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2030 तक 90 देशों में पहुंचेगा भारत का डिफेंस नेटवर्क, रक्षा निर्यात बढ़ाने का बड़ा प्लान तैयार

हाल ही में 3 सितंबर को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने ‘रक्षा’ (RAKSHA) फ्रेमवर्क जारी किया था, जिसे अगले 10 सालों के लिए भारत की रक्षा कूटनीति का रोडमैप माना जा रहा है...

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📍नई दिल्ली | 9 Sep, 2026, 10:52 AM

India Defence Diplomacy: भारत अब अपनी डिफेंस डिप्लोमेसी को नए स्तर पर ले जाने की तैयारी कर रहा है। रक्षा मंत्रालय ने 2030 तक दुनिया भर में 85 से 90 डिफेंस विंग स्थापित करने की योजना बनाई है। अभी भारत के पास विदेशों में करीब 54 डिफेंस विंग हैं, जबकि 2024 में मंजूर किए गए 10 नए विंग जुड़ने के बाद यह संख्या 62 तक पहुंच जाएगी।

बता दें कि डिफेंस विंग बनाने के पीछे असली वजह भारत के बढ़ते रक्षा निर्यात को बढ़ाने, सामरिक साझेदारी, समुद्री सुरक्षा और वैश्विक प्रभाव को माना रहा है। हाल ही में 3 सितंबर को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने ‘रक्षा’ (RAKSHA) फ्रेमवर्क जारी किया था, जिसे अगले 10 सालों के लिए भारत की रक्षा कूटनीति का रोडमैप माना जा रहा है।

India Defence Diplomacy: ‘रक्षा’ फ्रेमवर्क है दूर की सोच?

रक्षा मंत्रालय का यह दस्तावेज पूरी तरह सार्वजनिक नहीं किया गया है। यह मुख्य रूप से भारतीय दूतावासों में तैनात डिफेंस अताशे (डीए), सेना, नौसेना और वायुसेना के अधिकारियों को दिशा देने के लिए तैयार किया गया आंतरिक रोडमैप है।

इस फ्रेमवर्क के चार प्रमुख स्तंभ हैं। इनमें सामरिक साझेदारी, क्षमता निर्माण, स्वदेशी रक्षा निर्यात को बढ़ावा देना और हिंद महासागर क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा को मजबूत करना शामिल है।

पहले डिफेंस डिप्लोमेसी का मतलब मुख्य रूप से सैन्य अभ्यास, उच्च स्तरीय दौरे और औपचारिक कार्यक्रम होते थे। लेकिन अब इसे सीधे रक्षा उद्योग, हथियार निर्यात और रणनीतिक सहयोग से जोड़ा जा रहा है।

डिफेंस अताशे की भूमिका में बड़ा बदलाव

भारतीय दूतावासों में तैनात डिफेंस अताशे सेना, नौसेना और वायुसेना के अधिकारी होते हैं। पहले उनकी भूमिका मुख्य रूप से उन देशों के साथ मिलिट्री कॉर्डिनेशन बनाए रखने की होती थी, जहां से भारत हथियार और सैन्य उपकरण खरीदता था।

लेकिन अब सरकार ने उनकी प्राथमिकता बदल दी है। पूर्व चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान ने संसदीय समिति को बताया था कि कई ऐसे देशों से डिफेंस अताशे हटाए या कम किए जा रहे हैं, जहां भारत पहले से हथियार खरीदता रहा है। इसके बदले उन्हें उन देशों में भेजा जा रहा है जहां भारतीय हथियारों और सैन्य प्रणालियों के लिए बाजार मौजूद है।

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इसी रणनीति के तहत इथियोपिया, आइवरी कोस्ट, मोजाम्बिक, जिबूती, तंजानिया, पोलैंड, आर्मेनिया और फिलीपींस जैसे देशों में भारतीय डिफेंस अताशे की नियुक्तियां की जा रही हैं।

आर्मेनिया इसका बड़ा उदाहरण है। भारत ने हाल के सालों में वहां पिनाका मल्टी बैरल रॉकेट लॉन्चर, आकाश एयर डिफेंस सिस्टम और गोला-बारूद की सप्लाई की है। इसी वजह से वहां पहली बार भारतीय डिफेंस अताशे की नियुक्ति की गई। (India Defence Diplomacy)

2030 तक 157 देशों तक पहुंच बनाने की योजना

हर देश में अलग डिफेंस विंग खोलना आसान नहीं है। इसके लिए अधिकारियों, कार्यालयों, आवास, सुरक्षा और स्थानीय स्टाफ की जरूरत होती है। इसलिए रक्षा मंत्रालय ने एक अलग मॉडल अपनाया है। भारत का लक्ष्य वर्ष 2030 तक अपने डिफेंस विंग की संख्या बढ़ाकर लगभग 85 से 90 तक पहुंचाना है।

करीब 50 मौजूदा डिफेंस विंग को पड़ोसी देशों की अतिरिक्त जिम्मेदारी दी जा रही है। इसे एक्रीडिटेशन मॉडल कहा जाता है। इसके तहत एक ही डिफेंस अताशे कई देशों को कवर करेगा।

यही वजह है कि 62 डिफेंस विंग होने के बावजूद भारत की पहुंच 157 देशों तक बढ़ाने की योजना बनाई गई है।

12 देशों में प्राथमिकता से खुलेगी नई व्यवस्था

रक्षा मंत्रालय की प्राथमिकताओं में ऐसे 12 देश शामिल हैं जहां पहले से उनके डिफेंस अताशे नई दिल्ली में मौजूद हैं, लेकिन भारत ने अभी तक वहां अपना डिफेंस विंग नहीं खोला है। बता दें कि दिल्ली में करीब 160 से ज्यादा विदेशी मिशन हैं।

इसे “रेसिप्रोकल गैप” कहा जा रहा है। बेल्जियम इसका हालिया उदाहरण है। बेल्जियम ने भारत में अपना डिफेंस प्रतिनिधि तैनात किया हुआ है और अब भारत भी ब्रुसेल्स में अपनी सैन्य उपस्थिति मजबूत करने की तैयारी कर रहा है। (India Defence Diplomacy)

400 करोड़ रुपये का डिफेंस डिप्लोमेसी फंड

भारत ने रक्षा कूटनीति को मजबूत करने के लिए वित्त वर्ष 2025-26 में 400 करोड़ रुपये का विशेष फंड आवंटित किया है। यह रकम पिछले वित्त वर्ष की तुलना में 100 करोड़ रुपये अधिक है।

यह फंड पहली बार 2021-22 में 110 करोड़ के साथ शुरू किया गया था। इसके बाद 2023 में इसे 150 करोड़ किया गया। 2025 में यह बढ़कर 300 करोड़ और अब 400 करोड़ तक पहुंच गया है।

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यह पैसा किसी नए हथियार खरीदने के लिए नहीं बल्कि रणनीतिक सहयोग बढ़ाने के लिए इस्तेमाल होता है। (India Defence Diplomacy)

कहां इस्तेमाल होता है यह फंड

यह फंड भारतीय सेना, नौसेना, वायुसेना और अब भारतीय तटरक्षक बल के राजस्व बजट का हिस्सा है। इसका इस्तेमाल मित्र देशों को सैन्य उपकरण, प्रशिक्षण और मदद देने में किया जाता है। अफ्रीका और हिंद महासागर क्षेत्र में भारत कई देशों को गश्ती नौकाएं, राइफल, रडार सिस्टम, वाहन और प्रशिक्षण सुविधाएं उपलब्ध करा चुका है।

केन्या को इंसास राइफलें, गोला-बारूद और एमआरआई मशीन दी गई। मोजाम्बिक को हाई-स्पीड इंटरसेप्टर बोट और ट्रेनिंग सिम्युलेटर मिले है। सेशेल्स को पेट्रोलिंग बोट, डोर्नियर विमान और कोस्टल रडार नेटवर्क दिया गया। जबकि युगांडा को वाहन, मोटरसाइकिल और प्रशिक्षण सुविधाएं उपलब्ध कराई गईं। (India Defence Diplomacy)

रक्षा निर्यात बढ़ाने पर फोकस

भारत ने 2030 तक 50,000 करोड़ रुपये का रक्षा निर्यात लक्ष्य तय किया है। वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का रक्षा निर्यात 38,424 करोड़ तक पहुंच गया, जो पिछले साल की तुलना में लगभग 63 फीसदी अधिक था।

दिलचस्प बात यह है कि अमेरिका भारत का सबसे बड़ा ग्राहक बन गया है। हालांकि यहां भारत पूरे हथियार सप्लाई करता है, बल्कि एयरक्राफ्ट स्ट्रक्चर, फ्यूजलेज, विंग और अन्य को-असेंबली का निर्यात करता है।

दूसरी ओर फिलीपींस को ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल, आर्मेनिया को पिनाका और आकाश सिस्टम, जबकि कई अफ्रीकी देशों को गश्ती नौकाएं और छोटे हथियार निर्यात किए जा रहे हैं। (India Defence Diplomacy)

डिफेंस क्रेडिट लाइन की डिप्लोमेसी

भारत केवल हथियार ही नहीं बेच रहा, बल्कि कई देशों को रियायती रक्षा ऋण भी उपलब्ध करा रहा है। भारत मैत्री शक्ति योजना और डिफेंस लाइन ऑफ क्रेडिट के तहत मित्र देशों को कम ब्याज दर पर लंबी अवधि के लिए वित्तीय मदद दी जाती है।

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वियतनाम को समुद्री सुरक्षा कार्यक्रमों के लिए विशेष सहायता दी गई। मॉरीशस, मालदीव, श्रीलंका और बांग्लादेश को समुद्री निगरानी, हेलीकॉप्टर और सिक्योरिटी इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी मदद मिली।

अफ्रीकी देशों में भी डिफेंस सेक्टर से जुड़ी कई क्रेडिट लाइनें ऑपरेट की जा रही हैं। (India Defence Diplomacy)

चीन की बढ़ती मौजूदगी के बीच अपनाई नई रणनीति

रक्षा मंत्रालय की रणनीतिक योजना में यह भी स्पष्ट किया गया है कि भारत वैश्विक स्तर पर अपनी समुद्री और रक्षा उपस्थिति बढ़ाना चाहता है। विशेष रूप से अफ्रीका, प्रशांत द्वीप समूह, लैटिन अमेरिका और हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की सक्रियता बढ़ रही है।

चीन से तुलना करें तो भारत का डिफेंस अताशे नेटवर्क अभी भी अपेक्षाकृत छोटा माना जाता है। ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन (ओआरएफ) समेत कई आकलनों के अनुसार, चीन के डिफेंस अताशे और सैन्य प्रतिनिधि करीब 110 देशों में तैनात हैं, जबकि भारत के पास वर्तमान में लगभग 54 से 62 डिफेंस विंग और अताशे नेटवर्क मौजूद है।

जहां चीन पर कई देशों को कर्ज के जाल में फंसाने के आरोप लगते रहे हैं, वहीं भारत अपने मॉडल को “कैपेसिटी बिल्डिंग” यानी क्षमता निर्माण आधारित साझेदारी बताता है। इसके तहत मित्र देशों की सेनाओं को प्रशिक्षण, रक्षा उपकरणों का सहयोग, सैन्य शिक्षा, संयुक्त अभ्यास और संस्थागत क्षमता विकसित करने पर अधिक जोर दिया जाता है। (India Defence Diplomacy)

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    हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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