📍नई दिल्ली | 14 Sep, 2026, 9:07 PM
Indigenous Marine Gas Turbine: भारतीय नौसेना ने अपने युद्धपोतों के लिए स्वदेशी 24-28 मेगावाट मरीन गैस टर्बाइन डेवलप करने की तैयारियां शुरू कर दी हैं। रक्षा मंत्रालय ने इसके स्वदेशी निर्माण के लिए कंपनियों से एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (EOI) मांगा है। यह वही इंजन है जो नौसेना के युद्धपोतों को चलाने या जहाज पर बिजली पैदा करने के लिए इस्तेमाल होते हैं। 7 सितंबर को ही रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में हुई रक्षा अधिग्रहण परिषद (डीएसी) की बैठक में स्वदेशी मरीन गैस टर्बाइन परियोजना को मंजूरी दी गई थी। फिलहाल भारत इस तकनीक के लिए विदेशी कंपनियों पर निर्भर है। अमेरिका, ब्रिटेन, यूक्रेन और कुछ चुनिंदा यूरोपीय कंपनियों के पास ही यह एडवांस तकनीक मौजूद है। इस प्रोजेक्ट को रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया 2020 की मेक-1 कैटेगरी के तहत आगे बढ़ाया जाएगा।
Indigenous Marine Gas Turbine: विदेशी इंजनों पर निर्भर है नौसेना का बड़ा बेड़ा
भारतीय नौसेना के कई प्रमुख युद्धपोत आज भी विदेशी गैस टर्बाइनों पर निर्भर हैं। कोलकाता क्लास और विशाखापत्तनम क्लास डिस्ट्रॉयर, शिवालिक क्लास और नीलगिरि क्लास फ्रिगेट तथा विमानवाहक पोत आईएनएस विक्रांत जैसे प्लेटफॉर्म मुख्य रूप से यूक्रेन की जोर्या-माशप्रोएक्ट और अमेरिका की जनरल इलेक्ट्रिक एलएम-2500 गैस टर्बाइन का इस्तेमाल करते हैं।
हालांकि एलएम-2500 इंजनों की असेंबली और टेस्टिंग हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) बेंगलुरु में होती है, लेकिन इंजन की कोर टेक्नोलॉजी, हॉट सेक्शन, ब्लेड डिजाइन और अन्य महत्वपूर्ण तकनीकी हिस्से विदेशी नियंत्रण में रहते हैं।
सूत्रों का कहना है कि युद्ध या अंतरराष्ट्रीय संकट के दौरान स्पेयर पार्ट्स, ओवरहॉल और तकनीकी मदद मिलने में दिक्कत हो सकती है। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद ग्लोबल सप्लाई चेन में आई चुनौतियों से सरकार ने सबक लिया है। इसी वजह से भारतीय नौसेना ने लंबे समय से स्वदेशी गैस टर्बाइन डेवलप करने की दिशा में काम शुरू किया था।
जुलाई 2025 में मिली थी प्रारंभिक मंजूरी
इस कार्यक्रम को पहली बड़ी मंजूरी 28 जुलाई 2025 को मिली थी, जब परियोजना को अप्रूवल इन प्रिंसिपल (एआईपी) दिया गया था। इसके बाद नौसेना ने विभिन्न भारतीय कंपनियों और संगठनों की तकनीकी क्षमता का आकलन शुरू किया।
इस दौरान डिजाइन क्षमता, प्रिसीजन मैन्युफैक्चरिंग, टेस्टिंग इंफ्रास्ट्रक्चर, मेटलर्जी, डिजिटल कंट्रोल सिस्टम और लाइफ साइकिल सपोर्ट जैसी क्षमताओं का अध्ययन किया गया। अब 7 सितंबर 2026 को एओएन मिलने के बाद प्रोजेक्ट औपचारिक रूप से डेवलपमेंट फेज शुरू हो गया है। मेक-1 कैटेगरी के तहत सरकार प्रोटोटाइप डेवलपमें की लागत का 70 प्रतिशत तक वहन कर सकती है। इस पूरे कार्यक्रम की लागत लगभग 4,000 से 5,000 करोड़ रुपये के बीच आंकी गई है। (Indigenous Marine Gas Turbine)
24-28 मेगावाट इंजन क्यों है इतना महत्वपूर्ण?
24-28 मेगावाट पावर कैटेगरी के इंजन आधुनिक बड़े युद्धपोतों के मुख्य प्रोपल्शन सिस्टम के लिए उपयुक्त माने जाते हैं। इसी कैटेगरी में जनरल इलेक्ट्रिक एलएम-2500 और जोर्या-माशप्रोएक्ट के कई मरीन इंजन आते हैं।
इतने मेगावाट की ताकत युद्धपोत को तेज रफ्तार, तेज एक्सेलरेशन, लंबी समुद्री तैनाती और युद्धक परिस्थितियों में तेजी से ऑपरेशन करने की क्षमता देती है। आधुनिक नौसेनाएं सीओडीओजी, सीओजीएजी और इंटीग्रेटेड इलेक्ट्रिक प्रोपल्शन जैसे सिस्टम्स का इस्तेमाल कर रही हैं। भारतीय गैस टर्बाइन को भी इन आधुनिक सिस्टम्स के साथ कंपैटेबल बनाना होगा।
नौसेना की योजना के अनुसार इस इंजन का इस्तेमाल भविष्य के डिस्ट्रॉयर और फ्रिगेट कैटेगरी के युद्धपोतों में किया जा सकेगा। (Indigenous Marine Gas Turbine)
गैस टर्बाइन बनाना दुनिया की सबसे कठिन तकनीकों में शामिल
सूत्रों के मुताबिक गैस टर्बाइन टेक्नोलॉजी एयरोस्पेस और डिफेंस सेक्टर की सबसे मुश्किल तकनीकों में गिनी जाती है। इसके लिए अत्यधिक तापमान सहने वाली सामग्री, सटीक इंजीनियरिंग और उन्नत निर्माण तकनीकों की जरूरत होती है।
टर्बाइन के अंदर तापमान 1200 से 1400 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक तक पहुंच सकता है। ऐसे वातावरण में काम करने वाले ब्लेड के लिए सिंगल क्रिस्टल सुपरअलॉय, थर्मल बैरियर कोटिंग और विशेष कूलिंग चैनलों की जरूरत होती है।
भारत में गैस टर्बाइन रिसर्च एस्टेब्लिशमेंट (जीटीआरई), कावेरी इंजन कार्यक्रम और निजी उद्योगों ने इस क्षेत्र में अनुभव हासिल किया है, लेकिन बड़े मरीन इंजन के लिए जरूरी तकनीक डेवलप करना अभी भी चुनौतीपूर्ण माना जाता है। (Indigenous Marine Gas Turbine)
समुद्री वातावरण में इंजन को बचाना भी बड़ी चुनौती
समुद्र में लगातार नमक, नमी और कंपन की स्थिति रहती है। यही वजह है कि किसी भी गैस टर्बाइन को सीधे समुद्री इस्तेमाल के लिए तैयार नहीं किया जा सकता। इंजन में विशेष कोटिंग, एयर फिल्ट्रेशन सिस्टम, सीलिंग तकनीक और जंग से सुरक्षा देने वाले उपाय शामिल करने पड़ते हैं। इस प्रक्रिया को मरीनाइजेशन कहा जाता है।
इसके अलावा इंजन का फुल अथॉरिटी डिजिटल इंजन कंट्रोल सिस्टम यानी फेडेक युद्धपोत के कॉम्बैट मैनेजमेंट सिस्टम से जुड़ा होता है। इसलिए इंजन का प्रदर्शन हर परिस्थिति में स्थिर और विश्वसनीय होना आवश्यक है। (Indigenous Marine Gas Turbine)
चार प्रोटोटाइप बनाकर होंगे परीक्षण
प्रोजेक्ट के तहत शुरुआती चरण में चार प्रोटोटाइप इंजन डेवलप किए जाने की योजना है। इन इंजनों पर प्रयोगशाला और समुद्री वातावरण दोनों में विस्तृत परीक्षण किए जाएंगे। इन परीक्षणों में ईंधन दक्षता, अधिकतम शक्ति, लंबे समय तक संचालन क्षमता, नमक प्रतिरोध, कंपन सहनशीलता और रखरखाव संबंधी मानकों की जांच होगी। सफल परीक्षणों के बाद कम से कम 40 इंजनों की खरीद की जा सकती है।
कई सरकारी और निजी कंपनियां आ सकती हैं साथ
इस प्रोजेक्ट को इंडस्ट्री बेस्ड मॉडल पर डेवलप किया जाएगा। गैस टर्बाइन रिसर्च एस्टेब्लिशमेंट (जीटीआरई) डिजाइन और रिसर्च में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड (बीएचईएल) बड़े औद्योगिक सिस्टम निर्माण का अनुभव रखता है। हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड के पास एलएम-2500 इंजन असेंबली का अनुभव है।
निजी क्षेत्र में भारत फोर्ज जैसे समूह भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। कंपनी विशाखापत्तनम में मरीन गैस टर्बाइन रिपेयर और डेवलपमेंट सुविधाओं पर काम कर रही है। जून 2026 में भारत फोर्ज को 1.25 मेगावाट मरीन गैस टर्बाइन जनरेटर के 12 सेट बनाने का कॉन्ट्रैक्ट भी मिला था। (Indigenous Marine Gas Turbine)
तीन तरह के इंजन पर काम
भारत फिलहाल तीन लेवल पर समानांतर काम कर रहा है। पहला 1.25 मेगावाट मरीन गैस टर्बाइन जनरेटर कार्यक्रम है, जिसका इस्तेमाल जहाजों पर बिजली उत्पादन के लिए किया जाएगा। दूसरा 4 मेगावाट कैटेगरी का गैस टर्बाइन जनरेटर है, जिसे मेक-1 कैटेगरी के तहत डेवलप किया जा रहा है।
तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण कार्यक्रम 24-28 मेगावाट मुख्य प्रोपल्शन गैस टर्बाइन का है। इसी वजह से नौसेना ने स्टेजवाइज स्ट्रैटेजी अपनाई है, ताकि मेटलर्जी, कम्बशन टेक्नोलॉजी, फेडेक कंट्रोल और मरीनाइजेशन जैसी जटिल तकनीकों को धीरे-धीरे मैच्योर बनाया जा सके।
यह परियोजना भारतीय नौसेना की आत्मनिर्भरता से सीधे जुड़ी हुई है। स्वदेशी गैस टर्बाइन उपलब्ध होने पर भविष्य के युद्धपोतों के लिए इंजन, स्पेयर पार्ट्स, मरम्मत और ओवरहॉल की पूरी व्यवस्था देश के भीतर विकसित की जा सकेगी। (Indigenous Marine Gas Turbine)
Author
हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।





