बीच राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर मजबूत कार्य संबंध बने। जब 2007 में शी जिनपिंग को शंघाई का पार्टी सचिव बनाया गया तो झोंग भी उनके साथ चले गए। इसके बाद जब शी बीजिंग पहुंचे और चीन के शीर्ष नेता बने, तब भी झोंग शाओजुन उनके सबसे करीबी अधिकारियों में शामिल रहे।

करीब 22 सालों तक झोंग शाओजुन को शी जिनपिंग का भरोसेमंद सहयोगी माना जाता रहा।

बिना सैन्य पृष्ठभूमि के पहुंचे पीएलए में

झोंग शाओजुन के करियर का सबसे असाधारण पहलू यह रहा कि वे पारंपरिक सैन्य अधिकारी नहीं थे। इसके बावजूद शी जिनपिंग के सत्ता में आने के बाद उन्हें सीधे केंद्रीय सैन्य आयोग (सीएमसी) के जनरल ऑफिस में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी गई।

2013 में उन्हें केंद्रीय सैन्य आयोग के जनरल ऑफिस का उपनिदेशक बनाया गया। बाद में वे निदेशक बने और तेजी से प्रमोशन पाते हुए लेफ्टिनेंट जनरल के पद तक पहुंच गए।

2016 में उन्हें मेजर जनरल और 2019 में लेफ्टिनेंट जनरल बनाया गया।

केंद्रीय सैन्य आयोग चीन की सेना की सबसे बड़ी मिलिट्री बॉडी है और उसके अध्यक्ष स्वयं शी जिनपिंग हैं। ऐसे में जनरल ऑफिस का प्रमुख होना बेहद प्रभावशाली पद माना जाता है। (Zhong Shaojun PLA Purge)

Zhong Shaojun PLA Purge
Zhong Shaojun, a longtime “informant” of Xi Jinping and a close confidant in the military, has also been removed from his post. (Quote from the website of the National People’s Congress)

सेना में शी जिनपिंग की ‘आंख और कान’

झोंग शाओजुन को पीएलए के भीतर शी जिनपिंग की “आंख और कान” कहा जाता था। माना जाता था कि सेना के वरिष्ठ अधिकारियों, नियुक्तियों, पदोन्नतियों और आंतरिक गतिविधियों की जानकारी सीधे उन्हीं के माध्यम से शी जिनपिंग तक पहुंचती थी।

झोंग शाओजुन का नाम अक्सर एडमिरल मियाओ हुआ के साथ भी जोड़ा जाता रहा। दोनों को सेना में अधिकारियों की नियुक्तियों और पदोन्नतियों पर प्रभाव रखने वाला समूह माना जाता था।

कुछ विश्लेषकों का दावा है कि पिछले वर्षों में जिन अधिकारियों को महत्वपूर्ण सैन्य पद मिले, उनकी सिफारिशों में झोंग शाओजुन की भूमिका रही थी। (Zhong Shaojun PLA Purge)

गलवान में भी अहम भूमिका

झोंग शाओजुन सीधे तौर पर सीमा पर तैनात कमांडर नहीं थे, लेकिन 2020 के पूर्वी लद्दाख और गलवान घाटी संकट के दौरान वे केंद्रीय सैन्य आयोग के जनरल ऑफिस के प्रमुख थे। उस समय चीन की सेना से जुड़े संवेदनशील फैसलों और मिलिट्री कॉर्डिनेशन सिस्टम्स तक उनकी पहुंच थी। यही कारण है कि हाल के घटनाक्रमों के बाद उनका नाम फिर चर्चा में आया है।

इससे पहले 26 अगस्त को सीपीपीसीसी की बैठक में झाओ जोंगकी को 14वीं राष्ट्रीय समिति की स्थायी समिति और जातीय एवं धार्मिक मामलों की समिति के उपाध्यक्ष पद से हटा दिया गया। साथ ही उनकी सदस्यता भी समाप्त कर दी गई।

झाओ जोंगकी चीन की सेना के उन अधिकारियों में रहे हैं जिनका नाम भारत-चीन सीमा से जुड़ी घटनाओं के कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में रहा। वे 2020 के पूर्वी लद्दाख संकट और गलवान घाटी टकराव के समय वेस्टर्न थिएटर कमांड के प्रमुख थे। इससे पहले 2017 के डोकलाम गतिरोध के दौरान भी वही इस क्षेत्र की सैन्य कमान संभाल रहे थे।

हालांकि चीन की ओर से उनकी हटाने की कार्रवाई को गलवान प्रकरण से जोड़ने वाला कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है। (Zhong Shaojun PLA Purge)

अचानक गायब होने के बाद बढ़ी थीं अटकलें

करीब दो साल पहले झोंग शाओजुन कुछ समय के लिए सार्वजनिक गतिविधियों से गायब हो गए थे। बाद में जानकारी सामने आई कि उन्हें नेशनल डिफेंस यूनिवर्सिटी का राजनीतिक आयुक्त बनाया गया था। लेकिन इस पद पर भी उनका कार्यकाल ज्यादा लंबा नहीं रहा। इसके बाद उनके भविष्य को लेकर लगातार अटकलें लगती रहीं।

कुछ रिपोर्टों में दावा किया गया कि सेना के भीतर चल रही जांच का असर उन तक भी पहुंच चुका है। हालांकि उस समय चीन की सरकार ने कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की थी। (Zhong Shaojun PLA Purge)

केंद्रीय सैन्य आयोग में अब कितने सदस्य

केंद्रीय सैन्य आयोग चीन की सेना का सर्वोच्च सैन्य निकाय है। इसके अध्यक्ष स्वयं शी जिनपिंग हैं। हालिया कार्रवाई के बाद आयोग के कई प्रमुख सदस्य बाहर हो चुके हैं। इनमें पूर्व रक्षा मंत्री ली शांगफू, पूर्व उपाध्यक्ष हे वेइडोंग और पूर्व राजनीतिक कार्य विभाग प्रमुख मियाओ हुआ जैसे नाम शामिल हैं।

28 अगस्त को झांग यूक्सिया और लियू जेनली के खिलाफ कार्रवाई की पुष्टि के बाद आयोग के स्ट्रक्चर को लेकर भी चर्चा बढ़ गई। झांग यूक्सिया पीएलए के सबसे वरिष्ठ वर्दीधारी अधिकारी माने जाते थे, जबकि लियू जेनली संयुक्त स्टाफ विभाग के प्रमुख थे। (Zhong Shaojun PLA Purge)

चीन के सरकारी मीडिया की चुप्पी

दिलचस्प बात यह रही कि चीन के प्रमुख सरकारी मीडिया संस्थानों ने झोंग शाओजुन जैसे वरिष्ठ अधिकारी को हटाए जाने की खबर को सीमित कवरेज दी। कुछ रिपोर्टों में उनका नाम तक प्रमुखता से नहीं लिया गया।

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार चीन में जब किसी वरिष्ठ नेता या अधिकारी से जुड़ा मामला संवेदनशील माना जाता है तो सरकारी मीडिया अक्सर नियंत्रित और सीमित जानकारी जारी करता है। (Zhong Shaojun PLA Purge)

रॉकेट फोर्स से शुरू हुआ बड़ा अभियान

पीएलए में मौजूदा कार्रवाई की शुरुआत 2023 में सामने आए रॉकेट फोर्स घोटाले से जुड़ी मानी जाती है। उस समय चीन की रणनीतिक मिसाइल इकाई रॉकेट फोर्स के कई वरिष्ठ अधिकारियों को हटाया गया था।

इसके बाद पूर्व रक्षा मंत्री ली शांगफू भी जांच के दायरे में आए। ली शांगफू पहले केंद्रीय सैन्य आयोग के उपकरण विकास विभाग के प्रमुख रह चुके थे।

रॉकेट फोर्स के अलावा उपकरण विकास विभाग, राजनीतिक कार्य विभाग और विभिन्न थिएटर कमांडों के वरिष्ठ अधिकारियों पर भी कार्रवाई हुई। (Zhong Shaojun PLA Purge)

पाकिस्तानी सेना में बड़े फेरबदल की तैयारी! खुफिया एजेंसी ISI में आएगी नई टीम, ‘डर्टी हैरी’ का भी हुआ ट्रांसफर

Pakistan Army Reshuffle 2026
Pakistan Army Set For Major Leadership Shake-Up As DG ISI Asim Malik, Dirty Harry transfered And Six Other Lieutenant Generals Retire In October 2026.

Pakistan Army Reshuffle 2026: पाकिस्तानी सेना में इस साल अक्टूबर में टॉप लेवल पर बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। सेना के सात सीनियर लेफ्टिनेंट जनरल एक साथ रिटायर होने वाले हैं। इनमें इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (आईएसआई) के डीजी लेफ्टिनेंट जनरल असीम मलिक भी शामिल हैं। इसके अलावा कई कोर कमांडर, एयर डिफेंस कमांडर और नेशनल डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी (एनडीएमए) चीफ भी रिटायर होंगे।

यह बदलाव ऐसे समय हो रहा है जब पाकिस्तान की सेना में हाल के महीनों में कई बड़े बदलाव देखने को मिले हैं। फील्ड मार्शल आसिम मुनीर को चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज के तौर पर व्यापक अधिकार मिल चुके हैं और जुलाई 2026 में नेशनल स्ट्रेटेजिक कमांड के लिए अलग चार-स्टार जनरल की नियुक्ति भी की गई है।

Pakistan Army Reshuffle 2026: डीजी आईएसआई असीम मलिक का नाम सबसे ज्यादा चर्चा में

रिटायर होने वाले अधिकारियों में सबसे प्रमुख नाम लेफ्टिनेंट जनरल असीम मलिक का है। असीम मलिक वर्तमान में आईएसआई के डीजी होने के साथ-साथ पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार यानी एनएसए की जिम्मेदारी भी संभाल रहे हैं।

असीम मलिक ने सितंबर 2024 में आईएसआई प्रमुख का पद संभाला था। अप्रैल 2025 में मलिक को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की अतिरिक्त जिम्मेदारी दी गई। वह 80 पीएमए लॉन्ग कोर्स के अधिकारी हैं और पाकिस्तान मिलिट्री अकादमी में स्वॉर्ड ऑफ ऑनर प्राप्त कर चुके हैं। सेना में वह पहले एडजुटेंट जनरल जैसे महत्वपूर्ण पदों पर भी कार्य कर चुके हैं।

पाकिस्तानी मीडिया में चर्चा है कि सेना से रिटायर होने के बाद भी वह एनएसए का पद शायद ही छोड़ें। इससे पहले अक्टूबर 2025 में मलिक को सेवा विस्तार भी दिया गया था। (Pakistan Army Reshuffle 2026)

एक साथ रिटायर होंगे कई कोर कमांडर

अक्टूबर 2026 में रिटायर होने वाले अधिकारियों में कई महत्वपूर्ण फॉर्मेशन कमांडर शामिल हैं।

इनमें मिलिट्री सेक्रेटरी लेफ्टिनेंट जनरल शाहिद इम्तियाज पहले एक्स कॉर्प्स के कमांडर रह चुके हैं। लेफ्टिनेंट जनरल अहसान गुलरेज के पास मुल्तान स्थित 2 कॉर्प्स की कमान है। लेफ्टिनेंट जनरल नौमान जकारिया मंगला स्थित वन कॉर्प्स और सेंट्रल कमांड के प्रमुख हैं।

इसके अलावा लेफ्टिनेंट जनरल फैयाज हुसैन शाह लाहौर स्थित 4 कॉर्प्स के कमांडर हैं, जबकि लेफ्टिनेंट जनरल जफर इकबाल के पास पाकिस्तान सेना की एयर डिफेंस कमांड की जिम्मेदारी है। एनडीएमए के चेयरमैन लेफ्टिनेंट जनरल इनाम हैदर मलिक भी इसी रिटायरमेंट लिस्ट में शामिल हैं। (Pakistan Army Reshuffle 2026)

किन मेजर जनरलों को मिल सकता है प्रमोशन

रिटायरमेंट के बाद कई मेजर जनरलों को तीन सितारा रैंक यानी लेफ्टिनेंट जनरल बनाने की प्रक्रिया शुरू होगी। रक्षा सूत्रों के अनुसार संभावित उम्मीदवारों में आईएसआई से जुड़े मेजर जनरल कामरान ताबरेज सवेरा (47 बलूच) का नाम प्रमुख माना जा रहा है।

इसके अलावा पाकिस्तान ऑर्डनेंस फैक्ट्री वाह के डीजी प्रोडक्शन जावेद दोस्त चांदियो (63 एफएफ), पाकिस्तान मिलिट्री अकादमी काकुल के कमांडेंट मेजर जनरल इफ्तिखार हसन चौधरी (30 एसपी हैवी रेजिमेंट आर्टिलरी) और डीजी मिलिट्री इंटेलिजेंस मेजर जनरल वाजिद अजीज (39 पंजाब) भी संभावित सूची में बताए जा रहे हैं।

इंजीनियरिंग बैकग्राउंड वाले 45 इंजीनियर डिवीजन के जीओसी मेजर जनरल मुहम्मद इम्तनान बाबर (सैपर्स) और नेशनल डिफेंस यूनिवर्सिटी में चीफ इंस्ट्रक्टर मेजर जनरल मुहम्मद नईम अख्तर (30 एजेके रेजिमेंट) के नाम की भी चर्चा है। (Pakistan Army Reshuffle 2026)

आतिफ बिन अकरम को लेकर अटकलें तेज

पंजाब रेंजर्स के महानिदेशक मेजर जनरल मुहम्मद आतिफ बिन अकरम को लेकर भी काफी चर्चा हो रही है।

आतिफ बिन अकरम के पास नवंबर 2023 से पंजाब रेंजर्स की जिम्मेदरी है। चर्चा है कि अकरम को आईएसआई के काउंटर इंटेलिजेंस विभाग का चीफ बनाया जा सकता है। वहीं, अकरम को भविष्य में आईएसआई प्रमुख की जिम्मेदारी भी दी जा सकती है।

अकरम का नाम पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (पीएमएल-एन) के साथ राजनीतिक रूप से जुड़ा हुआ बताया जाता है। (Pakistan Army Reshuffle 2026)

फैसल नसीर को आईएसआई से हटाकर नाक्टा भेजा

इस बीच 4 सितंबर को जारी नोटिफिकेशन के मुताबिक डर्टी हैरी के नाम से मशहूर आईएसआई के काउंटर इंटेलिजेंस विंग के डीजी (सी) मेजर जनरल फैसल नसीर को हटाकर नेशनल काउंटर टेररिज्म अथॉरिटी (नाक्टा) में कोऑर्डिनेटर नियुक्त किया गया है। फैसल नसीर को बलूचिस्तान और सिंध में काम के कारण “सुपर स्पाई” भी कहा जाता रहा है।

बता दें कि फैसल नसीर को को डर्टी हैरी का उपनाम पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान और पीटीआई समर्थकों ने दिया था। इमरान खान ने सार्वजनिक रैलियों और वीडियो में उन्हें “डर्टी हैरी” कहकर कई बड़े आरोपों से जोड़ा था।

जारी नोटिफिकेशन के मुतबिक, “संघीय सरकार की मंजूरी के बाद मेजर जनरल फैसल नसीर को राष्ट्रीय आतंकवाद निरोधक प्राधिकरण (NACTA) का नेशनल कोऑर्डिनेटर नियुक्त किया गया है। उनकी यह नियुक्ति NACTA एक्ट 2013 की धारा 9(1) के तहत प्रतिनियुक्ति (डेपुटेशन) पर की गई है। वह तीन साल तक इस पद पर कार्य करेंगे। यह नियुक्ति तत्काल प्रभाव से लागू हो गई है।”

नाक्टा पाकिस्तान की प्रमुख आतंकवाद विरोधी संस्था है। मेजर जनरल नसीर की नियुक्ति ऐसे समय में हुई है जब नाक्टा को देश की प्रमुख नागरिक आतंकवाद-रोधी संस्था के रूप में अधिक प्रभावी बनाने की कोशिश की जा रही है। आमतौर पर इसमें सिविल सर्विस या पुलिस अधिकारियों की नियुक्ति होती रही है। ऐसे में सेना के वरिष्ठ अधिकारी की तैनाती को महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

फैसल नसीर का नाम पिछले कई साल से आईएसआई की आंतरिक सुरक्षा और काउंटर इंटेलिजेंस गतिविधियों से जुड़ा रहा है। मिलिट्री इंटेलिजेंस कोर का अफसर होने के बावजूद फैसल को लेफ्टिनेंट जनरल रैंक के लिए प्रमोशन मिलने की उम्मीद अब कम हो गई है। (Pakistan Army Reshuffle 2026)

पाकिस्तान सेना में हाल में हुए बड़े बदलाव

पाकिस्तान के मिलिट्री स्ट्रक्चर में पिछले एक साल में कई अहम बदलाव हुए हैं।

नवंबर 2025 में पारित 27वें संवैधानिक संशोधन के बाद चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज का नया पद बनाया गया। पहली नियुक्ति इस पर फील्ड मार्शल आसिम मुनीर की हुईष इसके बाद अगस्त 2026 में डिफेंस फोर्सेज एक्ट के तहत उन्हें वरिष्ठ अधिकारियों की नियुक्ति, सेवा विस्तार और रिटायरमेंट से जुड़े बड़े अधिकार भी मिले।

जुलाई 2026 में लेफ्टिनेंट जनरल सैयद आमिर रजा को फोर स्टार जनरल बनाकर नेशनल स्ट्रेटेजिक कमांड का पहला कमांडर नियुक्त किया गया। यह पद पाकिस्तान की सामरिक और रणनीतिक सैन्य क्षमताओं से जुड़ा माना जाता है। (Pakistan Army Reshuffle 2026)

Explainer: क्या है संयुक्त राष्ट्र का ‘Correct the Map’ प्रस्ताव? दुनिया के नक्शे पर क्यों छिड़ी बहस, अमेरिका ने क्यों किया विरोध?

UN Correct the Map Resolution
UN ‘Correct the Map’ Resolution Explained: Why the World Map Debate Matters and Why India Supported It.

UN Correct the Map Resolution: दुनिया का नक्शा हम बचपन से देखते आए हैं। स्कूल की किताबों से लेकर एटलस, न्यूज चैनलों और इंटरनेट तक, लगभग हर जगह एक जैसा विश्व मानचित्र दिखाई देता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जो नक्शा हम देखते हैं, वह वास्तव में पृथ्वी के देशों और महाद्वीपों का सही आकार दिखाता भी है या नहीं? इसी सवाल ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में एक बड़ी बहस को जन्म दिया है।

4 सितंबर को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने “करेक्ट द मैप” नाम का एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव 164-1 मतों से पारित किया। इस प्रस्ताव का उद्देश्य दुनिया के नक्शों में दिखाई देने वाली पुरानी विकृतियों को कम करना और देशों व महाद्वीपों का वास्तविक क्षेत्रफल अधिक सटीक तरीके से दिखाना है। भारत ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया, लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि किसी एक विशेष मैप सिस्टम को पूरी दुनिया पर नहीं थोपा जाना चाहिए।

UN Correct the Map Resolution: आखिर नक्शे में समस्या क्या है?

पृथ्वी गोल है, जबकि नक्शा सपाट कागज या स्क्रीन पर बनाया जाता है। यही सबसे बड़ी तकनीकी चुनौती है। किसी गोल सतह को सपाट सतह पर दिखाने के लिए गणितीय तरीकों का उपयोग किया जाता है, जिन्हें “मैप प्रोजेक्शन” कहा जाता है।

समस्या यह है कि कोई भी मैप प्रोजेक्शन एक साथ आकार, दूरी, दिशा और क्षेत्रफल को पूरी तरह सही नहीं रख सकता। किसी न किसी जगह समझौता करना पड़ता है।

पिछले लगभग 450 वर्षों से दुनिया में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला नक्शा “मर्केटर प्रोजेक्शन” रहा है। इसे 1569 में फ्लेमिश भूगोलवेत्ता जेरार्डस मर्केटर ने समुद्री नेविगेशन के लिए तैयार किया था।

उस समय जहाजों को दिशा बताने के लिए यह तरीका बेहद उपयोगी था। लेकिन इसमें एक बड़ी कमी भी थी। ध्रुवों के पास स्थित क्षेत्रों का आकार वास्तविकता से कहीं ज्यादा बड़ा दिखाई देता है, जबकि भूमध्य रेखा के आसपास के देशों का आकार अपेक्षाकृत छोटा दिखता है। (UN Correct the Map Resolution)

ग्रीनलैंड और अफ्रीका का उदाहरण

मर्केटर प्रोजेक्शन की सबसे ज्यादा आलोचना ग्रीनलैंड और अफ्रीका की तुलना को लेकर होती है। नक्शे में ग्रीनलैंड लगभग अफ्रीका जितना बड़ा दिखाई देता है। लेकिन वास्तविकता बिल्कुल अलग है। ग्रीनलैंड का क्षेत्रफल करीब 21.6 लाख वर्ग किलोमीटर है, जबकि अफ्रीका का क्षेत्रफल लगभग 3.03 करोड़ वर्ग किलोमीटर है। यानी अफ्रीका वास्तव में ग्रीनलैंड से करीब 14 गुना बड़ा है।

इसी तरह अलास्का और ब्राजील को देखें, तो नक्शे में दोनों लगभग समान आकार के दिखाई देते हैं। जबकि ब्राजील का क्षेत्रफल अलास्का से लगभग पांच गुना ज्यादा है।

अंटार्कटिका भी मर्केटर नक्शे में बहुत विशाल दिखाई देता है, जबकि वास्तविक क्षेत्रफल की तुलना में उसका दृश्य आकार काफी बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जाता है। (UN Correct the Map Resolution)

क्या कहता है संयुक्त राष्ट्र का “करेक्ट द मैप” प्रस्ताव?

संयुक्त राष्ट्र महासभा का यह प्रस्ताव दुनिया के देशों, शैक्षणिक संस्थानों, अंतरराष्ट्रीय संगठनों और डिजिटल प्लेटफॉर्मों को ऐसे नक्शों के इस्तेमाल के लिए प्रोत्साहित करता है जो देशों और महाद्वीपों का वास्तविक क्षेत्रफल अधिक सटीक तरीके से दिखाएं।

इसका उद्देश्य विशेष रूप से अफ्रीका, एशिया और दक्षिण अमेरिका जैसे क्षेत्रों को उनके वास्तविक भौगोलिक आकार के अनुसार प्रदर्शित करना है।

प्रस्ताव में कहा गया है कि पुराने नक्शों के कारण लोगों की भौगोलिक समझ प्रभावित होती है। कई बार किसी क्षेत्र का वास्तविक आकार और महत्व लोगों को पता ही नहीं चल पाता।

हालांकि यह प्रस्ताव बाध्यकारी नहीं है। इसका मतलब यह नहीं कि दुनिया भर के पुराने नक्शे तुरंत बदल जाएंगे या मर्केटर प्रोजेक्शन पर प्रतिबंध लग जाएगा। (UN Correct the Map Resolution)

इक्वल अर्थ प्रोजेक्शन क्या है?

इस बहस के केंद्र में “इक्वल अर्थ प्रोजेक्शन” नाम का एक आधुनिक मैप सिस्टम भी है। इसे 2018 में डेवलप किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य देशों और महाद्वीपों के वास्तविक क्षेत्रफल को सुरक्षित रखना है।

इस प्रकार के नक्शे में अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका और एशिया का आकार वास्तविकता के ज्यादा करीब दिखाई देता है। ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका जैसे ध्रुवीय क्षेत्रों का आकार भी संतुलित दिखता है।

हालांकि इसके बदले कुछ जगहों पर आकृतियां थोड़ी विकृत हो सकती हैं। यही वजह है कि सभी विशेषज्ञ इसे हर उद्देश्य के लिए सबसे उपयुक्त नहीं मानते। (UN Correct the Map Resolution)

भारत ने क्या कहा?

भारत ने प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया, लेकिन साथ ही अपनी बात भी रखी। संयुक्त राष्ट्र में भारत के प्रतिनिधि रघु पुरी ने कहा कि समान क्षेत्रफल वाले मैप प्रोजेक्शन महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वे महाद्वीपों और देशों के वास्तविक आकार को सही तरीके से दिखाते हैं।

उन्होंने कहा कि ऐसे नक्शे उन विकृतियों को कम कर सकते हैं जो केवल दिशा, दूरी या आकार को सुरक्षित रखने वाले पुराने प्रोजेक्शनों में दिखाई देती हैं।

लेकिन भारत ने यह भी कहा कि किसी एक विशेष मैप मॉडल को अनिवार्य नहीं बनाया जाना चाहिए। देशों, विश्वविद्यालयों, वैज्ञानिक संस्थानों और कार्टोग्राफरों को अपनी जरूरत के अनुसार उपयुक्त प्रोजेक्शन चुनने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए।

भारत ने इसे “तकनीकी और पद्धतिगत तटस्थता” का सिद्धांत बताया। (UN Correct the Map Resolution)

अमेरिका ने क्यों किया विरोध?

इस प्रस्ताव के खिलाफ वोट देने वाला एकमात्र देश अमेरिका था। अमेरिकी प्रतिनिधियों का तर्क था कि यह प्रस्ताव कार्टोग्राफी के तकनीकी मुद्दे से आगे बढ़कर वैचारिक बहस का हिस्सा बन रहा है। उनका मानना था कि संयुक्त राष्ट्र को ऐसे विषयों के बजाय वैश्विक शांति, सुरक्षा और आर्थिक विकास जैसे मुद्दों पर अधिक ध्यान देना चाहिए।

अमेरिका ने यह भी कहा कि नक्शों को लेकर अलग-अलग वैज्ञानिक दृष्टिकोण हो सकते हैं और किसी विशेष विचारधारा को बढ़ावा नहीं दिया जाना चाहिए। (UN Correct the Map Resolution)

इसके बावजूद महासभा में 164 देशों ने प्रस्ताव का समर्थन किया।

अभी भी क्यों इस्तेमाल होता है मर्केटर प्रोजेक्शन?

इतनी आलोचना के बावजूद मर्केटर प्रोजेक्शन पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। दरअसल यह समुद्री और हवाई नेविगेशन के लिए आज भी बेहद उपयोगी माना जाता है। इसमें दिशा और कोणों को सही तरीके से दिखाया जाता है, जिससे यात्रा मार्ग तय करना आसान होता है। (UN Correct the Map Resolution)

इसी वजह से कई डिजिटल मैपिंग प्लेटफॉर्म और ऑनलाइन सेवाएं अभी भी “वेब मर्केटर” का इस्तेमाल करती हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि अलग-अलग उद्देश्यों के लिए अलग-अलग मैप प्रोजेक्शन उपयुक्त हो सकते हैं। शिक्षा, सांख्यिकीय तुलना और क्षेत्रफल समझाने के लिए इक्वल-एरिया नक्शे बेहतर हो सकते हैं, जबकि नेविगेशन के लिए मर्केटर अभी भी उपयोगी है। (UN Correct the Map Resolution)

लोगों की सोच को भी प्रभावित करते हैं नक्शे

यह विवाद सिर्फ भूगोल का नहीं है। कई विशेषज्ञों का मानना है कि नक्शे लोगों की सोच को भी प्रभावित करते हैं।

जब कोई महाद्वीप लगातार छोटा दिखाया जाता है, तो उसके वास्तविक आकार और महत्व को लेकर गलत धारणाएं बन सकती हैं। अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका और एशिया के कई देशों का तर्क है कि दुनिया को उनकी वास्तविक भौगोलिक स्थिति और पैमाने के साथ देखना चाहिए।

इसी वजह से “करेक्ट द मैप” प्रस्ताव को केवल तकनीकी सुधार नहीं, बल्कि वैश्विक प्रतिनिधित्व को अधिक संतुलित बनाने की कोशिश के रूप में भी देखा जा रहा है। (UN Correct the Map Resolution)

भारतीय नौसेना का सबसे बड़ा समुद्री किला बन रहा कारवार, बनेंगे हाई-सिक्योरिटी मिसाइल स्टोरेज और नया एयर स्टेशन

Karwar Naval Base Expansion
Indian Navy Expands Karwar Naval Base with New Missile Storage Facilities, Air Station and Strategic Infrastructure

Karwar Naval Base Expansion: भारतीय नौसेना अपने सबसे बड़े और रणनीतिक प्रोजेक्ट सीबर्ड फेज-IIA को आगे बढ़ाने की तैयारी कर रही है। नौसेना ने कर्नाटक के कारवार स्थित आईएनएस कदंबा में नई ऑर्डिनेंस स्टोरेज फैसिलिटी और रणनीतिक इंफ्रास्ट्रक्चर के विस्तार के लिए डिजाइन कंसल्टेंट नियुक्त करने हेतु एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (ईओआई) जारी की है।

कारवार नौसेना बेस को भारतीय नौसेना की भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखकर विकसित किया जा रहा है। यह बेस पश्चिमी समुद्री क्षेत्र में भारत की सैन्य मौजूदगी को मजबूत करने वाला सबसे महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है।

Karwar Naval Base Expansion: प्रोजेक्ट सीबर्ड फेज-IIA में क्या होगा?

ईओआई के अनुसार, प्रोजेक्ट के तहत मौजूदा नेवल आर्मामेंट डिपो (एनएडी), मिसाइल टेक्निकल पोजिशन (एमटीपी), कॉमन फैसिलिटी एरिया (सीएफए) और नेवल आर्मामेंट इंस्पेक्टोरेट (एनएआई) का विस्तार किया जाएगा।

इस प्रोजेक्ट के डिजाइन का लगभग 85 प्रतिशत काम पहले ही पूरा हो चुका है। आईआईटी मद्रास पहले ही तकनीकी जांच कर चुकी है और उन्हें मंजूरी भी मिल चुकी है। वहीं सेंटर फॉर फायर, एक्सप्लोसिव एंड एनवायरनमेंट सेफ्टी (सीएफईईएस) ने भी प्रारंभिक मंजूरी प्रदान की है।

ऑर्डिनेंस स्टोरेज के लिए बनेंगे हाई-सिक्योरिटी बंकर

कारवार में बनने वाली नई सुविधाओं का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा आधुनिक ऑर्डिनेंस स्टोरेज परिसर है। यहां अलग-अलग कैटेगरी के विस्फोटकों और मिसाइलों के लिए खास स्ट्रक्चर तैयार किए जाएंगे।

योजना के अनुसार 400 टन क्षमता वाले बॉक्स टाइप इग्लू, 600 टन क्षमता वाले डबल बंकर मैगजीन और 120 टन क्षमता वाले एबव-ग्राउंड मैगजीन बनाए जाएंगे।

इसके अलावा टॉरपीडो, मिसाइल, माइन और अन्य नौसैनिक हथियारों के रखरखाव और परीक्षण के लिए विशेष वर्कशॉप भी बनाई जाएंगी। इन सुविधाओं का उद्देश्य युद्धपोतों और पनडुब्बियों को तेजी से हथियार उपलब्ध कराना है। (Karwar Naval Base Expansion)

कारवार को क्यों चुना गया था?

कारवार नौसेना बेस का आइडिया 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद सामने आया था। उस समय मुंबई बंदरगाह पर व्यापारिक जहाजों, मछली पकड़ने वाली नौकाओं और नौसेना के युद्धपोतों का भारी दबाव था।

इसके बाद भारतीय नौसेना ने पश्चिमी तट पर एक ऐसे खास सैन्य बंदरगाह की जरूरत महसूस की, जहां केवल नौसैनिक गतिविधियां संचालित की जा सकें। इसी उद्देश्य से कर्नाटक के कारवार को चुना गया।

गोवा से लगभग 120 किलोमीटर दक्षिण में स्थित यह क्षेत्र पश्चिमी घाट की पहाड़ियों और अरब सागर के बीच मौजूद है। यहां समुद्र तट के पास ही पर्याप्त गहराई उपलब्ध है, जिससे बड़े विमानवाहक पोत और पनडुब्बियां आसानी से ऑपरेट कर सकती हैं। (Karwar Naval Base Expansion)

आईएनएस कदंबा का इतिहास

कारवार नौसेना बेस की आधारशिला वर्ष 1986 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने रखी थी। बाद में इस प्रोजेक्ट को प्रोजेक्ट सीबर्ड नाम दिया गया।

31 मई 2005 को इस बेस को आधिकारिक रूप से आईएनएस कदंबा के रूप में कमीशन किया गया। प्रोजेक्ट का पहला चरण 2011 में पूरा हुआ, जिसमें ब्रेकवाटर, पियर, शिप रिपेयर सुविधाएं, शिपलिफ्ट सिस्टम और आवासीय परिसर शामिल थे।

आज यह भारतीय नौसेना के पश्चिमी कमान के सबसे महत्वपूर्ण ठिकानों में गिना जाता है। (Karwar Naval Base Expansion)

50 युद्धपोतों तक की क्षमता वाला बेस

प्रोजेक्ट सीबर्ड का दूसरा फेज कारवार की क्षमता को कई गुना बढ़ा देगा। फेज-IIA पूरा होने के बाद यहां 32 बड़े युद्धपोत और पनडुब्बियां तथा 23 यार्ड क्राफ्ट एक साथ तैनात किए जा सकेंगे।

इसके बाद फेज-IIB के पूरा होने पर यह संख्या और बढ़ जाएगी। तब कारवार में लगभग 50 युद्धपोत और पनडुब्बियां तथा 40 सहायक जहाजों को ठहराने की क्षमता होगी।

वर्तमान में भारतीय नौसेना के दोनों विमानवाहक पोत आईएनएस विक्रमादित्य और आईएनएस विक्रांत इसी बेस से जुड़े हुए हैं। (Karwar Naval Base Expansion)

बन रहा है विशाल कवरड ड्राई बर्थ

फेज-IIA के तहत सबसे बड़े स्ट्रक्चर में से एक 75 मीटर ऊंचा कवरड ड्राई बर्थ है। इसकी ऊंचाई कुतुब मीनार से भी अधिक है।

लगभग 33,000 वर्ग मीटर क्षेत्र में फैली इस फैसिलिटी में एक साथ चार बड़े युद्धपोतों की मरम्मत और रखरखाव किया जा सकेगा। इसके अलावा चार कवरड ड्राई बर्थ, पूर्ण विकसित नेवल डॉकयार्ड और आधुनिक लॉजिस्टिक सुविधाएं भी विकसित की जा रही हैं। (Karwar Naval Base Expansion)

नया नेवल एयर स्टेशन भी तैयार हो रहा

प्रोजेक्ट के तहत कारवार में 2,700 मीटर रनवे वाला ग्रीनफील्ड ड्यूल-यूज नेवल एयर स्टेशन भी डेवलप किया जा रहा है। यह एयर स्टेशन समुद्री निगरानी विमान, हेलीकॉप्टर, ड्रोन और अन्य सैन्य विमानों के ऑपरेशन में मदद करेगा। साथ ही इसमें सिविल एनक्लेव भी होगा, जिससे नागरिक उड़ानों का संचालन संभव होगा।

यह सुविधा उत्तर कर्नाटक और दक्षिण गोवा क्षेत्र की कनेक्टिविटी को भी मजबूत करेगी। (Karwar Naval Base Expansion)

हजारों लोगों के लिए बन रहे आवास

कारवार प्रोजेक्ट में अधिकारियों, नाविकों और रक्षा नागरिक कर्मचारियों के लिए चार बड़े टाउनशिप भी डेवलप किए जा रहे हैं। इन टाउनशिप में लगभग 10,000 आवासीय इकाइयां बनाई जा रही हैं। पूरा परिसर करीब 10,000 सैन्य और नागरिक कर्मियों तथा उनके परिवारों को समायोजित करने की क्षमता रखेगा।

हाल के वर्षों में कई आवासीय टावर, पियर और बिजली सबस्टेशन तैयार किए जा चुके हैं। अप्रैल 2025 में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने करीब 2,000 करोड़ रुपये की विभिन्न सुविधाओं का उद्घाटन भी किया था। (Karwar Naval Base Expansion)