📍नई दिल्ली | 17 Sep, 2026, 12:58 PM
Shaksgam Valley Dispute: 12-13 सितंबर को नई दिल्ली में आयोजित 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान भारत और चीन के रिश्तों में कुछ नरमी दिखाई दी थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात से यह संकेत मिले थे कि दोनों देश गलवान संघर्ष के बाद बने तनाव को कम करने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन इस बैठक के कुछ ही दिनों बाद चीन और पाकिस्तान ने इस्लामाबाद में चीन-पाकिस्तान बाउंड्री जॉइंट कमीशन की पहली बैठक आयोजित कर दी। इसके बाद भारत ने कड़ी प्रतिक्रिया दी और साफ कहा कि इस आयोग का कोई कानूनी आधार नहीं है।
Shaksgam Valley Dispute: क्या है चीन-पाकिस्तान बाउंड्री जॉइंट कमीशन?
16 सितंबर को इस्लामाबाद में चीन और पाकिस्तान के अधिकारियों ने चीन-पाकिस्तान बाउंड्री जॉइंट कमीशन की पहली बैठक की। पाकिस्तान ने इसे दोनों देशों के संबंधों में “महत्वपूर्ण मील का पत्थर” बताया। पाकिस्तान के अनुसार यह आयोग सीमा प्रबंधन, संयुक्त सीमा सर्वेक्षण, व्यापारिक गतिविधियों और लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने के लिए काम करेगा।
पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने कहा, “पाकिस्तान-चीन संबंधों में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के तहत दोनों देशों ने पाकिस्तान-चीन सीमा संयुक्त आयोग (बाउंड्री जॉइंट कमीशन) को औपचारिक रूप से सक्रिय कर दिया है। इससे सीमा प्रबंधन, संयुक्त सीमा सर्वेक्षण, व्यापारिक गतिविधियों और लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने में सहयोग को नई गति मिलेगी।
आयोग की पहली बैठक इस्लामाबाद में पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय में आयोजित की गई। बैठक की सह-अध्यक्षता चीन के विदेश मंत्रालय के बाउंड्री एंड ओशन अफेयर्स विभाग के उप महानिदेशक ली या और पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय में चीन मामलों के महानिदेशक बिलाल महमूद चौधरी ने की।”
दिलचस्प बात यह है कि जिस आयोग का उल्लेख सालों से किया जाता रहा, उसकी पहली औपचारिक बैठक अब जाकर हुई है।
भारत ने क्यों किया विरोध?
भारत ने इस बैठक को तुरंत खारिज कर दिया। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि पाकिस्तान और चीन के बीच जिस सीमा की बात की जा रही है, उसका कोई वैध आधार नहीं है क्योंकि वह भारतीय क्षेत्र से जुड़ा हुआ है।
भारत का कहना है कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख का पूरा क्षेत्र भारत का अभिन्न हिस्सा है। पाकिस्तान जिन इलाकों पर कब्जा किए हुए है, उनके बारे में किसी तीसरे देश के साथ कोई समझौता करने का उसे अधिकार नहीं है।
भारत ने यह भी कहा कि चीन और पाकिस्तान के बीच भारतीय क्षेत्र को लेकर होने वाला कोई भी सहयोग भारत की संप्रभुता को प्रभावित नहीं करता। (Shaksgam Valley Dispute)
2013 के समझौते से जुड़ी है इसकी शुरुआत
इस आयोग की नींव वर्ष 2013 में रखी गई थी। उस समय चीन के तत्कालीन प्रधानमंत्री ली खछ्यांग की पाकिस्तान यात्रा के दौरान दोनों देशों ने बाउंड्री मैनेजमेंट सिस्टम एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर किए थे।
इस समझौते के अनुच्छेद 45 में एक संयुक्त आयोग बनाने का प्रावधान था, जिसका उद्देश्य सीमा प्रबंधन संबंधी व्यवस्थाओं के क्रियान्वयन की निगरानी करना था। हालांकि समझौता 2013 में हुआ था, लेकिन आयोग अब जाकर औपचारिक रूप से सक्रिय किया गया है।
यह संयुक्त आयोग सीमा से जुड़े कई महत्वपूर्ण मामलों पर काम करेगा।
इसमें सीमा की देखभाल और निरीक्षण, संयुक्त सर्वेक्षण, सीमा चिह्नों की स्थिति की निगरानी, सीमा पार सुविधाओं का प्रबंधन और सीमा पर होने वाली घटनाओं से जुड़े मामलों का समाधान शामिल होगा।
यदि किसी सीमा चिह्न को उसके मूल स्थान पर दोबारा स्थापित करना संभव नहीं होता, तो आयोग उसके लिए नया स्थान तय कर सकेगा। हालांकि इससे वास्तविक सीमा रेखा में कोई बदलाव नहीं किया जाएगा। (Shaksgam Valley Dispute)
In a significant milestone for Pakistan- China relations, the two sides today operationalized the Pakistan-China Boundary Joint Commission, setting the stage for enhanced cooperation in border management, joint border surveys, trade flows and people to people connectivity.
The… pic.twitter.com/q5uNn8qpN0
— Ministry of Foreign Affairs – Pakistan (@ForeignOfficePk) September 16, 2026
1963 का समझौता आखिर था क्या?
इस विवाद की जड़ 1963 में है। मार्च 1963 में पाकिस्तान और चीन ने एक सीमा समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इस समझौते के तहत पाकिस्तान ने ट्रांस-काराकोरम ट्रैक्ट या शाक्सगाम घाटी का लगभग 5,180 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र चीन को सौंप दिया था।
यह इलाका सियाचिन ग्लेशियर के उत्तर में स्थित है और काराकोरम रेंज का हिस्सा माना जाता है। भारत ने उस समय भी इस समझौते का विरोध किया था और आज भी उसे अवैध मानता है।
भारत का तर्क है कि पाकिस्तान जिस क्षेत्र को चीन को सौंप रहा था, वह स्वयं पाकिस्तान का नहीं था। वह भारतीय क्षेत्र था जिस पर पाकिस्तान का कब्जा था। इसलिए पाकिस्तान को किसी तीसरे देश को वह जमीन देने का अधिकार नहीं था।
क्यों इतनी महत्वपूर्ण है शक्सगाम घाटी
शक्सगाम घाटी दुनिया के सबसे कठिन पर्वतीय क्षेत्रों में से एक है। यह क्षेत्र काराकोरम रेंज के उत्तर में स्थित है और चीन के शिनजियांग क्षेत्र के करीब पड़ता है। इसकी भौगोलिक स्थिति इसे रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण बनाती है।
यह इलाका काराकोरम हाईवे, चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे यानी सीपीईसी और सियाचिन सेक्टर के आसपास के सैन्य समीकरणों से जुड़ा हुआ है।
भारत की चिंता यह भी रही है कि चीन ने इस क्षेत्र में सड़क, सर्वेक्षण और अन्य बुनियादी ढांचा गतिविधियों को बढ़ाया है। (Shaksgam Valley Dispute)
63 साल बाद ही क्यों हुई आयोग की पहली बैठक?
यही सवाल सबसे ज्यादा चर्चा में है। 1963 के समझौते के बाद आयोग का जिक्र तो होता रहा, लेकिन इसकी कोई औपचारिक बैठक नहीं हुई। अब सितंबर 2026 में इसकी पहली बैठक आयोजित की गई।
वहीं पाकिस्तान का कहना है कि यह नया संयुक्त आयोग वर्ष 1963 में बने जॉइंट बाउंड्री डिमार्केशन कमीशन से अलग है। 1963 का आयोग केवल सीमा निर्धारण और सीमांकन के लिए बनाया गया था। उसका काम सीमा सर्वेक्षण करना, सीमा चिह्न स्थापित करना, विस्तृत नक्शे तैयार करना और सीमा रेखा तय करना था। (Shaksgam Valley Dispute)
उस आयोग का कार्य सीमा निर्धारण पूरा होने के बाद समाप्त हो गया था।
1963 का सीमा समझौता बीजिंग में पाकिस्तान के तत्कालीन विदेश मंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो और चीन के विदेश मंत्री चेन यी के बीच हस्ताक्षरित हुआ था।
खास बात यह है कि 1963 के समझौते में यह भी उल्लेख किया गया था कि यदि भविष्य में भारत और पाकिस्तान के बीच कश्मीर विवाद का समाधान होता है, तो संबंधित संप्रभु प्राधिकरण चीन के साथ सीमा संबंधी मुद्दों पर दोबारा बातचीत कर सकता है।
1963 के चीन-पाकिस्तान सीमा समझौते का अनुच्छेद 6 बहुत महत्वपूर्ण है। इसका मतलब सीधे शब्दों में यह है: चीन और पाकिस्तान दोनों ने खुद माना कि यह समझौता अंतिम नहीं है। इसके तहत जब भारत और पाकिस्तान के बीच कश्मीर विवाद का समाधान हो जाएगा, तब जो भी पक्ष उस क्षेत्र का असली मालिक (संप्रभु प्राधिकरण) माना जाएगा, वह चीन के साथ सीमा पर दोबारा बातचीत करेगा और एक नई औपचारिक संधि बनाएगा।
वहीं, भारत पूरे समझौते को अवैध मानता है क्योंकि पाकिस्तान के पास वह क्षेत्र सौंपने का कोई कानूनी अधिकार ही नहीं था। वह क्षेत्र भारत का हिस्सा है, जिसे पाकिस्तान ने अवैध रूप से कब्जाया हुआ है।
विश्लेषकों का मानना है कि इसका संबंध चीन-पाकिस्तान संबंधों को अधिक संस्थागत रूप देने से है। दोनों देश सीमा प्रबंधन और सीमा से जुड़े आर्थिक मार्गों को बेहतर तरीके से संचालित करना चाहते हैं।
खुंजेराब पास, जो चीन और पाकिस्तान को जोड़ता है, चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीपेक) का प्रमुख प्रवेश द्वार है। इस वजह से सीमा प्रबंधन चीन और पाकिस्तान दोनों के लिए महत्वपूर्ण हो गया है। (Shaksgam Valley Dispute)
BRICS शिखर सम्मेलन के तुरंत बाद क्यों हुई बैठक?
12-13 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन हुआ था। इस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग की द्विपक्षीय बैठक हुई। दोनों नेताओं ने कई मुद्दों पर बातचीत की और दोनों देशों के बीच संवाद जारी रखने की बात कही थी। (Shaksgam Valley Dispute)
लेकिन कुछ ही दिनों बाद चीन-पाकिस्तान सीमा आयोग की बैठक होने से कई सवाल उठे।
कई रणनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि चीन भारत के साथ संबंध सुधारने की कोशिश कर सकता है, लेकिन साथ ही वह पाकिस्तान के साथ अपने विशेष संबंधों को भी बनाए रखना चाहता है।
चीन लंबे समय से पाकिस्तान को दक्षिण एशिया में अपना महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार मानता है। दूसरी ओर पाकिस्तान भी चीन को अपना सबसे बड़ा आर्थिक और रक्षा सहयोगी मानता है।
चीन और पाकिस्तान के संबंधों को अक्सर “ऑल वेदर फ्रेंडशिप” कहा जाता है। रक्षा, अर्थव्यवस्था, बुनियादी ढांचे और कूटनीति के क्षेत्र में दोनों देशों के बीच गहरा सहयोग है।
चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा, जिसे सीपीईसी कहा जाता है, दोनों देशों की साझेदारी का सबसे बड़ा उदाहरण है। यह परियोजना चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव का हिस्सा है। इसके तहत सड़कें, ऊर्जा परियोजनाएं, रेल नेटवर्क और बंदरगाह विकसित किए गए हैं।
भारत लगातार सीपीईसी का विरोध करता रहा है क्योंकि इसका एक हिस्सा पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर से होकर गुजरता है। (Shaksgam Valley Dispute)
भारत की नीति क्या कहती है
भारत का आधिकारिक रुख पिछले छह दशकों में लगभग समान रहा है। 1963 के समझौते के समय भी भारत ने इसका विरोध किया था। उसके बाद आने वाली सभी सरकारों ने इसी नीति को जारी रखा।
2019 में जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन और लद्दाख को अलग केंद्र शासित प्रदेश बनाए जाने के बाद भारत ने अपने दावे को और स्पष्ट रूप से दोहराया।
भारत लगातार कहता रहा है कि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर, गिलगित-बाल्टिस्तान और शाक्सगाम घाटी भारतीय क्षेत्र हैं। इसी कारण भारत चीन और पाकिस्तान के बीच इन क्षेत्रों को लेकर होने वाले किसी भी समझौते को स्वीकार नहीं करता। (Shaksgam Valley Dispute)
Author
हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।





