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नौसेना के लिए स्वदेशी मरीन गैस टर्बाइन इंजन बनाने की तैयारियां शुरू, कंपनियों से मांगे प्रस्ताव, चुनिंदा देशों के पास है यह टेक्नोलॉजी

Indigenous Marine Gas Turbine
Indian Navy Launches Indigenous 24-28 MW Marine Gas Turbine Program to Reduce Foreign Dependence, Proposals sought from companies.

Indigenous Marine Gas Turbine: भारतीय नौसेना ने अपने युद्धपोतों के लिए स्वदेशी 24-28 मेगावाट मरीन गैस टर्बाइन डेवलप करने की तैयारियां शुरू कर दी हैं। रक्षा मंत्रालय ने इसके स्वदेशी निर्माण के लिए कंपनियों से एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (EOI) मांगा है। यह वही इंजन है जो नौसेना के युद्धपोतों को चलाने या जहाज पर बिजली पैदा करने के लिए इस्तेमाल होते हैं। 7 सितंबर को ही रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में हुई रक्षा अधिग्रहण परिषद (डीएसी) की बैठक में स्वदेशी मरीन गैस टर्बाइन परियोजना को मंजूरी दी गई थी। फिलहाल भारत इस तकनीक के लिए विदेशी कंपनियों पर निर्भर है। अमेरिका, ब्रिटेन, यूक्रेन और कुछ चुनिंदा यूरोपीय कंपनियों के पास ही यह एडवांस तकनीक मौजूद है। इस प्रोजेक्ट को रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया 2020 की मेक-1 कैटेगरी के तहत आगे बढ़ाया जाएगा।

Indigenous Marine Gas Turbine: विदेशी इंजनों पर निर्भर है नौसेना का बड़ा बेड़ा

भारतीय नौसेना के कई प्रमुख युद्धपोत आज भी विदेशी गैस टर्बाइनों पर निर्भर हैं। कोलकाता क्लास और विशाखापत्तनम क्लास डिस्ट्रॉयर, शिवालिक क्लास और नीलगिरि क्लास फ्रिगेट तथा विमानवाहक पोत आईएनएस विक्रांत जैसे प्लेटफॉर्म मुख्य रूप से यूक्रेन की जोर्या-माशप्रोएक्ट और अमेरिका की जनरल इलेक्ट्रिक एलएम-2500 गैस टर्बाइन का इस्तेमाल करते हैं।

हालांकि एलएम-2500 इंजनों की असेंबली और टेस्टिंग हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) बेंगलुरु में होती है, लेकिन इंजन की कोर टेक्नोलॉजी, हॉट सेक्शन, ब्लेड डिजाइन और अन्य महत्वपूर्ण तकनीकी हिस्से विदेशी नियंत्रण में रहते हैं।

सूत्रों का कहना है कि युद्ध या अंतरराष्ट्रीय संकट के दौरान स्पेयर पार्ट्स, ओवरहॉल और तकनीकी मदद मिलने में दिक्कत हो सकती है। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद ग्लोबल सप्लाई चेन में आई चुनौतियों से सरकार ने सबक लिया है। इसी वजह से भारतीय नौसेना ने लंबे समय से स्वदेशी गैस टर्बाइन डेवलप करने की दिशा में काम शुरू किया था।

जुलाई 2025 में मिली थी प्रारंभिक मंजूरी

इस कार्यक्रम को पहली बड़ी मंजूरी 28 जुलाई 2025 को मिली थी, जब परियोजना को अप्रूवल इन प्रिंसिपल (एआईपी) दिया गया था। इसके बाद नौसेना ने विभिन्न भारतीय कंपनियों और संगठनों की तकनीकी क्षमता का आकलन शुरू किया।

इस दौरान डिजाइन क्षमता, प्रिसीजन मैन्युफैक्चरिंग, टेस्टिंग इंफ्रास्ट्रक्चर, मेटलर्जी, डिजिटल कंट्रोल सिस्टम और लाइफ साइकिल सपोर्ट जैसी क्षमताओं का अध्ययन किया गया। अब 7 सितंबर 2026 को एओएन मिलने के बाद प्रोजेक्ट औपचारिक रूप से डेवलपमेंट फेज शुरू हो गया है। मेक-1 कैटेगरी के तहत सरकार प्रोटोटाइप डेवलपमें की लागत का 70 प्रतिशत तक वहन कर सकती है। इस पूरे कार्यक्रम की लागत लगभग 4,000 से 5,000 करोड़ रुपये के बीच आंकी गई है। (Indigenous Marine Gas Turbine)

24-28 मेगावाट इंजन क्यों है इतना महत्वपूर्ण?

24-28 मेगावाट पावर कैटेगरी के इंजन आधुनिक बड़े युद्धपोतों के मुख्य प्रोपल्शन सिस्टम के लिए उपयुक्त माने जाते हैं। इसी कैटेगरी में जनरल इलेक्ट्रिक एलएम-2500 और जोर्या-माशप्रोएक्ट के कई मरीन इंजन आते हैं।

इतने मेगावाट की ताकत युद्धपोत को तेज रफ्तार, तेज एक्सेलरेशन, लंबी समुद्री तैनाती और युद्धक परिस्थितियों में तेजी से ऑपरेशन करने की क्षमता देती है। आधुनिक नौसेनाएं सीओडीओजी, सीओजीएजी और इंटीग्रेटेड इलेक्ट्रिक प्रोपल्शन जैसे सिस्टम्स का इस्तेमाल कर रही हैं। भारतीय गैस टर्बाइन को भी इन आधुनिक सिस्टम्स के साथ कंपैटेबल बनाना होगा।

नौसेना की योजना के अनुसार इस इंजन का इस्तेमाल भविष्य के डिस्ट्रॉयर और फ्रिगेट कैटेगरी के युद्धपोतों में किया जा सकेगा। (Indigenous Marine Gas Turbine)

गैस टर्बाइन बनाना दुनिया की सबसे कठिन तकनीकों में शामिल

सूत्रों के मुताबिक गैस टर्बाइन टेक्नोलॉजी एयरोस्पेस और डिफेंस सेक्टर की सबसे मुश्किल तकनीकों में गिनी जाती है। इसके लिए अत्यधिक तापमान सहने वाली सामग्री, सटीक इंजीनियरिंग और उन्नत निर्माण तकनीकों की जरूरत होती है।

टर्बाइन के अंदर तापमान 1200 से 1400 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक तक पहुंच सकता है। ऐसे वातावरण में काम करने वाले ब्लेड के लिए सिंगल क्रिस्टल सुपरअलॉय, थर्मल बैरियर कोटिंग और विशेष कूलिंग चैनलों की जरूरत होती है।

भारत में गैस टर्बाइन रिसर्च एस्टेब्लिशमेंट (जीटीआरई), कावेरी इंजन कार्यक्रम और निजी उद्योगों ने इस क्षेत्र में अनुभव हासिल किया है, लेकिन बड़े मरीन इंजन के लिए जरूरी तकनीक डेवलप करना अभी भी चुनौतीपूर्ण माना जाता है। (Indigenous Marine Gas Turbine)

समुद्री वातावरण में इंजन को बचाना भी बड़ी चुनौती

समुद्र में लगातार नमक, नमी और कंपन की स्थिति रहती है। यही वजह है कि किसी भी गैस टर्बाइन को सीधे समुद्री इस्तेमाल के लिए तैयार नहीं किया जा सकता। इंजन में विशेष कोटिंग, एयर फिल्ट्रेशन सिस्टम, सीलिंग तकनीक और जंग से सुरक्षा देने वाले उपाय शामिल करने पड़ते हैं। इस प्रक्रिया को मरीनाइजेशन कहा जाता है।

इसके अलावा इंजन का फुल अथॉरिटी डिजिटल इंजन कंट्रोल सिस्टम यानी फेडेक युद्धपोत के कॉम्बैट मैनेजमेंट सिस्टम से जुड़ा होता है। इसलिए इंजन का प्रदर्शन हर परिस्थिति में स्थिर और विश्वसनीय होना आवश्यक है। (Indigenous Marine Gas Turbine)

चार प्रोटोटाइप बनाकर होंगे परीक्षण

प्रोजेक्ट के तहत शुरुआती चरण में चार प्रोटोटाइप इंजन डेवलप किए जाने की योजना है। इन इंजनों पर प्रयोगशाला और समुद्री वातावरण दोनों में विस्तृत परीक्षण किए जाएंगे। इन परीक्षणों में ईंधन दक्षता, अधिकतम शक्ति, लंबे समय तक संचालन क्षमता, नमक प्रतिरोध, कंपन सहनशीलता और रखरखाव संबंधी मानकों की जांच होगी। सफल परीक्षणों के बाद कम से कम 40 इंजनों की खरीद की जा सकती है।

कई सरकारी और निजी कंपनियां आ सकती हैं साथ

इस प्रोजेक्ट को इंडस्ट्री बेस्ड मॉडल पर डेवलप किया जाएगा। गैस टर्बाइन रिसर्च एस्टेब्लिशमेंट (जीटीआरई) डिजाइन और रिसर्च में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड (बीएचईएल) बड़े औद्योगिक सिस्टम निर्माण का अनुभव रखता है। हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड के पास एलएम-2500 इंजन असेंबली का अनुभव है।

निजी क्षेत्र में भारत फोर्ज जैसे समूह भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। कंपनी विशाखापत्तनम में मरीन गैस टर्बाइन रिपेयर और डेवलपमेंट सुविधाओं पर काम कर रही है। जून 2026 में भारत फोर्ज को 1.25 मेगावाट मरीन गैस टर्बाइन जनरेटर के 12 सेट बनाने का कॉन्ट्रैक्ट भी मिला था। (Indigenous Marine Gas Turbine)

तीन तरह के इंजन पर काम

भारत फिलहाल तीन लेवल पर समानांतर काम कर रहा है। पहला 1.25 मेगावाट मरीन गैस टर्बाइन जनरेटर कार्यक्रम है, जिसका इस्तेमाल जहाजों पर बिजली उत्पादन के लिए किया जाएगा। दूसरा 4 मेगावाट कैटेगरी का गैस टर्बाइन जनरेटर है, जिसे मेक-1 कैटेगरी के तहत डेवलप किया जा रहा है।

तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण कार्यक्रम 24-28 मेगावाट मुख्य प्रोपल्शन गैस टर्बाइन का है। इसी वजह से नौसेना ने स्टेजवाइज स्ट्रैटेजी अपनाई है, ताकि मेटलर्जी, कम्बशन टेक्नोलॉजी, फेडेक कंट्रोल और मरीनाइजेशन जैसी जटिल तकनीकों को धीरे-धीरे मैच्योर बनाया जा सके।

यह परियोजना भारतीय नौसेना की आत्मनिर्भरता से सीधे जुड़ी हुई है। स्वदेशी गैस टर्बाइन उपलब्ध होने पर भविष्य के युद्धपोतों के लिए इंजन, स्पेयर पार्ट्स, मरम्मत और ओवरहॉल की पूरी व्यवस्था देश के भीतर विकसित की जा सकेगी। (Indigenous Marine Gas Turbine)

क्या अगले साल सितंबर से IAF को मिलेंगे तेजस Mk-1A? रक्षा मंत्रालय ने दी नई डिलीवरी टाइमलाइन!

Tejas Mk-1A Delivery Delay
Tejas Mk-1A Delivery Delay: Will the IAF receive the Tejas Mk-1A by September next year? (AI Generated Image)

Tejas Mk-1A Delivery Delay: भारतीय वायुसेना के सबसे महत्वपूर्ण स्वदेशी लड़ाकू विमान तेजस एमके-1ए की डिलीवरी में लगातार देरी हो रही है। फरवरी 2024 में भारतीय वायुसेना को पहला तेजस एमके-1ए मिलना था, लेकिन सितंबर 2026 तक एक भी विमान औपचारिक रूप से वायुसेना को नहीं सौंपा गया है। अब रक्षा मंत्रालय की सालाना रिपोर्ट 2025-26 में खुलासा हुआ है कि मार्क-1 अल्फा की डिलीवरी में और देरी हो सकती है।

बता दें कि अमेरिकी कंपनी जीई एयरोस्पेस से अगस्त 2026 तक एचएएल को कुल 10 एफ-404आईएन20 इंजन मिल चुके हैं।

Tejas Mk-1A Delivery Delay: रक्षा मंत्रालय की रिपोर्ट में क्या कहा गया है?

रक्षा मंत्रालय की सालाना रिपोर्ट 2025-26 के अनुसार, “25 सितंबर 2025 को हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) और रक्षा मंत्रालय के बीच 97 अतिरिक्त तेजस एमके-1ए विमानों का अनुबंध हुआ था। इस ऑर्डर में 68 सिंगल-सीटर फाइटर जेट और 29 ट्विन-सीटर ट्रेनर विमान शामिल हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि इन 97 विमानों की डिलीवरी सितंबर 2027 से शुरू होगी और सितंबर 2033 तक पूरी हो जाएगी।”

यह ऑर्डर पहले से मौजूद 83 तेजस एमके-1ए विमानों के कॉन्ट्रैक्ट से अलग है। दोनों ऑर्डर मिलाकर भारतीय वायुसेना को कुल 180 तेजस एमके-1ए विमान मिलने हैं। अभी तक पहले ऑर्डर के 83 तेजस एमके-1ए विमानों में से एक भी फाइटर जेट डिलीवर नहीं हुआ है। हालांकि रिपोर्ट में पहले बैच के ऑर्डर के डिलीवरी की कोई टाइमलाइन नहीं दी गई है। (Tejas Mk-1A Delivery Delay)

2021 में मिला था पहला बड़ा ऑर्डर

तेजस एमके-1ए कार्यक्रम की शुरुआत फरवरी 2021 में हुई थी। उस समय भारतीय वायुसेना ने 83 विमानों का ऑर्डर दिया था। इनमें 73 सिंगल-सीटर फाइटर और 10 ट्विन-सीटर ट्रेनर विमान शामिल थे। मूल योजना के अनुसार पहला विमान 3 फरवरी 2024 तक वायुसेना को सौंपा जाना था। इसके बाद हर साल लगभग 16 विमान देने का लक्ष्य रखा गया था। पूरा ऑर्डर 2028-29 तक पूरा होना था।

लेकिन सितंबर 2026 तक हालात यह है कि पहली डिलीवरी लगभग 2 साल 7 महीने पीछे चल रही है। (Tejas Mk-1A Delivery Delay)

एचएएल के पास तैयार हैं कई विमान

लोकसभा की रक्षा संबंधी स्थायी समिति के सामने एचएएल ने इस साल मार्च बताया कि उसके पास पांच तेजस एमके-1ए विमान डिलीवरी के लिए लगभग तैयार हैं।

एचएएल अधिकारियों ने संसदीय समिति को बताया था, “एलसीए मार्क-1 अल्फा के लिए हमारे पास पांच विमान तैयार हैं। रडार और डीडब्ल्यूयू का इंटीग्रेशन पूरा हो चुका है। एएसआरएएएम एयर-टू-एयर मिसाइल और अस्त्र बियॉन्ड विजुअल रेंज मिसाइल के परीक्षण भी सफलतापूर्वक पूरे किए जा चुके हैं।”

वहीं, सूत्रों के मुताबिक एचएएल ने लगभग 30 एयरफ्रेम तैयार कर लिए हैं। इनमें से कई विमान प्रोडक्शन और ट्रायल्स के एडवांस फेज में पहुंच चुके हैं। एचएएल का लक्ष्य मार्च 2027 तक पहला पूर्ण स्क्वाड्रन तैयार करना है। एक फाइटर स्क्वाड्रन में सामान्य तौर पर 18 से 20 विमान शामिल होते हैं। (Tejas Mk-1A Delivery Delay)

इंजन सप्लाई ने बढ़ाईं मुश्किलें

कार्यक्रम में देरी की सबसे बड़ी वजह इंजन की कमी रही है। तेजस एमके-1ए में अमेरिकी कंपनी जीई एयरोस्पेस का एफ-404आईएन20 टर्बोफैन इंजन लगाया जाता है। कोविड महामारी के बाद वैश्विक सप्लाई चेन समस्याओं और उत्पादन संबंधी चुनौतियों के कारण इंजन की डिलीवरी समय पर नहीं हो सकी।

इंजन नहीं मिलने की वजह से एचएएल तैयार एयरफ्रेम को अंतिम रूप नहीं दे पाया। कई विमान असेंबली पूरी होने के बावजूद उड़ान और डिलीवरी चरण तक नहीं पहुंच सके। अगस्त 2026 तक एचएएल को कुल 10 इंजन मिल चुके हैं। इनमें अगस्त के दौरान पहुंचे तीन नए इंजन भी शामिल हैं।

जीई एयरोस्पेस की 2026-27 के दौरान 24 इंजन और उसके बाद हर साल लगभग 30 इंजन देने की योजना है। इसी के आधार पर उत्पादन प्रक्रिया में तेजी आने की उम्मीद जताई जा रही है। (Tejas Mk-1A Delivery Delay)

नासिक में खुली तीसरी प्रोडक्शन लाइन

रिपोर्ट के मुताबिक, तेजस कार्यक्रम की सबसे बड़ी चुनौती केवल इंजन नहीं बल्कि उत्पादन क्षमता भी थी। इसी को देखते हुए एचएएल ने महाराष्ट्र के नासिक स्थित एयरक्राफ्ट डिवीजन में तीसरी प्रोडक्शन लाइन शुरू की है। इस लाइन की सालाना 8 विमान है। बेंगलुरु की दो मौजूदा लाइनों के साथ मिलाकर अब एचएएल की कुल उत्पादन क्षमता 24 विमान प्रति वर्ष हो गई है।

17 अक्टूबर 2025 को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने नासिक स्थित इस नई सुविधा का उद्घाटन किया था। इसी दौरान नासिक में निर्मित पहले तेजस एमके-1ए विमान को औपचारिक रूप से फ्लैग ऑफ भी किया गया था।

एचएएल ने संसद की समिति को बताया कि तीसरी लाइन शुरू होने के बाद उत्पादन क्षमता 16 विमान प्रति वर्ष से बढ़कर 24 विमान प्रति वर्ष हो गई है। (Tejas Mk-1A Delivery Delay)

तेजस एमके-1ए में क्या है खास?

तेजस एमके-1ए भारतीय वायुसेना की जरूरतों को ध्यान में रखकर विकसित किया गया आधुनिक मल्टीरोल फाइटर जेट है। इसमें एडवांस एईएसए रडार लगाया गया है, जो एक साथ कई लक्ष्यों को ट्रैक और एंगेज करने में सक्षम है। विमान में नया इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सूट, आधुनिक एवियोनिक्स, एयर-टू-एयर रिफ्यूलिंग क्षमता और बेहतर मिशन कंप्यूटर भी शामिल हैं। (Tejas Mk-1A Delivery Delay)

डीआरडीओ ने बनाया स्वदेशी रेडोम

रिपोर्ट के मुताबिक, तेजस एमके-1ए कार्यक्रम में डीआरडीओ की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। डीआरडीओ ने विमान के लिए स्वदेशी रेडोम विकसित किया है। रेडोम विमान के नाक वाले हिस्से पर लगा विशेष कवर होता है, जिसके अंदर रडार सिस्टम स्थित रहता है। इसका काम रडार सिग्नल को न्यूनतम हानि के साथ बाहर जाने देना और संवेदनशील उपकरणों की सुरक्षा करना होता है। रक्षा मंत्रालय के अनुसार मई 2025 में स्वदेशी रेडोम का इंटीग्रेशन ट्रायल सफलतापूर्वक पूरा किया गया था। (Tejas Mk-1A Delivery Delay)

भारतीय वायुसेना के लिए क्यों जरूरी है तेजस?

भारतीय वायुसेना की अधिकृत जरूरत 42 फाइटर स्क्वाड्रन की है। वर्तमान में यह संख्या लगभग 29 से 31 स्क्वाड्रन के बीच है। मिग-21 विमान सेवा से बाहर हो चुके हैं। आने वाले सालों में जगुआर, मिग-29 और मिराज-2000 जैसे पुराने लड़ाकू विमानों की संख्या भी धीरे-धीरे कम होगी। (Tejas Mk-1A Delivery Delay)

LAC पर चीन ने घटाए 50,000 तक सैनिक? रक्षा मंत्रालय की रिपोर्ट में बड़ा खुलासा, फिर भी हाई अलर्ट पर भारतीय सेना

PLA Deployment Along LAC
China Reduces PLA Deployment Along LAC, But Indian Army Remains on High Alert: Defence Ministry Report Reveals. (AI Generated Image)

PLA Deployment Along LAC: भारत और चीन के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर पिछले कुछ वर्षों से जारी सैन्य तनाव के बीच रक्षा मंत्रालय की वार्षिक रिपोर्ट 2025-26 में कहा गया है कि चीन ने उत्तरी सीमाओं के सामने पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) की तैनाती में उल्लेखनीय कटौती की है। हालांकि भारत ने साफ किया है कि उसकी सेना एलएसी के सभी सेक्टरों में पूरी तरह तैयार और मजबूत स्थिति में है।

PLA Deployment Along LAC: क्या कहा है रक्षा मंत्रालय ने?

रिपोर्ट में कहा गया है कि, “साल 2025 में उत्तरी सीमाओं के सामने पीएलए सेनाओं की तैनाती में महत्वपूर्ण कमी देखी गई है। एलएसी और पारंपरिक ट्रेनिंग इलाकों में 10-10 कम्बाइंड आर्म्स ब्रिगेड साइज की सेनाएं तैनात रहीं। भारतीय सेना की तैनाती एलएसी के सभी सेक्टरों में मजबूत, संतुलित और किसी भी उभरती परिस्थिति से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार है।”

सैन्य सूत्रों के अनुसार, इस आकलन का मतलब यह माना जा रहा है कि चीन ने एलएसी के पास मौजूद कुछ अग्रिम तैनात ब्रिगेडों को पीछे हटाया है। वहीं, पीएलए की एक कम्बाइंड आर्म्स ब्रिगेड में लगभग 5,000 सैनिक होते हैं। ऐसे में 10 ब्रिगेड के स्तर पर कमी का मतलब लगभग 50,000 सैनिकों की संख्या में कमी माना जा सकता है। (PLA Deployment Along LAC)

खत्म नहीं हुआ है खतरा?

हालांकि रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि सैनिकों की संख्या में कमी का अर्थ यह नहीं है कि चीन ने अपनी सैन्य क्षमता कम कर दी है या सीमा पर खतरा समाप्त हो गया है। अमेरिकी रक्षा विभाग की नवंबर 2024 की एक रिपोर्ट में कहा गया था कि चीन ने एलएसी के विभिन्न क्षेत्रों में करीब 1.20 लाख सैनिक तैनात किए हुए थे। रिपोर्ट के अनुसार पश्चिमी, मध्य और पूर्वी सेक्टरों में 20 से अधिक कम्बाइंड आर्म्स ब्रिगेड अग्रिम मोर्चों पर मौजूद थीं।

सूत्रों के मुताबिक चीन अब भी एलएसी के पास बड़ी संख्या में सैनिक, मिसाइल सिस्टम, एयर डिफेंस सिस्टम, आर्टिलरी और टैंक तैनात रखे हुए है। पिछले कुछ सालों में चीन ने तिब्बत और शिनजियांग क्षेत्रों में सड़क, रेल, एयरबेस और सैन्य ढांचे का भी तेजी से विस्तार किया है। (PLA Deployment Along LAC)

चीन की तरफ का भूभाग समतल

भारतीय सेना ने अपनी तैनाती में कोई कमी नहीं की है। रक्षा मंत्रालय ने रिपोर्ट में दोहराया है कि सेना हर परिस्थिति से निपटने के लिए तैयार है।

सूत्र बताते हैं कि चीन की तरफ का भूभाग अधिकतर समतल पठारी क्षेत्र है। वहां सैनिकों, टैंकों और सैन्य उपकरणों की तेज आवाजाही संभव है। इसके मुकाबले भारतीय इलाकों में ऊंचे पहाड़ और कठिन भूगोलिक परिस्थितियां हैं। इसी कारण भारत को अग्रिम क्षेत्रों में पर्याप्त संख्या में सैनिक बनाए रखने पड़ते हैं।

2020 में पूर्वी लद्दाख में शुरू हुए सैन्य गतिरोध के बाद भारतीय सेना ने एलएसी पर अपनी निगरानी, इन्फ्रास्ट्रक्चर और तैनाती क्षमता में काफी वृद्धि की है। (PLA Deployment Along LAC)

बातचीत से आई स्थिरता

रक्षा मंत्रालय ने अपनी रिपोर्ट में भारत और चीन के बीच राजनीतिक, कूटनीतिक और सैन्य स्तर पर हुई बातचीत को सीमा पर स्थिरता का महत्वपूर्ण कारण बताया है। रिपोर्ट के अनुसार, मार्च और जुलाई 2025 में वर्किंग मेकैनिज्म फॉर कंसल्टेशन एंड कोऑर्डिनेशन (डब्ल्यूएमसीसी) की 33वीं और 34वीं बैठक आयोजित हुईं। इसके अलावा भारत-चीन सीमा विवाद पर विशेष प्रतिनिधियों की वार्ता भी दोबारा शुरू हुई।

दिसंबर 2024 और अगस्त 2025 में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और चीन के विदेश मंत्री वांग यी के बीच बातचीत हुई। अगस्त 2025 में बीजिंग में हुई बैठक के दौरान दोनों पक्षों ने सीमा विवाद के राजनीतिक समाधान की दिशा में प्रयास जारी रखने पर सहमति जताई थी। (PLA Deployment Along LAC)

मोदी-शी जिनपिंग मुलाकातों का भी असर

रिपोर्ट में कहा गया है कि अक्टूबर 2024 के बाद दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व के बीच संपर्क बढ़ा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच कई महत्वपूर्ण मुलाकातें हुईं।

अगस्त 2025 में प्रधानमंत्री मोदी ने चीन के तियानजिन शहर में आयोजित शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) शिखर सम्मेलन में हिस्सा लिया था। रक्षा मंत्रालय का मानना है कि इस दौरान हुई उच्चस्तरीय बातचीत ने दोनों देशों के रिश्तों में सकारात्मक माहौल बनाने में मदद की। (PLA Deployment Along LAC)

पूर्वी लद्दाख में सैन्य वार्ता जारी

भारत और चीन के बीच सैन्य स्तर पर भी बातचीत जारी रही। रिपोर्ट के अनुसार 25-26 अक्टूबर 2025 को पूर्वी लद्दाख में 23वीं कोर कमांडर स्तर की बैठक आयोजित की गई।

रक्षा मंत्रालय ने कहा कि जमीनी स्तर पर दोनों देशों के सैनिकों के बीच नियमित बॉर्डर पर्सनल मीटिंग्स भी जारी हैं। इन बैठकों का उद्देश्य स्थानीय स्तर पर उत्पन्न होने वाले मुद्दों का समाधान करना और तनाव को बढ़ने से रोकना है।

रिपोर्ट में कहा गया है, “सभी सेक्टरों में पीएलए के साथ बॉर्डर पर्सनल मीटिंग्स सौहार्दपूर्ण और मित्रवत वातावरण में जारी हैं, ताकि चिंता के मुद्दों का समाधान किया जा सके।” (PLA Deployment Along LAC)

सीमा क्षेत्रों में तेजी से बढ़ रहा इन्फ्रास्ट्रक्चर

रक्षा मंत्रालय की रिपोर्ट में सीमा क्षेत्रों में इन्फ्रास्ट्रक्चर विकास का भी उल्लेख किया गया है। बॉर्डर रोड्स ऑर्गेनाइजेशन (बीआरओ) लगातार ऊंचाई वाले और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्रों में ऑल-वेदर कनेक्टिविटी मजबूत कर रहा है।

रिपोर्ट में पूर्वी लद्दाख के मुध-न्योमा एयरफील्ड का भी जिक्र किया गया है। लगभग 13,700 फीट की ऊंचाई पर स्थित यह भारतीय वायुसेना का सबसे ऊंचा एयरफील्ड माना जाता है। इसके चालू होने से लद्दाख सेक्टर में सैन्य और लॉजिस्टिक क्षमताओं को मजबूती मिली है।

इसके अलावा अरुणाचल प्रदेश के अनिनी में बीआरओ ने हेलिपैड का बड़ा अपग्रेड पूरा किया है। पहले यहां छोटा लैंडिंग ग्राउंड था, जिसका साइज बढ़ाकर पेवमेंट क्वालिटी कंक्रीट हेलिपैड बनाया गया है।

इस नए और बड़े हेलिपैड की वजह से अब भारी हेलीकॉप्टर भी यहां आसानी से उतर सकेंगे। इससे सीमावर्ती इलाके में सामान, जरूरी सामग्री और सैनिकों की आवाजाही तेज और आसान होगी। प्राकृतिक आपदा, राहत कार्य और आपातकालीन परिस्थितियों में भी यह हेलिपैड काफी मददगार साबित होगा। (PLA Deployment Along LAC)

ऑपरेशन सिंदूर में जैकोबाबाद में निशाना बने थे पाकिस्तान के कई एफ-16, AEW&C और तुर्किए के बने घातक ड्रोन, रक्षा मंत्रालय की रिपोर्ट में बड़ा खुलासा

Operation Sindoor Mod Report
Operation Sindoor Report Reveals S-400 Kill, Damage To Pakistani F-16s And Major Airbase Strikes. (AI Generated Image)

Operation Sindoor Mod Report: रक्षा मंत्रालय की वार्षिक रिपोर्ट 2025-26 में ऑपरेशन सिंदूर को भारत के आतंकवाद विरोधी अभियान में एक महत्वपूर्ण सैन्य कार्रवाई बताया गया है। रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि जैकोबाबाद एयरबेस पर कई एफ-16 लड़ाकू विमानों को नुकसान पहुंचा था। वहीं रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि सेना की विशेष टीमों ने युद्ध के दौरान गिरे ड्रोन, मिसाइलों और फटे बिना रह गए सैकड़ों विस्फोटकों को सुरक्षित तरीके से निष्क्रिय कर संभावित खतरे को टाल दिया।

Operation Sindoor Mod Report: नियंत्रित थी भारतीय कार्रवाई

रक्षा मंत्रालय की वार्षिक रिपोर्ट 2025-26 में ऑपरेशन सिंदूर को भारत के आतंकवाद विरोधी अभियान में एक महत्वपूर्ण सैन्य कार्रवाई बताया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत ने संयुक्त सैन्य शक्ति, आधुनिक हथियारों और इंटीग्रेटेड एयर डिफेंस नेटवर्क का इस्तेमाल करते हुए पाकिस्तान की कई सैन्य क्षमताओं को निशाना बनाया। साथ ही भारतीय पक्ष ने कार्रवाई को नियंत्रित और गैर-विस्तारवादी रखने का प्रयास किया।

रिपोर्ट में बताया गया है कि इस अभियान ने दिखाया कि भारतीय सेनाएं मल्टी-डोमेन ऑपरेशंस, एडवांस टेक्नोलॉजी, इंटेलिजेंस नेटवर्क और जॉइंट फोर्स को किस तरह एक साथ इस्तेमाल करने में सक्षम हैं। साथ ही, ऑपरेशन के बाद भारत ने अपनी सैन्य क्षमताओं की व्यापक समीक्षा शुरू की, जिसमें फोर्स रिस्ट्रक्चरिंग, तीनों सेनाओं के बीच बेहतर जॉइंटनेस और उभरती टेक्नोलॉजी को तेजी से शामिल करने पर विशेष ध्यान दिया गया।

Operation Sindoor Mod Report
Discussions at the Highest Level during Op Sindoor (Pic: MoD)

भारतीय वायुसेना ने संभाली एयर सुपीरियोरिटी

रक्षा मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय वायुसेना के एडवांस्ड एयर डिफेंस सिस्टम ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। भारतीय रक्षा बलों ने पाकिस्तान और पीओके में स्थित नौ आतंकी शिविरों तथा संबंधित इंफ्रास्ट्रक्चर पर सटीक हमले किए। रिपोर्ट में कहा गया है कि एस-400 और शौर्य जैसे एयर डिफेंस सिस्टम ने कई पाकिस्तानी हवाई खतरों को विफल किया, जिससे भारत को एयर सुपीरियोरिटी बनाए रखने में मदद मिली और पाकिस्तान वायुसेना की ऑपरेशनल क्षमता सीमित हो गई।

ऑपरेशन के दौरान भारतीय वायुसेना की एस-400 एयर डिफेंस यूनिट ने पाकिस्तान के एक विशेष मिशन विमान को 314 किलोमीटर की दूरी से सफलतापूर्वक निशाना बनाकर नष्ट कर दिया। यह दुनिया के सबसे लंबी दूरी वाले सतह से हवा में मार करने वाले अभियानों में से एक माना जाता है।

रिपोर्ट के मुताबिक 8 से 10 मई 2025 के बीच पाकिस्तान की ओर से सैन्य ठिकानों के साथ-साथ नागरिक ढांचे, धार्मिक स्थलों, स्कूलों और चिकित्सा केंद्रों को निशाना बनाने की कोशिश की गई। इसके जवाब में भारतीय वायुसेना ने कई महत्वपूर्ण सैन्य लक्ष्यों पर कार्रवाई की।

छह रडार और दो एयर डिफेंस ठिकाने बने निशाना

रिपोर्ट के मुताबिक भारतीय वायुसेना ने एयर लॉन्च हथियारों और लोइटरिंग म्यूनिशन के इस्तेमाल से पाकिस्तान के छह रडार और दो एयर डिफेंस ठिकानों को सफलतापूर्वक निशाना बनाया। यह कार्रवाई पाकिस्तान की वायु निगरानी और एयर डिफेंस क्षमता को प्रभावित करने के उद्देश्य से की गई थी।

भारतीय कार्रवाई में चकलाला, रहीम यार खान, सुक्कुर, मुरीद, सरगोधा, जैकोबाबाद और भोलारी जैसे स्थानों का उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार इन ठिकानों पर हमले भारत की “डिमॉन्स्ट्रेटिव कम्पेलेंस” रणनीति का हिस्सा थे, जिसका उद्देश्य सीमित लेकिन प्रभावी सैन्य दबाव बनाना था। (Operation Sindoor Mod Report)

जैकोबाबाद में एफ-16 और ड्रोन सिस्टम को नुकसान

पाकिस्तान के जैकोबाबाद एयरबेस के बाारे में कहा गया है कि 10 मई 2025 को भारतीय वायुसेना ने चार ऐसे हैंगरों को निशाना बनाया, जिनमें लड़ाकू विमान, एयरबोर्न अर्ली वार्निंग एंड कंट्रोल विमान और मानव रहित विमान रखे गए थे।

रिपोर्ट में कहा गया है, “जैकोबाबाद में मौजूद कई एफ-16 विमान, एक एईडब्ल्यू एंड सी विमान और अकिनची तथा टीबी-2 श्रेणी के कई यूसीएवी नष्ट या क्षतिग्रस्त हुए।” साथ ही कई पाकिस्तानी सैन्य कर्मी भी हताहत हुए थे।

Operation Sindoor Mod Report
Planning Military Operations (Pic: MoD)

सरगोधा और रहीम यार खान की रनवे स्ट्राइक

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान के दो महत्वपूर्ण एयरबेस के रनवे भी निशाना बनाए। रिपोर्ट के अनुसार सरगोधा और रहीम यार खान के रनवे पर सटीक हमला किया गया, जिससे उन्हें नुकसान पहुंचा।
रिपोर्ट में इन हमलों की तुलना 1971 के युद्ध के दौरान पूर्वी पाकिस्तान के एयरफील्ड को निष्क्रिय करने वाली भारतीय वायुसेना की कार्रवाई से की गई है।

वहीं ऑपरेशन के दौरान चकलाला और मुरीद स्थित कमांड एंड कंट्रोल सेंटरों को भी सफलतापूर्वक निशाना बनाया गया। रिपोर्ट के अनुसार चकलाला पाकिस्तान वायुसेना के एयर डिफेंस कमांड का मुख्यालय है।

कमांड एंड कंट्रोल सेंटर किसी भी सैन्य नेटवर्क का दिमाग माने जाते हैं। यहां से रडार, मिसाइल सिस्टम, एयर डिफेंस नेटवर्क और लड़ाकू विमानों के ऑपरेशन को कॉर्डिनेट किया जाता है।

रिपोर्ट के अनुसार भारतीय वायुसेना ने जैकोबाबाद स्थित कूलिंग प्लांट और रहीम यार खान के टर्मिनल क्षेत्र को भी निशाना बनाया। इन टारगेट् को एयरफील्ड इंफ्रास्ट्रक्चर का हिस्सा बताया गया है। ऐसे स्ट्रक्चर किसी एयरबेस की नियमित संचालन क्षमता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। (Operation Sindoor Mod Report)

आईएसीसीएस नेटवर्क ने निभाई अहम भूमिका

रिपोर्ट में भारतीय वायुसेना के इंटीग्रेटेड एयर कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम यानी आईएसीसीएस का विशेष उल्लेख किया गया है। मंत्रालय के अनुसार यही नेटवर्क पूरे ऑपरेशन के दौरान एयर डिफेंस ऑपरेशन की रीढ़ बना रहा।

आईएसीसीएस में सैन्य और नागरिक दोनों प्रकार के निगरानी सेंसर जुड़े रहते हैं। इससे सभी संबंधित एजेंसियों को एक साझा एयर पिक्चर उपलब्ध होती है। रिपोर्ट के अनुसार चार दिन तक चले संघर्ष के दौरान यह नेटवर्क अपेक्षा के अनुरूप काम करता रहा। (Operation Sindoor Mod Report)

Operation Sindoor Mod Report
Validation Missile Firing by IN Ship during Op Sindoor. (Pic: MoD)

ऑपरेशन सिंदूर में शामिल थी भारतीय नौसेना की स्पेशल फोर्सेज

पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारतीय नौसेना ने अपने प्रमुख युद्धपोतों, एयरक्राफ्ट कैरियर बैटल ग्रुप और पनडुब्बियों को उत्तर अरब सागर में अग्रिम मोर्चे पर तैनात कर दिया। नौसेना पूरी तरह युद्धक तैयारी की स्थिति में थी और आदेश मिलने पर समुद्र तथा जमीन पर चुने गए टारगेट्स पर हमला करने की क्षमता रखती थी।

भारतीय नौसेना ने अपने युद्धपोतों, विमानों, स्पेस बेस्ड सिस्टम्स और तटीय संसाधनों की मदद से समुद्री क्षेत्र की लगातार निगरानी बनाए रखी। नौसेना की अग्रिम तैनाती से पाकिस्तान के लिए समुद्र में ऑपरेशन करना मुश्किल हो गया और समुद्र पर भारत का प्रभावी नियंत्रण स्थापित किया।

इसके अलावा, भारतीय नौसेना के स्पेशल फोर्सेज भी 6-7 मई 2025 को आतंकवादी इंफ्रास्ट्रक्चर पर किए गए सटीक हमलों का हिस्सा थे। इन अभियानों में उच्च सटीकता वाले हथियारों का इस्तेमाल किया गया था।

वहीं, इंडियन कोस्ट गार्ड ने भारतीय नौसेना के साथ मिलकर भारत के पश्चिमी समुद्री तट पर अपने संसाधनों को तैनात किया और निगरानी को और मजबूत किया। जिससे संवेदनशील क्षेत्रों में किसी भी शत्रुतापूर्ण समुद्री गतिविधि या खतरे को रोकने में मदद मिली।

वहीं, क्रीक क्षेत्र में भी आईसीजी ने संबंधित एजेंसियों के साथ समन्वय बनाकर लगातार निगरानी रखी और जरूरत पड़ने पर जमीनी बलों की तुरंत तैनाती के लिए पूरी तैयारी बनाए रखी। (Operation Sindoor Mod Report)

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान 220 यूएक्सओ को किया निष्क्रिय

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान काउंटर एक्सप्लोसिव डिवाइस यूनिट (सीईडीयू) की टीमों ने बड़ी संख्या में बिना फटे हथियारों और ड्रोन से जुड़े खतरों को सुरक्षित तरीके से निष्क्रिय किया। उत्तरी कमान (नॉर्दर्न कमांड) के जिम्मेदारी क्षेत्र में सीईडीयू टीमों ने 220 अनएक्सप्लोडेड ऑर्डनेंस (यूएक्सओ) यानी ऐसे बम, मिसाइल या गोला-बारूद जो फटे नहीं थे, उन्हें सुरक्षित रूप से नष्ट किया। वहीं पश्चिमी कमान (वेस्टर्न कमांड) क्षेत्र में 13 यूएक्सओ को सफलतापूर्वक निष्क्रिय किया गया।

इसके अलावा, उत्तरी कमान क्षेत्र में गिरे तीन ड्रोन के मलबे को भी सीईडीयू टीमों ने सुरक्षित बनाया और आगे की तकनीकी जांच के लिए संबंधित एजेंसियों को सौंप दिया। इन ड्रोन में लगे वारहेड (विस्फोटक हिस्से) को मौके पर ही नष्ट कर दिया गया।

जांच के दौरान एक ड्रोन की पहचान तुर्की निर्मित बायकर वाईआईएचए-III (Baykar YIHA III) के तौर पर की गई।
पश्चिमी कमान में सीईडीयू टीमों ने मिनी अकिली मुहिमाद (एमएएम) म्यूनिशन को भी निष्क्रिय किया। माना जाता है कि ये हथियार तुर्की के बायराक्तर टीबी-2 ड्रोन द्वारा दागे गए थे। इसके साथ ही टीमों ने दो पीएल-15 मिसाइलों को भी सुरक्षित तरीके से निष्क्रिय कर क्षेत्र को खतरे से मुक्त किया।

वहीं, भारतीय सेना ने साल 2025 में चिल्लम फील्ड फायरिंग रेंज की पूरी तरह से सफाई और सुरक्षा सुनिश्चित करने का अभियान भी पूरा किया। इस अभियान के तहत करीब 1.27 लाख वर्ग मीटर क्षेत्र की जांच की गई।

इस दौरान कुल 29 अनफटे बम (यूएक्सओ) और बड़ी मात्रा में धातु के टुकड़े (स्प्लिंटर्स) बरामद किए गए। बाद में इन सभी खतरनाक विस्फोटकों को कंट्रोल्ड एक्सप्लोजन तकनीक यानी नियंत्रित विस्फोट के जरिए सुरक्षित रूप से नष्ट कर दिया गया। (Operation Sindoor Mod Report)

9 मई को हुई थी डीएसी की विशेष बैठक

9 मई 2025 को रक्षा अधिग्रहण परिषद (डीएसी) की एक विशेष बैठक आयोजित की गई थी। इस बैठक में इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट (ईपी)-2025 के तहत सेना की तत्काल जरूरतों से जुड़े कई पूंजीगत खरीद मामलों को मंजूरी दी गई। यह फैसला ऑपरेशन सिंदूर के पहले चरण से मिले अनुभवों और सबक के आधार पर लिया गया। भारतीय सेना ने माना कि बदलते युद्धक्षेत्र में कुछ महत्वपूर्ण क्षमताओं को तेजी से मजबूत करने की जरूरत है। इसी कारण सेना की ताकत बढ़ाने के लिए विशेष और आधुनिक उपकरणों को शामिल करने की प्रक्रिया शुरू की गई।

इसमें अनमैन्ड एरियल सिस्टम (यूएएस) यानी ड्रोन, काउंटर-यूएएस (सी-यूएएस) यानी दुश्मन के ड्रोन को रोकने वाली प्रणालियां, लोइटर म्यूनिशन, एयर डिफेंस सिस्टम और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम शामिल थे। (Operation Sindoor Mod Report)

सेना का K-9 वज्र बनेगा और घातक; मिलने जा रहा है नया नेविगेशन अपग्रेड, शूट एंड स्कूट क्षमता होगी और मजबूत

K-9 Vajra Sigma 30N-600
Indian Army Initiates Procurement of Navigation System for K-9 Vajra Howitzers. (AI Generated Image)

K-9 Vajra Sigma 30N-600: भारतीय सेना अपने सबसे अहम सेल्फ प्रोपेल्ड आर्टिलरी प्लेटफॉर्म के-9 वज्र को और अधिक सटीक और आधुनिक बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठा रही है। सेना के सबसे आधुनिक और घातक सेल्फ प्रोपेल्ड आर्टिलरी सिस्टम को अब अत्याधुनिक नेविगेशन तकनीक से लैस करने की तैयारी शुरू हो गई है। रक्षा मंत्रालय के-9 वज्र हॉवित्जर के लिए फ्रांस की कंपनी साफरान से इनर्शियल नेविगेशन यूनिट खरीदने की तैयारी कर रहा है।

इस सिस्टम से के-9 वज्र को बैटलफील्ड में बिना बाहरी सिग्नल के भी अधिक सटीक लोकेशन, तुरंत तैनाती और टारगेट को सटीक निशाना बनाने में मदद मिलेगी।

K-9 Vajra Sigma 30N-600: K-9 वज्र के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह सिस्टम?

इंटीग्रेटेड हेडक्वॉर्टर (आर्मी) ने साफरान इलेक्ट्रॉनिक्स एंड डिफेंस के एडवांस इनर्शियल नेविगेशन यूनिट (आईएनयू) सिग्मा 30एन-600 18 यूनिट की सप्लाई के लिए सिंगल टेंडर इन्क्वायरी (टू बिड सिस्टम) के तहत आरएफपी जारी की है। यह प्रोक्योरमेंट दिसंबर 2024 में एलएंडटी के साथ हुए के-9 वज्र के रीपीट ऑर्डर से जुड़ा हुआ है।

इनर्शियल नेविगेशन यूनिट किसी भी बाहरी सिग्नल पर निर्भर हुए बिना प्लेटफॉर्म की स्थिति और दिशा का पता लगाता है। यदि दुश्मन जीपीएस को जाम भी कर दे या सैटेलाइट सिग्नल ब्लॉक कर दे, तब भी यह सिस्टम काम करता रहता है।

सेना का मानना है कि सिग्मा 30एन-600 लगाने के बाद के-9 वज्र की “शूट एंड स्कूट” क्षमता और बेहतर होगी। तोप तेजी से फायर करके तुरंत अपनी जगह बदल सकेगी, जिससे दुश्मन के जवाबी हमले से बचना आसान होगा।

क्या है सिग्मा 30N-600?

सिग्मा 30एन-600, फ्रांस की कंपनी साफरान का बनाया रिंग लेजर जाइरो (RLG) आधारित स्ट्रैपडाउन इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम है। इसे विशेष रूप से आर्टिलरी, मल्टीपल रॉकेट लॉन्चर, मोर्टार और सेल्फ प्रोपेल्ड तोपों के लिए डिजाइन किया गया है।

यह सिस्टम अत्यधिक चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में भी काम कर सकता है। यदि जीएनएसएस, जीपीएस या अन्य सैटेलाइट बेस्ड नेविगेशन सेवाएं उपलब्ध न हों, तब भी यह तोप को सटीक दिशा और स्थान की जानकारी देता रहता है। सिग्मा 30एन-600 का हेडिंग प्रिसिजन लगभग 0.9 मिल आरएमएस है, जबकि रोल और पिच प्रीसिजन लगभग 0.35 मिल आरएमएस है। इसका हॉरिजॉन्टल पोजिशन एरर लगभग 0.05 फीसदी दूरी (CEP) के आसपास है।

सिस्टम कुछ ही मिनटों में पूरी क्षमता से काम करने लगता है और इसकी बिजली खपत भी काफी कम है। इसे 18 से 32 वोल्ट पावर सप्लाई पर चलाया जा सकता है तथा इसकी खपत 30 वाट से कम रहती है। (K-9 Vajra Sigma 30N-600)

जीपीएस बंद होने पर भी जारी रहेगा ऑपरेशन

हाल के सालों में दुनिया भर के युद्धक्षेत्रों में इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर का महत्व तेजी से बढ़ा है। कई देशों ने ऐसे सिस्टम विकसित कर लिए हैं जो जीपीएस सिग्नलों को जैम या स्पूफ कर सकते हैं। ऐसे हालात में पारंपरिक नेविगेशन सिस्टम प्रभावित हो सकते हैं, लेकिन सिग्मा 30एन-600 पूरी तरह इनर्शियल प्रिंसिपल पर आधारित होने के चलते स्वतंत्र रूप से काम करता है।

यही वजह है कि भारतीय सेना के-9 वज्र के नए बैच में इस सिस्टम को शामिल कर रही है ताकि किसी भी परिस्थिति में तोप की मारक क्षमता प्रभावित न हो। (K-9 Vajra Sigma 30N-600)

नैविक-ग्लोनास रिसीवर भी मिलेगा

सेना की तरफ से जारी जरूरत के मुताबिक प्रत्येक इनर्शियल नेविगेशन यूनिट के साथ कई एसेसरीज भी दी जाएंगी। इनमें जीपीएस एंटीना, इंटरफेस केबल, माउंटिंग ब्रैकेट, आईसीसी (इंटरफेस कंट्रोल कंपोनेंट) तथा आईआरएनएसएस-ग्लोनास रिसीवर शामिल हैं।

आईआरएनएसएस यानी नैविक (NavIC) भारत की स्वदेशी सैटेलाइट नेविगेशन प्रणाली है। इसका इस्तेमाल भारतीय मिलिट्री प्लेटफॉर्मों में लगातार बढ़ाया जा रहा है। नैविक और रूसी ग्लोनास रिसीवर से यह फायदा होगा कि जरूरत पड़ने पर भारतीय सैटेलाइट नेटवर्क का भी इस्तेमाल किया जा सकेगा। (K-9 Vajra Sigma 30N-600)

जबलपुर में होगी डिलीवरी

सभी 18 यूनिट की डिलीवरी कॉन्ट्रैक्ट लागू होने के 18 महीने के भीतर पूरी करनी होगी। इन सिस्टमों की सप्लाई जबलपुर स्थित सेंट्रल ऑर्डनेंस डिपो को की जाएगी। साथ ही मूल निर्माता को सेना के ईएमई (इलेक्ट्रॉनिक्स एंड मैकेनिकल इंजीनियर्स) कर्मियों को इंस्टॉलेशन, फिटमेंट और रखरखाव का प्रशिक्षण भी देना होगा। कंपनी को दो सालों तक इंस्टॉलेशन और कमीशनिंग मदद निःशुल्क उपलब्ध करानी होगी। (K-9 Vajra Sigma 30N-600)

भारत में होगा निर्माण

दिसंबर 2025 में इंडिया ऑप्टेल लिमिटेड (IOL) और साफरान के बीच सिग्मा 30एन सिस्टम के प्रोडक्शन ट्रांसफर को लेकर समझौता हुआ था। इस समझौते के तहत भारत में सिस्टम की असेंबली, परीक्षण, रखरखाव और लाइफ-साइकिल सपोर्ट की व्यवस्था विकसित की जा रही है। ताकि भविष्य में इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम के अधिक हिस्सों का निर्माण भारत में ही किया जा सके। (K-9 Vajra Sigma 30N-600)

के-9 वज्र भारतीय सेना की प्रमुख सेल्फ प्रोपेल्ड गन

के-9 वज्र भारतीय सेना की सबसे आधुनिक 155 मिमी/52 कैलिबर ट्रैक्ड सेल्फ-प्रोपेल्ड हॉवित्जर है। इसे एलएंडटी ने दक्षिण कोरिया की हनव्हा एयरोस्पेस के सहयोग से विकसित किया है। पहली 100 के-9 वज्र तोपों की सप्लाई 2021 तक पूरी हो चुकी थी। इसके बाद दिसंबर 2024 में दूसरी खेप के लिए 100 अतिरिक्त तोपों का कॉन्ट्रैक्ट किया गया था। वहीं, सेना की योजना करीब 300 और तोपों का ऑर्डर देने की है, लेकिन अभी यह प्रोपेजल लेवल पर ही है। (K-9 Vajra Sigma 30N-600)

LAC के पास लद्दाख में आर्मी-ITBP की जॉइंट ड्रिल, एक्सरसाइज में इस्तेमाल हुए BMP-2 और मिसाइल सिमुलेटर

Army ITBP Joint Training Ladakh
Indian Army and ITBP Conduct Joint High-Altitude Training in Eastern Ladakh with BMP-2 and Missile Simulator. (AI Generated Image)

Army ITBP Joint Training Ladakh: भारतीय सेना अब दूसरे बलों के साथ जॉइंटनेस बढ़ाने पर फोकस कर रही है। सीआईएसएफ के बाद भारतीय सेना की फायर एंड फ्यूरी कॉर्प्स और भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) ने जॉइंट ट्रेनिंग में हिस्सा लिया। यह ट्रेनिंग एलएएसी के पास पूर्वी लद्दाख के रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण पुंगुक क्षेत्र में की गई।

इस अभ्यास में जवानों को इन्फैंट्री कॉम्बैट व्हीकल (आईसीवी) की क्षमताओं से परिचित कराया गया और इंटीग्रेटेड मिसाइल सिमुलेटर पर जॉइंट सिमुलेशन फायरिंग कराई गई। सेना के अनुसार इस गतिविधि का उद्देश्य दोनों बलों के बीच ऑपरेशनल समझ, समन्वय और इंटरऑपरेबिलिटी को मजबूत करना था।

Army ITBP Joint Training Ladakh: पूर्वी लद्दाख में बढ़ी संयुक्त तैयारी

यह अभ्यास ऐसे समय में हुआ है जब पूर्वी लद्दाख में भारतीय सेना और आईटीबीपी के बीच तालमेल बढ़ाने पर लगातार जोर दिया जा रहा है। साल 2020 के गलवान संघर्ष के बाद वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के आसपास सुरक्षा व्यवस्था और सैन्य तैनाती में बड़े बदलाव किए गए हैं।

उस दौरान भारतीय सेना ने पहली बार बड़ी संख्या में मैकेनाइज्ड प्लेटफॉर्म, टैंक और इन्फैंट्री कॉम्बैट व्हीकल्स को 14,000 फीट से अधिक ऊंचाई वाले इलाकों में लंबे समय तक तैनात किया था। ऐसे कठिन वातावरण में सेना और सीमा सुरक्षा बलों के बीच बेहतर तालमेल बनाए रखना एक अहम जरूरत बन गई है।

पूर्वी लद्दाख में सेना और आईटीबीपी के बीच समन्वय बढ़ाने के लिए हाल के सालों में कई संयुक्त अभ्यास आयोजित किए गए हैं। चुमार, चुशुल, चिशुमले और अन्य अग्रिम क्षेत्रों में भी दोनों बलों ने संयुक्त गतिविधियों में हिस्सा लिया है। (Army ITBP Joint Training Ladakh)

Army ITBP Joint Training Ladakh
Image Source: fire fury corps

पुंगुक इलाका क्यों है महत्वपूर्ण

पुंगुक पूर्वी लद्दाख के चांगथांग क्षेत्र में स्थित एक छोटा लेकिन रणनीतिक गांव है। यह हानले घाटी के पास लगभग 4,300 से 4,500 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। इसके पश्चिम में चुमार है। पुंगुक हानले क्लस्टर का हिस्सा है और एलएसी (चुमार सेक्टर) से इसकी दूरी लगभग 40 किलोमीटर है। यह फॉरवर्ड बॉर्डर जोन है, इसलिए आर्मी यहां मैकेनाइज्ड ट्रेनिंग भी करती है। यह इलाका अपनी खुली तथा पठारी भौगोलिक बनावट के कारण सैन्य गतिविधियों के लिए उपयुक्त समझा जाता है। (Army ITBP Joint Training Ladakh)

अभ्यास में शामिल हुई बीएमपी-2 सारथ आईसीवी

जॉइंट ट्रेनिंग के दौरान जिस बीएमपी-2 सारथ इन्फैंट्री कॉम्बैट व्हीकल का इस्तेमाल किया गया, वह भारतीय सेना की मैकेनाइज्ड इन्फैंट्री की रीढ़ माना जाता है। इस वाहन में 30 मिमी ऑटोमैटिक कैनन, कोंकर्स एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल सिस्टम, को-एक्सियल मशीन गन और स्मोक ग्रेनेड लॉन्चर लगे होते हैं। यह एक बार में लगभग 10 सैनिकों को युद्ध क्षेत्र तक पहुंचा सकता है।

मैदानी क्षेत्रों में इसकी अधिकतम गति लगभग 65 किलोमीटर प्रति घंटा तक होती है। हालांकि लद्दाख जैसे ऊंचे क्षेत्रों में कम ऑक्सीजन और अत्यधिक ठंड इंजन के प्रदर्शन को प्रभावित करती है। कई बार तापमान माइनस 30 से माइनस 40 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है, जिसके कारण वाहनों को विशेष रखरखाव की आवश्यकता होती है। (Army ITBP Joint Training Ladakh)

Army ITBP Joint Training Ladakh
Image Source: fire fury corps

इंटीग्रेटेड मिसाइल सिमुलेटर का हुआ इस्तेमाल

इस संयुक्त अभ्यास की एक खास बात इंटीग्रेटेड मिसाइल सिमुलेटर का इस्तेमाल रहा। यह एक आधुनिक ट्रेनिंग सिस्टम है, जो असली वेपन सिस्टम का एक्सपीरियंस देती है। वहीं इसमें इसमें वास्तविक गोला-बारूद खर्च नहीं होता। सिमुलेटर के जरिए जवान एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल फायरिंग, लक्ष्य पहचान, हथियार संचालन और युद्ध क्षेत्र की विभिन्न परिस्थितियों का अभ्यास कर सकते हैं।

उच्च हिमालयी क्षेत्रों में लाइव फायरिंग कई बार मौसम, सुरक्षा और लॉजिस्टिक कारणों से सीमित होती है। ऐसे में सिमुलेटर बेस्ड ट्रेनिंग सैनिकों को वास्तविक परिस्थितियों जैसी तैयारी उपलब्ध कराता है। इससे गोला-बारूद की बचत होती है और प्रशिक्षण की गुणवत्ता भी बेहतर रहती है। (Army ITBP Joint Training Ladakh)

फायर एंड फ्यूरी कॉर्प्स के अंडर में है यह इलाका

भारतीय सेना की 14वीं कॉर्प्स या फायर एंड फ्यूरी कॉर्प्स का मुख्यालय लेह में स्थित है। कारगिल युद्ध के बाद बनी इस कॉर्प्स की जिम्मेदारी सियाचिन ग्लेशियर, पाकिस्तान के साथ नियंत्रण रेखा और चीन के साथ लगी कुल 3,488 किलोमीटर की लगभग 832 किमी लंबी वास्तविक नियंत्रण रेखा की सुरक्षा करती है। जिसमें दौलत बेग ओल्डी (डीबीओ) से लेकर देमचोक तक का इलाका शामिल है।

गलवान संघर्ष के बाद इस कॉर्प्स की जिम्मेदारियां और बढ़ गईं। इसके तहत टी-72, टी-90 भीष्म टैंक और बीएमपी-2 सारथ जैसे प्लेटफॉर्म बड़ी संख्या में पूर्वी लद्दाख में तैनात किए गए। इतनी अधिक ऊंचाई पर मैकेनाइज्ड फोर्स का ऑपरेशन करना दुनिया की चुनिंदा सैन्य क्षमताओं में गिना जाता है। (Army ITBP Joint Training Ladakh)

Army ITBP Joint Training Ladakh
Image Source: fire fury corps

गलवान के बाद आईटीबीपी पर रहा फोकस

आईटीबीपी की स्थापना 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद की गई थी। यह बल चीन सीमा की निगरानी और सीमा प्रबंधन की जिम्मेदारी निभाता है। एलएसी पर आईटीबीपी को अक्सर भारत की पहली सुरक्षा पंक्ति माना जाता है।
आईटीबीपी काराकोरम पास और दौलत बेग ओल्डी (डीबीओ) से लेकर दक्षिण में देमचोक और चुमार तक करीब 832 किलोमीटर लंबे सीमावर्ती क्षेत्र में निगरानी और गश्त का काम करती है।

पूर्वी लद्दाख में पैंगोंग त्सो, चुशुल, चांगचेनमो, न्योमा, हानले, कोरजोक, पुंगुक, देमचोक और चुमार जैसे संवेदनशील इलाकों में आईटीबीपी की चौकियां मौजूद हैं। इन चौकियों की ऊंचाई लगभग 9,000 फीट से लेकर 18,900 फीट तक है, जहां जवान बेहद कठिन मौसम और ऑक्सीजन की कमी के बीच ड्यूटी करते हैं।

जून 2020 के गलवान घाटी संघर्ष के बाद लद्दाख में आईटीबीपी की तैनाती को काफी मजबूत किया गया। पहले जहां इस सेक्टर में लगभग तीन बटालियन तैनात थीं, वहीं बाद में इनकी संख्या बढ़ाकर सात बटालियन तक कर दी गई। इसके साथ ही एलएसी पर बॉर्डर आउटपोस्ट (बीओपी) की संख्या 180 से बढ़ाकर 215 की गई। केवल लद्दाख क्षेत्र में 2022 से 2024 के बीच 29 नई चौकियां स्थापित की गईं।

साथ ही, 2020 के बाद आईटीबीपी ने अपने विशेष शौर्य कमांडो प्लाटून भी तैयार किए हैं। इन जवानों को पर्वतीय युद्ध, ड्रोन ऑपरेशन और त्वरित प्रतिक्रिया अभियानों के लिए प्रशिक्षित किया जाता है। साथ ही, आईटीबीपी ने अपनी गश्त गतिविधियों में भी बड़ा विस्तार किया है। एलएसी के पास गश्त की संख्या लगभग तीन गुना बढ़ाई गई है और कई चौकियों को सीमा के और नजदीक स्थानांतरित किया गया है। (Army ITBP Joint Training Ladakh)

सीआईएसएफ के साथ जॉइंट ट्रेनिंग

इससे पहले इसी साल 27 जून को केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (सीआईएसएफ) कर्मी लद्दाख स्थित परशु ड्रोन ट्रेनिंग स्कूल में आयोजित विशेष यूएएस और काउंटर-यूएएस अवेयरनेस एवं ऑपरेशंस कैडर ट्रेनिंग में शामिल हुए थे। ऊंचाई वाले चुनौतीपूर्ण क्षेत्र में आयोजित इस ट्रेनिंग में ड्रोन ऑपरेशन, ड्रोन खतरों की पहचान और काउंटर-यूएएस के बारे में बताया गया था। यह ट्रेनिंग भारतीय सेना द्वारा अंतर-एजेंसी सहयोग को बढ़ावा देने, विशेषज्ञता साझा करने और जॉइंट ट्रेनिंग के माध्यम से राष्ट्रीय सुरक्षा क्षमताओं को मजबूत करने के लिए आयोजित की गई थी। (Army ITBP Joint Training Ladakh)

भारत-यूएई की बड़ी डील; कोच्चि में बनेगा इंटरनेशनल शिप रिपेयर हब, हर साल 80 जहाजों की होगी मरम्मत

Kochi Global Ship Repair Hub
India-UAE Partnership Boosts Maritime Sector: Cochin Shipyard and Drydocks World Launch Joint Venture to Build Global Ship Repair Hub in Kochi. (AI Generated Image)

Kochi Global Ship Repair Hub: भारत शिप रिपेयरिंग सेंटर का बड़ा हब बनने की तरफ तेजी से कदम बढ़ा रहा है। केंद्रीय बंदरगाह, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने भारत और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के बीच समुद्री क्षेत्र में बढ़ते सहयोग को नई दिशा देने वाला महत्वपूर्ण कदम बताया है। उन्होंने कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड (सीएसएल) और डीपी वर्ल्ड समूह की कंपनी ड्राईडॉक्स वर्ल्ड के बीच हुए जॉइंट वेंचर समझौते का स्वागत करते हुए कहा कि यह साझेदारी भारत के जहाज मरम्मत और जहाज निर्माण क्षेत्र को वैश्विक स्तर पर मजबूत बनाएगी।

यह समझौता कोचीन स्थित अंतरराष्ट्रीय शिप रिपेयर फैसिलिटी के ऑपरेशन और एक्सपेंशन के लिए किया गया है। नई दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान सोनोवाल ने कहा कि भारत और यूएई के संबंध विश्वास, सम्मान और लोगों के बीच मजबूत जुड़ाव पर आधारित हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में दोनों देशों के संबंधों को नई गति मिली है और अब यह साझेदारी व्यापार, निवेश, ऊर्जा, तकनीक और समुद्री सहयोग तक पहुंच चुकी है।

Kochi Global Ship Repair Hub: शिप रिपेयर सेक्टर में पहली पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप

सरकारी कंपनी कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड (सीएसएल) और दुबई की प्रमुख मेरीटाइम कंपनी ड्राईडॉक्स वर्ल्ड ने कोच्चि स्थित इंटरनेशनल शिप रिपेयर फैसिलिटी (आईएसआरएफ) के ऑपरेशन और एक्सपेंशन के लिए 50:50 जॉइंट वेंचर एग्रीमेंट पर दस्तखत किए हैं। यह भारत के शिप रिपेयर सेक्टर में अपनी तरह की पहली पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप मानी जा रही है।

यह समझौता नई दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स समिट 2026 के दौरान हुआ। इस कार्यक्रम में केंद्रीय बंदरगाह, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्री सर्बानंद सोनोवाल और संयुक्त अरब अमीरात के एडवांस्ड साइंस एंड टेक्नोलॉजी मामलों के सहायक विदेश मंत्री ओमरन शराफ अलहाशिमी भी मौजूद थे।

कोच्चि को अंतरराष्ट्रीय शिप रिपेयर सेंटर बनाने की तैयारी

इस साझेदारी का मुख्य उद्देश्य कोच्चि को भारत और हिंद महासागर क्षेत्र का प्रमुख शिप रिपेयर हब बनाना है। नई कंपनी “कोचीन दुबई इंटरनेशनल शिप रिपेयर फैसिलिटी” के नाम से काम करेगी। जॉइंट वेंचर के तहत इंटरनेशनल शिप रिपेयर फैसिलिटी की क्षमता बढ़ाई जाएगी ताकि भारतीय, क्षेत्रीय और वैश्विक ग्राहकों के जहाजों की मरम्मत, अपग्रेड और मेंटेनेंस का काम बड़े स्तर पर किया जा सके।

इसकी वजह है कि भारत की भौगोलिक स्थिति दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री व्यापार मार्गों के बीच है। ऐसे में अगर बड़े जहाजों को रिपेयर और मेंटेनेंस की सुविधाएं भारत में उपलब्ध होती हैं तो विदेशी जहाज को सिंगापुर, दुबई या अन्य देशों की बजाय भारतीय बंदरगाहों का रुख कर सकते हैं।

Kochi Global Ship Repair Hub
CSL and Dry docks World. a DP World company, have signed a Joint Venture Agreement for Ship Repair Operations at the International Shiprepair Facility (ISRF) of CSL at Kochi. (Image: CSL)

हर साल 80 से अधिक जहाजों की मरम्मत

केंद्रीय बंदरगाह, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने भारत और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के बीच समुद्री क्षेत्र में बढ़ते सहयोग को नई दिशा देने वाला महत्वपूर्ण कदम बताया है। साथ ही यह केरल के लिए एक बड़ा अवसर है, जिससे वह मैरीटाइम सर्विसेज का प्रमुख केंद्र बन सकता है। सोनोवाल ने बताया कि शुरुआती चरण में यहां हर साल 80 से अधिक जहाजों की मरम्मत किए जाने का लक्ष्य रखा गया है। वहीं, फैसिलिटी को वर्तमान छह वर्कस्टेशन से बढ़ाकर 16 वर्कस्टेशन तक बढ़ाया जाएगा।

उन्होंने कहा कि यदि यह मॉडल सफल रहता है तो इसे भारत के अन्य मेरीटाइम सेंटर्स पर भी लागू किया जा सकता है।

उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में दोनों देशों के संबंधों को नई गति मिली है और “रिफॉर्म, परफॉर्म और ट्रांसफॉर्म” के सिद्धांत पर काम करते हुए देश पोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत कर रहा है, प्रक्रियाओं को आसान बना रहा है और दीर्घकालिक वैश्विक निवेश को आकर्षित कर रहा है।

“मदर इंडस्ट्री” है शिप रिपेयरिंग और मैन्युफैक्चरिंग

सोनोवाल ने कहा कि जहाज निर्माण और जहाज रेपेयरिंग सेक्टर को भारी इंजीनियरिंग उद्योगों की “मदर इंडस्ट्री” कहा जाता है, क्योंकि यह स्टील, मशीनरी, इलेक्ट्रिकल सिस्टम, डिजाइन, लॉजिस्टिक्स और कई अन्य क्षेत्रों को सपोर्ट देता है।

सोनोवाल ने बताया कि जहाज निर्माण उद्योग का एम्प्लॉयमेंट मल्टीप्लायर लगभग 6.4 है, जबकि इकोनॉमिक मल्टीप्लायर 1.8 के आसपास माना जाता है। इसका मतलब है कि इस क्षेत्र में निवेश से बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा होते हैं और आर्थिक गतिविधियां बढ़ती हैं। उन्होंने कहा कि यह क्षेत्र तटीय इलाकों में रोजगार सृजित करता है, विदेशी मुद्रा अर्जित करता है और देश की रणनीतिक स्वतंत्रता को भी मजबूत बनाता है।

2030 तक दुनिया के टॉप 10 शिप बिल्डिंग देशों में शामिल होगा देश

सोनोवाल ने कहा कि सरकार मैरिटाइम इंडिया विजन 2030 और मैरिटाइम अमृतकाल विजन 2047 के तहत काम कर रही है। इन योजनाओं के तहत देश में नए शिपयार्ड विकसित किए जा रहे हैं, जहाज निर्माण क्लस्टर बनाए जा रहे हैं और शिप रिपेयर सुविधाओं का आधुनिकीकरण किया जा रहा है।

सोनोवाल ने बताया कि देश के शिप रिपेयर नेटवर्क को मजबूत करने के लिए गुजरात के वाडिनार में लगभग 1,570 करोड़ रुपये की लागत से नई सुविधा विकसित की जा रही है। यह परियोजना भारतीय बंदरगाह प्राधिकरण और कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड के सहयोग से आगे बढ़ाई जा रही है।

उन्होंने कहा कि भारत का लक्ष्य साल 2030 तक दुनिया के शीर्ष 10 जहाज निर्माण देशों में शामिल होना और 2047 तक टॉप 5 देशों में जगह बनाना है।

इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए केंद्र सरकार ने जहाज निर्माण क्षेत्र के लिए लगभग 70,000 करोड़ रुपये के पैकेज को मंजूरी दी है। साथ ही पांच शिपबिल्डिंग क्लस्टरों को सिद्धांततः स्वीकृति भी दी जा चुकी है।

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड ने पिछले पांच दशकों में 400 से अधिक जहाज निर्माण परियोजनाएं पूरी की हैं और 2,600 से ज्यादा शिप रिपेयर, रिफिट तथा कन्वर्जन प्रोजेक्ट पूरे कर चुकी है। वहीं ड्राईडॉक्स वर्ल्ड ने दुनियाभर में 9,000 से अधिक परियोजनाएं पूरी की हैं।

उन्होंने कहा कि स्वदेशी विमानवाहक पोत आईएनएस विक्रांत का निर्माण भारत की एडवांस शिप बिल्डिंग क्षमता का सबसे बड़ा उदाहरण है। सीएसएल का शिप रिपेयर नेटवर्क मुंबई, कोलकाता और अन्य स्थानों तक फैला हुआ है। कोच्चि में विकसित की जा रही अंतरराष्ट्रीय शिप रिपेयर सुविधा इस क्षमता को और मजबूत करेगी।

तूतीकोरिन में नई फैसिलिटी बना रही ड्राईडॉक्स वर्ल्ड

पोर्ट्स, शिपिंग और वाटरवेज के सचिव विजय कुमार ने कहा कि ड्राईडॉक्स वर्ल्ड पहले से ही भारत के पश्चिमी तट पर एक बड़ी सुविधा विकसित कर रहा है। इसके अलावा तूतीकोरिन में भी नई फैसिलिटी बनाने की योजना पर काम चल रहा है। उन्होंने उम्मीद जताई कि कोच्चि में इस मॉडल की सफलता के बाद इसे देश के अन्य तटीय क्षेत्रों में भी लागू किया जा सकेगा।

उन्होंने बताया कि सरकारी योजना के तहत अब तक 100 से अधिक जहाजों को मंजूरी मिल चुकी है। इन परियोजनाओं का कुल निवेश 12,000 करोड़ रुपये से अधिक है। वहीं, इन जहाजों में से लगभग 80 प्रतिशत जहाज निर्यात के लिए बनाए जा रहे हैं।

पांच बड़े शिपयार्ड क्लस्टर को मंजूरी

उन्होंने बताया कि सरकार ने शिपबिल्डिंग क्षमता बढ़ाने के लिए नई और मौजूदा दोनों तरह की सुविधाओं के विकास की योजना बनाई है। इसके तहत महाराष्ट्र, गुजरात, ओडिशा, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में पांच बड़े शिपयार्ड क्लस्टर को मंजूरी दी जा चुकी है। इन परियोजनाओं में कई अंतरराष्ट्रीय कंपनियां भी रुचि दिखा रही हैं।

सचिव विजय कुमार ने बताया कि दक्षिण कोरिया की दुनिया की अग्रणी जहाज निर्माण कंपनी एचडी ह्युंडई ने तमिलनाडु में परियोजना के लिए समझौता किया है और इसके लिए विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार की जा रही है।

इसके अलावा इटली और लेबनान की कई कंपनियों ने भी भारत के समुद्री क्षेत्र में निवेश में रुचि दिखाई है। उन्होंने कहा कि भारत के जहाज निर्माण और समुद्री उद्योग में वैश्विक निवेशकों की दिलचस्पी लगातार बढ़ रही है।

उन्होंने बताया कि सरकार केवल उत्पादन क्षमता बढ़ाने पर ही ध्यान नहीं दे रही है, बल्कि मांग तैयार करने पर भी काम कर रही है। सरकारी एजेंसियों की जरूरतों को जोड़कर लगभग 400 जहाजों की मांग तैयार की गई है। इस मांग से 2 लाख करोड़ रुपये से अधिक का निवेश पैदा होने की संभावना है। इससे देश के शिपयार्ड, जहाज मरम्मत इकाइयों और संबंधित उद्योगों को बड़े पैमाने पर कारोबार मिलेगा।

भारत और यूएई संबंध होंगे मजबूत

यूएई के सहायक विदेश मंत्री ओमरन शराफ अलहाशिमी ने कहा, “भारत और यूएई के बीच लंबे समय से भरोसे और सहयोग पर आधारित संबंध हैं। यह जॉइंट वेंचर दिखाता है कि दोनों देश औद्योगिक क्षेत्र में मिलकर ठोस परिणाम हासिल कर सकते हैं।”

वहीं, कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक (सीएमडी) जोस वीजे ने कहा, “ड्राईडॉक्स वर्ल्ड दुबई के साथ यह संयुक्त उद्यम भारत के वैश्विक शिप रिपेयर हब बनने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है।

कोचीन शिपयार्ड के घरेलू अनुभव और ड्राईडॉक्स वर्ल्ड की विश्वस्तरीय विशेषज्ञता को मिलाकर हम केवल कारोबार का विस्तार नहीं कर रहे हैं, बल्कि वैश्विक स्तर की कार्यप्रणालियों को अपना रहे हैं, जहाजों की मरम्मत में लगने वाला समय कम कर रहे हैं और गुणवत्ता तथा सुरक्षा के नए मानक स्थापित कर रहे हैं।

उन्होंने कहा, कोच्चि स्थित इंटरनेशनल शिप रिपेयर फैसिलिटी को केंद्र में रखकर यह साझेदारी एक मजबूत रिपेयर क्लस्टर विकसित करेगी, अंतरराष्ट्रीय जहाजों को आकर्षित करेगी, उच्च कौशल वाले रोजगार पैदा करेगी और ‘मैरीटाइम इंडिया विजन 2030’ तथा ‘अमृत काल 2047’ के लक्ष्यों को आगे बढ़ाएगी।

2025 के एमओयू से शुरू हुई थी साझेदारी

भारत मैरीटाइम वीक 2025 के दौरान ड्राईडॉक्स वर्ल्ड और कोचीन शिपयार्ड के बीच एक मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग (एमओयू) पर हस्ताक्षर हुए थे। उस समय दोनों कंपनियों ने शिप रिपेयर और समुद्री सेवाओं के क्षेत्र में सहयोग की संभावनाओं पर काम करने पर सहमति जताई थी। करीब एक साल की चर्चा और मूल्यांकन के बाद अब इस सहयोग को औपचारिक रूप से जॉइंट वेंचर का रूप दिया गया है।

कोच्चि स्थित इंटरनेशनल शिप रिपेयर फैसिलिटी भारत की सबसे आधुनिक शिप रिपेयर सुविधाओं में से एक मानी जाती है। यहां अत्याधुनिक शिप लिफ्ट सिस्टम और आधुनिक डॉकिंग इंफ्रास्ट्रक्चर मौजूद है। इस सुविधा में विभिन्न प्रकार के व्यापारिक जहाजों, ऑफशोर सपोर्ट वेसल, टैंकर, कंटेनर जहाज और विशेष समुद्री प्लेटफॉर्म की मरम्मत की जा सकती है।

शिप लिफ्ट सिस्टम की मदद से जहाजों को पानी से बाहर निकालकर तेजी से निरीक्षण, मरम्मत और अपग्रेड का काम किया जा सकता है। इससे जहाजों का डाउनटाइम कम होता है और ऑपरेटरों की लागत भी घटती है।

बता दें कि ड्राईडॉक्स वर्ल्ड दुबई के पोर्ट राशिद के पास स्थित 200 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला हुआ है। इसके पास पांच बड़े ड्राईडॉक और 3,700 मीटर से अधिक बर्थ स्पेस है।

यह फैसलिटी एक समय में दुनिया के सबसे बड़े जहाजों समेत 10 अल्ट्रा लार्ज क्रूड कैरियर जहाजों को संभाल सकती है। कंपनी ऑफशोर विंड एनर्जी प्लेटफॉर्म, ऑयल एंड गैस स्ट्रक्चर और बड़े समुद्री इंजीनियरिंग प्रोजेक्ट्स में भी सक्रिय है। (Kochi Global Ship Repair Hub)

कोर्टरूम से परेड ग्राउंड तक: वकालत छोड़ चुनी वर्दी, कैसे लंबी कानूनी लड़ाई के बाद भारतीय सेना में लेफ्टिनेंट बनीं सीरत कौर

Seerat Kaur Indian Army Lieutenant
From Supreme Court to OTA: How a women Overcame Legal Hurdles to Become an Indian Army Lieutenant.

Seerat Kaur Indian Army Lieutenant: भारतीय सेनाओं में अफसर बनना केवल पुरुषों का बल्कि महिलाओं का भी सपना होता है। लेकिन सेनाओं में एंट्री पाना आज भी महिलाओं के लिए इतना आसान नहीं है। इनमें से एक हैं सीरत कौर, जिन्हें वकील होने के बाद भी सेना में जाने का अपना सपना पूरा करने के लिए कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी। हाल ही में 5 सितंबर को जब सीरत कौर को भारतीय सेना की जज एडवोकेट जनरल (जेएजी) ब्रांच में लेफ्टिनेंट के रूप में कमीशन मिला, तब उसके पीछे लगभग दो साल की लंबी लड़ाई थी।

24 वर्षीय सीरत कौर का सेना तक पहुंचने का सफर परेड ग्राउंड से नहीं, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के कोर्टरूम से शुरू हुआ था। उन्होंने न केवल भारतीय सेना की कठिन चयन प्रक्रिया का सामना किया, बल्कि अपने अधिकारों के लिए देश की सर्वोच्च अदालत तक भी लड़ाई लड़ी।

Seerat Kaur Indian Army Lieutenant: कानून की पढ़ाई से शुरू हुआ सफर

सीरत कौर ने गुरु गोबिंद सिंह इंद्रप्रस्थ यूनिवर्सिटी से कानून की पढ़ाई की। उन्होंने फर्स्ट डिवीजन के साथ एलएलबी पूरी की। अक्टूबर 2023 से मई 2025 तक उन्होंने भारत के सुप्रीम कोर्ट में लॉ क्लर्क-कम-रिसर्च एसोसिएट के तौर पर काम किया। इस दौरान उन्हें देश की सर्वोच्च अदालत की कार्यप्रणाली को करीब से समझने का मौका मिला। लेकिन हालांकि उनका सपना भारतीय सेना में अफसर बनना था। और अपने इसी सपने को पूरा करने के लिए उन्होंने सेना की जेएजी ब्रांच के रिक्रूटमेंट प्रोसेस में हिस्सा लिया।

जेएजी-35 की मेरिट लिस्ट में वे छठवें नंबर पर

भारतीय सेना की जेएजी ब्रांच उन अधिकारियों के लिए होती है जो सेना में कानूनी मामलों को संभालते हैं। यह सेना की सबसे प्रतिष्ठित तकनीकी शाखाओं में गिनी जाती है।

जेएजी-35 के रिक्रूटमेंट में सीरत कौर ने कुल 432 अंक हासिल किए। वहीं जॉइंट मेरिट लिस्ट में वे छठवें नंबर पर थीं। वहीं, महिला कैंडिडेट्स में उन्हें पांचवां स्थान मिला। खास बात यह है कि उनका स्कोर तीसरे स्थान पर रहे पुरुष कैंडिडेट और चौथे नंबर की महिला कैंडिडेट के बराबर था। कुल आठ उम्मीदवारों की सिफारिश की गई थी और सीरत उन आठ में शामिल थीं।

अमूमन ऐसे हालात में इतनी ऊंची मेरिट में नाम होने पर सिलेक्शन को पक्का मान लिया जाता है। लेकिन महिला होने के नाते उनके लिए ये चुनौतियों की शुरुआत थी। क्योंकि उस समय जेएजी-35 के रिक्रूटमेंट प्रोसेस में महिलाओं के लिए केवल चार पद निर्धारित थे। उन चारों पदों पर उनसे ऊपर रैंक वाली महिला उम्मीदवारों का चयन हो गया। लेकिन जॉइंट मेरिट सूची में छठवें स्थान पर होने के बावजूद सीरत को जॉइनिंग लेटर नहीं मिला। (Seerat Kaur Indian Army Lieutenant)

मामला पहुंचा सुप्रीम कोर्ट

सीरत कौर ने इस फैसले को चुनौती देने का फैसला किया। उनका कहना था कि जब पुरुष और महिला उम्मीदवारों का मूल्यांकन एक समान मानदंडों पर किया गया है, तब केवल तय महिला कोटा के आधार पर अवसर सीमित करना महिलाओं के प्रति अप्रत्यक्ष भेदभाव माना जा सकता है।

खास बात यह थी कि यह मामला ऐसे समय में सामने आया जब सेना की जेएजी रिक्रूटमेंट सिस्टम को लेकर पहले से बहस चल रही थी।

खुद सीरत के लिए कानूनी लड़ाई लड़ने का फैसला आसान नहीं था, लेकिन बावजूद इसके उन्होंने अपने अधिकारों के लिए लड़ने का फैसला लिया।

अगस्त 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने अर्शनूर कौर मामले में कहा था कि भविष्य की जेएजी की भर्तियों में पुरुष और महिला उम्मीदवारों के लिए जॉइंट मेरिट लिस्ट का सिस्टम अपनाया जाना चाहिए। हालांकि केंद्र सरकार ने अदालत में कहा कि यह फैसला भविष्य की भर्तियों पर लागू होगा और पहले से शुरू हो चुकी भर्ती प्रक्रिया पर इसे लागू नहीं किया जा सकता।

अदालत ने दिया बड़ा मौका

मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन था। इसी दौरान 26 सितंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने एक अंतरिम आदेश जारी किया। अदालत ने सीरत कौर को जरूरी औपचारिकताएं पूरी करने की शर्त पर चेन्नई स्थित ऑफिसर्स ट्रेनिंग अकादमी (ओटीए) में शुरू होने वाले ट्रेनिंग कोर्स में अस्थायी रूप से शामिल होने की अनुमति दे दी।

यह कोर्स 1 अक्टूबर 2025 से शुरू होना था।

उस समय तक यह स्पष्ट नहीं था कि अंतिम फैसला उनके पक्ष में आएगा या नहीं। इसके बावजूद उन्हें ट्रेनिंग में शामिल होने का मौका मिला।

बता दें कि सीरत कौर के पिता और भाई पहले से भारतीय सेना में हैं। उन्हीं से उन्हें अधिकारी बनने की प्रेरणा मिली।

ट्रेनिंग के दौरान भी बनी रही अनिश्चितता

ओटीए चेन्नई में प्रवेश मिलने के बाद भी सीरत के सामने चुनौतियां खत्म नहीं हुईं। उन्हें पता था कि अदालत का आखिरी फैसला आना अभी बाकी है। इसके बावजूद उन्होंने बाकी कैडेट्स की तरह पूरी मेहनत के साथ ट्रेनिंग जारी रखी।

ट्रेनिंग के दौरान सीरत को यह भी साबित करना था कि वे भी उन्हीं में से एक हैं। ट्रेनिंग का हर दिन उनके लिए नई चुनौती लेकर आता था और उन्होंने हर चुनौती का सामना किया।

ओटीए की ट्रेनिंग शारीरिक, मानसिक और प्रोफेशनल लेवल पर बेहद मुश्किल मानी जाती है। सुबह की ड्रिल, फिजिकल ट्रेनिंग, मिलिट्री एक्सरसाइज, लीडरशिप ट्रेनिंग और अनुशासन से भरा रुटीन हर कैडेट की परीक्षा लेता है।

सीरत ने इन सभी चुनौतियों का सामना उसी समय किया, जब उनके भविष्य को लेकर कानूनी अनिश्चितता भी बनी हुई थी। (Seerat Kaur Indian Army Lieutenant)

खारिज कर दी याचिका

14 अक्टूबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने अपना अंतिम फैसला सुनाया। अदालत ने सीरत कौर की याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने माना कि अर्शनूर कौर मामले में दिए गए जेंडर-न्यूट्रल भर्ती संबंधी निर्देश भविष्य की भर्ती प्रक्रियाओं पर लागू होंगे और जेएजी-35 की रिक्रूटमेंट साइकल को प्रभावित नहीं करेंगे।

कागजों पर यह फैसला सीरत के खिलाफ गया।

लेकिन अदालत ने मामले की विशेष परिस्थितियों को भी ध्यान में रखा। चूंकि सीरत अदालत के अंतरिम आदेश के आधार पर ट्रेनिंग शुरू कर चुकी थीं, इसलिए उन्हें “बहुत विशेष मामला” मानते हुए 11 महीने की ट्रेनिंग पूरा करने की अनुमति दी गई।

अदालत ने स्पष्ट किया कि इससे उन्हें ऑटोमैटिक प्लेसमेंट का अधिकार नहीं मिलेगा। हालांकि अगर चयनित उम्मीदवारों में से कोई बाहर होता है, अयोग्य घोषित होता है या कोई उपयुक्त रिक्ति उपलब्ध होती है, तो ट्रेनिंग सफलतापूर्वक पूरा करने के बाद उनके मामले पर विचार किया जा सकता है। (Seerat Kaur Indian Army Lieutenant)

नहीं मानी हार, ट्रेनिंग जारी रखी

कई लोगों के लिए यह स्थिति ट्रामा वाली होती है। लेकिन हिम्मत हारने की बजाय सीरत ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने पूरी शिद्दत के साथ अपनी ट्रेनिंग जारी रखी। हर एक्सरसाइज, हर एग्जाम और हर सैन्य चुनौती को सफलतापूर्वक पार किया। और अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए खुद को और ज्यादा मेहनत करने के लिए प्रेरित किया। (Seerat Kaur Indian Army Lieutenant)

आखिरकार मिला सेना का कमीशन

लगभग एक साल की मुश्किल ट्रेनिंग पूरी करने के बाद सीरत कौर का सपना साकार हुआ। इस साल 5 सितंबर को उन्हें भारतीय सेना की जज एडवोकेट जनरल ब्रांच में लेफ्टिनेंट के रूप में कमीशन प्रदान किया गया। (Seerat Kaur Indian Army Lieutenant)

इसके साथ ही वह आधिकारिक रूप से भारतीय सेना की अधिकारी बन गईं।

जिस उम्मीदवार को कभी मेरिट सूची में जगह मिलने के बावजूद नियुक्ति पत्र नहीं मिला था, वही अब सेना की वर्दी पहनकर देश की सेवा के लिए तैयार थी।

भारतीय सेना में अधिकारी बनने के लिए सीरत कौर ने जिन मुश्किलों का सामना किया, वह वाकई प्रेरणा देने वाला है। अपने सपने को पूरा करने वाले इस सफर में सीरत ने न केवल अपनी योग्यता साबित की, बल्कि निराशा का भी सामना किया। कानूनी लड़ाई भी लड़ी और धैर्य भी बनाए रखा। (Seerat Kaur Indian Army Lieutenant)

वायुसेना को चाहिए फिक्स्ड विंग हाई एल्टीट्यूड स्यूडो सैटेलाइट, 23 किमी ऊपर से होगी लगातार निगरानी, जारी हुआ EoI

FW-HAPS India
The Air Force needs a fixed-wing high-altitude pseudo-satellite for continuous surveillance from 23 km above; EoI issued

FW-HAPS India: भारतीय वायुसेना अब तेजी से हाई एल्टीट्यूड स्यूडो सैटेलाइट्स (HAPS) पर फोकस कर रही है। एयर शिप-हैप्स के बाद वायुसेना फिक्स्ड-विंग बेस्ड हाई एल्टीट्यूड स्यूडो सैटेलाइट (FW-HAPS) पर काम कर रही है। वायुसेना ऐसे प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल सर्विलांस और कम्युनिकेशन के लिए करना चाहती है। हाल ही में रक्षा मंत्रालय ने इसके डिजाइन और डेवलपमेंट के लिए मेक-I श्रेणी में इंडस्ट्री से एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (ईओआई) जारी किया है। ये हाईटेक प्लेटफॉर्म जमीन से करीब 18 से 23 किलोमीटर की ऊंचाई पर लंबे समय तक उड़ सकते हैं।

इससे पहले 3 जुलाई को रक्षा अधिग्रहण परिषद (DAC) ने भारतीय वायुसेना के लिए FW-HAPS की खरीद को आवश्यकता की स्वीकृति (AoN) दिया था। डीएसी की तरफ से करीब 52,000 करोड़ रुपये के कई रक्षा प्रस्तावों को मंजूरी दी गई थी।

FW-HAPS India: क्या है FW-HAPS?

FW-HAPS बेहद ऊंचाई पर उड़ने वाला सोलर-पावर्ड अनमैन्ड एयरक्राफ्ट है। यह सामान्य ड्रोन से काफी ऊपर और सैटेलाइट से काफी नीचे उड़ता है। इसी वजह से इसे स्यूडो सैटेलाइट यानी छद्म उपग्रह कहा जाता है।

आमतौर पर ऐसे प्लेटफॉर्म करीब 18 से 23 किलोमीटर, यानी लगभग 60,000 से 75,000 फीट की ऊंचाई पर ऑपरेट करने के लिए डिजाइन किए जाते हैं। इतनी ऊंचाई पर उड़ने की वजह से यह एक बड़े इलाके पर लंबे समय तक नजर रख सकता है। FW-HAPS का इस्तेमाल लगातार इंटेलिजेंस, सर्विलांस एंड रिकॉनिसेंस यानी ISR, दूरसंचार और रिमोट सेंसिंग जैसे कामों के लिए किया जाएगा।

इसकी खासियत यह है कि यह सैटेलाइट की तरह अंतरिक्ष में नहीं जाता। यह एक विमान की तरह उड़ता है और जरूरत के हिसाब से इसकी जगह बदली जा सकती है। दिन के समय इसके बड़े विंग्स पर लगे सोलर पैनल बिजली पैदा करते हैं और बैटरियों को चार्ज करते हैं। रात में यही बैटरी इलेक्ट्रिक मोटर, एवियोनिक्स और मिशन पेलोड को एनर्जी देती है।

ऑपरेशन सिंदूर से मिला सबक

ऑपरेशन सिंदूर और हाल के सैन्य संघर्षों ने यह साबित किया है कि दुश्मन की गतिविधियों पर लगातार और रियल-टाइम नजर रखना कितना महत्वपूर्ण है। इसके लिए इंटेलिजेंस, निगरानी और टोही (आईएसआर) क्षमताओं का मजबूत होना जरूरी है।

फिलहाल इस्तेमाल होने वाले हाई एल्टीट्यूड ड्रोन आमतौर पर करीब 12 किलोमीटर की ऊंचाई तक उड़ते हैं और हवा में लंबे समय तक नहीं रह पाते। दूसरी ओर, सैटेलाइट बहुत महंगे होते हैं। उन्हें किसी नए क्षेत्र पर तुरंत फोकस करना आसान नहीं होता और वे हर समय एक ही इलाके की निगरानी भी नहीं कर सकते।

ऐसे में फिक्स्ड-विंग हाई एल्टीट्यूड प्सूडो सैटेलाइट (एफडब्ल्यू-एचएपीएस) इस कमी को पूरा कर सकता है। यह एक ऐसा प्लेटफॉर्म है जो बहुत अधिक ऊंचाई पर लंबे समय तक उड़ते हुए लगातार निगरानी कर सकता है।

ड्रोन और सैटेलाइट के बीच की कड़ी

FW-HAPS को समझने के लिए इसे ड्रोन और सैटेलाइट के बीच की कड़ी माना जा सकता है। सामान्य निगरानी ड्रोन अपेक्षाकृत कम ऊंचाई पर उड़ते हैं और उनका एंड्योरेंस सीमित होता है। दूसरी तरफ सैटेलाइट बहुत ज्यादा ऊंचाई पर मौजूद होते हैं और उन्हें किसी खास इलाके पर लगातार निगरानी के लिए तुरंत रीपोजीशन करना आसान नहीं होता।

FW-HAPS इन दोनों के बीच एक अलग क्षमता देता है। यह एक ही इलाके के ऊपर लंबे समय तक रह सकता है और जरूरत के अनुसार अपना मिशन बदला जा सकता है।

भारतीय वायुसेना इसके जरिए सीमा पर दुश्मन सैनिकों की गतिविधि, सैन्य वाहनों की आवाजाही, एयरबेस, समुद्री क्षेत्र और दूसरे महत्वपूर्ण इलाकों पर लगातार नजर रख सकती है। (FW-HAPS India)

इतनी ऊंचाई पर उड़ने का फायदा

18 से 23 किलोमीटर की ऊंचाई पर उड़ने से FW-HAPS को जमीन के मुकाबले काफी बड़ा विजुअल एरिया मिलता है। इसमें लगे सेंसर दूर तक निगरानी कर सकते हैं।

इस प्लेटफॉर्म में इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल और इंफ्रारेड कैमरे, सिंथेटिक अपर्चर रडार, इलेक्ट्रॉनिक इंटेलिजेंस (ईएलआईएनटी), कम्युनिकेशन इंटेलिजेंस (कॉमिंट) सिस्टम और कम्युनिकेशन रिले उपकरण लगाए जा सकते हैं।

इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल कैमरा दिन में तस्वीरें लेने के लिए उपयोगी होता है, जबकि इंफ्रारेड सेंसर रात में और गर्मी के अंतर के आधार पर टारगेट की पहचान में मदद करता है। SAR रडार आधारित इमेजिंग करता है और खराब मौसम या कम रोशनी में भी निगरानी की क्षमता देता है।

कम्युनिकेशन रिले के तौर पर FW-HAPS अलग-अलग सैन्य यूनिट्स के बीच डेटा लिंक बनाए रखने में भी मदद कर सकता है। (FW-HAPS India)

सोलर पावर से चलेगा पूरा सिस्टम

FW-HAPS की सबसे मुश्किल टेक्नोलॉजी इसका एनर्जी सिस्टम है। प्लेटफॉर्म को कई दिनों या हफ्तों तक हवा में रखना है, लेकिन इसके लिए लगातार ईंधन भरना संभव नहीं है। इसलिए इसके विंग पर बड़े सोलर पैनल लगाए जाते हैं। दिन में सूर्य की रोशनी से बिजली बनती है। इसी बिजली से मोटर और दूसरे सिस्टम चलते हैं और अतिरिक्त ऊर्जा बैटरी में जमा होती है।

रात के समय सोलर पैनल बिजली नहीं बनाते, इसलिए बैटरी सिस्टम को ऊर्जा देता है। इसका मतलब है कि सोलर सेल, बैटरी, इलेक्ट्रिक मोटर और फ्लाइट कंट्रोल सिस्टम को बेहद कम वजन और कम ऊर्जा खपत के साथ डिजाइन करना पड़ता है। (FW-HAPS India)

स्ट्रेटोस्फियर में उड़ना आसान नहीं

FW-HAPS की असली तकनीकी चुनौती इसकी ऊंचाई है। स्ट्रेटोस्फियर में हवा काफी पतली होती है। कम हवा में विमान को पर्याप्त लिफ्ट देने के लिए इसका विंग बहुत बड़ा लेकिन बेहद हल्का रखना पड़ता है।

इसके साथ ही प्लेटफॉर्म को तेज हवाओं, कम तापमान और लंबे समय तक लगातार उड़ान की स्थिति झेलनी होती है। वजन बढ़ने पर ज्यादा एनर्जी चाहिए और एनर्जी की जरूरत बढ़ने पर सोलर पैनल और बैटरी का आकार बढ़ता है। इससे फिर विमान का वजन बढ़ जाता है।

यही वजह है कि HAPS के डिजाइन में लाइटवेट कंपोजिट मटेरियल, हाई एफिशिएंसी इलेक्ट्रिक मोटर, एडवांस्ड बैटरी और ऑटोनॉमस फ्लाइट कंट्रोल बेहद महत्वपूर्ण तकनीकें हैं। (FW-HAPS India)

AS-HAPS से कैसे अलग है FW-HAPS?

भारत न सिर्फ फिक्स्ड-विंग HAPS बल्कि एयरशिप बेस्ड AS-HAPS पर भी अलग कार्यक्रम चल रहा है। फरवरी 2026 में डीएसी ने एयरशिप बेस्ड HAPS कार्यक्रम को मंजूरी दी थी।

लेकिन दोनों की बनावट और इस्तेमाल अलग है। एयरशिप बेस्ड हैप्स हल्के-से-हवा वाले एयरशिप की तरह होता है और लंबे समय तक किसी इलाके के ऊपर लगभग स्थिर रह सकता है। इसके विपरीत फिकस्ड विंग-हैप्स विमान जैसा होता है। यह रनवे से उड़ान भर सकता है और जरूरत के अनुसार दूसरे क्षेत्र में जा सकता है।

जहां एक सिस्टम को लंबे समय तक एक जगह निगरानी के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है, जबकि फिक्स्ड-विंग प्लेटफॉर्म ज्यादा गतिशील निगरानी के लिए उपयोगी है। (FW-HAPS India)

भारत में पहले से चल रही है रिसर्च

भारत में HAPS तकनीक पर पहले से काम चल रहा है। बेंगलुरु स्थित सीएसआईआर-नेशनल एयरोस्पेस लेबोरेटरीज (NAL) एक ऐसे बड़े सोलर पावर्ड फिक्स्ड-विंग एयरक्राफ्ट का विकास कर रही है, जो बहुत अधिक ऊंचाई पर लंबे समय तक उड़ सके।

इसका छोटा प्रोटोटाइप पहले ही 25,000 फीट की ऊंचाई पर 10-11 घंटे तक सफल उड़ान भर चुका है। अब फुल-स्केल मॉडल तैयार किया जा रहा है, जिसका विंगस्पैन लगभग 24 से 30 मीटर, टेकऑफ वजन 150 से 450 किलोग्राम और पेलोड क्षमता 10 से 35 किलोग्राम तक हो सकती है।

इस प्रोजेक्ट के तहत ऐसा विमान बनाना है जो करीब 20 किलोमीटर (65,000 फीट) की ऊंचाई पर सोलर ऊर्जा के सहारे कई हफ्तों तक लगातार उड़ान भर सके। इसके फ्लाइट टेस्ट 2026-27 के दौरान शुरू होने की उम्मीद है।

इसी क्षेत्र में बेंगलुरु की न्यूस्पेस रिसर्च एंड टेक्नोलॉजीज भी काम कर रही है। कंपनी ने आईडीईएक्स (iDEX) कार्यक्रम के तहत कई प्रोजेक्ट विकसित किए हैं और भारतीय नौसेना ने भी इस तकनीक में रुचि दिखाई है।

वहीं, वेदा एयरोनॉटिक्स संयुक्त अरब अमीरात की मीरा एयरोस्पेस के साथ मिलकर हाई एल्टीट्यूड प्लेटफॉर्म विकसित कर रही है।

दूसरी तरफ, डीआरडीओ की एडीआरडीई (ADRDE) प्रयोगशाला ने मई 2025 में मध्य प्रदेश में एयरशिप प्रोटोटाइप को लगभग 17 किलोमीटर की ऊंचाई तक सफलतापूर्वक उड़ाया था। (FW-HAPS India)

मेक-I मॉडल में सरकार देगी डेवलपमेंट सपोर्ट

FW-HAPS को मेक-I कैटेगरी में रखा गया है। इस मॉडल में सरकार प्रोटोटाइप विकसित करने की लागत का 70 प्रतिशत तक खर्च उठाती है। सरकार स्वदेशी प्रोटोटाइप के डिजाइन और डेवलपमेंट में वित्तीय मदद देती है। सफल डेवलपमेंट के बाद इसकी खरीद बाय इंडियन-आईडीडीएम (इंडिजिनसली डिजाइन्ड, डेवलप्ड एंड मैन्युफैक्चर्ड) श्रेणी के तहत की जाएगी, जिसमें स्वदेशी सामग्री का न्यूनतम स्तर जरूरी होगा। (FW-HAPS India)

जी-7 को पीछे छोड़ने वाला 11 देशों का ब्रिक्स कितना ताकतवर, क्या बदल रहा है दुनिया का पावर बैलेंस, कितनी बड़ी हैं चुनौतियां?

BRICS Summit 2026
BRICS at 20: How the Bloc Became a Global Economic Powerhouse and the Challenges It Faces Ahead. (AI Generated Image)

BRICS Summit 2026: भारत 12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली में होने वाले 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी करने जा रहा है। यह सम्मेलन ऐसे समय में हो रहा है जब ब्रिक्स अपनी स्थापना के 20 साल पूरे कर रहा है। साल 2006 में शुरू हुआ यह मंच अब केवल आर्थिक सहयोग का समूह नहीं रह गया है, बल्कि वैश्विक राजनीति, व्यापार, वित्त और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था पर चर्चा करने वाला एक महत्वपूर्ण मंच बन चुका है।

ब्राजील, रूस, भारत और चीन से शुरू हुआ यह समूह आज 11 सदस्य देशों तक पहुंच चुका है। हाल के सालों में मिस्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और इंडोनेशिया जैसे देशों के शामिल होने से इसकी वैश्विक मौजूदगी और बढ़ी है। ऐसे में यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या ब्रिक्स अपने मूल उद्देश्यों पर कायम है या फिर बदलती भू-राजनीतिक परिस्थितियों ने इसके सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं।

BRICS Summit 2026: भारत कर रहा चौथी बार ब्रिक्स की मेजबानी

इस बार समिट का आयोजन भारत मंडपम में किया जा रहा है। भारत ने 1 जनवरी 2026 को ब्राजील से ब्रिक्स की अध्यक्षता संभाली थी। यह चौथी बार है जब भारत इस संगठन की चेयरशिप कर रहा है। इससे पहले 2012, 2016 और 2021 में भी भारत यह जिम्मेदारी निभा चुका है।

समिट की थीम “बिल्डिंग फॉर रेजिलिएंस, इनोवेशन, कोऑपरेशन एंड सस्टेनेबिलिटी” रखी गई है। इसका मकसद बदलती वैश्विक परिस्थितियों के बीच सहयोग, आर्थिक विकास और बहुपक्षीय व्यवस्था को मजबूत करना है।

जी-7 को पीछे छोड़ चुका है ब्रिक्स

बीते दो दशकों में वैश्विक अर्थव्यवस्था में ब्रिक्स देशों की हिस्सेदारी तेजी से बढ़ी है। साल 2000 में ब्राजील, रूस, भारत और चीन की संयुक्त हिस्सेदारी वैश्विक जीडीपी (परचेजिंग पावर पैरिटी) का लगभग 23 फीसदी थी। उसी समय जी-7 देशों की हिस्सेदारी करीब 52 फीसदी थी।

लेकिन 2024 तक तस्वीर बदल गई। 11 सदस्यीय विस्तारित ब्रिक्स समूह वैश्विक जीडीपी का लगभग 36.8 प्रतिशत की हिस्सेदारी रखने लगा, जबकि जी-7 की हिस्सेदारी 29 प्रतिशत से नीचे आ गई। यह बदलाव दुनिया की आर्थिक ताकत के केंद्र में आए परिवर्तन को दर्शाता है।

हालांकि प्रति व्यक्ति आय के मामले में अभी भी बड़ा अंतर बना हुआ है। जी-7 देशों में औसत प्रति व्यक्ति जीडीपी लगभग 53 हजार डॉलर है, जबकि ब्रिक्स देशों में यह करीब 8,200 डॉलर के आसपास है। इसका मतलब है कि ब्रिक्स की ताकत मुख्य रूप से उसकी विशाल आबादी, प्राकृतिक संसाधनों और बड़े बाजारों से आती है। (BRICS Summit 2026)

कैसे शुरू हुआ था ब्रिक्स?

ब्रिक्स की शुरुआत साल 2006 में ब्रिक (BRIC) के तौर पर हुई थी। उस समय ब्राजील, रूस, भारत और चीन को भविष्य की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं के रूप में देखा जा रहा था। बाद में 2009 में रूस के येकातेरिनबर्ग शहर में पहला ब्रिक शिखर सम्मेलन आयोजित हुआ।

साल 2010 में दक्षिण अफ्रीका शामिल हुआ और समूह का नाम ब्रिक्स हो गया। इसके बाद 2024 में मिस्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब और यूएई को सदस्य बनाया गया। जनवरी 2025 में इंडोनेशिया भी पूर्ण सदस्य बन गया।

आज यह समूह दुनिया की बड़ी उभरती अर्थव्यवस्थाओं का प्रतिनिधित्व करता है और खुद को ग्लोबल साउथ यानी विकासशील देशों की आवाज के रूप में प्रस्तुत करता है। (BRICS Summit 2026)

वैश्विक संस्थानों में सुधार की मांग अब भी कायम

ब्रिक्स की स्थापना के समय से ही इसकी एक प्रमुख मांग रही है कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में सुधार किया जाए। संयुक्त राष्ट्र, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) और विश्व बैंक जैसी संस्थाओं में आज भी पश्चिमी देशों का प्रभाव अधिक माना जाता है।

ब्रिक्स देशों का तर्क है कि दुनिया की आर्थिक और राजनीतिक शक्ति में जो बदलाव आया है, उसका प्रतिबिंब इन संस्थाओं में दिखाई नहीं देता। इसी वजह से समूह लंबे समय से अधिक प्रतिनिधित्व, वित्तीय सुधार और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की मांग करता रहा है। (BRICS Summit 2026)

भारत की रणनीति: सभी मंचों पर सक्रिय भूमिका

भारत का ब्रिक्स में शामिल होना उसकी व्यापक रणनीतिक नीति का हिस्सा माना जाता है। नई दिल्ली एक साथ ब्रिक्स, जी-20, क्वाड और शंघाई सहयोग संगठन जैसे मंचों में सक्रिय है।

भारत किसी सैन्य गठबंधन का हिस्सा बने बिना अलग-अलग मंचों पर अपने हितों को आगे बढ़ाने की नीति अपनाता है। इसी कारण भारत ब्रिक्स में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है।

साल 2012 में नई दिल्ली में हुए ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान भारत ने एक विकास बैंक बनाने का प्रस्ताव रखा था। बाद में यही प्रस्ताव न्यू डेवलपमेंट बैंक (एनडीबी) के रूप में सामने आया। (BRICS Summit 2026)

न्यू डेवलपमेंट बैंक की बढ़ती भूमिका

ब्रिक्स देशों द्वारा स्थापित न्यू डेवलपमेंट बैंक आज समूह की सबसे बड़ी संस्थागत उपलब्धियों में गिना जाता है।

2026 के मध्य तक बैंक लगभग 141 परियोजनाओं को मंजूरी दे चुका था, जिनकी कुल कीमत करीब 44 अरब डॉलर बताई गई है। इन परियोजनाओं का संबंध बुनियादी ढांचे, ऊर्जा, परिवहन और सतत विकास से जुड़ा है।

भारत इस बैंक को विकासशील देशों के लिए वित्तीय सहयोग का एक महत्वपूर्ण माध्यम मानता है। (BRICS Summit 2026)

लेकिन ब्रिक्स के भीतर बढ़ रहे मतभेद

ब्रिक्स की बढ़ती ताकत के साथ-साथ इसके भीतर मतभेद भी सामने आने लगे हैं। सबसे बड़ा अंतर इस बात को लेकर है कि समूह का मूल उद्देश्य क्या होना चाहिए।

चीन और रूस ब्रिक्स को पश्चिमी प्रभाव और अमेरिकी नेतृत्व वाली व्यवस्था के विकल्प के रूप में देखते हैं। दोनों देश इसे वैश्विक शक्ति संतुलन बदलने का मंच मानते हैं।

चीन का मानना है कि ब्रिक्स के विस्तार से “ग्लोबल साउथ” यानी विकासशील देशों की आवाज मजबूत होगी। वहीं रूस, पश्चिमी प्रतिबंधों और स्विफ्ट भुगतान प्रणाली से बाहर किए जाने के बाद ब्रिक्स को आर्थिक सहयोग और व्यापार के लिए महत्वपूर्ण मंच मानता है।

दूसरी ओर भारत और ब्राजील का दृष्टिकोण अलग है। भारत और ब्राजील ब्रिक्स को मुख्य रूप से आर्थिक विकास, व्यापार, निवेश और वैश्विक आर्थिक सुधार से जुड़ा मंच मानते हैं। वे इसे किसी राजनीतिक या रणनीतिक गठबंधन के रूप में नहीं देखते।

यह अंतर कई मौकों पर खुलकर सामने आया है। उदाहरण के तौर पर रूस ने 2023 में भारत से तेल भुगतान युआन में करने का सुझाव दिया था, लेकिन भारत ने डॉलर और रुपये में भुगतान को प्राथमिकता दी।

विशेषज्ञों के अनुसार भारत “मल्टी-अलाइनमेंट” की नीति अपनाता है। इसका मतलब है कि भारत एक साथ कई अंतरराष्ट्रीय समूहों का सदस्य बना रहता है और किसी एक खेमे में नहीं जाता। यही कारण है कि भारत ब्रिक्स, जी-20, क्वाड और शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गनाइजेशन (एससीओ) जैसे अलग-अलग मंचों में सक्रिय है, लेकिन किसी सैन्य गठबंधन का हिस्सा नहीं है। (BRICS Summit 2026)

ईरान और यूएई ने बढ़ाई नई चुनौती

ब्रिक्स के विस्तार के बाद समूह के भीतर भू-राजनीतिक चुनौतियां भी बढ़ी हैं। इसका उदाहरण मई 2026 में नई दिल्ली में हुई ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक में देखने को मिला।

बैठक के दौरान सदस्य देश संयुक्त घोषणा पत्र पर सहमत नहीं हो सके। इसकी मुख्य वजह ईरान और संयुक्त अरब अमीरात के बीच मतभेद थे। दोनों देश एक ही समूह के सदस्य हैं, लेकिन पश्चिम एशिया के कई मुद्दों पर उनके दृष्टिकोण अलग हैं।

भारत को मेजबान देश के रूप में चेयर स्टेटमेंट जारी करना पड़ा, जिसमें कहा गया कि कुछ सदस्य देशों के बीच पश्चिम एशिया की स्थिति को लेकर अलग-अलग विचार हैं।

इस घटना ने दिखाया कि सदस्य देशों की संख्या बढ़ने के साथ सर्वसम्मति बनाना पहले की तुलना में अधिक मुश्किल हो गया है। (BRICS Summit 2026)

डॉलर से दूरी बनाने की कोशिश

ब्रिक्स देशों के बीच डॉलर पर निर्भरता कम करने को लेकर लंबे समय से चर्चा होती रही है। हालांकि एक साझा ब्रिक्स मुद्रा बनाने का विचार फिलहाल आगे नहीं बढ़ पाया है। इसकी वजह है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चेतावनी दी थी कि डॉलर की जगह नई मुद्रा लाने पर 100 प्रतिशत टैरिफ लग सकते हैं।

इसके बजाय सदस्य देश अपने-अपने राष्ट्रीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने पर ध्यान दे रहे हैं।

रूस और चीन अब अपने 90 प्रतिशत से अधिक द्विपक्षीय व्यापार का निपटान रूबल और युआन में कर रहे हैं। भारत और रूस के बीच भी बड़ी मात्रा में भुगतान राष्ट्रीय मुद्राओं में होने लगा है।

भारत और यूएई के बीच जुलाई 2023 से रुपया-दिरहम भुगतान प्रणाली लागू है। वहीं भारत और इंडोनेशिया ने जुलाई 2026 में रुपया-रुपिया भुगतान व्यवस्था शुरू की। (BRICS Summit 2026)

ब्रिक्स पे सिस्टम पर फोकस

2026 के शिखर सम्मेलन में ब्रिक्स पे सिस्टम भी चर्चा का प्रमुख विषय है। इस प्रणाली का उद्देश्य सदस्य देशों के भुगतान नेटवर्क को आपस में जोड़ना है।

इसमें रूस का एसपीएफएस, चीन का सीआईपीएस, भारत का यूपीआई और ब्राजील का पिक्स नेटवर्क शामिल किए जाने की योजना है। इससे सदस्य देशों के बीच व्यापारिक भुगतान डॉलर आधारित बैंकिंग चैनलों पर निर्भर हुए बिना किए जा सकेंगे।

भारत इस दिशा में इंटरऑपरेबल सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी और डिजिटल भुगतान सहयोग को अधिक व्यावहारिक विकल्प मानता है। (BRICS Summit 2026)

नई दिल्ली शिखर सम्मेलन पर दुनिया की नजर

नई दिल्ली में होने वाला 18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन ऐसे समय में हो रहा है जब पश्चिम एशिया, रूस-यूक्रेन संघर्ष और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता जैसे कई मुद्दे दुनिया के सामने हैं।

सम्मेलन में सप्लाई चेन को मजबूत बनाने, वैश्विक वित्तीय संस्थाओं में सुधार, न्यू डेवलपमेंट बैंक की भूमिका बढ़ाने और सदस्य देशों के बीच व्यापार विस्तार जैसे विषयों पर चर्चा होने की उम्मीद है।

भारत का ध्यान डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, जलवायु वित्त, स्वास्थ्य सहयोग, महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति, स्थानीय मुद्रा भुगतान और कनेक्टिविटी जैसे व्यावहारिक क्षेत्रों पर केंद्रित है। (BRICS Summit 2026)