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Explained: क्या भारत में बनेगी अमेरिकी जेवलिन मिसाइल? जानिए क्या है टाटा-लॉकहीड डील का पूरा गणित

जेवलिन दुनिया की सबसे आधुनिक और प्रभावी एंटी-टैंक मिसाइल प्रणालियों में से एक मानी जाती है। इसे अमेरिकी सेना ने वर्ष 1996 में सेवा में शामिल किया था...

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📍नई दिल्ली | 1 Sep, 2026, 12:04 PM

Javelin Missile Deal Explained: हाल ही में भारतीय सेना ने अमेरिका से जेवलिन एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल (एटीजीएम) खरीदने का समझौता किया है। इसे लेकर टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लिमिटेड (टीएएसएल) और जेवलिन जॉइंट वेंचर (जेजेवी) के बीच एक नया समझौता भी हुआ है। हालांकि इस समझौते की बारीकियों को देखें तो तस्वीर कुछ अलग है। समझौते के तहत भारत में जेवलिन मिसाइल का पूरा निर्माण नहीं होगा। भारत में केवल मिसाइल की फाइनल असेंबली और इंटीग्रेशन की सुविधा स्थापित करने की संभावना पर काम किया जाएगा। मिसाइल के सबसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील हिस्से अमेरिका में ही बनते रहेंगे।

Javelin Missile Deal Explained: क्या है जेवलिन मिसाइल?

जेवलिन दुनिया की सबसे आधुनिक और प्रभावी एंटी-टैंक मिसाइल प्रणालियों में से एक मानी जाती है। इसे अमेरिकी सेना ने वर्ष 1996 में सेवा में शामिल किया था।

यह एक मैन-पोर्टेबल मिसाइल है, यानी एक सैनिक इसे अपने कंधे पर लेकर युद्धक्षेत्र में इस्तेमाल कर सकता है। यह “फायर एंड फॉरगेट” तकनीक पर आधारित है। इसका मतलब है कि मिसाइल दागने के बाद सैनिक को टारगेट पर लगातार नजर रखने की जरूरत नहीं पड़ती। मिसाइल अपने गाइडेंस सिस्टम की मदद से खुद टारगेट तक पहुंच जाती है।

जेवलिन का इस्तेमाल टैंक, आर्मर्ड व्हीकल, बंकर और अन्य मजबूत सैन्य ठिकानों को नष्ट करने के लिए किया जाता है। इसकी प्रभावी मारक क्षमता करीब 2.5 किलोमीटर तक मानी जाती है।

भारत ने क्यों किया जेवलिन खरीदने का फैसला?

भारतीय सेना लंबे समय से तीसरी पीढ़ी की आधुनिक एंटी-टैंक मिसाइलों की कमी का सामना कर रही है। सेना के पास अभी भी मिलान-2टी और कोंकुर्स-एम जैसी वायर-गाइडेड मिसाइलें मौजूद हैं।

दूसरी ओर डीआरडीओ की मैन-पोर्टेबल एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल (एमपीएटीजीएम) का डेवलपमेंट भी चल रहा है। लेकिन सेना को तत्काल जरूरतों के लिए एक युद्ध में सिद्ध और आधुनिक प्रणाली की जरूरत थी।

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इसी कारण भारत ने अमेरिकी फॉरेन मिलिट्री सेल्स (एफएमएस) प्रक्रिया के तहत जेवलिन मिसाइल खरीदने का फैसले लिया।

अमेरिकी डिफेंस सिक्योरिटी कोऑपरेशन एजेंसी ने पहले ही लगभग 4.57 करोड़ डॉलर के संभावित पैकेज की जानकारी दी थी। इसमें 100 एफजीएम-148 जेवलिन मिसाइलें, एक फ्लाई-टू-बाय मिसाइल और 25 लाइटवेट कमांड लॉन्च यूनिट शामिल थीं। (Javelin Missile Deal Explained)

टाटा और अमेरिकी कंपनियों के बीच क्या हुआ समझौता?

31 अगस्त को टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स और जेवलिन जॉइंट वेंचर के बीच समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर हुए। जेवलिन जॉइंट वेंचर अमेरिका की दो प्रमुख डिफेंस कंपनियों लॉकहीड मार्टिन और रेथियॉन का जॉइंट वेंचर है। इन दोनों कंपनियों ने अब तक 55,000 से अधिक जेवलिन मिसाइलें और 12,000 से ज्यादा लॉन्च यूनिट तैयार की हैं।

समझौते के अनुसार दोनों पक्ष भारत में जेवलिन ऑल-अप राउंड (एयूआर) के लिए फाइनल असेंबली और इंटीग्रेशन सुविधा स्थापित करने की संभावना तलाशेंगे।

टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स को कई भारतीय कंपनियों के मूल्यांकन के बाद इस परियोजना के लिए प्रमुख भारतीय भागीदार चुना गया है। (Javelin Missile Deal Explained)

क्या भारत में पूरी जेवलिन मिसाइल बनेगी?

इस समझौते का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है। जारी प्रेस रिलीज के मुताबिक फिलहाल भारत में पूरी मिसाइल का निर्माण नहीं होगा। मिसाइल के मुख्य और संवेदनशील हिस्से अमेरिका में ही बनते रहेंगे।

लॉकहीड मार्टिन अपने ट्रॉय, अलबामा स्थित संयंत्र में मिसाइल के सब-असेंबली किट तैयार करेगी। वहीं रेथियॉन अपने टक्सन, एरिजोना संयंत्र में गाइडेंस इलेक्ट्रॉनिक्स यूनिट बनाएगी।

गाइडेंस इलेक्ट्रॉनिक्स यूनिट मिसाइल का सबसे अहम हिस्सा माना जाता है। यही मिसाइल का ऑनबोर्ड कंप्यूटर होता है, जो टारगेट की पहचान करता है और मिसाइल को लक्ष्य तक पहुंचाता है।

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ये सभी प्रमुख हिस्से अमेरिका से भारत भेजे जाएंगे। इसके बाद टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स भारत में उनकी फाइनल असेंबली और इंटीग्रेशन करेगी। (Javelin Missile Deal Explained)

क्या टेक्नोलॉजी ट्रांसफर होगा?

भारतीय सेना पहली बार 2009 में जेवलिन खरीदने की दिशा में आगे बढ़ी थी। उस समय भारत की प्राथमिकता केवल मिसाइल खरीदना नहीं बल्कि महत्वपूर्ण तकनीकों तक पहुंच हासिल करना भी था।

लेकिन 2012 तक चली बातचीत के दौरान टेक्नोलॉजी ट्रांसफर को लेकर सहमति नहीं बन सकी। इसके बाद यह मामला लंबे समय तक आगे नहीं बढ़ पाया।

वर्तमान समझौते में भी किसी संवेदनशील टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की घोषणा नहीं की गई है। न ही कोई स्वदेशीकरण लक्ष्य, निवेश राशि या भारतीय सामग्री का प्रतिशत घोषित किया गया है।

संयुक्त बयान में केवल इतना कहा गया है कि भारत में कंपोनेंट निर्माण की संभावनाओं पर विचार किया जाएगा। (Javelin Missile Deal Explained)

भारतीय रक्षा उद्योग को क्या फायदा होगा?

हालांकि यह फुल मैन्युफैक्चरिंग प्रोजेक्ट नहीं है, फिर भी इससे भारतीय उद्योग को कुछ महत्वपूर्ण अनुभव मिल सकते हैं। भारत में फाइनल असेंबली और इंटीग्रेशन की सुविधा स्थापित होने पर इंजीनियरों और तकनीशियनों को आधुनिक मिसाइल सिस्टम्स के साथ काम करने का अवसर मिलेगा।

टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स का कहना है कि इससे भारत के रक्षा औद्योगिक इकोसिस्टम में नई असेंबली विशेषज्ञता आएगी और हाई-टेक रोजगार के अवसर बढ़ेंगे।

इसके अलावा भारतीय सेना को आवश्यकता पड़ने पर मिसाइलों की उपलब्धता और सपोर्ट व्यवस्था को भी बेहतर तरीके से प्रबंधित किया जा सकेगा। (Javelin Missile Deal Explained)

जेवलिन क्यों मानी जाती है इतनी खास?

जेवलिन की सबसे बड़ी ताकत इसका फायर एंड फॉरगेट सिस्टम है। ऑपरेटर टारगेट को लॉक करता है और मिसाइल दाग देता है। इसके बाद मिसाइल खुद लक्ष्य तक पहुंचती है। मिसाइल में इंफ्रारेड सीकर लगा होता है, जो लक्ष्य की गर्मी को पहचानकर उसका पीछा करता है।

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इसमें दो प्रकार के अटैक मोड उपलब्ध हैं। पहला डायरेक्ट अटैक मोड है, जिसका इस्तेमाल बंकर और अन्य स्थिर लक्ष्यों के खिलाफ किया जाता है। दूसरा टॉप अटैक मोड है। इसमें मिसाइल पहले ऊपर उठती है और फिर टैंक की छत पर हमला करती है। चूंकि अधिकांश टैंकों की छत अपेक्षाकृत कमजोर होती है, इसलिए यह तरीका बेहद प्रभावी माना जाता है।

इराक और अफगानिस्तान में किया इस्तेमल

जेवलिन का इस्तेमाल अमेरिकी सेना ने इराक और अफगानिस्तान में किया है। लेकिन इसकी सबसे ज्यादा चर्चा रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान हुई।

यूक्रेनी सेना ने रूसी टैंकों और बख्तरबंद वाहनों के खिलाफ बड़ी संख्या में जेवलिन मिसाइलों का इस्तेमाल किया था। इस युद्ध के दौरान जेवलिन दुनिया की सबसे चर्चित एंटी-टैंक मिसाइल प्रणालियों में शामिल हो गई। (Javelin Missile Deal Explained)

पहले बीडीएल था भारतीय भागीदार

दिलचस्प बात यह है कि जेवलिन प्रोजेक्ट में पहले भारत डायनेमिक्स लिमिटेड (बीडीएल) को भारतीय भागीदार माना जा रहा था। फरवरी 2020 में डिफेंस एक्सपो लखनऊ के दौरान बीडीएल और जेवलिन जॉइंट वेंचर के बीच भी एक समझौता हुआ था। उस समय दोनों पक्ष भारत में जेवलिन के प्रोडक्शन की संभावनाओं पर काम कर रहे थे। (Javelin Missile Deal Explained)

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    हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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