📍नई दिल्ली/मास्को | 9 Sep, 2026, 9:59 PM
Su-57 Fighter Jet India: रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन एक बार फिर भारत को अपने सबसे आधुनिक फिफ्थ जेनरेशन स्टील्थ फाइटर जेट सु-57 की पेशकश कर रहे हैं। 11 सितंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पुतिन की प्रस्तावित द्विपक्षीय बैठक से पहले क्रेमलिन ने साफ कर दिया है कि रक्षा सहयोग और सु-57 लड़ाकू विमान का मुद्दा बातचीत के एजेंडे में शामिल रहेगा।
वहीं, रूस सु-57 के साथ टेक्नोलॉजी ट्रांसफर, भारत में प्रोडक्शन और आगे के डेवलपमेंट में साझेदारी जैसी शर्तें भी दे रहा है। इसके बावजूद भारत की तरफ से ठंडा रुख अपनाया जा रहा है। जानते हैं आखिर इसके पीछे वजह क्या है?
Su-57 Fighter Jet India: ब्रिक्स समिट से पहले फिर क्रेमलिन ने किया सु-57 का जिक्र
12-13 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में होने वाले 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से पहले सु-57 एक बार फिर चर्चा में है। इस बैठक से ठीक पहले 8 सितंबर को एक कार्यक्रम के दौरान क्रेमलिन प्रवक्ता ने भारतीय मीडिया के साथ वर्चुअल ब्रीफिंग में कहा कि सु-57 दुनिया के सबसे एडवांस फाइटर जेट्स में से एक है और इस विषय पर दोनों देशों के बीच चर्चा जारी है। पेसकोव ने कहा कि भारत को सु-57 लड़ाकू विमान की बिक्री का मुद्दा राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 11 सितंबर को होने वाली द्विपक्षीय बैठक के एजेंडे में शामिल है।
उन्होंने कहा, “सु-57 दुनिया के सबसे बेहतरीन और सबसे परिष्कृत लड़ाकू विमानों में से एक है। भारत को इसकी बिक्री दोनों नेताओं की बैठक में चर्चा के विषयों में शामिल है।”
पेसकोव ने कहा, “हर देश अपनी नई और जटिल सैन्य तकनीकों को अपने पास रखना चाहता है। लेकिन भारत के साथ हमारे एडवांस रणनीतिक संबंध हैं, इसलिए हम इस संभावना पर चर्चा करेंगे कि क्या यह तकनीक भारत को दी जा सकती है।”
पुतिन खुद भी दे चुके हैं ऑफर
जून 2026 में सेंट पीटर्सबर्ग इंटरनेशनल इकोनॉमिक फोरम के दौरान राष्ट्रपति पुतिन ने भारतीय मीडिया से बातचीत में कहा था, “हमने भारतीय मित्रों को पांचवीं पीढ़ी के इस विमान को संयुक्त रूप से विकसित करने का प्रस्ताव दिया था। मुझे लगता है कि यह दुनिया के सबसे अच्छे विमानों में से एक है। भारतीय मित्रों ने कहा था कि वे इस पर विचार करेंगे।”
उन्होंने जोड़ा कि सैद्धांतिक रूप से यह रूस-भारत का संयुक्त उत्पाद हो सकता था, लेकिन रूस ने इसे अकेले विकसित किया। अब वे भारत के साथ काम करने, विमान सप्लाई करने और आगे विकसित करने को तैयार हैं। कोई पाबंदी नहीं होगी।
पुतिन ने यह भी कहा था कि रूस भारत को विमान सप्लाई करने, तकनीक साझा करने और आगे के विकास में भागीदारी देने के लिए तैयार है। उन्होंने जोर देकर कहा कि इस सहयोग पर किसी प्रकार की पाबंदी नहीं होगी।
पुतिन ने भारत को एक्सपोर्ट वर्जन सु-57ई नहीं, बल्कि पूरे सु-57 फैमिली का ऑफर दिया है। जिसमें दो सीटों वाला सु-57डी भी शामिल है, जिसका मई 2026 में पहला उड़ान परीक्षण हुआ है। (Su-57 Fighter Jet India)
2007 में शुरू हुआ था जॉइंट फाइटर प्रोग्राम
साल 2007 में दोनों देशों ने फिफ्थ जेनरेशन फाइटर एयरक्राफ्ट (FGFA) प्रोग्राम शुरू किया था। यह प्रोजेक्ट सु-57 प्लेटफॉर्म पर आधारित था। भारत चाहता था कि उसे डिजाइन, इंजन, एवियोनिक्स और स्टील्थ टेक्नोलॉजी से जुड़ी महत्वपूर्ण तकनीकों तक पहुंच मिले। लेकिन समय के साथ प्रोजेक्ट की लागत बढ़ती गई और तकनीकी मुद्दों को लेकर मतभेद सामने आने लगे।
करीब एक दशक तक चली बातचीत के बाद तत्कालीन नरेंद्र मोदी सरकार ने 2018 में इस कार्यक्रम से खुद को अलग कर लिया। इसके बाद रूस ने सु-57 को अपने दम पर डेवलप किया और उसे रूसी एयरोस्पेस फोर्सेज में शामिल करना शुरू कर दिया।
वहीं, अब रूस पुरानी साझेदारी को पुनर्जीवित करने की कोशिश कर रहा है। प्रस्ताव में फुल टेक्नोलॉजी ट्रांसफर, सोर्स कोड तक पहुंच, भारत में लाइसेंस के तहत उत्पादन, दो सीटों वाला वेरिएंट और भारतीय हथियारों का इंटीग्रेशन शामिल है। (Su-57 Fighter Jet India)
🇷🇺🇮🇳 Kremlin Signals Openness to Discuss Su-57 Technology Transfer with India…
Kremlin spokesperson Dmitry Peskov has said discussions with India on the Su-57 fifth-generation fighter are ongoing, including New Delhi’s interest in production technologies.
Calling the Su-57 “one… pic.twitter.com/8zPoVp8C3x— Raksha Samachar | रक्षा समाचार 🇮🇳 (@RakshaSamachar) September 8, 2026
रूस के लिए भारत क्यों है इतना महत्वपूर्ण?
रूस की सु-57 बेचने की कोशिश के पीछे आर्थिक और रणनीतिक दोनों कारण हैं। दरअसल यूक्रेन युद्ध के बाद रूस पर पश्चिमी देशों के प्रतिबंध बढ़े हैं। इससे रूसी रक्षा उद्योग को झटका लगा है। कई पारंपरिक ग्राहक देश पश्चिमी दबाव और वित्तीय प्रतिबंधों के चलते रूसी हथियार नहीं खरीद रहे हैं।
ऐसे माहौल में भारत रूस का सबसे बड़ा और सबसे भरोसेमंद रक्षा साझेदार बना हुआ है। भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना के पास आज भी बड़ी संख्या में रूसी मूल के प्लेटफॉर्म मौजूद हैं।
सु-30एमकेआई इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड ने नासिक में लाइसेंस के तहत लगभग 222 सु-30एमकेआई बनाए हैं। वायुसेना के कुल बेड़े में करीब 260 सु-30एमकेआई हैं इनमें से लगभग 50 विमान रूस में बनकर सीधे भारत आए थे। रूस चाहता है कि एचएएल के इसी इन्फ्रास्ट्रक्चर का इस्तेमाल सु-57 के लिए भी किया जाए। इसके लिए रूस ने सितंबर 2025 में सु-57 के संभावित भारतीय उत्पादन का जायजा लेने के लिए एक तकनीकी टीम एचएएल के प्लांटों पर भेजी थी। जिनमें सुखोई डिजाइन ब्यूरो के प्रतिनिधि और अन्य रूसी रक्षा कंपनियों के इंजीनियर व अधिकारी शामिल थे।
अक्टूबर-नवंबर 2025 में टीम ने एचएएल को रिपोर्ट सौंपी। जिसमें लिखा था कि एचएएल के पास सु-57 बनाने की करीब 50 प्रतिशत क्षमता पहले से मौजूद है। नासिक की सु-30एमकेआई लाइन को थोड़े बदलाव से सु-57 के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। बाकी 50 प्रतिशत के लिए नई टूलिंग, स्टील्थ कोटिंग, कंपोजिट और सेंसर फ्यूजन लैब की जरूरत बताई थी। खुद तत्कालीन एचएएल चेयरमैन डी.के. सुनील ने इसकी पुष्टि भी की थी। (Su-57 Fighter Jet India)
सु-57 पर भारत ने जताई थीं ये आपत्तियां?
सु-57 रूस का पहला ऑपरेशनल फिफ्थ जेनरेशन स्टील्थ फाइटर है। इसे अमेरिकी एफ-22 रैप्टर और एफ-35 के मुकाबले डेवलप किया गया है। इस विमान में स्टील्थ डिजाइन, सुपरक्रूज क्षमता, एडवांस्ड रडार, इंटीग्रेटेड सेंसर सिस्टम और लंबी दूरी की एयर-टू-एयर तथा एयर-टू-ग्राउंड मिसाइलें शामिल हैं।
विमान में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित कुछ सिस्टम, इंटरनल वेपन बे और नेटवर्क-सेंट्रिक वॉरफेयर क्षमताएं भी जोड़ी गई हैं। हालांकि कई रक्षा विशेषज्ञ इसकी स्टील्थ क्षमता को अमेरिकी एफ-35 या एफ-22 के बराबर नहीं मानते। यही वजह है कि भारत ने पहले भी इसके कुछ तकनीकी पहलुओं पर सवाल उठाए थे।
भारतीय वायुसेना की सबसे बड़ा आपत्ति यही थी। आईएएफ का मानना था कि सु-57 (तब टी-50/पीएके एफए) की रडार क्रॉस सेक्शन पांचवीं पीढ़ी के मानकों पर खरी नहीं उतरती। फ्रंट से कुछ हद तक स्टील्थ है, लेकिन साइड और रियर से रडार सिग्नेचर ज्यादा है। आईएएफ ने प्रोटोटाइप देखने के बाद 40 से ज्यादा बदलाव मांगे थे, जिनमें स्टील्थ सुधार प्रमुख था। जबकि रूस का कहना था विमान उसकी जरूरतों के हिसाब से ठीक है।
साथ ही तब विमान में एएल-41एफ1 इंजन था (सु-35 वाला एडवांस वर्जन) और नया इज्देलिये-30 इंजन तैयार नहीं था। आईएएफ को सुपरक्रूज (आफ्टरबर्नर के बिना सुपरसोनिक उड़ान) चाहिए थी, जो उस इंजन से पूरी नहीं हो रही थी। इंजन की विश्वसनीयता और रखरखाव पर भी सवाल थे।
वहीं, भारत चाहता था कि वह आगे विमान खुद अपग्रेड कर सके। इसके लिए सोर्स कोड और डिजाइन डेटा चाहिए था। जबकि रूस इसे देने को तैयार नहीं था। एचएएल और डीआरडीओ को रूसी आरएंडडी सुविधाओं तक पर्याप्त पहुंच नहीं मिली थी और काम का बंटवारा भी भारत के पक्ष में कम था।
फिफ्थ जेनरेशन फाइटर एयरक्राफ्ट के शुरुआती डिजाइन पर भारत ने करीब 295 मिलियन डॉलर खर्च किए थे। जबकि आगे पूरा कार्यक्रम अरबों डॉलर का हो रहा था। जिससे प्रति विमान कीमत 150-200 मिलियन डॉलर तक पहुंच रही थीं। (Su-57 Fighter Jet India)
रूस जानता है भारतीय वायुसेना को चाहिए फाइटर जेट्स
भारतीय वायुसेना लंबे समय से स्क्वाड्रन की कमी का सामना कर रही है। वायुसेना की जरूरत 42 स्क्वाड्रन की है, जबकि मौजूदा संख्या लगभग 29 से 31 स्क्वाड्रन के बीच है। पुराने मिग-21 रिटायर हो चुके हैं। 2035 तक भारतीय वायुसेना के सामने सिर्फ मौजूदा स्क्वाड्रन की कमी पूरी करने की चुनौती नहीं होगी, बल्कि बड़ी संख्या में पुराने लड़ाकू विमानों को बदलने की जरूरत भी पड़ेगी।
भारतीय वायुसेना के पास जगुआर फाइटर जेट के करीब 6 स्क्वाड्रन हैं, यानी लगभग 110-120 विमान। इनकी रिटायरमेंट 2028 से शुरू होने की संभावना है। इसके बाद मिग-29 के करीब 3 स्क्वाड्रन हैं, जिनके 2030 के दशक के मध्य तक सेवा से बाहर होने की उम्मीद है। वहीं मिराज-2000 बेड़े के करीब 3 स्क्वाड्रन भी 2030 के दशक के मध्य से अंत तक रिटायरमेंट होने शुरू हो जाएंगे। मिराज-2000 को हाल के सालों में अपग्रेड जरूर किया गया है, लेकिन उनकी उम्र भी धीरे-धीरे पूरी हो रही है।
इस तरह देखें तो 2035 तक जगुआर, मिग-29 और मिराज-2000 मिलाकर लगभग 12 फाइटर स्क्वाड्रन भारतीय वायुसेना से बाहर हो सकते हैं।
यही वजह है कि कई विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत को किसी फिफ्थ जेनरेशन फाइटर की जरूरत है। चीन पहले से जे-20 स्टील्थ फाइटर का संचालन कर रहा है। वहीं पाकिस्तान भी चीनी जे-35 खरीदने की तैयारी कर रहा है। (Su-57 Fighter Jet India)
क्या है रूस का “स्टॉप-गैप” तर्क?
रूस का कहना है कि एएमसीए को पूरी तरह सेवा में आने में अभी लगभग 8 से 10 साल लग सकते हैं। इस बीच क्षेत्रीय सुरक्षा माहौल तेजी से बदल रहा है। भारत के पास फिलहाल कोई ऑपरेशनल स्टील्थ फाइटर नहीं है।
तेजस एमके-1ए के 180 विमानों का ऑर्डर दिया जा चुका है। इनका इंडक्शन 2026-27 से शुरू होगा, लेकिन सभी विमान वायुसेना को मिलने में 2030 के दशक के मध्य तक का समय लग सकता है। इसके बाद तेजस एमके-2 कार्यक्रम है। लगभग 120 विमानों की योजना पर काम चल रहा है, लेकिन इसका बड़े पैमाने पर उत्पादन 2030 के दशक के मध्य में शुरू होने की उम्मीद है।
भारत 114 नए लड़ाकू विमानों की की डिलीवरी भी कई वर्षों में चरणबद्ध तरीके से होगी और इसका बड़ा हिस्सा “मेक इन इंडिया” मॉडल के तहत तैयार किया जाएगा।
जबकि एएमसीए अभी डेवलपमेंट फेज में है। इसकी पहली उड़ान लगभग 2029 के आसपास होने की उम्मीद है, जबकि पहली स्क्वाड्रन 2034-35 से पहले ऑपरेशनल नहीं हो पाएगी।
यही वजह है कि 2030 से 2035 के बीच भी स्क्वाड्रन संख्या में एक बड़ा अंतर बना रह सकता है।
रूस का तर्क है कि यदि भारत अभी 36 से 40 सु-57 स्टील्थ फाइटर खरीदता है, तो लगभग दो स्क्वाड्रन 2028 से 2032 के बीच सर्विस में आ सकती हैं। इससे वायुसेना को अस्थायी राहत मिलेगी और एएमसीए के आने तक स्टील्थ क्षमता भी मिल जाएगी। (Su-57 Fighter Jet India)
भारत क्यों नहीं दिखा रहा उत्साह?
भारत का सबसे बड़ा फोकस इस समय तेजस एमके-1ए, तेजस एमके-2 और सबसे महत्वपूर्ण एएमसीए (एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट) स्वदेशी लड़ाकू विमान कार्यक्रमों पर है। जुलाई 2026 में रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने भी संकेत दिया था कि नई सुखोई-57 खरीदने की फिलहाल कोई योजना नहीं है और मौजूदा सु-30एमकेआई के अपग्रेड का काम जारी रहेगा और देश स्वदेशी कार्यक्रमों पर ध्यान केंद्रित करेगा। खुद वायुसेना के टॉप सूत्रों ने भी रक्षा समाचार को पुष्टि की थी कि वायुसेना की सु-57 में कोई दिलचस्पी नहीं है।
वहीं, अमेरिका का CAATSA (Countering America’s Adversaries Through Sanctions Act) कानून रूस से बड़े रक्षा सौदों पर प्रतिबंध लगाने की अनुमति देता है। भारत को एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम खरीदने पर अभी तक छूट मिली हुई है। लेकिन किसी नए बड़े सौदे की स्थिति में ट्रंप की प्रतिक्रिया क्या होगी, यह सवाल हमेशा बना रहता है। क्योंकि 2026 में सीनेट में रूस से सैन्य उपकरण खरीदने वाले देशों पर 100 फीसदी कड़े टैरिफ लगाने वाले विधेयक भी पास हुआ।
इसके अलावा फरवरी 2026 में भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते को लेकर एक प्रारंभिक स्ट्रक्चर पर सहमति बनी थी। उस समय अमेरिका ने भारत पर लगाए जाने वाले पारस्परिक टैरिफ को 18 प्रतिशत तक कम करने का संकेत दिया था। हालांकि कई दौर की बातचीत के बावजूद यह समझौता अभी तक अंतिम रूप नहीं ले सका है।
भारत की कोशिश है कि उसे अन्य देशों के मुकाबले अधिक अनुकूल और बेहतर व्यापारिक शर्तें मिलें। वहीं अमेरिका की ओर से कुछ कानूनी और नीतिगत प्रक्रियाओं, अतिरिक्त जांच-पड़ताल तथा कृषि क्षेत्र जैसे संवेदनशील मुद्दों पर मतभेद के कारण बातचीत अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ पाई। इसी वजह से अभी तक यह व्यापार समझौता लंबित है। क्योंकि भारत के बड़े रूसी रक्षा सौदे के चलते अमेरिका के साथ उसके आर्थिक और रणनीतिक संबंध मुश्किल हो सकते हैं।
हालांकि रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भी सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं कि बाहरी प्रतिबंधों या दबावों के जरिए देशों के रणनीतिक फैसलों को प्रभावित करना आसान नहीं है। (Su-57 Fighter Jet India)
किन देशों के पास है सु-57?
रूस के पास इस समय लगभग 40 से 44 सु-57 पांचवीं पीढ़ी के स्टील्थ फाइटर विमान हैं। रूसी एयरोस्पेस फोर्सेज इसका सबसे बड़ा ऑपरेटर है। रूस ने कुल 76 प्रोडक्शन सु-57 विमानों का ऑर्डर दिया है, जिनकी डिलीवरी 2028 तक पूरी करने की योजना है।
विदेशी ग्राहकों में अल्जीरिया पहला और फिलहाल एकमात्र पुष्टि किया गया खरीदार है। नवंबर 2025 में उसे पहले दो सु-57ई विमान मिले और 2026 की शुरुआत में ये विमान अल्जीरिया में उड़ान भरते दिखाई दिए। अल्जीरिया का शुरुआती ऑर्डर 12 से 14 विमानों का है।
रूसी कंपनियों का दावा है कि कई अन्य देशों ने भी सु-57ई के लिए कॉन्ट्रैक्ट किए हैं, लेकिन उनके नाम सार्वजनिक नहीं किए गए हैं। कजाकिस्तान, ईरान और उत्तर कोरिया को संभावित ग्राहकों के रूप में देखा जा रहा है, हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। (Su-57 Fighter Jet India)
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हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।





