📍नई दिल्ली | 17 Sep, 2026, 11:46 AM
DRDO Technology Transfer: रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) ने 15 सितंबर को नई दिल्ली में आयोजित ‘विमर्श-2026’ कार्यक्रम के दौरान 13 उद्योग साझेदारों को 9 महत्वपूर्ण डिफेंस टेक्नोलॉजी का ट्रांसफर ऑफ टेक्नोलॉजी (टीओटी) सौंपा। इस दौरान एक नया फ्रेमवर्क भी लॉन्च किया। जिसके तहत डीआरडीओ के बनाए वेपन सिस्टम्स का निर्माण करने वाली निजी और सरकारी कंपनियों को अब उन सिस्टम्स के सॉफ्टवेयर सोर्स कोड तक पहुंच मिल सकेगी।
DRDO Technology Transfer: क्या होता है ट्रांसफर ऑफ टेक्नोलॉजी?
ट्रांसफर ऑफ टेक्नोलॉजी (टीओटी) में किसी अनुसंधान संस्थान द्वारा डेवलप टेक्नोलॉजी को उद्योग को सौंपा जाता है ताकि उसका व्यावसायिक उत्पादन किया जा सके। डीआरडीओ कई सालों तक रिसर्च और टेस्टिंग के बाद किसी सिस्टम, इक्विपमेंट, सेंसर, मिसाइल कंपोनेंट या अन्य डिफेंस टेक्नोलॉजी को डेवलप करता है। जब टेक्नोलॉजी तैयार हो जाती है और उसका प्रदर्शन सफल साबित हो जाता है, तब डीआरडीओ उद्योगों के साथ लाइसेंसिंग एग्रीमेंट फॉर ट्रांसफर ऑफ टेक्नोलॉजी (एलएटीओटी) करता है।
इसके तहत कंपनियों को डिजाइन डेटा, मैन्युफैक्चरिंग डॉक्यूमेंटेशन, टेक्नोलॉजी सपोर्ट, प्रोडक्शन प्रोसेस और क्वॉलिटी स्टैंडर्ड्स की जानकारी दी जाती है। इसके बाद उद्योग उस टेक्नोलॉजी को प्रोडक्शन लाइन में बदलते हैं।
केवल रिसर्च नहीं, इंडस्ट्री इकोसिस्टम भी बना रहा डीआरडीओ
कई सालों तक भारत में यह समस्या रही कि प्रयोगशालाओं में डेवलप टेक्नोलॉजी प्रोडक्शन तक नहीं पहुंच पाती थीं। जिसके चलते देश को विदेशों से आयात पर निर्भर रहना पड़ता था।
अब डीआरडीओ की रणनीति बदल चुकी है। संगठन केवल रिसर्च एजेंसी की भूमिका में नहीं रहना चाहता बल्कि वह उद्योगों के साथ मिलकर एक पूर्ण डिफेंस इंडस्ट्रियल इकोसिस्टम तैयार कर रहा है।
रक्षा सचिव और डीआरडीओ अध्यक्ष राजेश कुमार सिंह ने इस कार्यक्रम के दौरान बताया कि अब तक 1100 से अधिक उद्योगों को 2300 से ज्यादा टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की जा चुकी है। उन्होंने यह भी कहा कि लगभग 50 मिसाइल सिस्टम्स से जुड़ी टेक्नोलॉजी उद्योगों को उपलब्ध कराई जा चुकी हैं। (DRDO Technology Transfer)
इंडस्ट्री को मिलेगा सोर्स कोड
वहीं, अब डीआरडीओ के बनाए वेपन सिस्टम्स का सोर्स कोड अब निजी और सरकारी कंपनियों को भी उपलब्ध हो सकेगा। अब तक डीआरडीओ टीओटी में कंपनियों को हार्डवेयर डिजाइन और ड्रॉइंग तो देता था, लेकिन सॉफ्टवेयर में बदलाव का अधिकार नहीं मिलता था। किसी भी अपडेट, पैच या नए फीचर के लिए कंपनियों को फिर से डीआरडीओ लैब पर निर्भर रहना पड़ता था।
रक्षा उद्योग लंबे समय से मांग कर रहा था कि उन्हें सोर्स कोड तक पहुंच दी जाए। उनका कहना था कि इस निर्भरता के कारण उत्पादन, मरम्मत और मिड-लाइफ अपग्रेड में देरी होती है।
नए फ्रेमवर्क के तहत अधिकृत इंजीनियर जरूरत के अनुसार सॉफ्टवेयर में बदलाव कर सकेंगे, नए फीचर जोड़ सकेंगे और पुराने हो चुके इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स की जगह नए सिस्टम को तेजी से इंटीग्रेट कर सकेंगे। (DRDO Technology Transfer)
⚓🇮🇳 Major Boost for Indigenous Underwater Warfare!
In the presence of Defence Minister Rajnath Singh, DRDO handed over 9 Licensing Agreements for Transfer of Technology (LAToT) to 13 industry partners, paving the way for large-scale production of advanced indigenous defence… pic.twitter.com/vy6Q6xSOPw— Raksha Samachar | रक्षा समाचार 🇮🇳 (@RakshaSamachar) September 15, 2026
सबसे अहम टेक्नोलॉजी: नौसेना की मल्टी-इन्फ्लुएंस ग्राउंड माइन
नई दिल्ली में आयोजित डीआरडीओ-इंडस्ट्री सिनर्जी मीट ‘विमर्श 2026’ के दौरान नौ महत्वपूर्ण स्वदेशी तकनीकों का ट्रांसफर ऑफ टेक्नोलॉजी (टीओटी) 13 उद्योग साझेदारों को भी सौंपा गया। उनमें सबसे महत्वपूर्ण तकनीकों में से एक मल्टी-इन्फ्लुएंस ग्राउंड माइन (एमआईजीएम) है।
इसे डीआरडीओ की नेवल साइंस एंड टेक्नोलॉजिकल लेबोरेटरी (एनएसटीएल) ने डेवलप किया है। यह आधुनिक युद्धपोतों और पनडुब्बियों को निशाना बनाने वाली अत्याधुनिक नौसैनिक माइन है। इस टेक्नोलॉजी का लाइसेंस भारत डायनामिक्स लिमिटेड (बीडीएल) और हैदराबाद स्थित अपोलो माइक्रो सिस्टम्स को दिया गया है। इस परियोजना की खास बात यह है कि दोनों कंपनियां पहले से इसके कुछ हिस्सों के विकास में भी शामिल रही हैं। अब वे पूर्ण उत्पादन में भागीदार बनेंगी। (DRDO Technology Transfer)
मिसाइल टेक्नोलॉजी का भी हुआ ट्रांसफर
डीआरडीओ ने शॉर्ट रेंज एंटी-शिप मिसाइल के लिए डेवलप प्रोपेलेंट और इग्नाइटर टेक्नोलॉजी भी उद्योगों को सौंप दी है। यह टेक्नोलॉजी मिसाइल के बूस्टर और सस्टेनर मोटर का महत्वपूर्ण हिस्सा है। लॉन्च के समय शुरुआती थ्रस्ट पैदा करने और उड़ान के दौरान गति बनाए रखने में इसकी भूमिका होती है।
सोलर डिफेंस एंड एयरोस्पेस, प्रीमियर एक्सप्लोसिव्स और साल्वो इंडस्ट्रीज को इसका लाइसेंस दिया गया है। (DRDO Technology Transfer)
सी-130 और सी-17 के लिए हेवी ड्रॉप सिस्टम
डीआरडीओ की एडीआरडीई प्रयोगशाला का बनाया 20 टन हेवी ड्रॉप सिस्टम का भी टेक्नोलॉजी ट्रांसफर किया गया।
यह सिस्टम भारतीय वायुसेना के सी-130 हरक्यूलिस और सी-17 ग्लोबमास्टर ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट से भारी सैन्य उपकरणों को एयरड्रॉप करने में इस्तेमाल होता है। इस तकनीक को जेसीबीएल प्राइवेट लिमिटेड को दिया गया है। (DRDO Technology Transfer)
🎯📷 DRDO Transfers Advanced Semi-Active Laser Homing Technology to Indian Industry…
Defence Minister Rajnath Singh witnessed the transfer of the Semi-Active Homing Laser System (SALHS) technology, developed by IRDE, Dehradun, to Ananth Technologies Pvt Ltd and Apollo Micro… https://t.co/B66y2ZkDsG pic.twitter.com/4pO9kXtkbJ— Raksha Samachar | रक्षा समाचार 🇮🇳 (@RakshaSamachar) September 15, 2026
लेजर गाइडेड हथियारों की टेक्नोलॉजी
डीआरडीओ की इंस्ट्रूमेंट्स रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टैब्लिशमेंट (आईआरडीई) की बनाई सेमी एक्टिव होमिंग लेजर सिस्टम (एसएएलएचएस) का ट्रांसफर भी किया गया। यह तकनीक लेजर गाइडेड बम, मिसाइल और आर्टिलरी शेल जैसे प्रिसिजन गाइडेड म्यूनिशंस में इस्तेमाल होती है।
जब किसी लक्ष्य पर लेजर मार्किंग की जाती है तो यह सिस्टम उसी लेजर रिफ्लेक्शन को ट्रैक करके हथियार को अत्यधिक सटीकता से लक्ष्य तक पहुंचाता है।
आज की आधुनिक युद्धों में प्रिसिजन स्ट्राइक क्षमता अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। यह टेक्नोलॉजी लेजर गाइडेड बम, मिसाइल और आर्टिलरी शेल को टारगेट तक सटीकता के साथ पहुंचाने में मदद करती है। इस टेक्नोलॉजी का ट्रांसफर अनंत टेक्नोलॉजीज और अपोलो माइक्रो सिस्टम्स को किया गया।
इससे भविष्य में स्वदेशी प्रिसिजन गाइडेड हथियारों का उत्पादन बढ़ सकेगा। (DRDO Technology Transfer)
पनडुब्बी से बच निकलने वाला हाइड्रो सूट
डीआरडीओ की डीईबीईएल प्रयोगशाला ने हाइड्रो सूट विकसित किया है। यह एक विशेष सूट होता है जिसे पनडुब्बी में आपातकालीन स्थिति के दौरान उपयोग किया जाता है। यदि किसी कारण से पनडुब्बी को छोड़ना पड़े तो चालक दल इस सूट की मदद से समुद्र की सतह तक सुरक्षित पहुंच सकता है। यह शरीर को अत्यधिक ठंडे समुद्री पानी और उच्च दबाव से सुरक्षा प्रदान करता है। इस तकनीक का ट्रांसफर बिलविन इंडस्ट्रीज लिमिटेड और यूफ्लो ऑटोमेशन को किया गया है। (DRDO Technology Transfer)
विस्फोटक और रसायनों की पहचान करने वाली तकनीक
सॉलिड स्टेट फिजिक्स लेबोरेटरी (एसएसपीएल) द्वारा विकसित तकनीक जिंक टेल्यूराइड (जेडएनटीई) सिंगल क्रिस्टल ग्रोथ टेक्नोलॉजी भी उद्योग को सौंप दी है। जिंक टेल्यूराइड आधारित यह तकनीक छिपे हुए विस्फोटकों और रसायनों की पहचान करने में उपयोगी है। यह टेक्नोलॉजी टेराहर्ट्ज स्पेक्ट्रम बेस्ड इक्विपमेंट्स में इस्तेमाल होती है। इसका इस्तेमाल छिपे हुए विस्फोटकों, रसायनों और अन्य खतरनाक पदार्थों की पहचान करने में किया जा सकता है। इसके अलावा वायरलेस कम्युनिकेशन क्षेत्र में भी इसका महत्व है।
इस टेक्नोलॉजी का लाइसेंस एंट्स इनोवेशन्स प्राइवेट लिमिटेड को मिला है। (DRDO Technology Transfer)
स्मार्ट हेलमेट: सैनिकों के लिए डिजिटल वॉरफेयर सिस्टम
विमर्श-2026 में ट्रांसफर हुई टेक्नोलॉजीों में स्मार्ट हेलमेट भी शामिल है। यह कोई सामान्य हेलमेट नहीं है। इसमें लिडार सेंसर, आरजीबी कैमरा और स्टीरियो कैमरा लगे हैं। यह शहरी युद्ध क्षेत्र में रीयल टाइम 3डी मैपिंग करने में सक्षम है। यह हेलमेट आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तकनीक से भी लैस है। इसके जरिए जीपीएस उपलब्ध न होने की स्थिति में भी सैनिकों की लोकेशन ट्रैक की जा सकती है और कमांडरों को बेहतर सिचुएशनल अवेयरनेस मिलती है।
इस टेक्नोलॉजी का लाइसेंस प्रगति डिफेंस सिस्टम्स को दिया गया है।
डीआरडीओ की चंडीगढ़ स्थित टर्मिनल बैलिस्टिक्स रिसर्च लेबोरेटरी (टीबीआरएल) ने ऑर्डिनेंस और एक्सप्लोसिव सिस्टम के सुरक्षित ऑपरेशन के लिए दो महत्वपूर्ण इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम बनाए हैं। इनमें इलेक्ट्रॉनिक एक्टिवेशन डिवाइस (टिनी) और वायरलेस कंट्रोल कम एक्टुएशन सिस्टम (रेड) शामिल हैं।
टीआईएनवाई एक छोटा लेकिन अत्याधुनिक इलेक्ट्रॉनिक एक्टिवेशन डिवाइस है, जिसे गोला-बारूद, वॉरहेड और अन्य विस्फोटक प्रणालियों को तय समय पर सक्रिय करने के लिए विकसित किया गया है। इस डिवाइस में माइक्रोकंट्रोलर आधारित प्रोसेसिंग यूनिट, सेफ्टी इलेक्ट्रॉनिक्स, तीन बैटरी पावर सोर्स, सेफ्टी प्लग, एलईडी डिस्प्ले और कीपैड लगाया गया है।
जब मुख्य बैटरी सर्किट पूरा होता है तो सिस्टम रेडी स्टेट में आ जाता है। इसके बाद ऑपरेटर कीपैड के जरिए काउंटडाउन या डिले टाइम सेट करता है। निर्धारित समय पूरा होने पर डिवाइस अपने ट्रिगरिंग चैनलों के माध्यम से सिग्नल जारी कर देता है। इसका फोर-चैनल वर्जन भी उपलब्ध है। ऑपरेटर इसमें पहले से डिले टाइम, एयरबर्स्ट हाइट या टारगेट आधारित डिटोनेशन प्रोफाइल भी प्रोग्राम कर सकता है। इससे विस्फोट का समय और स्थान अधिक सटीक बनाया जा सकता है।
वहीं, आरईडी (रेड) यानी वायरलेस कंट्रोल कम एक्टुएशन सिस्टम एक रिमोट कंट्रोल्ड इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम है, जिसका इस्तेमाल सुरक्षित दूरी से विस्फोटक पेलोड या डेमोलिशन डिवाइस को कंट्रोल करने के लिए किया जाता है। इस सिस्टम के दो हिस्से होते हैं। पहला यूजर रिमोट, और दूसरा ग्राउंड सिस्टम। दोनों के बीच कम्युनिकेशन एन्क्रिप्टेड रेडियो फ्रीक्वेंसी (आरएफ) सिग्नल के जरिए होता है।
ऑपरेटर एक ही रिमोट से कई ग्राउंड सिस्टम को कॉन्फिगर और एक्टिवेट कर सकता है। यह सिस्टम लाइन ऑफ साइट दूरी तक काम करता है और दो स्वतंत्र ट्रिगरिंग सिग्नल जारी करने की क्षमता रखता है।
इन दोनों तकनीकों का लाइसेंस बेंगलुरु की ऑटोटेक सिस्टम्स प्राइवेट लिमिटेड और मोहाली की एक्सेलर माइक्रोसिस्टम्स को दिया गया है। (DRDO Technology Transfer)
एमएसएमई और स्टार्टअप्स को क्यों मिलेगा फायदा?
विमर्श-2026 के दौरान डीआरडीओ ने एमएसएमई (माइक्रो, स्मॉल एंड मीडियम एंटरप्राइजेज) और डीप-टेक स्टार्टअप्स के लिए कई नई पहल शुरू की हैं। इनका उद्देश्य छोटे उद्योगों और नई टेक्नोलॉजी विकसित करने वाली कंपनियों को रक्षा क्षेत्र में ज्यादा अवसर देना है।
अब तक डिफेंस सेक्टर में प्रवेश करना छोटे उद्योगों के लिए आसान नहीं था। रक्षा उपकरणों के विकास और निर्माण के लिए कड़े तकनीकी मानक, महंगी टेस्टिंग प्रक्रिया, सर्टिफिकेशन की जटिलताएं और रिसर्च पर भारी निवेश की जरूरत होती थी। इसके कारण कई स्टार्टअप्स और एमएसएमई अपनी तकनीक होने के बावजूद रक्षा परियोजनाओं में शामिल नहीं हो पाते थे।
नई नीति के तहत डीआरडीओ ऐसे उद्योगों को सीधे फंडिंग सपोर्ट उपलब्ध कराएगा, जिससे उन्हें शुरुआती रिसर्च और प्रोडक्ट डेवलपमेंट के लिए वित्तीय मदद मिल सके। इसके साथ ही इन्क्यूबेशन सपोर्ट भी दिया जाएगा, ताकि नई कंपनियां अपने आइडिया को प्रोटोटाइप और फिर तैयार उत्पाद में बदल सकें।
डीआरडीओ की एडवांस्ड टेस्टिंग और वैलिडेशन सुविधाओं तक पहुंच भी आसान बनाई जा रही है। इससे स्टार्टअप्स और छोटे उद्योगों को अपने उत्पादों का परीक्षण कराने के लिए अलग से महंगा इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार नहीं करना पड़ेगा। उन्हें विशेषज्ञों की तकनीकी सलाह और टेक्नोलॉजी सपोर्ट भी मिलेगा।
इस पहल का मकसद रक्षा उत्पादन में ज्यादा से ज्यादा भारतीय कंपनियों की भागीदारी बढ़ाना है। इससे स्वदेशी टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट को गति मिलेगी और देश का डिफेंस इंडस्ट्रियल इकोसिस्टम और मजबूत होगा। साथ ही, छोटे उद्योगों और स्टार्टअप्स के लिए नए बिजनेस अवसर भी पैदा होंगे। (DRDO Technology Transfer)
Author
हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।





