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Explainer: क्या है संयुक्त राष्ट्र का ‘Correct the Map’ प्रस्ताव? दुनिया के नक्शे पर क्यों छिड़ी बहस, अमेरिका ने क्यों किया विरोध?

पिछले लगभग 450 वर्षों से दुनिया में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला नक्शा “मर्केटर प्रोजेक्शन” रहा है। इसे 1569 में फ्लेमिश भूगोलवेत्ता जेरार्डस मर्केटर ने समुद्री नेविगेशन के लिए तैयार किया था...

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📍नई दिल्ली | 5 Sep, 2026, 2:58 PM

UN Correct the Map Resolution: दुनिया का नक्शा हम बचपन से देखते आए हैं। स्कूल की किताबों से लेकर एटलस, न्यूज चैनलों और इंटरनेट तक, लगभग हर जगह एक जैसा विश्व मानचित्र दिखाई देता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जो नक्शा हम देखते हैं, वह वास्तव में पृथ्वी के देशों और महाद्वीपों का सही आकार दिखाता भी है या नहीं? इसी सवाल ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में एक बड़ी बहस को जन्म दिया है।

4 सितंबर को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने “करेक्ट द मैप” नाम का एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव 164-1 मतों से पारित किया। इस प्रस्ताव का उद्देश्य दुनिया के नक्शों में दिखाई देने वाली पुरानी विकृतियों को कम करना और देशों व महाद्वीपों का वास्तविक क्षेत्रफल अधिक सटीक तरीके से दिखाना है। भारत ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया, लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि किसी एक विशेष मैप सिस्टम को पूरी दुनिया पर नहीं थोपा जाना चाहिए।

UN Correct the Map Resolution: आखिर नक्शे में समस्या क्या है?

पृथ्वी गोल है, जबकि नक्शा सपाट कागज या स्क्रीन पर बनाया जाता है। यही सबसे बड़ी तकनीकी चुनौती है। किसी गोल सतह को सपाट सतह पर दिखाने के लिए गणितीय तरीकों का उपयोग किया जाता है, जिन्हें “मैप प्रोजेक्शन” कहा जाता है।

समस्या यह है कि कोई भी मैप प्रोजेक्शन एक साथ आकार, दूरी, दिशा और क्षेत्रफल को पूरी तरह सही नहीं रख सकता। किसी न किसी जगह समझौता करना पड़ता है।

पिछले लगभग 450 वर्षों से दुनिया में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला नक्शा “मर्केटर प्रोजेक्शन” रहा है। इसे 1569 में फ्लेमिश भूगोलवेत्ता जेरार्डस मर्केटर ने समुद्री नेविगेशन के लिए तैयार किया था।

उस समय जहाजों को दिशा बताने के लिए यह तरीका बेहद उपयोगी था। लेकिन इसमें एक बड़ी कमी भी थी। ध्रुवों के पास स्थित क्षेत्रों का आकार वास्तविकता से कहीं ज्यादा बड़ा दिखाई देता है, जबकि भूमध्य रेखा के आसपास के देशों का आकार अपेक्षाकृत छोटा दिखता है। (UN Correct the Map Resolution)

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ग्रीनलैंड और अफ्रीका का उदाहरण

मर्केटर प्रोजेक्शन की सबसे ज्यादा आलोचना ग्रीनलैंड और अफ्रीका की तुलना को लेकर होती है। नक्शे में ग्रीनलैंड लगभग अफ्रीका जितना बड़ा दिखाई देता है। लेकिन वास्तविकता बिल्कुल अलग है। ग्रीनलैंड का क्षेत्रफल करीब 21.6 लाख वर्ग किलोमीटर है, जबकि अफ्रीका का क्षेत्रफल लगभग 3.03 करोड़ वर्ग किलोमीटर है। यानी अफ्रीका वास्तव में ग्रीनलैंड से करीब 14 गुना बड़ा है।

इसी तरह अलास्का और ब्राजील को देखें, तो नक्शे में दोनों लगभग समान आकार के दिखाई देते हैं। जबकि ब्राजील का क्षेत्रफल अलास्का से लगभग पांच गुना ज्यादा है।

अंटार्कटिका भी मर्केटर नक्शे में बहुत विशाल दिखाई देता है, जबकि वास्तविक क्षेत्रफल की तुलना में उसका दृश्य आकार काफी बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जाता है। (UN Correct the Map Resolution)

क्या कहता है संयुक्त राष्ट्र का “करेक्ट द मैप” प्रस्ताव?

संयुक्त राष्ट्र महासभा का यह प्रस्ताव दुनिया के देशों, शैक्षणिक संस्थानों, अंतरराष्ट्रीय संगठनों और डिजिटल प्लेटफॉर्मों को ऐसे नक्शों के इस्तेमाल के लिए प्रोत्साहित करता है जो देशों और महाद्वीपों का वास्तविक क्षेत्रफल अधिक सटीक तरीके से दिखाएं।

इसका उद्देश्य विशेष रूप से अफ्रीका, एशिया और दक्षिण अमेरिका जैसे क्षेत्रों को उनके वास्तविक भौगोलिक आकार के अनुसार प्रदर्शित करना है।

प्रस्ताव में कहा गया है कि पुराने नक्शों के कारण लोगों की भौगोलिक समझ प्रभावित होती है। कई बार किसी क्षेत्र का वास्तविक आकार और महत्व लोगों को पता ही नहीं चल पाता।

हालांकि यह प्रस्ताव बाध्यकारी नहीं है। इसका मतलब यह नहीं कि दुनिया भर के पुराने नक्शे तुरंत बदल जाएंगे या मर्केटर प्रोजेक्शन पर प्रतिबंध लग जाएगा। (UN Correct the Map Resolution)

इक्वल अर्थ प्रोजेक्शन क्या है?

इस बहस के केंद्र में “इक्वल अर्थ प्रोजेक्शन” नाम का एक आधुनिक मैप सिस्टम भी है। इसे 2018 में डेवलप किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य देशों और महाद्वीपों के वास्तविक क्षेत्रफल को सुरक्षित रखना है।

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इस प्रकार के नक्शे में अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका और एशिया का आकार वास्तविकता के ज्यादा करीब दिखाई देता है। ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका जैसे ध्रुवीय क्षेत्रों का आकार भी संतुलित दिखता है।

हालांकि इसके बदले कुछ जगहों पर आकृतियां थोड़ी विकृत हो सकती हैं। यही वजह है कि सभी विशेषज्ञ इसे हर उद्देश्य के लिए सबसे उपयुक्त नहीं मानते। (UN Correct the Map Resolution)

भारत ने क्या कहा?

भारत ने प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया, लेकिन साथ ही अपनी बात भी रखी। संयुक्त राष्ट्र में भारत के प्रतिनिधि रघु पुरी ने कहा कि समान क्षेत्रफल वाले मैप प्रोजेक्शन महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वे महाद्वीपों और देशों के वास्तविक आकार को सही तरीके से दिखाते हैं।

उन्होंने कहा कि ऐसे नक्शे उन विकृतियों को कम कर सकते हैं जो केवल दिशा, दूरी या आकार को सुरक्षित रखने वाले पुराने प्रोजेक्शनों में दिखाई देती हैं।

लेकिन भारत ने यह भी कहा कि किसी एक विशेष मैप मॉडल को अनिवार्य नहीं बनाया जाना चाहिए। देशों, विश्वविद्यालयों, वैज्ञानिक संस्थानों और कार्टोग्राफरों को अपनी जरूरत के अनुसार उपयुक्त प्रोजेक्शन चुनने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए।

भारत ने इसे “तकनीकी और पद्धतिगत तटस्थता” का सिद्धांत बताया। (UN Correct the Map Resolution)

अमेरिका ने क्यों किया विरोध?

इस प्रस्ताव के खिलाफ वोट देने वाला एकमात्र देश अमेरिका था। अमेरिकी प्रतिनिधियों का तर्क था कि यह प्रस्ताव कार्टोग्राफी के तकनीकी मुद्दे से आगे बढ़कर वैचारिक बहस का हिस्सा बन रहा है। उनका मानना था कि संयुक्त राष्ट्र को ऐसे विषयों के बजाय वैश्विक शांति, सुरक्षा और आर्थिक विकास जैसे मुद्दों पर अधिक ध्यान देना चाहिए।

अमेरिका ने यह भी कहा कि नक्शों को लेकर अलग-अलग वैज्ञानिक दृष्टिकोण हो सकते हैं और किसी विशेष विचारधारा को बढ़ावा नहीं दिया जाना चाहिए। (UN Correct the Map Resolution)

इसके बावजूद महासभा में 164 देशों ने प्रस्ताव का समर्थन किया।

अभी भी क्यों इस्तेमाल होता है मर्केटर प्रोजेक्शन?

इतनी आलोचना के बावजूद मर्केटर प्रोजेक्शन पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। दरअसल यह समुद्री और हवाई नेविगेशन के लिए आज भी बेहद उपयोगी माना जाता है। इसमें दिशा और कोणों को सही तरीके से दिखाया जाता है, जिससे यात्रा मार्ग तय करना आसान होता है। (UN Correct the Map Resolution)

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इसी वजह से कई डिजिटल मैपिंग प्लेटफॉर्म और ऑनलाइन सेवाएं अभी भी “वेब मर्केटर” का इस्तेमाल करती हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि अलग-अलग उद्देश्यों के लिए अलग-अलग मैप प्रोजेक्शन उपयुक्त हो सकते हैं। शिक्षा, सांख्यिकीय तुलना और क्षेत्रफल समझाने के लिए इक्वल-एरिया नक्शे बेहतर हो सकते हैं, जबकि नेविगेशन के लिए मर्केटर अभी भी उपयोगी है। (UN Correct the Map Resolution)

लोगों की सोच को भी प्रभावित करते हैं नक्शे

यह विवाद सिर्फ भूगोल का नहीं है। कई विशेषज्ञों का मानना है कि नक्शे लोगों की सोच को भी प्रभावित करते हैं।

जब कोई महाद्वीप लगातार छोटा दिखाया जाता है, तो उसके वास्तविक आकार और महत्व को लेकर गलत धारणाएं बन सकती हैं। अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका और एशिया के कई देशों का तर्क है कि दुनिया को उनकी वास्तविक भौगोलिक स्थिति और पैमाने के साथ देखना चाहिए।

इसी वजह से “करेक्ट द मैप” प्रस्ताव को केवल तकनीकी सुधार नहीं, बल्कि वैश्विक प्रतिनिधित्व को अधिक संतुलित बनाने की कोशिश के रूप में भी देखा जा रहा है। (UN Correct the Map Resolution)

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  • herry passport

    हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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