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DRDO की ये 9 तकनीकें कैसे बदलेंगी निजी कंपनियों की किस्मत, भारत कैसे बदल रहा है अपना डिफेंस इंडस्ट्रियल इकोसिस्टम?

DRDO Technology Transfer
How DRDO’s Technology Transfer Model Is Transforming India’s Defence Industrial Ecosystem.

DRDO Technology Transfer: रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) ने 15 सितंबर को नई दिल्ली में आयोजित ‘विमर्श-2026’ कार्यक्रम के दौरान 13 उद्योग साझेदारों को 9 महत्वपूर्ण डिफेंस टेक्नोलॉजी का ट्रांसफर ऑफ टेक्नोलॉजी (टीओटी) सौंपा। इस दौरान एक नया फ्रेमवर्क भी लॉन्च किया। जिसके तहत डीआरडीओ के बनाए वेपन सिस्टम्स का निर्माण करने वाली निजी और सरकारी कंपनियों को अब उन सिस्टम्स के सॉफ्टवेयर सोर्स कोड तक पहुंच मिल सकेगी।

DRDO Technology Transfer: क्या होता है ट्रांसफर ऑफ टेक्नोलॉजी?

ट्रांसफर ऑफ टेक्नोलॉजी (टीओटी) में किसी अनुसंधान संस्थान द्वारा डेवलप टेक्नोलॉजी को उद्योग को सौंपा जाता है ताकि उसका व्यावसायिक उत्पादन किया जा सके। डीआरडीओ कई सालों तक रिसर्च और टेस्टिंग के बाद किसी सिस्टम, इक्विपमेंट, सेंसर, मिसाइल कंपोनेंट या अन्य डिफेंस टेक्नोलॉजी को डेवलप करता है। जब टेक्नोलॉजी तैयार हो जाती है और उसका प्रदर्शन सफल साबित हो जाता है, तब डीआरडीओ उद्योगों के साथ लाइसेंसिंग एग्रीमेंट फॉर ट्रांसफर ऑफ टेक्नोलॉजी (एलएटीओटी) करता है।

इसके तहत कंपनियों को डिजाइन डेटा, मैन्युफैक्चरिंग डॉक्यूमेंटेशन, टेक्नोलॉजी सपोर्ट, प्रोडक्शन प्रोसेस और क्वॉलिटी स्टैंडर्ड्स की जानकारी दी जाती है। इसके बाद उद्योग उस टेक्नोलॉजी को प्रोडक्शन लाइन में बदलते हैं।

केवल रिसर्च नहीं, इंडस्ट्री इकोसिस्टम भी बना रहा डीआरडीओ

कई सालों तक भारत में यह समस्या रही कि प्रयोगशालाओं में डेवलप टेक्नोलॉजी प्रोडक्शन तक नहीं पहुंच पाती थीं। जिसके चलते देश को विदेशों से आयात पर निर्भर रहना पड़ता था।

अब डीआरडीओ की रणनीति बदल चुकी है। संगठन केवल रिसर्च एजेंसी की भूमिका में नहीं रहना चाहता बल्कि वह उद्योगों के साथ मिलकर एक पूर्ण डिफेंस इंडस्ट्रियल इकोसिस्टम तैयार कर रहा है।

रक्षा सचिव और डीआरडीओ अध्यक्ष राजेश कुमार सिंह ने इस कार्यक्रम के दौरान बताया कि अब तक 1100 से अधिक उद्योगों को 2300 से ज्यादा टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की जा चुकी है। उन्होंने यह भी कहा कि लगभग 50 मिसाइल सिस्टम्स से जुड़ी टेक्नोलॉजी उद्योगों को उपलब्ध कराई जा चुकी हैं। (DRDO Technology Transfer)

इंडस्ट्री को मिलेगा सोर्स कोड

वहीं, अब डीआरडीओ के बनाए वेपन सिस्टम्स का सोर्स कोड अब निजी और सरकारी कंपनियों को भी उपलब्ध हो सकेगा। अब तक डीआरडीओ टीओटी में कंपनियों को हार्डवेयर डिजाइन और ड्रॉइंग तो देता था, लेकिन सॉफ्टवेयर में बदलाव का अधिकार नहीं मिलता था। किसी भी अपडेट, पैच या नए फीचर के लिए कंपनियों को फिर से डीआरडीओ लैब पर निर्भर रहना पड़ता था।

रक्षा उद्योग लंबे समय से मांग कर रहा था कि उन्हें सोर्स कोड तक पहुंच दी जाए। उनका कहना था कि इस निर्भरता के कारण उत्पादन, मरम्मत और मिड-लाइफ अपग्रेड में देरी होती है।

नए फ्रेमवर्क के तहत अधिकृत इंजीनियर जरूरत के अनुसार सॉफ्टवेयर में बदलाव कर सकेंगे, नए फीचर जोड़ सकेंगे और पुराने हो चुके इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स की जगह नए सिस्टम को तेजी से इंटीग्रेट कर सकेंगे। (DRDO Technology Transfer)

सबसे अहम टेक्नोलॉजी: नौसेना की मल्टी-इन्फ्लुएंस ग्राउंड माइन

नई दिल्ली में आयोजित डीआरडीओ-इंडस्ट्री सिनर्जी मीट ‘विमर्श 2026’ के दौरान नौ महत्वपूर्ण स्वदेशी तकनीकों का ट्रांसफर ऑफ टेक्नोलॉजी (टीओटी) 13 उद्योग साझेदारों को भी सौंपा गया। उनमें सबसे महत्वपूर्ण तकनीकों में से एक मल्टी-इन्फ्लुएंस ग्राउंड माइन (एमआईजीएम) है।

इसे डीआरडीओ की नेवल साइंस एंड टेक्नोलॉजिकल लेबोरेटरी (एनएसटीएल) ने डेवलप किया है। यह आधुनिक युद्धपोतों और पनडुब्बियों को निशाना बनाने वाली अत्याधुनिक नौसैनिक माइन है। इस टेक्नोलॉजी का लाइसेंस भारत डायनामिक्स लिमिटेड (बीडीएल) और हैदराबाद स्थित अपोलो माइक्रो सिस्टम्स को दिया गया है। इस परियोजना की खास बात यह है कि दोनों कंपनियां पहले से इसके कुछ हिस्सों के विकास में भी शामिल रही हैं। अब वे पूर्ण उत्पादन में भागीदार बनेंगी। (DRDO Technology Transfer)

मिसाइल टेक्नोलॉजी का भी हुआ ट्रांसफर

डीआरडीओ ने शॉर्ट रेंज एंटी-शिप मिसाइल के लिए डेवलप प्रोपेलेंट और इग्नाइटर टेक्नोलॉजी भी उद्योगों को सौंप दी है। यह टेक्नोलॉजी मिसाइल के बूस्टर और सस्टेनर मोटर का महत्वपूर्ण हिस्सा है। लॉन्च के समय शुरुआती थ्रस्ट पैदा करने और उड़ान के दौरान गति बनाए रखने में इसकी भूमिका होती है।

सोलर डिफेंस एंड एयरोस्पेस, प्रीमियर एक्सप्लोसिव्स और साल्वो इंडस्ट्रीज को इसका लाइसेंस दिया गया है। (DRDO Technology Transfer)

सी-130 और सी-17 के लिए हेवी ड्रॉप सिस्टम

डीआरडीओ की एडीआरडीई प्रयोगशाला का बनाया 20 टन हेवी ड्रॉप सिस्टम का भी टेक्नोलॉजी ट्रांसफर किया गया।
यह सिस्टम भारतीय वायुसेना के सी-130 हरक्यूलिस और सी-17 ग्लोबमास्टर ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट से भारी सैन्य उपकरणों को एयरड्रॉप करने में इस्तेमाल होता है। इस तकनीक को जेसीबीएल प्राइवेट लिमिटेड को दिया गया है। (DRDO Technology Transfer)

लेजर गाइडेड हथियारों की टेक्नोलॉजी

डीआरडीओ की इंस्ट्रूमेंट्स रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टैब्लिशमेंट (आईआरडीई) की बनाई सेमी एक्टिव होमिंग लेजर सिस्टम (एसएएलएचएस) का ट्रांसफर भी किया गया। यह तकनीक लेजर गाइडेड बम, मिसाइल और आर्टिलरी शेल जैसे प्रिसिजन गाइडेड म्यूनिशंस में इस्तेमाल होती है।

जब किसी लक्ष्य पर लेजर मार्किंग की जाती है तो यह सिस्टम उसी लेजर रिफ्लेक्शन को ट्रैक करके हथियार को अत्यधिक सटीकता से लक्ष्य तक पहुंचाता है।

आज की आधुनिक युद्धों में प्रिसिजन स्ट्राइक क्षमता अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। यह टेक्नोलॉजी लेजर गाइडेड बम, मिसाइल और आर्टिलरी शेल को टारगेट तक सटीकता के साथ पहुंचाने में मदद करती है। इस टेक्नोलॉजी का ट्रांसफर अनंत टेक्नोलॉजीज और अपोलो माइक्रो सिस्टम्स को किया गया।

इससे भविष्य में स्वदेशी प्रिसिजन गाइडेड हथियारों का उत्पादन बढ़ सकेगा। (DRDO Technology Transfer)

पनडुब्बी से बच निकलने वाला हाइड्रो सूट

डीआरडीओ की डीईबीईएल प्रयोगशाला ने हाइड्रो सूट विकसित किया है। यह एक विशेष सूट होता है जिसे पनडुब्बी में आपातकालीन स्थिति के दौरान उपयोग किया जाता है। यदि किसी कारण से पनडुब्बी को छोड़ना पड़े तो चालक दल इस सूट की मदद से समुद्र की सतह तक सुरक्षित पहुंच सकता है। यह शरीर को अत्यधिक ठंडे समुद्री पानी और उच्च दबाव से सुरक्षा प्रदान करता है। इस तकनीक का ट्रांसफर बिलविन इंडस्ट्रीज लिमिटेड और यूफ्लो ऑटोमेशन को किया गया है। (DRDO Technology Transfer)

विस्फोटक और रसायनों की पहचान करने वाली तकनीक

सॉलिड स्टेट फिजिक्स लेबोरेटरी (एसएसपीएल) द्वारा विकसित तकनीक जिंक टेल्यूराइड (जेडएनटीई) सिंगल क्रिस्टल ग्रोथ टेक्नोलॉजी भी उद्योग को सौंप दी है। जिंक टेल्यूराइड आधारित यह तकनीक छिपे हुए विस्फोटकों और रसायनों की पहचान करने में उपयोगी है। यह टेक्नोलॉजी टेराहर्ट्ज स्पेक्ट्रम बेस्ड इक्विपमेंट्स में इस्तेमाल होती है। इसका इस्तेमाल छिपे हुए विस्फोटकों, रसायनों और अन्य खतरनाक पदार्थों की पहचान करने में किया जा सकता है। इसके अलावा वायरलेस कम्युनिकेशन क्षेत्र में भी इसका महत्व है।

इस टेक्नोलॉजी का लाइसेंस एंट्स इनोवेशन्स प्राइवेट लिमिटेड को मिला है। (DRDO Technology Transfer)

स्मार्ट हेलमेट: सैनिकों के लिए डिजिटल वॉरफेयर सिस्टम

विमर्श-2026 में ट्रांसफर हुई टेक्नोलॉजीों में स्मार्ट हेलमेट भी शामिल है। यह कोई सामान्य हेलमेट नहीं है। इसमें लिडार सेंसर, आरजीबी कैमरा और स्टीरियो कैमरा लगे हैं। यह शहरी युद्ध क्षेत्र में रीयल टाइम 3डी मैपिंग करने में सक्षम है। यह हेलमेट आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तकनीक से भी लैस है। इसके जरिए जीपीएस उपलब्ध न होने की स्थिति में भी सैनिकों की लोकेशन ट्रैक की जा सकती है और कमांडरों को बेहतर सिचुएशनल अवेयरनेस मिलती है।

इस टेक्नोलॉजी का लाइसेंस प्रगति डिफेंस सिस्टम्स को दिया गया है।

डीआरडीओ की चंडीगढ़ स्थित टर्मिनल बैलिस्टिक्स रिसर्च लेबोरेटरी (टीबीआरएल) ने ऑर्डिनेंस और एक्सप्लोसिव सिस्टम के सुरक्षित ऑपरेशन के लिए दो महत्वपूर्ण इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम बनाए हैं। इनमें इलेक्ट्रॉनिक एक्टिवेशन डिवाइस (टिनी) और वायरलेस कंट्रोल कम एक्टुएशन सिस्टम (रेड) शामिल हैं।

टीआईएनवाई एक छोटा लेकिन अत्याधुनिक इलेक्ट्रॉनिक एक्टिवेशन डिवाइस है, जिसे गोला-बारूद, वॉरहेड और अन्य विस्फोटक प्रणालियों को तय समय पर सक्रिय करने के लिए विकसित किया गया है। इस डिवाइस में माइक्रोकंट्रोलर आधारित प्रोसेसिंग यूनिट, सेफ्टी इलेक्ट्रॉनिक्स, तीन बैटरी पावर सोर्स, सेफ्टी प्लग, एलईडी डिस्प्ले और कीपैड लगाया गया है।

जब मुख्य बैटरी सर्किट पूरा होता है तो सिस्टम रेडी स्टेट में आ जाता है। इसके बाद ऑपरेटर कीपैड के जरिए काउंटडाउन या डिले टाइम सेट करता है। निर्धारित समय पूरा होने पर डिवाइस अपने ट्रिगरिंग चैनलों के माध्यम से सिग्नल जारी कर देता है। इसका फोर-चैनल वर्जन भी उपलब्ध है। ऑपरेटर इसमें पहले से डिले टाइम, एयरबर्स्ट हाइट या टारगेट आधारित डिटोनेशन प्रोफाइल भी प्रोग्राम कर सकता है। इससे विस्फोट का समय और स्थान अधिक सटीक बनाया जा सकता है।

वहीं, आरईडी (रेड) यानी वायरलेस कंट्रोल कम एक्टुएशन सिस्टम एक रिमोट कंट्रोल्ड इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम है, जिसका इस्तेमाल सुरक्षित दूरी से विस्फोटक पेलोड या डेमोलिशन डिवाइस को कंट्रोल करने के लिए किया जाता है। इस सिस्टम के दो हिस्से होते हैं। पहला यूजर रिमोट, और दूसरा ग्राउंड सिस्टम। दोनों के बीच कम्युनिकेशन एन्क्रिप्टेड रेडियो फ्रीक्वेंसी (आरएफ) सिग्नल के जरिए होता है।

ऑपरेटर एक ही रिमोट से कई ग्राउंड सिस्टम को कॉन्फिगर और एक्टिवेट कर सकता है। यह सिस्टम लाइन ऑफ साइट दूरी तक काम करता है और दो स्वतंत्र ट्रिगरिंग सिग्नल जारी करने की क्षमता रखता है।

इन दोनों तकनीकों का लाइसेंस बेंगलुरु की ऑटोटेक सिस्टम्स प्राइवेट लिमिटेड और मोहाली की एक्सेलर माइक्रोसिस्टम्स को दिया गया है। (DRDO Technology Transfer)

एमएसएमई और स्टार्टअप्स को क्यों मिलेगा फायदा?

विमर्श-2026 के दौरान डीआरडीओ ने एमएसएमई (माइक्रो, स्मॉल एंड मीडियम एंटरप्राइजेज) और डीप-टेक स्टार्टअप्स के लिए कई नई पहल शुरू की हैं। इनका उद्देश्य छोटे उद्योगों और नई टेक्नोलॉजी विकसित करने वाली कंपनियों को रक्षा क्षेत्र में ज्यादा अवसर देना है।

अब तक डिफेंस सेक्टर में प्रवेश करना छोटे उद्योगों के लिए आसान नहीं था। रक्षा उपकरणों के विकास और निर्माण के लिए कड़े तकनीकी मानक, महंगी टेस्टिंग प्रक्रिया, सर्टिफिकेशन की जटिलताएं और रिसर्च पर भारी निवेश की जरूरत होती थी। इसके कारण कई स्टार्टअप्स और एमएसएमई अपनी तकनीक होने के बावजूद रक्षा परियोजनाओं में शामिल नहीं हो पाते थे।

नई नीति के तहत डीआरडीओ ऐसे उद्योगों को सीधे फंडिंग सपोर्ट उपलब्ध कराएगा, जिससे उन्हें शुरुआती रिसर्च और प्रोडक्ट डेवलपमेंट के लिए वित्तीय मदद मिल सके। इसके साथ ही इन्क्यूबेशन सपोर्ट भी दिया जाएगा, ताकि नई कंपनियां अपने आइडिया को प्रोटोटाइप और फिर तैयार उत्पाद में बदल सकें।

डीआरडीओ की एडवांस्ड टेस्टिंग और वैलिडेशन सुविधाओं तक पहुंच भी आसान बनाई जा रही है। इससे स्टार्टअप्स और छोटे उद्योगों को अपने उत्पादों का परीक्षण कराने के लिए अलग से महंगा इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार नहीं करना पड़ेगा। उन्हें विशेषज्ञों की तकनीकी सलाह और टेक्नोलॉजी सपोर्ट भी मिलेगा।

इस पहल का मकसद रक्षा उत्पादन में ज्यादा से ज्यादा भारतीय कंपनियों की भागीदारी बढ़ाना है। इससे स्वदेशी टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट को गति मिलेगी और देश का डिफेंस इंडस्ट्रियल इकोसिस्टम और मजबूत होगा। साथ ही, छोटे उद्योगों और स्टार्टअप्स के लिए नए बिजनेस अवसर भी पैदा होंगे। (DRDO Technology Transfer)

इस हफ्ते HAL का मेगा डिलीवरी प्लान; IAF को मिलेंगे 3 HTT-40 और 2 तेजस एमके-1 ट्रेनर

HAL Indigenous Aircraft Delivery
HAL Set to Deliver HTT-40, Dhruv NG and LCA Tejas MK1 Trainer to IAF and Pawan Hans.

HAL Indigenous Aircraft Delivery: हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) 18 सितंबर को तीन स्वदेशी प्लेटफॉर्म भारतीय वायुसेना और पवन हंस लिमिटेड को सौंपेगा। इनमें एचटीटी-40 बेसिक ट्रेनर एयरक्राफ्ट, ध्रुव एनजी सिविल हेलीकॉप्टर और एलसीए एफओसी ट्रेनर शामिल हैं। इन प्लेटफॉर्म्स को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, नागरिक उड्डयन मंत्री के. राममोहन नायडू और वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल ए.पी. सिंह की मौजूदगी में सौंपा जाएगा।

HAL Indigenous Aircraft Delivery: भारतीय वायुसेना को मिलेगा एचटीटी-40 का पहला बैच

एचएएल भारतीय वायुसेना को एचटीटी-40 बेसिक ट्रेनर एयरक्राफ्ट का पहला बैच सौंपेगा। इस बैच में कुल तीन विमान शामिल हैं। इनमें दो विमान बेंगलुरु में और एक विमान नासिक में तैयार किया गया है। एचटीटी-40 की सप्लाई मार्च 2023 में हुए 6,838 करोड़ रुपये के कॉन्ट्रैक्ट का हिस्सा है। इस समझौते के तहत एचएएल को भारतीय वायुसेना के लिए कुल 70 एचटीटी-40 विमान तैयार करने हैं।

यह विमान वायुसेना के पायलटों की शुरुआती ट्रेनिंग जरूरतों को पूरा करने के लिए डेवलप किया गया है। इसका उद्देश्य वर्तमान में इस्तेमाल हो रहे स्विट्जरलैंड निर्मित पिलाटस पीसी-7 एमके-II ट्रेनर विमानों को चरणबद्ध तरीके से रिप्लेस है।

एचटीटी-40 में आधुनिक ग्लास कॉकपिट लगाया गया है। इसके अलावा इसमें जीरो-जीरो इजेक्शन सीट दी गई है, जो किसी भी ऊंचाई और गति पर पायलट को सुरक्षित बाहर निकलने की सुविधा देती है। विमान की अधिकतम गति लगभग 450 किलोमीटर प्रति घंटा है और यह पूरी तरह एरोबेटिक क्षमताओं से लैस है।

इंजन सप्लाई में देरी से प्रभावित हुआ कार्यक्रम

एचटीटी-40 कार्यक्रम को इंजन उपलब्धता की समस्या का सामना करना पड़ा था। विमान में इस्तेमाल होने वाले हनीवेल टीपीई331-12बी इंजन की सप्लाई में देरी के कारण प्रोडक्शन प्रभावित हुआ।

जून 2026 में हनीवेल ने पहले बैच के इंजन एचएएल को सौंपे। यह 100 मिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक मूल्य के कॉन्ट्रैक्ट का हिस्सा था। इस समझौते के तहत कुल 88 इंजन उपलब्ध कराए जाने हैं। इनमें 16 इंजन सीधे सप्लाई किए जाएंगे, जबकि बाकी इंजन टेक्नोलॉजी ट्रांसफर व्यवस्था के तहत उपलब्ध होंगे।

इंजन सप्लाई शुरू होने के बाद एचएएल ने अपनी प्रोडक्शन क्षमता बढ़ा दी है। अब कंपनी दो प्रोडक्शन लाइनों के जरिए हर वर्ष 20 एचटीटी-40 विमान तैयार कर सकती है। (HAL Indigenous Aircraft Delivery)

ध्रुव एनजी के जरिए सिविल हेलीकॉप्टर बाजार में वापसी

एचएएल का दूसरा बड़ा प्लेटफॉर्म ध्रुव एनजी हेलीकॉप्टर है। यह एडवांस्ड लाइट हेलीकॉप्टर ध्रुव का सिविल सर्टिफाइड वर्जन है। हाल ही में इसे नागरिक उड्डयन महानिदेशालय यानी डीजीसीए से टाइप सर्टिफिकेशन मिला है।

ध्रुव एनजी को पवन हंस लिमिटेड में शामिल किया जाएगा। इसके साथ ही एचएएल कई सालों बाद सिविल हेलीकॉप्टर बाजार में अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराएगा। पिछले वर्षों में कंपनी का मुख्य फोकस सैन्य हेलीकॉप्टरों पर रहा है।

ध्रुव एनजी को कई प्रकार के मिशनों के लिए डिजाइन किया गया है। इसका उपयोग वीवीआईपी परिवहन, ऑफशोर ऑपरेशन, एयर एम्बुलेंस सेवा और हेली-पिलग्रिमेज मिशनों में किया जा सकता है।

हेलीकॉप्टर में व्हील्ड लैंडिंग गियर, नया ग्लास कॉकपिट और बेहतर वाइब्रेशन कंट्रोल सिस्टम लगाया गया है। इससे यात्रियों और पायलटों को अधिक आरामदायक उड़ान अनुभव मिलता है।

सरकार की क्षेत्रीय संपर्क योजना उड़ान के तहत हेलीकॉप्टर नेटवर्क के विस्तार में भी ध्रुव एनजी की महत्वपूर्ण भूमिका मानी जा रही है। (HAL Indigenous Aircraft Delivery)

तेजस ट्रेनर से मजबूत होगी फाइटर पायलट ट्रेनिंग

एचएएल का तीसरा प्लेटफॉर्म एलसीए एफओसी ट्रेनर है। यह तेजस एमके-1 एफओसी लड़ाकू विमान का दो सीटों वाला ट्रेनर वर्जन है।

इस विमान का इस्तेमाल फाइटर पायलटों की एडवांस ट्रेनिंग के लिए किया जाएगा। तेजस ट्रेनर भारतीय वायुसेना के पायलटों को आधुनिक लड़ाकू विमान संचालन की तैयारी में मदद करेगा।

इसके साथ ही साल 2006 और 2010 में दिए गए कुल 40 तेजस एमके-1 विमानों का ऑर्डर पूरा हो जाएगा।

इस ऑर्डर में 16 प्रारंभिक ऑपरेशनल क्लियरेंस कॉन्फिगरेशन वाले लड़ाकू विमान, 16 एफओसी कॉन्फिगरेशन वाले लड़ाकू विमान और 8 दो सीटों वाले ट्रेनर शामिल थे।

दिसंबर 2010 में एफओसी कॉन्ट्रैक्ट की कीमत उस समय 5,989 करोड़ रुपये थी। बाद में डिलीवरी कार्यक्रम में बदलाव के कारण मार्च 2025 में इसकी लागत बढ़कर 6,542 करोड़ रुपये हो गई।

पहला ट्रेनर विमान अक्टूबर 2023 में वायुसेना को सौंपा गया था। हालांकि सभी आठ ट्रेनर मार्च 2024 तक देने का लक्ष्य पूरा नहीं हो सका। (HAL Indigenous Aircraft Delivery)

तेजस एमके-1ए का इंतजार जारी

जहां एक ओर एचएएल पुराना तेजस ऑर्डर पूरा करने जा रहा है, वहीं भारतीय वायुसेना अभी भी तेजस एमके-1ए की पहली डिलीवरी का इंतजार कर रही है।

फरवरी 2021 में भारतीय वायुसेना ने 46,898 करोड़ रुपये के कॉन्ट्रैक्ट के तहत 83 तेजस एमके-1ए विमानों का ऑर्डर दिया था। इनमें 73 सिंगल सीट फाइटर और 10 ट्विन सीट ट्रेनर शामिल हैं।

इन विमानों की डिलीवरी मार्च 2024 से शुरू होनी थी, लेकिन अभी तक एक भी विमान वायुसेना को नहीं मिला है।

तेजस एमके-1ए में एईएसए रडार, एडवांस इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम, बेहतर एवियोनिक्स, एयर-टू-एयर रिफ्यूलिंग क्षमता और आधुनिक हथियार इंटीग्रेशन जैसी नई क्षमताएं जोड़ी गई हैं। (HAL Indigenous Aircraft Delivery)

इंजन और रडार बने देरी की वजह

तेजस एमके-1ए कार्यक्रम में देरी का सबसे बड़ा कारण जीई एयरोस्पेस द्वारा एफ404-आईएन20 इंजन की सप्लाई में देरी माना जा रहा है।

एचएएल इस मामले में कॉन्ट्रैक्ट के तहत पैनल्टी के विकल्पों पर भी काम कर रहा है। इसके अलावा इजरायली एईएसए रडार और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सूट के इंटीग्रेशन से जुड़े तकनीकी मुद्दों ने भी कार्यक्रम को प्रभावित किया है। इस महीने एचएएल और भारतीय वायुसेना के बीच तेजस एमके-1ए कार्यक्रम की प्रगति की समीक्षा के लिए महत्वपूर्ण बैठक होने की संभावना है। (HAL Indigenous Aircraft Delivery)

97 तेजस की डिलीवरी सितंबर 2027 से शुरू

रक्षा मंत्रालय ने सितंबर 2025 में एचएएल के साथ 97 तेजस एमके-1ए के लिए 62,370 करोड़ रुपये का नया कॉन्ट्रैक्ट किया था। इस समझौते के तहत 97 अतिरिक्त तेजस एमके-1ए विमान सौंपे जाने हैं। इनमें 68 लड़ाकू विमान और 29 ट्विन सीट ट्रेनर शामिल हैं।

रक्षा मंत्रालय की हाल ही में जारी सालाना रिपोर्ट के अनुसार इस नए ऑर्डर की डिलीवरी सितंबर 2027 से शुरू होगी और सितंबर 2033 तक पूरी की जाएगी। एचएएल वर्तमान में नासिक में तीसरी प्रोडक्शन लाइन भी संचालित कर रहा है, जिससे तेजस प्रोडक्शन क्षमता बढ़ाई जा रही है। (HAL Indigenous Aircraft Delivery)

सेना ‘K-9 वॉरियर्स’ को दे रही है पैराशूट से जंप करने की ट्रेनिंग, पहली बार डॉग हैंडलर और कॉम्बैट डॉग ने किया टैंडम जंप

Airborne Combat Dogs
Indian Army Trains Combat Dogs for Airborne Operations with Tandem Parachute Jumps.

Airborne Combat Dogs: भारतीय सेना के कॉम्बैट डॉग्स अब सिर्फ जमीन पर ही नहीं, बल्कि आसमान से भी ऑपरेशन एरिया में पहुंचने के लिए तैयार किए जा रहे हैं। सेना ने पहली बार एक ऐसी एयरबोर्न ट्रेनिंग का प्रदर्शन किया है, जिसमें एक पैराट्रूपर, डॉग हैंडलर और कॉम्बैट डॉग ने फुल कॉम्बैट लोड के साथ टैंडम पैराशूट जंप किया। यह अभ्यास मध्य भारत के बेहट ड्रॉप जोन में किया गया और इसे भारतीय सेना की एयरबोर्न क्षमताओं में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

सूर्य कमांड यानी सेंट्रल कमांड ने 15 सितंबर 2026 को इस अभ्यास का वीडियो जारी किया। सेना ने इस उपलब्धि को “पॉज इन द स्काई, करेज ऑन द ग्राउंड” नाम दिया। कमांड ने कहा, “यह सैनिक और उसके कैनाइन साथी के बीच भरोसे, टीमवर्क और अटूट संबंध का शानदार उदाहरण है। दोनों हर मिशन के लिए तैयार हैं।”

Airborne Combat Dogs: पहली बार डॉग हैंडलर और कॉम्बैट डॉग के साथ टैंडम जंप

सेना के मुताबिक, ऐसा बहुत कम देखने को मिला है, जब किसी डॉग हैंडलर और उसके कॉम्बैट डॉग ने टैंडम पैराशूट डिसेंट किया है। इस दौरान एक प्रशिक्षित पैराट्रूपर के साथ डॉग हैंडलर और उसके मिलिट्री डॉग एक ही जंप प्रोफाइल में शामिल रहे। इस अभ्यास की खास बात यह भी थी कि तीनों के पास पूरा कॉम्बैट लोड मौजूद था।

सेना ने बताया कि इससे पहले संबंधित कॉम्बैट डॉग के साथ मिलिट्री फ्री फॉल जंप भी किए जा चुके थे। अब फुल कॉम्बैट लोड के साथ टैंडम जंप और लैंडिंग का अभ्यास किया गया है।

क्यों जरूरी है एयरबोर्न कॉम्बैट डॉग क्षमता

आधुनिक युद्ध और आतंकवाद विरोधी अभियानों में कई बार सैनिकों को ऐसे इलाकों में उतरना पड़ता है, जहां रनवे, सड़क या हेलिपैड उपलब्ध नहीं होते। ऐसे हालात में स्पेशल फोर्सेज को पैराशूट के जरिए टारगेट एरिया के पास उतारा जाता है।

अब यदि कॉम्बैट डॉग्स भी उसी समय सैनिकों के साथ उतर सकें, तो ऑपरेशन शुरू होने के तुरंत बाद विस्फोटक खोजने, संदिग्धों का पीछा करने, इमारतों की तलाशी लेने और ट्रैकिंग जैसे कार्य शुरू किए जा सकते हैं। यही वजह है कि अमेरिका, फ्रांस और रूस जैसे देशों की स्पेशल फोर्सेज लंबे समय से एयरबोर्न कैनाइन टीमों का इस्तेमाल करती रही हैं। यहां तक कि पाकिस्तान के ऐब्टाबाद में छिपे बैठे आतंकी ओसामा बिन लादेन को मारने के लिए यूएस नेवी सील्स उस समय अपने साथ कॉम्बैट डॉग कायरो (मेलिनोइस) को लेकर गए थे। (Airborne Combat Dogs)

पैराशूट जंप से पहले होती है विशेष ट्रेनिंग

किसी सैन्य कुत्ते को सीधे विमान से कूदने के लिए तैयार नहीं किया जाता। इसके पीछे कई महीनों की विशेष ट्रेनिंग होती है। भारतीय सेना के कॉम्बैट डॉग्स की प्राइमरी ट्रेनिंग मेरठ स्थित रिमाउंट एंड वेटरिनरी कॉर्प्स (आरवीसी) सेंटर एंड कॉलेज में होती है। यहां उन्हें आज्ञापालन, ट्रैकिंग, विस्फोटक पहचान, हमला और सुरक्षा से जुड़ी ट्रेनिंग दी जाती है।

इसके बाद यूनिट स्तर पर बैटल इनोक्यूलेशन कराया जाता है। इस दौरान कुत्तों को गोलीबारी, विस्फोट, धुआं, तेज आवाज और युद्ध जैसी परिस्थितियों का सामना कराया जाता है ताकि वास्तविक ऑपरेशन के दौरान वे घबराएं नहीं। एयरबोर्न ट्रेनिंग के लिए उन्हें स्पेशल फोर्सेज और पैराट्रूपर्स के साथ अतिरिक्त अभ्यास कराया जाता है। (Airborne Combat Dogs)

पहले सिखाई गई हेलीकॉप्टर से रस्सी के जरिए उतरने की तकनीक

पैराशूट जंप से पहले सेना ने कॉम्बैट डॉग्स को हेलीकॉप्टर से स्लिदरिंग तकनीक भी सिखाई थी। स्लिदरिंग में सैनिक और कुत्ता हेलीकॉप्टर से रस्सी के सहारे जमीन पर उतरते हैं।

मई 2026 में मणिपुर के लेइमाखोंग क्षेत्र में स्पीयर कॉर्प्स की रेड शील्ड डिवीजन की पांच के-9 टीमों ने एडवांस हेली-स्लिदरिंग ट्रेनिंग पूरी की थी।

सदर्न कमांड की 25 आर्मी डॉग यूनिट ने पुणे में 12 मीटर ऊंचा स्लिदरिंग टावर भी बनाया है। इसका उद्देश्य कुत्तों को ऊंचाई के डर से मुक्त करना और हैंडलर के साथ संतुलन बनाए रखने की ट्रेनिंग देना है। (Airborne Combat Dogs)

कौन सी नस्लें निभा रही हैं सबसे बड़ी भूमिका

भारतीय सेना में कई नस्लों के सैन्य कुत्ते तैनात हैं। इनमें बेल्जियन मेलिनोइस, जर्मन शेफर्ड और लैब्राडोर प्रमुख हैं। बेल्जियन मेलिनोइस को स्पेशल फोर्सेज के अभियानों के लिए सबसे उपयुक्त माना जाता है क्योंकि यह तेज, फुर्तीला और अत्यधिक प्रशिक्षित होने वाला कुत्ता है।

सेना अब स्वदेशी नस्लों जैसे मुदहोल हाउंड और रामपुर हाउंड को भी बढ़ावा दे रही है। इन नस्लों को भारतीय मौसम और भौगोलिक परिस्थितियों के लिए बेहतर माना जाता है। (Airborne Combat Dogs)

सेना के लिए क्यों महत्वपूर्ण हैं कॉम्बैट डॉग्स

दशकों से सेना, केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों और अन्य सुरक्षा एजेंसियों के लिए सैन्य कुत्ते महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं। इनका इस्तेमाल सीमा सुरक्षा, गश्त, आतंकवाद विरोधी अभियान, विस्फोटक और बारूदी सुरंगों की पहचान, वीआईपी सुरक्षा, तस्करी रोकने और सर्च एंड रेस्क्यू ऑपरेशन में किया जाता है।

कॉम्बैट डॉग्स को फोर्स मल्टीप्लायर माना जाता है क्योंकि वे ऐसे स्थानों तक पहुंच सकते हैं जहां इंसानों का पहुंचना मुश्किल होता है। कई कुत्तों को कैमरों और सेंसर से भी लैस किया जाता है, जिससे वे रियल टाइम टैक्टिकल जानकारी उपलब्ध करा सकते हैं। (Airborne Combat Dogs)

कई कैनाइन वॉरियर्स ने दिखाई है वीरता

भारतीय सेना के कई कॉम्बैट डॉग्स ने आतंकवाद विरोधी अभियानों में असाधारण साहस दिखाया है। बेल्जियन मेलिनोइस नस्ल का फैंटम, जो 9 पैरा स्पेशल फोर्सेज के साथ तैनात था, 2024 में अखनूर सेक्टर में अभियान के दौरान शहीद हो गया था। उसे 2025 में मेंशन-इन-डिस्पैचेज सम्मान दिया गया था।

फरवरी 2026 में किश्तवाड़ ऑपरेशन के दौरान 2 पैरा स्पेशल फोर्सेज के जर्मन शेफर्ड टायसन को गोली लगी थी। घायल होने के बावजूद उसने ऑपरेशन में सहयोग जारी रखा। राजौरी में 2023 के एक ऑपरेशन के दौरान लैब्राडोर केंट ने अपने हैंडलर को बचाते हुए चोटें झेली थीं। सेना में सेवा के दौरान शहीद होने वाले सैन्य कुत्तों को पूर्ण सैन्य सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी जाती है। (Airborne Combat Dogs)

डॉग्स के लिए तैयार हो रहे स्मार्ट कॉलर और बुलेटप्रूफ वेस्ट

भारतीय सेना अपने कैनाइन वॉरियर्स के लिए नई सुरक्षा तकनीक भी डेवलप कर रही है। मॉड्यूलर बुलेटप्रूफ वेस्ट तैयार किए जा रहे हैं, जो आतंकवाद विरोधी अभियानों और नियंत्रण रेखा जैसे संवेदनशील इलाकों में कुत्तों को गोलियों और छर्रों से सुरक्षा प्रदान करेंगे।

इसके अलावा स्मार्ट कॉलर भी विकसित किए जा रहे हैं। ये कॉलर शरीर का तापमान, पल्स, सांस लेने की गति, हृदय गति में बदलाव और कैलोरी खर्च जैसी जानकारियां रिकॉर्ड करेंगे।

सेना का मानना है कि अत्यधिक गर्मी, ठंड, थकान, जहरीले वातावरण और लंबे अभियानों के दौरान इन जानकारियों से कुत्तों की सेहत पर नजर रखने में मदद मिलेगी। (Airborne Combat Dogs)

भारत-अमेरिका का सबसे बड़ा युद्ध अभ्यास शुरू! पहली बार दो मोर्चों पर ट्रेनिंग, आईबीजी और काउंटर-ड्रोन सिस्टम पर फोकस

Yudh Abhyas 2026
India-US Yudh Abhyas 2026 Begins With Focus on Integrated Battle Groups, Drones and Multi-Domain Warfare

Yudh Abhyas 2026: भारत और अमेरिका के बीच होने वाला संयुक्त सैन्य अभ्यास युद्ध अभ्यास-2026 उत्तराखंड के औली और राजस्थान के महाजन फील्ड फायरिंग रेंज में शुरू हो गया है। यह दोनों देशों के बीच आयोजित होने वाले सबसे बड़े द्विपक्षीय सैन्य अभ्यास का 22वां संस्करण है। इस बार अभ्यास का मुख्य उद्देश्य पहाड़ी और अर्ध-पहाड़ी इलाकों में इंटीग्रेटेड बैटल ग्रुप (आईबीजी) के इस्तेमाल के लिए दोनों सेनाओं की संयुक्त क्षमता को मजबूत करना है। वहीं, दोनों इलाकों में एक साथ ट्रेनिंग से सैनिकों को अलग-अलग परिस्थितियों में संयुक्त सैन्य अभियान चलाने का अनुभव मिलेगा।

9 सितंबर से शुरू हुआ यह अभ्यास 28 सितंबर तक चलेगा। उद्घाटन समारोह औली फॉरेन ट्रेनिंग नोड में आयोजित किया गया, जहां भारतीय सेना की ओर से 14 इन्फैंट्री डिवीजन के जनरल ऑफिसर कमांडिंग मेजर जनरल अमरेश गुंजन और अमेरिकी सेना की ओर से 11वीं एयरबोर्न डिवीजन की प्रथम इन्फैंट्री ब्रिगेड कॉम्बैट टीम के कमांडर कर्नल बेंजामिन जैकमैन मौजूद रहे।

दोनों देशों की सेनाओं से करीब 600-600 सैनिक इस अभ्यास में भाग ले रहे हैं। अभ्यास का आयोजन एक साथ दो अलग-अलग इलाकों में किया जा रहा है, ताकि विभिन्न प्रकार के युद्धक्षेत्रों में संयुक्त ऑपरेशन की क्षमता विकसित की जा सके।

Yudh Abhyas 2026: औली और महाजन में अलग-अलग युद्ध परिस्थितियों का अभ्यास

इस बार यह अभ्यास खास इसलिए है क्योंकि पहली बार इसे एक साथ दो अलग-अलग स्थानों पर आयोजित किया जा रहा है, जिनके बीच करीब 1,000 किलोमीटर से अधिक की दूरी है और दोनों का भूभाग भी पूरी तरह अलग है।

इसके लिए उत्तराखंड के पहाड़ी इलाके औली को चुना गया है, जहां एक्सरसाइज होनी है। औली चमोली जिले में लगभग 10,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। यह स्थान वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के नजदीक है और भारतीय सेना के लिए रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। यहां सैनिकों को इंटीग्रेटेड बैटल ग्रुप्स के तहत ऑपरेशन की ट्रेनिंग दी जा रही है।

15 सितंबर से शुरू हुए इस चरण में लंबी दूरी तक सटीक फायरिंग, ड्रोन खतरों से निपटने की रणनीति और पर्वतीय इलाकों में युद्ध संचालन से जुड़े अभ्यास शामिल हैं। कार्यक्रम के अंत में दोनों देशों की सेनाएं संयुक्त लाइव फायर डेमोंस्ट्रेशन भी करेंगी।

दूसरी ओर राजस्थान का महाजन फील्ड फायरिंग रेंज रेगिस्तानी और अर्ध-रेगिस्तानी इलाका है। यहां बड़े स्तर पर लाइव फायरिंग, मैकेनाइज्ड ऑपरेशन और आर्टिलरी अभ्यास किए जाते हैं। महाजन में दोनों सेनाएं लेटेस्ट वेपन सिस्टम्स, ड्रोन और ऑटोनॉमस सिस्टम्स का प्रदर्शन कर रही हैं।

इन सिस्टम्स का इस्तेमाल निगरानी, टोही और युद्धक्षेत्र में सूचना जुटाने के लिए किया जा रहा है। इसके अलावा दोनों देशों के विशेषज्ञ उभरती सैन्य तकनीकों और मल्टी-डोमेन वॉरफेयर से जुड़े विषयों पर विचार-विमर्श भी कर रहे हैं।

एक साथ दो जगह अभ्यास क्यों?

इस बार अभ्यास को दो अलग-अलग स्थानों पर एक साथ आयोजित करने का उद्देश्य सैनिकों को विभिन्न प्रकार के भूभाग और ऑपरेशनल परिस्थितियों में ट्रेनिंग देना है। औली में जहां ऊंचाई वाले पहाड़ी क्षेत्रों में इंन्फैंट्री के ऑपरेशन पर जोर दिया जा रहा है, वहीं राजस्थान में सटीक हथियारों, ड्रोन और काउंटर-ड्रोन तकनीकों का उपयोग सिखाया जा रहा है। इससे दोनों सेनाएं एक ही अभ्यास के दौरान अधिक व्यापक क्षमताओं का परीक्षण कर पा रही हैं। (Yudh Abhyas 2026)

आईबीजी कॉन्सेप्ट पर विशेष जोर

युद्ध अभ्यास-2026 में सबसे अहम इंटीग्रेटेड बैटल ग्रुप (आईबीजी) का कॉन्सैप्ट है। इस अभ्यास का मुख्य उद्देश्य पहाड़ी और अर्ध-पहाड़ी इलाकों में आईबीजी के इस्तेमाल की क्षमता को और बेहतर बनाना है, खासकर उन अभियानों में जहां इन्फैंट्री की भूमिका ज्यादा होती है।

इस अभ्यास के दौरान भारतीय और अमेरिकी सेनाएं यह समझने का प्रयास कर रही हैं कि अमेरिकी ब्रिगेड कॉम्बैट टीम (BCT) और भारतीय आईबीजी एक-दूसरे के साथ बेहतर तालमेल कैसे बना सकते हैं। पहाड़ी क्षेत्रों में आईबीजी की योजना, मूवमेंट और फायर सपोर्ट कैसे काम करेगा। ड्रोन, काउंटर-ड्रोन सिस्टम और प्रिसिजन फायर को आईबीजी के ढांचे में कैसे शामिल किया जाए। वहीं, उत्तराखंड के औली जैसे पहाड़ी क्षेत्र और राजस्थान के महाजन फील्ड फायरिंग रेंज जैसे रेगिस्तानी इलाके में एक ही वॉर कॉन्सैप्ट को कैसे लागू किया जाए।

बता दें कि आईबीजी भारतीय सेना की नई बैटल फॉर्मेशन है। इसे तेजी से तैनात होने वाली मिलिट्री फॉर्मेशन के तौर पर डेवलप किया गया है। इसमें इन्फैंट्री, आर्टिलरी, इंजीनियर, एयर डिफेंस, सिग्नल और लॉजिस्टिक्स जैसी क्षमताएं एक ही फॉर्मेशन में शामिल रहती हैं।

वहीं, रेगुलर डिवीजन की तुलना में आईबीजी को कम समय में युद्ध में भेजा जा सकता है। इसका लक्ष्य युद्ध की स्थिति में तेजी से प्रतिक्रिया देना और कम समय में सैन्य क्षमता का इसतेमाल करना है। (Yudh Abhyas 2026)

अमेरिकी बीसीटी और भारतीय आईबीजी की समानताएं

अमेरिकी सेना की ब्रिगेड कॉम्बैट टीम (बीसीटी) भी कंबाइंड आर्म्स मिलिट्री स्ट्रक्चर है। यही कारण है कि युद्ध अभ्यास-2026 को दोनों सेनाओं के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

भारतीय आईबीजी और अमेरिकी बीसीटी दोनों का उद्देश्य इन्फैंट्री, फायर सपोर्ट, इंजीनियरिंग और लॉजिस्टिक क्षमताओं को इंटीग्रेट करके युद्ध में तेजी से कार्रवाई करना है। अभ्यास के दौरान दोनों सेनाएं कमांड एंड कंट्रोल, ऑपरेशनल प्लानिंग और संयुक्त कार्रवाई से जुड़ी प्रक्रियाओं का आदान-प्रदान कर रही हैं।

अमेरिकी सेना में आमतौर पर कर्नल एक ब्रिगेड की कमान संभालता है, जबकि मेजर जनरल एक डिवीजन का नेतृत्व करता है। लेकिन भारतीय सेना ने आईबीजी की कमान सीधे मेजर जनरल स्तर के अधिकारी को दी है। इसका मतलब है कि इस फॉर्मेशन को ज्यादा अधिकार, तेजी से फैसले लेने की क्षमता और अधिक फायरपावर मिली है।

लंबी दूरी की मिसाइल और रॉकेट सिस्टम का इंटीग्रेशन

इस साल के युद्ध अभ्यास की एक खास खूबी भारत और अमेरिका की लंबी दूरी की सटीक मारक क्षमता वाली प्रणालियों का डिजिटल इंटीग्रेशन है। अमेरिकी सेना के अनुसार, दोनों देशों के लॉन्ग-रेंज प्रिसिजन फायर और रॉकेट सिस्टम को इंटीग्रेटेड तरीके से ऑपरेट किया जाएगा। इसका प्रदर्शन औली में होने वाले अंतिम लाइव फायर कार्यक्रम में देखने को मिलेगा। (Yudh Abhyas 2026)

पहली बार भारत में एडवांस काउंटर-ड्रोन सिस्टम

युद्ध अभ्यास-2026 में अमेरिकी सेना का मोबाइल लो, स्लो, स्मॉल अनमैन्ड एयरक्राफ्ट इंटीग्रेटेड डिफीट सिस्टम (एमएलआईडीएस) भी शामिल किया गया है।

यह एक एडवांस काउंटर-ड्रोन सिस्टम है जिसे कम ऊंचाई पर उड़ने वाले छोटे ड्रोन की पहचान और उन्हें निष्क्रिय करने के लिए विकसित किया गया है।

इस प्रणाली में रडार, इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल सेंसर, इन्फ्रारेड सेंसर और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर उपकरण लगे होते हैं। आधुनिक युद्धक्षेत्र में ड्रोन खतरों से निपटने के लिए इसे महत्वपूर्ण माना जाता है। (Yudh Abhyas 2026)

मल्टी-डोमेन ऑपरेशन पर भी प्रशिक्षण

अमेरिकी सेना की थर्ड मल्टी-डोमेन टास्क फोर्स (3एमडीटीएफ) भी इस अभ्यास का हिस्सा है। यह यूनिट केवल पारंपरिक युद्ध तक सीमित नहीं है, बल्कि साइबर, स्पेस, सूचना युद्ध और लंबी दूरी की प्रिसिजन स्ट्राइक जैसी क्षमताओं पर काम करती है।

अभ्यास के दौरान दोनों सेनाएं डिजिटल नेटवर्क के माध्यम से सूचना साझा करने, लक्ष्य पहचानने और संयुक्त फायर मिशन चलाने की प्रक्रिया का अभ्यास कर रही हैं। (Yudh Abhyas 2026)

2004 से जारी है युद्ध अभ्यास

भारत और अमेरिका के बीच युद्ध अभ्यास की शुरुआत वर्ष 2004 में हुई थी। शुरुआती वर्षों में इसका फोकस आतंकवाद विरोधी अभियानों और शांति स्थापना मिशनों पर था।

समय के साथ इस अभ्यास का स्वरूप बदलता गया और इसमें आधुनिक युद्ध तकनीकों, डिजिटल कमांड सिस्टम, ड्रोन ऑपरेशन, साइबर क्षमताओं और मल्टी-डोमेन ऑपरेशन को शामिल किया गया। (Yudh Abhyas 2026)

क्या राफेल और स्कैल्प मिसाइल को दूर से किया जा सकता है कंट्रोल? रूसी एक्सपर्ट्स का बड़ा दावा- फाइटर जेट में हो सकता है ‘किल स्विच’!

Rafale Kill Switch
Rafale ‘Kill Switch’ Debate: Russian Claims Raise Questions Over India’s 114 Fighter Jet Deal. (AI Generated Image)

Rafale Kill Switch: भारतीय वायुसेना के लिए खरीदे जाने वाले 114 नए राफेल मल्टी-रोल फाइटर जेट को लेकर एक चौंकाने वाला खुलासा सामने आया है। रूस के सेंटर फॉर एनालिसिस ऑफ वर्ल्ड आर्म्स ट्रेड (सीएडब्ल्यूएटी) से जुड़े कुछ विशेषज्ञों ने दावा किया है कि एक्सपोर्ट वर्जन राफेल लड़ाकू विमानों और स्कैल्प-ईजी (एससीएएलपी-ईजी) क्रूज मिसाइलों में ऐसे सॉफ्टवेयर और हार्डवेयर फीचर हो सकते हैं, जिन्हें बाहरी इलेक्ट्रॉनिक सिग्नल के जरिए एक्टिव किया जा सकता है।

हालांकि इन दावों को लेकर अभी तक कोई सार्वजनिक तकनीकी या फोरेंसिक सबूत सामने नहीं आया है। फ्रांस ने भी कभी ऐसी किसी क्षमता की पुष्टि नहीं की है। इसके बावजूद यह मामला भारत के लिए इसलिए अहम माना जा रहा है क्योंकि भारतीय वायुसेना के 114 फाइटर जेट कार्यक्रम में राफेल एफ-4 सबसे मजबूत दावेदारों में शामिल है।

Rafale Kill Switch: क्या कहा गया है रूसी रिपोर्ट में?

रूसी डिफेंस एनालिस्ट रिया नोवोस्ती ने दावा किया है कि रूस के सेंटर फॉर एनालिसिस ऑफ वर्ल्ड आर्म्स ट्रेड ने एक एक्सपर्ट स्टडी जारी की है। स्टडी में रूसी विशेषज्ञों ने दावा किया गया कि एक्सपोर्ट के लिए बनाए गए राफेल विमानों में ऐसे सॉफ्टवेयर और हार्डवेयर “बग” मौजूद हो सकते हैं जिन्हें दूर से एक्टिवेट किया जा सकता है।

रिपोर्ट में कहा गया, “फ्रांस के पास स्कैल्प-ईजी मिसाइलों के युद्ध में इस्तेमाल को रोकने की क्षमता हो सकती है और भारत को इस पहलू पर विचार करना चाहिए।”

यह दावा सीधे तौर पर भारत की उस रणनीतिक सोच को चुनौती देता है जिसके तहत वह अपने लड़ाकू विमानों में स्वदेशी हथियार, डेटा लिंक, सेंसर और इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम जोड़ने की आजादी चाहता है।

ऑपरेशन सिंदूर का भी किया गया जिक्र

रूसी रिपोर्ट ने मई 2025 में हुए ऑपरेशन सिंदूर का भी उल्लेख किया है। रिपोर्ट के अनुसार भारतीय वायुसेना ने मई 2025 में पहली बार 10 स्कैल्प-ईजी लंबी दूरी की क्रूज मिसाइल का इस्तेमाल किया था। इनमें से 9 मिसाइलें अपने टारगेट पर सफलतापूर्वक लगीं, जबकि 1 मिसाइल में इंजन खराबी का दावा किया गया है। इन हमलों में आतंकवादी ठिकाने, कमांड एवं कंट्रोल सेंटर, हैंगर और एयरबेस के इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बनाया गया था। उस दौरान ब्रह्मोस, हैमर, रैंपेज, और क्रिस्टल मेज मिसाइलें भी इस्तेमाल की गई थीं। वहीं, ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत 100 से 150 अतिरिक्त स्कैल्प-ईजी मिसाइलें खरीदने की योजना बना रहा है।

रिपोर्ट में सवाल उठाया गया कि क्या उस दौरान राफेल विमानों को किसी प्रकार की सॉफ्टवेयर या सिस्टम संबंधी दिक्कत हुई थी? हालांकि इस संबंध में न भारत सरकार ने कोई आधिकारिक जानकारी दी है और न ही फ्रांस ने किसी तरह की तकनीकी दखल की बात स्वीकार की है। इसलिए यह दावा पूरी तरह अनुमान आधारित माना जा रहा है। (Rafale Kill Switch)

कोई तकनीकी सबूत सामने नहीं

रूसी रिपोर्ट खुद भी स्वीकार करती है कि अंतिम निष्कर्ष केवल भारतीय जांच एजेंसियां ही निकाल सकती हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि किसी विमान में वास्तव में दूर से एक्टिव होने वाला “किल स्विच” मौजूद हो, तो उसके लिए सुरक्षित कम्युनिकेशन सिस्टम, ऑथेंटिकेशन प्रोटोकॉल, कमांड चैनल और विशेष सॉफ्टवेयर आर्किटेक्चर की जरूरत होगी।

अब तक ऐसा कोई सार्वजनिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है जो दिखाए कि राफेल में ऐसा कोई सिस्टम मौजूद है।

फ्रांस नहीं देता सॉफ्टवेयर कंट्रोल

राफेल विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू “किल स्विच” नहीं बल्कि सॉफ्टवेयर कंट्रोल है। राफेल के सबसे संवेदनशील सिस्टम जैसे थेल्स आरबीई-2 एईएसए रडार, स्पेक्ट्रा इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सूट, मिशन कंप्यूटर और सेंसर फ्यूजन सॉफ्टवेयर का सोर्स कोड फ्रांस अपने किसी भी ग्राहक देश को नहीं देता।

इसका मतलब यह है कि विमान खरीदने वाला देश राफेल का उपयोग तो कर सकता है, लेकिन उसके मूल सॉफ्टवेयर में अपनी तरफ से बदलाव नहीं कर सकता।

भारत, मिस्र, कतर, ग्रीस, इंडोनेशिया और संयुक्त अरब अमीरात जैसे सभी राफेल ऑपरेटर इसी सिस्टम के तहत विमान चला रहे हैं। (Rafale Kill Switch)

भारत चाहता है आईसीडी तक पहुंच

भारत की मांग है कि उसे कम से कम इंटरफेस कंट्रोल डॉक्यूमेंट्स (आईसीडी) तक पहुंच मिले। आईसीडी वह तकनीकी दस्तावेज होता है जिसकी मदद से कोई देश अपने हथियार और इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम विमान में जोड़ सकता है। भारत की भविष्य में राफेल पर अस्त्र एमके-1, अस्त्र एमके-2, रुद्रम एंटी-रेडिएशन मिसाइल, स्मार्ट एंटी एयरफील्ड वेपन और ब्रह्मोस-एनजी जैसे स्वदेशी हथियारों के साथ नेशनल डेटालिंक से जोड़ने की योजना है। इसके लिए उसे फ्रांसीसी कंपनियों की मंजूरी पर पूरी तरह निर्भर नहीं रहना है।

वहीं, इससे पहले राफेल-एम लड़ाकू विमान में भारत के स्वदेशी “उत्तम” एईएसए रडार को लगाने की योजना थी, लेकिन उसे टाल दिया गया, क्योंकि इसके लिए विमान के मिशन सिस्टम में बड़े बदलाव करने पड़ते। इससे लागत बहुत अधिक बढ़ जाती और प्रोजेक्ट में लगभग आठ साल की देरी हो सकती थी। (Rafale Kill Switch)

टाटा समूह बना सकता है 94 राफेल

फरवरी 2026 में भारत ने 114 नए फाइटर जेट खरीदने की आवश्यकता को मंजूरी दी थी। इनमें 88 सिंगल सीटर और 26 ट्विन सीटर शामिल हैं। अगस्त 2026 में फ्रांसीसी कंपनी दसॉ एविएशन ने अपना औपचारिक प्रस्ताव भी जमा कर दिया। प्रस्ताव के अनुसार लगभग 20 विमान सीधे फ्रांस से आएंगे जबकि करीब 94 विमान भारत में टाटा समूह की भागीदारी से बनाए जा सकते हैं।

हालांकि इस सौदे की अंतिम कीमत अभी तय नहीं हुई है, लेकिन विमान, हथियार, बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर, ट्रेनिंग, मेंटेनेंस, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और पूरे सर्विस लाइफ सपोर्ट को जोड़ने पर इसकी कुल लागत लगभग 30 अरब डॉलर तक पहुंच सकती है। यही कारण है कि डिजिटल संप्रभुता और सॉफ्टवेयर नियंत्रण का मुद्दा बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। (Rafale Kill Switch)

स्कैल्प मिसाइल कैसे काम करती है?

एससीएएलपी-ईजी एक लंबी दूरी की क्रूज मिसाइल है जिसका वजन लगभग 1,300 किलोग्राम है। इसकी लंबाई करीब 5.1 मीटर है और इसमें लगभग 450 किलोग्राम का ब्रॉच वारहेड लगा होता है। यह मिसाइल लॉन्च होने के बाद इनर्शियल नेविगेशन, सैटेलाइट पोजिशनिंग, टेरेन रेफरेंस सिस्टम और इमेजिंग इंफ्रारेड सीकर की मदद से अपने टारगेट तक पहुंचती है।

मिसाइल के अलग-अलग वर्जन और उसके उड़ान प्रोफाइल के आधार पर इसकी मारक क्षमता लगभग 250 से 560 किलोमीटर तक मानी जाती है। इससे राफेल लड़ाकू विमान दुश्मन के मजबूत एयर डिफेंस क्षेत्र से काफी दूर रहकर ही मिसाइल दाग सकते हैं।

सैन्य विशेषज्ञों का कहना है कि मिसाइल लॉन्च होने के बाद उसे दूर से रोकना तकनीकी रूप से काफी जटिल काम होगा क्योंकि वह पहले से प्रोग्राम किए गए मार्ग पर उड़ती है। स्कैल्प और उसका ब्रिटिश संस्करण स्टॉर्म शैडो इराक, लीबिया, सीरिया, यमन, यूक्रेन और भारत-पाकिस्तान संघर्ष जैसे कई युद्ध क्षेत्रों में इस्तेमाल हो चुके हैं। लेकिन अब तक ऐसा कोई सार्वजनिक और प्रमाणित मामला सामने नहीं आया है, जिसमें फ्रांस या ब्रिटेन ने किसी ग्राहक देश को पहले से दी गई और लॉन्च की गई मिसाइल को दूर से डिसेबल कर दिया हो। (Rafale Kill Switch)

राफेल में सॉफ्टवेयर की तीन लेयर

राफेल की पहली लेयर उसका मुख्य लड़ाकू सॉफ्टवेयर है जिसमें रडार, सेंसर, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और हथियार प्रबंधन शामिल है। दूसरी लेयर इंटरफेस कंट्रोल डॉक्यूमेंट्स की है, जो बाहरी हथियारों और सिस्टम को विमान से जोड़ने में मदद करती है। तीसरी लेयर एप्लीकेशन प्रोग्रामिंग इंटरफेस की है, जिसके जरिए ग्राहक देश कुछ अतिरिक्त सिस्टम जोड़ सकते हैं, लेकिन मुख्य फ्रांसीसी सॉफ्टवेयर तक पहुंच नहीं मिलती। यही वजह है कि भारत और फ्रांस के बीच बातचीत का बड़ा हिस्सा सॉफ्टवेयर राइट्स और वेपन इंटीग्रेशन पर फोकस है। (Rafale Kill Switch)

36 राफेल के भी नहीं मिले थे कोड

2016 में भारत ने 36 राफेल विमानों का सौदा किया था। उस समय भी भारत को सोर्स कोड या पूर्ण आईसीडी एक्सेस नहीं मिला था। इसके कारण भारतीय हथियारों और सिस्टम को राफेल में जोड़ने के लिए फ्रांसीसी कंपनियों की तकनीकी मदद लेनी पड़ी थी। अस्त्र मिसाइल इंटीग्रेशन में दसॉ-थेल्स की मदद ली गई थी। जिसके लिए ट्रायल्स और सर्टिफिकेशन अभी भी जारी है, जिसके 2028 तक पूरा होने की उम्मीद है।

किसी फाइटर जेट में मिसाइल को जोड़ना केवल उसे विमान के नीचे लगाना भर नहीं होता। इसके लिए इंजीनियरों को यह सुनिश्चित करना पड़ता है कि मिसाइल को सही पावर मिले, उसका कूलिंग सिस्टम ठीक से काम करे, विमान और मिसाइल के इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम एक-दूसरे में कोई बाधा न डालें, दोनों के बीच डेटा का आदान-प्रदान सही हो, टारगेट की जानकारी सही तरीके से पहुंचे, मिसाइल किन परिस्थितियों में सुरक्षित रूप से दागी जा सकती है, लॉन्च के समय वह विमान से सुरक्षित तरीके से अलग हो, इमरजेंसी में उसे तुरंत गिराया जा सके और विमान का स्टोर्स मैनेजमेंट सिस्टम उसे सही तरीके से कंट्रोल कर सके। (Rafale Kill Switch)

अब IED फटने का खतरा होगा कम, सेना खरीदने जा रही है 4 मीटर रेंज वाले 250 एडवांस टेलीस्कॉपिक मैनिपुलेटर

Indian Army Telescopic Manipulator
Indian Army Plans To Procure 250 Telescopic Manipulators For Safe IED Handling And Bomb Disposal Operations. (AI Generated Image)

Indian Army Telescopic Manipulator: भारतीय सेना ने आतंकवाद प्रभावित इलाकों और काउंटर-आईईडी अभियानों में तैनात बम निरोधक टीमों की सुरक्षा बढ़ाने के लिए एक महत्वपूर्ण खरीद प्रक्रिया शुरू कर दी है। भारतीय सेना ने टेलीस्कॉपिक मैनिपुलेटर की खरीद के लिए रिक्वेस्ट फॉर इनफॉरमेशन (आरएफआई) जारी किया है। यह इक्विपमेंट बम डिस्पोजल ऑपरेटरों को संदिग्ध पैकेज, इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस (आईईडी), बिना फटे गोला-बारूद और अन्य खतरनाक वस्तुओं को सुरक्षित दूरी से संभालने में मदद करेगा। इसका उद्देश्य ऑपरेटर को सीधे खतरे के क्षेत्र से दूर रखना और विस्फोट की स्थिति में उसके जोखिम को कम करना है। सेना करीब 250 टेलीस्कॉपिक मैनिपुलेटर सिस्टम खरीदने की योजना बना रही है।

Indian Army Telescopic Manipulator: काउंटर-आईईडी ऑपरेशन के लिए बेहद जरूरी

सेना के इंजीनियर-इन-चीफ ब्रांच के कॉम्बैट इंजीनियर्स निदेशालय ने टेलीस्कॉपिक मैनिपुलेटर की खरीद के लि जारी आरएफआई में लिखा है कि आधुनिक सैन्य अभियानों में आईईडी सबसे बड़े खतरों में से एक माने जाते हैं। जम्मू-कश्मीर, पूर्वोत्तर और अन्य संवेदनशील क्षेत्रों में सुरक्षा बलों को अक्सर सड़क किनारे लगाए गए विस्फोटकों, संदिग्ध बैग, पैकेज और गोला-बारूद का सामना करना पड़ता है।

आरएफआई में कहा गया है कि टेलीस्कॉपिक मैनिपुलेटर का इस्तेमाल ईओडी यानी एक्सप्लोसिव ऑर्डनेंस डिस्पोजल टीमें करेंगी।

बम और जवान के बीच बनेगी सुरक्षित दूरी

आतंकवाद प्रभावित क्षेत्रों, सीमावर्ती इलाकों और शहरों में सुरक्षा एजेंसियों को अक्सर संदिग्ध बैग, पैकेट या आईईडी मिलने की सूचना मिलती है। ऐसी स्थिति में बम निरोधक जवानों को काफी जोखिम उठाकर वस्तु के करीब जाना पड़ता है।

अगर वस्तु में विस्फोटक मौजूद हो और किसी कारण से विस्फोट हो जाए, तो जान का खतरा बढ़ जाता है। सेना जिस टेलीस्कॉपिक मैनिपुलेटर को खरीदना चाहती है, उसका उद्देश्य इसी खतरे को कम करना है।

यह इक्विपमेंट जवान और संदिग्ध वस्तु के बीच कई मीटर की दूरी बनाए रखता है। इससे ऑपरेटर अपेक्षाकृत सुरक्षित स्थान पर खड़ा रहकर पूरी कार्रवाई कर सकता है। (Indian Army Telescopic Manipulator)

क्या है टेलीस्कॉपिक मैनिपुलेटर?

टेलीस्कॉपिक मैनिपुलेटर एक लंबा मैकेनिकल इक्विपमेंट है, जिसमें आगे की तरफ एक विशेष क्लॉ यानी पंजा लगा होता है। यह पंजा संदिग्ध वस्तु को पकड़ने, घुमाने, झुकाने और उठाने में सक्षम होता है।

इस इक्विपमेंट का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा इसका क्लॉ है। सेना चाहती है कि यह पंजा दोनों दिशाओं में 360 डिग्री घूमने में सक्षम हो।

सेना की जरूरत के मुताबिक इस इक्विपमेंट में क्लॉ से कंट्रोल पॉइंट तक कम से कम 4 मीटर की दूरी होनी चाहिए। यानी ऑपरेटर चार मीटर या उससे अधिक दूरी पर रहकर काम कर सकेगा।

पूरी तरह फैलने पर यह मशीन कम से कम 10 किलोग्राम वजन की वस्तु उठा सकेगी। यही वजह है कि इसका इस्तेमाल छोटे आईईडी से लेकर कई प्रकार के संदिग्ध पैकेजों को संभालने में किया जा सकेगा। (Indian Army Telescopic Manipulator)

हल्का होना चाहिए वजन

सेना ने आरएफआई में स्पष्ट किया है कि इक्विपमेंट का वजन ऐसा होना चाहिए कि एक व्यक्ति इसे आसानी से लेकर चल सके। सपोर्ट व्हील हटाने के बाद इसका वजन 15 किलोग्राम से अधिक नहीं होना चाहिए। ऑपरेटर इसे कंधे के पट्टे की मदद से उठा सकेगा। इसका इस्तेमाल केवल खुले मैदानों में ही नहीं, बल्कि संकरी गलियों, इमारतों, सीढ़ियों और वाहनों के नीचे भी किया जा सकेगा।

वहीं, टेलीस्कॉपिक पोल को हल्का और मजबूत बनाने के लिए यह एल्यूमीनियम, कार्बन फाइबर या अन्य आधुनिक कंपोजिट सामग्री से बना हो। इससे इक्विपमेंट का वजन कम रहेगा और मजबूती बनी रहेगी। बम निरोधक टीमों को लंबे समय तक इसे उठाकर चलने में आसानी होगी।

इक्विपमेंट के अंदर के तार पूरी तरह छिपे होंगे ताकि ऑपरेशन के दौरान किसी तार के फंसने या टूटने का खतरा न रहे। (Indian Army Telescopic Manipulator)

डेढ़ घंटे तक लगातार करे काम

टेलीस्कॉपिक मैनिपुलेटर पूरी तरह बैटरी से चलेगा। सेना ने इसकी न्यूनतम ऑपरेशनल एंड्योरेंस 1.5 घंटे तय की है। एक बार चार्ज होने के बाद यह लगातार डेढ़ घंटे तक काम कर सकेगा। इससे बम निरोधक टीमों को कई ऑपरेशन पूरे करने में मदद मिलेगी। आरएफआई में बैटरी की क्वॉलिटी, चार्जिंग साइकिल, स्पेयर बैटरियों और भारतीय बाजार में उपलब्धता से जुड़ी जानकारी भी मांगी गई है।

साथ ही, सेना ने इक्विपमेंट को स्प्लैश प्रूफ रखने की मांग की है। ताकि बारिश, कीचड़ या पानी के छींटों जैसी हालात में भी इक्विपमेंट को चलाया जा सके। इसके अलावा कंपनियों से तापमान, ऊंचाई, आर्द्रता, झटकों और कंपन को सहने की क्षमता से जुड़ी जानकारी भी मांगी है। (Indian Army Telescopic Manipulator)

वीडियो फीड और नाइट ऑपरेशन पर भी फोकस

यदि किसी कंपनी का सिस्टम कैमरे से लैस है तो उसे दिन और रात दोनों समय लाइव वीडियो फीड देने में सक्षम होना चाहिए। इससे ऑपरेटर दूर खड़े होकर स्क्रीन पर संदिग्ध वस्तु को देख सकेगा। कैमरा दिन और रात दोनों परिस्थितियों में काम कर सकेगा। नाइट विजन, जूम और लाइव वीडियो ट्रांसमिशन जैसी सुविधाओं की जानकारी भी कंपनियों से मांगी गई है। नाइट विजन और वीडियो फीड होने से अंधेरे, धुएं या सीमित दृश्यता वाले क्षेत्रों में ऑपरेशन और सुरक्षित हो सकता है। (Indian Army Telescopic Manipulator)

इस खरीद प्रक्रिया में आत्मनिर्भर भारत और मेक इन इंडिया पर विशेष जोर दिया गया है।

सेना चाहती है कि इक्विपमेंट में कम से कम 50 फीसदी स्वदेशी सामग्री शामिल हो। कंपनियों को यह बताना होगा कि डिजाइन, सॉफ्टवेयर, कंपोनेंट और निर्माण का कितना हिस्सा भारत में तैयार किया गया है। देशी उत्पादन होने से स्पेयर पार्ट्स, मरम्मत, तकनीकी सहायता और भविष्य के अपग्रेड आसानी से उपलब्ध हो सकेंगे।

सेना ने कंपनियों से विस्तृत तकनीकी और व्यावसायिक जानकारी मांगी है। आरएफआई से जुड़े सवाल 7 अक्टूबर तक भेजे जा सकते हैं। दस्तावेज जमा करने की अंतिम तिथि 6 नवंबर रखी गई है। इसके बाद टेक्निकल इवैल्यूशन, फील्ड ट्रायल और अन्य प्रक्रियाओं के जरिए सही सिस्टम का चयन किया जाएगा। (Indian Army Telescopic Manipulator)

नौसेना के लिए स्वदेशी मरीन गैस टर्बाइन इंजन बनाने की तैयारियां शुरू, कंपनियों से मांगे प्रस्ताव, चुनिंदा देशों के पास है यह टेक्नोलॉजी

Indigenous Marine Gas Turbine
Indian Navy Launches Indigenous 24-28 MW Marine Gas Turbine Program to Reduce Foreign Dependence, Proposals sought from companies.

Indigenous Marine Gas Turbine: भारतीय नौसेना ने अपने युद्धपोतों के लिए स्वदेशी 24-28 मेगावाट मरीन गैस टर्बाइन डेवलप करने की तैयारियां शुरू कर दी हैं। रक्षा मंत्रालय ने इसके स्वदेशी निर्माण के लिए कंपनियों से एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (EOI) मांगा है। यह वही इंजन है जो नौसेना के युद्धपोतों को चलाने या जहाज पर बिजली पैदा करने के लिए इस्तेमाल होते हैं। 7 सितंबर को ही रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में हुई रक्षा अधिग्रहण परिषद (डीएसी) की बैठक में स्वदेशी मरीन गैस टर्बाइन परियोजना को मंजूरी दी गई थी। फिलहाल भारत इस तकनीक के लिए विदेशी कंपनियों पर निर्भर है। अमेरिका, ब्रिटेन, यूक्रेन और कुछ चुनिंदा यूरोपीय कंपनियों के पास ही यह एडवांस तकनीक मौजूद है। इस प्रोजेक्ट को रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया 2020 की मेक-1 कैटेगरी के तहत आगे बढ़ाया जाएगा।

Indigenous Marine Gas Turbine: विदेशी इंजनों पर निर्भर है नौसेना का बड़ा बेड़ा

भारतीय नौसेना के कई प्रमुख युद्धपोत आज भी विदेशी गैस टर्बाइनों पर निर्भर हैं। कोलकाता क्लास और विशाखापत्तनम क्लास डिस्ट्रॉयर, शिवालिक क्लास और नीलगिरि क्लास फ्रिगेट तथा विमानवाहक पोत आईएनएस विक्रांत जैसे प्लेटफॉर्म मुख्य रूप से यूक्रेन की जोर्या-माशप्रोएक्ट और अमेरिका की जनरल इलेक्ट्रिक एलएम-2500 गैस टर्बाइन का इस्तेमाल करते हैं।

हालांकि एलएम-2500 इंजनों की असेंबली और टेस्टिंग हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) बेंगलुरु में होती है, लेकिन इंजन की कोर टेक्नोलॉजी, हॉट सेक्शन, ब्लेड डिजाइन और अन्य महत्वपूर्ण तकनीकी हिस्से विदेशी नियंत्रण में रहते हैं।

सूत्रों का कहना है कि युद्ध या अंतरराष्ट्रीय संकट के दौरान स्पेयर पार्ट्स, ओवरहॉल और तकनीकी मदद मिलने में दिक्कत हो सकती है। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद ग्लोबल सप्लाई चेन में आई चुनौतियों से सरकार ने सबक लिया है। इसी वजह से भारतीय नौसेना ने लंबे समय से स्वदेशी गैस टर्बाइन डेवलप करने की दिशा में काम शुरू किया था।

जुलाई 2025 में मिली थी प्रारंभिक मंजूरी

इस कार्यक्रम को पहली बड़ी मंजूरी 28 जुलाई 2025 को मिली थी, जब परियोजना को अप्रूवल इन प्रिंसिपल (एआईपी) दिया गया था। इसके बाद नौसेना ने विभिन्न भारतीय कंपनियों और संगठनों की तकनीकी क्षमता का आकलन शुरू किया।

इस दौरान डिजाइन क्षमता, प्रिसीजन मैन्युफैक्चरिंग, टेस्टिंग इंफ्रास्ट्रक्चर, मेटलर्जी, डिजिटल कंट्रोल सिस्टम और लाइफ साइकिल सपोर्ट जैसी क्षमताओं का अध्ययन किया गया। अब 7 सितंबर 2026 को एओएन मिलने के बाद प्रोजेक्ट औपचारिक रूप से डेवलपमेंट फेज शुरू हो गया है। मेक-1 कैटेगरी के तहत सरकार प्रोटोटाइप डेवलपमें की लागत का 70 प्रतिशत तक वहन कर सकती है। इस पूरे कार्यक्रम की लागत लगभग 4,000 से 5,000 करोड़ रुपये के बीच आंकी गई है। (Indigenous Marine Gas Turbine)

24-28 मेगावाट इंजन क्यों है इतना महत्वपूर्ण?

24-28 मेगावाट पावर कैटेगरी के इंजन आधुनिक बड़े युद्धपोतों के मुख्य प्रोपल्शन सिस्टम के लिए उपयुक्त माने जाते हैं। इसी कैटेगरी में जनरल इलेक्ट्रिक एलएम-2500 और जोर्या-माशप्रोएक्ट के कई मरीन इंजन आते हैं।

इतने मेगावाट की ताकत युद्धपोत को तेज रफ्तार, तेज एक्सेलरेशन, लंबी समुद्री तैनाती और युद्धक परिस्थितियों में तेजी से ऑपरेशन करने की क्षमता देती है। आधुनिक नौसेनाएं सीओडीओजी, सीओजीएजी और इंटीग्रेटेड इलेक्ट्रिक प्रोपल्शन जैसे सिस्टम्स का इस्तेमाल कर रही हैं। भारतीय गैस टर्बाइन को भी इन आधुनिक सिस्टम्स के साथ कंपैटेबल बनाना होगा।

नौसेना की योजना के अनुसार इस इंजन का इस्तेमाल भविष्य के डिस्ट्रॉयर और फ्रिगेट कैटेगरी के युद्धपोतों में किया जा सकेगा। (Indigenous Marine Gas Turbine)

गैस टर्बाइन बनाना दुनिया की सबसे कठिन तकनीकों में शामिल

सूत्रों के मुताबिक गैस टर्बाइन टेक्नोलॉजी एयरोस्पेस और डिफेंस सेक्टर की सबसे मुश्किल तकनीकों में गिनी जाती है। इसके लिए अत्यधिक तापमान सहने वाली सामग्री, सटीक इंजीनियरिंग और उन्नत निर्माण तकनीकों की जरूरत होती है।

टर्बाइन के अंदर तापमान 1200 से 1400 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक तक पहुंच सकता है। ऐसे वातावरण में काम करने वाले ब्लेड के लिए सिंगल क्रिस्टल सुपरअलॉय, थर्मल बैरियर कोटिंग और विशेष कूलिंग चैनलों की जरूरत होती है।

भारत में गैस टर्बाइन रिसर्च एस्टेब्लिशमेंट (जीटीआरई), कावेरी इंजन कार्यक्रम और निजी उद्योगों ने इस क्षेत्र में अनुभव हासिल किया है, लेकिन बड़े मरीन इंजन के लिए जरूरी तकनीक डेवलप करना अभी भी चुनौतीपूर्ण माना जाता है। (Indigenous Marine Gas Turbine)

समुद्री वातावरण में इंजन को बचाना भी बड़ी चुनौती

समुद्र में लगातार नमक, नमी और कंपन की स्थिति रहती है। यही वजह है कि किसी भी गैस टर्बाइन को सीधे समुद्री इस्तेमाल के लिए तैयार नहीं किया जा सकता। इंजन में विशेष कोटिंग, एयर फिल्ट्रेशन सिस्टम, सीलिंग तकनीक और जंग से सुरक्षा देने वाले उपाय शामिल करने पड़ते हैं। इस प्रक्रिया को मरीनाइजेशन कहा जाता है।

इसके अलावा इंजन का फुल अथॉरिटी डिजिटल इंजन कंट्रोल सिस्टम यानी फेडेक युद्धपोत के कॉम्बैट मैनेजमेंट सिस्टम से जुड़ा होता है। इसलिए इंजन का प्रदर्शन हर परिस्थिति में स्थिर और विश्वसनीय होना आवश्यक है। (Indigenous Marine Gas Turbine)

चार प्रोटोटाइप बनाकर होंगे परीक्षण

प्रोजेक्ट के तहत शुरुआती चरण में चार प्रोटोटाइप इंजन डेवलप किए जाने की योजना है। इन इंजनों पर प्रयोगशाला और समुद्री वातावरण दोनों में विस्तृत परीक्षण किए जाएंगे। इन परीक्षणों में ईंधन दक्षता, अधिकतम शक्ति, लंबे समय तक संचालन क्षमता, नमक प्रतिरोध, कंपन सहनशीलता और रखरखाव संबंधी मानकों की जांच होगी। सफल परीक्षणों के बाद कम से कम 40 इंजनों की खरीद की जा सकती है।

कई सरकारी और निजी कंपनियां आ सकती हैं साथ

इस प्रोजेक्ट को इंडस्ट्री बेस्ड मॉडल पर डेवलप किया जाएगा। गैस टर्बाइन रिसर्च एस्टेब्लिशमेंट (जीटीआरई) डिजाइन और रिसर्च में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड (बीएचईएल) बड़े औद्योगिक सिस्टम निर्माण का अनुभव रखता है। हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड के पास एलएम-2500 इंजन असेंबली का अनुभव है।

निजी क्षेत्र में भारत फोर्ज जैसे समूह भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। कंपनी विशाखापत्तनम में मरीन गैस टर्बाइन रिपेयर और डेवलपमेंट सुविधाओं पर काम कर रही है। जून 2026 में भारत फोर्ज को 1.25 मेगावाट मरीन गैस टर्बाइन जनरेटर के 12 सेट बनाने का कॉन्ट्रैक्ट भी मिला था। (Indigenous Marine Gas Turbine)

तीन तरह के इंजन पर काम

भारत फिलहाल तीन लेवल पर समानांतर काम कर रहा है। पहला 1.25 मेगावाट मरीन गैस टर्बाइन जनरेटर कार्यक्रम है, जिसका इस्तेमाल जहाजों पर बिजली उत्पादन के लिए किया जाएगा। दूसरा 4 मेगावाट कैटेगरी का गैस टर्बाइन जनरेटर है, जिसे मेक-1 कैटेगरी के तहत डेवलप किया जा रहा है।

तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण कार्यक्रम 24-28 मेगावाट मुख्य प्रोपल्शन गैस टर्बाइन का है। इसी वजह से नौसेना ने स्टेजवाइज स्ट्रैटेजी अपनाई है, ताकि मेटलर्जी, कम्बशन टेक्नोलॉजी, फेडेक कंट्रोल और मरीनाइजेशन जैसी जटिल तकनीकों को धीरे-धीरे मैच्योर बनाया जा सके।

यह परियोजना भारतीय नौसेना की आत्मनिर्भरता से सीधे जुड़ी हुई है। स्वदेशी गैस टर्बाइन उपलब्ध होने पर भविष्य के युद्धपोतों के लिए इंजन, स्पेयर पार्ट्स, मरम्मत और ओवरहॉल की पूरी व्यवस्था देश के भीतर विकसित की जा सकेगी। (Indigenous Marine Gas Turbine)

क्या अगले साल सितंबर से IAF को मिलेंगे तेजस Mk-1A? रक्षा मंत्रालय ने दी नई डिलीवरी टाइमलाइन!

Tejas Mk-1A Delivery Delay
Tejas Mk-1A Delivery Delay: Will the IAF receive the Tejas Mk-1A by September next year? (AI Generated Image)

Tejas Mk-1A Delivery Delay: भारतीय वायुसेना के सबसे महत्वपूर्ण स्वदेशी लड़ाकू विमान तेजस एमके-1ए की डिलीवरी में लगातार देरी हो रही है। फरवरी 2024 में भारतीय वायुसेना को पहला तेजस एमके-1ए मिलना था, लेकिन सितंबर 2026 तक एक भी विमान औपचारिक रूप से वायुसेना को नहीं सौंपा गया है। अब रक्षा मंत्रालय की सालाना रिपोर्ट 2025-26 में खुलासा हुआ है कि मार्क-1 अल्फा की डिलीवरी में और देरी हो सकती है।

बता दें कि अमेरिकी कंपनी जीई एयरोस्पेस से अगस्त 2026 तक एचएएल को कुल 10 एफ-404आईएन20 इंजन मिल चुके हैं।

Tejas Mk-1A Delivery Delay: रक्षा मंत्रालय की रिपोर्ट में क्या कहा गया है?

रक्षा मंत्रालय की सालाना रिपोर्ट 2025-26 के अनुसार, “25 सितंबर 2025 को हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) और रक्षा मंत्रालय के बीच 97 अतिरिक्त तेजस एमके-1ए विमानों का अनुबंध हुआ था। इस ऑर्डर में 68 सिंगल-सीटर फाइटर जेट और 29 ट्विन-सीटर ट्रेनर विमान शामिल हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि इन 97 विमानों की डिलीवरी सितंबर 2027 से शुरू होगी और सितंबर 2033 तक पूरी हो जाएगी।”

यह ऑर्डर पहले से मौजूद 83 तेजस एमके-1ए विमानों के कॉन्ट्रैक्ट से अलग है। दोनों ऑर्डर मिलाकर भारतीय वायुसेना को कुल 180 तेजस एमके-1ए विमान मिलने हैं। अभी तक पहले ऑर्डर के 83 तेजस एमके-1ए विमानों में से एक भी फाइटर जेट डिलीवर नहीं हुआ है। हालांकि रिपोर्ट में पहले बैच के ऑर्डर के डिलीवरी की कोई टाइमलाइन नहीं दी गई है। (Tejas Mk-1A Delivery Delay)

2021 में मिला था पहला बड़ा ऑर्डर

तेजस एमके-1ए कार्यक्रम की शुरुआत फरवरी 2021 में हुई थी। उस समय भारतीय वायुसेना ने 83 विमानों का ऑर्डर दिया था। इनमें 73 सिंगल-सीटर फाइटर और 10 ट्विन-सीटर ट्रेनर विमान शामिल थे। मूल योजना के अनुसार पहला विमान 3 फरवरी 2024 तक वायुसेना को सौंपा जाना था। इसके बाद हर साल लगभग 16 विमान देने का लक्ष्य रखा गया था। पूरा ऑर्डर 2028-29 तक पूरा होना था।

लेकिन सितंबर 2026 तक हालात यह है कि पहली डिलीवरी लगभग 2 साल 7 महीने पीछे चल रही है। (Tejas Mk-1A Delivery Delay)

एचएएल के पास तैयार हैं कई विमान

लोकसभा की रक्षा संबंधी स्थायी समिति के सामने एचएएल ने इस साल मार्च बताया कि उसके पास पांच तेजस एमके-1ए विमान डिलीवरी के लिए लगभग तैयार हैं।

एचएएल अधिकारियों ने संसदीय समिति को बताया था, “एलसीए मार्क-1 अल्फा के लिए हमारे पास पांच विमान तैयार हैं। रडार और डीडब्ल्यूयू का इंटीग्रेशन पूरा हो चुका है। एएसआरएएएम एयर-टू-एयर मिसाइल और अस्त्र बियॉन्ड विजुअल रेंज मिसाइल के परीक्षण भी सफलतापूर्वक पूरे किए जा चुके हैं।”

वहीं, सूत्रों के मुताबिक एचएएल ने लगभग 30 एयरफ्रेम तैयार कर लिए हैं। इनमें से कई विमान प्रोडक्शन और ट्रायल्स के एडवांस फेज में पहुंच चुके हैं। एचएएल का लक्ष्य मार्च 2027 तक पहला पूर्ण स्क्वाड्रन तैयार करना है। एक फाइटर स्क्वाड्रन में सामान्य तौर पर 18 से 20 विमान शामिल होते हैं। (Tejas Mk-1A Delivery Delay)

इंजन सप्लाई ने बढ़ाईं मुश्किलें

कार्यक्रम में देरी की सबसे बड़ी वजह इंजन की कमी रही है। तेजस एमके-1ए में अमेरिकी कंपनी जीई एयरोस्पेस का एफ-404आईएन20 टर्बोफैन इंजन लगाया जाता है। कोविड महामारी के बाद वैश्विक सप्लाई चेन समस्याओं और उत्पादन संबंधी चुनौतियों के कारण इंजन की डिलीवरी समय पर नहीं हो सकी।

इंजन नहीं मिलने की वजह से एचएएल तैयार एयरफ्रेम को अंतिम रूप नहीं दे पाया। कई विमान असेंबली पूरी होने के बावजूद उड़ान और डिलीवरी चरण तक नहीं पहुंच सके। अगस्त 2026 तक एचएएल को कुल 10 इंजन मिल चुके हैं। इनमें अगस्त के दौरान पहुंचे तीन नए इंजन भी शामिल हैं।

जीई एयरोस्पेस की 2026-27 के दौरान 24 इंजन और उसके बाद हर साल लगभग 30 इंजन देने की योजना है। इसी के आधार पर उत्पादन प्रक्रिया में तेजी आने की उम्मीद जताई जा रही है। (Tejas Mk-1A Delivery Delay)

नासिक में खुली तीसरी प्रोडक्शन लाइन

रिपोर्ट के मुताबिक, तेजस कार्यक्रम की सबसे बड़ी चुनौती केवल इंजन नहीं बल्कि उत्पादन क्षमता भी थी। इसी को देखते हुए एचएएल ने महाराष्ट्र के नासिक स्थित एयरक्राफ्ट डिवीजन में तीसरी प्रोडक्शन लाइन शुरू की है। इस लाइन की सालाना 8 विमान है। बेंगलुरु की दो मौजूदा लाइनों के साथ मिलाकर अब एचएएल की कुल उत्पादन क्षमता 24 विमान प्रति वर्ष हो गई है।

17 अक्टूबर 2025 को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने नासिक स्थित इस नई सुविधा का उद्घाटन किया था। इसी दौरान नासिक में निर्मित पहले तेजस एमके-1ए विमान को औपचारिक रूप से फ्लैग ऑफ भी किया गया था।

एचएएल ने संसद की समिति को बताया कि तीसरी लाइन शुरू होने के बाद उत्पादन क्षमता 16 विमान प्रति वर्ष से बढ़कर 24 विमान प्रति वर्ष हो गई है। (Tejas Mk-1A Delivery Delay)

तेजस एमके-1ए में क्या है खास?

तेजस एमके-1ए भारतीय वायुसेना की जरूरतों को ध्यान में रखकर विकसित किया गया आधुनिक मल्टीरोल फाइटर जेट है। इसमें एडवांस एईएसए रडार लगाया गया है, जो एक साथ कई लक्ष्यों को ट्रैक और एंगेज करने में सक्षम है। विमान में नया इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सूट, आधुनिक एवियोनिक्स, एयर-टू-एयर रिफ्यूलिंग क्षमता और बेहतर मिशन कंप्यूटर भी शामिल हैं। (Tejas Mk-1A Delivery Delay)

डीआरडीओ ने बनाया स्वदेशी रेडोम

रिपोर्ट के मुताबिक, तेजस एमके-1ए कार्यक्रम में डीआरडीओ की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। डीआरडीओ ने विमान के लिए स्वदेशी रेडोम विकसित किया है। रेडोम विमान के नाक वाले हिस्से पर लगा विशेष कवर होता है, जिसके अंदर रडार सिस्टम स्थित रहता है। इसका काम रडार सिग्नल को न्यूनतम हानि के साथ बाहर जाने देना और संवेदनशील उपकरणों की सुरक्षा करना होता है। रक्षा मंत्रालय के अनुसार मई 2025 में स्वदेशी रेडोम का इंटीग्रेशन ट्रायल सफलतापूर्वक पूरा किया गया था। (Tejas Mk-1A Delivery Delay)

भारतीय वायुसेना के लिए क्यों जरूरी है तेजस?

भारतीय वायुसेना की अधिकृत जरूरत 42 फाइटर स्क्वाड्रन की है। वर्तमान में यह संख्या लगभग 29 से 31 स्क्वाड्रन के बीच है। मिग-21 विमान सेवा से बाहर हो चुके हैं। आने वाले सालों में जगुआर, मिग-29 और मिराज-2000 जैसे पुराने लड़ाकू विमानों की संख्या भी धीरे-धीरे कम होगी। (Tejas Mk-1A Delivery Delay)

LAC पर चीन ने घटाए 50,000 तक सैनिक? रक्षा मंत्रालय की रिपोर्ट में बड़ा खुलासा, फिर भी हाई अलर्ट पर भारतीय सेना

PLA Deployment Along LAC
China Reduces PLA Deployment Along LAC, But Indian Army Remains on High Alert: Defence Ministry Report Reveals. (AI Generated Image)

PLA Deployment Along LAC: भारत और चीन के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर पिछले कुछ वर्षों से जारी सैन्य तनाव के बीच रक्षा मंत्रालय की वार्षिक रिपोर्ट 2025-26 में कहा गया है कि चीन ने उत्तरी सीमाओं के सामने पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) की तैनाती में उल्लेखनीय कटौती की है। हालांकि भारत ने साफ किया है कि उसकी सेना एलएसी के सभी सेक्टरों में पूरी तरह तैयार और मजबूत स्थिति में है।

PLA Deployment Along LAC: क्या कहा है रक्षा मंत्रालय ने?

रिपोर्ट में कहा गया है कि, “साल 2025 में उत्तरी सीमाओं के सामने पीएलए सेनाओं की तैनाती में महत्वपूर्ण कमी देखी गई है। एलएसी और पारंपरिक ट्रेनिंग इलाकों में 10-10 कम्बाइंड आर्म्स ब्रिगेड साइज की सेनाएं तैनात रहीं। भारतीय सेना की तैनाती एलएसी के सभी सेक्टरों में मजबूत, संतुलित और किसी भी उभरती परिस्थिति से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार है।”

सैन्य सूत्रों के अनुसार, इस आकलन का मतलब यह माना जा रहा है कि चीन ने एलएसी के पास मौजूद कुछ अग्रिम तैनात ब्रिगेडों को पीछे हटाया है। वहीं, पीएलए की एक कम्बाइंड आर्म्स ब्रिगेड में लगभग 5,000 सैनिक होते हैं। ऐसे में 10 ब्रिगेड के स्तर पर कमी का मतलब लगभग 50,000 सैनिकों की संख्या में कमी माना जा सकता है। (PLA Deployment Along LAC)

खत्म नहीं हुआ है खतरा?

हालांकि रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि सैनिकों की संख्या में कमी का अर्थ यह नहीं है कि चीन ने अपनी सैन्य क्षमता कम कर दी है या सीमा पर खतरा समाप्त हो गया है। अमेरिकी रक्षा विभाग की नवंबर 2024 की एक रिपोर्ट में कहा गया था कि चीन ने एलएसी के विभिन्न क्षेत्रों में करीब 1.20 लाख सैनिक तैनात किए हुए थे। रिपोर्ट के अनुसार पश्चिमी, मध्य और पूर्वी सेक्टरों में 20 से अधिक कम्बाइंड आर्म्स ब्रिगेड अग्रिम मोर्चों पर मौजूद थीं।

सूत्रों के मुताबिक चीन अब भी एलएसी के पास बड़ी संख्या में सैनिक, मिसाइल सिस्टम, एयर डिफेंस सिस्टम, आर्टिलरी और टैंक तैनात रखे हुए है। पिछले कुछ सालों में चीन ने तिब्बत और शिनजियांग क्षेत्रों में सड़क, रेल, एयरबेस और सैन्य ढांचे का भी तेजी से विस्तार किया है। (PLA Deployment Along LAC)

चीन की तरफ का भूभाग समतल

भारतीय सेना ने अपनी तैनाती में कोई कमी नहीं की है। रक्षा मंत्रालय ने रिपोर्ट में दोहराया है कि सेना हर परिस्थिति से निपटने के लिए तैयार है।

सूत्र बताते हैं कि चीन की तरफ का भूभाग अधिकतर समतल पठारी क्षेत्र है। वहां सैनिकों, टैंकों और सैन्य उपकरणों की तेज आवाजाही संभव है। इसके मुकाबले भारतीय इलाकों में ऊंचे पहाड़ और कठिन भूगोलिक परिस्थितियां हैं। इसी कारण भारत को अग्रिम क्षेत्रों में पर्याप्त संख्या में सैनिक बनाए रखने पड़ते हैं।

2020 में पूर्वी लद्दाख में शुरू हुए सैन्य गतिरोध के बाद भारतीय सेना ने एलएसी पर अपनी निगरानी, इन्फ्रास्ट्रक्चर और तैनाती क्षमता में काफी वृद्धि की है। (PLA Deployment Along LAC)

बातचीत से आई स्थिरता

रक्षा मंत्रालय ने अपनी रिपोर्ट में भारत और चीन के बीच राजनीतिक, कूटनीतिक और सैन्य स्तर पर हुई बातचीत को सीमा पर स्थिरता का महत्वपूर्ण कारण बताया है। रिपोर्ट के अनुसार, मार्च और जुलाई 2025 में वर्किंग मेकैनिज्म फॉर कंसल्टेशन एंड कोऑर्डिनेशन (डब्ल्यूएमसीसी) की 33वीं और 34वीं बैठक आयोजित हुईं। इसके अलावा भारत-चीन सीमा विवाद पर विशेष प्रतिनिधियों की वार्ता भी दोबारा शुरू हुई।

दिसंबर 2024 और अगस्त 2025 में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और चीन के विदेश मंत्री वांग यी के बीच बातचीत हुई। अगस्त 2025 में बीजिंग में हुई बैठक के दौरान दोनों पक्षों ने सीमा विवाद के राजनीतिक समाधान की दिशा में प्रयास जारी रखने पर सहमति जताई थी। (PLA Deployment Along LAC)

मोदी-शी जिनपिंग मुलाकातों का भी असर

रिपोर्ट में कहा गया है कि अक्टूबर 2024 के बाद दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व के बीच संपर्क बढ़ा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच कई महत्वपूर्ण मुलाकातें हुईं।

अगस्त 2025 में प्रधानमंत्री मोदी ने चीन के तियानजिन शहर में आयोजित शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) शिखर सम्मेलन में हिस्सा लिया था। रक्षा मंत्रालय का मानना है कि इस दौरान हुई उच्चस्तरीय बातचीत ने दोनों देशों के रिश्तों में सकारात्मक माहौल बनाने में मदद की। (PLA Deployment Along LAC)

पूर्वी लद्दाख में सैन्य वार्ता जारी

भारत और चीन के बीच सैन्य स्तर पर भी बातचीत जारी रही। रिपोर्ट के अनुसार 25-26 अक्टूबर 2025 को पूर्वी लद्दाख में 23वीं कोर कमांडर स्तर की बैठक आयोजित की गई।

रक्षा मंत्रालय ने कहा कि जमीनी स्तर पर दोनों देशों के सैनिकों के बीच नियमित बॉर्डर पर्सनल मीटिंग्स भी जारी हैं। इन बैठकों का उद्देश्य स्थानीय स्तर पर उत्पन्न होने वाले मुद्दों का समाधान करना और तनाव को बढ़ने से रोकना है।

रिपोर्ट में कहा गया है, “सभी सेक्टरों में पीएलए के साथ बॉर्डर पर्सनल मीटिंग्स सौहार्दपूर्ण और मित्रवत वातावरण में जारी हैं, ताकि चिंता के मुद्दों का समाधान किया जा सके।” (PLA Deployment Along LAC)

सीमा क्षेत्रों में तेजी से बढ़ रहा इन्फ्रास्ट्रक्चर

रक्षा मंत्रालय की रिपोर्ट में सीमा क्षेत्रों में इन्फ्रास्ट्रक्चर विकास का भी उल्लेख किया गया है। बॉर्डर रोड्स ऑर्गेनाइजेशन (बीआरओ) लगातार ऊंचाई वाले और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्रों में ऑल-वेदर कनेक्टिविटी मजबूत कर रहा है।

रिपोर्ट में पूर्वी लद्दाख के मुध-न्योमा एयरफील्ड का भी जिक्र किया गया है। लगभग 13,700 फीट की ऊंचाई पर स्थित यह भारतीय वायुसेना का सबसे ऊंचा एयरफील्ड माना जाता है। इसके चालू होने से लद्दाख सेक्टर में सैन्य और लॉजिस्टिक क्षमताओं को मजबूती मिली है।

इसके अलावा अरुणाचल प्रदेश के अनिनी में बीआरओ ने हेलिपैड का बड़ा अपग्रेड पूरा किया है। पहले यहां छोटा लैंडिंग ग्राउंड था, जिसका साइज बढ़ाकर पेवमेंट क्वालिटी कंक्रीट हेलिपैड बनाया गया है।

इस नए और बड़े हेलिपैड की वजह से अब भारी हेलीकॉप्टर भी यहां आसानी से उतर सकेंगे। इससे सीमावर्ती इलाके में सामान, जरूरी सामग्री और सैनिकों की आवाजाही तेज और आसान होगी। प्राकृतिक आपदा, राहत कार्य और आपातकालीन परिस्थितियों में भी यह हेलिपैड काफी मददगार साबित होगा। (PLA Deployment Along LAC)

ऑपरेशन सिंदूर में जैकोबाबाद में निशाना बने थे पाकिस्तान के कई एफ-16, AEW&C और तुर्किए के बने घातक ड्रोन, रक्षा मंत्रालय की रिपोर्ट में बड़ा खुलासा

Operation Sindoor Mod Report
Operation Sindoor Report Reveals S-400 Kill, Damage To Pakistani F-16s And Major Airbase Strikes. (AI Generated Image)

Operation Sindoor Mod Report: रक्षा मंत्रालय की वार्षिक रिपोर्ट 2025-26 में ऑपरेशन सिंदूर को भारत के आतंकवाद विरोधी अभियान में एक महत्वपूर्ण सैन्य कार्रवाई बताया गया है। रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि जैकोबाबाद एयरबेस पर कई एफ-16 लड़ाकू विमानों को नुकसान पहुंचा था। वहीं रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि सेना की विशेष टीमों ने युद्ध के दौरान गिरे ड्रोन, मिसाइलों और फटे बिना रह गए सैकड़ों विस्फोटकों को सुरक्षित तरीके से निष्क्रिय कर संभावित खतरे को टाल दिया।

Operation Sindoor Mod Report: नियंत्रित थी भारतीय कार्रवाई

रक्षा मंत्रालय की वार्षिक रिपोर्ट 2025-26 में ऑपरेशन सिंदूर को भारत के आतंकवाद विरोधी अभियान में एक महत्वपूर्ण सैन्य कार्रवाई बताया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत ने संयुक्त सैन्य शक्ति, आधुनिक हथियारों और इंटीग्रेटेड एयर डिफेंस नेटवर्क का इस्तेमाल करते हुए पाकिस्तान की कई सैन्य क्षमताओं को निशाना बनाया। साथ ही भारतीय पक्ष ने कार्रवाई को नियंत्रित और गैर-विस्तारवादी रखने का प्रयास किया।

रिपोर्ट में बताया गया है कि इस अभियान ने दिखाया कि भारतीय सेनाएं मल्टी-डोमेन ऑपरेशंस, एडवांस टेक्नोलॉजी, इंटेलिजेंस नेटवर्क और जॉइंट फोर्स को किस तरह एक साथ इस्तेमाल करने में सक्षम हैं। साथ ही, ऑपरेशन के बाद भारत ने अपनी सैन्य क्षमताओं की व्यापक समीक्षा शुरू की, जिसमें फोर्स रिस्ट्रक्चरिंग, तीनों सेनाओं के बीच बेहतर जॉइंटनेस और उभरती टेक्नोलॉजी को तेजी से शामिल करने पर विशेष ध्यान दिया गया।

Operation Sindoor Mod Report
Discussions at the Highest Level during Op Sindoor (Pic: MoD)

भारतीय वायुसेना ने संभाली एयर सुपीरियोरिटी

रक्षा मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय वायुसेना के एडवांस्ड एयर डिफेंस सिस्टम ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। भारतीय रक्षा बलों ने पाकिस्तान और पीओके में स्थित नौ आतंकी शिविरों तथा संबंधित इंफ्रास्ट्रक्चर पर सटीक हमले किए। रिपोर्ट में कहा गया है कि एस-400 और शौर्य जैसे एयर डिफेंस सिस्टम ने कई पाकिस्तानी हवाई खतरों को विफल किया, जिससे भारत को एयर सुपीरियोरिटी बनाए रखने में मदद मिली और पाकिस्तान वायुसेना की ऑपरेशनल क्षमता सीमित हो गई।

ऑपरेशन के दौरान भारतीय वायुसेना की एस-400 एयर डिफेंस यूनिट ने पाकिस्तान के एक विशेष मिशन विमान को 314 किलोमीटर की दूरी से सफलतापूर्वक निशाना बनाकर नष्ट कर दिया। यह दुनिया के सबसे लंबी दूरी वाले सतह से हवा में मार करने वाले अभियानों में से एक माना जाता है।

रिपोर्ट के मुताबिक 8 से 10 मई 2025 के बीच पाकिस्तान की ओर से सैन्य ठिकानों के साथ-साथ नागरिक ढांचे, धार्मिक स्थलों, स्कूलों और चिकित्सा केंद्रों को निशाना बनाने की कोशिश की गई। इसके जवाब में भारतीय वायुसेना ने कई महत्वपूर्ण सैन्य लक्ष्यों पर कार्रवाई की।

छह रडार और दो एयर डिफेंस ठिकाने बने निशाना

रिपोर्ट के मुताबिक भारतीय वायुसेना ने एयर लॉन्च हथियारों और लोइटरिंग म्यूनिशन के इस्तेमाल से पाकिस्तान के छह रडार और दो एयर डिफेंस ठिकानों को सफलतापूर्वक निशाना बनाया। यह कार्रवाई पाकिस्तान की वायु निगरानी और एयर डिफेंस क्षमता को प्रभावित करने के उद्देश्य से की गई थी।

भारतीय कार्रवाई में चकलाला, रहीम यार खान, सुक्कुर, मुरीद, सरगोधा, जैकोबाबाद और भोलारी जैसे स्थानों का उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार इन ठिकानों पर हमले भारत की “डिमॉन्स्ट्रेटिव कम्पेलेंस” रणनीति का हिस्सा थे, जिसका उद्देश्य सीमित लेकिन प्रभावी सैन्य दबाव बनाना था। (Operation Sindoor Mod Report)

जैकोबाबाद में एफ-16 और ड्रोन सिस्टम को नुकसान

पाकिस्तान के जैकोबाबाद एयरबेस के बाारे में कहा गया है कि 10 मई 2025 को भारतीय वायुसेना ने चार ऐसे हैंगरों को निशाना बनाया, जिनमें लड़ाकू विमान, एयरबोर्न अर्ली वार्निंग एंड कंट्रोल विमान और मानव रहित विमान रखे गए थे।

रिपोर्ट में कहा गया है, “जैकोबाबाद में मौजूद कई एफ-16 विमान, एक एईडब्ल्यू एंड सी विमान और अकिनची तथा टीबी-2 श्रेणी के कई यूसीएवी नष्ट या क्षतिग्रस्त हुए।” साथ ही कई पाकिस्तानी सैन्य कर्मी भी हताहत हुए थे।

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Planning Military Operations (Pic: MoD)

सरगोधा और रहीम यार खान की रनवे स्ट्राइक

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान के दो महत्वपूर्ण एयरबेस के रनवे भी निशाना बनाए। रिपोर्ट के अनुसार सरगोधा और रहीम यार खान के रनवे पर सटीक हमला किया गया, जिससे उन्हें नुकसान पहुंचा।
रिपोर्ट में इन हमलों की तुलना 1971 के युद्ध के दौरान पूर्वी पाकिस्तान के एयरफील्ड को निष्क्रिय करने वाली भारतीय वायुसेना की कार्रवाई से की गई है।

वहीं ऑपरेशन के दौरान चकलाला और मुरीद स्थित कमांड एंड कंट्रोल सेंटरों को भी सफलतापूर्वक निशाना बनाया गया। रिपोर्ट के अनुसार चकलाला पाकिस्तान वायुसेना के एयर डिफेंस कमांड का मुख्यालय है।

कमांड एंड कंट्रोल सेंटर किसी भी सैन्य नेटवर्क का दिमाग माने जाते हैं। यहां से रडार, मिसाइल सिस्टम, एयर डिफेंस नेटवर्क और लड़ाकू विमानों के ऑपरेशन को कॉर्डिनेट किया जाता है।

रिपोर्ट के अनुसार भारतीय वायुसेना ने जैकोबाबाद स्थित कूलिंग प्लांट और रहीम यार खान के टर्मिनल क्षेत्र को भी निशाना बनाया। इन टारगेट् को एयरफील्ड इंफ्रास्ट्रक्चर का हिस्सा बताया गया है। ऐसे स्ट्रक्चर किसी एयरबेस की नियमित संचालन क्षमता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। (Operation Sindoor Mod Report)

आईएसीसीएस नेटवर्क ने निभाई अहम भूमिका

रिपोर्ट में भारतीय वायुसेना के इंटीग्रेटेड एयर कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम यानी आईएसीसीएस का विशेष उल्लेख किया गया है। मंत्रालय के अनुसार यही नेटवर्क पूरे ऑपरेशन के दौरान एयर डिफेंस ऑपरेशन की रीढ़ बना रहा।

आईएसीसीएस में सैन्य और नागरिक दोनों प्रकार के निगरानी सेंसर जुड़े रहते हैं। इससे सभी संबंधित एजेंसियों को एक साझा एयर पिक्चर उपलब्ध होती है। रिपोर्ट के अनुसार चार दिन तक चले संघर्ष के दौरान यह नेटवर्क अपेक्षा के अनुरूप काम करता रहा। (Operation Sindoor Mod Report)

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Validation Missile Firing by IN Ship during Op Sindoor. (Pic: MoD)

ऑपरेशन सिंदूर में शामिल थी भारतीय नौसेना की स्पेशल फोर्सेज

पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारतीय नौसेना ने अपने प्रमुख युद्धपोतों, एयरक्राफ्ट कैरियर बैटल ग्रुप और पनडुब्बियों को उत्तर अरब सागर में अग्रिम मोर्चे पर तैनात कर दिया। नौसेना पूरी तरह युद्धक तैयारी की स्थिति में थी और आदेश मिलने पर समुद्र तथा जमीन पर चुने गए टारगेट्स पर हमला करने की क्षमता रखती थी।

भारतीय नौसेना ने अपने युद्धपोतों, विमानों, स्पेस बेस्ड सिस्टम्स और तटीय संसाधनों की मदद से समुद्री क्षेत्र की लगातार निगरानी बनाए रखी। नौसेना की अग्रिम तैनाती से पाकिस्तान के लिए समुद्र में ऑपरेशन करना मुश्किल हो गया और समुद्र पर भारत का प्रभावी नियंत्रण स्थापित किया।

इसके अलावा, भारतीय नौसेना के स्पेशल फोर्सेज भी 6-7 मई 2025 को आतंकवादी इंफ्रास्ट्रक्चर पर किए गए सटीक हमलों का हिस्सा थे। इन अभियानों में उच्च सटीकता वाले हथियारों का इस्तेमाल किया गया था।

वहीं, इंडियन कोस्ट गार्ड ने भारतीय नौसेना के साथ मिलकर भारत के पश्चिमी समुद्री तट पर अपने संसाधनों को तैनात किया और निगरानी को और मजबूत किया। जिससे संवेदनशील क्षेत्रों में किसी भी शत्रुतापूर्ण समुद्री गतिविधि या खतरे को रोकने में मदद मिली।

वहीं, क्रीक क्षेत्र में भी आईसीजी ने संबंधित एजेंसियों के साथ समन्वय बनाकर लगातार निगरानी रखी और जरूरत पड़ने पर जमीनी बलों की तुरंत तैनाती के लिए पूरी तैयारी बनाए रखी। (Operation Sindoor Mod Report)

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान 220 यूएक्सओ को किया निष्क्रिय

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान काउंटर एक्सप्लोसिव डिवाइस यूनिट (सीईडीयू) की टीमों ने बड़ी संख्या में बिना फटे हथियारों और ड्रोन से जुड़े खतरों को सुरक्षित तरीके से निष्क्रिय किया। उत्तरी कमान (नॉर्दर्न कमांड) के जिम्मेदारी क्षेत्र में सीईडीयू टीमों ने 220 अनएक्सप्लोडेड ऑर्डनेंस (यूएक्सओ) यानी ऐसे बम, मिसाइल या गोला-बारूद जो फटे नहीं थे, उन्हें सुरक्षित रूप से नष्ट किया। वहीं पश्चिमी कमान (वेस्टर्न कमांड) क्षेत्र में 13 यूएक्सओ को सफलतापूर्वक निष्क्रिय किया गया।

इसके अलावा, उत्तरी कमान क्षेत्र में गिरे तीन ड्रोन के मलबे को भी सीईडीयू टीमों ने सुरक्षित बनाया और आगे की तकनीकी जांच के लिए संबंधित एजेंसियों को सौंप दिया। इन ड्रोन में लगे वारहेड (विस्फोटक हिस्से) को मौके पर ही नष्ट कर दिया गया।

जांच के दौरान एक ड्रोन की पहचान तुर्की निर्मित बायकर वाईआईएचए-III (Baykar YIHA III) के तौर पर की गई।
पश्चिमी कमान में सीईडीयू टीमों ने मिनी अकिली मुहिमाद (एमएएम) म्यूनिशन को भी निष्क्रिय किया। माना जाता है कि ये हथियार तुर्की के बायराक्तर टीबी-2 ड्रोन द्वारा दागे गए थे। इसके साथ ही टीमों ने दो पीएल-15 मिसाइलों को भी सुरक्षित तरीके से निष्क्रिय कर क्षेत्र को खतरे से मुक्त किया।

वहीं, भारतीय सेना ने साल 2025 में चिल्लम फील्ड फायरिंग रेंज की पूरी तरह से सफाई और सुरक्षा सुनिश्चित करने का अभियान भी पूरा किया। इस अभियान के तहत करीब 1.27 लाख वर्ग मीटर क्षेत्र की जांच की गई।

इस दौरान कुल 29 अनफटे बम (यूएक्सओ) और बड़ी मात्रा में धातु के टुकड़े (स्प्लिंटर्स) बरामद किए गए। बाद में इन सभी खतरनाक विस्फोटकों को कंट्रोल्ड एक्सप्लोजन तकनीक यानी नियंत्रित विस्फोट के जरिए सुरक्षित रूप से नष्ट कर दिया गया। (Operation Sindoor Mod Report)

9 मई को हुई थी डीएसी की विशेष बैठक

9 मई 2025 को रक्षा अधिग्रहण परिषद (डीएसी) की एक विशेष बैठक आयोजित की गई थी। इस बैठक में इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट (ईपी)-2025 के तहत सेना की तत्काल जरूरतों से जुड़े कई पूंजीगत खरीद मामलों को मंजूरी दी गई। यह फैसला ऑपरेशन सिंदूर के पहले चरण से मिले अनुभवों और सबक के आधार पर लिया गया। भारतीय सेना ने माना कि बदलते युद्धक्षेत्र में कुछ महत्वपूर्ण क्षमताओं को तेजी से मजबूत करने की जरूरत है। इसी कारण सेना की ताकत बढ़ाने के लिए विशेष और आधुनिक उपकरणों को शामिल करने की प्रक्रिया शुरू की गई।

इसमें अनमैन्ड एरियल सिस्टम (यूएएस) यानी ड्रोन, काउंटर-यूएएस (सी-यूएएस) यानी दुश्मन के ड्रोन को रोकने वाली प्रणालियां, लोइटर म्यूनिशन, एयर डिफेंस सिस्टम और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम शामिल थे। (Operation Sindoor Mod Report)